धर्म और आइडियालॉजी, रिलिजन तथा मजहब

images-1-2.jpeg

प्रो.रामेश्वर मिश्र पंकज

दिल्ली : मानव धर्म शास्त्र में प्रतिपादित जो मानव धर्म है, वह केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है। वह मनुष्य मात्र के लिए है और इस अर्थ में सार्वभौम है। इन्हें आधुनिक पदावली में सार्वभौम मानव मूल्य कह सकते है। यह भी स्मरण योग्य् है कि मानव धर्म का प्रतिपादन ईसाइयत, इस्लाम और कम्युनिज्म में नहीं है। क्योंकि वहां मानव जाति का विभाजन ‘फेथफुल’ और ‘हीदन’ के रूप में ईसाइयत में और मोमिन तथा काफिर के रूप में इस्लाम में एवं शोषित और शोषक के रूप में कम्युनिज्म में परस्पर विरोधी युग्मों में बांट कर किया जाता है। जिसके कारण वे पंथ इनमें परस्पर आधारभूत टकराहट मानते है और पहला दूसरे को विनष्ट कर डालने को संकल्पित रहता है।

अतः मानव जाति की एकता की वहां कही कोई कल्पना ही नहीं है। विज्ञान के उत्कर्ष से यूरोप के केवल वैज्ञानिक बोध से सम्पन्न व्यक्तियों और समूहों ने यूरोप में विगत 60 वर्षों में पहली बार मानव जाति की एकता की बात शुरू की है। परन्तु वे लोग ईसाई समाज में एक प्रतिशत से भी कम हैं। शेष सम्पूर्ण ईसाई लोग मनुष्य को फेथफुल क्रिष्चियन और हीदन में बांट कर ही देखते है। इसी प्रकार स्वयं को मुसलमान कहने वाले लोग, जिन्हें यूरोप के लोग मुहम्मडन ही कहते है, स्वयं कुरान का निष्ठा से पालन करें या न करें, पर मनुष्यों को मोमिन और काफिर में बांट कर ही देखते है और स्वयं को कभी भी काफिर नहीं कहते तथा जो मुसलमान नहीं है, वह कितना भी सदाचारी हो, तो भी उसे नेक बंदा नहीं कहते।

इस प्रकार मानव जाति की एकता की कोई भी बात ईसाइयत या इस्लाम में नहीं है। इन्हीं दोनों की नकल करके कम्युनिस्टों ने मानव जाति को शोषित और शोषक में बांटा है। जो व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी का पदाधिकारी है, वह कितने भी बडे पद पर हो और कितने ही अधिक ऐष्वर्य के साथ जी रहा हो, वह स्वयं को शोषितों का प्रतिनिधि बताता है और दूसरा कोई सीमांत किसान या छोटा व्यापारी या मंदिर का मामूली पुजारी हो या किसी तरह कथा बाँचकर परिवार का गुजर बसर करने वाला पुरोहित हो, वे सब उसकी दृष्टि में शोषक वर्ग के लोग है। इस प्रकार मानव जाति की एकता में कम्युनिस्टों का भी कोई विश्वाृस नहीं है और मान्यता भी नहीं है।

समस्त मनुष्यों के लिए एक समान मानव धर्म का प्रतिपादन केवल सनातन धर्म शास्त्रों में है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि सब को एक ही काम करना है या सबसे एक सा ही व्यवहार करना है, क्योंकि यह तो तामसिक अभेदवाद हो जायेगा।

मानव धर्म मनुष्य मात्र द्वारा पालनीय हैं। पर उतना ही पर्याप्त नहीं। मनुष्य जीवन की अनेक विलक्षणतायें है। वह पशुओं की तरह कतिपय सामान्य और विशिष्ट प्रवृत्तियों से पहचाना नहीं जा सकता और परिभाषित भी नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मनुष्य अर्थात प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है, उसकी अपनी ही महिमा है, गौरव है और स्वधर्म है। यद्यपि मानव धर्म का पालन मनुष्य मात्र द्वारा करणीय है। तथापि उतने से ही मानव जीवन का ऐश्वयर्य व्यक्त नहीं होता। मनुष्य को ऐश्वुर्य प्रकट करना है। पुरूषार्थ करना है। इसके लिए ही उसे मानव जीवन मिला है। पुरूषार्थ के द्वारा ऐश्वयर्य की सिद्धि में ही मानव जीवन की सार्थकता है।

ऐश्वमर्य के भी अनन्त भेद है। भौतिक ऐश्वथर्य, बौद्धिक ऐश्वमर्य, धार्मिक ऐश्वरर्य, आध्यात्मिक ऐश्वमर्य, आर्थिक या वित्तीय ऐश्वषर्य, वस्तुओं के संग्रह का ऐश्वयर्य, समस्त भौतिक ऐश्वंर्य के त्याग का आध्यात्मिक ऐश्व र्य, संयम का ऐश्वथर्य, शौर्य का ऐश्वमर्य, उद्योग और वाणिज्य में, कृषि और शिल्प में, कला और साहित्य में, जीवन के विविध रूपों में उत्कर्ष का ऐश्व र्य, इस प्रकार क्षेत्रभेद, वृत्तिभेद, कर्मभेद, बोधभेद, लक्ष्यभेद तथा भावभेद से ऐश्व र्य के अनंत रूप है और अनेक स्तर है। पूर्व जन्म के संस्कारों के साथ व्यक्ति कतिपय स्मृतियों और आकांक्षाओं का बीज रूप लेकर जन्म लेता है और फिर उसकी उससे आगे की यात्रा प्रारंभ होती है। अतः पुरूषार्थ की आकांक्षा को लेकर और ऐश्वतर्य की मान्यता को लेकर व्यक्ति-व्यक्ति में बहुत भेद है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग ऐश्व र्य की सिद्धि करनी है और उसके लिए अलग-अलग पुरूषार्थ करने है। सभी ऐश्वोर्य वस्तुतः ईश्वनर के विराट और अनंत ऐश्वसर्य-सागर की बहुत छोटी तरंगें मात्र है। सब को जो अलग-अलग पुरूषार्थ करने है, वे ही हर व्यक्ति के अलग-अलग स्वधर्म है। धर्म तो मनुष्य मात्र का एक ही है – मानव धर्म।

स्वधर्मों की अनंत विविधता है। क्योंकि ऐश्वषर्य के अनंत रूप है। स्वधर्म भेद से ऐश्वसर्य भेद की साधना होती है, पुरूषार्थ भेद प्रकट होता है। माँ का स्वधर्म माँ के रूप में शिशु का पालन है। शिशु पालन ही माँ द्वारा की जा रही चिदंश की सेवा है, चिन्मय सत्ता की सेवा है। शिशु का स्वधर्म माँ के प्रति आज्ञाकारिता और उनकी अपेक्षा की पूर्ति के लिए पुरूषार्थ करना है। यही माँ की सच्ची सेवा है, जो वस्तुतः चिदंश की, चिन्मय सत्ता की ही सेवा है। राजा का स्वधर्म अलग है, प्रजा का अलग। सचिव का अलग, भृत्य का अलग। गुरू का अलग, शिष्य का अलग। पत्नी का अलग, पति का अलग। इस प्रकार स्वधर्म भेद की विराटता है। उन पर निरंतर विचार करते रहना आवश्यनक है। सजगता, विवेक, संकल्प और पुरूषार्थ पूर्वक स्वधर्म की सिद्धि की जाती है।

वर्तमान में हमारे सामने जो परिस्थितियों हैं, वे क्या परिस्थितियां हैं, यह विचार करते रहना चाहिए। हम स्वयं को कहाँ पर स्थित मानते हैं और जो परिस्थितियां हैं, वे तत्वतः क्या हैं, यह सब सदा मनन करते रहना और उनके प्रकाश में ही विवेकपूर्वक स्वधर्म का निर्णय करना कर्तव्य है। अगर हम राष्ट्र के विषय में सोचते हैं तो राष्ट्र में क्या परिस्थितियां हैं, अगर घर के विषय में सोचते हैं तो घर की क्या परिस्थितियाँ है, आसपास के क्षेत्र के विषय में सोचते हैं तो आसपास की क्या परिस्थितियाँ हैं और उसमें हमारा क्या कर्तव्य है, शास्त्र हमें क्या निर्देश देते हैं, इस दृष्टि से सोचना चाहिए, तभी हम धर्म के प्रकाश में स्वधर्म का निर्णय कर सकेंगे। किसी आइडियालॉजी के आधार पर सोचना अधर्म है क्योंकि आइडियालॉजी अपने से भिन्न लोगों के राजनैतिक नियंत्रण के लिए किसी भी समूह के द्वारा गढ़ी गई पदावलियों का संग्रह मात्र है।

जैसे कहा है कि प्रथम धर्म हैं- सत्य, ऋत और यज्ञ। देवताओं ने सृष्टि के आरंभ में जो यज्ञीय प्रक्रिया सम्पन्न की, उसमें से यह प्रथम धर्म निकले – ‘‘तानि धर्माणि प्रथमान्यासन’’। तो सत्य क्या है ? यह भी मनन के द्वारा ही स्पष्ट होगा। केवल सामान्य बुद्धि से सहज जो दिखें, वह कई बार भ्रान्ति हो सकता है। अतः मननपूर्वक सत्य को जानना होता है। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संसार में विगत 1400-1500 वर्षों में दो प्रबल महाप्रवाह शक्तिशाली बनें, उनमें सत्य की बिल्कुल अलग परिभाषा है और सनातन धर्म में सत्य की अलग परिभाषा है। जैसे इस्लाम में सत्य का क्या अर्थ है ? यह कि अल्लाह ने अपने आखिरी रसूल के द्वारा जो शब्द कह दिए, वहीं अंतिम सत्य है। शेष सब असत्य है। जो पहले के पैगम्बरों, देवदूतों, रसूलों ने कहा और जो उस समय के लिए सत्य था, वह अब आखिरी रसूल के द्वारा प्राप्त इलहामों के बाद पुराना रद्द हो गया है। अतः अब वह सत्य नहीं है। अब अंतिम सत्य वह है जो आखिरी रसूल ने अल्लाह से प्राप्त किया है। यह बात अलग है कि आखिरी रसूल ने स्वयं ऐसा कुछ नहीं लिखा था कि जिससे सीधे यह ज्ञात हो कि उन्हें वस्तुतः क्या प्राप्त हुआ था। परन्तु जो लोग उनके द्वारा की गई लड़ाइयों में साथ थे और लूट के माल में यानी माले गनीमा में सहभागी थे, हिस्सेदार थे, यानी जो सहाबा थे (जिसका तद्भव रूप साहब है जो मुसलमानों ने अंग्रेजों को प्रसन्न करने के लिए कहा और बाद में उनके असर से अथवा उनकी संगति से भारत के सब हिन्दू भी अपने से शक्तिशाली को या बड़े को आदरवश कहने लगे), उनके वंशजों ने तीसरी और चौथी पीढ़ी में अपनी याददाश्तव के बल पर जो कुछ बताया कि हजरत पैगम्बर आखिरी रसूल ने यह-यह इलहाम प्राप्त किया था, वही कुरान के रूप में संकलित है और मुसलमानों के अनुसार वही अंतिम सत्य है, शेष सब असत्य है।

इसी प्रकार ईसाइयों के यहां भी सत्य यानी ट्रुथ एक कूटपद (कोड वर्ड) है। जिसकी व्याख्या बहुत विस्तार से उन लोगों ने किया है कि सत्य वह है जो बाइबिल में जीसस के द्वारा कहा गया बताया जाता है। फिर आगे कहा कि नहीं सत्य वह है कि जो चर्च बताता है कि यह सत्य है क्योंकि चर्च जो है, वह जीसस की दुल्हन है तो चर्च जो बाइबिल की व्याख्या करें वही सत्य है। बाकी जो है वह झूठ है। इसीलिए अगर चर्च ने कह दिया कि गॉड ने करोड़ों वर्षों में बहुत ही मेहनत से किसी प्रकार इकलौता सगा बेटा पैदा कर धरती के उद्धार के लिए भेजा तो सब को मानना पडेगा। उस इकलौते बेटे के सचमुच कभी पैदा होने का कोई साक्ष्य इतिहास में सुलभ नहीं है, तो भी मानना पडे़गा। उस इकलौते बेटे ने जो कुछ कहा, यदि कहा, तो वह भी उनके समय में कही सुरक्षित नहीं किया गया। कहीं लिखा नहीं गया। उस इकलौते बेटे के जन्म होकर बलिदान देकर चले जाने के 150 वर्ष बाद कुछ मनोरोगी जैसे व्यक्तियों ने, जिनमें पाल आदि है, जो कुछ बताया कि एकमात्र प्रभुपुत्र ने यह-यह कहा था और उनके उस कहे को हम ‘गुड न्यूज’ मानते है तो गुड न्यूज के नाम से संकलित उन चार संकलनों में जो कुछ लिखा है और उसकी अलग-अलग चर्चों के द्वारा जो भी व्याख्याएं की गई है, वही सत्य है। शेष सब असत्य है। इकलौते बेटे और उनके परमपूज्य पिताजी के अतिरिक्त अन्य किसी भी देवता या आराध्य देव की पूजा झूठे देवताओं की पूजा है और ऐसे झूठे देवताओं की पूजा करने वाले समाजों को या तो फेथफुल किश्चियन बनना होगा या हमारे द्वारा समाप्त होना होगा।

इस प्रकार इन एकदेववादी, एकपंथवादी (मोनोथीइस्ट) लोगों के अनुसार सत्य वस्तुतः अपने से भिन्न सम्पूर्ण अस्तित्व को वशवर्ती बनाने, उनको बदल डालने या नष्ट कर डालने का एक माध्यम है या एक अत्यंत शक्तिशाली संहारक शस्त्र है, जो अन्यों को समाप्त करने या अधीन करने के काम आता है। सत्य की यह विचित्र परिभाषा सनातन धर्म में प्रतिपादित सत्य से पूरी तरह भिन्न और विरोधी है।

सनातन धर्म के अनुसार सत्य की परिभाषा है – ‘‘सत्यं यथार्थें वाड्मनसे, यथादृष्टं यथानुमितं यथाश्रुतं तथा वाड्मनष्चेति। परत्र स्वबोधसंक्रान्तये वागुक्ता सा यदि न वंचिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्तिबन्ध्या वा भवेदिति, एषा, सर्वभूतोपकारार्थं प्रवृत्ता न भूतोपघाताय। यदि चैवमप्यभिधीयमाना भूतोपघातपरैव स्यात्, न सत्यं भवेत् पापमेव भवेत्। तेन पुण्याभासेन पुण्यप्रतिरूपकेण कष्टं तमः प्राप्नुयात्, तस्मात् परीक्ष्य सर्वभूतहितं सत्यं ब्रूयात्।’’

अर्थात वाणी और मन से जैसा देखा, सुना और अनुमान किया, वैसा ही यथार्थ कथन और चिंतन सत्य है। अपने ज्ञान की संक्रांति (सम्प्रेषण) के लिए दूसरे के प्रति जो वाक्य कहा जाये, वह वाक्य सत्य होता है यदि वह वंचना कारक या भ्रांति कारक या श्रोता के लिए दुर्गम और निरर्थक न हो। वह वाक्य समस्त प्राणियों का उपकारक है, इस बौद्धिक सजगता के साथ ही वाक्य कहा जाना चाहिए, ताकि वह किसी का उपघातक न हो। क्योंकि उपघात होने पर वह कथन सत्य होने पर भी पुण्य नहीं होता अपितु पाप ही होता है। इस प्रकार विचारपूर्वक सर्वहितकारक सत्य वाक्य ही कहना चाहिए।
इस तरह सनातन धर्म में सत्य की बहुत स्पष्ट परिभाषा है। कोई भी वाक्य भले ही सत्य के रूप में पुण्य का आभास दे रहा हो तो भी वह यदि किसी या किन्ही प्राणियों के लिए उपघातक हो अर्थात आंतरिक या बाहरी, आंशिक या पूर्ण क्षति पहुँचाने वाला हो तो वह पापी है। इसी अर्थ में अहिंसा ही सत्य की कसौटी है। अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी घटक के प्रति द्रोह भावना का सम्पूर्ण अभाव। अहिंसा का अर्थ ‘हत्या नहीं करना’ नहीं होता। किसी के प्रति द्रोह भाव रखना ही हिंसा है। भले ही आप उसे कोई भी प्रत्यक्ष भौतिक आघात नहीं पहुँचा रहे है। अतः द्रोहभाव का सम्पूर्ण अभाव ही अहिंसा है। स्पष्ट है कि इस प्रकार सनातन धर्म की कसौटी पर इस्लाम और ईसाइयत का आज जो प्रचारित रूप है, वह घोर हिंसक और पूर्ण असत्य है। इस तरह सत्य की सनातन दृष्टि से इस्लाम की दृष्टि और ईसाइयत की दृष्टि पूरी तरह विरोधी है और वह पूर्णतः असत्य कही जायेगी। हिंसक तो वह प्रत्यक्ष रूप से है ही।

अतः सत्य के सनातन स्वरूप को जाने बिना धर्म का पालन हो ही नहीं सकता। सच या हकीकत और ट्रुथ की ईसाई, मुस्लिम और कम्युनिस्ट अवधारणाओं को मानने वाला व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता। किसी आइडियालॉजी से आविष्ट व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता। सत्य का जो अर्थ सनातन धर्म शास्त्रों में स्पष्ट है, उसका ही पालन धर्म है।

#TheShowMustGoOn

directors-notes_show-must-go_new-website.jpg

दिल्ली । यहाँ सामाजिक और अकादमिक जगत का एक ऐसा नक़्शा है, जहाँ वैचारिक सिपाही दो खेमों में बँटे नजर आते हैं-एक तरफ वे जो हलचल मचाते हैं, दूसरी तरफ वे जो हवा में तैरते रहते हैं, बिना कभी लहर पैदा किए।

आइए इनका परिचय कराते हैं। हवा में बिना लहर पैदा किए तैरने वाला समूह है ‘एडजस्टमेंट मास्टर्स’ का। ये लोग व्यवस्था के हर रंग में घुल-मिल जाते हैं। सत्ता बदले या न बदले, इनका रुतबा बना रहता है। इन्हें ‘बार्टर सिस्टम’ का आधुनिक अवतार कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। तुम मुझे यहाँ सपोर्ट दो, मैं वहाँ तुम्हारा बैक दे दूँगा। ये लोग न कभी पूरी तरह विरोध में खड़े होते हैं, न पूरी तरह समर्थन में। बस बीच में लटके रहते हैं-एक ऐसी कुर्सी पर, जो हर सरकार, हर विचारधारा के आने-जाने के बावजूद हिलती नहीं। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इनके होने और न होने में कोई खास फ़र्क़ नहीं पड़ता, फिर भी ये सभी सरकारों में ‘अनिवार्य’ बने रहते हैं। इनकी डिमांड सभी विचारधाराओं में ‘हाई’ है।

दूसरी ओर हैं वे जो बदलाव की बात करते हैं। ये लोग व्यवस्था में चुभन पैदा करते हैं। इनकी मौजूदगी से लोगों को असहजता होती है, क्योंकि ये सवाल उठाते हैं, लड़ते हैं, पुरानी आदतों को चुनौती देते हैं। इन्हें ‘आरामजीवियों’ का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है। आरामजीवी समूह सोचता है-“सब ठीक चल रहा है न? फिर ये नाटक क्यों?” इन परिवर्तन-प्रेमियों को हर तरफ़ से घेर लिया जाता है-आलोचना, ट्रोलिंग, अलग-थलग करना, यहाँ तक कि ‘ओवर-एक्टिव’ या ‘अति-उत्साही’ का ठप्पा लगाना भी इनके हिस्से आता है।

पर इस समूह में भी सभी एक जैसे नहीं होते। दो उप-प्रकार हैं इनके।

पहले वे ‘नए रंगरूट’। बाहर से आए, नए-नए वैचारिक सिपाही। इन पर साबित करने का भारी दबाव होता है। इसलिए ये ओवर-ड्राइव में चले जाते हैं। हर मुद्दे पर सबसे आगे, हर पोस्ट में सबसे तेज़, हर मीटिंग में सबसे ज़्यादा बोलने वाले। इनकी सक्रियता देखकर तालियाँ भी बजती हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग जानते हैं कि यह सक्रियता विचारधारा की नहीं, बल्कि ‘बिग बी’ को इम्प्रेस करने की है। बिग बी खुश हुआ, तो टिकट मिलेगा, पद मिलेगा, वीसी बनेंगे, समितियों में जाएंगे, फ़ायदा मिलेगा। ये लोग कल अगर सत्ता बदल गई तो उसी गति से नई सत्ता के साथ ‘एडजस्ट’ हो जाएँगे।

दूसरे हैं ‘वैचारिक सिपाही’। ये किसी को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि विचार को ज़मीन पर उतारने के लिए लड़ते हैं। ये मॉडल खड़ा करने की कोशिश करते हैं-छोटा सा ही सही, लेकिन ईमानदार। इन्हें सबसे ज़्यादा हमले झेलने पड़ते हैं। क्योंकि ये न सिर्फ़ बाहर के दुश्मन से, बल्कि अपने ही कैंप के ‘एडजस्टर्स’ से भी लड़ते हैं।

फिर सबसे मज़ेदार वर्ग है-‘निष्क्रिय महानुभाव’। इन्हें जो मिलना था, उनका उद्देश्य पूरा हो चुका है। इन्हें व्यवस्था में जहां बिठाया गया है। वहां सभी के साथ एडजस्ट करके वे बैठ गए हैं। बैठने के बाद वे अपनी निष्क्रियता के लिए शानदार तर्क गढ़ते हैं। ‘पदस्थ हूँ, इसलिए कुछ नहीं कर सकता’, ‘सिस्टम बहुत मज़बूत है’, ‘अंदर से बदलाव लाना ज़रूरी है’। वाह! क्या गहन विश्लेषण। पर सवाल यह है-अगर कुछ नहीं हो पा रहा, तो अंदर की गंदगी बाहर क्यों नहीं लाते? उसे सार्वजनिक क्यों नहीं करते? किसी के माध्यम से अंदर की बात को बाहर क्यों नहीं लाते? राजनीति का सच क्यों नहीं बोलते? पद छोड़ने से किसने रोका है? क्या सच में कोई बन्दूक सिर पर रखकर कह रहा है— “यहीं रहो, चुप रहो, कुछ मत करो”?

नहीं। असलियत यह है कि क्रांतिकारी का टैग लगवाना है, पर नाखून से ज़्यादा कुछ कटना नहीं चाहिए। बस थोड़ी-सी पोस्ट, थोड़ा-सा भाषण, थोड़ी-सी फोटो-और जनता ताली बजाए। जनता खुश, नेता संतुष्ट, व्यवस्था सुरक्षित और हर तरफ वाह वाही। भाई साहब आपने तो कमाल ही कर दिया।

और इस पूरे नाटक का उपसंहार यह है कि असली बदलाव लाने वाले हमेशा अकेले पड़ जाते हैं, जबकि ‘एडजस्टमेंट आर्टिस्ट’ और ‘निष्क्रिय दार्शनिक’ हमेशा भीड़ में चमकते रहते हैं। क्योंकि इस बाज़ार में सबसे ज़्यादा बिकने वाला माल है-आराम और दिखावा।

क्या बंगाल सच में इतना अराजक है !

murshidabad-violence-780x446-1.jpg

— गोपाल सामंतो

दिल्ली । देश आज एक नया अध्याय को देख रहा है, दुर्भाग्यवश यह अध्याय भी उसी पुण्य भूमि से शुरू हो रही है जहाँ से स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ था। इस वाक्य मात्र से यह स्थापित हो जाता है कि हम पश्चिम बंगाल के बारे में बात कर रहे है। यहाँ की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज मंच पर खड़ी होकर यह चीख चीख कर कह रही है कि —“केवल 15 मिनट के लिए अगर प्रशासन बंगालियों के सर से हाथ उठा ले तो पूरा समाज समाप्त हो जाएगा।”
इतिहास ने बंगाल को “डायरेक्ट एक्शन डे” दिखाया था, क्या ममता बनर्जी का आशय ऐसे ही कत्ले आम से है? इसीलिए वो अपने भाषण के द्वारा बंगाल को डायरेक्ट एक्शन डे का फ़्लैशबैक दिखा रही है !

जब यह वाक्य उन्होंने अपने श्रीमुख से कहा, तो क्या वो चुनाव से पहले बंगालियों को डराना चाहती थी? यह प्रश्न केवल प्रश्न नहीं है अपितु देश के संघीय ढांचे पर सीधा कुठाराघात है। ऐसे तो अगर स्पष्ट रूप से समझा जाये तो देश के संविधान के आधीन कार्य करने वाली चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का इस कुत्सित तरीके से विरोध ही अपने आप में संघवाद का विरोध माना जाना चाहिए। प्रजातांत्रिक तरीके से वो कोर्ट भी जा चुकी हैं। वहाँ अपनी बात को स्वयं रखा भी था। इसके बाद शायद सर्वोच्च न्यायालय से भी वो नाखुश है क्योंकि फ़ैसला उनके मन माफ़िक़ नहीं हुआ, इसलिए वो धरना दे रही थीं।

अलग अलग प्रदेशों में भी SIR की प्रक्रिया हुई और किसी को पता भी नहीं चला कि कैसे और कब यह चुनावी प्रक्रिया संपन्न हो गयी। इसी भ्रामक वातावरण के चलते अगर वर्तमान की ख़बरों और घटनाक्रमों को देखें तो लगता है —जैसे केवल बंगाल में ही SIR हो रहा है और यह कोई विदेशी प्रक्रिया है जिसको अंग्रेजों ने बंगाल की जनता पर थोप दिया है ।ममता बनर्जी के मुताबिक़ हर बंगाली को इसका विरोध करना पड़ेगा। इस साधारण सी प्रक्रिया को नेस्तानाबूद करने में TMC का हर कार्यकर्ता दिन रात लगा हुआ है। शायद इस प्रक्रिया को ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेता – कार्यकर्ता अपने अस्तित्व की लड़ाई मानकर चल रहे है, हो भी क्यों ना ? जिस प्रकार से बंगाल की सड़कों पर प्रजातंत्र को गुंडातंत्र के आगे नतमस्तक कर दिया गया है। पिछले 50 सालों से, ऐसा होना बहुत ही आम बात है। विचारणीय यह है कि— वो बंगाली समाज कहा गुम हो गया है, जिसने अंग्रेजों का खिलाफत उनके तोपों की नाल पर चढ़कर किया था? बंगाल की भूमि में ही पहले सशस्त्र बल “आज़ाद हिन्द फौज” का निर्माण हुआ था। आज वो बंगाली शायद अपने दैनंदिनी आवश्यताओं की पूजा अर्चना करने में इतना व्यस्त हो गया है की उन्हें समाज से कोई विशेष लेना देना नहीं है।

बंगाली समाज का वो निर्णायक वर्ग केवल अभिभावक के रूप में अपने बच्चे को आईआईटीयन और डॉक्टर बनाने में लगा हुआ है, बाद के समय में उन्ही बच्चों द्वारा प्रताड़ित-परित्यक्ता ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर है। यह बंगाल के हर गली की कहानी है, घरों में अकेले बूढ़े माँ -बाप बचे हुए है और बच्चे विदेशों में सेटल -साल में एक बार विजिट पर आने वाले बन गए है। यही मौक़ा TMC के हाथ लग गया है । मनमानी करने का और भ्रामक अराजकता उत्पन्न कर सत्ता पर काबिज रहने का और समाज के बीच अपने झूठे नैरेटिव को सेट करने का।

TMC के इसी मंच से उनकी एक सांसद श्रीमती महुआ मोइत्रा अपने उच्चतम आवाज़ में यह कहती हैं कि —“आज जो TMC के साथ नहीं है वो बंगाली ही नहीं है।”

क्या बंगाली होने का सर्टिफिकेट TMC की एक ऐसी महिला से बंगाली समाज को लेना पड़ेगा जो खुले आम कहती है कि—“ माँ काली मदिरापान और धूम्रपान करती है।” ऐसी कूटरचना और राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए दिए गए बयान केवल TMC की नहीं अपितु समस्त बंगाली समाज और असंख्य वैभव-गाथा वाले बंगाल को कलंकित करने का काम कर रही है ।

90 के दशक में जिस प्रकार चुनावी हिंसा और बैलेट बॉक्स लूट के कारण बिहार कलंकित था ममता बनर्जी को कार्यकाल में बंगाल उससे कहीं आगे निकल गया है। बंगाल आज रोज़ नए रिकॉर्ड बना रहा है। राजनीतिक हिंसा और द्वेष का होनख कोई बड़ी बात नहीं जिस प्रकार पूर्वी बंगाल ने ‘हिंदू जेनोसाइड’ को बार बार झेला है। अगर हालात ऐसे रहे तो आशंका है कि _उसी प्रकार पश्चिम बंगाल में भी आने वाले वर्षों में बंगालियों के ऐसे क़त्ले आम को अंजाम दिया जा सकता है। बंगाल और बंगालियों के बीच होम्योपैथी दवाई बहुप्रचलित है। क्योंकि उसमें ना सर्जरी दिखती है और न ही कड़वी दवाई, ठीक उसी प्रकार बंगालियों के मन में धीमा मीठा जहर घोल कर उनके देश के संघीय ढांचे से अलग करने का कुत्सित प्रयास सत्ताधारी TMC पार्टी हर दिन कर रही है।

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार
शासकीय अधिकारियों को, विपक्षी पार्टियों के नेताओं को और आम जानता को डराने का काम जो TMC के नेता दैनिक रूप से कर रहे हैं। मानो प्रशासन और न्याय व्यवस्था बंगाल में लंबी छुट्टी पर गयी हुई है। एक क़ानूनजीवी और TMC सांसद कल्याण बनर्जी—“देश के चीफ इलेक्शन कमिश्नर की उंगली काटने की बात कर रहे हैं।”

ऐसे सांस्कृतिक पतन को देखकर, इसे सहन कर रहे शांत बैठे लोगो को देखकर दुख और आश्चर्य लगता है।

बंगाल में बहने वाली हुगली नदी के जल में कहते हैं कोई जीवाणु पनप नहीं पाता है। कोई विष उत्पन्न नहीं हो पाता है तो ऐसे में बंगाल में रोज़ इसी हुगली नदी के पानी पीने वालो के बीच ऐसा विष और नकारात्मकता कैसे उत्पन्न हो गई? जो सालों से टिकी हुई है । यह वैज्ञानिक और सामाजिक सोध का विषय है।

बंगाल में आने वाले दिनों में चुनाव होने वाला है ऐसे बंगाल में राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर है, TMC ही चारों ओर लड़ते दिख रही है। अपनी ख़ुद के कमज़ोरियों को छुपाने के लिए और अपने 15 सालों के सत्ता के विफलता को किसी भी स्तर पर उतरकर लोगों के मन से मिटाने के लिए TMC का ख़ूनी तांडव देखने को मिल रहा है। देखना दिलचस्प रहेगा, बंगाल का ‘भद्रोलोक’ समाज कब तक ऐसे अभद्र प्रयास को संजोकर रखता ? कब तक अराजकता के सहारे देश के ब्रेन-कैपिटल को उसके वैभव से दूर रखने में ममता बनर्जी और उनके साथी सफल हो पाते हैं?पिछले 50 सालों में बंगाल कितने पीछे जा चुका है यह किसी से छुपा नहीं है, 1947 में आज़ादी के समय केवल कोलकाता की GDP देश के आर्थिक राजधानी कही जाने वाले मुंबई से दुगुनी थी। आज मुंबई की GDP कोलकाता के तीन गुना से भी अधिक है। इस ब्रेन-ड्रेन वाले जगह से क्या बंगाल वापस वैभव का सफ़र कर पाएगा? अब यह कोलकाता के बुद्धिजीवी बंगाली समाज को सोचना होगा और तय करना होगा।

— (लेखक गोपाल सामंतो, Save Bengal Save India मूवमेंट के फाउंडर हैं)

खरीफ 2026: भारत की कृषि के सामने खड़ी नई चुनौती

image-8-1536x800-1.png

निलेश देसाई

दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक संकटों का असर अंततः आम लोगों की ज़िंदगी और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं तक पहुँचता ही है। हाल के घटनाक्रमों ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक, Strait of Hormuz, को अस्थिर बना दिया है। यह वही समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया का लगभग एक चौथाई कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस गुजरती है।

ऊर्जा बाजार में किसी भी प्रकार की हलचल का असर केवल पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा प्रभाव उर्वरक उद्योग, परिवहन लागत और अंततः कृषि उत्पादन पर पड़ता है। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा और उर्वरकों के कच्चे माल के आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय है।

ऐसे समय में जब खरीफ 2026 का मौसम सामने है, भारत की कृषि व्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। भारत को अक्सर कृषि प्रधान देश कहा जाता है और आज भी देश की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। ऐसे में यदि उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होती है या उनकी कीमतों में तेज़ वृद्धि होती है, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी खाद्य व्यवस्था और उपभोक्ता बाजार तक पहुँचेगा।

भारत की खेती का एक बड़ा हिस्सा खरीफ मौसम पर आधारित है। धान, सोयाबीन, मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलें इसी मौसम में बोई जाती हैं। इन फसलों के लिए किसानों को विशेष रूप से यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इन उर्वरकों के उत्पादन में ऊर्जा और आयातित कच्चे माल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आती है या तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आता है, तो उर्वरकों की लागत बढ़ना लगभग तय है।

इसके साथ ही डीज़ल की बढ़ती कीमतें भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। देश के कई हिस्सों में आज भी सिंचाई के लिए डीज़ल पंपों का उपयोग होता है। डीज़ल महंगा होने पर केवल सिंचाई ही नहीं, बल्कि जुताई, कटाई और परिवहन सभी महंगे हो जाते हैं। खेती की लागत में यह बढ़ोतरी अंततः किसानों की आय को प्रभावित करती है और कई बार इसका असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है।

यह संकट केवल उत्पादन लागत तक सीमित नहीं है। भारत की खाद्य व्यवस्था भी कई महत्वपूर्ण कृषि उत्पादों के आयात पर निर्भर है। विशेष रूप से खाद्य तेलों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता होने पर इन वस्तुओं की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए घरेलू उत्पादन को मजबूत करना और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।

लेकिन इस पूरी चर्चा के बीच एक महत्वपूर्ण सबक को भी याद रखना आवश्यक है। वर्ष 2021 में Sri Lanka ने बिना पर्याप्त तैयारी के रासायनिक उर्वरकों पर अचानक प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया था। इस फैसले का परिणाम यह हुआ कि कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, किसानों की आय घट गई और देश को गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ा। इस अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी कृषि परिवर्तन को बिना तैयारी और चरणबद्ध रणनीति के लागू करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

भारत के लिए आज चुनौती यह है कि वह इस वैश्विक संकट को केवल एक खतरे के रूप में न देखे, बल्कि इसे कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने के अवसर के रूप में भी समझे।

सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि किसानों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाए। अक्सर संकट के समय सबसे बड़ी समस्या सूचना के अभाव की होती है। यदि किसानों को समय रहते यह बताया जाए कि उर्वरकों की उपलब्धता सीमित हो सकती है या उनकी कीमत बढ़ सकती है, तो वे अपनी फसल योजना और पोषण प्रबंधन को उसी अनुसार बदल सकते हैं।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम उर्वरकों के विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना है। कई बार किसान परंपरा या सलाह के अभाव में आवश्यकता से अधिक रासायनिक खाद का उपयोग करते हैं। यदि वैज्ञानिक तरीके से मृदा परीक्षण, संतुलित पोषण और जैविक विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए, तो उर्वरकों की कुल मांग को कम किया जा सकता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम स्थानीय संसाधनों पर आधारित उर्वरक व्यवस्था को मजबूत करना है। गोबर, फसल अवशेष, हरी खाद और अन्य जैविक संसाधनों से बनने वाले कम्पोस्ट और जैविक खाद खेती की लागत को कम करने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाते हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर पर “जैविक कम्पोस्ट मिशन” जैसी पहल शुरू की जाए तो यह दीर्घकालीन समाधान साबित हो सकती है।

इसके साथ ही कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और किसान संगठनों को मिलकर प्राकृतिक खेती, कम लागत वाली खेती और पोषण प्रबंधन के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर चलाना चाहिए। किसानों को केवल सलाह देने के बजाय उन्हें व्यवहारिक प्रशिक्षण और सफल उदाहरणों से जोड़ना अधिक प्रभावी होगा।

अंततः यह भी आवश्यक है कि दलहन और तिलहन उत्पादन को विशेष प्राथमिकता दी जाए। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है और देश की आयात निर्भरता भी कम हो सकती है।

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में उत्पन्न संकट हमें यह याद दिलाता है कि कृषि केवल खेत तक सीमित गतिविधि नहीं है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

यदि समय रहते दूरदर्शिता के साथ कदम उठाए गए, तो यह संकट भारतीय कृषि को अधिक मजबूत, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने का अवसर बन सकता है। लेकिन यदि इसे केवल एक अस्थायी समस्या मानकर अनदेखा कर दिया गया, तो आने वाला समय किसानों और देश दोनों के लिए अधिक कठिन हो सकता है।

इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि खरीफ 2026 केवल एक कृषि मौसम नहीं, बल्कि भारत की कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी की घंटी है।

scroll to top