डॉ. शैलेश शुक्ला को अंतरराष्ट्रीय ERAI फेलोशिप 2026 के लिए चयनित किया गया

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लखनऊ। जनसंचार, डिजिटल मीडिया और उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Responsible AI) के क्षेत्र में सक्रिय वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता डॉ. शैलेश शुक्ला का चयन प्रतिष्ठित ERAI Fellowship Program – June 2026 के लिए किया गया है। यह अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप अमेरिका स्थित Knowledge Networks द्वारा आयोजित की जा रही है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता, शासन (AI Ethics and Governance), जवाबदेही तथा मीडिया के बदलते स्वरूप से जुड़े वैश्विक विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए जानी जाती है।

इस फेलोशिप कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न देशों के मीडिया पेशेवरों, नीति विशेषज्ञों और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग, नियमन और समाज पर उसके प्रभाव से संबंधित विषयों पर वैश्विक विशेषज्ञों से सीखने और विचार-विमर्श का अवसर प्राप्त होगा।

डॉ. शैलेश शुक्ला जनसंचार में पीएच.डी. उपाधि प्राप्त हैं तथा हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मीडिया, डिजिटल संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भाषा प्रौद्योगिकी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय लेखन एवं शोध कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में वे Srijan Sansar के ग्लोबल ग्रुप एडिटर के रूप में भी कार्यरत हैं।

डॉ. शुक्ला ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तीव्र विस्तार के वर्तमान दौर में मीडिया और संचार जगत की जिम्मेदारियां पहले से कहीं अधिक बढ़ गई हैं। ऐसे समय में AI Ethics and Governance जैसे विषयों पर वैश्विक स्तर पर संवाद और सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह फेलोशिप न केवल उनके लिए बल्कि भारतीय मीडिया समुदाय के लिए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीखने और अनुभव साझा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

ज्ञातव्य है कि Knowledge Networks द्वारा संचालित विभिन्न वैश्विक कार्यक्रम कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तरदायी विकास, नियमन तथा समाज, मीडिया और सार्वजनिक नीति पर उसके प्रभाव से जुड़े विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे हैं।

जसपाल राणा-अभी तो बहुत काम बाकी था

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दिल्ली । भारतीय निशानेबाजी के महारथी और कोच जसपाल राणा के असामयिक निधन से सभी ओर शोक व्याप्त है। मात्र 49 वर्ष में चले जाना निश्चय ही ह्रदय विदारक है। देश के लिए अपूरणीय क्षति है। जसपाल निशानेबाजी के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों में 15 पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया, स्वयं एशियाई खेलों और ओलपिंक में देश का प्रतिनिधित्व करने के बाद नई पीढ़ी को तैयार करने में जुट गए। इस समय वे युवा निशानेबाज मनु भाकर के गुरु थे। जसपाल राणा को अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रेाणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह भारतीय खेल इतिहास के सबसे चमकदार व होनहार निशानेबाज थे। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में जन्मे जसपाल राणा को उनके पिता नारायण सिंह राणा ने बीएसएफ अधिकारी द्वारा प्रशिक्षित करवाया था।12 वर्षीय राणा ने अहमदाबाद में 31वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप से राष्ट्रीय निशानेबाजी में पदार्पण किया था। तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक दिन यह छोटा बालक इतना करिश्माई निकलेगा।

जसपाल ने आरम्भ में पिस्टल और राइफल दोनों से अभ्यास किया किंतु बाद में फेडरेशन ने एक इवेंट के लिए एक ही शूटर को चुनने का नियम लागू किया जिसके बाद उन्होंने पिस्टल शूटिंग को चुना। जसपाल 12 वर्ष की आयु तक आते आते राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे थे। उन्होंने 1988 में 12 वर्ष की अवस्था में ही 31वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीत लिया था। जसपाल राणा ने कॉमनवेल्थ खेलों और एशियाई खेलों को मिलाकर कुल 23 पदक अपने नाम किए थे। जसपाल ने एशियाई खेलों में चार स्वर्ण पदक, दो रजत और दो कांस्य पदक जीते वहीं राष्ट्रमंडल खेलों में नौ स्वर्ण, चार रजत व दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। एशियाई चैंपियनशिप में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीता जबकि विश्व जूनियर चैंपियनशिप में एक स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

जसपाल ने कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अद्भुत व शानदार प्रदर्शन कर भारत का मस्तक गर्व से ऊंचा किया। 1994 मिलान विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में उनकी जीत यादगार रही। उन्होंने यह जीत दर्द से कराहते हुए प्राप्त की थी। प्रतियोगिता से एक दिन पहले उन्हें घुटने में फोड़ा हो गया था और डाक्टरो ने उन्हें सर्जरी की सलाह देकर अस्पताल से छुट्टी देने से मनाकर दिया था किंतु उन्होंने राष्ट्रप्रथम की भावना को ध्यान में रखा और डॉक्टरों की सलाह को दरकिनार करते हुए प्रतियोगिता मे भाग लेने का निश्चय किया किंतुअस्पताल से निकलने के बाद उसी रात फोड़ा फूट गया और उनका दर्द बढ़ गया। वे अपनी जींस तक नहीं उतार पा रहे थे। ऐसे में उन्होंने जीन्स को फाड़कर ही हाफ पैंट बनाई और उसे पहनकर ही अगली सुबह प्रतियोगिता में उतरे। राणा ने असहनीय दर्द में मैच खेला और जूनियर कैटेगरी में विश्व रिकार्ड के साथ अपना पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता। इसी वर्ष उन्होंने हिरोशिमा एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता था। 1994 में हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जसपाल को इसी वर्ष मात्र 18 वर्ष की अवस्था में अर्जुन पुरस्कार मिला।
जसपाल राणा का जीवन खेल व राष्ट्र के प्रति समर्पित रहा। वह हर बार रेंज पर उतरते समय देश का गौरव अपने साथ लेकर चलते थे। एक खिलाड़ी के रूप में तो उनका कैरियर शानदार रहा। दूसरी पारी में वह एक अच्छे प्रशिक्षक बने। उनके मार्गदर्शन में मनु भाकर ने पेरिस ओलंपिक में दो पदक जीते। उन्होंने सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव सहित कई अन्य निशानेबाज़ो के कैरियर को संवारने में अहम भूमिका निभाई ।

जसपाल राणा की उपलब्धियों ने देश को ख़ुशी से झुमने का अवसर दिया। अगली पीढ़ी को गढ़ा। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के लोकप्रिय गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने जसपाल के नाम से वर्ष 1999 में एक गीत बनाया था। मात्र 49 वर्ष की अवस्था में जसपाल का जाना एक शून्य उत्पन्न कर गया है। अभी तो बहुत कुछ करना था जसपाल…..इतनी जल्दी क्यों की जाने की ?

क्या अब तक नहीं देखी तुमने धुरंधर

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पुनीत बिसारिया

दिल्ली । अनेक मित्रगण आदेशित कर रहे थे कि धुरंधर फ़िल्म के बारे में कुछ लिखूँ, किन्तु मुझे लगता था कि जब तक इसके दोनों भाग न देख लूँ, तब तक इसके बारे में लिखना अनुचित होगा।

अब दोनों भाग देखने के बाद मुझे लगता है कि बीते तीन दशक के भारत और इसके पड़ोसी देश के बीच के ख़ुफ़िया तंत्र के बीच की उठापटक को समझने के लिए यह फ़िल्म बहुत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ समय में ऐसी अनेक फ़िल्में आई हैं, जिन्होंने इसी समयावधि की कुछ बेहद भयावह घटनाओं को उकेरने का काम किया है और यह फ़िल्म इनसे आगे बढ़कर आज के दौर में अज्ञात भारत मित्रों द्वारा भारत के दुश्मन आतंकवादियों के अड्डों में घुसकर उन्हें यमराज तक पहुँचाने की आज की कहानी भी बयान करती है; साथ ही मक्की और अतीक अहमद जैसे आतंकवादियों को मिट्टी में मिलाने और दाऊद इब्राहीम को ठिकाने लगाने की कोशिशों की कहानी भी बयान करती है और इन सबका केंद्रबिंदु बनता है कराची के पास स्थित ल्यारी नामक कस्बा,जहाँ के कुख्यात अपराधियों के बीच वर्चस्व की जंग के बीच में भारत के तीन जासूस ख़ुद को स्थापित करते हुए भारत पर होने वाले हमलों को रोकने में सफल होते हैं और आतंकवादियों को निपटाने का काम भी बखूबी करते जाते हैं।इस फ़िल्म के पहले भाग के गाने भी चर्चित हुए थे और भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी शादी विवाहों में लोग उसके बोलों पर थिरक रहे थे।

यह फ़िल्म वास्तव में भारत विरोधी बॉलीवुड फिल्मकारों के कफ़न में आख़िरी कील ठोंकने का काम करती है क्योंकि भारत की जानता अब इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी है कि वामपंथी एजेंडे के फ़िल्मकार केवल मनोरंजन नहीं परोसते, बल्कि अपने भारत विरोधी और सनातनद्रोही एजेंडे को भी फ़िल्मों के माध्यम से धार ओ देने का काम करते हैं। इसीलिए अब दबे मुँह से ही सही ऐसे फ़िल्मकार भी इस फ़िल्म तथा ऐसी अन्य फ़िल्मों की प्रशंसा करने के लिए विवश हैं। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिये कि वामियों ने रणबीर सिंह के अभिनय की प्रशंसा करने की जगह उनके बहिष्कार का निकृष्ट प्रयास किया जिसमें वे बुरी तरह विफल रहे और उन्हें इस अभिनेता के आगे झुकना पड़ा। मेरे विचार से फ़िल्मकार आदित्य धर ने कई कालजयी फ़िल्में बनाई हैं, जिनमें उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म धुरंधर है एल, जिसे एक बार अवश्य देखना चाहिए, किन्तु यह आरम्भ है अंत नहीं।

क्राँतिकारी नानक भील का बलिदान : किसानों के शोषण के विरुद्ध आँदोलन चलाया

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बूँदी (राजस्थान) : स्वतंत्रता के बाद भी अँग्रेजों के बाँटो और राज करो षड्यंत्र के अंतर्गत सोचने वाले वालों के लिये बलिदानी नानक भील एक बड़ा उदाहरण है । बलिदानी नानक भील वनवासी थे लेकिन उन्होंने एक सशक्त किसान आँदोलन चलाया ।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान खाली हुआ अपना खजाना भरने केलिये अंग्रेजों ने भारत में बलपूर्वक बसूली शुरु करदी। इससे सर्वाधिक प्रभावित किसान हुये । अंग्रेजों द्वारा नियुक्त सैनिकों ने गांव गांव जाकर बसूली केलिये किसानों को प्रताड़ित करना आरंभ कर दिया । देश भर में इसका विरोध शुरु हुआ । राजस्थान के बूँदी जिले में आरंभ हुये किसान के विरोध आँदोलन में क्राँतिकारी नानक भील की भूमिका महत्वपूर्ण थी । क्राँतिकारी नानक भील का जन्म राजस्थान के बूँदी जिला अंतर्गत बराड़ क्षेत्र के गाँव धनेश्वर में हुआ था । उनके जन्म की तिथि और जीवन का विवरण कहीं नहीं मिलता । अंग्रेजों के पुलिस रिकार्ड में नाम, आयु, पिता का नाम और गाँव का नाम मिलता है । स्थानीय लेखकों ने लोक जीवन की चर्चाओं के आधार पर जीवनी तैयार की है । इनका जन्म की तिथि का विवरण भी नहीं है । अंग्रेजों के पुलिस रिकार्ड में दर्ज आयु के अनुसार जन्म वर्ष 1890 माना गया है । इनके पिता पिता का नाम भेरू भील था वे जंगल से वनोपज लाकर धनेश्वर गांव में बेचते थे । समय के साथ पिता ने गांव भी एक कच्चा घर बना लिया था । नानक भील का जन्म इसी गाँव में हुआ था । वे बचपन से बहुत निडर और साहसी थे । उनके मित्रों वनवासी युवाओं की एक अच्छी टोली थी ।

साथ ही गांव में रहने वाले युवाओं का भी अच्छा समूह बन गया था । समय के साथ उन्होंने भी वन से वनोपज लाकर अन्य गाँवों में बेचना आरंभ कर दिया इससे उनका संपर्क आसपास के गाँवों में भी बन गया । उन्ही दिनों क्षेत्र के समाजसेवी गोविंद गुरु और मोतीलाल तेजावत ने अंग्रेजों के बलपूर्वक बसूली अभियान के विरुद्ध आँदोलन आरंभ किया । इसके लिये उन्होंने नानक भील को जोड़ा। नानक भील इस आंदोलन से जुड़ गये और अपनी युवा टोली के साथ पूरे क्षेत्र में झंडा गीतों के माध्यम से अंग्रेजों का विरुद्ध जन जागरण अभियान चलाने लगे । वे गीत भी अच्छा गाते थे और हाट बाजार में लोगों को एकत्र करके अंग्रेजों के षड्यंत्र से अवगत कराते । वे हाट बाजार के साथ गाँवों में किसानों की सभाएँ भी करते थे । ऐसी ही एक सभा 13 जून 1923 को डाबी में आयोजित की गई थी वहीं पर अचानक से अंग्रेज पुलिस पहुँची और घेर लिया । तब नानक भील सभा को संबोधित कर रहे थे । पुलिस को देखकर सभा में भगदड़ मच गई लेकिन नानक भील बिल्कुल विचलित न हुये । और झंडा लहराते हुए झंडा गीत गाने लगे । इससे क्रोधित अंग्रेज कमांडर क्रोधित हुआ उसने नानक भील को गोली मारने का आदेश दे दिया । एक सिपाही ने नानक भील के सीने पर गोली मारदी । नानक भील भूमि पर गिरे और बलिदान हो गये । लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ न गया । पूरे वनक्षेत्र में उनके बलिदान की प्रतिक्रिया हुई और आँदोलन ने जोर पकड़ लिया । अंत में अंग्रेजों की शासन ने बसूली की कुछ व्यवस्था में परिवर्तन किया तथा उन किसानों सख्ती कम करदी जिनकी फसल खराब हो गई थी । इससे किसानों और जन सामान्य को कुछ राहत मिली ।

नानक भील ने जितने क्षेत्र में सभाएँ करके जन जागरण किया उस क्षेत्र में अब बराड़ क्षेत्र के तेरह ग्राम पंचायत क्षेत्र आते हैं । क्राँतिकारी नानक भील ने इस पूरे क्षेत्र में वनवासियों और किसानों को जाग्रत किया था । स्वतंत्रता के बाद धनेश्वर और बराड़ में अमर शहीद नानक भील की स्मृति में प्रतिमा स्थापित की गई और बराड़ में बार्षिक मेले का आयोजन भी आरंभ हो गया है ।

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