हिड़मा के शव पर अर्बन नक्सलियों का शृगाल विलाप

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~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

छत्तीसगढ़ के बस्तर समेत कई राज्यों के निरपराध लोगों के ख़ून से रत्नगर्भा धरती को रक्तरंजित करने वाले माओवादी आतंकी ‘हिड़मा’ को सुरक्षाबलों ने मार गिराया। 18 नवंबर 2025 को लाल आतंक का पर्याय हिड़मा मारा गया। इसके चलते जहां देशभर में ख़ुशी का वातावरण है। बस्तर समेत समूचा वनांचल जहां उसके आतंक का खौफ़ व्याप्त था। वहां के लोग सुकून की सांस लेने लगे। क्योंकि हिड़मा का मारा जाना माओवादी आतंक के सबसे मज़बूत किले का ढह जाना है। बस्तर में स्थायी शांति की बहाली का संकेत है। इसी बीच छग सरकार ने सदाशयता और मानवीयता दिखलाई। 20 नवंबर को हिड़मा और उसकी माओवादी पत्नी के शव को अंतिम संस्कार के लिए उसके गांव पूवर्ती भेजा। शव आने की ख़बर के साथ ही माओवादियों का अर्बन माड्यूल तुरंत एक्टिवेट हुआ। पूरे लाव-लश्कर के साथ कई टीमें पूवर्ती पहुंचने लगीं।कुछ लोग जो जहां जिन संस्थानों में बैठे हैं। वहां की-बोर्ड में माओवादी बारुद के साथ अलर्ट मोड में बैठ गए। देरी थी बस कुछ एक्सक्लूसिव तस्वीरों, भावुकता भरे वीडियोज, कुछ लोगों के स्क्रिप्टेड वर्जन (वर्सन)। ये इनपुट जैसे ही मिले सियारों का रुदन तुरंत चालू हो गया। अर्बन नक्सल गिरोह के सिपाही हिड़मा के अंतिम संस्कार के नाम पर सहानुभूति बटोरने। उसे ग्लोरीफाई करना शुरू कर दिया।

कामरेड के नाम पर उसके ऊपर काले कपड़ों वाली वर्दी रखी गई। अर्बन नक्सली ‘नक्सलवाद कभी ख़त्म न होने की’ बात कहते नज़र आए। भावनाओं को भुनाने के लिए ये नैरेटिव सेट किया गया कि— फला-फला फूट-फूटकर रोया। ये मिथ्यारोप लगाए गए कि “हिड़मा तो सरेंडर करने आया था। जवानों ने उसका नाहक में एनकाउंटर कर दिया।”— ये सब कितना सोचा समझा नैरेटिव है न? हिड़मा को ऐसा पेश किया जा रहा है कि जैसे वो कोई मासूम दुधमुंहा बच्चा रहा हो।

जबकि हिड़मा ये वही माओवादी आतंकी है जिस पर 6 राज्यों ने तक़रीबन 1.80 करोड़ का ईनाम रखा था। हिड़मा जिसने ख़ुद 127 हत्याएं की थी। 600 माओवादी-नक्सलियों का जो हेड था। वो हिड़मा जिसने बस्तर के सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा। जनजातीय समाज के जीवन की खुशियां छीन ली। सालों से सुरक्षाबलों के जवानों, राजनेताओं सहित न जाने कितने निरपराधों की हत्या करता आया।

ये वही हिड़मा है जिसने छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में सैकड़ों जवानों की हत्या की। सैकड़ों जवानों की हत्या की साज़िशें रची। मई 2013 का झीरम घाटी कांड जिसमें कांग्रेस के कद्दावर नेता महेंद्र कर्मा समेत कई नेताओं की हत्या कर दी गई। उस दौरान सुरक्षाकर्मियों समेत कुल 33 लोगों की हत्या हुई थी। इसका मास्टरमाइंड हिड़मा ही था। हालांकि महेन्द्र कर्मा की हत्या और झीरम घाटी कांड के पीछे कुछ कांग्रेस के नेताओं द्वारा साज़िश रची जाने की बातें भी सुर्खियां बनीं थीं।
हिड़मा जिसमें अहम किरदार था। इन बातों में कितनी सच्चाई थी याकि अफ़वाह थी। इसका कोई अंतिम सत्य अभी तक आया नहीं है। इससे पहले इसी हिड़मा के नेतृत्व में — 2010 में दंतेवाड़ा में एक यात्री बस को बम के धमाकों से उड़ा दिया था। दंतेवाड़ा बस कांड में 20 जवानों समेत कुल 50 लोग मारे गए थे।

बस्तर क्षेत्र में हिड़मा जैसे माओवादी आतंकियों का कितना भय व्याप्त है। ये मैंने क़रीब से अनुभव किया है। 2024 में गर्मी के महीने में दंतेवाड़ा जाना हुआ। वहां के कुछ सुदूर ग्रामीण इलाकों में गया। एक राजनेता के घर ठहरना तय था। इसलिए उनके यहां गया। जब रास्ते से गुजर रहा था तो उन्होंने कई ऐसी जगहें दिखाई, जहां नक्सलियों ने ख़ूनी खेल रचा था। बीच रास्ते में जवानों की एंबुस लगाकर हत्या की थी। मेले से वापस लौट रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्थानीय लोगों की माओवादी आतंकियों ने क्रूरता के साथ हत्याएं की थी । IED लगाकर वाहन सहित उड़ा दिया था।

आख़िर में जब मैं उनके घर पहुंचा तो थोड़ा अचंभित हो गया। क्योंकि उनके घर में सुरक्षा के लिए कई ज़वान तैनात थे। उनके भाई अगर घर से बाहर निकलेंगे तो उनकी सुरक्षा में ज़वान साथ-साथ चलेंगे। शाम को एक निश्चित समय के बाद वो घर से बाहर कतई नहीं निकल पाएंगे।— जब मैंने उनसे इस संदर्भ में पूछा तो उन्होंने बताया कि – हम हर समय माओवादियों के निशाने पर हैं। साथ ही उन्होंने कई घटनाओं का जिक्र भी किया। जब वो और उनके परिवार के लोग माओवादियों को चकमा देकर सुरक्षित बचे थे।….इस वाकिए को बताने के पीछे का आशय ये है कि — नक्सलवाद-माओवादी आतंकवाद कितना खौफनाक है। इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। जिसने आम जनजीवन को तबाह कर दिया हो। निरपराधों के ख़ून से पूरे बस्तर को लथपथ कर दिया हो। उस नक्सलवाद-माओवाद के प्रति क्या कोई सहानुभूति हो सकती है?

ऐसे में हिड़मा के शव और उसकी मौत को लेकर
जो लोग आंसू बहा रहे हैं। उनके मंसूबे क्या किसी से छिपे हैं? उस दुर्दांत माओवादी आतंकी की मौत पर मातमपुर्सी, संवेदनाओं का खेल रचना सबकुछ अर्बन नक्सलियों की स्क्रिप्ट का हिस्सा ही मालूम पड़ रहा है। ये सब इसलिए किया गया ताकि हिड़मा के नाम पर लोगों को बरगलाया जा सके। देश और विदेश में छुपे भारत-विरोधी-जनजातीय समाज के विरोधी — आकाओं को ख़ुश किया जा सके। क्योंकि अर्बन नक्सलियों के लिए यही तो फायदे का धंधा है।

वैसे इन अर्बन नक्सलियों को क्या कभी आपने
उन जवानों के नाम पर कभी आंसू नहीं बहाते देखा है जिन्हें हिड़मा और उसके साथियों ने मौत के घाट उतार दिया। जो ‘की-बोर्ड’ के क्रांतिकारी
और तथाकथित ‘मुखौटाधारी’ — हिड़मा को हीरो बनाने में जुटे रहे। मानवीय संवेदनाओं भरी स्टोरीज लिखते रहे। भावुकता भरे स्क्रिप्टेड वीडियो क्लिप जनरेट करते रहे। जबरदस्ती माइक ठूंसकर—संवेदनाओं की बयार बहाने में पूरी ताक़त झोंक दी। हिड़मा के अंतिम संस्कार के समय ऐसा चित्रित करते रहे। जैसे हिड़मा कोई महान नायक रहा हो। जबकि उसका पूरा जीवन क्रूर आतंक का पर्याय है। बल्कि छग के राजनांदगांव में इन्हीं माओवादियों से लोहा लेने वाले हॉक फोर्स के बलिदानी — आशीष शर्मा पर इनकी नज़र ही नहीं गई। नरसिंहपुर के बोहानी गांव में उनका भी 20 नवंबर को ही अंतिम संस्कार हुआ।

बात इतनी ही नहीं है..जो हिड़मा की— माँ के नाम पर संवेदनशीलता का प्रशस्ति गान कर रहे थे। वो ये क्यों भूल जाते हैं कि —वो हिड़मा जो अपनी माँ का कभी नहीं हुआ और जिसने माओवाद के ज़हर के चलते पूरे परिवार को कष्ट दिया। अपनी माँ समेत न जाने कितनी माँओं के सपनों को उजाड़ दिया। वो माओवादी आतंकी ‘हिड़मा’ जिसने न जाने कितनी महिलाओं के सुहाग उजाड़े, किसी के भाई, किसी के बेटे को थोक के भाव मौत के घाट उतारा। क्या उन पीड़ितों के लिए इन अर्बन नक्सलियों की आंखों से कभी आंसू बहे थे?

वस्तुत: ये वही ‘अर्बन नक्सली’ हैं जिन्होंने हिड़मा जैसे न जाने कितने लोगों को ‘माओवादी आतंकी’ बनाया। विदेशी आकाओं के इशारों पर भारत की धरती को रक्तरंजित करने के लिए बस्तर के जनजातीय समाज के युवाओं, महिलाओं का ब्रेनवाश किया। उनके हाथों में किताब की बजाय। हथियार थमा दिया। ताकि छत्तीसगढ़ के बस्तर समेत लाल गलियारा कहे जाने वाले हिस्सों में विकास न पहुंच पाए। बस्तर अंचल के लोग सुख-शांति और समृद्धि के साथ न रह सकें।

अब हिड़मा की लाश पर माओवादी गिद्ध अपनी खोई हुई ज़मीन तलाश रहे हैं। हिड़मा जैसे क्रूर दुर्दांत अपराधी के नाम पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि अब न तो जंगल में छिपे नक्सली-माओवादी बचने वाले हैं। न ही मुखौटा लगाकर राष्ट्र घात करने वाले अर्बन नक्सली बचेंगे। बस इसीलिए वो हिड़मा के बहाने अपनी माओवादी आतंकी की ज़मीन को बचाने की अंतिम कोशिश में जुटे हैं।

कुछ ऐसी कर्कश खूनी आवाज़ें भी सुनाई दीं। जो ये कहती नज़र आईं कि – ‘हम हिड़मा की मौत पर कोर्ट में लड़ाई लड़ेंगे’। अचानक से ये कवर फायरिंग का आइडिया कहां से आया भाई? हिड़मा जैसे माओवादी आतंकी, जो देश के कानून और व्यवस्था को ही नहीं मानते रहे हैं। जो भारतीय राज्य के ख़िलाफ़ घोषित तौर पर युद्ध मैदान में उतरे हैं। उनके लिए कोर्ट, कानून और मानवाधिकार कहां से आ गए ? क्या ये अर्बन नक्सली भूल गए कि — इसी 15 अगस्त 2025 को कांकेर में स्वतंत्रता दिवस मनाने। तिरंगा फहराने के विरोध में माओवादियों ने जन अदालत लगाई थी। जनजातीय समाज के मनीष नुरेटी की बर्बरतापूर्ण ढंग से हत्या की थी। तिरंगा तो भारत का राष्ट्रध्वज है न ! …तो जिन माओवादी आतंकियों के लिए तिरंगा फहराना अपराध होता है। वो कोर्ट के दरवाज़े जाने की बातें कह रहे हैं? स्पष्ट है कि जब माओवादी आतंकियों का जंगल से खात्मा होगा। उस समय अर्बन नक्सलियों का बिलबिलाना। मानवता पर ख़तरे का नैरेटिव खड़ा करना। जल-जंगल-जमीन के नाम पर रक्तपात के लिए ब्रेनवाश करना। जनभावनाओं को उकसाना। स्वाभाविक है। आख़िर ये सब कवर फायरिंग के ही तो तौर तरीके हैं न। अगर हिड़मा से इतना ही प्यार था तो उसे सरेंडर करवा देते। जैसे सैकड़ों की संख्या में दूसरे माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। उसे भी ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025’, नियद नेल्लानार योजना और ‘पूना मारगेम-पुनर्वास का लाभ मिल जाता। क्योंकि ‘मोदी और साय’ के नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार हर हाल में ‘नक्सलवाद-माओवाद’ के खात्मे के लिए संकल्पित है। आत्मसमर्पण करेंगे तो पुनर्वास मिलेगा।‌ रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत किया जाएगा। अन्यथा आतंकियों को नरकवास मिलना तय है। क्योंकि राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिए चप्पे-चप्पे पर प्रखर राष्ट्रभक्त ज़वान तैनात हैं। जो लाल आतंक का समूलनाश किए बिना चैन से नहीं बैठने वाले हैं।

जय जोहार..

बिहार विधान सभा चुनाव दे रहे हैं कुछ संकेत

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ग्वालियर । हाल ही में सम्पन्न हुए बिहार राज्य की विधान सभा के चुनाव परिणाम आ गए हैं एवं भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। कुल 243 विधायकों में से एनडीए गठबंधन के 202 प्रत्याशी चुनाव जीत कर विधायक बन गए हैं। विधान सभा स्तर के किसी भी चुनाव में सामान्यतः राज्य स्तर की स्थानीय समस्याओं को ध्यान में रखकर ही राज्य के नागरिक अपना वोट देते हैं। परंतु, हाल ही के समय में कई राज्यों के चुनावों में स्थानीय नागरिकों के बीच यह प्रवृत्ति घर करती जा रही है कि जो राष्ट्रीय अथवा स्थानीय दल उन्हें मुफ्त की आकर्षक योजनाएं प्रस्तुत कर रिझाने का प्रयास करता है, उस दल को उस राज्य में अधिक सफलता मिलती हुई दिखाई दे रही है। इस प्रवृत्ति का स्पष्ट संकेत दिल्ली राज्य में वर्ष 2013 में सम्पन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में, केवल एक वर्ष पूर्व गठित नए दल, आम आदमी पार्टी के इस विधान सभा चुनाव में 28 सीटों की जीत पर दिखाई दिया था। उस समय आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बनाई थी। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली निवासियों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का वायदा इन चुनावों के दौरान किया था, जिसे बाद में पूरा भी किया गया था। इसके बाद तो दिल्ली विधान सभा चुनाव में वर्ष 2025 तक आम आदमी पार्टी का ही लगभग पूर्ण कब्जा रहा, क्योंकि मुफ्त में प्रदान की जाने वाली इसी प्रकार की कुछ और घोषणाओं को भी आम आदमी पार्टी समय समय पर लागू करती रही और दिल्ली के पढ़े लिखे नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रही। हालांकि, इस बीच दिल्ली की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती रही और दिल्ली का “बचत का बजट” – “घाटे के बजट” में परिवर्तित हो गया था।

इसके बाद तो लगभग प्रत्येक राज्य में इस प्रकार का दौर ही चल पड़ा। हिमाचल प्रदेश राज्य में कांग्रेस, सेवा निवृत्त कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को लागू करने के वादा, राज्य की प्रत्येक वयस्क महिला को 1500 रुपए देने का वादा एवं प्रत्येक परिवार को 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का वादा कर वर्ष 2022 में सत्ता में आ गई। बाद में जब पुरानी पेंशन योजना को हिमाचल प्रदेश में लागू किया गया तो हिमाचल प्रदेश के पहिले से ही दबाव में चल रहे बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ा एवं राज्य की आर्थिक स्थिति लगभग पूर्णत: डावांडोल हो गई है एवं राज्य को अपने ऋण पर ब्याज का भुगतान करने एवं राज्य के सामान्य खर्चों को चलाने के लिए भी ऋण लेना पड़ रहा है।

इसी चलन को कायम रखते हुए हाल ही में सम्पन्न बिहार राज्य में भी विधान सभा चुनाव के समय श्री नीतीश कुमार की राज्य सरकार ने राज्य की 1.21 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में 10,000 रुपए की राशि सीधे जमा करवाई है। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की घोषणा 29 अगस्त 2025 को की गई थी एवं केवल एक माह के अंदर इस योजना को लागू कर दिया गया तथा राज्य की महिलाओं के बैंक खातों में राशि हस्तांतरित कर दी गई। हालांकि, राज्य में लागू की गई इस योजना को महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी पहल के रूप में देखा गया क्योंकि राज्य सरकार द्वारा इस योजना को लागू करने का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना एवं रोजगार के नए अवसर निर्मित करना था। ऐसा बताया गया है कि राज्य की कुछ महिलाओं ने इस राशि से अपनी छोटी छोटी उत्पादन इकाईयों को प्रारम्भ करने में सफलता पाई है। राज्य के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि बिहार सरकार उन महिलाओं को रुपए 2 लाख तक की सहायता राशि उपलब्ध कराएगी जिनका व्यवसाय सफल रहेगा, इस छोटे निवेश से पूरा परिवार लाभान्वित होगा। बिहार राज्य में लगभग 1.40 करोड़ जीविका दीदियां स्व सहायता समूहों के माध्यम से सक्रिय हैं। आज देश के सबसे बड़े राज्यों में बिहार राज्य में गरीब वर्ग के नागरिकों की संख्या सबसे अधिक है एवं बिहार राज्य के नागरिक रोजगार प्राप्त करने के उद्देश्य से सबसे अधिक पलायन करते हुए दिखाई देते हैं। पूर्व में उत्तर प्रदेश राज्य की भी लगभग यही स्थिति थी, परंतु, हाल ही के समय में उत्तर प्रदेश राज्य में रोजगार के पर्याप्त नए अवसर निर्मित हुए हैं जिससे इस राज्य में नागरिकों का रोजगार के लिए पलायन रुका है। यदि बिहार राज्य भी अपने नागरिकों का पलायन रोकने में सफल रहता है एवं अपने राज्य के नागरिकों के लिए पर्याप्त मात्रा में रोजगार के नए अवसर निर्मित करने में सफलता प्राप्त करता है तो यह देश के आर्थिक विकास को भी गति देने में सहायक होगा। परंतु, लाख टके का प्रश्न यह है कि क्या बिहार सरकार की आर्थिक स्थिति उक्त प्रकार की योजनाओं को चलाने की स्थिति में है?

इसी प्रकार, मध्य प्रदेश राज्य भी लाड़ली बहिना योजना को लागू कर चुका है एवं इसी तर्ज पर हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, आदि राज्यों में भी नागरिकों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजनाएं प्रारम्भ की गई। तमिलनाडु में तो मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध कराने का पुराना इतिहास रहा है। कुछ राज्यों में तो टीवी, लैपटॉप, स्कूटी, साइकल, आदि जैसे महंगे उत्पाद भी चुनावों के समस्त राज्य के नागरिकों को मुफ्त में उपलब्ध कराए जाते रहे हैं। विभिन्न राज्यों द्वारा यदि चुनाव जीतने के लिए राज्य के नागरिकों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने का क्रम यदि जारी रहता है तो यह प्रचलन इन राज्यों एवं देश के लिए उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि आज सब्सिडी, वेतन, पेन्शन एवं ब्याज जैसी मदों पर लगातार बढ़ रहे खर्चों के कारण 15 राज्यों का बजटीय घाटा कानूनी रूप से निर्धारित 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर हो गया है। हिमाचल प्रदेश में बजटीय घाटा बढ़कर 4.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.1 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 4.2 प्रतिशत एवं पंजाब में 3.8 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के कई राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च को घटाया है। वर्ष 2015-16 से वर्ष 2022-23 के बीच राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च में 51 प्रतिशत तक की कमी की है। दिल्ली में 38 प्रतिशत, पंजाब में 40 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 41 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 33 प्रतिशत से पूंजीगत खर्चों में कमी दर्ज हुई है। आज कई राज्य सरकारें सब्सिडी प्रदान करने की मद पर अपने खर्चों को लगातार बढ़ा रहीं हैं एवं पूंजीगत खर्चों को लगातार घटा रही हैं, जो उचित नीति नहीं कही जा सकती है। इस प्रकार तो इन राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं शीघ्र ही डूबने के कगार पर पहुंच जाने वाली हैं।

अब यदि चुनाव जीतने के लिए विभिन्न राज्य सरकारें क्या इसी तरह की योजनाओं को लागू करती रहेंगी। यदि हां, तो इन राज्यों को अपने दिवालिया होने के लिए बहुत लम्बा इन्तजार नहीं करना होगा। क्योंकि, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि विशेष रूप से पंजाब, केरल, पश्चिमी बंगाल, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार, दिल्ली आदि राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। यदि समय पर इन राज्यों के आर्थिक ढांचे को सुधारने के प्रयास नहीं किया गए तो यह राज्य दिवालिया होने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि, समय समय पर केंद्र सरकार द्वारा सहायता की राशि उपलब्ध कराकर कई राज्यों की वित्तीय कठिनाईयों को हल करने का प्रयास किया जाता है परंतु, केंद्र सरकार भी लम्बे समय तक यह कार्य नहीं कर सकती है क्योंकि अंततः इससे केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी दबाव बनता है।

विभिन्न राज्यों के वित्तीय घाटे की स्थिति एवं प्रवृत्ति पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर इस पर रोक लगने का समय अब आ गया है। उत्पादक कार्यों पर सब्सिडी दी जाय तो ठीक है परंतु यदि यह लोक लुभावन वायदों को पूरा करने पर दी जा रही है तो इन पर अब अंकुश लगाया जाना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़कर इस सम्बंध में कुछ नियम जरूर बनाए जाने चाहिए। यदि इन राज्यों की वित्तीय स्थिति लोक लुभावन घोषणाओं को पूरा करने की नहीं है तो, इस प्रकार की घोषणाएं चिन्हित राज्यों द्वारा नहीं की जानी चाहिए, ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए। सहायता की राशि केवल चिन्हित व्यक्तियों को ही प्रदान की जानी चाहिए न कि राज्य की पूरी जनता को उपलब्ध करायी जाय। जैसा कि बिजली माफी योजना के अंतर्गत किया जा रहा है। राज्य के समस्त परिवारों को 300/400 यूनिट बिजली मुफ़्त में उपलब्ध कराए जाने के प्रयास हो रहे हैं। यदि राज्य की आर्थिक हालत बिगड़ रही है तो इसका खामियाजा भी अंततः उस प्रदेश की जनता को ही भुगतना पड़ता है। यह राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आदि मदों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं, जो राज्य के आर्थिक विकास एवं भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए ठीक नहीं है। राज्य में आर्थिक विकास की गति कम होने से इन राज्यों में रोजगार के अधिक अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे है।

Rohini Acharya vs Kanhaiya Bhallari: TV Debate Turns Ugly, Mother Dragged into Personal Attack

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Patna: A prime-time television debate in Bihar has spiralled into a major controversy after Rashtriya Janata Dal (RJD) leader and Rajya Sabha MP Rohini Acharya, daughter of Lalu Prasad Yadav, launched a scathing personal attack on Patna-based journalist Kanhaiya Bhallari. In a widely circulated clip, Acharya said, “The mother of someone like Kanhaiya Bhallari must be ashamed for giving birth to a son like him.”

The remark came in response to Bhallari’s earlier on-air comment about Acharya: “She should stay in her husband’s home (sasural) instead of coiling up in her father’s house (maayka).” Acharya first silenced him during a phone call in which, according to the leaked audio that went viral, Bhallari could only manage repeated “ji… ji…” (yes… yes…). Later, on the same show, she escalated the attack by bringing his mother into the row.

Roots of the Controversy
During the 2024 Lok Sabha elections, several BJP spokespersons openly accused Kanhaiya Bhallari of working as a “paid journalist” for the RJD. They claimed that Rajya Sabha member Sanjay Yadav allegedly facilitated his appearances on national channels, and that throughout the Bihar campaign, Bhallari effectively acted as an RJD mouthpiece. He repeatedly referred to Lalu Prasad as his “friend” on air.

However, once Rohini Acharya announced her candidature from Saran, Bhallari’s tone changed dramatically. He used terms like “naagin” (female serpent) and questioned the “publicity stunt” around her kidney donation to her father. Acharya hit back sharply: “People like you wouldn’t donate even a bottle of blood to anyone.”

21st-Century Feudal Dictate?
Bhallari’s comment that a married woman should remain in her in-laws’ house and not “sit coiled” in her parental home drew widespread outrage. Women’s rights activists and social media users branded it outright feudal and patriarchal. One prominent tweet read: “Self-proclaimed progressives are now issuing fatwas on where a woman should live.”

Silence from Bhallari, Mixed Reactions in RJD Camp
Kanhaiya Bhallari has remained silent since the episode. Sources close to him say he wishes to “maintain dignity” and will not respond even after his mother was targeted. Within the RJD, opinions are divided: some see Bhallari as a “turncoat who bit the hand that fed him,” while others feel Acharya crossed the line by making it deeply personal.

Debate Over Decency vs Freedom of Expression
While thousands of women have rallied behind Rohini Acharya for defending female dignity, several journalists’ bodies have condemned the dragging of a mother into a public spat. The Bihar Working Journalists’ Union issued a statement: “Personal life and family should never be weaponised in debates, no matter who is at fault.”

The row shows no signs of dying down. Hashtags such as #WhoseShame and #DontDragMothers are trending across platforms. Once again, Bihar’s political discourse has proved that television debates have degenerated from policy discussions into arenas of personal vilification and abuse.

टीवी डिबेट में मर्यादा की सारी हदें पार, माँ को घसीटा गया विवाद में

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पटना। बिहार की राजनीति में एक टीवी डिबेट ने नया बवाल खड़ा कर दिया है। कन्हैया भेल्लारी को पड़े इस डांट के पीछे एक दिन पुरानी टीवी डिबेट है। जिसमें भेल्लारी ने रोहिणी के लिए कह दिया के वे अपने मां बाप के घर पर कुंडली मारकर बैठ गई हैं।

इस बयान को सुनने के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी और राज्यसभा सांसद रोहिणी आचार्य ने अपना आपा खो दिया और पटना के विवादास्पद पत्रकार कन्हैया भेल्लारी पर बेहद तीखा व्यक्तिगत हमला बोलते हुए कहा कि “कन्हैया भेल्लारी जैसे बेटे को जन्म देकर उनकी माँ को शर्मिंदगी महसूस हो रही होगी।”

यह बयान एक निजी न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम शो में आया, जब कन्हैया भेल्लारी ने रोहिणी आचार्य पर टिप्पणी की थी कि “वे अपने पति के घर (ससुराल) में रहें, मायके में कुंडली मारकर क्यों बैठी हैं?” इसके जवाब में रोहिणी ने पहले फोन पर कन्हैया को खूब खरी खोटी सुनाया। दूसरी तरफ कन्हैया इतना सब सुनने के बाद जी, जी के अलावा कुछ बोल नहीं पा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि रोहिणी ने उनके झूठ को पकड़ के सार्वजनिक तौर पर उन्हें नंगा कर दिया हो। उस कॉल का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। कन्हैया को डांटते हुए इसी वायरल आडियो में रोहिणी ने कहा — कन्हैया भेल्लारी की मां को शर्म आ रहा होगा उनके जैसा बेटा पैदा करके।

विवाद की जड़

चुनाव के दौरान कन्हैया भेल्लारी पर आरोप लगे थे कि वे राजद के इशारे पर काम करते हैं। कई भाजपा प्रवक्ताओं ने खुलेआम कहा था कि राज्यसभा सदस्य संजय यादव के पे-रोल पर रहते हुए भेल्लारी ने पूरे लोकसभा चुनाव में बिहार में राजद की फील्डिंग की। लालू प्रसाद को वे बार-बार “मित्र” बताते रहे। लेकिन जैसे ही रोहिणी आचार्य ने सारण से चुनाव लड़ने की घोषणा की, भेल्लारी ने उन पर व्यक्तिगत टिप्पणियाँ शुरू कर दीं। उन पर सोशल मीडिया पर “नागिन”, “कीड़नी दान का ढोंग” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। रोहिणी ने पलटवार में कहा, “आप जैसे लोग किसी को एक बोतल खून भी नहीं देंगे।”

21वीं सदी में सामंती फरमान?

भेल्लारी की उस टिप्पणी ने खासा गुस्सा भड़काया जिसमें उन्होंने कहा था कि शादीशुदा बेटी को ससुराल में रहना चाहिए, मायके में “कुंडली मारकर” नहीं बैठना चाहिए। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया यूज़र्स ने इसे खुली सामंती सोच करार दिया। एक यूज़र ने लिखा, “प्रगतिशील होने का दावा करने वाले खुद औरत की जगह तय कर रहे हैं।”

कन्हैया भेल्लारी ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। उनके करीबी कहते हैं कि वे “मर्यादा बनाए रखना चाहते हैं” और माँ को घसीटे जाने पर भी चुप रहेंगे। वहीं राजद खेमे में कुछ लोग इसे “अपनों का विश्वासघात” बता रहे हैं तो कुछ रोहिणी के बयान को “ज़रूरत से ज़्यादा व्यक्तिगत” मान रहे हैं।

महिला vs पत्रकार स्वतंत्रता का सवाल

जहाँ एक तरफ रोहिणी आचार्य को महिलाओं की गरिमा की रक्षा के लिए समर्थन मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई पत्रकार संगठनों ने इसे “पत्रकारिता पर हमला” बताया है। बिहार वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन ने बयान जारी कर कहा, “व्यक्तिगत जीवन और परिवार को डिबेट का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए, चाहे गलती किसी की भी हो।”

फिलहाल यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। सोशल मीडिया पर #शर्मिंदगी_किसे और #माँ_को_मत_घसीटो ट्रेंड कर रहे हैं। बिहार की राजनीति में एक बार फिर साबित हो गया कि टीवी डिबेट अब नीति की जगह निजी गाली-गलौज की अखाड़ा बन चुकी है।

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