पश्चिम बंगाल ‘शपथ ग्रहण’ में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

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कोलकाता । चाहे समाजनीति हो-राजनीति हो, याकि विचार-विमर्श हो। सबमें संकेतों और प्रतीकों के गहरे अर्थ होते हैं। प्रतीक भी अपने आप में दिशाबोध उद्घाटित करते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के 9 मई 2026 को शपथग्रहण समारोह में देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतीकों के माध्यम से कई संदेश दिए। अक्सर हम राजनीति की चर्चा करते हुए केवल गणितीय रूप में घटनाक्रमों, परिणामों का मूल्यांकन करते हैं। लेकिन प्रतीकों के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ कहा जाता है। जो कई बार शब्दों में प्रकट नहीं हो पाता है। पश्चिम बंगाल के पूरे चुनावी प्रचार अभियान से लेकर शपथ ग्रहण समारोह तक ‘प्रतीकों’ ने बहुत कुछ सुस्पष्ट किया है। शपथ ग्रहण के दौरान कई ऐसे प्रतीक दिखे जो बहुत कुछ कह रहे हैं। पहला प्रतीक है — 25 ‘पच्चीसे बैसाख’ यानी गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती का अवसर। भाजपा ने शपथ ग्रहण के लिए इसी तारीख़ को चुना। क्योंकि बंगभूमि में जिस ‘सोनार बांग्ला’ का संकल्प भाजपा ने लिया है। वो राष्ट्रीयता का दिशाबोध गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की ‘स्व’ और ‘स्वदेशी’ की वैचारिकी से होकर ही जाएगा। ये अवसर यह भी बताने का निमित्त था कि- राष्ट्रीय अस्मिता और बांग्ला अस्मिता में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही हैं।

दूसरा प्रतीक है- शपथग्रहण समारोह का स्थान। शपथग्रहण जिस जगह आयोजित हुआ वो है कलकत्ता का ‘बिग्रेड परेड मैदान’। जहां से कभी 16 अगस्त 1946 को बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और क्रूर आतंक का पर्याय मुस्लिम लीग के नेता हुसैन सुहरावर्दी ने हिन्दुओं का नरसंहार कराया था। सुहरावर्दी ने भारत विभाजन वाले ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के क्रूर आतंक की शुरुआत की थी। उस दिन लाखों मुसलमानों की हत्यारी भीड़ ने बंगाल में रक्तपात की सीमाएं लांघ दी थी। हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था। कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल को हिन्दुओं के ख़ून से लाल कर दिया। लेकिन अब स्वाधीनता के बाद जब पहली बार पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनी तो वहां हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। भाजपा ने जिस ब्रिगेड परेड मैदान’ का चयन किया— वो ये बता रहा कि – पश्चिम बंगाल में अब राष्ट्रीयता के पर्याय ‘हिन्दुत्व’ की सरकार है। यही बोध ही भाजपा सरकार के कार्यों में परिलक्षित होगा। यहां रक्तपात और हिंसा की कहीं कोई जगह नहीं है। पश्चिम बंगाल में वही दिखेग जो ‘वंदेमातरम्’ की राष्ट्रीय चेतना से प्रकट होता है।

तीसरा प्रतीक है — शपथ ग्रहण के मंच में बैकग्राउंड में लगे बैनर में निहित संदेश। बैकग्राउंड की तस्वीर में एक-एक तस्वीर अपने आप में बड़ी कहानी कहती है। बैकग्राउंड की तस्वीर में ‘शंख बजाती’ नारी शक्ति के ज़रिए ये बताया गया कि—पश्चिम बंगाल में शक्ति जागृत अवस्था में है। नारी जब शंखनाद कर रही है तो उसका अर्थ ही मङ्गल बेला का शुभारम्भ है। आरती करता हुआ पुरुष ; इस भाव में भी शक्ति की आराधना है। वहीं सबसे प्रखर संकेत है कालीघाट शक्तिपीठ जो 51 शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ के तौर पर भी जाना जाता है। यह पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक है। वहीं ‘धुनुची’ का चित्रण भी बंगभूमि की सांस्कृतिक पहचान में से एक है। जो शुद्धता और पवित्रता तथा भक्ति भाव का सर्वोच्च रूप है। दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा के समक्ष धुनुची नृत्य करने की परंपरा है। इसके साथ ही माँ दुर्गा को असुर वध करते हुए दिखाया गया है। जो ये बता रहा है कि दानवदल भले कितने भी छद्म रूप धरे। जो समाज में विध्वंस फैलाता है। लोगों को दुःख देता है। उसका अन्त सुनिश्चित है। ये असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। जो पश्चिम बंगाल में साकार भी हुआ। वहीं ‘सिंदूर खेला’ का चित्रण – वो पारंपरिक प्रतीक है जो भारतीय संस्कृति में ‘शक्ति’ की उपासना के तौर पर जाना जाता है। इसमें भी मातृशक्ति ही केंद्र में होती है। पश्चिम बंगाल की सुप्रसिद्ध दुर्गा पूजा के समय जब विजयादशमी की तिथि को मां को विदाई दी जाती है। उससे ठीक पहले विवाहित महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगाकर एक दूसरे के सुहागिन होने की कामना करती हैं।
ये पश्चिम बंगाल के जनजीवन में रचा बसा है। यानी पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने शपथग्रहण के साथ ही ये बता दिया कि- यहां के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य और संगठित हिन्दू शक्ति के साथ ही आगे कार्य होंगे।इसी से दशा और दिशा निर्धारित होगी।

ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘विकास और विरासत के सम्मान’ के ध्येय का प्रतिबिंब है। चाहे पूरे चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम भाजपा नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट से ‘बांग्ला’ में संदेश देने की बात हो। याकि ये सभी प्रतीक। इनके पीछे का संदेश यही है कि हमारे भारत में ‘एकता की विविधता’ है। सभी परंपराएं, त्योहार, कलाएं, बोली-भाषा, वेश-भूषा सब हमारे अपने हैं। इनसे एकत्व प्रकट होता है। यही एकता ही भारत की शक्ति बनती है।

चौथा प्रतीक है — बीजेपी के बलिदानियों का मेमोरियल। शपथ ग्रहण स्थल पर भाजपा ने अपने उन तमाम कार्यकर्ताओं के नामों से जुड़ा मेमोरियल बनाया। जो भाजपा संगठन का विस्तार करते हुए टीएमसी, ममता बनर्जी सरकार की राजनीतिक हिंसा का शिकार हुए। ये बताया गया कि — भाजपा के लिए जिन्होंने जीवन न्योछावर कर दिया। उन बलिदानियों को भाजपा कभी नहीं भूलेगी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलिदानियों के परिवारों से मुलाक़ात की। उन्हें ये भरोसा दिलाया कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। न्याय होगा। कोई अपराध बख़्शे नहीं जाएंगे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा—
“बंगाल में भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुँचाने की यात्रा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले कार्यकर्ताओं की पावन स्मृति में बना यह मेमोरियल, शपथ ग्रहण स्थल पर उपस्थित हर कार्यकर्ता के हृदय में भावनाओं का ज्वार उत्पन्न कर रहा है।उन पुण्यात्माओं का त्याग, संघर्ष और बलिदान आज सार्थक होने जा रहा है।
राष्ट्र और संगठन के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले उन सभी हुतात्माओं को कोटि-कोटि नमन।”

पांचवां प्रतीक अपनी जड़ों से जुड़े रहना—

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथ ग्रहण के मंच पर
माखनलाल सरकार के पांव छूकर उनका सम्मान किया। आत्मीयता और श्रद्धा के साथ उनसे गले मिले। माखनलाल जैसे तपस्वी साधकों का सम्मान अपने विचार के प्रति समर्पण और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है। सिलीगुड़ी के रहने वाले 98 वर्षीय माखनलाल सरकार जनसंघ-भाजपा के उन शुरुआती लोगों में से हैं जिन्होंने विचारधारा के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया।वो जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे। श्यामा प्रसाद
मुखर्जी जी ने जब – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”; के नारे के साथ जम्मू-कश्मीर में तिरंगा यात्रा के लिए निकले तो माखनलाल सरकार उनके साथ बढ़ चले।गिरफ्तारी दी। जेल की निर्मम यातना सही। आगे चलकर जब 1980 में भाजपा का गठन हुआ तो संगठन को मजबूत करने में माखनलाल सरकार ने बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा की पौध को सींचा। संगठन को खड़ा किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में अडिग रहे। सालों के संघर्ष के बाद जब पश्चिम बंगाल में 2026 में ‘कमल’ खिला तो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अपने नींव के पत्थर को नहीं भूली। शपथ ग्रहण समारोह की अग्रिम पंक्ति में माखनलाल सरकार को आदरपूर्वक को स्थान दिया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श कर ये बता दिया कि – विचार के प्रति अनन्य समर्पण क्या होता है। आजकल लोग जब थोड़े में बौरा जाते हैं। उस समय नरेन्द्र मोदी जैसे तपस्वी राजर्षि बताते हैं कि भारत का मूल चिंतन और आदर्श क्या है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तपोभूमि यही सिखाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसी तपशाला में तपे हैं। संघ राष्ट्र और समाज के प्रति अनन्य और असंदिग्ध समर्पण सिखाता है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चरितार्थ किया है।

छठवां प्रतीक —जनता ही जनार्दन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र जब शपथ ग्रहण के दौरान मंच पर पहुंचे तो उन्होंने पहले हाथ हिलाकर वहां मौजूद जनमानस का अभिवादन किया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनादेश और विश्वास के लिए सबको नतमस्तक होकर प्रणाम किया। ये कोई सामान्य बात नहीं है। शिखर पर होकर इतना विनम्र होना। धन्यता का अनुभव करना‌। ये वही करता है जो राष्ट्र में जागृत देवता देखता है। उपासना करता है। वैसे भी भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर वो लीक तोड़ी है। जो जनप्रतिनिधियों को जनता से दूर करती थी। सन् 2014 में संसद में प्रवेश के साथ साष्टांग प्रणाम करना हो। याकि प्रयागराज कुंभ में सफाईकर्मियों के पांव धुलने, उन्हें चप्पल पहनाने का भाव हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसे अनेकों अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जो ये बताता है कि उनकी दृष्टि में जनता ही जनार्दन है। कहने का आशय ये कि प्रतीकों के ज़रिए लोक से जुड़ने, उनके साथ समानुभूति स्थापित करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा का कोई तोड़ नहीं है। इसके पीछे की मंशा केवल राजनीतिक पकड़ मज़बूत स्थापित करना नहीं है। बल्कि ये एकात्म स्थापित करने का बोध है। ये पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवदर्शन’ और ‘अंत्योदय’ के प्रयोगधर्मी- विचार का प्रतिपादन है। जो वैचारिकी के दिशाबोध को निरूपित करता है।

सोमनाथ से जागृत होता भारत का सांस्कृतिक स्वाभिमान

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मुकेश वशिष्ठ

दिल्ली । भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों पुरानी संस्कृति, अध्यात्म, त्याग और आत्मगौरव की अखंड परंपरा का जीवंत स्वरूप है। इस राष्ट्र की आत्मा उसके तीर्थों, मंदिरों, ऋषि-परंपरा और उन मूल्यों में बसती है, जिन्होंने असंख्य संघर्षों और आक्रमणों के बावजूद भारतीय सभ्यता को अमर बनाए रखा। यदि भारत की इसी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान का कोई सर्वोच्च प्रतीक है, तो वह निस्संदेह सोमनाथ मंदिर है।
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की अदम्य आस्था, आत्मबल और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह वह पवित्र धरा है, जिसने एक ओर विदेशी आक्रमणों की विभीषिका देखी, तो दूसरी ओर पुनर्निर्माण और पुनरुत्थान का गौरव भी अनुभव किया। इतिहास साक्षी है कि विदेशी आक्रांताओं ने अनेक बार इस मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया, किंतु भारत की सांस्कृतिक चेतना को कभी पराजित नहीं कर सके। विशेष रूप से 1025 ईस्वी में महमूद गजनवी का आक्रमण भारतीय सभ्यता पर एक क्रूर प्रहार माना जाता है। मंदिर को तोड़ा गया, उसकी संपदा लूटी गई, किंतु भारत की आत्मा को झुकाया नहीं जा सका।

सोमनाथ की सबसे बड़ी विशेषता उसका पुनर्जन्म है। वह जितनी बार टूटा, उतनी ही दृढ़ता और भव्यता के साथ पुनः खड़ा हुआ। यही कारण है कि सोमनाथ भारत के आत्मसम्मान, अटूट संकल्प और सांस्कृतिक जीवटता का अमर प्रतीक बन गया। यह मंदिर हमें स्मरण कराता है कि कोई भी शक्ति उस राष्ट्र को पराजित नहीं कर सकती, जो अपनी संस्कृति, परंपरा और आस्था से गहराई से जुड़ा हो।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब देश विभाजन की पीड़ा और अस्थिरता से गुजर रहा था, तब भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक संकल्प लिया। यह निर्णय केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत के आत्मगौरव और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने का राष्ट्रीय प्रयास था। सरदार पटेल भली-भांति जानते थे कि कोई भी राष्ट्र तभी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकता है, जब उसे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व हो।

11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्मित स्वरूप का लोकार्पण किया गया। वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक चेतना की उद्घोषणा थी। अपने ऐतिहासिक संबोधन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि “सोमनाथ का पुनर्निर्माण यह प्रमाणित करता है कि राष्ट्र की आत्मा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।” उनके ये शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक और प्रेरणादायी प्रतीत होते हैं।

आज जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और लोकार्पण के 75 वर्ष पूर्ण होने पर “अमृत महोत्सव” आयोजित किया जा रहा है तथा इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति प्रस्तावित है, तब यह आयोजन केवल श्रद्धा का विषय नहीं रह जाता, बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय चेतना का उत्सव बन जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विकास यात्रा को उसकी सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है। उनकी दृष्टि केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि वे भारत को उसकी सभ्यतागत पहचान के साथ विश्व मंच पर स्थापित करना चाहते हैं। यही कारण है कि आधुनिक अवसंरचना, डिजिटल क्रांति और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के साथ-साथ काशी विश्वनाथ धाम, केदारनाथ और सोमनाथ जैसे तीर्थों के पुनरोद्धार को भी अभूतपूर्व महत्व दिया गया है।

वर्षों तक भारत में आधुनिकता को अपनी परंपराओं से दूरी बनाकर देखने की प्रवृत्ति रही, किंतु अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। आज भारत अपनी संस्कृति, योग, अध्यात्म और सनातन मूल्यों को विश्व के समक्ष गर्वपूर्वक प्रस्तुत कर रहा है। यह केवल सांस्कृतिक जागरण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सभ्यतागत पुनर्जागरण का प्रतीक है।

सोमनाथ का अमृत महोत्सव केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की दिशा का संकेत भी है। यह आयोजन हमें यह संदेश देता है कि विकास और विरासत परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जो राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही विश्व में स्थायी नेतृत्व स्थापित कर सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को केवल आस्था का विषय न मानें, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय चेतना, सभ्यतागत गौरव और आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में देखें। सोमनाथ हमें यह शिक्षा देता है कि संघर्ष चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, यदि राष्ट्र अपनी आत्मा से जुड़ा रहे, तो उसका पुनरुत्थान निश्चित है।

निस्संदेह, सोमनाथ भारत की अस्मिता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना का अमर प्रतीक है। आज का भारत उसी चेतना को आधार बनाकर एक ऐसे भविष्य की ओर अग्रसर है, जहाँ आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चलती हैं। यही वह मार्ग है, जो भारत को केवल एक विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि विश्व की सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।

(लेखक मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक है)

वामपंथियों की श्रद्धांजलि सभा में मेरी तरफ़ से भी दो पुष्प अर्पित

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शिशु रंजन

दिल्ली । भारत जैसे विशाल और महान लोकतांत्रिक देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी भी राज्य में वामपंथी यानी की कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट सरकार नहीं है। देश की स्वतंत्रता के बाद जब १९५१-५२ में पहले आम चुनाव हुए थे तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया १६ सांसदों के साथ और सोशलिस्ट पार्टी १२ सांसदों के साथ देश में क्रमशः दूसरी और तीसरी बड़ी पार्टी थी। कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा का विकास कुछ इस कदर हुआ कि १९५७ में, यानी की पाँच वर्ष बाद ही EMS Namboodiripad के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने केरल में सरकार बना ली। वामपंथी या समाजवादी का खोल ओढ़ कर वामपंथियों ने अगले कई दशक तक देश के विभिन्न राज्यों में मज़बूत सरकार चलायी। और आज क्या संयोग है कि जब देश को केंद्रीय और राज्य सरकारें मिलकर लगभग नक्सल मुक्त कर चुके हैं, जनता ने भी वोट की चोट से देश को वामपंथ मुक्त कर दिया है।

यह अच्छा हुआ है या बुरा, इस प्रश्न को फिलहाल किनारे रख देतें हैं। चुकी छात्र राजनीति में रहते हुए हमारे कई अच्छे मित्र वामपंथी विचारधारा के रहे हैं और भारतीय परंपरा के अनुसार हम लोग उनके व्यक्तिगत ख़ुशी और दुख में साथ रहते हैं, आज जब वामपंथी विचारधारा की श्रद्धांजलि सभा रखी जाएगी तो अवश्य मेरे तरफ़ से भी उस सभा में दो पुष्प अर्पित किया जाएगा। और उस सभा को संबोधित करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के तथाकथित स्वर्णिम युग की याद कराते हुए यह अवश्य बताया जाएगा कि वामपंथी विचारधारा का इस देश से विदा हो जाने के पीछे के कारण क्या रहे हैं।

लोकोक्ति है कि समय बड़ा बलवान होता है। श्रद्धांजलि सभा में पुष्प तर्पण करने के बाद अगर संबोधन करने का अवसर मिलता तो अवश्य यह कहता कि यह समय ही तो है जिसके कारण अपने जीवनकाल में इस देश में वामपंथ की श्रद्धांजलि सभा होते हुए देख रहे हैं। वरना इस सभा को संबोधित करने की इच्छा तो जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी रही होगी जो पहली लोकसभा में मात्र ३ सीट के साथ भारतीय राजनीति में राष्ट्रवादी राजनीति की शुरुआत कर रहे थे, वही वामपंथी दल रूस व चीन परस्त राजनीति की फसल खड़ी करने में लगे हुए थे। इस सभा को संबोधित करने की इच्छा डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी की भी रही होगी जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना उसी वर्ष की थी जब १९२५ में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना हुई। एक तरफ़ संघ का अखंड भारत का स्वप्न और दूसरी तरफ़ कम्युनिस्टों का उन तत्वों से प्रेम जो भारत को धर्म के आधार पर विभाजित करने का स्वप्न देख रहे थे। इस प्रकार की सभा को संबोधित करने का स्वप्न भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने भी देखा होगा या विद्यार्थी परिषद से राजनीति में प्रवेश किये स्वर्गीय श्री अरुण जेटली जी ने देखा होगा क्यूँकि एक तरफ़ भाजपा हिंदुत्व के नीचे समाज को एकत्रित कर रही थी तो कम्युनिस्ट पार्टियां जाति के नाम पर समाज में विष घोल रहे थे। खैर, ऐसे सारे महापुरुष लोगों की पुण्यात्माएं उस श्रद्धांजलि सभा में जरूर आयेंगे क्यूँकि भारतीय परंपरा में विचारधारा के परे व्यक्ति दुख की घड़ियों में एकजुट होकर श्रद्धासुमन अर्पित करता है।

ये समय ही तो है कि आज साथ में जन्म लेने वाला आरएसएस संगठन अपना स्वर्णिम शताब्दी वर्ष मना रहा है और वामपंथ श्रद्धांजलि सभा। वही वामपंथ जिसके अनुयायी संघ को जड़ से समाप्त करने के लिए सौगंध खाते थे, भाजपा को हरा दे इसके लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी अपनी दुश्मन दलों के गोद में बैठने से परहेज नहीं की, संघ के अनुयायी व विद्यार्थी परिषद और भाजपा के कार्यकर्ताओं का सार्वजनिक मजाक उड़ाते हुए अपमानित करना पसंदीदा शगल हुआ करता था, आज उस वामपंथी विचारधारा की श्रद्धांजलि सभा लगाने के लिए भी पर्याप्त लोग नहीं जुटेंगे। आज उस विचारधारा के लोगों की आत्मा पर दुख का कितना बड़ा पहाड़ टूटा होगा जब वो अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को भगवामय देख रहे होंगे। कामरेड सीताराम येचुरी जी की आत्मा तो इस बात से प्रसन्न होगी कि यह दिन देखने के पहले “राम नाम सत्य है” का उद्घोष करवाते हुए वो इस पृथ्वीलोक से विदा हो गए। इसीलिए, इस भयंकर पीड़ादायी वेदना में हमसब का कर्तव्य बनता है कि उनके साथ हम संवेदना प्रकट करें।

श्रद्धांजलि सभा में संबोधन समाप्ति के पहले अवश्य उन कारणों पर भी बात करता जिसके कारण यह दुर्दिन देखना पड़ा हो। चिरंजीवी रहने के लिए हमे बीमारी से बचना होता है। कम्युनिस्ट सामाजिक बीमारी को गले लगाते थे। वो बीमारियाँ कौन सी थी।

पहली, अपने विचारधारा में इस देश को ढालने की जिद। यह देश में वेद का भी स्थान है और बुद्ध का भी। इसलिए सिर्फ़ एक विचार से देश चलाने वालों में बीमारी लग जाएगी और यही कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों के साथ हुआ।

दूसरा, क्षद्म धर्मनिरपेक्षता जिसकी आड़ में मुसलमानों और ईसाइयों का तुष्टिकरण। भारत की आम जनता इस बीमारी के कारण कम्युनिस्टों से दूर होती गई।

तीसरा, समाज का जाति में विभक्तीकरण। वोट पॉलिटिक्स के चक्कर में हिंदू समाज को जातियों में बाँटकर उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियाँ भारत के लोगो को जड़ो से काटने का कार्य कर रही थी जिसे आम जनमानस ने देर से ही सही पर पहचान लिया।

चौथा, जनमानस को अपने बिचार समझाने के बजाय सभी संस्थानों पर अपने आदमी बिठा कर सिस्टम पर कब्जा करने की प्रवृति। भारतीय संस्कृति में एकाधिकार पसंद नहीं किया जाता, इसका कई उदाहरण हमारे हजारों वर्ष पुराने इतिहास का हिस्सा है।

और पाँचवाँ, अहंकार तो जब रावण का नहीं रहा तो भला कामरेड लोग का कैसे रहता। ये तो बस समय का खेल है। अहंकार वश जब कम्युनिस्ट भगवान राम का अपमान करते थे, ये आस्तिक जनमानस पर नास्तिक विचारों को थोपने जैसा था जिसे समाज कब तक बर्दाश्त करता। कालांतर के वामपंथियों में विचारधारा का न पढ़ना किंतु विचारधारा को समझने का ढोंग करना आत्मघाती सिद्ध हुआ। मजदूर वर्ग की भलाई के नाम पर उद्योग धंधे बंद करवाने वाली विचारधारा अपने मजदूर हित के प्रति ईमानदार नहीं थी, वरना उद्योगपति उनके दुश्मन नहीं बल्कि, उनके साथी रहते। प्रतिस्पर्धा के प्रति उनके विचारधारा की घृणा प्रतिभाशाली लोगों को इनसे दूर करती रही। आरक्षण को सामाजिक प्रगति का पर्याय बनाने के बजाय इसे वोटबैंक राजनीति के टूल की तरह उपयोग करना इसका उदाहरण है। इन सब में वैचारिक भटकाव में इन्हें पता ही नहीं चला कि कुल्हाड़ी ये स्वयं के जड़ो पर चला रहे थे।

खैर, जो हुआ वो इतिहास है और इतिहास की विवेचना सत्ता करती है। रहा न कोई रोवन हारा कहावत चरितार्थ होने पर है। परंतु, इन सब के बीच हमे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टी के विचार के बीज जीवित है। हम सब के मध्य। अमरलता के बेल की भाँति। आप अपने इर्द गिर्द देखिए, आपको दिखेंगे। आँखे बंद कर लेने से समस्या का अंत नहीं होता है। वामपंथियों रेवड़ियों को देखिए क्या वो नए अवतार में हैं? तुष्टिकरण पर नजर रखिए। सत्ता के दुरुपयोग पर नजर रखिए। अहंकार पर नजर रखिए। अपने अंदर के वामपंथी पर नजर रखिए। १०० वर्ष बाद जब पुनः इतिहास का अवलोकन होगा, किसकी श्रद्धांजलि सभा होगी, ये देखने के लिए न हम रहेंगे न आप। पर हमारे विचार अवश्य रहेंगे।

बंगाल के तपस्वी स्वयंसेवक : माखनलाल सरकार और राष्ट्रवादी आंदोलन की अनसुनी कहानी

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दिल्ली । पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में अनेक बड़े नाम हुए, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहे जिन्होंने कभी पद, प्रसिद्धि या सत्ता की इच्छा नहीं की। उन्होंने अपना पूरा जीवन केवल राष्ट्र और विचार के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक कर्मयोगी थे माखनलाल सरकार, जिनका नाम हाल के दिनों में तब चर्चा में आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच पर उनके चरण स्पर्श कर उनका सम्मान किया।

लेकिन माखनलाल सरकार की कहानी केवल उस एक क्षण की नहीं है। यह कहानी उस पीढ़ी की है जिसने विभाजन, प्रतिबंध, संघर्ष और विरोध के बीच भी राष्ट्रवादी विचार को जीवित रखा।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी

माखनलाल सरकार उन शुरुआती कार्यकर्ताओं में थे जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवादी आंदोलन को बंगाल की धरती पर मजबूत करने का कार्य किया। वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगियों में गिने जाते थे और लंबे समय तक संगठन के विस्तार में सक्रिय रहे।

उस समय बंगाल की राजनीति पूरी तरह अलग दिशा में जा रही थी। राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए जमीन तैयार करना आसान नहीं था। विरोध, हिंसा और राजनीतिक दबाव आम बात थी। लेकिन माखनलाल सरकार जैसे कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ते रहे।

राष्ट्रगान गाने पर हुई गिरफ्तारी

उनके जीवन का एक ऐसा प्रसंग आज भी लोगों को भावुक कर देता है। परिवार के अनुसार, एक समय ऐसा भी आया जब RSS पर प्रतिबंध लगा हुआ था और राष्ट्रवादी गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। उसी दौरान माखनलाल सरकार को राष्ट्रगान गाने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था।

आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना कठिन है कि कभी “वंदे मातरम्” और “राष्ट्रगान” भी संघर्ष का कारण बन सकते थे। लेकिन उस दौर में ऐसे हजारों स्वयंसेवकों ने जेल और प्रताड़ना झेली।

कश्मीर आंदोलन से बंगाल तक

1952 में जब कश्मीर आंदोलन 1952 चल रहा था, तब माखनलाल सरकार भी उस आंदोलन का हिस्सा बने। वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ तिरंगा आंदोलन में शामिल हुए और इसी दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया।

उस समय “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे” का नारा पूरे देश में गूंज रहा था। बंगाल के एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में माखनलाल सरकार ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

संगठन निर्माण में बड़ी भूमिका

1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद बंगाल में संगठन विस्तार की जिम्मेदारी आसान नहीं थी। माखनलाल सरकार को पश्चिम दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग क्षेत्रों में संगठनात्मक कार्य का दायित्व मिला।

बताया जाता है कि केवल एक वर्ष के भीतर उन्होंने हजारों नए कार्यकर्ताओं को संगठन से जोड़ा। लगातार सात वर्षों तक उन्होंने जिला अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति की मजबूत नींव रखने में योगदान दिया।

साधारण जीवन, असाधारण समर्पण

97 वर्ष की आयु में भी माखनलाल सरकार का जीवन बेहद साधारण बताया जाता है। न कोई विशेष सुरक्षा, न प्रचार, न राजनीतिक महत्वाकांक्षा। यही कारण था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच पर उनका सम्मान किया, तो वह दृश्य पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।

वह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था—वह उन लाखों अनाम स्वयंसेवकों का सम्मान था जिन्होंने दशकों तक बिना किसी पहचान के संगठन और राष्ट्र के लिए काम किया।

बंगाल में विचार की जड़ें मजबूत करने वाले स्वयंसेवक

आज बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति जिस स्थिति में दिखाई देती है, उसके पीछे दशकों का संघर्ष और हजारों कार्यकर्ताओं का परिश्रम रहा है। माखनलाल सरकार उन लोगों में से थे जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन को जीवित रखा।

जब राजनीतिक हिंसा और विरोध अपने चरम पर था, तब भी वे लगातार लोगों के बीच जाते रहे। उनके लिए राजनीति सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का मार्ग थी।

जिस प्रकार मोरोपंत पिंगले ने इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के अभियानों को दिशा दी, जिस प्रकार एकनाथ रानाडे ने समुद्र के बीच चट्टान को राष्ट्रीय स्मारक बना दिया—उसी प्रकार माखनलाल सरकार जैसे स्वयंसेवकों ने विचार की ऐसी नींव तैयार की, जिस पर आज एक बड़ा संगठन खड़ा दिखाई देता है।

यह कहानी किसी बड़े पद या प्रसिद्धि की नहीं है। यह उस निष्ठा की कहानी है, जो दशकों तक बिना थके, बिना रुके केवल राष्ट्र के लिए कार्य करती रही।

और शायद इसी कारण, जब प्रधानमंत्री ने उनके चरण स्पर्श किए, तो वह दृश्य केवल सम्मान का नहीं—एक युग के संघर्ष को प्रणाम करने का क्षण बन गया।

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