क्या भाजपा परिसीमन के माध्यम से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मॉडल को अपनाना चाहती है?

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बक्सर (बिहार): राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा हाल ही में किए गए विश्लेषण और टिप्पणियों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रस्तावित परिसीमन रणनीतियों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की केंद्रीकृत सत्ता संरचनाओं के बीच समानताएं बताई गई हैं। उनका आरोप है कि भाजपा एक ऐसे सत्तावादी मॉडल की ओर बढ़ रही है जिसका उद्देश्य “एक राष्ट्र” की राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है। विपक्षी नेताओं सहित आलोचकों का तर्क है कि भाजपा दीर्घकालिक चुनावी वर्चस्व के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में हेरफेर करने के लिए परिसीमन को एक “ट्रोजन हॉर्स” के रूप में इस्तेमाल कर रही है, ठीक उसी तरह जैसे सीसीपी एकदलीय शासन बनाए रखने के लिए राजनीतिक विपक्ष को खत्म करती है।

विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार संसद का आकार बढ़ाकर (जैसे 850 सीटें) और व्यक्तिगत सांसदों के प्रभाव को सीमित करके वास्तविक शक्ति को एक केंद्रीकृत कार्यकारी कार्यालय में स्थानांतरित कर रही है, जो चीन के पोलित ब्यूरो की संरचना की नकल है। इस कदम को “संघवाद पर युद्ध” के रूप में देखा जा रहा है, जो “एक देश, एक विधायिका, एक कार्यपालिका” मॉडल का समर्थन करने वाली विचारधारा पर आधारित है। आलोचक इसे भारत को एक विविध लोकतंत्र से सीपीसी के नियंत्रण के समान एक शीर्ष-नियंत्रित, एकीकृत प्रणाली में बदलने का प्रयास बताते हैं। यद्यपि दोनों दल अपनी-अपनी प्रणालियों में प्रमुख हैं, भाजपा एक लोकतांत्रिक, प्रतिस्पर्धी ढांचे के भीतर कार्य करती है, जबकि सीपीसी एक केंद्रीकृत एक-दलीय राज्य के भीतर काम करती है। आलोचकों के आरोप शासन शैली और राजनीतिक पुनर्गठन के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग के इर्द-गिर्द घूमते हैं।

विपक्षी नेताओं ने भाजपा पर अपने पक्ष में सीमाएँ पुनर्निर्धारित करने का आरोप लगाया है, और इसके लिए उन्होंने 2020 के जम्मू-कश्मीर और 2023 के असम परिसीमन का उदाहरण दिया है। इन परिसीमनों की आलोचना इसलिए की गई क्योंकि इनमें विशिष्ट समुदायों का प्रतिनिधित्व कम किया गया और भौगोलिक निकटता का ध्यान रखे बिना सीमाएँ बदली गईं। आलोचकों का मानना ​​है कि 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन दक्षिणी राज्यों को प्रभावी शासन (जनसंख्या नियंत्रण) के लिए दंडित करने जैसा है, जिससे उत्तरी हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा को “स्थायी बहुमत” मिल जाएगा।

2011 में ही भाजपा नेताओं ने चीन का दौरा किया था और एक आधुनिक, अनुशासित पार्टी बनाने के लिए सीपीसी के कैडर प्रशिक्षण मॉड्यूल से सीखने में रुचि व्यक्त की थी। भाजपा ने हाल ही में 2026 में सीपीसी प्रतिनिधिमंडल के साथ औपचारिक “पार्टी-टू-पार्टी” बैठकें कीं, जिन्हें भाजपा ने “खुला” संवाद बताया और विपक्ष के कथित “गुप्त” समझौतों से अलग बताया। बैठकों के समय को लेकर आलोचना भी हुई। हालांकि कांग्रेस भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में रहती है और इसके लिए कांग्रेस की आलोचना भी हुई है।

आलोचकों का तर्क है कि समय की कमी के कारण वर्तमान सांसदों को प्रश्न-उत्तर सत्र में पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। यदि सीटों में 50% की वृद्धि की जाती है, तो प्रश्न-उत्तर सत्र में सांसदों को अपना कर्तव्य निभाने के लिए पर्याप्त समय कैसे मिलेगा? परिसीमन के बाद अतिरिक्त सांसदों के वेतन और भत्तों का वहन करने के लिए सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बढ़ा हुआ खर्च भी देश के करदाताओं पर एक अतिरिक्त बोझ होगा। दक्षिण भारत के 5 राज्यों का वर्तमान प्रतिनिधित्व और भी कम हो जाएगा, जिससे दक्षिण भारत में अशांति और आंदोलन पनप सकता है।

दक्षिण भारतीय राज्यों के नेताओं ने चिंता व्यक्त की है कि देश की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले और मानव विकास सूचकांक में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले दक्षिणी राज्य संसद में अपनी आवाज खो देंगे। उन्होंने यह भी महसूस किया कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों में वृद्धि करना उच्च जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करने के समान है। केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों में वृद्धि से दक्षिणी राज्य अपने ही देश में हाशिए पर चले जाएंगे और इससे राष्ट्र की अखंडता पर भी प्रभाव पड़ सकता है। विकास के नाम पर दक्षिणी राज्यों के साथ हो रहे आर्थिक भेदभाव को उजागर करते हुए, दक्षिणी राज्यों के नेताओं का मानना ​​है कि परिसीमन प्रक्रिया से राजनीतिक भेदभाव भी बढ़ेगा।

दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर परिसीमन पर निर्णय 1971 में लिया जाना था, लेकिन 1976 में एक संशोधन के माध्यम से इसे 2001 तक टाल दिया गया और 2001 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इसे 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया। 2001 में, राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण उपायों को बढ़ावा देने के लिए परिसीमन पर निर्णय रोक दिया गया था। अब, कम जनसंख्या वाले राज्य, जो अधिकतर दक्षिण भारत में हैं, यह आरोप लगा रहे हैं कि अधिक जनसंख्या के प्रतिनिधित्व को समायोजित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बढ़ाकर उन्हें दंडित किया जा रहा है। परिणामस्वरूप, लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या (उत्तर की तुलना में) कम हो जाएगी, जिससे निर्णय लेने में दक्षिणी राज्यों के महत्व को खतरा हो सकता है।

इस बीच, आलोचकों का तर्क है कि महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से जोड़ना केवल दिखावे के लिए है, जबकि संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र का मुख्य एजेंडा परिसीमन और सीटों का पुनर्वितरण है।

पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर : ममता को सताने लगा हार का डर

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : पश्चिम बंगाल चुनाव दिनों-दिन बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है। अजेय समझी जाने वाली
ममता बनर्जी हैरान, परेशानी और आक्रोशित दिखाई दे रही हैं। हाल ही में एक चुनावी सभा में उनका ये बयान – ‘रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे’ ; ख़ूब चर्चा में है। जहां कुछ सियासी पंडित इसे ममता बनर्जी के चुनाव में सरेंडर करने से जोड़ रहे हैं। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि- ये उनका शक्ति प्रदर्शन का अंदाज़ ए बयां है। लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल के चुनाव में दृश्य दिखाई दे रहे हैं। वो किसी भी लिहाज़ से ममता बनर्जी के पक्ष में नहीं हैं।
अपने चुनावी अभियान के बीच ममता बनर्जी उकसावे वाले बयान दे रही हैं।चुनाव कराने आए सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ लोगों को उकसा रही हैं। 25 मार्च 2026 को दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में नंदप्रसाद गर्ल्स हाई स्कूल के मैदान में आयोजित एक जनसभा में उनका उकसावे वाला बयान सामने आया। एक वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कथित तौर पर CRPFके जवानों को ‘धमकाती’ नजर आ रही हैं। आरोप है कि जनसभा के दौरान उन्होंने सभी महिलाओं और लड़कियों से अपील की कि- वे भारी संख्या में पोलिंग बूथ पर मौजूद रहें। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि —“अगर जरूरत पड़े तो महिलाएं CRPF जवानों से ‘निपटने’ के लिए घरेलू रसोई के उपकरणों (जैसे बर्तन या अन्य सामान) का इस्तेमाल करें।”

इस खीझ, उकसावे से — ये आईने की तरह साफ़ हो रहा है कि बंगाल की सियासी पिच से ममता बाहर हो चुकी हैं। इसी के चलते वो किसी भी मुद्दे पर जनता के बीच ख़ुद को साबित नहीं कर पा रही हैं।तिस पर ऐसे बयान दे रही हैं मानो पश्चिम बंगाल — भारत से अलग कोई देश है। जहां ममता बनर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलेगा। ममता बनर्जी को लगता है कि वो संविधान से ऊपर हैं।लेकिन ऐसा कतई नहीं है। यहां जनता से बढ़कर कोई नहीं।ममता बनर्जी जिस मुस्लिम वोटबैंक के नाम पर एक छत्र राज कर रही थीं। वो मुस्लिम समुदाय अब अपने ‘इस्लामी’ एजेंडे की ओर बढ़ चला है। हुमायूं कबीर, असद्दुदीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता — मुस्लिम सत्ता और वर्चस्व की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस, टीएमसी की वोटकटवा वाली भूमिका में है। साफ़ है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी के खाते में क्रेडिट होगा। कांग्रेस के दिग्गज नेता कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी,ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ बिगुल फूंक रहे हैं। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वर्ग भी भाजपा की रैलियों और जनसभाओं में नज़र आ रहा है। मुस्लिम महिलाएं और पुरुष ये कहते देखे गए हैं कि —“ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कोई काम नहीं किया है। ममता मुसलमानों को बीजेपी के नाम पर केवल डराने का काम कर रही हैं। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है। वहां मुसलमानों में कोई भय नहीं है वहां विकास हो रहा है।”

पश्चिम बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मेरे कई परिचित लोग जिनका राजनीति से कोई विशेष सरोकार नहीं है। उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। 2021 के चुनाव में जहां वो बीजेपी की राह कठिन बता रहे थे। वहीं इस बार पश्चिम बंगाल में बड़े परिवर्तन को भांप रहे हैं। उनका कहना है कि — इस बार पश्चिम बंगाल, कुछ अलग तरह के चुनावी माहौल में है। जहां पिछले चुनावों में ममता समर्थकों की गुंडागर्दी, हिंसा और उत्पात से लोग डरे-सहमे रहते थे। वहीं अब लोग ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ रहे हैं। उन्हें अब किसी चीज़ का भय नहीं लग रहा है। जिन पोलिंग बूथों में टीएमसी के गुंडों का खौफ़ रहता था। वहां अब लोग ममता बनर्जी का खुला विरोध जता रहे हैं । साथ ही साइलेंटली भी बीजेपी के पक्ष में वहां हवा चल पड़ी है। ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण से बंगाल की जनता मुक्ति चाहती है। डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर स्थानीय लोग ख़ासे चिंतित हैं। पश्चिम बंगाल में खुलेआम होती गौहत्याएं, जनसांख्यिकी बदलाव, गुंडागर्दी, हिंसा, अराजकता और अपराधियों को मिलते संरक्षण से वहां की जनता त्रस्त हो चुकी है।

ये संकेत बता रहे हैं कि वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना वाली बंगभूमि जागृत हो चुकी है। वहां का जन-मानस ऐतिहासिक परिवर्तन करने वाला है। बंगाली भद्रोलोक में इस बार गहन चिंतन मंथन चला है।उनका मानना है कि अगर ममता बनर्जी, अपने मज़हबी तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठियों को संरक्षण न देतीं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, हिन्दू त्योहारों पर लगातार अंकुश लगाने का प्रयास न करती तो उनके प्रति सहानुभूति बनी रहती।लेकिन ममता बनर्जी ने जिस ढंग से हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसाओं में मौन साधे रखा। मज़हबी कट्टरपंथियों को संरक्षण देती रहीं। उससे बंगाली समुदाय के स्वाभिमान को धक्का लगा। संदेशखाली, आर जी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, दुर्गापुर लॉ कॉलेज, साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में महिलाओं के साथ हुए दुराचार, अत्याचार की — वीभत्स घटनाओं ने, उनके महिला सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक महिला होने के नाते भी ममता बनर्जी का असंवेदनशील रूप पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा है। जो ये बताता है कि वो सिर्फ़ अपने वोटबैंक की राजनीति करती हैं। उनके लिए महिला सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती है।

वहीं ममता बनर्जी का खुलकर मुस्लिम पक्षकार के तौर पर आना। लगातार केंद्र की जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू न करना। केंद्र से हर मुद्दे पर टकराव लेना। SIR— के विरोध में उतरना। मालदा में ममता राज में,
एसआइआर के काम में लगे 3 महिला सहित 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की झकझोर देने वाली घटना ने एक गंभीर ख़तरे की ओर संकेत किया है। जब एक भीड़ ने 9 घंटे तक उन्हें बंधक बनाए रखा। उकसावे के बयान दिए जाते रहे। अधिकारी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते रहे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें रेस्क्यू किया।

स्थिति की भयावहता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया। देर रात 2बजे तक सुनवाई की और NIA को जांच सौंपी। मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि —“कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने उन्हें देर रात और फिर सुबह इस स्थिति के बारे में सूचित किया था। सूचना मिलने के बावजूद मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और स्थानीय एसपी की भूमिका को ‘बेहद निराशाजनक’ है।”

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि — “न्यायाधीशों को डराने-धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायपालिका अपने अधिकारियों की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित है। पीठ ने आगे कहा कि राज्य सरकार की निष्क्रियता ‘बेहद निंदनीय’ है। यह घटना न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और चल रही चुनावी प्रक्रिया को रोकने के लिए सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।”

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ममता बनर्जी सरकार का असल चरित्र पेश करती हैं। आप सोचिए कि सीमावर्ती राज्य में ऐसे दृश्य कितने ख़तरनाक हैं। जहां एक संगठित भीड़ न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लेती हो। खुलेआम देश के संविधान और कानून को चुनौती दी जाती हो। हिंसा, उत्पात के दृश्य दिखाई देते हों। क्या ये देश की एकता और अखंडता को चुनौती नहीं है? आख़िर ये दुस्साहस कहां से आया? स्पष्ट है राज्य की ममता बनर्जी सरकार की उस तानाशाही और तुष्टिकरण की नीति से, जो केवल सत्ता चाहती है। उनके लिए राष्ट्रीयता जैसे मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं। कोई आम नागरिक भी सोचे कि — अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप ना करता, केंद्रीय बल रेस्क्यू न करते— तो क्या न्याय अधिकारी सुरक्षित रहते? अगर वहां न्याय अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं तो क्या आम नागरिक सुरक्षित हो सकता है? क्या ये दृश्य अलगाव, आतंक को स्पष्ट बयां नहीं करते हैं? क्या किसी भी नेता, राजनीतिक दल को, देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने की छूट दी जा सकती है?

पहले कम्युनिस्ट शासन उसके बाद ममता बनर्जी सरकार के लंबे समय के अराजक शासन से बंगाल त्रस्त हो गया है। वो अब इन सबसे मुक्ति चाहता है। इसी के दृश्य पश्चिम बंगाल में सर्वत्र दिखाई देते हैं। कोलकाता के रहने वाले एक युवा ने कहा कि— “पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में अचानक बदलती डेमोग्राफी। पश्चिम बंगाल के संसाधनों पर डाका डालते, बांग्लादेशी घुसपैठियों, रोहिंग्याओं से लोगों में भय का वातावरण बना है।” लेकिन ममता सरकार में उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। ये सारी बातें ममता बनर्जी को ख़ासा डैमेज कर रही हैं। सुवेंदु अधिकारी के नामांकन रोड शो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सभाओं में लगातार उमड़ता विशाल जनसमूह—बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है। बीजेपी को‌ लेकर जनता में जैसा उत्साह 2026 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। वो परिवर्तन की बड़ी आहट के तौर पर दिखाई दे रहा है। महिलाओं, युवा, बुजुर्ग — सभी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय नेतृत्व, भाजपा की नीतियों को लेकर विश्वास की लहर दौड़ रही है। छोटे-छोटे बच्चे तक अपने माता-पिता के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों में, सभाओं में पहुंच रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र के इंतज़ार में बच्चों के निश्छल, भावुक कर देने वाले वीडियो देखने को मिल रहे हैं। जहां तक नज़र जाती है वहां विशाल जनसमूह दिखाई देता है। जबकि दूसरी ओर ममता बनर्जी की संभाएं खाली दिख रही हैं। इसी के चलते प्रेशर से बचने के लिए उन्होंने जनसभाओं के आकार को छोटा कर दिया। ममता बनर्जी की सभाओं में लोग उनका बॉयकॉट करते नज़र आ रहे हैं। ये सब स्पष्ट संकेत हैं कि — पश्चिम बंगाल की भूमि इस बार अपने मूल स्वरूप में लौट आई है। संन्यासी क्रांति, वंदेमातरम् की भूमि- हिंसा, अत्याचार, अराजकता से मुक्ति चाहती है। वहीं पश्चिम बंगाल के अतिसंवेदनशील और संवदेनशील इलाक़ों में सेना ने जिस तरह से भयमुक्त निर्वाचन के लिए मोर्चा संभाला है। उससे जनता में उत्साह की लहर देखने को मिली है। लोग भयमुक्त होकर अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। नए परिवर्तन के लिए आगे आ रहे हैं। स्पष्ट है कि हाल-फिलहाल पूरा गेम ममता के हाथों से फिसलता जा रहा है। पश्चिम बंगाल भाजपा की ओर रुख कर रहा है।‌ये आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी कि — 4 मई को रिजल्ट के दिन हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा मैजिक देखने को मिले। टीएमसी दो अंकों में सिमट जाए और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ विजय तिलक करे।

संस्कृत भारत की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि की आधारशिला है – डॉ. मोहन भागवत जी

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नई दिल्ली। संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के नवनिर्मित भवन ‘प्रणवः’ के लोकार्पण अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि अक्षय तृतीया जैसे शुभ मुहूर्त पर ‘प्रणवः’ कार्यालय का लोकार्पण अत्यंत आनंददायक और शुभ संकेत है। यह सत्य संकल्प है। ‘प्रणवः’ सृष्टि के मूल नाद का प्रतीक है और इस नाम के साथ आरंभ हुआ यह कार्य पूर्णता की ओर अग्रसर होगा। उन्होंने संस्कृत को भारत का प्राण बताते हुए कहा कि यह केवल भाषा नहीं, अपितु भारत की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि की आधारशिला है। भारत को समझने के लिए संस्कृत को समझना अनिवार्य है, क्योंकि इसी में हमारी ज्ञान-परंपरा, दर्शन और जीवन-मूल्य निहित हैं। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, अपितु भारत का प्राण है। यह हमारे विचारों, संस्कृति और ज्ञान का वह सार है, जिसे पूरी दुनिया को देने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है और इसके माध्यम से अन्य भाषाओं को भी सहजता से सीखा जा सकता है। संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान का व्यापक भंडार संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी है। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य में केवल रुचि नहीं, अपितु उसके उद्देश्य की स्पष्ट समझ, धैर्य और निरंतरता आवश्यक है। जैसे श्वास-प्रश्वास निरंतर चलता है और उसमें कोई ऊब नहीं होती, उसी प्रकार संस्कृत के कार्य को भी बिना उबते हुए निरंतर आगे बढ़ाना चाहिए।

संस्कृत सीखने के संदर्भ में उन्होंने “संभाषण पद्धति” को सबसे सरल और प्रभावी उपाय बताया। सरसंघचालक जी ने कहा कि संस्कृत को व्यवहार में लाकर, बोलचाल के माध्यम से आसानी से सीखा जा सकता है। संस्कृत संभाषण शिविर इस दिशा में अत्यंत उपयोगी हैं और इनके माध्यम से अल्प समय में भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यदि हम संस्कृत को फिर से गौरव दिलाना चाहते हैं, तो इसे लोकभाषा बनाना होगा। भारत को समझने के लिए संस्कृत अनिवार्य है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत भारती का कार्य सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने का है। संस्कृत के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाएँ और अधिक समृद्ध होंगी तथा समाज में सांस्कृतिक एकात्मता का भाव विकसित होगा।

संस्कृत भाषा के पुनरुत्थान एवं वैश्विक प्रसार के लिए समर्पित संस्कृत भारती के नवनिर्मित केंद्रीय कार्यालय ‘प्रणवः’ का लोकार्पण अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर सम्पन्न हुआ। लोकार्पण से पूर्व वैदिक परंपरा के अनुसार सरसंघचालक जी ने ‘गावो विश्वस्य मातरः’ की भावना के साथ गौमाता की पूजा-अर्चना की तथा शतचंडी यज्ञ में पूर्णाहुति प्रदान की। आचार्य सुधीर वेदपाठी, प्रो. रामराज उपाध्याय एवं प्रो. परमानंद भारद्वाज के सान्निध्य में संपूर्ण वैदिक विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न हुआ।

इस अवसर पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय ने सबका स्वागत किया, अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने ‘प्रणवः’ भवन की संरचना, उद्देश्यों एवं भावी योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।

प्रधानमंत्री का संदेश – संस्कृत अतीत ही नहीं, भविष्य की भी भाषा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रेषित संदेश में कहा कि अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर ‘प्रणवः’ कार्यालय का लोकार्पण अत्यंत हर्ष का विषय है। उन्होंने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण की दिशा में एक प्रेरणादायी कदम बताया। संस्कृत हमारी प्राचीन एवं समृद्ध विरासत की संवाहिका है, जिसमें निहित ज्ञान-विज्ञान और दर्शन मानवता की अमूल्य धरोहर हैं। नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा को विशेष महत्व दिया गया है, जिससे संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा मिली है। संस्कृत न केवल अतीत की, अपितु वर्तमान और भविष्य की भी सशक्त भाषा है और ‘प्रणवः’ कार्यालय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री का शुभकामना संदेश सचिन कठाले ने पढ़ा। कार्यक्रम में शारदा पीठ, श्रृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखरभारती का संदेश भी पढ़ा गया।

अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने प्रस्तावना में कहा कि संस्कृत भारती की स्थापना वर्ष 1981 में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के उद्देश्य से हुई थी। यह आगे चलकर एक व्यापक संस्कृत आंदोलन के रूप में विकसित हुआ और 1995 में इसे ‘संस्कृत भारती’ नाम प्राप्त हुआ। वर्ष 1981 में कुछ छात्रों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन आज 28 देशों और भारत के 660 जिलों तक फैल चुका है।

यह कार्यालय आधुनिक सुविधाओं और प्राचीन परम्परा का संगम है। मुख्य लक्ष्य देश की 10 प्रतिशत जनसंख्या तक संस्कृत पहुँचाना और 12 भाषाओं के माध्यम से पत्राचार द्वारा शिक्षण कार्य को गति देना है। यहां वास्तु, शिल्प, वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) और धर्मशास्त्र इत्यादि विषयों पर परामर्श के लिए विद्वान सदैव उपलब्ध रहेंगे।

समारोह में सहयोग देने वाले ११ व्यक्ति एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों का सम्मान किया गया। समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य सुरेश सोनी, केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन सहित देश-विदेश से आए शिक्षाविद्, विद्वान और संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे। यह भवन अब संस्कृत के प्रचार-प्रसार, शिक्षकों के प्रशिक्षण और वैश्विक शोध के एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

विदेशी जीएम लॉबी के चंगुल में भारत की खाद्य संप्रभुता? ‘जीएम-मुक्त भारत गठबंधन’ ने केंद्र सरकार को दी चेतावनी

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नई दिल्ली: ‘जीएम-मुक्त भारत गठबंधन’ (Coalition for a GM-Free India) ने केंद्र सरकार को एक विस्तृत पत्र लिखकर अमेरिका की उन कुटिल रणनीतियों का पर्दाफाश किया है, जिसके माध्यम से भारत के बाजारों में जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) मक्का और सोयाबीन को पिछले दरवाजे से घुसाने की कोशिश की जा रही है। गठबंधन ने कृषि, वाणिज्य, पर्यावरण और स्वास्थ्य मंत्रियों से आग्रह किया है कि वे अमेरिकी दबाव के आगे न झुकें और देश की जैव-विविधता व जन-स्वास्थ्य की रक्षा करें।

प्रमुख खुलासे: व्यापार की आड़ में संप्रभुता पर हमला:
गठबंधन ने साक्ष्यों के साथ बताया है कि कैसे अमेरिकी संस्थाएं भारत की नियामक व्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही हैं:

आयोवा ‘पायलट प्रोजेक्ट’ का षड्यंत्र: अमेरिकी राज्य आयोवा और भारतीय औद्योगिक समूहों के बीच हुए समझौतों (MoUs) के माध्यम से महाराष्ट्र जैसे राज्यों को जीएम मक्का और इथेनॉल के आयात के लिए ‘प्रवेश द्वार’ बनाया जा रहा है।
वैज्ञानिक धोखा: अमेरिकी एजेंसियां दावा कर रही हैं कि जीएम सोयाबीन तेल और DDGS में आनुवंशिक सामग्री नहीं होती, जबकि स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षणों ने इन प्रसंस्कृत उत्पादों में भी जीएम अंशों की उपस्थिति की पुष्टि की है।

अवैध खेती और निर्यात पर खतरा: भारत में अवैध जीएम फसलों की मौजूदगी न केवल पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों (जैसे चावल) की साख को भी खत्म कर रही है।

हमारी मुख्य मांगें:

1. जीएम आयात पर रोक: अमेरिका से आने वाले जीएम बिनौला तेल, सोयाबीन तेल और DDGS के आयात को तुरंत रोका जाए।
2. लॉबी समूहों का निष्कासन: भारत सरकार के नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप करने वाले विदेशी वित्तपोषित संस्थानों (SABP, BCIL, AFSI) की भागीदारी समाप्त की जाए।
3. संस्थागत जांच: ‘सोया एक्सीलेंस सेंटर’ और USGC के कार्यालयों को बंद किया जाए जो भारतीय किसानों के हितों के विरुद्ध काम कर रहे हैं।

यह केवल व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि भारत की खाद्य संप्रभुता पर हमला है। हम अपने देश को विदेशी प्रयोगशालाओं का डंपिंग ग्राउंड नहीं बनने देंगे।”

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