प्लास्टिक से जकड़ा भारत

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दिल्ली की जाम नालियाँ, मुंबई के कचरे से पटे समुद्रतट, हिमालय की पगडंडियों पर बिखरे रैपर, वाराणसी और वृंदावन के घाटों पर तैरती बोतलें और माला…आज भारत का हर कोना प्लास्टिक से घिरा है। यह जहरीला बोझ मिट्टी को बंजर बना रहा है, नदियों का दम घोंट रहा है, जानवरों की जिंदगी छीन रहा है और पवित्र स्थलों की आभा धूमिल कर रहा है।
पहाड़, जो कभी निर्मल और शांत थे, अब कचरे के ढेरों से सजे दिखते हैं। तालाब और कुंड प्लास्टिक की मालाओं से भरे हैं, और समुद्रतट पर सीपियों की जगह अब पैकेजिंग व रैपर चमकते हैं। एकबारगी इस्तेमाल होने वाला यह प्लास्टिक सिर्फ कचरा नहीं है—यह हमारे भोजन, हवा और यहां तक कि खून में भी घुस चुका है।
प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट है। जिनेवा में प्लास्टिक पर वैश्विक संधि को लेकर तीन साल चली छह दौर की बातचीत बेनतीजा रही। उत्पादन घटाने की मांग करने वाले और सिर्फ कचरा प्रबंधन पर जोर देने वाले देशों के बीच खाई गहरी होती गई। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत जैसे देशों को हो रहा है, जहां आबादी विशाल है और कचरा प्रबंधन बेहद कमजोर।
भारत रोज़ाना करीब 26,000 टन प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। इसमें से आधे से ज्यादा गलत तरीके से निपटाया जाता है—नालियों में, खाली ज़मीन पर या सीधे नदियों और समुद्र में। नतीजा यह कि भारत हर साल लगभग 80 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक महासागरों में फेंक देता है।
7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर बसे मछुआरे समुदाय इसका सीधा खामियाजा भुगत रहे हैं। अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक, कछुए, मछलियां और समुद्री पक्षी प्लास्टिक में उलझे या अपचनीय बोतलों-थैलियों से भरे पेट के साथ मृत पाए जा रहे हैं। माइक्रोप्लास्टिक मछलीपालन को तबाह कर रहा है और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा खड़ा कर रहा है।
भारत पर दबाव है कि वह उत्पादन घटाने की दिशा में कदम बढ़ाए। लेकिन यह आसान नहीं। लाखों लोग इस उद्योग पर आश्रित हैं, और भारत जैसा मूल्य-संवेदनशील बाज़ार अभी सस्ते विकल्पों के बिना जी नहीं सकता। रिवर एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “प्लास्टिक उद्योग रोज़गार का बड़ा स्रोत है। अगर उत्पादन पर अचानक रोक लगी, तो सामाजिक-आर्थिक संकट गहरा जाएगा।”
फिर भी, भारत ने कुछ कोशिशें की हैं। स्वच्छ भारत मिशन, कुछ राज्यों में एकबारगी प्लास्टिक पर आंशिक प्रतिबंध, और समुद्रतट सफाई अभियान—ये सब आशा जगाते हैं, लेकिन नाकाफी हैं। समस्या है कमजोर ढांचा, असंगत प्रवर्तन और व्यापक रीसाइक्लिंग सिस्टम का अभाव। एक्टिविस्ट चतुर्भुज तिवारी बताते हैं, “देश में सिर्फ 60% प्लास्टिक कचरा ही रीसाइक्लिंग तक पहुंच पाता है। बाकी नालियों में सड़ता है या जलाकर जहरीला धुआं बन जाता है।”
जिनेवा की विफल वार्ता ने साफ कर दिया है कि भारत को वैश्विक सहमति का इंतजार नहीं करना चाहिए। मुक्ता गुप्ता, सोशल एक्टिविस्ट, कहती हैं: “अगर हमें अपनी नदियों, पहाड़ों और समुद्रों को बचाना है, तो हमें खुद निर्णायक कदम उठाने होंगे। कचरे का पृथक्करण अनिवार्य करना होगा, आधुनिक रीसाइक्लिंग तकनीकों में निवेश करना होगा और जैव-अवक्रमणशील विकल्पों को सुलभ बनाना होगा।”
समुद्रतट सफाई जैसे अभियान प्रतीकात्मक हैं। असली बदलाव तभी आएगा जब प्रणालीगत सुधार होंगे—नगर निकायों से लेकर उद्योग तक सबको इसमें भागीदार बनाना होगा। भारत के अनौपचारिक कचरा बीनने वाले, जो रीसाइक्लिंग का बड़ा हिस्सा संभालते हैं, अभी तक सुरक्षा, वेतन और सम्मान से वंचित हैं। उन्हें औपचारिक ढांचे में लाना ही होगा।
एनवायरनमेंटलिस्ट डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य चेतावनी देते हैं, “मछलियों और समुद्री नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक मिल चुका है। यह हमारी थाली तक पहुंच रहा है। स्वास्थ्य पर इसके दीर्घकालिक खतरे अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं, लेकिन कैंसर, हार्मोनल गड़बड़ियों और प्रतिरोधक क्षमता पर असर की आशंका गहरी है।” आर्थिक दृष्टि से भी संकट बड़ा है। तटीय राज्यों की आजीविका—मत्स्य उद्योग और पर्यटन—दोनों ही खतरे में हैं। कौन विदेशी पर्यटक गंदगी और कचरे से पटे समुद्रतट देखना चाहेगा?
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रो. पारस नाथ चौधरी मानते हैं कि समाधान दोतरफा है: “हमें उत्पादन भी घटाना होगा और प्रबंधन भी सुधारना होगा। दोनों में संतुलन लाए बिना भारत न तो अपने लोगों की रक्षा कर पाएगा, न ही वैश्विक स्तर पर उदाहरण बन पाएगा।” आज की हकीकत यह है कि प्लास्टिक प्रदूषण ने भारत के पर्यावरण, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य—चारों पर शिकंजा कस लिया है।
अगर अब निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो नदियाँ, समुद्र, पहाड़ ही नहीं—भारत का भविष्य भी इस प्लास्टिक के बोझ तले दब जाएगा।

मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की केंद्रीय मंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात।

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दिल्ली । राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा ने बुधवार को नई दिल्ली में केंद्रीय ऊर्जा, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर से उनके आवास पर भेंट कर राजस्थान में ऊर्जा और आवासन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री से आग्रह किया कि राजस्थान ने नवीकरणीय ऊर्जा निकासी की योजना बनाई है। इस योजना में शामिल परियोजनाओं को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर- थर्ड में शामिल कर केंद्र की तरफ से अधिकतम अनुदान शीघ्र स्वीकृत किया जावे। श्री शर्मा ने कहा कि राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश के महत्वपूर्ण प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं इन प्रस्तावों के क्रियान्वयन हेतु नवीकरणीय ऊर्जा योजनाओं से ऊर्जा की निकासी हेतु सुदृढ़ पारेषण तंत्र की आवश्यकता है जिसके लिए अधिकतम केंद्रीय सहयोग आवश्यक है।

*जयपुर मेट्रो फेज- 2 की स्वीकृति का किया आग्रह।*

मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री से मुलाकात के दौरान आग्रह किया कि जयपुर मेट्रो रेल फेज- 2 का ज्वाइंट वेंचर (50:50)के तहत निर्माण की विस्तृत कार्य योजना को जल्द स्वीकृति प्रदान की जावें। उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण प्रस्तावित परियोजना के लिए केंद्रीय अंशदान की स्वीकृति से जयपुर वासियों के लिए एक सुदृढ़ , सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन की सुविधा प्रदान करने के लक्ष्य को जल्द हासिल किया जा सकेगा।

*नॉन मिलियन प्लस शहरों के लिए केंद्रीय सहयोग पर चर्चा।*

मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री से मुलाकात के दौरान 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत राजस्थान के नॉन मिलियन प्लस शहरों की नगरीय निकायों को दिए जाने वाले केंद्रीय सहयोग पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि इन नगरीय निकायों को प्रदान किए जाने वाले वित्तीय सहयोग से गतिमान विकास कार्यों को जल्द से जल्द पूरा किया जा सकेगा।

मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि राजस्थान सरकार द्वारा एशियन डेवलपमेंट बैंक एवं वल्ड बैंक के संयुक्त वित्त पोषण के माध्यम से संचालित आर यू आई डी पी पांचवें चरण की परियोजना तैयार कर भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत की है जिस पर केंद्रीय मंत्रालय का सकारात्मक सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राजस्थान सरकार इस योजना के माध्यम से जलापूर्ति, अपशिष्ट जल प्रबंधन, ठोस अवशिष्ट प्रबंधन, शहरी यातायात सुधार, बाढ़ प्रबंधन और विरासत संरक्षण सहित प्रदेश के शहरों के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को जल्द से जल्द पूर्ण करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से आग्रह किया कि इस परियोजना की शीघ्र स्वीकृति से राज्य के चहुमुखी विकास में गति आएगी तथा प्रदेश की जनता लाभान्वित होगी।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि राजस्थान में ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं व्याप्त है जिनके सकारात्मक दोहन और उपयोगिता बढ़ाने के साथ-साथ प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के विकास के लिए केंद्रीय सहयोग आवश्यक है इस पर केंद्रीय मंत्री द्वारा राजस्थान को हर संभव मदद का आश्वासन दिया है।

मैने उन्हें भारतीय राजनीति में सफलता का पाठ पढाया था, सत्यनिष्ठा अनिवार्य है

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*आचार्य श्रीहरि*

दिल्ली । गुजरात विधान सभा 2012 की बात है। गुजरात विधान सभा चुनाव के एक नियंत्रक, प्रवेक्षक और विश्लेषक मैं भी था। मेरी जिम्मेदारी चुनाव प्रचार की खामियां, कमजोरियां निकालना था और प्रचार के मुद्दे खोजने थे, चुनाव प्रचारको की उपियोगिता भी देखनी थी। साथ ही साथ मुझे हिन्दी अखबारों और सोशल मीडिया के लिए विश्लेषनात्मक आलेख भी प्रतिदिन लिखने थे। मेरा काय्र्र बहुत ही दुरूह था, भाषा की समस्या थीं, गुजराती से अनभिज्ञ था और अंग्रेजी में हाथ तंग थे। मेरी दिलचस्पी इस विषय में ज्यादा थी कि बाहर से आने वाले नेता कितना चाकचैबंद चुनाव प्रचार करते हैं या फिर हवाहवाई मनोरंजन करते हैं। इसी सर्वेक्षण के दौरान में मुझे सीपी राधाकृष्णन का नाम मालूम हुआ। सीपी राधाकृष्णन को मैं अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल से जानता था, वे 1998 में संसद बने थे। सिर्फ नाम से जानता था और उनसे कभी नहीं मिला था।

नरेन्द्र मोदी की विघान सभा क्षेत्र मणिनगर में अनुराग ठाकुर की सभा थी। उस समय अनुराग ठाकुर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। मैं भी अंकेक्षण के लिए वहां उपस्थित था। उसी दौरान मुझे सीपी चन्द्रशेखर के आने की सूचना मिली। मैं अनुराग ठाकुर की सभा में ही सीपी राधाकृष्णन से मिला। सीपी राधाकृष्णन हिन्दी नहीं जानते थे और न ही उन्हें गुजराती आती थी। दुभाषीय के माध्यम से मेरी उनसे बात होती है। इसी दौरान समाजवादी नेता और राजनारायण के शिष्य क्रांति प्रकाश मिल गये। क्रांति प्रकाश पहले से ही सीपी राधाकृष्णन के घनिष्ठ मित्र थे। मेरीे तारीफ क्रांति प्रकाश ने जमकर की, इस कारण सीपी राधाकृष्णन हमसे प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी सभाओं के लिए मुझे आमंत्रित कर लिया। वे आमंत्रित नहीं करते तो भी मैं उनकी सभाओं में सक्रियता रखता ही, क्योंकि मेरी जिम्मेदारी में वह निहीत था। सीपी राधाकृष्णन की चुनावी दृष्टिकोण और तमिल लोगों को आकर्षित करने के कारक विन्दु को भी मुझे जानना था।
सीपी राधाकृष्णन जब हिन्दी, गुजराती नहीं जानते हैं तब उन्हें गुजरात विधान सभा चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित क्यों किया गया? मेरे मन में बहुत ही क्रोधित करने वाले प्रश्न खडे हो रहे थे। मैंने सीधे भाजपा कार्यालय को फोन लगा दिया। पता चला कि कुछएक वोट तमिल भाषाई लोगों के हैं। इसी कारण उन्हें प्रचार के लिए आमंत्रित किया गया है। सीपी राधाकृष्णन के साथ चुनाव प्रचार के लिए मैं जाता हूं। क्रांति प्रकाश भी साथ रहते हैं। एक तमिल भाषाई कालोनी में जाते हैं जहां पर उनकी सभा रखी गयी थी। पर वहां सभा नाम का कोई चिन्ह और तैयारी नहीं थी। एक मंदिर में बीस-पच्चीस लोग होते हैं। शायद ये तमिल भाषायी मछुआरे और मजदूर थे पर बहुत ही गरीब थे। बीस-पच्चीस लोगों के बीच भी उन्होंने आराम से अपना भाषण तमिल में दिया। मुझे याद है कि उन्होंने कहा था कि व्यक्तिगत लाभ के लिए देश को खतरे में नहीं डालना चाहिए और हमारे लिए देश महत्वपूर्ण है। चूंकि गुजरात सीमावर्ती प्रदेश हैे, इसीलिए पाकिस्तान के निशाने पर है, नरेन्द्र मोदी की वीरता को पराजित करने का अर्थ राष्ट्र की अस्मिता को कमजोर करना होगा। सभा समाप्त होने के बाद हमलोग गांधी आश्रम लौट गये, जहां पर राधाकृष्णन ठहरे हुए थें वहां पर उन्होंने रात में रूकने का आग्रह किया और साथ में खाना भी खाया। रात के काफी देर तक चन्द्रशेखर, मैं और क्रांति प्रकाश देश की राधाकृष्णन और नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक वीरता और सत्यनिष्ठा पर बात करते रहे थे। उनकी बातों से मुझे समझ में आ गया था कि वे राष्ट्रीय स्तर के ज्ञान रखते हैं और हिन्दी नहीं जानने के कारण उनकी राजनीतिक उडान आसमान नहीं छुऐगी। मैने उन्हें महात्मा गांधी का पाठ पढाना जरूरी समझा। मैंने उन्हें सीधे तौर पर कह दिया कि बडा बनना है तो हिन्दी को जानिये, उदाहरण मैं महात्मा गांधी को देता हूं, महात्मा गंाधी हिन्दी भाषी नहीं थे, वे गुजराती थे, लेकिन उन्होंने गुजराती की जगह हिन्दी को अपने संवाद की भाषा बनायी। अगर आप हिन्दी-गुजराती जानते तो इस विधान सभा चुनाव में आपके विचार मीडिया के सिर चढ कर बोलते। यही कारण है कि आपकी सभा के भाषण मीडिया बाजार में धमाका नहीं कर सका। सीपी राधाकृष्णन ने मेरी इस सीख पर सिर्फ इतना कहा था यू आर राइट।
हिन्दी को लेकर उनकी राय स्पष्ट होने से मैं प्रसन्न था। सीपी राधाकृष्णन ने मुझसे कहा कि दक्षिण का हिन्दी विरोध आंदोलन आत्मघाती था, बेवहियात था और अदूरदर्शी था। उनका कहना साफ था कि हिन्दी विरोध का प्रश्न सस्ती राजनीति थी। अपने फायदे के लिए हिन्दी के खिलाफ वातावारण बनाया गया। हिन्दी नहीं जानने के कारण दक्षिण के युवाओं को उत्तर भारत में रोजगार नहीं मिल पाया। रजनीतिज्ञ भी इसका शिकार हुए हैं। हिन्दी नहीं जानने वाले राजनीतिज्ञ अखिल भारतीय स्तर पर अपना जनाधार विकसित नहीं कर पाये। तमिल के राजनीतिज्ञ हिन्दी इलाके मे तो क्या बल्कि कर्नाटक और आध्रप्रदेश में भी विख्यात नहीं हो सके, जहां पर कन्नड और तेलगू का प्रभाव है। उनकी यह समझ बहुत ही चाकचैबंद थी। दक्षिण में सिर्फ तमिल ही नहीं बल्कि कन्नड, मलयालम, तेलगू जैसे मजबूत भाषाएं हैं और इनकी पहचान भी अलग है। इसी के साथ ही साथ राधाकृष्णन अंग्रेजी के प्रति भी आग्रही हैं। अंग्रेजी भाषा का विरोध को भी वे असंगत मानते हैं।
लंबे समय तक राजनीति के मुख्य धारा में होने के बाद भी इनकी पहचान राष्ट्रीय नेता की नहीं बन सकी थी। कारण उपर के तथ्यों में निहित है। एकाएक इनके भाग्य का पिटारा खुलता है और ये राज्यपाल बना दिये जाते हैं। मुझे यह खबर सुनकर अच्छा लगा। सौभाग्य से ये हमारे गृह प्रदेश्ज्ञ झारखंड के राज्यपाल थे। लेकिन मैं ठहरा संत और फक्कड संस्कृति का मनुष्य। किसी के पीछे भागना मुझे अच्छा लगता नहीं है, यह मेरी कार्य संस्कृति का हिस्सा नहीं है। मैंने गुजरात के बाद फिर कभी सीपी राधाकृष्णन से मिलने और बात करने की जरूरत ही नहीं समझी। जब ये झारखंड के राज्यपाल थे तब भी मुझे इनसे बात करने की इच्छा नहीं हुई और न ही मैं कभी गुजरात प्रसंग के इतिहास पर चर्चा करने की जरूरत समझी।
अब ये उप राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। भाजपा ने इन्हें उप राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। भाजपा के पास बहुमत है। इसलिए ये निश्चित तौर पर उपराष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति बनाना भाजपा की दूरदष्टि हैं और नरेन्द्र मोदी का मास्टर पोलिटकल स्ट्रोक हैं। निशाना दक्षिण की राजनीति है, तमिल की राजनीति है। तमिलनाडु की राजनीति में इसका प्रभाव पडने वाला है। तमिलनाडु की राजनीतिक सत्ता द्वार पर भाजपा दस्तक दे रही है, जनाधार लगातार मजबूत हो रहा है। तमिल भाषाई आबादी के बीच नरेन्द्र मोदी और भाजपा के प्रति हमदर्दी बढी होगी और भविष्य में बढेगी। ऐसी उम्मीदो को खारिज करना मुश्किल है।
सीपी राधाकृष्णन को दूरदर्शिता दिखाने की जरूरत होगी। इसके पहले भी भाजपा ने बैेंक्टैया नायडू को उपराष्ट्रपति बनाया था। लेकिन नायडू ने अपनी कोई पहचान नहीं छोड पाये और दक्षिण में भाजपा का कोई लाभ नहीं दिला सके। सीपी राधाकृष्णन को अति महत्वाकांक्षा से मुक्त होना होगा, आत्मघाती बनने की मानसिकता से दूर रहना होगा। राज्य सभा के संचालन में शक्ति प्रदर्शन करने की जरूरत होगी। नरमी घातक होगी। सख्ती की भाषा से ही सदन की गरिमा बचेगी, शांति की उम्मीद बनेगी। इस मंत्र को अपना कर्म बनाना होगा।
हमें गर्व है कि उप राष्ट्रपति के पद पर बैठने जाने वाले सीपी राधाकृष्णन कभी मेरे चुनावी सहचर्य और संवाद के शख्सियत रहे है, मैंने उन्हें हिन्दी की अनिवार्यता और स्वीकारता का पाठ भी पढाया थां। पर मैं जिस तरह गुजरात के बाद फिर कभी सीपी राधाकृष्णन से मिलने और बात करने की जरूरत नहीं समझी उसी तरह से मैं आगे भी उनसे शायद ही मिल पाउंगा या फिर कोई बात कर पाउंगा। क्योंकि मेरा कर्म राजनीति नहीं बल्कि सनातन है। ऐसे भी जब कोई बडी कुर्सी पर बैठ जाता है तो फिर उसकी दृष्टि उपर की ओर हो जाती है, सफल बनना है तो पीछे नहीं आगे देखों की मानसिकता पर सवार हो जाता है।
मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद सीपी राधाकृष्णन के साथ जरूर है। पर ध्यान यह रखना होगा कि कोई बडी कुर्सी मिलने से महान नहीं होता है बल्कि महान राष्ट्र के प्रति समर्पण और सत्य निष्ठा के प्रदर्शन से होता है।

इंस्टाग्राम कॉन्फेशन्स पेज ने बंगलुरू स्कूल में मचाई खलबली

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दिल्ली । साउथ के एक नामी स्कूल में 16 साल की एक लड़की से शिक्षकों द्वारा की गई सामान्य पूछताछ ने डिजिटल युग का एक डरावना सच सामने ला दिया, जिससे छात्रों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की अंधेरी दुनिया उजागर हो गई।

शिक्षकों और प्रिंसिपल द्वारा ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर पूछे गए सवालों ने एक “पिटारा खोल दिया”—जिसमें दर्जनों छात्रों से जुड़ी शिकायतें, अश्लील बातचीत और इंस्टाग्राम के एक “कन्फेशन्स पेज” में शामिल होने के आरोप सामने आए।
तनाव तब और बढ़ गया जब एक फोटो पोस्ट के कारण एक जोड़े का ब्रेकअप हो गया, और फिर कुछ लड़कों ने उस लड़की को धमकियां दीं जिसने तस्वीरें डाली थीं। मामला तेजी से बिगड़ता गया—पैरेंट्स को बुलाया गया, शिक्षक खुद को असहाय महसूस करने लगे, और काउंसलर्स ने चेतावनी दी कि अगर स्थिति नहीं संभाली गई, तो पुलिस और साइबर क्राइम विभाग को शामिल करना पड़ सकता है।
हालांकि, बढ़ते विवाद के बाद भी पैरेंट्स ने शिकायतें वापस ले लीं, क्योंकि वे लंबी कानूनी लड़ाई और बदनामी से डर गए थे। एक अभिभावक ने कहा, “सब बेकार लगा। हमें लगा कि हार मान लेना ही एकमात्र विकल्प है।”
लेकिन यह घटना एक डरावना सबक छोड़ गई है। शिक्षकों ने इसे “आंखें खोल देने वाली घटना” बताया, जबकि काउंसलर्स ने सख्त हस्तक्षेप की जरूरत पर जोर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि पैरेंट्स और स्टाफ एकमत हो गए—अब उनकी मांग है कि स्कूली बच्चों को सोशल मीडिया के खतरों से बचाने के लिए एक **राष्ट्रीय डिजिटल उपयोग नीति बनाई जाए।
सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो ‘लाइक्स’ को असली रिश्तों से ज्यादा अहमियत देती है। अगर जल्द ही कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बनी, तो नुकसान और बढ़ जाएगा।”
क्या हो सकता है समाधान? स्क्रीन टाइम की लिमिट तय करना, डिजिटल लिटरेसी प्रोग्राम चलाना, साइबर सुरक्षा की शिक्षा देना, गलत जानकारी रोकने के अभियान चलाना ।
मानसिक असर: ज़्यादा स्क्रीन टाइम से बेचैनी, नींद की दिक़्क़त, ध्यान की कमी और पढ़ाई में गिरावट।
सोशल मीडिया का जाल: तुलना और वैलिडेशन की दौड़ से बच्चों में डिप्रेशन, बॉडी-इमेज की समस्या और साइबर बुलिंग।
पढ़ाई पर असर: बग़ैर निगरानी डिजिटल टूल्स नकल, ध्यान भटकाने और AI पर ज़्यादा निर्भरता का सबब।
हिंसक गेम्स और एडल्ट कंटेंट: नाबालिग़ बच्चों में वक़्त से पहले परिपक्वता और इंसानी रिश्तों से दूरी।
असमानता: शहरी बच्चों पर डिजिटल ओवरलोड और ग़रीब या देहाती बच्चों पर रिसोर्स की कमी।
ध्यान की कमजोरी: लगातार स्क्रॉलिंग से याददाश्त और फ़ोकस पर नकारात्मक असर।
डेटा का शोषण: टेक्नोलॉजी कंपनियाँ बच्चों का डेटा मुनाफ़े के लिए बेच रही हैं।
ऑनलाइन ख़तरे: स्कैम, फ़िशिंग और Predatory Grooming से बच्चे आसानी से शिकार बनते हैं।
सांस्कृतिक असर: एल्गोरिदम उपभोक्तावाद और एकरूप ग्लोबल कल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे स्थानीय तहज़ीब कमज़ोर हो रही है।
कौशल की कमी: सिर्फ़ स्क्रॉलिंग करने वाले बच्चे डिजिटल इकॉनमी में पिछड़ सकते हैं।
अगर अब भी राष्ट्रीय डिजिटल वेलबीइंग पॉलिसी नहीं बनी तो टेक्नोलॉजी कंपनियाँ बच्चों का बचपन, तालीम और आने वाली शहरी-देहाती ज़िंदगी को अपनी मर्ज़ी से ढालेंगी।
यह सिर्फ़ स्क्रीन टाइम का मामला नहीं—यह पूरी नस्ल की सेहत, मानसिक हालत और पहचान को बचाने का सवाल है।
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