सुनिता विलियम्स का चौंकाने वाला खुलासा

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अनिल डागा

दिल्ली। अंतरिक्ष यात्री सुनिता विलियम्स का नौ महीने अंतरिक्ष में बिताने के बाद पत्रकारों से दिया गया बयान अब पूरे विश्व में चर्चा का विषय बना हुआ है।

उन्होंने कहा—”मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर की इच्छा से मैं अंतरिक्ष में फँसी रही। जब मैं अंतरिक्ष में 20 दिन की हुई, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं मृत्यु का सामना कर रही हूँ। जब मैंने सोचा कि अब भोजन और पानी की कमी के बीच मैं कैसे जीवित रहूँगी, तभी मुझे सनातन धर्म के चैत्र नवरात्रि के उपवास की याद आई। उस दिन से मैंने शाम को थोड़ा भोजन और पानी तथा सुबह थोड़ा पानी लेना शुरू किया। एक महीने बाद मैं स्वस्थ और प्रसन्न महसूस करने लगी। मुझे समझ आया कि मैं कुछ और समय तक टिक सकती हूँ।
“जब मैं मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही थी, तो मैंने कंप्यूटर खोला और सोचा कि एक दिन बाइबिल पढ़ूँगी। पहले भी कई बार पढ़ चुकी थी, पर एक पन्ना पढ़ते ही ऊब गई। फिर मन हुआ कि रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता दोबारा पढ़ूँ। (लगता है अब यह मुझे कोई शक्ति प्रदान कर रहा था।) मैंने (अंग्रेज़ी अनुवाद) डाउनलोड करके पढ़ना शुरू किया। 10-15 पन्ने पढ़ने के बाद मैं आश्चर्यचकित रह गई। उसमें गर्भ विज्ञान, समुद्र और आकाश का अद्भुत वर्णन था। मुझे लगा यह संसार को बताना चाहिए।
“अंतरिक्ष से देखने पर सूर्य ऐसा लगता है मानो कीचड़ के तालाब में बैठा हो। कभी-कभी ऊपर से कुछ आवाज़ें सुनाई देती थीं, जैसे मंत्रोच्चारण हो रहा हो। मुझे लगा कि यह संस्कृत-हिंदी के मंत्र हैं। मेरे साथी बैरी विलमोर ने कहा कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि मैं प्रतिदिन रामायण और गीता पढ़ती हूँ। इसके बाद मैंने गहराई से रामायण और गीता पढ़ने का निश्चय किया। यह अद्भुत अनुभव था। मैंने तुरंत एलन मस्क को फोन कर यह बात बताई।

“अब आप चौंक जाएँगे। कुछ दिन तो ऐसे रहे जब हम बड़े-बड़े उल्कापिंडों को अपनी अंतरिक्ष स्टेशन की ओर आते देख डर गए। जब कोई उपाय नहीं था, तो हमने ईश्वर से प्रार्थना की और चमत्कारिक ढंग से कुछ छोटे-छोटे गोलाकार प्रकाशपुंज (जो तारे जैसे दिखते थे) नीचे उतरकर उन सबको नष्ट कर गए। हमें ऐसा लगा जैसे तारे ही उन्हें मार रहे हों। यह हमें बहुत अचंभित कर गया। नासा ने वादा किया है कि इस विषय पर और गहन शोध किया जाएगा।

“आठ महीने में मैंने संपूर्ण रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ ली। मेरे भीतर लौटने का आत्मविश्वास जग गया। मुझे लगा कि अब मैं पृथ्वी पर वापस आ सकती हूँ।

“अप्रैल माह में जब सूर्य अस्त हो रहा था, तब पृथ्वी के ऊपर से शेर जैसी आकृति दिखाई दी, जिसके साथ माता जी और त्रिशूल भी था। जैसे ही वह पृथ्वी के वातावरण में पहुँची, वह अदृश्य हो गई। मैं समझ नहीं पाई कि यह कहाँ से आई थी। मेरे साथी बैरी विलमोर और मैंने देखा कि यह किसी विशेष परत से आ रही थी। तब मैंने समझा कि आकाश की भी कई परतें हैं। हमने बहुत सोचा कि ये उड़ते हुए घोड़े क्यों नहीं दिखे। फिर मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट देखी, जिसमें हडसन नदी के ऊपर चाँद के दिखने और 2 मार्च से सनातनी उपवास शुरू होने की खबर थी। तभी से नंगल में इस घटना का अवलोकन हो रहा था। बाद में हमने समझा कि यह धरती पर व्रत खोलने का समय था। मुझे लगता है कि वे ईश्वर के आशीर्वाद लेकर आने वाले देवदूत थे।

“अब मुझे लगता है कि सनातन धर्म की श्रीमद्भगवद्गीता सत्य है। अब मेरा शोध वेदों के विज्ञान पर होगा-गर्भ विज्ञान, समुद्र और अंतरिक्ष विज्ञान पर। मैं खगोल विज्ञान की हर बात जानना चाहती हूँ। नासा में वेदों की अद्भुत शक्तियों पर शोध करने के लिए एक नया विभाग शुरू करने का प्रस्ताव भी दिया गया है।”

(यह आलेख श्री डागा के सोशल मीडिया पेज से साभार लिया गया है)

वाणी कपूर की फिल्म ‘अबीर गुलाल’ पर विवाद: सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना

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मुम्बई। बॉलीवुड अभिनेत्री वाणी कपूर की आगामी फिल्म ‘अबीर गुलाल’ को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह फिल्म, जिसमें उनके साथ पाकिस्तानी अभिनेता फवाद खान मुख्य भूमिका में हैं, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से चर्चा में है। इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी, जिसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया। फिल्म, जो एक रोमांटिक ड्रामा है और 9 मई को रिलीज होने वाली थी, को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया। वाणी कपूर ने हाल ही में हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में इस विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने सोशल मीडिया पर मिल रही आलोचनाओं और ट्रोलिंग पर दुख जताया, पूछते हुए कि लोग व्यक्तिगत हमले क्यों करते हैं। वाणी ने कहा, “मैं आध्यात्मिक रूप से प्रेरित हूं और मुश्किल वक्त में खुद को संभालना जानती हूं। यह मेरे लिए सीखने का समय है।” उन्होंने यह भी बताया कि वह नकारात्मकता से ऊपर उठने की कोशिश करती हैं और अपने काम पर ध्यान देती हैं।


‘अबीर गुलाल’ को लेकर पहले भी विवाद हुआ था, जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने फवाद खान की कास्टिंग पर आपत्ति जताई थी। हमले के बाद फिल्म के गाने ‘खुदाया इश्क’ और ‘अंग्रेजी रंगरसिया’ यूट्यूब इंडिया से हटा दिए गए। वाणी ने अपने इंस्टाग्राम से फिल्म से संबंधित सभी पोस्ट हटा लीं, हालांकि टाइम्स नाउ के अनुसार, यह उनके द्वारा नहीं, बल्कि प्रोडक्शन टीम द्वारा किया गया। वाणी ने हाल ही में ‘रेड 2’ और ‘मंडाला मर्डर्स’ में अपनी सफलता के लिए प्रशंसा बटोरी, लेकिन ‘अबीर गुलाल’ के विवाद ने उनकी अन्य परियोजनाओं पर भी असर डाला। अब यह फिल्म 29 अगस्त को वैश्विक रिलीज के लिए तैयार है, लेकिन भारत में इसका प्रदर्शन नहीं होगा।

स्वरा का बायसेक्शुअल बम: हंसी, तंज और ट्रोल का तड़का

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मुम्बई। बॉलीवुड की बेबाक बाला स्वरा भास्कर ने एक बार फिर अपने बयान से सोशल मीडिया को हॉट कर दिया। इस बार मंच था एक पॉडकास्ट, जहां वह अपने पति फहद अहमद के साथ बैठी थीं। स्वरा ने बड़े ठाठ से कहा, “हम सब बायसेक्शुअल हैं, हेटरोसेक्शुअलिटी एक थोपी गई विचारधारा है।” और तो और, उन्होंने डिंपल यादव को अपना क्रश बताकर तड़के में मिर्च का डोज और बढ़ा दिया। अब ये सुनकर फहद का चेहरा देखने लायक था-शायद सोच रहे होंगे, “ये तो मेरा उत्तर प्रदेश का सियासी करियर भी डुबो देगी!”

स्वरा का ये बम वाकई कमाल का था। एक तरफ वो मानव जाति की उत्पत्ति और बायोलॉजी पर दार्शनिक ज्ञान बांट रही थीं, दूसरी तरफ डिंपल जी की तारीफ में कसीदे पढ़ रही थीं। सोशल मीडिया पर तुरंत मेला लग गया। कोई बोला, “ये स्वरा तो समाजवादी पार्टी का टिकट पक्का करने की जुगत में है!” तो किसी ने तंज कसा, “बायसेक्शुअल?

ये तो बस स्वरा की नई स्क्रिप्ट का डायलॉग है!” कुछ ने तो इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहकर तारीफ भी की, लेकिन ज्यादातर ट्रोल्स ने इसे ‘नया ड्रामा’ करार दिया।

स्वरा की इस बेबाकी का जवाब नहीं। वह बोलती हैं, और दुनिया सुनती है-या तो तालियां बजाती है, या फिर कीबोर्ड पर उंगलियां। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था। डिंपल यादव को ‘करीना जैसी हॉट’ कहना और बायसेक्शुअलिटी को सामान्य बताना, ये ऐसा मसाला था जो हर ट्वीट में चटकारे ले रहा था। कुछ ने कहा, ‘स्वरा, तू तो बायोपिक बनाकर ऑस्कर ले जाएगी!’ तो कुछ ने फहद को सलाह दी, ‘भाई, अब तो यूपी में रैली करने से पहले डिंपल जी से इजाजत ले लेना!’

स्वरा भास्कर एक ब्राह्मण परिवार से आती हैं। उनके पिता, उदय भास्कर, तेलुगु मूल के हैं, और उनकी मां, इरा भास्कर, बिहारी मूल की हैं। स्वरा ने उत्तर प्रदेश के मुस्लिम युवक फहद अहमद के साथ निकाह पढ़ा है।

Source: https://x.com/buzz_bihar/status/1957724986933743991

भारत का स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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 डॉ. प्रवेश चौधरी

आज देश में एक बार पुनः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर खूब चर्चा हो रही है। आज भी देश के कमतर बुद्धि एवं वामी गैंग के साथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाने से नही चूक रहे है। बार-बार संघ को लेकर मीडिया डिबेट में प्रश्न  करने लगते है की संघ का आज़ादी की लड़ई  में क्या? योगदान है, तो कभी कहते है संघ तो देश के तिरंगे का ही सम्मान नही करता। ऐसे सब में देश कई राजनीतिक दलो के नेता भी ऐसे ही कुछ प्रश्न खड़े करते है कभी यही दल डॉ०अम्बेडकर और स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान को चिन्हित ही नही करते थे, उन्हें केवल ओर केवल दलित नेता के रूप में दिखाते थे।  

आज वही दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान पर प्रश्न खड़े कर रहे है। ऐसे में मुझे जैसे कार्यकर्ता के मन में आता है की समाज को ये ज्ञात हो की संघ ने आज़ादी की लड़ाई में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया वही तिरंगे का सम्मान भी उस दिन से करत आ रहा जब से कांग्रेस ने इस तिरंगे को मान्यता दी थी। हम सभी जानते है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है देश और समाज में सबसे ज़्यादा स्वाकरिता भी संघ और उसके स्वयंसेवकों की ही है। 1925 में जिस संघ का बीज रोपण ही भारत राष्ट्र को पुनः उसके विश्व में गुरु के रूप स्थापित करना था, जिसके एक-एक कार्यकर्ता का ध्येय समरस भारत सशक्त भारत निर्माण हो ऐसा ही हो, जो सदैव  संघ गीत गुन गुनाते हुए कहता है की “देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखे”। जो कार्यकर्ता सदैव संघ की प्रार्थना में कहता “ नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमेत्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे। पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते” इसके अर्थ को देखे तो ज्ञात होता है की एक संघ कार्यकर्ता प्रार्थना में करता क्या है। 

हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ। अगली ही पंक्ति में कहा जाता है की “त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्” आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। जिस संगठन का निर्माण ही भारत की पुरातन हिंदू संस्कृति को पुन: जागृत कर भारत के ज़न मानस के भीतर राष्ट्र गौरव का जागरण कर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करना भला हो वो संगठन कैसे देश की आज़ादी की लड़ाई से अपने को भिन्न कर सकता है। हम देखे की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार अपने बाल्य काल से ही एक राष्ट्र भक्त थे। उनके विद्यालय में ब्रिटेन की रानी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में बटने वाले मिठाई को लेने से माना कर देते है, जिसके लिए उन्हें विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा दंड भी दिया जाता है। अपनी युवा अवस्था में कलकता में पढ़ते हुए वे अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य है, अंग्रेज़ी पुलिस उन पर नज़र रखे है। महाराष्ट्र में वे कांग्रेस के बड़े नेता है नागपुर में हो रहे कांग्रेस अधिवेशन की प्रबन्ध समिति में है वही स्वागत  समिति के सचिव है। 

1921 में हेडगेवार असहयोग आंदोलन में शामिल हुए जिस कारण उन्हें एक वर्ष के करावास में रहना पड़ा। जब हेडगेवार जी ज़ैल से निकल कर आए तो तमाम कांग्रेस नेताओ ने उनका स्वागत  किया, उनके स्वागत हेतु बुलाई सभा में मोतीलाल नेहरू जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता भी थे। ज़ैल में किए उनके चिंतन ने उनके मन में ये विचार जागृत किया की बिना संगठित हिन्दू  शक्ति के भारत सशक्त नही हो सकता। हमारी प्रतंत्रता का कारण हमारा एक संगठित शक्ति ना होना है,इस लिए 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई। 

हेडगेवार जी जहाँ एक और संघ की शाखा के माध्यम से युवा शक्ति के बीच राष्ट्र जागरण का कार्य कर रहे थे वही आज़ादी की लड़ाई में वे शामिल होते थे एवं तमाम संघ के कार्यकर्ता भी गाँधी जी एवं कांग्रेस के आवहन का अक्षरशः मानते हुए उन अभियानो में शामिल होते थे। 1930 में गाँधी जी द्वारा नामक सत्यग्रह में कुछ संघ कर्यकर्ताओ के साथ डॉ हेडगेवार भी शामिल हुए जिसमें उन्हें 9 महीने का कारावास का दंड भी मिला। 1928 में भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को उमरेड नागपुर के संघ कार्यकर्ता भैय्या जी ढानी के यहाँ रुकने की व्यवस्था संघ प्रमुख हेडगेवार जी ने ही की थी। हेडगेवार जी को वन्दे  मातरम कहने पर स्कूल से निकल दिया गया था अपने युवा अवस्था में अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य रहे। इतना ही नही  1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ बहुत ही सक्रिय भूमिका रही 27-28 अप्रेल 1942 को संघ के तत्कालीन प्रमुख गुरु गोलवलकर ने कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए कहा की “ वर्तमान सरकार को स्वार्थवश यथासम्भव भरपूर सहयात देने वाले व्यक्तियों की हम निंदा करते है, वही अपने दूसरे भाषण में उन्होंने स्वयंसेवकों को साफ़ निर्देश दिए की “ स्वयंसेवकों को देश के उदेश्य के लिए अपने प्राणो के बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए ये सब 28/8/1942 अंग्रेज़ी सरकार की ख़ुफ़िया रिपोर्ट में उद्धृत है। जिस उत्तरप्रदेश में संघ को लेकर अनर्गल अलाप हुआ वही सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान दिया। उत्तरप्रदेश मेरठ के मवाना तहसील जहाँ अंग्रेज़ी पुलिस ने निहाते संघ के कार्यकर्ताओं पर लाढ़ी- ड़डो से मारा बाद में गोलियाँ चलाई  गई जिसके परिणाम स्वरूप सैकड़ों कार्यकर्ता का बलिदान हुआ। जो कांग्रेस कहती है संघ का आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान तो इतिहास के पन्ने पलटे अरुणा आसाफली एवं जयप्रकाश जी को दिल्ली के उस समय के संघचालक लाला हंसराज गुप्ता जी ने ही अपने यहाँ छुपा रखा था। जिस सावरकर को लेकर कांग्रेस जन आलोचना करते है उनकी रिहाई को लेकर स्वयं महात्मा गाँधी कई बार चिट्ठी लिखते है, इतना ही नही इंदिरागाँधी जी सावरकर को भारत की आज़ादी के महान सपूत कहती है।

डॉ. अम्बेडकर, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस आदि संघ की शाखा पर गए, शिविर में गये वही भारत के पहले प्रधानमंत्री जवहारलाल नेहरू ने संघ की सहायता से कश्मीर जैसी समस्या का निदान किया एवं चीन युद्ध में संघ कर्यकर्ताओ के योगदान को कौन नकार सकता है इसी का परिणाम है की 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ ने भी भाग लिया। उत्तरप्रदेश के मेरठ की मवाना तहसीलमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाढ़ी  चार्ज कर दी, गोली चलाई, जिसमें कई कार्यकर्ता गम्भीररूप से घयाल हुए ।मैं पहले ही कह रहा इस आंदोलन में समाज के तमाम संगठनों ने भाग लिया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विशेष भूमिका रही है। इस प्रकार ये आंदोलन 1942 के अंत तक चला सैकड़ों लोगों ने इसमें अपनी शहादत दी परंतु अंग्रेज़ी शासन कीनींव ज़रूर हिला कर रखा दी।1942 में ही पटना में  तिरंगा लहराने के जुर्म में बाला जी राय पुरकर को अंग्रेजो ने गोली मार दी जो संघ के कार्यकर्ता थे वही दादा नायक 1942 के आन्दोलन  में शामिल होने के कारण अंग्रेज़ी सरकार  द्वारा फाँसी की सजा दी गई। 1930 में संघ की प्रत्येक शाखा पर तिरंगा लहराया गया, ये भी इतिहास में इंगित है की जिस दिन पहली बार तिरंगा लहराया गया उस दिन भी किशन सिंह राजपूत ने ही इस पुनीत कार्य में सहयोग किया जिसकी प्रशंसा स्वयं नेहरू ने की ये कार्यकर्ता भी संघ का स्वयंसेवक था। संघ समाज स्वीकारीता को देखते हुए विवेकानंद मेमोरीयल एवं मूर्ति के  विमोचन कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता एकनाथ रानाडे जी के कहने पर इंदिरा गाँधी जी स्वयं शामिल हुई।  

जयप्रकाश आंदोलन को जन-जन तक ले जाने का कार्य किसने किया तो वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था।आज भी देश में कितने ही सेवा कार्यों में संघ लगा है,अभी हाल के कोरोना संकट के दोरान संघ के द्वारा किए सेवा कार्यों ने उसकी स्वीकारित को और अधिक बढ़ा दिया है।इस सबके बावजूद समाजवादी समेत अन्य दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा करते है।

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