क्षत विक्षत बंगाल पर सनातन के लेप से निखरेगी बंगाल की आत्मा

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सुरेन्द्र चतुर्वेदी, जयपुर

जयपुर । बंगाल ने भाजपा को अपना लिया। अपनाया ही नहीं बल्कि अपने सिर माथे बिठाया है। आजादी के समय विभाजन और उसके बाद बांग्लादेश की प्रसव वेदना को बंगाल ने झेला। *भाजपा को जो बंगाल मिला है वो ना केवल घायल है अपितु आत्मा तक क्षत विक्षत है । भाजपा को सबसे पहले बंगाल की आत्मा पर मरहम लगाना होगा, यह सनातन के लेप से ही होगा!*

*असंख्य साधकों की तपोस्थली बंगाल की सुषुप्त आत्मा को जागृत करना आसान नहीं होगा। सैकड़ों सालों तक बंगाल को तिल तिल कर मारा गया है। 1204 में लक्ष्मण सेन की पराजय के बाद बख्तियार खिलजी के मुगल शासन फिर अंग्रेजी हुकूमत और आजादी के बाद कांग्रेस, वामपंथ और ममता के कुशासन से मुक्त होना ही बंगाल की असली विजय है।* भाजपा को अब उसी धागे को पकड़ कर आगे बढ़ना है। राजनीतिक रूप से भाजपा को वंदेमातरम् गीत में कहे गए सुखदाम वरदाम और दश प्रहर धारिणी बनाने की कठिन अग्नि परीक्षा से निकलना होगा।

दरअसल, बंगाल का चुनाव केवल एक विधानसभा का ही चुनाव नहीं था कि जिसमें राजनीतिक सत्ता किसको मिलेगी ? *यह चुनाव इसलिए और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था कि इस देश में मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ और देश विरोधी मानसिकता को संरक्षण देने वाले राजनीतिक दलों को भारत का जनमानस नकारता है या नहीं ?*

दुर्भाग्य से आजादी के बाद से ही ऐसी राजनीति स्थापित की गई जो सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण पर केंद्रित थी। मुस्लिमों को तुष्ट करने के लिए बहुसंख्यक हिंदू समाज को निर्लज्ज भाव से अपमानित करना, हिन्दू आख्यानों को उपेक्षित करना और हिंदू समाज को जातियों , भाषाओं और क्षेत्र के आधार पर बांट कर और बहका कर सत्ता में बने रहना ही उनका लक्ष्य होता था। लेकिन देर से ही सही बंगाल ने उस राजनीति को तिरस्कृत कर दिया और मुसलमानों के हाथ में सत्ता की चाभी है, इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया। बंगाल के बाद अगले साल उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं, हालांकि यहाँ पर भी मुस्लिम भाजपा के विरोध में ही हैं लेकिन *बंगाल में भाजपा की जीत ने यह सिद्ध कर दिया है कि मुस्लिमों को भारत में विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होगा। वह भी इस देश के वैसे ही नागरिक हैं जैसे कि हिंदू समाज के लोग।*

*बंगाल की जीत उन राजनीतिक दलों के लिए सबक है जो मुस्लिम समुदाय और उनके वोटों को अपना ग़ुलाम समझते हैं और उनकी रणनीति में मुस्लिम वोट प्राथमिकता पर होते हैं।* पहले बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और आने वाले चुनाव में उत्तर प्रदेश में यादव मुस्लिम वोट के भरोसे सत्ता प्राप्त करने की होड़ में समाजवादी पार्टी लगी है। भाजपा विरोधी दलों की यह रणनीति बिहार में ध्वस्त हुई, यही हाल उत्तर प्रदेश में होना है।

भाजपा के लिए अब आगे का रास्ता और ज़्यादा सावधानी बरतने का है। उसे धीरे धीरे ऐसे नेतृत्व को सामने लाना होगा जिनकी सोच में सनातनी स्पष्टता और कार्य शैली में तीव्र आक्रामकता हो। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यह विश्वास जगाया है तो असम में हेमंत विश्व सरमा, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ उसी मार्ग पर चल रहे हैं। बंगाल में भी हिंदुओं को आक्रामक नेता चाहिए। जो सच को डंके की चोट पर कहने का साहस रखता हो। जो भरोसे की गारंटी हो।

*बंगाल चुनाव की बात अमित शाह और सुनील बंसल के बिना अधूरी है। इस जोड़ी ने उत्तर प्रदेश के बाद बंगाल को देश द्रोहियों से मुक्त कर दिया। अमित शाह के साथ ने सुनील बंसल को एक ऐसा संगठनकर्ता के रूप में देश के सामने ला खड़ा किया है, जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य रखते हुए एक एक कड़ी को जोड़कर विजय माला तैयार कर देता है।* राजनीतिक विश्लेषक बंसल में काफ़ी संभावनाएं देख रहे हैं। ये आने वाले कल की भाजपा का चेहरा है, जिन पर भारत को सुखदाम वरदाम बनाने की ज़िम्मेदारी है!!

(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर से संबद्ध हैं)

नए नियमों से क्या देवभूमि में खत्म हो जाएंगे मदरसे? अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण वाला पहला राज्य उत्तराखंड

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देहरादून । उत्तराखंड में चल रहे मदरसों का भविष्य अधर में लटक गया है। राज्य की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने मदरसा बोर्ड खत्म कर उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन कर दिया है। साथ ही नए शैक्षिक सत्र से मदरसों के लिए इस प्राधिकरण और उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेने की अनिवार्य शर्त भी लागू कर दी गई है।

सभी अल्पसंख्यक समुदायों को लाभ
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को देश में पहली बार उत्तराखंड में लागू किया गया है। इसमें दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों को भी शामिल करते हुए सरकारी मदद के रास्ते खोल दिए गए है। अभी तक यह सुविधा मुस्लिम समुदाय के संस्थानों को ही मिलती थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि अल्पसंख्यक समाज के बच्चे अब राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के तहत शिक्षा लेंगे। उनके अनुसार ऐसा करना अल्पसंख्यक समुदायों के उत्थान के लिए बहुत जरूरी है। अल्पसंख्यक विभाग के सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते बताते हैं शिक्षा का अधिकार सबके के लिए समान होना चाहिए। सरकार की कोशिश है कि हर बच्चे को एक जैसी शिक्षा मिले।

मदरसा संचालक कहां से लाएंगे दस्तावेज?
सरकार के इस फैसले के बाद राज्य में जैसे-तैसे चल रही मदरसा शिक्षा व्यवस्था के खत्म होने के आसार बन गए हैं, क्योंकि जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड का कोई भी मदरसा शायद ही सरकारी शर्तों का पालन कर पाए। राज्य के ज्यादातर मदरसों के पास नियम के मुताबिक पर्याप्त भूमि नहीं है। साथ ही जितनी जमीन है, उसके भी दस्तावेज नहीं के बराबर हैं। उनके पास बीएड शिक्षक नहीं है। भवनों में तय शर्तों के मुताबिक कमरे नहीं है। न ही खेल के मैदान हैं। लेकिन अब मदरसा संचालकों को बैंक के खातों का ब्योरा, देशी-विदेशी चंदे और दूसरे आर्थिक स्रोतों का भी ऑडिट करवाना होगा।

मदरसों की पहचान के लिए सर्वे
धामी कैबिनेट ने कक्षा आठ तक की शिक्षा के लिए जिला विद्यालय समिति को मान्यता का अधिकार दिया है। किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए ऐसा पहले भी था और इंटर तक की मान्यता के लिए राज्य शिक्षा बोर्ड से मंजूरी जरूरी होगी। दूसरे शिक्षण संस्थानों की तरह अब मदरसे चलाने के लिए इन दोनों संस्थाओं से मंजूरी जरूरी तौर पर लेनी होगी। जानकारी यह भी है कि पुष्कर सिंह धामी की सरकार के सर्वे में राज्य में 950 मदरसों की पहचान की गई थी। इनमें से लगभग 300 मदरसे बिना सरकार की अनुमति के चलते पाए गए। ऐसे मदरसों पर सरकार ने पहले ही ताला जड़ दिया था। गौर करने लायक बात यह भी है कि उत्तराखंड के मदरसों में बिहार, असम, यूपी, झारखंड आदि राज्यों से मुस्लिम बच्चे पढ़ाए जा रहे थे। सर्वे के दौरान इनकी पहचान छुपाए जाने, फर्जी आधार कार्ड के अलावा दूसरी गड़बड़ियां भी सामने आई थीं। बाल संरक्षण आयोग ने भी ऐसे मामलों में दखल दिया था।

30 जून को खत्म हो जाएगी मान्यता
अभी तक उत्तराखंड मदरसा बोर्ड में कुल 452 मदरसे रजिस्टर्ड हैं। इनकी मान्यता 30 जून, 2026 को खत्म हो जाएगी, क्योंकि मदरसा बोर्ड को ही खत्म कर दिया गया है। राज्य में 192 मदरसे ऐसे थे जिन्हें केंद्र और राज्य सरकार से आर्थिक मदद मिल रही थी। इसके अलावा 117 मदरसे वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है। पंजीकृत मदरसों में 46 हजार बच्चे पढ़ रहे थे। इन सभी मदरसों को अब एक जुलाई से अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से संबद्धता और उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी।

रजिस्ट्रेशन के लिए कड़े नियम
जिला विद्यालय समिति से मान्यता के मुख्य नियमों के तहत शहरी क्षेत्रों में कम से कम 2000 वर्ग मीटर के आकार का खेल का मैदान होना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में खेल का मैदान 4000 वर्ग मीटर होना चाहिए। पहाड़ी इलाकों में नियमों में थोड़ी छूट दी गई है। स्कूल के नाम पर जमीन की रजिस्ट्री या फिर 30 साल की लीज होनी चाहिए। कक्षा एक से पांच तक के लिए कम से कम पांच कमरे और कक्षा छह से आठ के लिए के लिए आठ कमरे होने चाहिए।

हर कमरा कम से कम 20 गुणा 20 फीट यानी 400 वर्ग फीट के आकार का होना चाहिए। इसके साथ ही स्टाफ रूम, लाइब्रेरी, टॉयलेट, हैंडपंप, पानी की टंकी, किचन शेड भी होना चाहिए। सुरक्षा के लिए हर तरह का बिल्डिंग सेफ्टी सर्टिफिकेट भी जमा करना होगा। शिक्षकों की अर्हता के साथ ही अलग-अलग स्तर के स्कूलों में बच्चों की संख्या और फीस और पाठ्यक्रमों के मामले में कड़े नियम बनाए गए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि कितने मदरसे इन शर्तों को पूरा कर पाएंगे? शायद एक भी नहीं।।

असम में मदरसा शिक्षा
कई राज्यों ने मदरसा शिक्षा में सुधार की कोशिशें की हैं। कई राज्य इस दिशा में कदम उठाने जा रहे हैं। असम में दिसंबर, 2020 में ‘असम निरसन विधेयक 2020’ पारित किया गया था। इसके तहत राज्य के सभी सरकारी मदरसों को बंद करने का कानून बनाया गया। इसके तहत एक अप्रैल, 2021 से लगभग 1,281 सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों (मध्य अंग्रेजी स्कूलों) में बदल दिया गया। वे अब असम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के तहत काम कर रहे हैं। यह कानून सरकारी और सरकार से मदद लेने वाले मदरसों पर ही लागू है, निजी मदरसों पर नहीं।

उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा
उत्तर प्रदेश के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने 22 मार्च, 2024 को उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। कोर्ट ने राज्य सरकार से मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को औपचारिक स्कूली शिक्षा प्रणाली में शामिल करने का आदेश दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पांच नवंबर, 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला पलटते हुए एक्ट को संवैधानिक करार दे दिया। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि मदरसा बोर्ड ‘फाजिल’ और ‘कामिल’ (स्नातक और स्नातकोत्तर) की डिग्री नहीं दे सकता, क्योंकि यह यूजीसी एक्ट, 1956 के खिलाफ है।

5 मई 1911 सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी प्रीतिलता का जन्म : 19 वर्ष की आयु में बलिदान

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भोपाल । सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई 1911 को चटगाँव में हुआ था । अब यह क्षेत्र पाकिस्तान में है । उनके पिता नगरपालिका के क्लर्क थे । वे चटगाँव के कन्या विद्यालय की मेघावी छात्रा थीं। 1928 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की। वे इण्टरमिडिएट परीक्षा में पूरे ढाका बोर्ड में पाँचवें स्थान पर रहीं। पिता तो शासकीय सेवा में थे पर प्रीतिलता के मन में बचपन से स्वत्व का वोध बहुत तीव्र था और वे तरुण आयु में ही स्वराज आंदोलन से जुड़ गयीं। इसके चलते कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उनकी डिग्री रोक दी थी। डिग्री उनके बलिदान के 80 वर्ष बाद जारी की गई। मरणोपरांत 80 वर्ष बाद डिग्री जारी होने की घटना अपने आप में सबसे अलग है।

शालेय जीवन में वे एक संस्था “बालचर” से जुड़ी। यह संस्था अंग्रेजों के प्रति वफादारी की अभियान चला रही थी। उनके मन में इसकी गहरी प्रतिक्रिया होती थी। उन्होंने बचपन में अपनी माँ से रानी लक्ष्मी बाई के जीवनचरित को सुना था। वे रानी लक्ष्मीबाई से बहुत प्रभावित थी। इस कारण उनके मन में भारत को अंग्रेजों से दूरियाँ बढ़ीं और भारत को मुक्त कराने के विचार उठने लगे। उन्होंने यह संस्था छोड़ी और क्रांतिकारी आँदोलन के समीप आईं। इसी बीच उनकी भेट प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन से हुई। प्रीतिलता उनके दल की सदस्य बन गईं। प्रीतिलता जब सूर्यसेन से मिली तब वे अज्ञातवास में थे। सूर्यसेन के संदेश यहाँ वहाँ पहुँचाने का काम क्राँतिकारी प्रीतिलता को मिला जो उन्होंने सफलता पूर्वक किया। इससे प्रभावित होकर उनके दल ने उन्हें इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बना दिया। वे एक दिन अपने दल के साथ जा रहीं थीं कि घलघाट क्षेत्र में पुलिस ने घेर लिया । क्रान्तिकारियो के इस समूह में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे। जमकर मुकाबला हुआ इसमें अपूर्वसेन और निर्मल सेन का बलिदान हो गया और सूर्यसेन और प्रीतिलता घेरा तोड़ कर निकलने में सफल हो गये । क्रांतिकारी सूर्यसेन पर उस समय 10 हजार रूपये का इनाम घोषित था । क्रांति कारी सूर्यसेन ने अंग्रेजों पर हमला करने की योजना बनाई । योजनानुसार पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलने की थी। यह पहाड़ी अंग्रेजो की ऐय्याशी का एक बड़ा अड्डा था । प्रीतिलता के नेतृत्त्व में क्रांतिकारी वह पहुचे । यह 24 सितम्बर 1932 की रात थी। हथियारों के साथ प्रीतिलता ने पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था । वे चाहतीं थीं कि जीवित रहते अंग्रेजों की गिरफ्त में न आयें । प्रीतिलता अपने दल के साथ क्लब पहुचीं।
बाहर से खिड़की में बम लगाया गया । बम ब्लास्ट से क्लब में एकाएक चीखे सुनाई देने लगी। 13 अंग्रेज जख्मी हो गये और बाकी भाग गये। घटना में एक यूरोपीय महिला मारी गयी। थोड़ी देर बाद उस क्लब से गोलीबारी होने लगी। प्रीतिलता को एक गोली लगी। वे घायल हो गयीं । जब भागने में सफल न हो सकीं तो पोटेशियम सायनाइड खा लिया। उस समय उनकी उम्र 21 साल थी । इस प्रकार अंग्रेजों से लड़ते हुए प्रीतिलता ने अपना बलिदान दे दिया ।
शत शत नमन

पश्चिम बंगाल में अब ‘बदला’ नहीं ‘बदलाव’ की राजनीति

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— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

कोलकाता । पश्चिम बंगाल में स्वाधीनता के पश्चात पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और ऐतिहासिक बहुत मिला है। भाजपा ने बंगाल में दो शतक का आंकड़ा पार कर कर एक नई लकीर खींच दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा को जहां साल 2016 में 3 और 2021 में 77 सीटें मिलीं। वहां 4 मई 2026 को घोषित हुए चुनाव परिणाम में भाजपा ने 206 सीटों के साथ नया अध्याय लिख दिया है। अंततः भाजपा के लिए कभी असंभव माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में भगवा लहरा गया है। भाजपा ने ममता बनर्जी के अभेद्य किले को भेदकर वहां अपना विजय का परचम लहरा दिया है। बीजेपी की ये जीत कई मायनों में विशेष है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिसने भी वहां के जनमानस को देखा, वहां के लोगों के मनोभावों, मुखरता और मौन को देखा। उन्हें ये परिणाम अप्रत्याशित नहीं लगे। क्योंकि 2026 के चुनाव में बंगभूमि में परिवर्तन की लहर सुस्पष्ट दिखाई दे रही थी। हालांकि जिनकी आंखों में वामपंथी, कांग्रेसी और समाजवादी चश्मा लगा था। वो बारंबार ये कह रहे थे कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार नहीं बनेगी।

लेकिन वो भूल गए कि ये वही बंगाल है जहां पूज्य रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द हुए। संन्यासी क्रांति हुई। महर्षि अरविन्द हुए। बंकिम बाबू ने वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना का जयघोष किया। गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रगान लिखा। स्वदेशी और स्व का गौरवबोध जगाया।वो बंगाल जहां संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति से जुड़े और यहीं उनका नाम ‘कोकेन’ पड़ा। बंगाल जहां
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रांतिवीर हुए। यही वो भूमि है जहां जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बलिदानी हुए। वो श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए स्वाधीन भारत की नेहरू कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया। “एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेंगे” — इस उद्घोष के साथ जम्मू-कश्मीर की मुक्ति का पथ प्रशस्त किया। सत्ता का मोह नहीं किया बल्कि भारतभूमि की अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भाजपा ने 2026 में बंगभूमि में नव परिवर्तन का इतिहास रच दिया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के गहरे अर्थ हैं। ये कोई सामान्य चुनावी जीत नहीं है।

ये जीत केवल ममता बनर्जी की दमनकारी सत्ता की हार नहीं है।बल्कि ये जीत संगठित राजनीतिक अपराध, तुष्टिकरण, माफिया और कट मनी के पूरे सिंडिकेट और माड्यूल पर जनता का प्रहार है। ये विजय — ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी’ की जीत है। बंगाल में भाजपा की ये विजय उन असंख्य बलिदानों की विजय है ,जिन्होंने अपना जीवन बंगभूमि के ‘स्व’ के लिए अर्पित कर दिया।ये जीत हिंदुत्व की है।ये जीत राष्ट्रीयता की जीत है। भाजपा की जीत हिंदू समाज की संगठित शक्ति की जीत है। ये विजय वंदेमातरम् की जागृत चेतना का शंखनाद है। ये जीत इस बात का प्रमाण है कि अन्याय, अत्याचार, हिंसा , रक्तपात, आतंक का अंत सुनिश्चित है। भाजपा की ये जीत श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे उन सैकड़ों बलिदानियों की जीत है जिन्होंने राष्ट्रीयता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। कई पीढ़ियां जिस संकल्प में खप गईं। वो अब साकार हो चुका है। क्योंकि वहां का समाज संगठित हुआ। बच्चा-बच्चा
राष्ट्रीय अस्मिता का ध्वजवाहक बना। उसका परिणाम भाजपा की प्रचंड जीत हुई‌।

लेकिन ये जीत केवल पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की ही कहानी बयां नहीं कर रही है बल्कि नए समीकरणों की ओर संकेत कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीत के बाद 4 मई 2026 को बीजेपी मुख्यालय नई दिल्ली में अपने संबोधन के दौरान जनादेश के लिए न सिर्फ़ आभार जताया। बल्कि उन्होंने सुस्पष्ट कहा कि— “ ये जीत भारत के लोकतंत्र और संविधान की जीत है। चुनाव में हार-जीत अलग बात है। लेकिन बदला नहीं बल्कि बदलाव की बात होनी चाहिए।भय नहीं भविष्य की बात होनी चाहिए।”

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से आह्वान किया कि— “हिंसा के अंतहीन चक्र को हमेशा के लिए ख़त्म करें।बंगाल की सेवा के लिए काम करें।विवाद नहीं विकास, विभाजन नहीं विश्वास चाहिए।”
वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंगाल के विकास, सुशासन, विकसित भारत के संकल्प को दुहराया। साथ ही ये चेतावनी भी दी कि दोषियों को सज़ा ज़रूर मिलेगी। स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए सत्ता नहीं बल्कि उसकी नीति महत्वपूर्ण है।इसके संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दे दिए हैं। यानी पश्चिम बंगाल में वर्षों के कम्युनिस्ट आतंक, ममता बनर्जी की क्रूरता से त्रस्त जनता अब परिवर्तन की नई दिशा की ओर बढ़ चली है।

वैसे बंगाल के आकाश से अंधेरा छटा और कमल खिला लेकिन भाजपा की ये जीत इतनी आसान नहीं थी। भाजपा ने साल 2021 के विधानसभा चुनाव की हार से कई सबक लिए। माइक्रो लेवल से लेकर BROAD PERSPECTIVE में प्लानिंग की।बूथ से लेकर वोटर्स तक डायरेक्ट कनेक्ट किया। स्थानीय मुद्दों और नैरेटिव पर अपनी पकड़ मजबूत की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और मोदी की गारंटी को बीजेपी ने ब्रांड इमेज बनाया। सुशासन की नीति और स्पष्टता ने बीजेपी की चुनावी ज़मीन को बेहद मजबूत कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समवैचारिक संगठनों की वर्षों से राष्ट्रीय अस्मिता को लेकर की जा रही अपील ने लोगों को संगठित किया। इसका ये परिणाम हुआ कि पश्चिम बंगाल का जनमानस जो ममता बनर्जी के क्षेत्रवाद के विभाजनकारी प्रोपेगैंडा का शिकार हो जाता था। बंगाल के उस समाज ने समझा कि उनके आदर्श राष्ट्रीय संस्कृति में निहित हैं‌।उस संस्कृति में निहित हैं जिसके आभूषण बंगाल की भाषा-बोली, पहनावे, खान-पान और परंपराएं हैं।
जहां कोई विभाजन नहीं है बल्कि सहकार है। समरसता और समन्वय के साथ जीवन का सौंदर्यबोध है।

वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में वर्षों से चली आ रही राजनीतिक हिंसा, सत्ता के संरक्षण में जारी रहे रक्तपात, गुंडागर्दी, दुराचार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। ऐसे में भाजपा में जनता को अपना हित दिखा।भाजपा की जीत के कुछ महत्वपूर्ण फैक्टर्स की बात करें तो – बीजेपी ने खुद को हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता का स्टेक होल्डर और रक्षक बताया। इसके चलते पश्चिम बंगाल में ‘हिन्दू पहचान’ प्रमुख पहचान बनकर उभरी‌। बंगाल के समाज ने इस बात को प्रमुखता दी कि— “हमारी अलग-अलग जितनी भी पहचाने हैं। उन सबमें सबसे बड़ी पहचान हिन्दू होने की पहचान है। इसी पर आक्रमण हो रहा है।” ऐसे में हिन्दू और हिन्दुत्व के बोध ने बंगाल की अन्तश्चेतना में नया सांस्कृतिक जागरण किया। इसके चलते लोग मुखर हुए।

वहीं पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, सुवेंदु अधिकारी की आक्रामक शैली को लोगों ने दिल में जगह दी। अमित शाह के —’ 5 मई को टीएमसी के गुंडों को उल्टा लटकाकर- सीधा कर दूंगा’— इस बयान को जनता ने हाथों हाथ लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पीपुल कनेक्ट के हर सांकेतिक प्रतीक को लोगों ने अपने से जोड़ा। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का झालमुड़ी खाने वाला प्रकरण हो। याकि जनसभा के दौरान ख़ुद मोबाइल निकालकर —उसकी वीडियोग्राफी करनी हो। याकि टीएमसी और ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ आक्रामक बयान देना हो। ‘4 मई दीदी गई’ के नारे हों। इन सबने जनता को भाजपा के पक्ष में किया।

पश्चिम बंगाल के कोने-कोने से ऐसे ऐसे दृश्य देखने को मिले जो किसी को भी भावुक कर दें। कहीं चिलचिलाती धूप में माता-पिता के साथ छोटे-छोटे बच्चे नज़र आए। वहीं बुजुर्ग महिलाएं प्रधानमंत्री के फोटो/ पोस्टर बैनर
की आरती उतारती और टीका लगाती नज़र आईं। बुजुर्ग महिलाएं — प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो दीवारों में चिपकाती दिखीं। लोग प्रधानमंत्री मोदी को किसी बड़े उद्धारक के तौर पर देख रहे थे। यहीं से पूरी बिसात बीजेपी के पाले में चली गई। अब पश्चिम बंगाल में भाजपा नहीं बल्कि जनता— भाजपा की ओर से चुनावी मैदान में उतरने लगी। ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ लोगों का आक्रोश फूटा।
महिला सुरक्षा के मुद्दे, आर जी कर मेडिकल कॉलेज, संदेशखाली जैसे मुद्दों को बीजेपी ने चुनाव के केंद्र में ला दिया‌। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह से लेकर हर बीजेपी नेता ने महिला सुरक्षा, हिन्दू हित और डेमोग्राफी बदलाव के मुद्दे को जनता तक ले गए।SIR, केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती ने फर्जी वोटिंग पर लगाम लगाई। भयमुक्त मतदान के चलते भाजपा को सीधा फायदा मिला। वहीं महिलाओं और युवाओं को हर महीने 3 हजार रु देने के वादों ने भी भाजपा को बढ़त दिलाई।

मुस्लिम तुष्टिकरण के आकंठ तक डूबी ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं के साथ कुठाराघात किया‌ । हिन्दू त्योहारों पर प्रतिबंध, मुस्लिमों को खैरात पर खैरात। हिन्दुओं के ख़िलाफ़ होने वाली सुनियोजित हिंसा पर ममता बनर्जी के मौन ने— वहां के समाज को उद्वेलित किया। पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों, रोहिंग्याओं की घुसपैठ को ममता बनर्जी के मौन समर्थन ने ख़ूब तूल दिया। इससे बंगाल के लोगों के मन में भय का वातावरण बना। चहुंओर हिंसा, रक्तपात, गुंडागर्दी, गौ हत्या, गौ-तस्करी, माफियाओं के बढ़ते हौसलों ने ममता के शासन के अंत की पटकथा लिख दी। बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से वहां हिन्दुओं के ख़िलाफ़ हुई सुनियोजित हिंसा और हर समय ममता बनर्जी का मौन रहना। मुस्लिमों की वकील बनकर सामने आना। ये सब पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा। वो उससे सीधे प्रभावित हुए। फिर अपना धैर्य बनाए रखा और मतदान के दिन बदला ले लिया।

बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों की डेमोग्राफी में हुए अप्रत्याशित परिवर्तन ने लोगों को झकझोर कर रख दिया।मुर्शिदाबाद हिंसा के साथ ही मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं के साथ हुई हिंसा में भी ममता का चुप रहना। कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं की बढ़ती अराजकता ने ममता के प्रति लोगों की सहानुभूति ख़त्म कर दी‌। वहीं
चुनाव के पूर्व मालदा में सुप्रीम कोर्ट की ओर से SIR के काम में लगे न्यायिक अधिकारियों को 9 घंटे तक बंधक बनाने की घटना ने पूरे देश का अपनी ओर ध्यान खींचा। देर रात को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सेना ने जब रेस्क्यू किया तब जाकर न्यायिक अधिकारियों की जान बची। इन सारे घटनाक्रमों को पश्चिम बंगाल समेत देश की जनता देख रही थी ‌

साथ ही जब ममता बनर्जी ने लोगों को खान-पान के नाम पर डराना शुरू किया। ये कहना शुरू किया कि — ‘अगर बीजेपी आ गई तो मछली नहीं खाने देगी’ और मां-माटी-मानुष के नैरेटिव को चलाया। भाजपा ने इन सभी नैरेटिव को बड़ी ही चतुराई से ममता के ख़िलाफ़ चुनावी हथियार में बदल दिया। आचार संहिता लगने के कई महीनों से देशभर से भाजपा के दिग्गज नेता, कार्यकर्ता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक ज़मीन पर काम करते दिखे। बूथ-बूथ पर तैनाती और लोगों से सीधे जुड़े। वहीं सुवेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल बीजेपी के मुख्य चेहरे के तौर पर रखा। सुवेंदु अधिकारी की आक्रामकता और अथक परिश्रम ने ममता बनर्जी के ‘बांग्ला’ – बंगाली अस्मिता के सियासी टूल को विफल कर दिया।सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के हर स्थानीय नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया। ममता के आख़िरी सहारा— टीएमसी के गुंडों को केंद्रीय सुरक्षा बलों ने नियंत्रित किया। फलस्वरूप लोग घर से बाहर निकले। भयमुक्त होकर व्यापक स्तर पर मतदान किया। हिंदुत्व, मोदी की गारंटी पर आंख मूंदकर भरोसा जताया । परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक 93% मतदान हुआ और बंगाल में कमल खिला। भाजपा की इस प्रचंड और ऐतिहासिक विजय ने एक बार फिर से मोदी मैजिक पर मुहर लगा दी है। यानी मोदी है तो मुमकिन है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ये परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि ये वहां के जनमानस के परिवर्तन का प्रतिबिम्ब है। जो ये बता रहा है कि जनता अब —अस्थिरता , अराजकता, हिंसा नहीं बल्कि स्थिरता, शांति, सुशासन, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोपरि बना रही है। राष्ट्रहित सर्वोपरि की यही भावना ‘वंदेमातरम्’ की शक्ति-चेतना को प्रकट कर रही है। बंगभूमि ने एक बार पुनः सिद्ध किया है की राष्ट्र की जय चेतना का गीत वंदेमातरम् है।

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