दिलीप मंडल के नाम पाति

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दिल्ली । दिलीप मंडल जिस तरह बंगाल की इस जीत को फिर जाति में बाँटने की प्रयास कर रहा है, वो सच में गलत है। कुछ दिन शांत रहा, फिर वही एससी, एसटी, ओबीसी वाला नैरेटिव शुरू कर दिया। हिंदुत्व की इतनी बड़ी जीत में भी जाति खोज लेना आखिर कैसी मानसिकता है?

हम स्वयं संघ के स्वयंसेवक हैं। ज़मीन पर जो बदलाव दिख रहा है, वो शायद ये लोग समझ ही नहीं पा रहे। आज हिंदू समाज का बड़ा वर्ग जाति को बस व्यक्तिगत पहचान तक सीमित कर रहा है। अब उसकी पहली पहचान धर्म बन रही है। यही सबसे बड़ा परिवर्तन है।

हिंदू समाज कभी किसी एक केंद्र पर नहीं टिका। उसकी ताकत हमेशा उसकी विकेंद्रीकृत व्यवस्था रही। जाति व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज को तोड़ना नहीं था, बल्कि कुल, वंश, परंपरा और सामाजिक दायित्वों को संभालना था। इसलिए हमारे यहाँ कुलधर्म, समाजधर्म और राष्ट्रधर्म की बात होती थी। व्यक्ति अकेला नहीं होता था, समाज का हिस्सा होता था।

लेकिन पिछले दो सौ साल में अंग्रेजों, कांग्रेस और वामपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से जाति को राजनीति का केंद्र बना दिया। क्योंकि उन्हें पता था कि हिंदू समाज को तोड़ना है तो उसकी सामाजिक संरचना पर हमला करना होगा। उसी का परिणाम है कि आज हर चीज़ जाति के चश्मे से देखी जाती है।

लेकिन अब परिस्थिति बदल रही है। हिंदू समाज फिर धर्म के आधार पर एकजुट हो रहा है। बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लोकतंत्र में दस में से आठ हिंदुओं का एक दिशा में खड़ा होना साधारण घटना नहीं है। ये हिंदू चेतना का जागरण है।

ऐसे समय में अगर कोई ये कहे कि भाजपा इसलिए जीती क्योंकि फलाँ जाति ने वोट दिया, तो वो इस पूरी चेतना का अपमान है। बंगाल की जीत किसी जाति की जीत नहीं थी। वो सामूहिक हिंदू समाज की जीत थी।

सच कहें तो एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल जैसी पहचानें पिछले कुछ दशकों में राजनीति ने हमारे ऊपर थोप दीं। हिंदू समाज की मूल सोच कभी ऐसी नहीं रही। ये वही विचार है जो समाज को स्थायी रूप से वर्गों में बाँटता है। दिलीप मंडल जैसे लोग उसी सोच को आगे बढ़ाते हैं, इसलिए उनका विरोध होना चाहिए। चाहे वो दिलीप मंडल हो, अजीत भारती हो या कोई और।

हिंदू समाज को अभी फिर से स्वधर्म, कुलधर्म, समाजधर्म और राष्ट्रधर्म को समझना बाकी है। जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, उसकी रक्षा कोई केंद्रीकृत व्यवस्था लंबे समय तक नहीं कर सकती। सनातन धर्म इतने आक्रमण झेलकर भी इसलिए बचा रहा क्योंकि उसकी शक्ति किसी एक केंद्र में नहीं, पूरे समाज में बिखरी हुई थी। उसी व्यवस्था को तोड़ने के लिए जाति को अपराधबोध बना दिया गया।

आज हालत ये हो गई है कि हिंदू अपने ही समाज की संरचना को लेकर अपराधबोध में जी रहा है। जबकि आवश्यकता इससे बाहर आने की है। हिंदू समाज को आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से और मजबूत करना होगा। यही भविष्य का मार्ग है।

संघ का गीत भी यही कहता है

“युग के साथ मिल के सब, कदम बढ़ाना सीख लो,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो,
भूल कर भी सुख में जाति, पंथ की न बात हो,
भाषा प्रांत के लिए, कभी न रक्तपात हो,
फूट का भरा घड़ा है, फोड़ कर बढ़े चलो।।
भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो।।

और इतिहास भी यही सिखाता है।

जोगेंद्र मंडल के साथ दलित पहचान के आधार पर पाकिस्तान गए हिंदुओं को आखिर में वहाँ से भागना पड़ा। जाति उन्हें बचा नहीं सकी। लेकिन जब वही लोग हिंदू बनकर खड़े हुए, तब पूरा राष्ट्र उनके साथ खड़ा हो गया।

यही हिंदू चेतना है।
यही उसकी असली ताकत है।
और यही बात दिलीप मंडल जैसे लोग कभी समझ नहीं पाएँगे।

: साभार

वृन्दावन को टूरिस्ट स्पॉट बनाने का पाप: ब्रज की आत्मा पर हमला और सांस्कृतिक हत्या

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मथुरा । एक तरफ वह पुराना ब्रज; धूल भरी पगडंडियाँ, कदम्ब की छाँव, यमुना की धीमी लहरें, मुरली की अनसुनी धुन। दूसरी तरफ आज का वृन्दावन; हॉर्न, होटल, भीड़ और सेल्फी स्टिक का जंगल।

तब भक्ति बहती थी, अब भीड़ बहती है। तब साधु मिलते थे, अब पैकेज टूर। तब शांति थी, अब शोर का मेला। क्या हमने आध्यात्मिकता को मनोरंजन में बदल दिया है? क्या यह वही भूमि है जहाँ राधा-कृष्ण की लीलाएँ सांस लेती थीं? या फिर यह एक ऐसा बाज़ार बन चुका है जहाँ आस्था भी बिकने लगी है?

वृन्दावन को व्यावसायिक टूरिज्म का हब बनाने का मॉडल न केवल गलत है, बल्कि श्री कृष्ण-राधा की पावन भक्ति संस्कृति पर सीधा आघात है। यह आस्था की भावनाओं से खिलवाड़ है, प्राचीन बृज विरासत पर हमला है। पुराणों, ग्रंथों और वैष्णव परंपरा में बृज भूमि को वन-उपवन, कुंज-वाटिका, तालाब-कुंड और यमुना घाटों से भरी एक पवित्र, शांत, गौ-पालन और रास-लीला की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन आज का “विकास” मॉडल इस वर्णन का घोर विरोधाभास है।

तथ्य चौंकाने वाले हैं। अध्ययनों के अनुसार वृन्दावन में सालाना 60 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं, जो त्योहारों के समय बढ़कर लाखों प्रतिदिन हो जाते हैं। इस भीड़ ने समूची ब्रज भूमि की काया विकृत कर दी है। ठोस कचरा, प्लास्टिक की बोतलें, प्रसाद पैकेटिंग और पूजा सामग्री का ढेर कुंडों, घाटों और यमुना में गिर रहा है। यमुना की स्थिति तो और भी भयावह है, उच्च BOD स्तर, फीकल कोलीफॉर्म की भारी मात्रा और अनुपचारित सीवेज के कारण नदी स्नान योग्य भी नहीं रही। 2026 के आंकड़ों में केशी घाट, विश्राम घाट जैसे स्थानों पर प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर्ज किया गया। बोट टूरिज्म के नाम पर चल रही नावों ने प्रदूषण को और बढ़ाया है, 2026 में वृन्दावन के पास यमुना में नाव पलटने की घटनाएं हुईं, जिसमें दर्जनों श्रद्धालु मारे गए। शुद्धिकरण की जगह सौंदर्यीकरण का ढोंग चल रहा है, जिससे पावन ब्रज रज दुर्लभ हो गई है।

पर्यावरणीय विनाश के आंकड़े स्पष्ट हैं। वन, हरियाली, तालाब और कुंड तेजी से गायब हो रहे हैं। कुंज गलियां, जो राधा-कृष्ण की लीला स्थलियाँ हैं, अब कंक्रीट की ऊंची अट्टालिकाओं से घिर गई हैं। 5500 से अधिक मंदिरों वाले इस छोटे से क्षेत्र में कैरिंग कैपेसिटी पार हो चुकी है। ट्रैफिक, शोर और वायु प्रदूषण ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। लोकल निवासियों का कहना है कि पहले की शांत वातावरण अब इतिहास बन चुका है। बिल्डर्स लॉबी का मॉडल हावी है: 2020-2025 के बीच प्राइम एरिया में भूमि की कीमतें तीन गुना से अधिक बढ़ गई हैं, कुछ जगहों पर 22-29% CAGR के साथ। स्थानीय वाशिंदे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, जबकि बाहरी डेवलपर्स और फ्रॉड बाबाओं का राज चल रहा है। मठाधीश बनकर भावनाओं का व्यापार करने वाले अज्ञान के अंधेरे का फायदा उठा रहे हैं। भक्ति अब कमोडिटी बन गई है; इंस्टेंट मोक्ष की तलाश में आने वाली भीड़ असली आस्था को कुचल रही है।

सांस्कृतिक विनाश और भी गहरा है। बृज भाषा लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। गुरुकुलों की जगह अंग्रेजी स्कूलों का बोलबाला है। पारंपरिक गायन, नृत्य, भोजन और वेशभूषा बदल चुके हैं। चैतन्य महाप्रभु, सूरदास और वल्लभाचार्य की भूमि अब पहचान में नहीं आती। चारों तरफ ऐश-ऐय्याशी के केंद्र बन चुके हैं, जहां भक्ति की जगह व्यावसायिकता हावी है। बृज संस्कृति के संरक्षण में जीरो प्रयास दिखाई देता है। विकास संस्थाएं भ्रष्टाचार के अड्डे बन गई हैं। बिना शुद्ध जल की व्यवस्था बढ़ाए रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, जो यमुना को और प्रदूषित कर रहे हैं।

यह “विकास” ब्रज भूमि की मूल आत्मा को कुचल रहा है। प्राचीन ग्रंथों में बृज का विकास उसके पिछड़ेपन को सहेजने, गौ-रक्षा, वन-संरक्षण और सादगी में निहित था, कंक्रीटाइजेशन में नहीं। आज की अट्टालिकाएं, मॉल जैसी संरचनाएं और हाईवे ब्रज की पावनता को नष्ट कर रहे हैं। स्थानीय ज्ञान प्रणाली, पारंपरिक जल संरक्षण और जैव विविधता खतरे में है। पर्यटन अर्थव्यवस्था के नाम पर जो रोजगार पैदा हो रहा है, वह मौसमी और असमान है; स्थानीय महिलाएं और पिछड़े वर्ग हाशिए पर हैं।

ब्रज की रक्षा जरूरी है। विकास का नाम लेकर इस पवित्र भूमि की आत्मा को कुचलना अपराध है। श्री कृष्ण की लीला भूमि को सौंदर्यीकरण की नहीं, असली शुद्धिकरण की जरूरत है; यमुना की सफाई, कुंडों का संरक्षण, वनों का पुनरुद्धार, भीड़ नियंत्रण, स्थानीय संस्कृति का संवर्धन और बिल्डर्स लॉबी पर लगाम। बिना इनके कोई भी विकास मॉडल ब्रज के साथ छलावा है।

आस्था के केंद्र को व्यावसायिक हब बनाने वाले सोचें; क्या हम श्री कृष्ण को बेच रहे हैं? क्या हम राधा की वाटिकाओं को कंक्रीट के नीचे दफना रहे हैं? ब्रज की रक्षा करना सिर्फ पर्यावरण या संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि सनातन धारा की रक्षा है। अगर आज नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ प्लास्टिक और कंक्रीट के बीच “इंस्टेंट भक्ति” का मजाक देखेंगी, असली ब्रज कभी नहीं जान पाएंगी।

यह घोर अन्याय है। ब्रज को बचाओ, उसकी आत्मा को बचाओ। विकास का ढोंग बंद करो, शुद्धिकरण और संरक्षण अपनाओ।

‘इंडिया से भारत’ का विमोचन

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प्रशांत पोल

भोपाल । कल का कार्यक्रम अद्भुत था। खचाखच भरा हुआ भव्य कुशाभाऊ ठाकरे सभागार। बाहर खडे डेढ़ – दो सौ लोग, और जगह नही मिली इसलिए वापस लौटे लगभग इतने ही लोग। उपस्थित सारे सुधी और प्रबुद्धजन। संघ के, विचार परिवार के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता। लगभग आठ – दस कुलगुरु। । अनेक शिक्षाविद, अनेक प्रशासनिक अधिकारी, निगम – मंडलों के अध्यक्ष, मिडीया जगत के वरिष्ठतम पत्रकार। मध्यप्रदेश मंत्रीमंडल के २१ मंत्री… किसी पुस्तक के विमोचन के लिए इतना सब ? मैं शब्दशः अभिभूत हूं..!

प्रसंग था, मेरी पुस्तक *इंडिया से भारत* के विमोचन का। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथी थे, तो पत्रकारिता के पितृपुरुष, लेखक / चिंतक और टीवी 9 के निदेशक श्री हेमंत शर्मा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। वे इस कार्यक्रम के लिए विशेष रुप से भोपाल पधारे थे। विद्या भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष एवं म. प्र. नियामक आयोग के अध्यक्ष डॉ. रविंद्र कान्हेरे विशिष्ठ अतिथी थे। प्रकाशक प्रभात कुमार जी, दिल्ली से इस कार्यक्रम के लिए पधारे थे। कार्यक्रम ‘प्रज्ञा प्रवाह’ द्वारा आयोजित था। प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत युवा आयाम प्रमुख आशुतोष कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। प्रांत संयोजक धीरेंद्र चतुर्वेदी मंचासीन थे।

प्रारंभ मे प्रज्ञा प्रवाह के अ. भा. सह-संयोजक दीपक शर्मा जी ने पुस्तक का परिचय दिया। श्री हेमंत शर्मा जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि *”यह पुस्तक केवल एक वैचारिक रचना नहीं, बल्कि भारत को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से पुनः जोड़ने का सशक्त प्रयास है।”* उन्होंने कहा कि ‘इंडिया से भारत’ पुस्तक के लेखक प्रशांत पोल निरंतर भारतीय समाज को पाश्चात्य मानसिकता से बाहर निकालकर आत्मगौरव से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। यह पुस्तक नई पीढ़ी को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि हम एक राष्ट्र के रूप में कौन हैं, हमारी पहचान क्या है और हमारी सांस्कृतिक जड़ें कहां हैं।

उन्होंने कहा कि “एक समय भारत की बात करना रूढ़िवादी माना जाता था, लेकिन आज देशभर में सांस्कृतिक चेतना का नया दौर शुरू हुआ है।” उन्होंने कहा कि अब “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के बाद वैचारिक स्तर पर ‘इंडिया, भारत छोड़ो’ जैसे आत्मबोध की आवश्यकता है, और यह पुस्तक उसी विचार का विस्तार है।

*मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि ‘इंडिया से भारत’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि देश के वैचारिक, सांस्कृतिक और आत्मगौरवपूर्ण पुनर्जागरण की सजीव कथा है।* उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 से 2026 तक का कालखंड भारत के लिए स्वर्णिम दौर है, जिसे आज देशवासी प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं।

*मुख्यमंत्री ने कहा कि “लेखक प्रशांत पोल ने इस पुस्तक में भारत की उस यात्रा को दर्ज किया है, जिसमें औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर राष्ट्र ने अपने आत्मसम्मान, सांस्कृतिक चेतना और निर्णायक नेतृत्व को वापस प्राप्त किया है।” उन्होंने आगे कहा कि “स्वतंत्रता के बाद कई ऐतिहासिक अवसरों पर भारत ने अपने सामर्थ्य के अनुरूप निर्णय नहीं लिए, जिसका उल्लेख पुस्तक में अत्यंत साहसिक ढंग से किया गया है।”*

कार्यक्रम अत्यंत सधा हुआ, व्यवस्थित और सटीक रहा। प्रज्ञा प्रवाह के कार्यकर्ताओंने इस हेतू अथक परिश्रम किये।

मेरे अभिन्न मित्र, प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री राकेश सिंह, पठन- पाठन मे रुची रखने वाले संवेदनशील व्यक्ती हैं। वाचन संस्कृती का प्रसार होना चाहिए, लोगों ने अच्छा वैचारिक साहित्य पढना चाहिए यह उनका कन्विक्शन हैं। इसपर इनकी दृढ श्रध्दा हैं। जहा इस प्रकार की वाचन संस्कृती का जोर रहता हैं, वह भाग, वह क्षेत्र समृध्द रहता हैं, ऐसी राकेश जी की मान्यता हैं। इसलिए, कल के कार्यक्रम मे राकेश जी का महती योगदान हैं।

कल के इस जबरदस्त सफल कार्यक्रम के लिए, और बडी संख्या मे पुस्तक का क्रय करने के लिए मैं आप सभी का शतशः कृतज्ञ हूं..!

बंगाल चुनाव परिणाम – स्वर्णिम भविष्य का संकेत

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दिल्ली । बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम अभूतपूर्व हैं, अभिभूत करने वाले हैं। भाजपा की लम्बी अनथक साधना, कार्यकर्ताओं का कठोर श्रम, कुशल रणनीति, बंगाल के मतदाताओं का किसी भी प्रकार के भय से उबर कर मतदान करना जैसे कारकों ने मिलकर लंबी प्रतीक्षा के बाद भाजपा (भारतीय जनसंघ) के संस्थापकों में से एक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की जन्मस्थली बंगाल में कमल खिला दिया है। आज बंगाल के धर्मयोद्धा अभय होकर जयश्रीराम, वंदेमातरम और भारत माता की जय का उद्घोष कर रहे हैं। बंगाल की जनता तृणमूल सरकार की अराजकता, कटमनी, मुस्लिम तुष्टिकरण और बांग्लादेशी घुसपैठियों व रोहिग्याओं से तंग आ चुकी थी। महिला सुरक्षा उपहास बन चुकी थी स्वयं मुख्यमंत्री बेटियों को शाम के बाद घर से बाहर न निकलने को कहती थीं, सरकार ने आर जी कार की वीभत्स घटना में अपराधियों को संरक्षण दिया था उससे टूट कर बंगाल का हिंदू जनमानस करो या मरो की स्थिति में पहुंचकर एकजुट हुआ और 93 प्रतिशत मतदान करके 20 हजार करोड़ से अधिक घोटालों वाली निर्मम ममता सरकार को उखाड़ फेंका ।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर भाजपा का सूर्योदय भारत की राजनीति में व्यापक बदलाव लाने वाला है। बंगाल की जनता ने घुसपैठ, तुष्टिकरण और हिंसा की राजनीति को नकार कर विकास, सुरक्षा और सुशासन का मार्ग चुना है। बंगाल की असुरक्षित नारी शक्ति, रोजगार के लिए बार -बार पलायन करते युवा, डर-डर कर जीते बुजुर्ग और घुसपैठियों द्वारा अपनी माँ- माटी और धर्म को अपमानित होते देखने वाले मध्यमवर्गीय सभी ने भाजपा पर विश्वास जताया है।

बंगाल में लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बने रहने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अथक प्रयास किए। बाहरी बनाम भीतरी और बंगाली अस्मिता के साथ ही मछली, मांस और क्षेत्रीय गौरव के भावनात्मक मुद्दों को हवा दी। चुनाव आयोग के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया। एसआईआर से लेकर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती तक का तीखा विरोध किया। मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण जैसी फर्जी और अवैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को रुकवाने का भरपूर प्रयास किया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बहस के लिए स्वयं सुप्रीम कोर्ट पहुँच गयीं । एसआईआर रुकवाने व अन्य मुद्दों पर चुनाव आयोग के खिलाफ कुल मिलाकर 80 याचिकाएं दायर कर इतिहास रच दिया। किंतु इनमें से कोई भी मुद्दा इस बार जनता को बहका नहीं सका क्योंकि ये मुद्दे जनता के थे ही नहीं। जनता के अपने मुद्दे थे – सुरक्षा, भ्रष्टाचार से मुक्ति, शांति, रोजगार, घुसपैठियों से मुक्ति, अपने त्यौहार मनाने का अधिकार जिसके लिए उसने प्राणों की बाजी लगाकर भी भाजपा को वोट दिया है।

बंगाल में भाजपा की विजय को महिलाओं की मैान क्रांति भी कहा जा सकता है क्योंकि दो चरणों में संपन्न हुए मतदान के दौरान मतदान केन्द्रों पर पुरुषों की तुलना में महिलाओ की कतारें अधिक लम्बी थीं जो संकेत दे रही थीं कि अब लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं से उनका मोहभंग हो चुका है उस पर सुरक्षा और सम्मान भारी पड़ रहा है। संदेशखाली ओैर आर जी कर जसी घटनाओं के कारण महिलाओं के मन का आक्रोश ममता समझ नहीं सकीं । संदेशखाली से लेकर आर जी कांड तक ममता बनर्जी की सरकार आरोपियों के साथ खड़ी थी।

बंगाल मे मुस्लिम तुष्टिकरण का विकृत खेल चल रहा था। ममता बनर्जी को जय श्रीराम के नारे से नफरत हो गई थी। अयोध्या में होने वाले दिव्य – भव्य राम मंदिर का कार्यक्रम बंगाल के लोग टीवी पर भी न देख सकें इसके लिए सरकार ने अपनी मशीनरी का पूरा दुरुपयोग किया।श्रीराम के नाम से ममता को इतनी घृणा हो गई थी कि उन्होंने बंगाली भाषा में जो इन्द्रधनुष को रामधोनु कहा जाता है उसको बदलकर रंगधोनु कर दिया था। रामनवमी पर शोभायात्रा निकालना, बसंत पंचमी का पर्व मनाना एक गंभीर समस्या बन गया था। गौ तस्करी सरेआम गोवध का बोलबाला हो गया था। स्वाभाविक है बंगाल का हिन्दू त्राहि त्राहि कर रहा था। इसी को भांप कर बंगाल बीजेपी के नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा था कि बंगाल में हिंदुओं व सनातन की रक्षा के लिए भाजपा का जीतना जरूरी है नहीं तो बंगाल में हिंदू समाप्त हो जाएगा ।

भाजपा इस बार बंगाल में भाषाई और क्षेत्रवाद की दीवार गिराकर जनता को यह भरोसा दिलाने में सफल रही कि वह “बाहरी“ नहीं बल्कि उनकी अपनी है। भाजपा बंगाल की जनता को यह समझाने मे सफल रही कि घुसपैठ व डेमोग्राफी में बदलाव की समस्या का हल वही कर सकती है। प्रधानमंत्री मोदी के भय बनाम भरोसे का नारा दिलों को छू गया। वह हर जनसभा में कहते थे कि भय जा रहा है और भरोसा आ रहा है जिसका असर चुनाव परिणामें में स्पष्ट दिखाई पड़ा है। बंगाल विजय के लिए इस बार भाजपा ने पूरी ताकत लगा दी और किसी प्रकार की कोई गलती नहीं की। वर्ष 2021 में जो कमियां रह गयीं थीं उन पर काम किया गया और परिणाम सामने है।

वर्ष 2024 तक पूरे बंगाल में चुनावी हिंसा आम बात थी, रक्तरंजित चुनाव का इतिहास है बंगाल का। इस बार चुनाव आयोग की सख्ती और भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती से जनता में भरोसा जगा और वह भारी संख्या में मतदान केंद्रों पर पहुंची।

भाजपा की विजय का एक अन्य कारण उम्मीदवारों का चयन भी रहा। भाजपा ने राज्य में ऐसे अनेक चेहरों को आगे किया जो सत्ता की राजनीति से दूर झोपड़ियों और खेतों में अपना पसीना बहाते रहे हैं। सन्देशखाली की रेखा पात्रा, आर जी कर पीड़िता की माँ और दूसरों के घरों में काम करने वाली मेहनतकश सामान्य स्त्री -ऐसे प्रत्याशी जिनमें सब अपने को पहचान सकें। ये आज विधायक हैं। भाजपा को विजयी बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सहित सभी चालीस स्टार प्रचारकों ने कड़ी मेहनत की।
बंगाल वामदलों के कुशासन से पीड़ित लोगों ने ममता को एक नहीं तीन बार मौका दिया किंतु बंगाल की जनता की समस्याएं बढ़ती ही चली गयीं जिस कारण आक्रोश भी बढ़ता चला गया। बंगाल की जनता की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय हो चुकी है। इलाज का खर्च बेतहाशा है कितु सुविधाएं नहीं के बराबर हैं। ममता अपने अहंकार के कारण केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं कर रही थीं।

बंगाल में भाजपा की विजय बहुत बड़ी व ऐतिहासिक है जिसका प्रभाव देश की राजनीति में दूर तक जाएगा राज्यसभा में संख्ष्याबल बदलेगा। यह जीत देश को घुसपैठियों, आतंकवादी गतिविधियों, और हमलों से बचाएगी। चिकननेक सुरक्षित रहेगा । पूर्वोत्तर राज्य सुरक्षित होंगे। बंगला देश की सीमा से होने वाली गो तस्करी रोकी जा सकेगी। भारत की सीमा सुरक्षित होगी।

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