वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा की इंडियन एक्सप्रेस पर नाराजगी, पत्रकारिता पर सवाल

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नई दिल्ली: वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा ने अपने एक्स पोस्ट के माध्यम से इंडियन एक्सप्रेस पर नाराजगी जताई है। शर्मा ने लिखा कि अखबार ने सुप्रीम कोर्ट के आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने के आदेश को प्रमुखता दी, जबकि विपक्ष के स्पीकर (SIR) के खिलाफ संसद के बाहर आंदोलन की खबर को हाशिए पर रखा। सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को दिल्ली-एनसीआर से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश जारी किया, जिसमें 5,000 कुत्तों के लिए आश्रय बनाने की बात कही गई। शर्मा का दुख वास्तविक प्रतीत होता है, लेकिन उनकी लंबे समय से कांग्रेस पार्टी के अनौपचारिक प्रवक्ता के रूप में भूमिका ने इस पर सवाल उठाए हैं।

पिछले कई वर्षों से शर्मा इंडिया गठबंधन की पैरवी करते दिखे हैं, जिससे कुछ लोगों को लगता है कि उनका झुकाव पत्रकारिता से ज्यादा राजनीतिक है। उनके करियर में हिंदुस्तान टाइम्स में लंबा योगदान रहा, जहां उन्होंने अपनी साख बनाई। बाद में वे विभिन्न मंचों, विशेषकर टीवी चैनलों पर सक्रिय रहे। आलोचकों का मानना है कि शर्मा के भीतर एक कारोबारी पहलू सक्रिय हो सकता है, जो उन्हें कांग्रेस की वकालत के लिए प्रेरित करता है। उनका लिंक्डइन प्रोफाइल बताता है कि वे ईटी नाउ में चीफ कॉपी एडिटर और राज्यसभा टेलीविजन में काम कर चुके हैं, जो उनके मीडिया करियर की विविधता को दर्शाता है।

शर्मा का दावा है कि इंडियन एक्सप्रेस, जो रामनाथ गोयनका की स्थापना है और आपातकाल में सेंसरशिप का विरोध कर चुका है, अब अपनी प्राथमिकताओं से भटक गया है। विपक्ष का SIR के खिलाफ प्रदर्शन, जो हाल के चुनावों में वोट रिगिंग के आरोपों से जुड़ा है, को कम कवरेज मिलना भी चर्चा का विषय बना है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि शर्मा की नाराजगी पत्रकारिता की हिफाजत हो सकती है, लेकिन उनका लगातार राजनीतिक पक्षपात इसे संदिग्ध बनाता है।

क्या शर्मा का यह रुख पत्रकारिता के सिद्धांतों की रक्षा है या व्यक्तिगत/व्यावसायिक हितों का विस्तार, यह सवाल अब गहराता जा रहा है। उनकी हिंदुस्तान टाइम्स में बिताई गई लंबी पारी और वर्तमान टीवी उपस्थिति के बीच यह तनाव उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहा है।

दिग्विजय-सिंधिया प्रसंग : इस खूबसूरत पल को थाम लीजिए

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प्रो. मनोज कुमार

भोपाल । राजनीति, समाज और आसपास जब अंधेरा घटाघोप हो रहा हो और ऐसे में कहीं भी एक लौ दिखाई दे तो उस पल को थाम लीजिए. यह लौ अंधेरे को चीर नहीं सकता है लेकिन उम्मीद की किरण के मानिंद हमें भरोसा दिलाता है कि अभी सबकुछ खराब नहीं हुआ है. अभी उम्मीद बाकि है. राजनीति के पटल पर देखते हैं तो यह अंधेरा घनघोर है. ऐसे में एक सार्वजनिक सभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया मंच से उतर कर दिग्विजयसिंह का हाथ थाम कर मंच पर ले जाते हैं. यह महज संयोग नहीं है बल्कि उन दिनों के लौट जाने का संकेत है कि राजनीति में शुचिता शेष है. शेष है एक-दूसरे को सम्मान देने की नियत. लेकिन आनंद लीजिए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया वक्त गंवाए और कोई दूसरा मनोभाव बनाये. मुस्कराते हुए मंच से उतरते हैं. आसपास खड़े लोगों का अभिवादन करते हैं और पूरे अधिकार के साथ दिग्विजयसिंह को मंच पर साथ ले जाते हैं.

यह पल यकिनन स्मृतिकोष में सदैव के लिए अंकित हो जाने वाला है. इस बात पर क्या कोई विमत हो सकता है कि राजनीति में दिग्विजयसिंह वरिष्ठ हैं और ज्योतिरादित्य उनसे कम. मध्यप्रदेश की राजनीति में दिग्विजयसिंह अपने संकल्पों को पूर्ण करने में कभी हिचके नहीं, पीछे हटे नहीं। और ज्योतिरादित्य अधिकार के साथ उन्हें मंच पर ले जाते हैं तो उनका संकल्प टूट जाता है. स्मरण रहे कि कांग्रेस की एक सभा में उन्होंने संकल्प लिया था कि वे मंच पर नहीं बैठेंगे। तब से वे कांग्रेस के मंच से किनारा कर दर्शक दीर्घा में बैठने लगे. ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेसजनों ने उनका मान-मनोव्वल नहीं किया होगा. उन्हें सम्मान देने में पीछे रहे होंगे. सबने अपने हिस्से से दिग्विजयसिंह को मनाने का प्रयास किया होगा लेकिन वे अपने संकल्प पर अडिग रहे. फिर ऐसा क्या हुआ कि वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के आग्रह को टाल नहीं सके? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने आग्रह तो किया ही, अधिकार के साथ उन्हें अपने साथ हाथ पकड़ कर मंच तक ले आए.

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का विषय बन गया. जैसा कि होता आया है राजनीति के मंच पर जब ऐसा कोई प्रसंग आता है तो उसके पीछे की राजनीति तलाश की जाने लगती है. अनेक बार ऐसा होता भी है लेकिन वर्तमान प्रसंग इस बात का संकेत देता है कि ज्योतिरादित्य की यह पहल अपने वरिष्ठ को सम्मान देने की है ना कि राजनीतिक विवशता. इस घटनाक्रम के अगले दिन अखबारों में दिग्विजयसिंह का बयान छपता है कि ज्योतिरादित्य उनके बेटे के समान है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की पहल और दिग्विजयसिंंह का बयान के नीचे या पीछे कोई राजनीति नहीं देखना चाहिए. यूं कि ये महज एक परिवार सा है. सनातनी संस्कृति को समझने और मानने वाले यह समझ सकते हैं कि जब घर के बुर्जुग नाराज होते हैं, रूठ जाते हैं तो यह जिम्मेदारी बच्चों की होती है कि वे उन्हें अधिकारपूर्वक साथ लेकर चलें. उन्हें मनाने या उनसे माफी मांगने की कतई जरूरत नहीं होती है और ना ही वे चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसा करें. ऐसा किया भी जाता है तो यह एक औपचारिक रिश्ते में बदल जाता है. उल्टे गुस्सा कीजिए, नाराज हो जाइए और अधिकार जताइए, आपस की दूरी खत्म हो जाती है. मनोविज्ञान भी यही कहता है और भारतीय संस्कृति में भी यही रिवाज है.

राजनीतिक गलियारे में इस सुखद प्रसंग के बाद चर्चा चल पड़ी, कयास लगाये जाने लगे कि यह सब संयोग नहीं बल्कि राजनीतिक पहल है. यह भी बिना किसी तथ्य, तर्क के यह बात गढ दी गई कि सिंधिया कांग्रेस वापसी चाहते हैं इसलिए यह पहल उन्होंंने की. कुछ ऐसी ही मीमांसा दिग्विजय सिंह के बयान को लेकर की जाने लगी. लिखने और बोलने वालों का आधार क्या है, शायद कोई नहीं जानता. अगर सबने देखा, जाना और समझा तो यह कि यह राजनीति के शह-मात का खेल नहीं बल्कि आपसी शिष्टाचार, सद्भाव और सौम्यता का प्रसंग है. मुश्किल यह है कि समाज का हर वर्ग इस बात से प्रसन्न नहीं होता है कि आज कुछ सुखद हो रहा है तो उसे आगे बढ़ायें ना कि क्लेश की जमीन को विस्तार दें. जब राजनीति में शुचिता की बात होती है तब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं. अनेक पुराने प्रसंग और घटनाओं को बताते हैं कि देखो, वो समय कैसा था. और आज जब उन पुराने प्रसंगों, घटनाओं का किंचचित मात्र बेहतर हो रहा है तो हम उनके बीच हुई कुछ कड़ुवाहट को सामने ले आते हैं. क्या हम थोड़ी देर के लिए इस मकबूल वक्त में खो नहीं सकते हैं. माना कि राजनेताओं की राजनीति अपने अस्तित्व को लेकर होती है तो सवाल यह है कि वे सारी मेधा, सारी मेहनत समाज को आगे बढ़ाने के लिए ही तो कर रहे हैं. निश्वित रूप से वे व्यक्तिगत छवि को निखारना चाहते हैं और वे ताकतवर होंगे, तभी वे समाज हित में, राष्ट्रहित में, राज्य में कुछ ठोस कर पाएंगे. मैं राजनीति का ककहरा नहीं जानता हूं लेकिन यह भी जानता हूं कि राजनीति है, यहां कुछ भी संभव है. और यह कोई नया नहीं है. भविष्य में क्या होगा, कैसे होगा, कोई नहीं जानता लेकिन बर्फ पिघल रही है तो पिघल जाने दीजिए. इस घटाघोप अंधेरे में इस बाती को प्रज्जवलित होने दीजिए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

WNBA कोर्ट पर सेक्स टॉय विवाद

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फीनिक्स, एरिज़ोना: हाल ही में WNBA (विमेन्स नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन) के खेलों में कोर्ट पर सेक्स टॉय फेंके जाने की घटनाएँ चर्चा में हैं। एक क्रिप्टोकरेंसी मेम कॉइन समूह, जिसने “ग्रीन डिल्डो कॉइन” (DILDO) बनाया, ने इन घटनाओं की जिम्मेदारी ली है। USA TODAY के अनुसार, यह समूह, जिसका प्रवक्ता

@Daldo_Raine
के नाम से जाना जाता है, का कहना है कि ये हरकतें क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया में “विषाक्त” माहौल और प्रभावशाली लोगों व स्कैमर्स के दबदबे के खिलाफ विरोध के रूप में की गईं। समूह का दावा है कि 28 जुलाई को लॉन्च हुए उनके मेम कॉइन को प्रचारित करने के लिए ये “मजाक” किए गए, जो हरे रंग के सेक्स टॉय को ट्रेडिंग चार्ट में “हरी मोमबत्ती” (मूल्य वृद्धि का प्रतीक) से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि इनका इरादा महिला खिलाड़ियों का अनादर करना नहीं, बल्कि ध्यान आकर्षित करना है। समूह ने भविष्य में “हल्के” और “स्वादपूर्ण” प्रैंक की योजना बनाई है।

दूसरी ओर, WNBA खिलाड़ी, कोच, और प्रशंसक इन घटनाओं से नाराज हैं। पिछले दो हफ्तों में सात ऐसी घटनाएँ हुईं, जिनमें से चार में सेक्स टॉय कोर्ट पर पहुँचे। लॉस एंजिल्स स्पार्क्स की कोच लिनी रॉबर्ट्स ने इसे “हास्यास्पद” और “खतरनाक” बताया, जो खिलाड़ियों की सुरक्षा को जोखिम में डालता है। इंडियाना फीवर की सोफी कनिंघम ने भी इसे अस्वीकार्य कहा। WNBA ने बयान जारी कर कहा कि कोर्ट पर वस्तु फेंकने वालों को तत्काल निष्कासित किया जाएगा और कम से कम एक साल का प्रतिबंध लगेगा, साथ ही कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। दो लोगों, काडेन लोपेज और डेलबर्ट कार्वर, को इन घटनाओं में गिरफ्तार किया गया, लेकिन समूह ने दावा किया कि वे उनके साथ संबद्ध नहीं हैं।
ये घटनाएँ खेल की गरिमा और खिलाड़ियों की सुरक्षा पर सवाल उठाती हैं। समूह इसे मजाक कहता है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह महिला खिलाड़ियों के प्रति असम्मान और मेम कॉइन की कीमत बढ़ाने का प्रयास हो सकता है, जिसकी कीमत हाल ही में 309% बढ़ी। WNBA और प्रशंसक इसे गंभीरता से ले रहे हैं, जबकि समूह इसे हल्का-फुल्का प्रोटेस्ट बताता है।

राहुल और मुनीर के लिए मुकेश अंबानी बने एक सियासी सर्कस

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कहानी है दिल्ली की गलियों और इस्लामाबाद के गलियारों की, जहाँ राहुल गांधी और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर एक अनोखे मिशन पर जुटे हैं—मुकेश अंबानी को निशाना बनाना! अब यह कोई बिजनेस डील नहीं, बल्कि एक सियासी सर्कस है, जहाँ दोनों अपने-अपने ढोल पीट रहे हैं। राहुल जी, जो हर बार “सूट-बूट की सरकार” का राग अलापते हैं, ने अंबानी को देश की अर्थव्यवस्था का “चोर” घोषित कर दिया। दूसरी ओर, जनरल मुनीर, जिन्हें शायद भारत की GDP से ज्यादा जलन है, कहते हैं, “अंबानी की दौलत हमारे ड्रोन से ज्यादा खतरनाक है!”

ये दोनों मिलकर क्या रच रहे हैं? एक सियासी षडयंत्र, जिसमें अंबानी का नाम तो बस बहाना है। राहुल जी को लगता है कि अंबानी को कोसने से वोटों का जखीरा खुल जाएगा, और मुनीर साहब को उम्मीद है कि भारत को बदनाम करने का नया मौका मिलेगा। पर सच्चाई? दोनों के पास न स्क्रिप्ट है, न डायलॉग! बस एक-दूसरे की नकल में लगे हैं। राहुल कहते हैं, “अंबानी ने देश को लूटा!” मुनीर तपाक से बोलते हैं, “हाँ, और वो हमारी सीमा पर भी नजर रखता है!” अरे भाई, सीमा पर तो तुम्हारे ड्रोन भी फेल हैं, अंबानी का क्या लेना-देना?

इस ड्रामे में ट्विस्ट तब आता है, जब दोनों की मुलाकात ट्विटर की गलियों में होती है। राहुल का ट्वीट: “अंबानी का एकाधिकार खत्म करो!” मुनीर रीट्वीट करते हैं: “बिलकुल, भारत की दौलत चुराने वाला!” जनता हैरान, पर सर्कस चलता रहता है। अंत में, दोनों एक-दूसरे को बधाई देते हैं, लेकिन अंबानी? वो तो अभी भी अपने जियो टावर से हँस रहे हैं।

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