16 सितम्बर 1904 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी महावीर सिंह राठौर का जेल की प्रताड़ना से हुआ था बलिदान

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कासगंज (उप्र) : कोई कल्पना कर सकता है ऐसे मानसिक दृढ़ संकल्प की कि पुलिस की हजार प्रताड़नाओं के बाद भले प्राण चले जायें पर संकल्प टस से मस न हो । ऐसे ही संकल्पवान क्राँतिकारी थे महावीर सिंह राठौर । जिनसे क्राँतिकारियों का विवरण पूछने के लिये प्रताड़ित किया गया और तब उन्होंने क्राँतिकारियों को प्रताड़ित किये जाने के विरुद्ध अनशन किया फिर भी प्रताड़ना बंद न हुई और अंततः 29 वर्ष की आयु में सेलुलर जेल में उनका बलिदान हो गया ।

वे किशोर वय से स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी बने थे । 1021 में जब असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ तब वे सत्रह साल के भी पूरे नहीं हुये थे । उन्होंने अपनी आयु के किशोरों और बच्चों को एकत्र कर प्रभात फेरी निकाली। झंडा लेकर जुलूस निकाला अंग्रेजों के विरुद्ध नारे लगाये । पुलिस ने पकड़कर दस बेतों की सजा दी और छोड़ दिया था । पर बेंत प्रहार से उनका संकल्प और मजबूत हुआ। वे स्वाधीनता संग्राम की राह पर चल निकले ।

ऐसे दृढ़ निश्चयी संकल्पवान क्राँतिकारी महावीर सिंह राठौर का जन्म 16 सितम्बर 1904 को

को उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले की शाहपुर तहसील के अंतर्गत ग्राम तहला में हुआ था । पिता पिता देवी सिंह एक संपन्न और प्रभावशाली परिवार से थे । उनके पूर्वजों की जमींदारी भी रही थी । परिवार आर्य समाज से जुड़ा हुआ था । पढ़ाई के लाये आर्य समाज से संबंधित डीएवी कॉलेज भेज दिया था । और यहीं उनके विचारों में ओज एवं दृढ़ता आई । 1921 के असहयोग आँदोलन में सहभागी होने से वे काफी चर्चित हो गये थे इसलिए पढ़ाई के दौरान ही उनका संपर्क क्राँतिकारी गतिविधियों से उनका संपर्क सहज ही बन गया । वे नौजवान भारत सभा के सदस्य बन गये ।

इस संस्था के माध्यम से वे लाहौर के क्राँतिकारियों के भी संपर्क में आये । इनमें सरदार भगतसिंह और दुर्गा भाभी भी शामिल थीं।1922 की एक घटना है । तब वे मुश्किल से अठारह वर्ष के थे । असहयोग आँदोलन से निबटने के लिये अंग्रेज जगह जगह बैठकें कर रहे थे । कासगंज में अंग्रेज कलेक्टर ने अपने विश्वस्त लोगों की बैठक बुलाई। इसमें सभी कर्मचारी और अधिकारियों के परिवारों को राजभक्ति प्रदर्शित करने केलिये बुलाई गई थी । इस बैठक में महावीर सिंह और उनका परिवार भी था । योजना पूर्वक वक्ता अंग्रेजी शासन की प्रशंसा कर रहे थे । इसी बीच महावीर सिंह ने उठकर वंदेमातरम और महात्मा गाँधी की जय का नारा लगा दिया । कलेक्टर नाराज हुआ । बंदी बनाये गये । परिवार जनों की प्रार्थना के बाद मुक्त किये गये ।

1929 में दिल्ली की असेंबली बम काँड और सांडर्स वध काँड मामलों में सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी सिंह, राजगुरु सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त के साथ इन्हें भी सह आरोपी बनाया गया। मुकदमे की सुनवाई लाहौर में हुई। महावीर सिंह को आजीवन कारावास का दंड मिला । पहले उन्हें पंजाब की जेल में रखा। 1933 में अंडमान की सेल्यूलर जेल में भेजा गया । यह जेल बंदियों को यातना देने के लिये “काला पानी” के नाम से कुख्यात थी । इस जेल में राजनैतिक बंदियों के साथ हो रहे अत्याचार के विरुद्ध महावीर सिंह ने भूख हड़ताल की। जेलर ने भूख हड़ताल तुड़वाने के लिये उनकी प्रताड़ना आरंभ की । उनके मुंह में बल पूर्वक दूध डालने का भी प्रयास हुआ । पर महावीर सिंह अडिग रहे । वह 17 मई 1933 का दिन था । अनशन और प्रताड़ना के चलते । उनके प्राणों ने शरीर छोड़ दिया । उनका बलिदान हुआ तो उनका निर्जीव शरीर समुद्र में फेक दिया गया । इस प्रकार क्राँतिकारी महावीर सिंह के प्राणों का 28 वर्ष की आयु में बलिदान हुआ । इस घटना के विरोध में सेलुलर जेल के तीस अन्य राजनैतिक बंदियों ने भूख हड़ताल की । इसमें मोहित मोइत्रा और मोहन किशोर नामदास का भी बलिदान हुआ । उनके सम्मान में सेललुर जेल के सामने एक मूर्ति स्थापित की गई।

मणिपुर में विकास और शांति की एक नई भोर

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दिल्ली । मई 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद मैतेयी और कुकी समुदायों के मध्य भड़की हिंसा से अब तक 260 लोग मारे जा चुके हैं तथा 60 हजार से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। इस संघर्ष के आरम्भ से ही भारत के सभी विपक्षी दल निरंतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सरकार पर हमलावर थे, उनका एक ही प्रश्न था कि मोदी जी मणिपुर कब जाएंगे ? मणिपुर को लेकर संसद ठप रखी गई। मणिपुर में महिलाओं पर हिंसा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की खंडपीठ ने मणिपुर की स्थिति का जायजा लेने के लिए वहां का दौरा किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी व अन्य नेतागण अपनी अपनी राजनीति चमकाने के लिए मणिपुर के हालातों को हथियार बनाते रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कई अवसरों पर मणिपुर पर अपनी चिंता व्यक्त की। विरोधी दलों के भारी दबाव के कारण भाजपा को अपनी ही सरकार हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा।
अब प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मणिपुर दौरे से सभी को उचित उत्तर दे दिया है किंतु अब विरोधी दलों को इसमें रुचि नहीं रही क्योंकि उनका मणिपुर नैरेटिव फिलहाल समाप्त होता दिख रहा है। जिस समय भारत में मणिपुर हिंसा पर राजनीति चरम पर थी उस समय यूरोपीय संघ की संसद में मणिपुर को लेकर एक प्रस्ताव पारित हुआ था जिसे केंद्र सरकार ने भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप बताते हुए खारिज कर दिया था अतः मणिपुर को लेकर कांग्रेस ने जो देश विरोधी वैश्विक नैरेटिव चलाया था वह भी अब ध्वस्त हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुकी बहुल हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित चुराचांदपुर के लिए 7,300 करोड़ रुपए से अधिक और मैतेई बहुल इंफाल के लिए 1,200 करोड़ रुपए की परियोजनाओं की घोषणा करके यह संदेश देने का प्रयास किया कि सरकार ही नहीं अपितु संपूर्ण भारत उनके साथ है। प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर यात्रा के दौरान हिंसा पीड़ितों से भेंट करते हुए उन्हें सुरक्षा शांति तथा विकास का भरोसा दिया।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने मणिपुर को भारत की मणि बताते हुए कहा कि मणिपुर में उम्मीद और विश्वास की नई सुबह दस्तक दे रही है। किसी भी स्थान पर विकास के लिए शांति बहुत अनिवार्य है। आपसी संवाद और भरोसे से ही विवाद को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार मणिपुर के विभिन्न समुदायों के बीच आपसी संवाद, सम्मान और समझौते को महत्व देते हुए शांति की स्थापना के लिए निरंतर प्रयास रही है।

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे से पूर्व गृह मंत्रालय के लगातार प्रयासों के बाद दोनो समुदायों के बीच तनाव कम करने के काफी प्रयास किये है जिनका प्रभाव दिखाई पड़ने लगा है। लगातार चल रहे संवाद के कारण ही कुकी बहुल क्षेत्र से होकर निकलने वाला एनएच दो हाईवे अब पूरी तरह से खुल गया है और जनता व वस्तुओं की आवाजाही शुरू हो चुकी है। मणिपुर में अभी शांति के लिए कई अहम पड़ाव आने हैं । मैतेयी ओर कुकी समुदाय के बीच कुछ मतभेद अभी भी बरकरार हैं जिनको सुलझाने के प्रयास जारी हैं। इसमें कुकी समुदाय के लोग मणिपुर की छत के नीचे ही अपने लिए एक अलग व्यवस्था की मांग कर रहे हैं फिर भी अब मणिपुर की समस्या का उचित समाधान निकलने की आस जग गई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने विकास कार्यों के लोकार्पण के बाद एक रैली को संबोधित किया जिसमें लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी जो मोदी -मोदी के नारे लगा रही थी । ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जनसमुदाय मान चुका है कि प्रधानमंत्री मोदी के आने से मणिपुर में विकास और शांति लाने वाली एक नयी भोर हुई है।

तुमको खुद अपनी ख़बर नहीं, तुम ज़माने की बात करते हो

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जयदीप कर्णिक

इंदौर: प्रेस क्लब के चुनाव और राजनीति से दूर ही रहा हूं। लेकिन ये मज़बूती से मानता हूं कि प्रेस क्लब जैसी संस्थाओं की पत्रकारों के लिए महती आवश्यकता है। जो ज़माने की खबर रखते हैं उनकी खबर रखने वाला कोई तो हो!! इस तरह के संगठन पत्रकारों की बेहतरी के लिए और सामूहिक उपस्थिति के लिए आवश्यक हैं।
यों देश के अधिकांश प्रेस क्लब स्वार्थ, राजनीति और वर्चस्व की भेंट चढ़ गए। इसमें पैसे और रसूख के खेल ने बड़ी भूमिका निभाई। पर कुछ हैं जो मोटे तौर पर अपने मूल उद्देश्य पर कायम हैं।


आज इंदौर प्रेस क्लब के चुनाव थे। ये याद नहीं कि पिछली बार इस चुनाव के लिए कब वोट देने गया था। बीच में तो लंबे समय सदस्य ही नहीं था (वो कहानी फिर कभी)।

जिस तरह का प्रचार, जबर्दस्त फोन कॉल और आरोप – प्रत्यारोप चुनाव में देखने को मिले, ऐसा लगा कि पत्रकारों को ये परिपाटी बदलने की आवश्यकता है। आदर्श स्थिति तो ये है कि सहमति बन जाए। ना बने तो ऐसे चुनाव हों जो उनके लिए उदाहरण बनें जिनके बारे में हम दिन-रात लिखते रहते हैं।

वोट देने का अनुभव भी बहुत अच्छा नहीं था। मतपत्र पाकर उस पर मोहर लगाकर उसे मतपेटी तक पहुंचा देना किसी युद्ध को जीत लेने जैसा अनुभव था। कुल ९०० वोटर। उनमें से करीब ८०० वोट देने आए। दोपहर १२ से २ बजे के बीच सर्वाधिक भीड़ हो गई। इसे संभालने में व्यवस्था नाकाम रही। इसके लिए पहले सोचा जाना चाहिए था। ऐसी ही अव्यवस्था कहीं और होती तो वीडियो बनाकर, लाइव करके और ख़बरें लिखकर हम सब ही इन कमियों को उजागर कर रहे होते। इसीलिए खुद ही आत्म मंथन कर लें। इस सबसे सबक लेकर आगे बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है। खास तौर पर बुजुर्ग और महिला मतदाताओं को जिस तरह परेशान होना पड़ा, वो नहीं होना चाहिए था।

हाँ, वोट देने जाने का सबसे बड़ा हासिल ये रहा कि बहुत सारे पुराने साथियों, पत्रकारों, वरिष्ठजनों से मुलाकात हो गई। कई तो बहुत लंबे अरसे बाद मिले। सभी की गर्मजोशी और आत्मीयता ने सुकून दिया कि दूरी और मुलाकात ना होना रिश्तों की ऊष्मा को प्रभावित नहीं कर पाते।

उम्मीद है जो भी साथी जीतेंगे वो सब मिलकर उस प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा को बढ़ाने का काम करेंगे जिसकी देश – दुनिया में अलग पहचान है।

दो अक्टूबर को विजयादशमी के दिन है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सौवां साल

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प्रिय मित्रो,

आप सभी साथियों से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि अपने आसपास, घर के अन्य सदस्यों को जगाइए और उन्हें शाखा से जोड़िए। आगामी 2 अक्टूबर को विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सौवां साल मनाया जा रहा है। यह मौका बार-बार नहीं आएगा।

17 अगस्त को सड़क दुर्घटना में मेरे शरीर के दाहिने अंग की सारी पसलियां टूटी हुई हैं इन सबके बावजूद मैं सवेरे शाखा में ही नहीं, उपस्थित रहता हूं, बल्कि अन्य लोगों को भी आगे बढ़ने के लिए उन्हें प्रेरित करता हूं। हिंदुओं को जोड़ना मेंढकों को तराजू में तौलने की तरह है। एक को रखो, तब तक दूसरे भाग जाते हैं। समस्याएं हम सभी की जिंदगी में हैं। ये आती-जाती रहेंगी। इनके साथ हम सभी को जीना सीखना होगा। आप सभी के आशीर्वाद और दुआओं से हम इन परिस्थितियों से भी बाहर निकलेंगे और आपके साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे।

कल मैंने फोर्टिस अस्पताल के ऑर्थोपेडिक्स हेड डॉक्टर पुनूीत मिश्रा जी से कहा- सर, 2 तारीख को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 100 वां साल है, उस दिन मैं परेड में हिस्सा लेना चाहता हूं। आप मुझे जल्दी से ठीक कीजिए, तो वो मुझे देखकर हंस रहे थे।

उन्होंने मुझसे कहा- आप पहले व्यक्ति हैं, जो इतना फ्रैक्चर होने के बावजूद महीने भर से कम समय में उठ खड़े हुए और संघ के परेड में भाग लेने की इतनी इच्छा है, ये जानते हुए भी कि दाहिने साइड की कई पसलियां टूटी हुई हैं। मैंने कहा, सर सब ठीक हो जाएगा। आप हां, कीजिए। वो मुस्कुरा रहे थे। यह सब लिखने के पीछे मात्र इतनी इच्छा है कि आप सब भी अपनी शारीरिक व्याधियों को पीछे रखकर आगे बढ़िए, ताकि यह सौवां साल भव्य तरीके से मना सकें।

आप सबका साथी हरेश कुमार

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