सिंहासन बत्तीसी का बैताल

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भगवान सिंह

दिल्ली । जेम्स मिल का दुर्भाग्य था कि उस समय तक सिंधु सभ्यता का पता नहीं चला था, अन्यथा वह उसकी भी वैज्ञानिक व्याख्या कर देता। यह मौक़ा मार्शल को मिला और उसने अपनी भूमिका में कई तरह के शीर्षासन करके यह सिद्ध कर दिया कि न तो आर्य सिंधु सभ्यता से पहले भारत में थे न उसके निर्माता थे, न समकालीन थे, वे आए सिंधु सभ्यता के विनाश के बाद उस सभ्यता के ख़स्ताहाल उत्तराधिकारियों से सिंधु सभ्यता की सारी विशेषताएं अपना ली और उन बेचारों को ज़मीन जायदाद से तो बेदखल करके उन्हें भागने को तो बाध्य किया या दास बनाया ही, उनकी याददाश्त भी छीन ली क्योंकि उन्हें यह तो मानना ही पड़ा कि केवल आर्यों की परंपरा में विचार, विश्वास, संस्कार, नागर सभ्यता के सभी उपादान बचे हैं । मार्शल ने अपनी मनवाने के लिए कुछ हेराफेरी भी की थी पर वह पूरे वैज्ञानिक होते तो काम अधूरा न नहीं छोड़ते।

यह वैज्ञानिक इतिहासकारों का सौभाग्य था कि जो काम जेम्समिल से संभव न था और मार्शल ने जिसे अधूरा छोड़ दिया था उसे पूरा करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला पुरातत्वविद मिल गया, जिसने सिद्ध कर दिया कि हिन्दू पाँच हज़ार साल से मुसलमानों पर अत्याचार करते आ रहे हैं । यह थे Five Thousand Years of Pakistan के लेखक मार्टिमर ह्वीलर। जिनको विज्ञान की समझ नहीं है, वे कहेंगे, पाँच हज़ार साल पहले तो इस्लाम ही नहीं था फिर मुसलमान कैसे हो गए? पाकिस्तान 1947 में बना फिर वह 5000 साल का कैसे हो गया? यह सतही नज़र वालों की समस्या है। विज्ञान उसे देख लेता है जो नंगी आँखों दिखाई नहीं देता । उसे जान लेता है जो मोटी अकल वाले नहीं जान पाते। किसी भारतीय मार्क्सवादी से पूछिए । उसकी खोपड़ी में विज्ञान ही विज्ञान भरा रहता है, इतना विज्ञान कि ज्ञान के लिए जगह ही नहीं बची है । वह बताएगा कि हिंदुओं ने जो पहले अपने को आर्य कहते थे और ढोर चराते हे, उनका दिमाग़ गोबर की सुलभता से इतना उपजाऊ हो गया था कि बिना किसी भूल-चूक के किसी आलमारी में अटने वाला साहित्य अपनी खोपड़ी में भर लेते थे और फिर भी दिमाग़ का एक हिस्सा दार्शनिक चिंतन के लिए ख़ाली रहता था, इसलिए हिंदू दार्शनिक हुआ करते थे। परंतु ऐसे दार्शनिक केवल भारत में और वह भी तभी तक पैदा होते थे, जब तक ढोर चराना जारी रहा।

हम अपनी ओर से बता दें कि वे त्रिकालदर्शी थे, क्योंकि वर्तमान को अपनी आँख से, भविष्य को ढोरों की नज़र सें देखते थे, और जो बीत गया वह तो सबको देखा जाना होता है। सो उन्होंने पाँच हज़ार साल पहले ही जान लिया था कि एक न एक दिन यहाँ पाकिस्तान बनेगा और यहाँ मुसलमानों का राज होगा। इस्लाम तो सृष्टि के आदि से अरबी ज़बान में अल्लाह के पास था ही। मुहम्मद साहब पर तो वह बहुत बाद में आयद हुआ था। जहाँ आदमी की नज़र न जाए, वहाँ जानवरों की पहुँच जाती है । उनकी आँखों यह भी देख लिया होगा कि इन्हीं सिंधियों के बच्चे इस्लाम क़बूल करेंगे। अब क्या था! उन्होंने आव देखा न ताव । उनके नगरों पर हमला कर दिया ।

आप कहेंगे नगरों की इतनी मज़बूत दीवारें भला टूट कैसे सकती हैं । तो यहीं आप चूक करते हैं । हिमालय पार करते समय उन्होंने ढोरों की पीठ पर बड़े बड़े पत्थर लाद लिए थे कि आगे काम आएँगे । इन्हें ही इन्द्र का वज्र कहा गया है । और दीवारें तोड़ने के बाद उन्होंने नागरिकों का वैसा ही संहार किया जैसे तैमूर लंग किया करता था । विश्वास नहीं होता । हाथ कंगन को आरसी क्या! ह्वीलर ने कत्ल किए गए लोगों के कंकाल पेश कर दिए और अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा से नरसंहार का आँखों देखा हाल प्रस्तुत कर दिया। Five Thousand Years of Pakistan, 1950 ह्वीलर ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण से अवकाश लेने के बाद, पाकिस्तान में बैठकर, उसका पुरातत्व सलाहकार रहते हुए लिखा था, जिसका आमुख पाकिस्तान के वाणिज्य और शिक्षामंत्री फजलुर्रहमान ने लिखा था और वह इस पर इतने फ़िदा थे कि उन्होंने कहा था कि इस कहानी को अगली पीढ़ियों को पढ़ाया जाना चाहिए । पाकिस्तान की पाठ्यपुस्तकों के लेखन में यह वैज्ञानिक इतिहास बहुत मददगार हुआ।

पर वैज्ञानिक इतिहास की ज़रूरत तो पाकिस्तान से अधिक पाकिस्तान बना कर भी वहां न गए, या न जाने वाले, हिंदुस्तानियों को थी। जेम्स मिल के बाद भारतीय वैज्ञानिक इतिहासकारों को अपना स्वधर्मा ह्वीलर मिला जिन्होंने अपने इतिहास लेखन के लिए माडल पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों को चुना। और वह भी तब जब 1964 में डेल्स द्वारा मोहेंजोदड़ो से मिले कंकालों की बारीकी से छीनबीन करने के बाद 1950 में नरसंहार को मिथक सिद्ध कर दिया गया और 1966 और उससे बाद के संस्करणों में उनको स्वीकार करना पड़ा इतनी विशाल नगर सभ्यता का अंत किसी नरसंहार से नहीं हो सकता। इसका ह्रास और नागरिकों का विस्थापन हुआ था।

आश्चर्य की बात यह है कि उन अकाट्य प्रमाणों को देखकर भी पहले ह्वीलर ने नज़रअंदाज़ क्यों किया? ह्वीलर बहुत अनुभवी, दूरदर्शी और सधे हुए पुरातत्वविद थे उनकी नजर में इन बातों में से कोई नजर नहीं आई जिनकी ओर डेल्स और दूसरों का ध्यान चला गया। वह स्वयं मानते हैं:

And the verdict of those who have dug into and through them is unanimous: they represent progressive degeneration. One thing at least is clear about the end of Mohenjodaro : the city was already slowly dying before its ultimate end…What is not conjectural is the intermittent impact of deep and prolonged flooding, in excess of the annual swelling of the river by normal rains and snow-melt…At a number of points this abnormal flooding can still be detected in the form of deep deposits of silty clay, thick layers of collapsed building-material mixed with clay, and compensating mud-brick platforms upon which the inhabitants had at different levels sought to rebuild their town after flood-disaster. Many of these phenomena occur high above the present flood-plain and imply long and overriding encroachments of mud for which some special cause must be adduced. …cause must be adduced….It has further been observed that these flood-deposits are silty clay of still-water origin, as distinct from those of the freely flowing, seasonal floods normal to the river-system. …The whole problem is now in the hands of the hydrologist and the geologist and may be left there for a while.

आत्मसमर्पण करने के बाद घालमेल करने की कोशिश क्यों की और नरसंहार की उनकी मान्यता के निषेध को चलन सा कह कर उसे पुनरुज्जीवित करने का बहाना क्यों निकाल लिया :

It has of late been fashionable to decry the witness of sprawling groups of skeletons which are liable to encumber the later strata of Mohenjo-daro.

फिर आंखों देखा चित्र वाली घिसीपिटी डिस्क क्यों चलाने लगे, जिसका केवल एक अंश देना ही पर्याप्त होगा:

A public well-room in the DK Area was the scene of a tragedy which involved four deaths. The well was approached from the higher level of the adjacent ‘Low Lane’ by a short flight of brick steps. ‘On the stairs were found the skeletons of two persons, evidently lying where they died in a vain endeavour with their last remaining strength to climb the stairs to the street/One of them was probably a woman. It appears that the ‘second victim fell over backwards just prior to death’. Remains of a third and a fourth body were found close outside.’ There seems no doubt that these four people were murdered … It can be regarded as almost certain that these skeletal remains date from the latter end of the occupation of Mohenjo-daro and are not later intrusions. The fact that some of the bones of one of these skeletons rested on the brick pavement of the well-room and that the skull of another lay on the floor of a (brick-lined) sediment-pit (adjoining the entrance) prove beyond doubt that both well-room and pit were in actual use when the tragedy took place.’ And these were of the latest architectural period on the site.

वह जानते थे कि इससे आर्यों के आक्रमण की पुष्टि तो नहीं होती और इसे स्वीकार भी किया (Who were the destroyers? We shall not know. It may be that some hill-tribe fell upon the enfeebled city and put it to the sword. …What brought the final blow the coup the grace to the dying cilization? Years ago I suggested the Aryan invaders from the north-west of the subcontinent as ultimate agents of destruction. This may not be proved and may be quite incorrect, but it is not an impossibility. और इस तरह बैताल लौट कर उसी डाल पर। वह हड़प्पा का वैदिक नाम हरियूपीया का सुझाव देने वालों के तर्क को मान लेते हैं और इसको विजेता आक्रमणकारियों द्वारा दिया गया नाम कह कर अपनी बात पर अड़े रहते हैं और उन्हीं दलीलों को दुहराते हैं जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता।

पर इसके बाद भी वह हमारे वैज्ञानिक इतिहासकारों द्वारा सबसे भरोसेमंद इतिहासकार के रूप में चुन लिए जाते हैं और लगभग दो दशक पहले के पाकिस्तानी माडल पर भारत की पाठ्यपुस्तकें लिखवाई जाती हैं। विज्ञान में यह चलता है।

(सोशल मीडिया से साभार)

मुक्ति आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण

Rss.avif

भोपाल : भारत की धरती का दक्षिणी अंग गोवा 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र नहीं हो पाया था । वहाँ पुर्तगालियों की सत्ता बनी रही । गोवा मुक्ति केलिये अलग से आँदोलन हुआ । भारत का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ से गोवा मुक्ति आंदोलन केलिये जत्थे नहीं पहुँचे। गोवा मुक्ति आंदोलन में जन जाग्रति करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही ।

पन्द्रह अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों से मुक्त हुआ लेकिन भारत के कुछ ऐसे भूभाग भी थे जो स्वतंत्र नहीं हो सके थे। इनमें पांडिचेरी पर फ्रांसीसी और गोवा, दमन और दीव पर पुर्तगालियों की सत्ता बनी रही । अंग्रेजों की तरह पुर्तगाली भी व्यापारी बनकर ही भारत आये थे । उनका पहला जत्था वास्कोडिगामा के नेतृत्व में मई 1498 में भारत आया था और गुजरात के कालीकट से अपना व्यापार शुरु किया । व्यापार के बहाने दक्षिण भारत में पैर जमाये और 1510 में गोवा पर अधिकार कर लिया । पुर्तगालियों ने गोवा को ईसाई धर्म प्रचार का केन्द्र बनाया था इसीलिए चर्च के संकेत पर अंग्रेजों ने भी गोवा में बहुत हस्तक्षेप नहीं किया और गोवा पर पुर्तगालियों की सत्ता लगभग साढ़े चार सौ वर्षों तक बनी रही।

भारत में स्वतंत्रता आँदोलन जब शुरु हुआ तब गोवा लगभग छूटा हुआ था । गोवा में स्वतंत्रता आँदोलन 1940 के आसपास आरंभ हुआ । गोवा मुक्ति के लिये आँदोलन करने वालों में सबसे पहला एक प्रमुख नाम महादेव शास्त्री जोशी का आता है । उन्होने मानों अपना पूरा जीवन ही गोवा मुक्ति केलिये समर्पित कर दिया था । उनकी पत्नि सुधाताई भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर सक्रिय रहीं। इस दंपत्ति ने गोवा मुक्ति के लिये देशभर के सभी राजनैतिक और सामाजिक संगठनों से संपर्क किया । इनमें काँग्रेस, हिन्दु महासभा, आर्य समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन प्रमुख थे । दोनों पति पत्नि कयी बार गिरफ्तार हुये । 1946 में उन्हें गोवा से बाहर कर दिया गया । तब उन्होंने अपना केन्द्र पुणे बनाया । यहाँ उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वातंत्र्यवीर दामोदर सावरकर से बना और आँदोलन को गति मिली । वर्ष 1946 गोवा मुक्ति आंदोलन के लिये एक मील का पत्थर साबित हुआ । एक ओर गोवा प्रशासन के दमन से स्वतंत्रता समर्थक स्थानीय नागरिकों में आक्रोश आया दूसरी डॉ. राम मनोहर लोहिया की मडगांव में एक सभा हुई । डा लोहिया गोवा में अपने किसी अन्य कार्य केलिये आये थे लेकिन उन्होंने गोवा में सरकार का आतंक देखा तो वे रुक गये और उन्होंने मंडगाव में सभा की । इससे स्थानीय स्तर पर स्वतंत्रता का वातावरण बना ।

लेकिन इस संघर्ष में कुछ गतिरोध आया । भारत विभाजन की त्रासदी और गाँधीजी की हत्या से उत्पन्न उथल पुथल से जहाँ भारत के अन्य भागों विशेषकर महाराष्ट्र से इस आँदोलन को अधिक सहायता नहीं मिल सकी वहीं गोवा सरकार ने चर्च को सक्रिय करके स्थानीय नागरिकों में विभाजन की नींव रखी । इन दोनों कारणों से गोवा मुक्ति आंदोलन कुछ धीमा हुआ । इसी बीच डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर आँदोलन का आव्हान किया था उस ओर भी पूरे भारत का ध्यान आकर्षित हो गया था ।

गोवा मुक्ति के लिये आँदोलन में गति 1952 के बाद आई । यह सक्रियता दोनों ओर बढ़ी । भारत के विभिन्न स्थानों पर भी जाग्रति अभियान चले और गोवा की स्थिति का आकलन करने केलिये विभिन्न सामाजिक और राजनेताओ का आवागमन भी गोवा में बढ़ा । गोवा मुक्ति आन्दोलन के लिये दो प्रमुख केन्द्र बनाये गये । एक मुम्बई और दूसरा पुणे । इन दोनों केन्द्रों के संचालन के व्यवस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाथ में थी । मुम्बई में तो स्वतंत्रवीर दामोदर सावरकर भी गोवा जाने वाले मुक्ति आंदोलन कारियों का उत्साह वर्धन कर रहे थे । गोवा प्रशासन ने आंदोलन को दबाने का पूरा प्रयास किया और भारत सरकार से सहयोग करने की बात भी की । पुर्तगाल सरकार चाहती थी कि गोवा उसी तरह एक स्वतंत्र इकाई रहे जैसे सिक्किम और नेपाल थे। ऐसे ही तनाव और तैयारी में लगभग दो वर्ष निकले । लेकिन 1954 के बाद गोवा मुक्ति आंदोलन में गति आई । पूरे भारत में सभाओं और जुलूस का क्रम चला और एक गोवा मुक्ति के लिये एक निर्णायक आँदोलन की रूपरेखा बनी । इसके लिये 15 अगस्त 1955 का दिन निश्चित हुआ । 15 अगस्त भारत की स्वतंत्रता का दिन था । योजना बनी कि उसदिन भारतीय तिरंगा फहराकर गोवा को पुर्तगाल के आधिपत्य से मुक्त करा लिया जाये । इसके वर्ष 1954 में पूरे देश में जाग्रति अभियान चला ।

गोवा मुक्ति आन्दोलन में यद्यपि पूरे देश में सभाएँ हुई, जाग्रति केलिये जुलूस निकले और जत्थे गोवा गये । फिर भी इसका सर्वाधिक जोर महाराष्ट्र में रहा । महाराष्ट्र में इस जाग्रति के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका मानी महत्वपूर्ण मानी जाती है । संघ ने पहले स्वतंत्रता आँदोलन और फिर सामाजिक आँदोलनों में जो भी सक्रियता दिखाई अपने नाम और बैनर का उपयोग नहीं किया ।जहाँ जो नेतृत्वकर्ता थे उन्हीं को सहयोग किया । स्वतंत्रता आँदोलन में यदि डाक्टर हेडगेवार जेल गये तो कांग्रेस नेतृत्व में ही गये थे । इसी प्रकार 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में भी संघ की भूमिका यही थी । गोवा मुक्ति आँदोलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महादेव शास्त्री जोशी और उनकी पत्नि सुधाताई दोनों का जीवन गोवा की मुक्ति केलिये समर्पित रहा । इनका संपर्क भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था। इनके संपर्क से ही इस आँदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ी। महाराष्ट्र का ऐसा कोई गांव या कस्बा न बचा था जहाँ गोवा मुक्ति केलिये सभाएँ न हुई हों।

मध्यप्रदेश में गोवा मुक्ति आंदोलन ने 1952 के बाद जोर पकड़ा इसका सर्वाधिक जोर मालवा, मध्यभारत और भोपाल अंचल में रहा । मालवा में गोवा मुक्ति केलिये चेतना जगाने का काम राजाभाऊ महाकाल ने किया । राजाभाऊ संघ के प्रचारकथे । मालवा का ऐसा कोई कस्बा न बचा जहाँ राजाभाऊ ने सभाएँ न कीं हों। भोपाल क्षेत्र में भाई उद्धवदास मेहता की सक्रियता रही । उद्धवदास मेहता उन दिनों नगर संघ चालक थे उन्होंने भोपाल के अतिरिक्त सीहोर रायसेन बरेली आदि क्षेत्रों में यात्रा की । उनके साथ पं भगवान दास सारस्वत, ब्रजभूषण गोयल, नन्नूलाल चौधरी आदि की टोली थी । विदिशा क्षेत्र में निरंजन वर्मा ने, ग्वालियर क्षेत्र में ब्रज नारायण ब्रजेश ने और जबलपुर क्षेत्र में बाबूराव परांजपे की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी । इन सभी का गहरा संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से रहा है ।

मध्यप्रदेश से जत्थे गोवा मुक्ति केलिये रवाना हुआ उनमें उज्जैन के जत्थे में सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद वाकणकर जी भी थे यह जत्था 9 अगस्त रवाना हुआ । जबकि इंदौर, जबलपुर से 10 अगस्त को और भोपाल से यह जत्था11 अगस्त को रवाना हुआ । योजनानुसार देशभर के सभी जत्थे मुम्बई पहुँचे वहाँ से गोवा रवाना हुये । मुम्बई और नासिक ही नहीं गोवा के समीप सभी भारतीय सीमाओं से गोवा केलिये परिवहन के साधन रोक दिये गये थे । सभी आँदोलन कारी पैदल ही मुम्बई से महाराष्ट्र और गोवा की सीमा पर स्थित पत्रादेवी केलिये रवाना हुये । इन जत्थों के पत्रादेवी में सभी जत्थों का स्वागत उस समय के प्रसिद्ध समाजसेवी श्री राणे, मोहन रानाडे, बालाजी पेंडाकर, मधु दंडवते, विश्वनाथ लंबदे आदि ने स्वागत किया । इस पूरे मार्ग जलपान की व्यवस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने ही की थी ।

गोवा सरकार की सेना ने पत्रादेवी में ही नाकाबंदी कर रखी थी । जत्थों ने तिरंगा हाथ में लेकर आगे बढ़ने का प्रयास किया । सेना ने रोका और गोली चालन कर दिया । इसमें तीस से अधिक कार्यकर्ता बलिदान हुये और सौ से अधिक घायल हुये । बलिदान होने वालों में उज्जैन के राजाभाऊ भी थे । उनके सिर में तीन गोलियाँ लगी थीं। यह 15 अगस्त 1955 का दिन था । बलिदान होने वालों की संख्या इससे अधिक बताई गई। यह संख्या तो सरकारी आकड़ों की थी । कितने ही आँदोलनकारियों को “गुमशुदगी” के रूप में दर्ज किया जिनका कभी पता नहीं चला । इसमें मध्यप्रदेश के चार कार्यकर्ता थे ।
इसके बाद तनाव निरंतर बढ़ा। आँदोलन की शैली में थोड़ा परिवर्तन हुआ । इसके बाद आँदोलन तो सतत रहा लेकिन भारतीय और गोवा की सीमा पर प्रदर्शन हुये । तथा देशभर में सभाएँ हुईं। भारत सरकार पर दबाब बना । सरकार से अपेक्षा की गई कि जैसा अभियान जूनागढ़ और हैदराबाद आदि में चला था वैसा गोवा में चलारा जार । अंततः भारत सरकार तैयार हुई और भारतीय सेना सक्रिय हुई । 1 नवम्बर 1961 में भारतीय सेना के तीनों अंगों को युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश हुआ और भारतीय सेना ने दो दिसंबर को गोवा मुक्ति का अभियान शुरू किया । शुरु में गोवा में तैनात पुर्तगाल की सेना ने मुकाबला किया । लेकिन वह टिक न सकी । अंततः गोवा में पुर्तगाल की सेना और वहाँ तैनात पुर्तगाल के गवर्नर जनरल मैन्यु आंतोनियो सिल्वा ने समर्पण सन्धि पर हस्ताक्षर किये । यह हस्ताक्षर 19 दिसम्बर 1961 की रात साढ़े आठ बजे हुये । इसी के साथ गोवा पर 451 वर्ष पुराना पुर्तगाली शासन समाप्त हुआ और वह भारतीय गणतंत्र का अंग बन गया ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और युवाशक्ति : नए भारत केनेतृत्व की तैयारी

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डॉ शिवनन्दन

किरोड़ीमल कॉलेज

युवक वही जो तूफानों से टकराना जाने
दीपक वही जो अंधेरों में जलना जाने
यह पंक्ति युवा के सामर्थ की ओर संकेत कर रहा है। जो केवल शक्ति से ही नहीं अपितु चरित्र, अनुशासन और राष्ट्रभक्त से पूर्ण हो। क्योंकि केवल शक्ति का होना व्यक्ति को अनैतिक और अधर्म के मार्ग पर ले जाता है। और उस शक्ति को साधने के लिए अनुशासन की जरूरत है और यह अनुशासन या मूल्य हमें एक दिन में नहीं मिलता और ना ही हम खरीद सकते हैं। हम इसे धीरे-धीरे घर परिवार या समाज से सीखते हैं। समाज ही युवाओं को एक अच्छे संस्कार से परिपूर्ण कर सकता है। इस दिशा में समाज भिन्न-भिन्न रूपोंमें लगा हुआ है या युवाओं को नेतृत्व कराने का प्रयास करता है। ऐसे ही राष्ट्रीय स्वयं संघ भारत के युवाओं को इस रूप में करने का कार्य दशकों से कर रहा है। जब देश एक नए भारत की परिकल्पना कर रहा है। जो आत्मनिर्भर, सशक्त, समावेशी और सांस्कृतिक रूप से जागरूक हो तब यह आवश्यक है कि नेतृत्व की बागडोर ऐसे युवाओं के हाथों में हो जो केवल कैरियर नहीं, अधिकार ही नहीं अपितु अपने कर्तव्य में विश्वास करते हो।कर्म और उत्तरदायित्व की प्रधानता रखते हो।
युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी पूंजी

भारत युवाओं का राष्ट्र है कुल आबादी का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र का है। यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी सार्थक है। जब इस ऊर्जा को रचनात्मक दिशा में लगाया जाए। इसी दिशा में संघ ने अपने स्थापना से ध्यान केंद्रित किया हुआ है। परम पूजनीय डॉक्टर साहब ने संघ की शुरुआत बच्चों से ही की थी और प्रमुखता युवाओं को ही केंद्र में रखे थे।उन्हें यह पता था कि राष्ट्र का निर्माण युवाओं के हाथ में है। युवाओं को संस्कारित करना जरूरी है। इसलिए नागपुर के बाद शाखों का विस्तार विश्वविद्यालय और कॉलेज के आसपास के क्षेत्र में ज्यादा हुआ। संघ ने स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक युवाओं को संगठित, संस्कारित और समर्पित करने का कार्य किया है। संघ का मानना है कि यदि युवाओं का सही मार्गदर्शन किया जाए तो वह सिर्फ अपने लिए ही नहीं अपितु राष्ट्र के लिए जीने वाले नागरिक बन सकते हैं। और नित्य प्रति प्रार्थना में सभी भारत के परम वैभव के प्राप्ति हेतु प्रार्थना करते हैं। जो युवाओं को राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत-प्रोत करता है।
RSS की युवा नीति : विचार से व्यवहार तक

आरएसएस केवल संगठन ही नहीं है अपितु यह एक जीवन शैली है। क्योंकि आरएसएस के जो कार्य है वह सभी हमारे परंपरा और संस्कृति से हैं। चुकी परंपरा और संस्कृति हमारे जीवन का अंग है। हमारे सनातन परंपरा से लिए गए हैं। RSS उन्हीं मूल्यों को लोगों में जागने का प्रयास करता है। जो भारतीय दर्शन से पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। RSS की युवा नीति स्पष्ट है युवाओं को सद्गुणों से पूर्ण करना, न कि नेता बनना। हां लेकिन नित्य प्रति जो शाखा आता है उसमें सत्चरित्र, संवाद की शैली, शारीरिक रूप से सुदृढ़ और नेतृत्व की शैली स्वतः ही विकसित हो जाती है। आरएसएस व्यक्तित्व निर्माण पर बल देता है। व्यक्तित्व निर्माण केवल व्यक्तिगत विकास का कार्य नहीं है। बल्कि यह राष्ट्र निर्माण का आधार है। संघ का मानना है कि यदि व्यक्ति नैतिक, चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्रभक्त होगा तो वह समाज और राष्ट्र के लिए एक मजबूत आधारशिला बन सकता है। ऐसे व्यक्ति में चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय चेतना का विकास, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास, सेवा और त्याग की भावना, संगठित जीवन और अनुशासन, संस्कार और संस्कृति के प्रति आदर जैसे गुण को देखने को मिलता है।
“हजारों लाखों चरित्रवान व्यक्तियों का संगठन ही भारत को पुनः एक विश्व गुरु बन सकता है”
व्यक्तित्व निर्माण एक सतत प्रक्रिया के तहत होता है जिसे परम पूजनीय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने भारत के महापुरुषों की सोच को आधार बनाकर युवाओं को विचारशीलता, सेवा और संगठन कौशल में प्रशिक्षित करने की योजना बनाई और यह योजना शाखा के रूप में देखने को मिलता है।
शाखा

संघ मतलब शाखा, अगर संघ को जानना है तो शाखा आना होगा। अब प्रश्न है की शाखा क्या है? शाखा संघ की वह मूल इकाई है जहां लोग एक दूसरे से आत्मीयता से जुड़ते हैं। शाखा एक प्रशिक्षण स्थल है जहां पर नित्य प्रति एक निश्चित समय पर कुछ लोगों का समूह परम पवित्र भगवान ध्वज (गुरु)के संरक्षण में खेल खेलते हैं। और यह खेल शारीरिक तथा मानसिक दोनों होते हैं। प्रतिदिन नियमित शाखा में खेलों के माध्यम से व्यक्ति में अनुशासन,धैर्य, टीम की भावना इत्यादि का विकास होता है।
यह शारीरिक प्रशिक्षण केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि संकट की घड़ी में तत्परता और सामूहिक चेतना के विकास का माध्यम भी है। चूंकि खेल के भिन्न-भिन्न प्रकार हैं। कुछ खेल ऐसे हैं जिनके माध्यम से संगठन या आपदा के समय में सामूहिक रूप से काम करना सिखते हैं। इसी के साथ शाखाबौद्धिक कालांश में भी विभाजित होती है।
बौद्धिक विकास में भी शाखा का एक प्रमुख हिस्सा है क्योंकि नेतृत्व के गुण एक दिन में नहीं आते। लेकिन सतत अभ्यास से जरूर आते हैं। इसलिए बौद्धिक के लिए शाखा में अलग कालांश होता है। जिसमें अमृत वचन,सुभाषित, गीत, कविता, मूल्य या किसी भी मुद्दों पर बात रखना शामिल होता है। तथा समय-समय पर प्रवास के माध्यम से भी बौद्धिक विकास में सहयोग मिलता है। और शाखा के सुदृढ़ीकरण हेतु बीच-बीच में प्रशिक्षण भी मिलता है।
नैतिकता और संस्कृति : संघ का मूल्य आधारित मॉडल

आज जब वर्तमान में नैतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। तो संघ युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रहा है। संघ का दृष्टिकोण केवल धार्मिक नहीं बल्कि धर्म आधारित नैतिक जीवन का है। यहां धर्म का अर्थ केवल कर्मकांड या पूजा पाठ ही नहीं अपितु संघ कर्तव्य, सच्चाई और सेवा पर बल देता है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में लोगों के कर्मकांड अलग हो सकते हैं लेकिन उनके मूल्यों और कर्तव्यों में कोई असमानता नहीं दिखती। सभी भारतीय मतों के परम तत्व पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। परंतु उन सब का मानना है कि परम तत्व एक ही है(एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति)। और उस तक पहुंचने के लिए सभी ने प्रेम, करुणा, मैत्री, दया, सेवा,वसुधैव कुटुंबकम्, अद्वैत या अद्वैवाद तथा संपूर्ण जगत एक ही धरती मां की संतान है इत्यादि भावना को स्वीकार किया है। यही धर्म है जिसेव्यक्ति को धारण करने के लिए गीता, उपनिषद, बौद्ध (एस धम्मो सनंतनो- धम्मपद), जैन, आदि ने सुझाव दिए हैं। यही भारतीय संस्कृति की सुंदरता है, यही आध्यात्मिकता है। इसे संघ ने अपनी आत्मा माना है और इसे ही युवाओं में विकास करने का लक्ष्य ले रखा है। और यही परम वैभव प्राप्ति का मार्ग हो सकता है।

नेतृत्व निर्माण की प्रयोगशाला

उपरोक्त गुणों का विकास अचानक नहीं होता किंतु इसका विकास धीरे-धीरे होता है और यह खेल-खेल में हम इन सभी मूल्यों और नेतृत्व के गुण को सीख लेते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। संघ के हर एक कार्य और हर एक खेल के पीछे कोई नहीं कोई उद्देश्य छिपा होता है। हो सकता है वह तात्कालिक या दूरगामी परिणाम दे।यही से स्वयंसेवक सेवा, नेतृत्व के गुण, संगठन कौशल, अनुशासन और जनसंपर्क जैसी जीवनोपयोगी योग्यताओं को आत्मसात करता है। यहां नेतृत्व किसी पद या अधिकार से नहीं बल्कि सेवा और समर्पण से उपजता है।

संघ में प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी स्तर की जिम्मेदारी निभाता है। इस जिम्मेदारी के अनुभव से उसमें निर्णय लेने की क्षमता, अनुशासन और लोगों के साथ समन्वय बिठाने का कौशल विकसित होता है। संघ द्वारा हर वर्ष आयोजित होने वाले प्रशिक्षण वर्ग (Training Camps) इसका प्रमुख माध्यम हैं, जहाँ हजारों युवाओं को स्वयं के भीतर छिपे नेतृत्व को पहचानने और निखारने का अवसर मिलता है।

इन शिविरों में केवल भाषण नहीं होते, बल्कि अनुशासित जीवन, श्रम, सेवा और सहभागिता के माध्यम से नेतृत्व के व्यावहारिक पहलुओं को सिखाया जाता है। यही कारण है कि संघ में जो स्वयंसेवक वर्षों तक निस्वार्थ सेवा करता है, वही संगठन में उच्च दायित्वों तक पहुँचता है — बिना किसी प्रचार या प्रदर्शन के।

सेवा: नेतृत्व की पहली शर्त

संघ का स्पष्ट मत है कि “नेतृत्व सेवा से आता है, अधिकार से नहीं।” यह विचार केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संघ के हर कार्य में व्यावहारिक रूप से देखा जा सकता है। जब-जब देश पर संकट आया है, संघ के स्वयंसेवक मूक सेवकों की तरह अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आए हैं।

कोविड-19 महामारीके दौरान लाखों स्वयंसेवकों ने जरूरतमंदों तक भोजन, दवाइयाँ और सहायता पहुँचाई — बिना मीडिया प्रचार के। केरल की बाढ़ और उत्तराखंड आपदा जैसी घटनाओं में राहत शिविर, दवा वितरण और पुनर्वास कार्यों में संघ की तत्परता ने साबित किया कि सेवा ही उनका धर्म है।

भविष्य

वर्तमान की Gen Z बच्चे जो सोशल मीडिया, मोबाइल, लैपटॉप आदि विचलित करने वाली वस्तुओं में ज्यादा समय व्यतीत कर रहे हैं। आज हर मां-बाप सोचता है कि उसके बच्चे को एक सही दिशा मिले परंतु हो नहीं पता। क्योंकि जब परिवार समूह में रहते थे। तो घर में बच्चों को मूल्यात्मक शिक्षा देने का कार्य घर के बड़े-बुजुर्ग, दादा-दादी या नाना- नानी करते थे। लेकिन वर्तमान में भारतीय समाज भी एकल परिवार की ओर बढ़ रहा है। जहां माता-पिता दोनों काम में व्यस्त हैं तो उनके नवनिहालों को सही-गलत, उचित- अनुचित की दिशा कौन दे? यह भी देखने को मिलता है कि बच्चों को शांत रखने के लिए उसे मोबाइल देते हैं। बिना मोबाइल के बच्चे खाना नहीं खा रहे हैं इत्यादि। कई सारी समस्याएं जन्म ले रही हैं। इन समस्याओं को देखते हुए संघ ने पंच परिवर्तन में कुटुंब प्रबोधन को ले रखा है। बच्चों में मोबाइल के लत से परेशान माता-पिता भी संघ की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि संघ आधुनिकता का विरोधी है। संघ यह दिखता है कि भारतीय परंपरा और आधुनिकता एक दूसरे के पूरक है। संघ एक ओर जहां भगवान ध्वज और प्राचीन मूल्यों को संजोए रखता है तो वहीं दूसरी ओर युवाओं को तकनीकी रूप से दक्ष बनाकर एक समृद्ध भारत की नींव रख रहा है। एक शताब्दी में संघ अपने अभियान में समय और काल के साथ टेक्नोलॉजी और उसके प्रति दीवानी युवा पीढ़ी के साथ तालमेल बिठा रखने के लिए खुद को समय-समय पर ढालने की भी कोशिश की है। जिस समय दुनिया में Gen Z चर्चा में है। उस समय संघ इस वर्ग में बहुत ही सक्रियता के साथ सकारात्मक रूप से कदम ताल कर रहा है। इसके लिए शाखा, मंथन, YUVA (Youth United for Vision and Action), आईटी मिलन,स्टार्टअप सहयोग, नवाचार शिवरों तथा संघ के प्रकल्पों प्रचार, प्रसार, सेवा के माध्यम से युवा जुड़ रहे हैं। इस कार्यक्रमों के माध्यम से युवा तकनीकी के जरिए समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रेषित हो रहे हैं।

आज भारत जब ‘विकसित राष्ट्र’ बनने की ओर अग्रसर है, तब उसे ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो केवल बुद्धिमान या तकनीकी रूप से दक्ष न हों, बल्कि जिनमें संस्कार, सेवा और संयम हो। यह नेतृत्व किसी कोर्स या डिग्री से नहीं, बल्कि संघ जैसी प्रयोगशालाओं से निकलता है। और संघ के शताब्दी वर्ष में व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला में संघ की शुरुआत जहां मात्र 17 स्वयंसेवक से हुई थी आज वही देश भर में साप्ताहिक 32000 बैठकों के अलावा प्रतिदिन 83000 से अधिक शाखा लग रही है।

संघ ऐसे युवाओं को गढ़ता है, जिनमें शक्ति हो पर अहंकार नहीं आत्मविश्वास हो पर दिखावा नहीं और सबसे बढ़कर, ”राष्ट्र सर्वोपरि” की भावना हो।

(लेखक दिल्ली विश्व विद्यालय में शोध छात्र हैं)

The Netflix–Warner Merger: Threat to BhartiyaCinema and Creative Freedom

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~ Devanshu Mittal

Delhi : The recent shift in the ownership of Warner Bros taken over by Netflix is being celebrated in global financial circles as a landmark business deal. Valued at over 80 billion dollars, it brings together Netflix, one of the world’s largest streaming platforms and Warner Bros, one of the most influential legacy film studios. For investors, this merger promises scale, efficiency, and market dominance. But for filmmakers, writers, exhibitors, and audiences—especially in the non-west periphery—it raises serious and troubling questions. It is a cultural shift with deep consequences for storytelling, creativity, and the future of cinema as a shared public experience. Bhartiya cinema, with its diversity of languages, regions, and narrative traditions, stands vulnerable in this new age of consolidation. This consolidation brings the one-size-fits-all approach to the centre and directly threatens creative freedom and cultural diversity. Moreover, it challenges the ambition of Aatmanirbhar Bharat, even in the entertainment sector.

From Competition to Concentration

Earlier, Netflix and Warner Bros existed as two distinct creative entities. Warner Bros represented a century-old studio culture rooted in theatrical cinema, long-format storytelling, and strong creative unions. Netflix, on the other hand, symbolised speed, data-driven decisions, and global streaming dominance. With the merger, these two entertainment cultures will be forced into one uniform corporate structure. The danger lies not in collaboration, but in concentration. When multiple creative buyers are reduced to one giant decision-maker, diversity of taste and risk-taking declines. Filmmakers no longer pitch to different sensibilities; they pitch to a single algorithm-driven mindset. Director Vivek Agnihotri argues that like a forest, a healthy cultural ecosystem needs many players, many voices, and many entry points. A single giant, however powerful, blocks the light for smaller plants to grow.

The Age of “Walmart Storytelling”

This merger sets forth the arrival of what Vivek Agnihotri called “Walmart storytelling.” In this model, stories are treated like mass-produced goods. The Walmart stories are standardised, predictable, and designed to appeal to the widest possible audience. Global platforms often aim for a universal viewer. But in doing so, they flatten cultural complexity. Nuance, local specificity, and a so-called discomfort are slowly removed. What remains is safe, repeatable content tested by data rather than lived experience. This model does not censor stories openly. Instead, it quietly sidelines originality and dissent by rewarding sameness. Over time, films and series across cultures begin to resemble each other in tone, theme, and structure. The result is not global culture, but global uniformity.

What this means for Bhartiya Storytelling

From ancient epics and folk narratives to regional cinema and contemporary independent films, stories of Bharat are deeply rooted in culture, philosophy, and social reality. Despite nearly a decade of Netflix’s presence in Bharat, critics point out that very few original productions truly reflect thecivilisational depth. Most popular shows focus on urban crime, nihilism, or westernised youth narratives. These stories and characters may be set in Bharat, but they often lack Bhartiya worldview. The merger risks worsening this trend. When a single global giant controls content pipelines, Bharat’s stories will be filtered through global market logic. Regional films, social dramas, family stories, political narratives, throughout linguistic domain of Bharat already appear financially insignificant in comparison to global franchises like Harry Potter or DC films. When one company owns all the tentpoles, it no longer needs smaller tents.

The Decline of Theatrical Cinema

Another major concern raised by filmmakers relates to the future of theatres. Netflix has consistently shown limited commitment to the cinema-first model. Its theatrical releases are often brief and symbolic, designed mainly to qualify for awards rather than to build long-term audience engagement.Statements by Netflix CEO Ted Sarandos, where he previously described traditional theatrical releases as an “outdated concept,” have alarmed cinema owners worldwide. Although Sarandos later softened his stance and acknowledged that theatres and streaming can coexist, the platform’s business practices remain steadfast on the original statement. Many filmmakers argue that cinema is not just about content delivery, but about collective experience. American filmmaker Gregory Orr has emphasised that watching a film in a theatre is fundamentally different from watching it alone at home. In an age of growing isolation, the shared darkness of a cinema hall becomes socially and psychologically important. Renowned filmmaker James Cameron has gone even further, calling the takeover “a disaster.” According to Cameron, the value of cinema lies not just in the image, but in the intention behind its creation.

A New Company Raj?

Several critics have compared the dominance of American streaming platforms in Bharat to a modern-day Company Raj. Today, most major content in Bharat is controlled or distributed by a few global giants—Netflix, Amazon, Disney, and Sony. Bharat built digital infrastructure and creative talent, but failed to build a global storytelling platform of its own. As a result, Bhartiya stories now travel through foreign-owned pipelines, governed by foreign priorities. While any streaming platform has not acquired or invested in any Bhartiya film studio but its policy of acquiring intellectual property and production partnership in Bhartiya films establish west-controlled narratives. This raises a crucial question of cultural sovereignty.

Why Aatmanirbhar Bharat Must Include Cinema

Cultural confidence and medium of conveying the cultural narrative are prerequisites for a Bharat that aspire to become Aatmanirbhar. Hollywood did not dominate the world by outsourcing its stories. Korea did not build its soft power by handing over its narratives. Cinema is soft power. Stories shape how nations are seen and how citizens see themselves.If Bhartiya filmmakers are forced to tailor stories for foreign algorithms, Bharat risks becoming a content supplier and consumer rather than a cultural leader. Aatmanirbhar Bharat cannot exist if stories of Bharat are owned, filtered, and monetised elsewhere.

Even in America, the merger has drawn strong reactions from the industry who have expressed concern over the shrinking number of powerful buyers in the industry. For creators and technicians, consolidation means weaker negotiating power, fewer opportunities, and greater job insecurity. A global monopoly further marginalises independent voices and pushes creators to conform to platform expectations. These concerns are equally relevant in Bharat. The Multiplex Association of India has warned that the merger could lead to reduced theatrical windows or even direct-to-streaming releases for major titles. This would severely impact distributors, technicians and the entire film economy that depends on cinema halls, especially in Bharat, where theatres are still central to film culture.

The Need to Rethink

The Netflix–Warner merger reminds us that culture cannot be treated purely as a commodity without consequences. This moment demands serious discussion. Policymakers, filmmakers, and audiences must ask hard questions:

1. Who controls Bhartiya stories?
2. Who benefits from cultural consolidation?
3. What happens to regional cinema?
4. Where does Aatmanirbhar ambition stand in a global monopoly?
If Bhartiya cinema values its plurality and sovereignty, it must invest in independent institutions and encourage diverse platforms. Resistance does not mean rejecting technology or global reach. It means demanding balance, regulation, and creative sovereignty. It means ensuring that Bhartiya stories are told in Bhartiya voices, not merely packaged for global consumption.

The world does not need more content. It needs more cultures.Cinema grows in freedom, not factories. Only if concerned sections of the society act with awareness, there is hope to preserve the richness of Bhartiya cinema. This merger is not just about who controls entertainment. It is about who controls imagination, and culture in long run. And that question matters to every society that values its stories.

(Writer is a Doctoral candidate at Indira Gandhi National Open University.)

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