भारत के सात प्रमुख फोटोग्राफरों की कला: सौंदर्य और स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति

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दिल्ली। भारत में फोटोग्राफी एक ऐसी कला है जो न केवल दृश्य सौंदर्य को उजागर करती है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशों को भी प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है। हाल के वर्षों में, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों ने फोटोग्राफरों को अपनी रचनात्मकता को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर प्रदान किया है। इस लेख में, हम सात उल्लेखनीय भारतीय फोटोग्राफरों-तारस तारापोरवाला, अर्जुन मार्क, रोहन श्रेष्ठ, विक्रम बावा, रफीक सईद, भूमिका भाटिया और सौम्या अय्यर-के कार्यों पर प्रकाश डालेंगे, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से Nude Art को न केवल सौंदर्यपूर्ण बनाया, बल्कि सामाजिक मानदंडों को चुनौती भी दी।

तारस तारापोरवाला: कामुकता का सौंदर्य
तारस तारापोरवाला (@taras84) की फोटोग्राफी उनकी संवेदनशील और कामुक छवियों के लिए जानी जाती है। उनकी इंस्टाग्राम फीड दर्शकों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां मानव शरीर को कला के रूप में उत्सव के साथ प्रस्तुत किया जाता है। तारस की तस्वीरें नग्नता को एक नाजुक और सौंदर्यपूर्ण तरीके से चित्रित करती हैं, जो दर्शकों को मानव शरीर की सुंदरता और उसकी सहजता की ओर आकर्षित करती हैं। उनकी रचनाएं न केवल तकनीकी रूप से उत्कृष्ट हैं, बल्कि भावनात्मक गहराई भी प्रदान करती हैं, जो दर्शकों को गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं।

अर्जुन मार्क: फैशन और कला का संगम
फोटोग्राफर अर्जुन मार्क अपनी फैशन फोटोग्राफी में एक अनूठी संवेदनशीलता लाते हैं। उनकी तस्वीरें बोल्ड और नवीन हैं, जो Nude Art को फैशन के साथ जोड़कर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। अर्जुन की रचनाएं अक्सर समकालीन सौंदर्यशास्त्र और पारंपरिक भारतीय तत्वों का मिश्रण होती हैं, जो उनकी फोटोग्राफी को विशिष्ट बनाती हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड एक दृश्यात्मक यात्रा है, जो दर्शकों को न केवल देखने, बल्कि महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।

रोहन श्रेष्ठ: बॉलीवुड का पसंदीदा लेंस

रोहन श्रेष्ठ (@rohanshrestha) बॉलीवुड के जाने-माने फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने शाहरुख खान से लेकर प्रियंका चोपड़ा तक कई बड़े सितारों को अपने कैमरे में कैद किया है। उनकी फोटोग्राफी में टेस्टोस्टेरोन से भरी ऊर्जा और Nude Art का साहसी प्रदर्शन देखने को मिलता है। रोहन की तस्वीरें न केवल तकनीकी रूप से मजबूत होती हैं, बल्कि वे अपने विषयों की व्यक्तित्व को भी उजागर करती हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड में Nude Art का प्रदर्शन अनपोलोजेटिक और सशक्त है, जो सामाजिक धारणाओं को चुनौती देता है।

विक्रम बावा: त्रि-आयामी दृष्टिकोण
विक्रम बावा (@vikram_bawa) भारत में त्रि-आयामी (3D) फोटोग्राफी के अग्रणी हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड सेलिब्रिटी पोर्ट्रेट्स और नग्न कला का एक शानदार मिश्रण प्रस्तुत करती है। विक्रम की तस्वीरें मानव शरीर की सुंदरता को एक नए दृष्टिकोण से दर्शाती हैं, जहां तकनीक और कला का संगम होता है। उनकी रचनाएं दर्शकों को न केवल दृश्यात्मक रूप से आकर्षित करती हैं, बल्कि मानव शरीर की जटिलता और सौंदर्य को समझने के लिए प्रेरित करती हैं।

रफीक सईद: श्वेत-श्याम का जादू
रफीक सईद (@rafique_sayed) भारत के सबसे प्रसिद्ध श्वेत-श्याम (B&W) फोटोग्राफरों में से एक हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड उनकी तीक्ष्ण सौंदर्यबोध को दर्शाती है, जहां Nude Art को एक कालातीत और गहन तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। रफीक की तस्वीरें अक्सर प्रमुख विज्ञापन अभियानों का हिस्सा रही हैं, और उनकी Nude Art समाज के रूढ़िगत विचारों को तोड़ने का प्रयास करती है। उनकी रचनाएं न केवल दृश्यात्मक रूप से प्रभावशाली हैं, बल्कि भावनात्मक और वैचारिक गहराई भी प्रदान करती हैं।

भूमिका भाटिया: प्रकाश और छाया का खेल
भूमिका भाटिया (@bhumikab) की फोटोग्राफी प्रकाश और छाया के साथ एक जादुई खेल है। उनकी तस्वीरें ईथरियल और कभी-कभी अतियथार्थवादी होती हैं, जो दर्शकों के दिल को छू लेती हैं। भूमिका की Nude Art मानव शरीर को एक काव्यात्मक और सौंदर्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है, जो समाज में नग्नता के प्रति गलत धारणाओं को चुनौती देती है। उनकी इंस्टाग्राम फीड एक ऐसी दुनिया की झलक देती है जहां कला और भावनाएं एक-दूसरे के साथ संनाद करती हैं।

सौम्या अय्यर: साहसी और नवीन दृष्टिकोण
मुंबई की फैशन फोटोग्राफर सौम्या अय्यर की तस्वीरें अपनी साहसिकता और अनूठे दृष्टिकोण के लिए जानी जाती हैं। उनकी रचनाएं पहली नजर में ही ध्यान खींचती हैं, और उनकी Nude Art सामाजिक मानदंडों को चुनौती देती है। सौम्या की फोटोग्राफी में एक तीक्ष्णता और परिप्रेक्ष्य है जो दर्शकों को न केवल देखने, बल्कि सोचने के लिए मजबूर करता है। उनकी इंस्टाग्राम फीड उनकी रचनात्मकता और साहस का एक जीवंत प्रदर्शन है।

 

नग्न कला और सामाजिक संदेश
इन फोटोग्राफरों की कला न केवल सौंदर्यपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशों को भी व्यक्त करती है। भारत जैसे देश में, जहां नग्नता को अक्सर कामुकता के साथ जोड़कर देखा जाता है, ये फोटोग्राफर Nude Art को एक स्वतंत्र और सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाएं खजुराहो जैसे प्राचीन भारतीय मंदिरों की नग्न मूर्तियों की याद दिलाती हैं, जो मानव शरीर को कला और सौंदर्य के प्रतीक के रूप में उत्सव मनाते थे।

चुनौतियां और विवाद
हालांकि, Nude Art का प्रदर्शन भारत में विवादों से मुक्त नहीं रहा है। 2006 में, एम.एफ. हुसैन की नग्न चित्रकारी ने व्यापक विवाद खड़ा किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें देश छोड़ना पड़ा। इन फोटोग्राफरों को भी इंस्टाग्राम जैसे मंचों पर सेंसरशिप और सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता है। फिर भी, ये कलाकार अपनी कला के माध्यम से समाज की रूढ़ियों को तोड़ने और मानव शरीर को एक सौंदर्यपूर्ण और सशक्त रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

तारस तारापोरवाला, अर्जुन मार्क, रोहन श्रेष्ठ, विक्रम बावा, रफीक सईद, भूमिका भाटिया और सौम्या अय्यर भारतीय फोटोग्राफी के क्षेत्र में अपनी अनूठी छाप छोड़ रहे हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड्स न केवल दृश्यात्मक सौंदर्य का खजाना हैं, बल्कि सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने और मानव शरीर की सुंदरता को उत्सव के रूप में प्रस्तुत करने का एक साहसी प्रयास भी हैं। ये फोटोग्राफर नग्न कला को एक नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करते हैं, जहां यह न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम भी है।

संघ यात्रा के नए क्षितिज..!

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– प्रशांत पोळ

दिल्ली । दिनांक 26, 27 और 28 अगस्त को, दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ इस शीर्षक से व्याख्यानमाला संपन्न हुई। यह व्याख्यानमाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आयोजित की थी और सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी इसमें वक्ता थे। इस कार्यक्रम में देश-विदेश के गिने-चुने एक हजार लोग आमंत्रित थे। इनमें कुछ देशों के राजनयिक भी सम्मिलित थे। विज्ञान भवन अत्याधुनिक तकनीकी से सुसज्जित हैं। इसलिए, सरसंघचालक जी जब हिंदी में बोल रहे थे, तभी हेडफोन्स के माध्यम से उसे अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश और जर्मन भाषा में सुनने की व्यवस्था थी। हम यूं समझें, कि देश के वैचारिक क्षेत्र के Who’s Who वहां उपस्थित थे।

मोटे तौर पर, पहले दिन सरसंघचालक जी ने सौ वर्ष के संघ के प्रवास का वर्णन
किया। संघ की स्थापना की आवश्यकता का गहराई से विवेचन किया। दूसरे दिन, संघ के प्रवास की दिशा क्या रहेगी, संघ का लक्ष्य क्या रहेगा, अगले सौ वर्षों की संघ की सोच क्या रहेगी, इन विषयों पर चर्चा की। अंतिम दिन श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए।

*तीन दिनों की यहां व्याख्यानमाला अनेक अर्थों में ऐतिहासिक थी। संघ के बारे में अत्यंत स्पष्ट चित्र खींचने वाली थी। यह दिशा दर्शक भी थी।*

इस विजया दशमी को संघ को सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा मील का पत्थर हैं। किंतु साध्य नहीं हैं। इस प्रवास में अभी और आगे जाना है।

‘कहां तक और किस दिशा में..?’

इसका उत्तर भी सरसंघचालक जी ने बड़े विस्तार के साथ दिया हैं। आपका दूसरे दिन का उद्बोधन, कार्यक्रम प्रारंभ होने के बाद 30 वे मिनट से आगे, लगभग 10 – 12 मिनट तक यदि हम सुनते हैं, तो सारा चित्र स्पष्ट हो जाता हैं।

सरसंघचालक जी ने धर्म (रिलिजन नहीं) की स्पष्टता बताते हुए कहा कि, “धर्म तो इस सृष्टि में पहले से ही अस्तित्व में था। धर्म यह यूनिवर्सल हैं। *विश्व की गति को पहचान कर उसको ठीक से चलाने वाला जो प्राकृतिक नियम हैं, वह धर्म हैं।*”

धर्म की इतनी सरल, इतनी सुंदर और इतनी सुस्पष्ट व्याख्या हमने कहीं सुनी नही होगी।

*इसी विचार को आगे बढ़ते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि, “इस धर्म को हमें विश्व को समझाना हैं। उसे सारे विश्व में लेकर जाना हैं।”*

पर कैसे..?

Not by Preaching, not by Conversion, but by Practice.
_(प्रवचन या भाषण देकर नहीं, धर्मांतरण करके भी नहीं, तो धर्म को जीने का उदाहरण प्रस्तुत करके)_

*यह जबरदस्त हैं। नए वैश्विक परिदृश्य में यह अत्यंत प्रभावी संदेश हैं। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की हमारी संकल्पना प्राचीन हैं। उसे अगले 100 वर्षों में धरातल पर उतारने का संकल्प लेकर संघ आगे बढ़ रहा हैं।*

सरसंघचालक जी ने वर्ष 1991 का एक वाकया बताया। तब वह विदर्भ प्रांत के प्रांत प्रचारक थे। स्वर्गीय लक्ष्मणराव जी भिड़े उन दिनों पश्चिम क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक थे। इससे पहले वह अनेक वर्ष विदेश विभाग में प्रचारक थे। सरसंघचालक जी 1991 के वर्ग में लक्ष्मणराव जी भिड़े के उद्बोधन का उल्लेख कर रहे थे। उस उद्बोधन में लक्ष्मणराव जी ने कहा कि, “भारत के बाहर संघ का कार्य करने वाली अब तीसरी पीढ़ी हैं। इस पीढ़ी ने अपने-अपने देशों में, देश – काल – परिस्थिति और प्रवृत्ति के अनुरूप संघ खड़ा करना चाहिए। ऐसा संघ, जिसे देखकर उस देश के लोग कहे, हमें ऐसा RSS खड़ा करना हैं..!”

कितनी बड़ी सोच है यह..!

स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी की कविता की पंक्तियां हैं –
_शत जन्म शोधिताना I शत आर्ति व्यर्थ झाल्या I_
_शत सूर्य मालिकांच्या I दीपावली विझाल्या II_
(असंख्य जन्मों की खोज, अनगिनत आरतियाँ और हजारों सूर्य-मालाओं की दीप्ति भी निष्फल सिद्ध हुई, मानो दीपावली के दीप भी बुझ गए हों।)

इसमें सावरकर जी अपने सौरमाला (सूर्य मंडल) जैसे सौ सौरमाला (Solar System) की बात कर रहे हैं। प्रख्यात मराठी लेखक पु. ल. देशपांडे जी ने कहा था, “सावरकर जी की इन दो पंक्तियों में दिखी विचारों की उडान के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल मिलना चाहिए।”

बस् ऐसा ही कुछ इस सोच में भी है।

_विश्व धर्म प्रकाशेन I विश्व शांति प्रवर्तके II_
अर्थात, इस विश्व धर्म के प्रकाश में, विश्व शांति का प्रवर्तन होना चाहिए।

आज जो विश्व का परिदृश्य हम देख रहे हैं, वह बहुत अच्छा नहीं हैं। यहां लड़ाई हैं, संघर्ष हैं, गरीबी हैं, सामाजिक अस्वस्थता हैं, उजड़े हुए कुटुंब हैं, विद्वेष हैं, कट्टरपन और बहशीपन हैं… ऐसे विश्व में आज अपने देश का ‘हिंदू विचार’ अत्यंत प्रासंगिक और महत्व का बन गया हैं। इसलिए, अब विश्व के अनेक देशों में यह विचार लेकर, उन – उन देशों की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार उसे ढालकर, नयी विश्व रचना का सृजन करने की आवश्यकता दिख रही हैं।

सहसा, 11 सितंबर 1893 को, शिकागो के अंतरराष्ट्रीय धर्म परिषद में दिया गया स्वामी विवेकानंद जी का भाषण स्मरण हो आया..!

सरसंघचालक जी ने कहा कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संकल्पना संघ में नई नहीं हैं। संघ के अंदर कई बार इसकी चर्चा हो चुकी हैं। किंतु प्रकट रूप से संघ यह बात कहता नहीं था। सरसंघचालक जी ने कहा, “उन दिनों यदि हम आपको बुलाते तो आप नहीं आते। आते भी, तो हमारी बातों को गंभीरता से नहीं लेते। और यह विश्व कल्याण की बातें तो आपको स्वप्नरंजन लगती।”

इसका कारण था। तब संघ की विशेष ताकत नहीं थी, और अपने देश की भी स्थिती, किसी को सुनाने जैसी नहीं थी।

*किंतु अब नहीं। अब बहुत कुछ बदला हैं। संघ की शक्ति और फैलाव भी बढा हैं। साथ ही, भारत वैश्विक मंच पर एक शक्तिशाली तथा तेजी से आगे बढ़ते देश के रुप मे प्रस्थापित हो चुका हैं।*

किंतु सरसंघचालक ने यह भी कहा कि, “विश्व कल्याण की बात करने से पहले हमें एक प्रतीक के रूप में, एक मॉडल के रूप में खड़ा होना पड़ेगा। यदि हम ही हमारे हिंदू विचार को प्रत्यक्ष जीवन में नहीं उतारेंगे, तो विश्व हमारी बातें क्यों सुनेगा.?”

इसलिए, संघ ने अपने प्रवास के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर प्रत्यक्ष समाज में परिवर्तन लाने का संकल्प लिया हैं। इस परिवर्तन के पांच आयाम है –

1. *समरसता* – सारा समाज जाति पंथ से परे, एकजुट हो। ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ यह भावना सबके मन में रहे।

2. *पर्यावरण* – पर्यावरण पूरक जीवन यह हमारी हिंदू जीवन पद्धति का अभिन्न अंग रहा हैं। उसे, हमे पुनः आज के परिपेक्ष्य में अपनाना हैं।

3. *’स्व’ के भाव का जागरण* – देश तभी उठ खड़ा होगा, जब हमारे अंदर अपने ‘स्व’ का भाव जागृत होगा। इसलिए स्वदेशी समवेत, हमारी पहचान से जुड़ी हर चीज अपनानी होगी।

4. *परिवार प्रबोधन* – समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार, उसे मजबूत करना।

5. *नागरिक कर्तव्य* – सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन करते हुए राष्ट्रहित में योगदान देना।

इन पांच बातों को यदि हम समाज में ठीक से उतारते हैं, तो हम निश्चित रूप से विश्व को कुछ बताने की भूमिका में रह सकेंगे।

इस त्रि दिवसीय व्याख्यानमाला में सरसंघचालक जी ने अत्यंत खुलकर और पारदर्शिता से सारी बातें कहीं। ‘हिंदू’ शब्द के आग्रह के बारे में तर्कपूर्ण विचार रखें। साथ ही, “भारत यह हिंदू राष्ट्र है। अलग से घोषित करने की आवश्यकता नहीं।” यह भी अत्यंत स्पष्टता से कहा।

दो मिनट के लिए जरा राजनीति को बाजू में रखें, मीडिया के टीआरपी समाचारों को दुर्लक्षित करें और इस तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के बारे में सोचे, तो हम पाएंगे कि भारत के भविष्य का एक सुस्पष्ट चित्र सरसंघचालक जी ने खींचा है..!

_(अगर यह व्याख्यानमाला नही सुनी होगी, तो एक बार अवश्य सुने।)_

Renowned Delhi Painter Shri Anand Narain, awarded/ honoured by the National Award

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Delhi : Beginning this month, Shri Anand Narain was honoured with the National Award in the 64th National Art Exhibition organised by Lalit Kala Akademi, New Delhi and Ministry of Culture, Government of India. He was honoured on August 5, 2025 by Minister of Culture and Tourism, Shri Gajendra Singh Shekhawat at the inaugural ceremony of the National Exhibition, accompanied by Secretary, Ministry of Culture, Government of India Shri Vivek Agarwal, Additional Secretary Ms. Amita Prasad Sarabhai, and Vice President of Lalit Kala Akademi Dr. Nandlal Thakur. There were 5922 applicants in the National Art Exhibition, out of which 283 works were selected, in which 20 artists from across the country were honoured in various genres such as painting, sculpture, drawing, graphic, photography and mixed media.
Mr. Narain has been awarded for the year 2024 from Uttar Pradesh for his painting ‘Kan-Kan Mein Hain Ram’. This work depicts the grandeur of the spiritual city of Ayodhya. Overwhelmed by cultural values,he has a vision of seeing things holistically, away from individualistic thoughts, which makes him different from others. A noteworthy contribution of the integration of art and literature in Mr. Narain’s inner self is that poetry can be seen and heard peeping in his artworks and in the same way, the diversity, attraction and brightness like the colors contained in the vocabulary of pictorial scenery in his poetic lines and expressions can also be seen in many forms and levels. Talking of his initial thought behind the award winning painting, Mr. Narain mesmerizes by reciting his own two lines

– “जिस से हो हर रोज दिवाली, ऐसा दिया दिला दो राम
दिया तले अंधेरे को भी अबकी बार जला दो राम” – आनन्द नारायण

He is an artist who is known for his experiments, creative diversity and innovation in the field of contemporary Indian art. He completed his graduation (B.F.A) from College of ArtLucknow and post graduation (M.F.A) from Jamia Millia Islamia New Delhi. Mr. Narain has had a long journey as a painter so far. As a result of the movement of subjects, his paintings got expanded by participating in more than fifty group painting exhibitions at the state, national and international level. His stylistic identity got established. So far, fourteen solo exhibitions have been organized in the prestigious art galleries of the metropolis. Both art and artist got recognition from the series of paintings in special exhibitions. He has also been honoured by the UP State LalitKala Akademi Award amongst many others.

The series’ of his paintings titled “Banaras” and “Untouched Nature” depict the expanse of Indian plains, settlements on the banks of rivers, or rivers making barren land fertile, bridges and culverts to cross them, forests that nourish life, the factors of myths embedded in the Indian psyche, a man living with self-respect, taking pride of being a pure Indian amidst culture and traditions – all these together give shape and concerns to his series of paintings. Whether it is Anand’s “Spiritual Heritage Banaras” series or his award winning work ‘Kan-KanMein Hain Ram’, they are evidence of twenty-first century India. It has become rare today for an artist to be in his time, to express himself with his cultural metaphors. In such a situation, Anand Narain’s pure Indian mind sees India in its ‘self’, historical images marking the country and time, the effort to preserve Indian symbols amidst all this is at an artistic peak, it is no less than an achievement. The National Art Exhibition will run till 15 September 2025.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संवाद सत्र द्वितीय दिवस

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आने वाली पीढ़ी को संकट से बचाने केलिये समाज में सकारात्मक पर जोर

–रमेश शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅक्टर मोहनजी भागवत ने अपने संवाद संबोधन में दूसरे दिन पूरे विश्व को उपभोक्तावाद के नये संघर्ष से सावधान किया और आने वाली पीढ़ी को इस संकट से बचाने केलिये आत्म जाग्रति और संयम-समन्वय पर जोर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है। अपने शताब्दी समागम के अंतर्गत संघ ने दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया है। इस संवाद समागम में दूसरे दिन सरसंघचालक डाॅक्टर मोहन जी भागवत ने दूसरे दिन पूरे संसार में आने वाले उपभोक्तावाद के संकट से सचेत किया। उनका कहना था कि परिवार, समाज और देश ही नहीं पूरे संसार में भोगवाद की स्पर्धा बढ़ रही है। बढ़ता हुआ भोगवाद स्पर्धा को जन्म देता है और स्पर्धा नये संघर्ष को जन्म देती है। भागवत जी की यह चेतावनी उस मानवीय मनोविज्ञान पर आधारित है जिसमें भोगवाद की प्रवृत्ति मनुष्य को अहंकारी बनाती है। और अहंकार ही परिवार समाज एवं दुनियाँ में संघर्ष का कारण बनता है। यदि इतिहास के पुराने महायुद्ध की घटनाओं को छोड़ दें तो भी बीसवीं शताब्दी के दोनों विश्व युद्ध केवल अपने अहंकार के विस्तार का प्रयास करने के कारण ही हुये। सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में इन दोनों महायुद्धों का उल्लेख करके सचेत किया कि जिस अहंकार से वे दोनों युद्ध हुये वह अहंकार समाप्त नहीं हुआ। इन दिनों भले विश्व युद्ध न चल रहा हो लेकिन संसार में युद्ध जैसी स्थिति है। जो आने वाली पीढ़ी के लिये ही नहीं पूरे विश्व की मानवता केलिये नया संकट है। इस संकट से बचने के एक मात्र उपाय धर्म आधारित

सकारात्मक सोच है। निसंदेह सरसंघचालक जी का यह कथन वर्तमान परिस्थिति में मानवता की रक्षा का सबसे सुगम उपाय है। लेकिन धर्म का अर्थ वह नहीं पश्चिमी जगत की अवधारणा है अथवा मध्य एशिया में जो स्वरूप उभरा। प्रकृति विविधता से भरी है। एक उपवन जितनी वनस्पति होती हैं सबके रंग रूप अलग होते हैं। एक वन में सभी प्राणियों के आकार प्रकार, भोजन रहने की शैली सब अलग होती है। वन और उपवन का सौन्दर्य उनकी विविधता में है तब कैसे सारे संसार के सभी मनुष्यों को एक रंग, भाषा भूषा में ढाला जा सकता है। भारतीय दर्शन की यही विशेषता है। इसमें न एकसी पूजा पद्धति पर जोर है और न भाषा, भूषा, भोजन, भजन पर जोर है। सब अपनी पसंद के देव को अपना ईष्ट बनायें। केवल इतनी मर्यादा आवश्यक है कि हम अपने ईष्ट अपने आराध्य की पूजा उपासना तो करें लेकिन किसी अन्य की आस्था को ठेस न पहुँचे। सरसंघचालक जी ने अपने द्वितीय दिवस के संवाद में इस विविधता को संघर्ष का नहीं समन्वय की शक्ति बनाने का आव्हान किया और संकेत किया कि आज विश्व को इसी भारतीय दर्शन की आवश्यकता है। जिसमें धर्म केवल पूजा उपासना की कर्म क्रिया तक सीमित नहीं है। प्रकृति और मानवता केलिये जितने आदर्श कर्त्तव्य हैं, जितने धारणीय कर्त्तव्य हैं वे सब धर्म की परिभाषा में आते हैं। सरसंघचालक जी ने धर्म की यही शास्त्रोक्त व्याख्या अपने संवाद में की।

उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म सार्वभौमिक है। यह सृष्टि के आरम्भ से ही अस्तित्व में है और सृष्टि के रहने तक चलेगा। यह मनुष्य की बुद्धि पर निर्भर करता है कि वह उसे कितना मानता है, अथवा कितना जानता है। सरसंघचालक जी की यह बात अत्यंत सटीक है। व्यक्ति के जानने या मानने से सत्य पर कोई अंतर नहीं आता। कुछ शताब्दी पहले तक मनुष्य गुरुत्वाकर्षण शक्ति से अनभिज्ञ था। लेकिन यह शक्ति तो तब भी थी और प्रकृति के अस्तित्व बनाये रखने में उसकी भूमिका भी थी और आज भी है। मनुष्य को उसका ज्ञान हुआ तो उसका उपयोग करके जीवन को अधिक सुगम बनाने लगा। ठीक इसी प्रकार धर्म का विषय है। धर्म का वास्तविक अर्थ भारतीय चिंतन में है, इसके केन्द्र में संपूर्ण प्रकृति और प्राणी मात्र है। जड़ और चेतन का धारणीय कर्तव्य को धर्म माना है। धरती, आकाश, पवन, वायु और अग्नि द्वारा जीवन संचालन उनका धर्म है। धर्म के इस वास्तविक दर्शन से ही संसार में शांति रहेगी, मानवता का विकास होगा। भागवत जी स्पष्ट किया कि पूरे विश्व को शांति और मानवता का विश्व धर्म समझाने के लिए हिंदू समाज का संगठित होना होगा। विश्व शांति केलिये धर्म सब जगह जाना चाहिए। लेकिन इसका अर्थ धर्मांतरण या “कनवर्सन” कतई नहीं है। धर्म में कनवर्सन होता भी नहीं है। धर्म तो शाश्वत है, मौलिक है, सत्य का तत्व है, जिसके आधार पर जीवन चलता है। पूजा उपासना जिसको जैसी करना हो, वह करे। लेकिन मानवीय और प्राकृतिक गुणों को सर्वोपरि रखकर ही करना चाहिए।

सरसंघचालक जी ने वैश्विक शांति और मानवता की रक्षा केलिये पाँच आधारभूत विन्दुओ॔ पर जोर दिया। इसमें पर्यावरण सुरक्षा, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब परंपरा की रक्षा, दायित्व वोध और आत्म अनुशासन है। उन्होंने चेतावनी दी कि आर्थिक उन्नति की लालसा मानवीय मूल्यों और पर्यावरण दोनों की क्षरण कर रही है। भागवतजी की यह चेतावनी आज के संदर्भ में अति उपयुक्त है। व्यक्ति को प्रगति करना चाहिये, आर्थिक उन्नति भी करना चाहिए लेकिन इस प्रगति और आर्थिक उन्नति आधार क्या हो, आर्थिक प्रगति की अंधी रफ्तार न हो, इसमें अहंकार का भाव न हो, किसी अन्य के हितों का शोषण न हो। यदि ऐसा होगा तो यह मानवता के बीच असमानता पैदा करती है, द्वेष पैदा करती है, गरीब और अमीर का अंतर बढ़ाती है। यह अंतर मानवीय मूल्यों के विरुद्ध होगा। इसलिये आर्थिक उन्नति में भी मानवता और पर्यावरण दोनों का संतुलन आवश्यक है। इसी बात पर भागवत जी ने जोर दिया। उन्होंने इस अंतर को स्पष्ट करते हुये पश्चिम और दक्षिण के देशों का उदाहरण भी दिया। दक्षिण के देशों की शिकायतों का उल्लेख भी किया। उन्होंने दो टूक शब्दों कहा कि इसपर चर्चा तो होती है लेकिन समाधान नहीं निकलता। इसका समाधान आत्म चिंतन से होगा। यही विशेषता भारतीय चितन की है। भारत संसार को तभी समाधान दे सकता है जब हिन्दु समाज जागरुक हो और संगठित हो। विश्व शांति केलिये सरसंघचालक जी ने हिन्दु समाज की जागरुकता और संगठन पर जोर दिया।

मोहन भागवत जी ने भारतीय समाज जीवन में उदारता और क्षमाशीलता की भी चर्चा की और कहा कि संसार मे शांति केलिये उदारता का यही भाव आना चाहिए, दूसरे के अस्तित्व, और सम्मान दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए। आज विश्व में अशांति और तनाव का जो वातावरण बढ़ रहा है वह असहिष्णुता के कारण है। इससे मुक्ति का मार्ग मानवता और विश्व बंधुत्व के भाव में है। यही भाव भारतीय चिंतन के मूल में। पूरे विश्व के कल्याण की इच्छा रखने का ऐसा दर्शन संसार में कहीं नहीं है। यह मानवीय और प्राकृतिक सिद्धांत के धर्म का ही अनुपालन है कि भारत ने किसी पर अपनी बात मानने का दबाव कभी नहीं बनाया, और न अपने मतानुसार जीवन जीने के लिये किसी को बाध्य किया। भारत ने तो शत्रुओं को भी क्षमा किया है, आक्रमणकारियों को भी क्षमा किया है। क्षमाशीलता के इस भारतीय गुण का उल्लेख करते हुये भागवतजी स्पष्ट किया कि भारत ने हमेशा अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम बरता है। जिन्होंने भारत का नुकसान किया है, उनके साथ भी उदारता का व्यवहार किया, उनकी भी सहायता की है। व्यक्ति के अहंकार और देशों के अहंकार के कारण दुश्मनी होती है लेकिन भारत उस अहंकार के परे है।

मोहन भागवत जी ने प्रत्येक व्यक्ति के दृष्टिकोण में सकारात्मकता रखने का आव्हान किया। सकारात्मकता का यह चिन्तन ही समाज एवं संस्कृति को दीर्घजीवी बनाता है। हमारे दृष्टिकोण में भी सकारात्मकता और मौलिकता होनी चाहिए। देखकर और सुनकर राय बनाना हितकारी नहीं है। भागवत जी ने उदाहरण दिया कि भारतीय समाज जीवन में जितनी बुराई दिखती है। समाज में उससे 40 गुना ज्यादा अच्छाई हैं। लेकिन योजनापूर्वक कुछ लोग और कुछ मीडिया समूह केवल बुराइयों पर ही अपनी बात केन्द्रित करते हैं। यदि केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर भारतीय का आकलन होगा तो यह अनुचित होगा। सुनकर राय बनाना और समझ कर राय बनाना दोनों में अंतर होता है। सुनकर केवल बुराइयों की चर्चा करने से आत्मविश्वास कम होता है जो प्रगति में बाधक है।

उन्होनें कहा कि हिन्दु विचार वसुधैव कुटुम्बकम वाला है। वह हर रास्ते को अच्छा मानता है। दुनियाँ धर्म के आधार पर जो दूरियाँ बढ़ रही हैं उन्हें दूर करने के लिए सभी ओर से प्रयास करने की जरूरत है।

अपने संवाद में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोध का विन्दु भी लिया और कहा कि जितना विरोध संघ का हुआ, उतना विरोध किसी अन्य संगठन का नहीं हुआ, फिर भी यदि संघ बढ़ रहा है, संघ का समर्थन बढ़ रहा है तो इसके पीछे स्वयंसेवकों के मन में भारत राष्ट्र और समाज के प्रति प्रेम है। और अब समय के साथ विरोध की धार कम हुई है। उन्होंने सभी समाज जनों से यह भी आव्हान किया कि अच्छे लोगों से दोस्ती करें, उन लोगों को नजरअंदाज करें जो अच्छा काम नहीं करते। अच्छे कामों की सराहना करें, भले ही वे विरोधियों द्वारा किए गए हों। गलत काम करने वालों के प्रति क्रूरता नहीं, बल्कि करुणा दिखाए। उन्होंने समाज की निस्वार्थ सेवा करने पर जोर दिया और कहा कि निस्वार्थ सेवा में जो सार्थकता है उसका आनंद अलग होता है।
सरसंघचालक जी ने अपने समाज में संवादशीलता पर बहुत जोर दिया। और कहा कि समस्याओं का जैसा समाधान संवाद से मिलता है वैसा संघर्ष से नहीं मिलता। उन्होंने सामाजिक समरसता पर बहुत जोर दिया और कहा कि यह काम कठिन है लेकिन करना है। निसंदेश समाज विभाजन न तो भारतीय संस्कृति के मूल में है और न यह भारत राष्ट्र के हित में है। जो संस्कृति संपूर्ण वसुन्धरा के निवासियों को एक कुटुम्ब मानती है, सभी प्राणियों सद्भाव की प्रार्थना करती है भला उसमें सामाजिक विभाजन की रेखाएँ। अतीत के अनुभव और भविष्य की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही मोहन भागवत जी ने सामाजिक समरसता का आव्हान किया। सरसंघचालक जी के इस संवाद संबोधन में भारत के साँस्कृतिक गौरव, ज्ञान विज्ञान की विरासत और भविष्य में आने वाली सभी समस्याओं के समाधान की झलक है। उन्होंने किसी के प्रति किसी आलोचना अथवा नकारात्मक बात नहीं कही। सबको साथ लेकर चलने और सबसे संवाद की ही महत्ता समझाई जो आज परिवार, समाज और राष्ट्र सबको लिये आवश्यक है।

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