संस्कार भारती, दिल्ली प्रांत की साधारण सभा सम्पन्न – संस्कृति और संगठन पर विमर्श

unnamed-1-2.jpg

नई दिल्ली : संस्कार भारती दिल्ली प्रांत की साधारण सभा आयुषम केंद्र के सभागार में गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर उत्तर क्षेत्र प्रमुख विजय जी, केंद्रीय कार्यालय सचिव अशोक तिवारी जी, प्रांत अध्यक्ष प्रभात कुमार, महामंत्री भूपेंद्र कौशिक, संरक्षक शिव प्रकाश सहित अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

प्रांतीय अध्यक्ष श्री प्रभात कुमार जी ने वरिष्ठ कवि एवं समाजसेवी राजेश चेतन जी को दिल्ली प्रांत का कार्यकारी अध्यक्ष रूप में घोषणा की साथ ही प्रांतीय कोषाध्यक्ष रूप श्री महेंद्र गुप्ता घोषणा हुई, श्री प्रदीप जालीवाला को प्रान्त मंत्री बनाया गया। पदाधिकारियों के घोषणा को संगठन की सांस्कृतिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। साथ ही प्रांत के विभिन्न विभागों में नए दायित्वों के निर्धारण और कार्य विस्तार पर विमर्श हुआ।

इस वर्ष ‘कला उत्सव’ विशेष आकर्षण रहेगा। इसके साथ ही दिल्ली प्रांत के आठ विभाग विकास और विस्तार की दिशा में सक्रिय कार्यक्रम करेंगे। संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर संगोष्ठी, सेमिनार और प्रदर्शनी, तथा गणेश उत्सव पर सात दिवसीय पेंटिंग एवं प्रदर्शनी कार्यशाला आयोजित की जाएगी।

विशेष बौद्धिक सत्र में विजय जी और अशोक तिवारी जी ने कहा कि संस्कार भारती केवल एक सांस्कृतिक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की जीवंत चेतना है। नई संरचना और सक्रिय कार्ययोजना के साथ संगठन समाज में और प्रभावशाली भूमिका निभाएगा।

गौरतलब है कि अपनी स्थापना से लेकर अब तक विस्तार की दृष्टि से कला जगत में संस्कार भारती आज विश्व की सबसे बड़ी संस्था के रूप में प्रतिष्ठित है।

भगवान गणेश का रहस्य और वर्तमान सामूहिक उपासना

unnamed-5.jpg

– गिरीश जोशी

सनातन से विपरीत विचार रखने वाले या नास्तिक लोगों द्वारा उठाए गए एक प्रश्न से भगवान गणेश को समझने का प्रयास करते हैं। ये लोग पुछते हैं कि हिंदू अपने सभी मंगल कार्यों कि शुरुआत गणेश पूजन से करते हैं, तो भगवान शिव और पार्वती जो कि उनके माता-पिता हैं उनके विवाह के समय प्रथम पूजन किसका हुआ था। इस प्रकार के प्रश्नों से अनेकों बार सनातन के अनुगामी बुद्धिजीवी खास कर युवा भी भ्रमित हो जाते हैं, उनको ये प्रश्न बड़ा तार्किक लगता है। इसका उत्तर जानने के लिए गणपती अथर्वशीर्ष के प्रथम श्लोक को देखते हैं जिसमें कहा गया है– “त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥ त्वमेव केवलं कर्तासि ॥ त्वमेव केवलं धर्तासि ॥ त्वमेव केवलं हर्तासि ॥ त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रम्हासि ॥ त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥“ इसके श्लोक के द्वारा भगवान गणेश के लिए उसी ब्रह्म तत्व को इंगित किया गया है जो ब्रह्मतत्व अथवा परमेश्वर इस सृष्टि का सृजनकर्ता है जो आदि , अनादी और अनंत है यानि जिसका न तो आरंभ है और न ही अंत ।

हम जानते हैं कि ब्रह्मतत्व निर्गुण और निराकार है। वो सृष्टि का सृजन, पालन और विसर्जन करता है। हमारे शास्त्रों में इसे स्पष्ट किया गया है कि सृजन का कार्य ब्रह्मा,पालन का विष्णु और विसर्जन का कार्य शिव के माध्यम से होता है। लेकिन किसी भी कार्य को करने के लिए किसी स्थान की आवश्यकता होती है या कहें कि आधार की आवश्यकता होती है। सृष्टि संचालन की इन तीनों क्रियाओं के लिए इस अखिल ब्रह्मांड का आधार कौन है इसे समझने के लिए फिर से अथर्वशीर्ष की एक उक्ति को देखते हैं जो कहती है – ” त्वं मूलाधार: स्थितोसि नित्यम ॥” इसका अर्थ ये लगाया जाता है कि मनुष्य के शरीर में जो सात चक्र है उसमें सबसे पहला चक्र मूलाधार होता है वहां श्री गणेश का वास होता है। किंतु हमारे शास्त्रों की एक और उक्ति “यत पिंडे तत ब्रह्मांडे” से यह स्पष्ट होता है कि भगवान गणेश प्रत्येक मानव के मूलाधार में ही नहीं बल्कि इस अखिल ब्रह्मांड के मूलाधार में स्थित है और अनादि काल से विद्यमान है।
जब माता पार्वती ने मिट्टी की मूरत बनाकर उसमें प्राण तत्व की स्थापना करने के लिए शक्ति का आह्वान किया तब वो गणेश तत्व जो पूर्व से ही विद्यमान रहा है उसका अंश उस मिट्टी की मूरत में आकर प्रतिष्ठित हुआ। हम मंदिर बनाते हैं, उसमें पत्थर अथवा धातु की मूर्ति स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा की विधि पूर्ण करते हैं तब उस मूर्ति का चैतन्य दर्शनीय होता है। जब मानव के पास ये क्षमता है तब स्वयं आदिशक्ति आव्हान करें तो निश्चित ही परम तत्व का ही आगमन होता है।

कलयुग के पूर्व द्वापर में जब उस परमतत्व का श्री कृष्ण के रूप में अवतरण हुआ तब कितनी विलक्षण घटनाएं घटी थी ये हम पौराणिक – ऐतिहासिक ग्रंथों में पढ़ते ही हैं। भगवान गणेश का जन्म तो उसके भी पूर्व की घटना है। उस दिव्य शक्ति के आवतरण के बाद जो भी घटनाएं घटी खासकर भगवान शिव से उनका द्वंद, सर का काटा जाना, हाथी के बच्चे का सर उनके धड़ पर लगाना इन सारी घटनाओं का विश्लेषण अनेक ग्रंथों में किया गया है ।

गणेश चतुर्थी से भगवान गणेश की आराधना- उपासना दस दिनों के लिए की जाती है क्योंकि उस समय धरती पर गणेश तत्व की पृथ्वी से अधिक निकटता रहती है। उस अवधि में गणपति की उपासना करने पर हमारा चित्त गणपति चैतन्य के साथ सहजता से जुड़ जाता है। भगवान गणेश सृष्टि का आधार है, सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत है। सृष्टि में जहां से सृजन होता है, रचनात्मकता प्रस्फुटित होती है उसका भी मूल केंद्र है।इसीलिए भगवान गणेश रचनात्मकता और सृजनशीलता के अधिष्ठाता है ।
आज हमें साहित्य, फ़िल्म, नाट्य, मूर्ति, चित्रकला, नृत्य,निर्माण आदि क्षेत्र में रचनात्मकता, सृजनशीलता,नवीनता में कमी दिखाई दे रही है। उसका मूल कारण ये है कि इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले रचनात्मकता के इस नित्य चिरंतन स्त्रोत से दूर होते दिखाई पड़ते हैं। यदि कला साधक सतत गणपति की उपासना करें, आराधना करें, उनका ध्यान करें तो उनके भीतर ईश्वर प्रदत्त रचनात्मकता, सृजनशीलता की धारा कभी कुंद नहीं हो सकती। कलाकारों, साहित्यकारों, लेखकों, अभिनेताओं आदि को इस रहस्य को समझना पड़ेगा। जिस तरह मोबाइल का उपयोग करने के लिए बैटरी को चार्ज करना पड़ता है उसी तरह हमारे भीतर की रचनात्मकता को चिरंतन बनाए रखने के लिए उसे ब्रह्मांड की रचनात्मकता के मूल स्त्रोत के साथ जुड़कर रिचार्ज करना ही पड़ेगा ।

गणपति की उपासना को व्यक्तिगत स्तर से उठाकर सामाजिक स्तर पर लाने का विलक्षण विचार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को सुझा था। उन्होंने गणपति उपासना को सामाजिक स्वरूप प्रदान कर इस प्रकार के कार्यक्रमों की रचना दस दिन के लिए की ताकि आने वाली पीढ़ी हमारी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ सकें, साथ ही समाज को जागृत कर उसे अंग्रेजों के विरुद्ध खड़ा कर देश को स्वतंत्र किया जा सके क्योंकि तत्कालीन परिस्थिति में समाज व देश के लिए वो सर्वोच्च प्राथमिकता थी।

आज की स्थिति में देखें तो ध्यान में आता है की समय काल परिस्थिति के कारण कार्यक्रमों के स्वरूपों में बदलाव हुआ है। लेकिन ये बदलाव कितना समाजहित में है,देशहित में हैं इसे समझने की आवश्यकता है। आज गणपति उत्सव के कार्यक्रम की योजना बनाते समय आयोजकों को इस बात का विचार करना होगा की वर्तमान में हमारे देश की जो समस्याएं हैं उनका निराकरण करने के लिए समाज को किन बातों के प्रति जागरूक करना है,समाज को देश विरोधी ताकतों के खिलाफ संगठित करने के लिए किस प्रकार के प्रबोधन की आवश्यकता है और भविष्य में जो चुनौतियां हमारे समाज और राष्ट्र के सामने आने वाली है उन चुनौतियों का सामना करने के लिए समर्थ -सक्षम समाज और राष्ट्र का निर्माण करने हेतु नवीन पीढ़ी को गढ़ने के लिए हमें किस प्रकार के कार्यक्रमों की रचनाएं करना है ।

उदाहरण के लिए देखें तो आज पर्यावरण असंतुलन एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ा है जो भविष्य के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है। इसीलिए पर्यावरण से संबंधित सभी आयामों पर समाज को जागृत करने की गतिविधि इन दस दिनों के उत्सव में की जा सकती है। उसी तरह आज हमारे परिवार वर्तमान परिस्थिति के कारण छोटे होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी को जिस प्रकार के संस्कार परंपरागत रूप से मिलते थे उसमें कमी आती दिखाई देती हैं।इसीलिए आयोजन से जुड़े प्रत्येक कुटुंब का प्रबोधन इस विषय में हो सके इस बात का विचार भी कार्यक्रम को करते समय कर सकते हैं ।

देश विरोधी ताकतें समाज में वैमनस्य फैलाकर देश को टुकड़ों- टुकड़ों में बांटने का मंसूबा लिए समाज के बीच खाई खोदने का षड्यंत्र रचती रहती है। इन गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए समाज में समरसता बढ़ाने के उद्देश्य वाले कार्यक्रमों को शामिल किया जा सकता है।

नई पीढ़ी को सनातन धर्म की आधारभूत जानकारी देने के लिए हमारे मूल ग्रंथों जैसे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, उपनिषद, वेदों की शिक्षा देकर धर्म के प्रति समाज का जागरण किया जा सकता है।
भगवान गणपति, गणों के पति यानी सेनापति भी है। भगवान गणेश ने सतयुग में देवांतक व नरांतक नामक असुरों का संहार किया था। उसी तरह त्रेता युग में सिंधु , द्वापर में सिंदूरासुर के साथ मत्सासुर, मदासुर, मोहासुर, कामासुर, लोभासुर, क्रोधासुर, मामासुर, अहंतासुर जैसे असुरों के संहार का वर्णन शास्त्रों में मिलता है ।

भगवान गणपति चतुर्भुज हैं वे अपने एक हाथ में ज्ञान के प्रतीक मोदक को रखते हैं, दूसरे हाथ से हमें आशीर्वाद देते हैं। तीसरे व चौथे हाथ में “पाश और अंकुश” धारण किए हुए हैं। वर्तमान परिस्थिति में गणपति के मोदक और लड्डू पर ध्यान देने के अलावा ‘पाश और अंकुश’ पर ध्यान देना भी आवश्यक हो गया है। आज के समय में देश विरोधी ताकतें जिस प्रकार से समाज में वैमनस्य को बढ़ाने वाले विमर्श स्थापित करने में लगी हैं उन्हें रोकने के लिए विवेक के ‘अंकुश’ का उपयोग समाज को बढ़ाना होगा। उसी तरह हमारे समाज को अपसंस्कृति की जंजीरों से बांधने का प्रयास अलग-अलग माध्यमों से हो रहा है। इन जंजीरों को अपने सनातन मूल्यों के विचार ‘पाश’ से काट कर समाज को देश के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का काम करने की आवश्यकता है। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को दूषित करने का काम जो तत्व, बातें, विचार करते हैं उन पर ‘अंकुश’ का उपयोग करना है।

लोक कल्याणकारी कामों में सफलता निश्चित मिलेगी इस बात का आश्वासन भगवान गणेश की अभय मुद्रा हमें देती है। परिणाम के रूप में मन में जो मोद यानि आनंद उत्पन्न होगा वो मोदक के रूप में भगवान के प्रसाद स्वरूप प्राप्त होगा। आज के समय में राष्ट्र एवं समाज की दृष्टि से यही सच्ची गणेश उपासना होगी ।

– (श्री जोशी संस्कृति अध्येता एवं अकादमिक प्रशासक हैं)

संघ किसी के विरोध में नहीं बना,संगठित होना समाज की स्वाभाविक अवस्थाः डा.मोहनराव भागवत

2-47.jpeg

नई दिल्ली। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के प्रथम दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ का निर्माण भारत को केंद्र में रखकर हुआ है और इसकी सार्थकता भारत के विश्वगुरु बनने में है। संघ कार्य की प्रेरणा संघ प्रार्थना के अंत में कहे जाने वाले ‘भारत माता की जय’ से मिलती है। संघ के उत्थान की प्रक्रिया धीमी और लंबी रही है, जो आज भी निरंतर जारी है। उन्होंने कहा कि संघ भले हिन्दू शब्द का उपयोग करता है, लेकिन उसका मर्म ‘वसुधैव कुटुंबकम’ है। इसी क्रमिक विकास के तहत गांव, समाज और राष्ट्र को संघ अपना मानता है। संघ कार्य पूरी तरह स्वयंसेवकों द्वारा संचालित होता है। कार्यकर्ता स्वयं नए कार्यकर्ता तैयार करते हैं।

दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ विषय पर तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया है।

व्याख्यानमाला के उद्देश्य पर मोहन भागवत जी ने कहा कि संगठन ने विचार किया कि समाज में संघ के बारे में सत्य और सही जानकारी पहुंचनी चाहिए। वर्ष 2018 में भी इसी प्रकार का आयोजन हुआ था। इस बार चार स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित होंगे ताकि अधिक से अधिक लोगों तक संघ का सही स्वरूप पहुँच सके। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की परिभाषा सत्ता पर आधारित नहीं है। हम परतंत्र थे, तब भी राष्ट्र था। अंग्रेजी का ‘नेशन’ शब्द ‘स्टेट’ से जुड़ा है, जबकि भारतीय राष्ट्र की अवधारणा सत्ता से जुड़ी नहीं है।

स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद देश में उपजी विचारधाराओं का विकास पर कहा कि 1857 में स्वतंत्रता का पहला प्रयास असफल रहा, लेकिन उससे नई चेतना जागी। उसके बाद आंदोलन खड़ा हुआ कि आखिर कुछ मुट्ठीभर लोग हमें कैसे हरा सके। एक विचार यह भी उभरा कि भारतीयों में राजनीतिक समझ की कमी है। इसी आवश्यकता से कांग्रेस का उदय हुआ, लेकिन स्वतंत्रता के बाद वह वैचारिक प्रबोधन का कार्य सही प्रकार से नहीं कर सकी। यह दोषारोपण नहीं, बल्कि तथ्य है। आजादी के बाद एक धारा ने सामाजिक कुरीतियों को मिटाने पर जोर दिया, वहीं दूसरी धारा ने अपने मूल की ओर लौटने की बात रखी। स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद ने इस विचार को आगे बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और अन्य महापुरुषों का मानना था कि समाज के दुर्गुणों को दूर किए बिना सब प्रयास अधूरे रहेंगे। बार-बार गुलामी का शिकार होना इस बात का संकेत है कि समाज में गहरे दोष हैं। हेडगेवार जी ने ठाना कि जब दूसरों के पास समय नहीं है, तो वे स्वयं इस दिशा में काम करेंगे। 1925 में संघ की स्थापना कर उन्होंने संपूर्ण हिन्दू समाज के संगठन का उद्देश्य सामने रखा।

हिन्दू नाम का मर्म समझाते हुए सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव है। यह नाम दूसरों ने दिया, पर हम अपने को हमेशा मानव शास्त्रीय दृष्टि से देखते आये हैं। हम मानते हैं कि मनुष्य, मानवता और सृष्टि आपस में जुड़े हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। हिन्दू का अर्थ है समावेश और समावेश की कोई सीमा नहीं होती। सरसंघचालक जी ने कहा कि हिन्दू यानी क्या – जो इसमें विश्वास करता है, अपने अपने रास्ते पर चलो, दूसरों को बदलो मत। दूसरे की श्रद्धा का भी सम्मान करो, अपमान मत करो, ये परंपरा जिनकी है, संस्कृति जिनकी है, वो हिन्दू हैं। हमें संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है। हिन्दू कहने से यह अर्थ नहीं है कि हिन्दू वर्सेस ऑल, ऐसा बिल्कुल नहीं है। ‘हिन्दू’ का अर्थ है समावेशी।

उन्होंने कहा कि भारत का स्वभाव समन्वय का है, संघर्ष का नहीं है। भारत की एकता का रहस्य उसके भूगोल, संसाधनों और आत्मचिंतन की परंपरा में है। हमने बाहर देखने के बजाय भीतर झाँककर सत्य को तलाशा। इसी दृष्टि ने हमें सिखाया कि सबमें एक ही तत्व है, भले ही वह अलग-अलग रूपों में दिखता हो। यही कारण है कि भारत माता और पूर्वज हमारे लिए पूजनीय हैं।

मोहन भागवत जी ने कहा कि भारत माता और अपने पूर्वजों को मानने वाला ही सच्चा हिन्दू है। कुछ लोग खुद को हिन्दू मानते हैं, कुछ भारतीय या सनातनी कहते हैं। शब्द बदल सकते हैं, लेकिन इनके पीछे भक्ति और श्रद्धा की भावना निहित है। भारत की परंपरा और डीएनए सभी को जोड़ता है। विविधता में एकता ही भारत की पहचान है। उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे वे लोग भी स्वयं को हिन्दू कहने लगे हैं, जो पहले इससे दूरी रखते थे। क्योंकि जब जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है तो लोग मूल की ओर लौटते हैं। हम लोग ऐसा नहीं कहते कि आप हिन्दू ही कहो। आप हिन्दू हो, ये हम बताते हैं। इन शब्दों के पीछे शब्दार्थ नहीं है, कंटेंट है, उस कंटेंट में भारत माता की भक्ति है, पूर्वजों की परंपरा है। 40 हजार वर्ष पूर्व से भारत के लोगों का डीएनए एक है। उन्होंने कहा कि जो अपने आपको हिन्दू कह रहे हैं, उनका जीवन अच्छा बनाओ। जो नहीं कहते वो भी कहने लगेंगे। जो किसी कारण भूल गये, उनको भी याद आयेगा। लेकिन करना क्या है, संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन। जब हम हिन्दू राष्ट्र कहते हैं तो किसी को छोड़ रहे हैं, ऐसा नहीं है। संघ किसी विरोध में और प्रतिक्रिया के लिए नहीं निकला है। हिन्दू राष्ट्र का सत्ता से कोई लेना देना नहीं है।

उन्होंने संघ कार्य पद्धति के बारे में कहा कि समाज उत्थान के लिए संघ दो मार्ग अपनाता है – पहला, मनुष्यों का विकास करना और दूसरा उन्हीं से आगे समाज कार्य कराना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठन है। संगठन का कार्य मनुष्य निर्माण का कार्य करना है। संघ के स्वयंसेवक विविध क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन संगठन उन्हें नियंत्रित नहीं करता। उन्होंने कहा कि संघ को लेकर विरोध भी हुआ और उपेक्षा भी रही। लेकिन संघ ने समाज को अपना ही माना।

व्यक्तिगत समर्पण से चलता है संघ

संघ की विशेषता है कि यह बाहरी स्रोतों पर निर्भर नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत समर्पण पर चलता है। ‘गुरु दक्षिणा’ संघ की कार्यपद्धति का अभिन्न हिस्सा है, जिसके माध्यम से प्रत्येक स्वयंसेवक संगठन के प्रति अपनी आस्था और प्रतिबद्धता प्रकट करता है। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। हमारा प्रयास होता है कि विचार, संस्कार और आचार ठीक रहे। इतनी हमें स्वयंसवेक की चिंता करनी है, संगठन की चिंता वो करते हैं। हम सबको मिलकर भारत में गुट नहीं बनाना है। सबको संगठित करना है।

इस दौरान संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल और दिल्ली प्रांत के संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल मंच पर उपस्थित रहे।

इस तीन दिवसीय आयोजन के प्रथम दिन सेवानिवृत न्यायाधीश, पूर्व राजनयिक, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, विभिन्न देशों के राजनयिक, मीडिया संस्थानों के प्रमुख, पूर्व सेनाधिकारी और खेल व कला क्षेत्र से जुड़ी हस्तियां उपस्थित रहीं।

सीआईएसएफ ने शुरू की पहली ऑल-वुमन कमांडो टीम की ट्रेनिंग, बढ़ेगी महिलाओं की भागीदारी

4840079-ani-20250824115726_cropped.jpg.webp

दिल्ली। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में महिलाओं की भूमिका को मजबूत करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। पहली बार, सीआईएसएफ ने एक ऑल-वुमन कमांडो टीम गठित की है, जिसकी ट्रेनिंग मध्य प्रदेश के बरवाहा स्थित क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र में शुरू हो चुकी है। इस आठ सप्ताह के गहन कमांडो प्रशिक्षण में 100 महिला कर्मियों को शामिल किया गया है, जो वर्तमान में देशभर के हवाई अड्डों पर विमानन सुरक्षा समूह (एएसजी) का हिस्सा हैं।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम शारीरिक फिटनेस, हथियार प्रशिक्षण, तनावपूर्ण परिस्थितियों में लाइव-फायर ड्रिल, रैपलिंग, जंगल में जीवित रहने के कौशल और 48 घंटे की आत्मविश्वास-निर्माण गतिविधियों पर केंद्रित है। पहला बैच, जिसमें 30 महिलाएं शामिल हैं, 11 अगस्त से 4 अक्टूबर तक प्रशिक्षण ले रहा है, जबकि दूसरा बैच 6 अक्टूबर से शुरू होगा। ये कमांडो क्विक रिएक्शन टीम (क्यूआरटी) और विशेष कार्य बल (एसटीएफ) में तैनात होंगी, जो हवाई अड्डों और अन्य संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।

सीआईएसएफ में वर्तमान में 12,491 महिला कर्मी हैं, जो कुल बल का 8% हैं। गृह मंत्रालय के 10% प्रतिनिधित्व लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 2026 में 2,400 और महिलाओं की भर्ती की जाएगी। यह पहल न केवल लैंगिक समानता को बढ़ावा देती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करती है।

scroll to top