कुतर्क की कुत्तागिरी की कोई हद नहीं

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दयानंद पांडेय

दिल्ली । वह कौन कृतघ्न और घृणित लोग हैं जिन्हों ने स्मित मच्छार के साहस को सैल्यूट नहीं किया l सैल्यूट ? अरे इस घटना की नोटिस तक नहीं ली l सिर्फ़ इस लिए कि हमलावर को-पायलट मुस्लिम जेहादी था l किसी मुस्लिम संगठन , ओवैसी आदि तो छोड़िए, कांग्रेस , सपा जैसी सभी सेक्यूलर सूरमा पार्टियां भी इस बाबत कब्रिस्तान जैसी ख़ामोशी अख़्तियार किए बैठी हैं l

ऐसे जैसे कुछ घटा ही न हो l और तो और कुछ श्वान तो स्मित मच्छार की मजम्मत में भी उपस्थित हो गए हैं l पूछ रहे हैं कि नेतन्याहू को कैसे यह सब पता चल गया ? और तो और मोदी ने बिना सोचे समझे कैसे नेतन्याहू को आँख बंद कर फालो कर लिया ? अजब-ग़ज़ब सवाल हैं इन श्वानों के l

स्मित मच्छार का दोष सिर्फ़ इतना है कि एक तो वह हिंदू है , तिस पर ब्राह्मण l गुजराती भी l हनुमान चालीसा पढ़ने की बात बताई है उस कठिन घड़ी में , स्मित मच्छार ने l हनुमान चालीसा की ताक़त का बखान किया है स्मित ने l भगवत गीता की बात की l यह सब कहां बर्दाश्त होगा इन अभागों को l फिर ओमान के उस जेहादी को-पायलट के प्लान को क्यों नाकाम कर दिया l कुतर्क की कुत्तागिरी की कोई हद नहीं है l स्मित मच्छार ने अपनी जान पर खेल कर कैसे इतने सारे लोगों को बचा लिया , सारे भौंकते हुए सवाल इसी पर है l या फिर ख़ामोशी !

अल्ला हो अकबर ! का नारा उस ओमान के जेहादी को-पायलट ने ही नहीं , यह सारे कृतघ्न और घृणित लोग भी लगा रहे हैं l बस शब्द बदल गए हैं l भाव और जेहाद वही हैं l

संघ की दृष्टि में ऐसे हैं महात्मा गांधी

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~डॉ. मनमोहन वैद्य

दिल्ली । संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी। परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार-बार लेते हैं जिनका आचरण और जिनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखता
एक बात मैंने देखी है। जो गांधी जी के असली अनुयायी हैं। वे अपने आचरण पर अधिक ध्यान देते हैं, वे कभी गोडसे का नाम तक नहीं लेते। संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी। परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार-बार लेते हैं जिनका आचरण और जिनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखता। वे तो सरासर असत्य और हिंसा का आश्रय लेने वाले और अपने स्वार्थ के लिए गांधी जी का उपयोग करने वाले ही होते हैं।

एक दैनिक के सम्पादक ने, जो संघ के स्वयंसेवक भी हैं, कहा कि एक गांधीवादी विचारक के लेख हमारे दैनिक में प्रकाशित हो रहे हैं। उस सम्पादक ने यह भी कहा कि उन गांधीवादी विचारक ने लेख लिखने की बात करते समय यह कहा था कि संघ के और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह मैं जानता हूं, फिर भी मैं उन कुछ पहलुओं के बारे में लिखूंगा जिनके बारे में आप अनजान हैं। यह सुन कर मैंने प्रश्न किया कि संघ और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह वे विचारक सही में जानते हैं? लोग बिना जाने, बिना अध्ययन किए अपनी धारणाएं बना लेते हैं। संघ के बारे में तो अनेक विद्वान, स्कॉलर कहलाने वाले लोग भी पूरा अध्ययन करने का कष्ट किए बिना या, सिलेक्टिव अध्ययन के आधार पर या एक विशिष्ट दृष्टिकोण से लिखे साहित्य के आधार पर ही अपने ‘विद्वतापूर्ण’ विचार व्यक्त करते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि इन विचारों का ‘सत्य’ से कोई लेना-देना नहीं होता है।

महात्मा गांधी के कुछ मतों से घोर असहमति होते हुए भी, उनके संघ से संबंध कैसे थे, इस पर उपलब्ध जानकारी पर नजर डालनी चाहिए। भारत की आजादी के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में जनाधार को व्यापक बनाने के शुद्ध उद्देश्य से मुसलमानों के कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले हिस्से के सामने उनकी शरणागति से सहमत न होते हुए भी, आजादी के आंदोलन में सर्वसामान्य लोगों को सहभागी होने के लिए उन्होंने चरखे जैसा सहज उपलब्ध अमोघ साधन और सत्याग्रह जैसा सहज स्वीकार्य तरीका दिया, वह उनकी महानता है। ग्राम स्वराज्य, स्वदेशी, गोरक्षा, अस्पृश्यता निर्मूलन आदि उनके आग्रह के विषयों से भारत के मूलभूत हिंदू चिंतन से उनके लगाव और आग्रह के महत्व को कोई नकार नहीं सकता। उनका स्वयं का मूल्याधारित जीवन अनेक युवक-युवतियों को आजीवन व्रतधारी बनकर समाज की सेवा में लगने की प्रेरणा देने वाला था।

1921 के असहयोग आंदोलन और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, इन दोनों सत्याग्रहों में डॉक्टर हेडगेवार सहभागी हुए थे। इस कारण उन्हें 19 अगस्त 1921 से 12 जुलाई 1922 तक और 21 जुलाई,1930 से 14 फरवरी, 1931 तक, दो बार सश्रम कारावास की सजा भी हुई।

महात्मा गांधी को 18 मार्च, 1922 को छह वर्ष की सजा हुई। तब से उनकी मुक्ति तक प्रत्येक महीने की 18 तारीख ‘गांधी दिन’ के रूप में मनाई जाती थी। 1922 के अक्तूबर मास में ‘गांधी दिन’ के अवसर पर दिए गए भाषण में डॉक्टर हेडगेवार ने कहा कि आज का दिन अत्यंत पवित्र है। महात्मा जी जैसे पुण्यश्लोक पुरुष के जीवन में व्याप्त सद्गुणों के श्रवण एवं चिंतन का यह दिन है। उनके अनुयायी कहलाने में गौरव अनुभव करने वालों के सिर पर तो उनके इन गुणों का अनुकरण करने की जिम्मेदारी विशेषकर है।

1934 में वर्धा में श्री जमनालाल बजाज के यहां जब गांधी जी का निवास था तब पास ही संघ का शीत शिविर चल रहा था। उत्सुकतावश गांधी जी वहां गए, संघ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया और स्वयंसेवकों के साथ उनका वार्तालाप भी हुआ। वार्तालाप के दौरान जब उन्हें पता चला कि शिविर में अनुसूचित जाति से भी स्वयंसेवक हैं, और उनसे किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना सब भाईचारे के साथ स्नेहपूर्वक साथ रहते हैं, सारे कार्यक्रम साथ करते हैं, तब उन्होंने बहुत प्रसन्नता व्यक्त की।

स्वतंत्रता के पश्चात जब गांधी जी का निवास दिल्ली में मैला ढोने वाले समाज की कॉलोनी में था, तब सामने मैदान में संघ की प्रभात शाखा चलती थी। सितम्बर में गांधी जी ने प्रमुख स्वयंसेवकों से बात करने की इच्छा व्यक्त की और सम्बोधित किया-‘बरसों पहले मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक श्री हेडगेवार जीवित थे। स्व. जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गए थे। मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ था। तब से संघ काफी बढ़ गया है। मैं तो हमेशा से यह मानता हूं कि जो भी संस्था सेवा और आत्म-त्याग के आदर्श से प्रेरित है, उसकी ताकत बढ़ती ही है। लेकिन सच्चे रूप में उपयोगी होने के लिए त्याग भाव के साथ ध्येय की पवित्रता और सच्चे ज्ञान का संयोजन आवश्यक है। ऐसा त्याग, जिसमें इन दो चीजों का अभाव हो, समाज के लिए अनर्थकारी सिद्ध हुआ है।’ (यह सम्बोधन ‘गांधी समग्र वाड्मय’ के खंड 89 में 215-217 पृष्ठ पर प्रकाशित है।)

30 जनवरी, 1948 को तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी मद्रास में एक कार्यक्रम में थे, जब उन्हें गांधी जी की मृत्यु का समाचार मिला। उन्होंने तुरंत ही प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, गृह मंत्री सरदार पटेल और गांधी जी के सुपुत्र देवदास गांधी को टेलीग्राम द्वारा अपनी शोक संवेदना भेजी। उसमें श्री गुरुजी ने लिखा, ‘प्राणघातक क्रूर हमले के फलस्वरूप एक महान विभूति की दु:खद हत्या का समाचार सुनकर मुझे बड़ा आघात लगा। वर्तमान कठिन परिस्थिति में इससे देश की अपरिमित हानि हुई है। अतुलनीय संगठक के तिरोधान से जो रिक्तता पैदा हुई है, उसे पूर्ण करने और जो गुरुतर भार कंधों पर आ पड़ा है, उसे पूर्ण करने का सामर्थ्य भगवान हमें प्रदान करें।’

गांधी जी के प्रति सम्मान रूप शोक व्यक्त करने के लिए 13 दिन तक संघ का दैनिक कार्य स्थगित करने की सूचना उन्होंने देशभर के स्वयंसेवकों को दी। दूसरे ही दिन 31 जनवरी, 1948 को श्री गुरुजी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा। उसमें वे लिखते हैं- ‘कल मद्रास में वह भयंकर वार्ता सुनी कि किसी अविचारी भ्रष्ट-हृदय व्यक्ति ने पूज्य महात्मा जी पर गोली चलकर उस महापुरुष के आकस्मिक-असामयिक निधन का नीरघृण कृत्य किया। यह निंदा कृत्य संसार के सम्मुख अपने समाज पर कलंक लगाने वाला हुआ है।’

ये सारी जानकारी ‘Justice on Trial’ नामक पुस्तक में और श्री गुरुजी समग्र में उपलब्ध है। 6 अक्तूबर, 1969 में महात्मा गांधी जी की जन्मशताब्दी के समय महाराष्ट्र के सांगली में गांधी जी की प्रतिमा का श्री गुरुजी के द्वारा अनावरण किया गया। उस समय श्री गुरुजी ने कहा-‘आज एक महत्वपूर्ण व पवित्र अवसर पर हम एकत्र हुए हैं। सौ वर्ष पूर्व इसी दिन सौराष्ट्र में एक बालक का जन्म हुआ था। उस दिन अनेक बालकों का जन्म हुआ होगा, पर हम उनकी जन्म-शताब्दी नहीं मनाते। महात्मा गांधी जी का जन्म सामान्य व्यक्ति के समान हुआ, पर वे अपने कर्तव्य और अंत:करण के प्रेम से परमश्रेष्ठ पुरुष की कोटि तक पहुंचे। उनका जीवन अपने सम्मुख रखकर, अपने जीवन को हम उसी प्रकार ढालें। उनके जीवन का जितना अधिकाधिक अनुकरण हम कर सकते हैं, उतना करें’।

‘लोकमान्य तिलक के पश्चात महात्मा गांधी ने अपने हाथों में स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्र संभाले और इस दिशा में बहुत प्रयास किए। शिक्षित-अशिक्षित स्त्री-पुरुषों में यह प्रेरणा जगाई कि अंग्रेजों का राज्य हटाना चाहिए, देश को स्वतंत्र करना चाहिए और स्व के तंत्र से चलने के लिए जो कुछ मूल्य देना होगा, वह हम देंगे। महात्मा गांधी ने मिट्टी से सोना बनाया। साधारण लोगों में असाधारणत्व निर्माण किया। इस सारे वातावरण से ही अंग्रेजों को हटना पड़ा’।

‘वे कहा करते थे-मैं कट्टर हिन्दू हूं, इसलिए केवल मानवों से ही नहीं, सम्पूर्ण जीवमात्र से प्रेम करता हूं।’ उनके जीवन व राजनीति में सत्य व अहिंसा को जो प्रधानता मिली, वह कट्टर हिंदुत्व के कारण ही मिली।

‘जिस हिंदू-धर्म के बारे में हम इतना बोलते हैं, उस धर्म के भवितव्य पर उन्होंने ‘फ्यूचर ऑफ हिंदुइज्म’ शीर्षक से अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने लिखा है-‘ हिंदू धर्म यानी न रुकने वाला, आग्रह के साथ बढ़ने वाला, सत्य की खोज का मार्ग है। आज यह धर्म थका हुआ-सा, आगे जाने की प्रेरणा देने में सहायक प्रतीत होता अनुभव में नहीं आता। इसका कारण है कि हम थक गए है, पर धर्म नहीं थका। जिस क्षण हमारी यह थकावट दूर होगी, उस क्षण हिंदू धर्म का भारी विस्फोट होगा जो भूतकाल में कभी नहीं हुआ, इतने बड़े परिमाण में हिंदू धर्म अपने प्रभाव और प्रकाश से दुनिया में चमक उठेगा’। महात्मा जी की यह भविष्यवाणी पूरी करने की जिम्मेदारी हमारी है।

‘ देश को राजकीय स्वतंत्रता चाहिए, आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए। उसी भांति इस तरह की धार्मिक स्वतंत्रता चाहिए कि कोई किसी का अपमान न कर सके, भिन्न-भिन्न पंथ के, मत के लोग साथ-साथ रह सकें। विदेशी विचारों की दासता से अपनी मुक्ति होनी चाहिए। गांधी जी की यही सीख थी। मैं गांधी जी से अनेक बार मिला हूं। उनसे बहुत चर्चा भी की है। उन्होंने जो विचार व्यक्त किए, उन्हीं के अध्ययन से मैं यह कह रहा हूं। इसीलिए अंत:करण की अनुभूति से मुझे महात्मा जी के प्रति नितांत आदर है।

गुरुजी कहते हैं, ‘महात्मा जी से मेरी अंतिम भेंट सन् 1947 में हुई थी। उस समय देश को स्वाधीनता मिलने से शासन-सूत्र संभालने के कारण नेतागण खुशी में थे। उसी समय दिल्ली में दंगा हो गया। मैं उस समय शांति प्रस्थापना करने का काम कर रहा था। गृह मंत्री सरदार पटेल भी प्रयत्न कर रहे थे और उस कार्य में उन्हें सफलता भी मिली। ऐसे वातावरण में मेरी महात्मा गांधी से भेंट हुई थी। महात्मा जी ने मुझसे कहा-देखो यह क्या हो रहा है? मैंने कहा-यह अपना दुर्भाग्य है।

अंग्रेज कहा करते थे कि हमारे जाने पर तुम लोग एक-दूसरे का गला काटोगे। आज प्रत्यक्ष में वही हो रहा है। दुनिया में हमारी अप्रतिष्ठा हो रही है। इसे रोकना चाहिए। गांधीजी ने उस दिन अपनी प्रार्थना सभा में मेरे नाम का उल्लेख गौरवपूर्ण शब्दों में कर, मेरे विचार लोगों को बताए और देश की हो रही अप्रतिष्ठा रोकने की प्रार्थना की। उस महात्मा के मुख से मेरा गौरवपूर्ण उल्लेख हुआ, यह मेरा सौभाग्य था। इन सारे सम्बन्धों से ही मैं कहता हूं कि हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।’

मैं जब वडोदरा में प्रचारक था तब (1987-90) सहसरकार्यवह श्री यादवराव जोशी का वडोदरा में प्रकट व्याख्यान था। उसमें श्री यादवराव जी ने महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान के साथ उल्लेख किया। व्याख्यान के पश्चात कार्यालय में एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा कि आज आपने महात्मा गांधी जी का सम्मानपूर्वक जो उल्लेख किया, वह क्या मन से किया था? इस पर यादवराव जी ने कहा कि मन में ना होते हुए भी, मैं केवल बोलने वाला कोई राजकीय नेता नहीं हूं। जो कहता हूं, मन से ही कहता हूं। फिर उन्होंने समझाया कि जब किसी व्यक्ति का हम आदर-सम्मान करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनके सभी विचारों से हम सहमत होते हैं। एक विशिष्ट प्रभावी गुण के लिए हम उन्हें याद करते हैं, आदर्श मानते हैं। जैसे पितामह भीष्म को हम उनकी प्रतिज्ञा की दृढ़ता के लिए अवश्य स्मरण करते हैं, परंतु राज सभा में द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय वे सारा अन्याय मौन बैठे देखते रहे, इसका समर्थन हम नहीं कर सकते हैं। इसी तरह कट्टर और जिहादी मुस्लिम नेतृत्व के संबंध में गांधी जी के व्यवहार के बारे में घोर असहमति होने के बावजूद, स्वतंत्रता आंदोलन में जनसामान्य को सहभागी होने के लिए उनके द्वारा दिया गया अवसर, स्वतंत्रता के लिए सामान्य लोगों में उनके द्वारा प्रज्ज्वलित की गई ज्वाला, भारतीय चिंतन पर आधारित उनके अनेक आग्रह के विषय, सत्याग्रह के माध्यम से व्यक्त किया जन आक्रोश-ये उनका योगदान निश्चित ही सराहनीय और प्रेरणादायी है।

इन सारे तथ्यों को ध्यान में लिए बिना संघ और गांधी जी के संबंध पर टिप्पणी करना असत्य और अनुचित ही कहा जा सकता है। ग्राम विकास, सेंद्रिय कृषि, गोसंवर्धन, सामाजिक समरसता, मातृभाषा में शिक्षा और स्वदेशी अर्थ व्यवस्था एवं जीवनशैली-ऐसे महात्मा गांधी जी के प्रिय एवं आग्रह के क्षेत्रों में संघ स्वयंसेवक पूर्ण मनोयोग से सक्रिय हैं। इस वर्ष महात्मा गांधी जी की 150 वीं जयंती है। उनकी पावन स्मृति को विनम्र आदरांजलि।

(लेख पाञ्चजन्य की आर्काइव से लिया गया है )

बलात्कारः स्त्री देह में ‘मजा’ और ‘सजा’ की संस्कृति -सुधा सिंह

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दिल्ली। यौन अपराधों के साथ जब तक ‘मजा’ और ‘सजा’ का संबंध बना रहेगा, ये अपराध थमने वाले नहीं। जिसने यौन अपराध किया वह अपराधी है लेकिन पूरा समाज ही इस अपराधी मानसिकता को बनाने का जिम्मेदार ठहरता है।
पुरुषों के लिए ‘मर्दानगी’ जिसमें उसकी कामुकता का एक बड़ा हिस्सा शामिल है, प्रदर्शन जरूरी बात मानी जाती है, पुरुष होने की पहली शर्त कि वह ‘मर्द’ के गुणों से युक्त हो। स्त्री को अपनी कामुकता के बल पर ‘काबू’ में रख सके। पुरुष कामुकता का संबंध अनिवार्यतः सामंती मानसिकता वाले समाज में देह के जोर से है। इस आधार को तय करने वाली चीज आयु, स्वास्थ्य, लिंग की ताक़त से है। यह एक सामान्य अवस्थागत स्थिति है जो स्त्री-पुरुष दोनों ही के साथ घटित होती है। लेकिन पुरुष अबाध रूप से इस लैंगिक ताक़त को भोग सके इसके लिए आयु के बंधन जिसके साथ शारीरिक शक्ति का स्वाभाविक क्षय होता है, को शिथिल कर दिया गया है। उसे सामान्य चलन में ‘साठा तब पाठा’, या ‘मर्दों की उम्र नहीं देखी जाती’, ‘….के बैल और मानख एक जैसे होते हैं’, आदि कहकर सामाजिक चेतना में स्थापित किया जाता है।यानि स्त्री-पुरुष का संबंध अंततः देह का ही संबंध ठहराया जाता है, बाकि संबंध महत्वपूर्ण नहीं। इस बात को हमारे महान् शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने इस तरह कहा है-
‘‘गो हाथ को जुम्बिश नहींआँखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मिरे आगे। ’’
जाहिर है देह बल में जैविक तौर पर स्त्री कुछ अपवादों को छोड़कर कमतर ठहरती है। स्त्री-पुरुष संबंधों का आधार देहबल को बनाने के साथ साथ इसका विस्तार स्त्री और पुरुष की सामाजिक भूमिकाओं में किया जाता है- स्त्री के काम अलग, पुरुष के काम अलग। और फिर स्त्री चूंकि ‘घर’ के काम करती है, तो तय किया गया कि ‘घर’ आराम की जगह है, मेहनत और कठोर श्रम की जगह बाहर है तो स्त्री की तुलना में पुरुष का ज्यादा शारीरिक श्रम ठहरा और इस नियम से पुष्टिकर भोजन जिसका ‘घर’ के संसाधनों के हिसाब से जितना भी प्रबंध है उसमें पुरुष का भाग पहला और विशेष होना चाहिए, यह भी तय हुआ।
जबकि शारीरिक क्षय की स्थिति माहवारी और बच्चा पैदा करने के क्रम में स्त्री के शरीर की एक निरंतर चक्रीय प्रक्रिया है जो अवस्था के साथ-साथ कई बार हारमोनजनित परिवर्तनों के कारण और भी दुरुह होती जाती है। इससे हर स्त्री को, स्त्री होने के जैविक कारणों से गुजरना होता है।लेकिन वह ‘घर’ की मालकिन ‘अन्नपूर्णा’ ठहरी, उसे तो सबका लालन-पालन करना है, सबकी संतुष्टि में उसकी संतुष्टि है।तो देवी स्वभाववाली अन्नपूर्णाएँ अपने को शारीरिक रूप से खपाकर और भी दुर्बल बनती रहीं, यह स्वाभाविक हुआ।
शरीर बल को बढ़ानेवाले और उसकी आवश्यकता महसूस करानेवाले ‘बाहर के क्षेत्र’ से ‘घर की लक्ष्मियां’ दूर रखी गईं। वहाँ उनके ‘बिगड़ने’ का ख़तरा था। उसी परिवेश में घूमकर पुरुष, ‘पुरुष’ बनते हैं, ‘बिगड़ते’ नहीं, ‘पुरुषोचित’ गुणों को अर्जित करते हैं पर घर की ‘लक्ष्मियाँ’, ‘अन्नपूर्णाएँ’ और ‘कुमारी दुर्गाएँ’ ‘बिगड़’ सकती हैं। उन्हें सुकोमल, सुंदर, रमणीय और ‘कमनीय’ (इन शब्दों का इस्तेमाल करते हमारी प्रबुद्ध स्त्रियाँ भी नहीं ठिठकतीं, किसी स्त्री की फेसबुक प्रोफाइल तस्वीर पर सहज ही इन शब्दों का प्रबुद्ध स्त्रियों द्वारा प्रशंसामूलक प्रयोग दिख सकता है!) बने रहना है, काम्य बने रहना है। ताकि वे ‘आनंद’ का बायस बनी रहें, ‘भोग’ के लायक रहें।
यह शिष्ट भाषा में ‘आनंद’ या चलताऊ भाषा में ‘मज़ा’ तभी संभव है जब स्त्री देह से कमज़ोर, बुद्धि से निर्भर और ‘बाहर’ की दुनिया की जटिल ज्ञान संरचना से वंचित हो! स्त्री का शरीर पुरुषों के ‘आनंद’ या ‘मजे’ के लिए है, इस बात को इतनी तरह से और इतने रूपों में पुष्ट कर वैध बनाया गया है कि इससे उलट सोचना संभव नहीं।यही नियम है बाकि सब विचलन! सामाजिक संरचना, घर की संरचना, बाहर की संरचना, राजनीति-अर्थ और न्याय की संरचना, ज्ञान के तमाम अनुशासनों की संरचना, अभिव्यक्ति और संप्रेषण के तमाम रूपों की संरचना इसी प्रकार की गई है।
राजनीति, अर्थ और न्याय की संरचनाओं में परिवर्तन के लिए नियम और प्रावधान बना दिए जाने के बावजूद सांस्कृतिक रूपों में उसका असर दिखाई नहीं देता। हम मानते हैं कि स्त्री को उसकी देह के आधार पर टारगेट नहीं किया जा सकता, क़ानून और व्यवस्था इसके पक्ष में है लेकिन सामाजिक व्यवहार इसको खारिज करता है, नहीं मानता। सामाजिक व्यवहार में स्त्री की देह ही ‘मजा’ और ‘सजा’ के लिए टारगेट की जाती है।
यह आदिम बोध ही समाज में तमाम शिष्ट सांस्कृतिक रूपों में अभिव्यक्त होता है। सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक बड़ा क्षेत्र साहित्य और मनोरंजन है। सूचना उद्योग को एक घड़ी हम पीछे रखें तो जिस तरह का स्वीकृत मॉडल इन दोनों जगहों पर दिखाई देता है—वह बलात्कार का ही स्वीकृत मॉडल है! जो बलात्कारी के साथ-साथ लक्षणहीन बलात्कारी तैयार करता है। जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि स्त्रियों के प्रति पुरुषों का आकर्षण और उनकी देह को ‘भोगने’ की इच्छा ‘स्वाभाविक’ है, स्त्री की इच्छा-अनिच्छा का सवाल ही नहीं। हम बड़ी सहजता से इस प्रवृत्ति को स्वाभाविक मानकर इसमें निहित बर्बरता के रूपों की निंदा करने लगते हैं, अबोध बच्ची या वृद्धा पर हुई वारदातों की निंदा करने लगते हैं। कहीं-न-कहीं सहमत होते हैं कि युवा स्त्री पुरुष के ‘भोग’ के लिए है! स्त्रियों की नकार भी उनका स्वीकार ही है। और जो ‘वीर’ हैं वे ही ‘वसुंधरा’ के ऐश्वर्य को ‘भोग’ सकते हैं। हमने भाषा में बलात्कार और यौनिक हिंसा का पूरा शास्त्र रच डाला है।
स्त्री की स्टीरियाटाइप छवि बनाना, उसे देह के रूप में देखना और अपनी या पराई वस्तु के रूप में वैध बनाना ये सब अंततः स्त्री के प्रति किसी न किसी रूप में हिंसा को जन्म देते हैं। यहाँ तक कि जब स्त्री पर हो रहे अत्याचारों का बयान भी करते हैं तो अवचेतन में पहले से मौजूद, सामाजिक संस्थानों द्वारा वैध बनाए गए मूल्यों और आदतों के जरिए उसमें आनंद ले रहे होते हैं। भाषा का तंत्र इसमें सहायता करता है।
साहित्य की पुस्तकों में स्त्री और पुरुष के उत्तेजक यौन शब्द-चित्र, सिनेमा के पर्दे पर स्त्री पर होनेवाले अत्याचारों की कहानी कहने के क्रम में बार-बार उसकी देह को केन्द्र कर यौनिक क्रियाओं का प्रदर्शन आदि, स्त्री के पक्ष में सहानुभूति और सम्मान का घोषित लक्ष्य रखने के बावजूद, ऐसा करने में असफल होते हैं। इसलिए इन विधाओं के ‘मैसेज’ स्त्री-पक्ष में होने की घोषणा के बावजूद स्त्री के पक्ष में नहीं होते। 16 एमएम और उसके पहले की हिंदी सिनेमा के आम ट्रेंड को याद कीजिए जहाँ नायिका पर यौनिक हिंसा और बलात्कार के दृश्य ‘हीरो’ की ‘मर्दानगी’ के प्रदर्शन लिए जरूरी हुआ करता था और ‘विलेन’ के चंगुल से छूटकर कोमल-भयभीत ‘हीरोइन’ अपनी ‘देह’ को बचाती हुई सीधे ‘हीरो’ को ‘देह’ स्वेच्छया प्रदान कर देती थी। खलनायक से नायक की तरफ शिफ़्टिंग, स्त्री देह को भोगने की ‘बर्बर मर्दानगी’ के बजाय ‘सॉफ्ट मर्दानगी’ की शिफ्टिंग भर है और कुछ नहीं, जहाँ स्त्री जो कहने को हीरोइन है अपने रोम-रोम से पुरुष की सौम्य या सॉफ़्ट मर्दानगी में आश्रय ढूँढ़, सुकून पाती दिखाई जाती है।
स्त्री की देह के साथ जितने ‘मूल्य’ जोड़े गए हैं उनमें स्त्री-अस्तित्व और व्यक्तित्व के लिए सबसे घातक मूल्य है ‘इज़्जत’। यह इज़्जत भी स्त्री की अपनी नहीं, पुरुष की इज़्जत जो स्त्री की ‘देह’ से जुड़ी है। समाज में प्रचलित कहावतों और मुहावरों पर ग़ौर करें तो इस मर्दाना इज़्जत की जटिल संरचना को समझा जा सकता है। इसमें ‘मालिक’ और ‘दास’ का भाव है, ‘वस्तु’ पर स्वामित्व का बोध है। ‘‘हाथी घूमे गाँव-गाँव, जाको हाथी ताको नाँव’’, ‘‘कमज़ोर की लुगाई, गाँव भर की भौजाई’’ आदि कितनी कहावतें हैं जो स्त्री-पुरुष की यौनिकता पर आधारित संबंधों की व्यवहारिक पुष्टि करती हैं। ऐसे में पढ़े-लिखे, सामान्य पढ़े-लिखे और अशिक्षित पुरुषों में स्त्रियों को लेकर जो मानसिकता और बोध विकसित होता है वह किस प्रकार का हो सकता है, समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
देह-आधारित संबंध पर ‘नियंत्रण’ भी देह की ताक़त का ही होगा। स्त्री अगर इस ‘नियंत्रण’ और ‘स्वामित्व’ को किसी भी रूप में मानने से इंकार करती है तो उसे ‘सजा’ मिलती है। धर्मशास्त्रों में स्त्री के लिए किसी स्वर्ग का प्रावधान नहीं है, पति के चरणों में ही स्त्री का स्वर्ग बताया गया है। फिर वह पति कितना ही बदचलन, बर्बर या असभ्य क्यों न हो! हमारा शास्त्र, हमारा साहित्य और हमारा मीडिया लगातार स्त्री की इस छवि को पुष्ट करते हैं।
‘नियंत्रण’ और ‘स्वामित्व’ न मानने वाली स्त्री के लिए ‘सजा’ है यह ‘सजा’ पुनः उसकी ‘देह’ को आधार बनाकर ही तय की जाती है। लोकप्रिय वेब सीरिज ‘‘मिर्जापुर’’ में नायक की पत्नी की भूमिका याद कीजिए, वह सिर्फ एक ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ की तरह प्रदर्शित है। घर के नौकर के साथ शारीरिक संबंध बनाने के कारण उसका अपंग ससुर उसे ‘सजा’ के लायक समझता है और बदनामी का भय दिखाकर खानदान की इज़्जत के नाम पर उसके साथ बलात्कार करता है। वह अपाहिज और अशक्त है फिर भी एक युवा और ऊर्जा से भरी स्त्री पर भारी पड़ता है चूँकि वह किसी प्रकार का शारीरिक प्रतिरोध नहीं करती क्योंकि उसके पति और घरवालों को नौकर के साथ उसके शारीरिक संबंध की बात पता चलने पर वह ‘पतिव्रता’ के आसन से च्युत हो सकती थी और उसका जीवन नर्क किया जा सकता था, अतः वृद्ध, अशक्त, अपाहिज ‘पुरुष’ भी उसकी ‘देह’ को अपमानित करके उसे सजा दे सकने का सामर्थ्य रखता है!
धर्म स्त्री को सामाजिक रूप से ‘नियंत्रित’ करने का बड़ा आधार है। देह आनंद देती है तो देह ही सब भोगों का आधार है। स्त्री की देह पर नियंत्रण रखना है तो उसे अपौष्टिक भोजन दो, भूखा रखो, धर्म के नाम पर व्रत-उपवास कराओ, कभी पति की लंबी उम्र के नाम पर, कभी संतान की खुशी के नाम पर-किसी भी बहाने उसे सामान्य जीवन न जीने दो।
और तो और धर्म का आडंबर तो स्त्रियों के लिए दोहरा छल है! आत्मिक मुक्ति और उत्थान अगर इतना ही वांछनीय है तो यहाँ भी स्त्री को पुरुष के बराबर अधिकार क्यों नहीं दिए गए? क्यों उसके साथ एक बार फिर छल किया गया? ‘परमात्मा’ को प्राप्त करना अगर सर्वोच्च आनंद और मुक्ति प्राप्त करना है तो स्त्री को सीधे उसी रूप में जिस रूप में पुरुष साधना कर सकता है, साधना के अधिकार से क्यों वंचित किया!
सभी धर्मों में स्त्री के लिए एक उपधर्म बनाया गया, उसका ‘परमात्मा’ उसके पति या स्वामी को ठहराया गया! यह विचित्र स्थिति थी, सबके ऊपर ईश्वर लेकिन स्त्री का ईश्वर, उसका मालिक पुरुष! इस धारणा को आधुनिक समय में भी महिमामंडित किया जाता है। ‘पातिव्रत्य धर्म’ को धर्म की एक उपधारा के रूप में स्त्रियों के लिए स्थिर कर दिया गया। ताकि वे अपनी यौनिकता को अंकुश में रखें, स्वयं ही अपने को तरह-तरह से बंधनों में जकड़ कर अपनी कार्य-शक्ति, अपनी यौनिकता, अपनी इच्छाओं के पर कतर दें। और अपने अलावा अन्य स्त्रियों पर भी इस अंकुश का विस्तार पितृसत्ता के हित में करती रहें। ऐसा न करने वाली स्त्रियाँ कुलटा, कुलच्छिनी, चरित्रहीन आदि विशेषणों से नवाजी जाएँ, यह सुनिश्चित कर लिया गया। आज के बॉलीवुड का लोकप्रिय गीत है ‘‘भला है बुरा है जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है’’! हज़ारों साल पहले कबीर ने गाया ‘‘पतिव्रता मैली भली, काली कुचित कुरुप’’! अद्भुत साम्य है, स्त्री के प्रति पुरुषों की इस मनोदशा में आधुनिक काल की समझदारी और वैज्ञानिकता की ज़रा भी हवा न लगी!
स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता का दावा करने वाले सभ्य से सभ्य संबंधों में पुंसवादी वर्चस्व की स्थितियाँ हावी रहती हैं। पुरुष प्यार करता है तो इस दावे के साथ कि ऐसा प्यार तुम्हें और कोई नहीं कर सकता! रसोई या घर का काम करता है तो इस भाव के साथ कि ‘तुम्हारा काम’ कर रहा हूँ। जबकि इन्हीं स्थितियों के संदर्भ में देखें तो बाहर जाकर काम करने वाली स्त्री नहीं कह पाती पुरुष से कि वह ‘तुम्हारा काम’ कर रही है! क्योंकि यह पुरुष ही कहता फिर रहा है कि स्त्रियाँ पढ़-लिखकर, घर के बाहर जाकर पुरुषों का काम कर रही हैं!! लेकिन यह कथन स्त्रियों के लिए भर्त्सनामूलक है, उन्हें पुरुषों के अवसर छीनने वाला साबित करता है!!!
शिक्षित स्त्रियों की बेरोजगारी जैसी समस्या तो सुनाई ही नहीं पड़ती। ‘बेरोजगार’ तो केवल पुरुष होता है, उसे ‘बाहर’ काम करना है, काम नहीं है तो वह ‘बेरोजगार’ है, स्त्रियों को ‘घर’ का काम करना है, शिक्षित हो तो भी! तो ‘बाहर’ के ‘रोजगार’ के अवसर ‘स्वाभाविक’ रूप से उसके नहीं हैं, तो वह ‘बेरोजगार’ भी नहीं है! बल्कि उसने तो ‘बाहर’ निकलकर ख़तरा पैदा कर दिया है, पुरुषों को लुभाकर रोजगार प्राप्त कर रही है और अवसर हथिया रही है! पुरुष कामुकता को उत्तेजित करने के लिए भी स्त्रियाँ ही जिम्मेदार हैं, पहले भी थीं! पुरुषों को अपनी देह के आकर्षण में बाँधकर नौकरी ले लेती हैं! अब जब ‘नारी की झांई’ मात्र से भुजंग (साँप) भी अंधा हो जाता है तो ये तो बेचारे ‘पुरुष’ हैं। अधिसंख्यक सामाजिक मानसिकता में सदियों से कुछ नहीं बदला।
ऐसे में अगर हज़ारों साल की सामाजिक फैक्ट्री में घर-घर लक्षणयुक्त और लक्षणहीन बलात्कारी पैदा हों, तो क्या आश्चर्य! (सोशल मीडिया से साभार)

रोमिला थापर: ऐतिहासिक मोतियाबिंद से ग्रसित  डिस्टोरियन

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डॉ. पवन विजय

दिल्ली। रोमिला थापर पिछले कई दशक से अकादमिक और सिविल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय के तौर पर मौजूद है। तथ्यों के नाम पर अहंकार और कपोल कल्पनाओं को परोसती यह इस डिस्टोरियन के लेखन की पहली चाल पहचान पर हमला करने की थी। रोमिला के फर्जीफिकेशन को एक एक कर समझते हैं।

1. थापर ने लगातार ये स्थापित किया कि “हिंदू धर्म जैसा हम आज जानते हैं, वह उन्नीसवीं सदी का निर्माण है। पूर्व-औपनिवेशिक भारत में कोई एकल एकीकृत हिंदू पहचान नहीं थी।” उसके अनुसार प्राचीन भारत में केवल शैव, वैष्णव, शाक्त जैसे बिखरे हुए पंथ थे, जिनमें कोई साझा सभ्यतागत चेतना नहीं थी। इस एक तर्क से भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता को तोड़ दिया जाता है और देश को एक आधुनिक, कृत्रिम निर्माण के रूप में पेश किया जाता है।

2. उसका दूसरा कार्य हिन्दू स्रोतों को अवैध घोषित करना था। रामायण, महाभारत, पुराण, वेद और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों को ब्राह्मण एलीट वर्ग का प्रोपेगेंडा बताकर इतिहास के दायरे से बाहर कर दिया गया। इन ग्रंथों में दिए गए नगरों, राज्यों, वंशों और युद्धों के विस्तृत विवरणों को मिथक कह दिया गया। मजे की बात यह है कि यही कठोरता इस्लामिक काल के दरबारी इतिहासों पर कभी नहीं दिखाई गई, वहाँ तारीख-ए-फिरोजशाही या बाबरनामा जैसे एकतरफा ग्रंथ भी प्रामाणिक स्रोत बन जाते हैं।

3.थापर की तीसरी बात  हिंदू धर्म को पूरी तरह जाति व्यवस्था में समेत देना थी। उसके इतिहास में भक्ति आंदोलन, अद्वैत, योग, न्याय दर्शन, गणित और खगोल जैसी बौद्धिक उपलब्धियों के लिए कोई जगह नहीं बची। हर कालखंड, हर राजवंश और हर परम्परा को केवल ब्राह्मण बनाम शूद्र के शोषण के फ्रेम में पढ़ाया गया, ताकि छात्र अपने धर्म को ज्ञान की परम्परा के बजाय केवल शोषण की व्यवस्था के रूप में देखें।

4. रोमिला की चौथी रणनीति पुरातात्विक और मंदिर परम्परा के भाषा के सौंदर्य, विन्यास, विधान को सिरे से नकारना था। अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे स्थलों पर मंदिर के स्पष्ट अवशेष मिलने पर भी उन्हें धार्मिक संरचना नहीं बल्कि सामान्य आर्किटेक्चरल फीचर्स कहा गया। साथ ही एक बराबरी का झूठा नैरेटिव बनाया गया कि “महामूद गजनवी का मंदिर से जुड़ाव धार्मिक कट्टरता से ज्यादा धन के लिए विजय का मामला था।” और हिंदू राजाओं ने भी बौद्ध और जैन मठ तोड़े थे, इसलिए सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक का विध्वंस कोई धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि मध्यकालीन राजनीति का सामान्य हिस्सा था।

5. रोमिला का सबसे विषैला, हाइपोथेटिकल पैटर्न नैतिक मॉडल गढ़ने का था। अशोक जो युद्ध छोड़कर बौद्ध बन गया, वह सेक्युलर और महान है, जबकि समुद्रगुप्त, चाणक्य या पुष्यमित्र शुंग जैसे साम्राज्य निर्माता और राज्य की अवधारणा देने वाले लोग ब्राह्मणवादी और कट्टर हैं। इसका संदेश साफ था, हिंदू तभी अच्छा और प्रगतिशील माना जाएगा जब वह अपनी सत्ता, अपने प्रतीक और अपनी सभ्यतागत पहचान को खुद ही छोड़ दे।

6. हिंदू डी कंस्ट्रक्शन का मॉडल रोमिला ने तैयार किया और  मार्क्सिस्ट डिस्टोरियन की कई पीढ़ी उसी के आधार पर बनाई। इस डी कंस्ट्रक्शन मॉडल में गजनी, गोरी, तुगलक, खिलजी, बाबर हीरो हैं, हिंदू राजा मार्क्स का बुर्जुआ है। इस पूरी डी-कंस्ट्रक्शन का सबसे बेतुका उदाहरण तब सामने आया जब थापर ने अपने एक लेक्चर में कहा कि “आज कुछ इतिहासकार कह रहे हैं कि शायद जब युधिष्ठिर ने कहा कि मैं राजा नहीं बनना चाहता, तो उसके मन में अशोक की छवि थी।” यानी 5000 साल पहले का महाभारत का नायक 2300 साल बाद हुए अशोक से प्रेरणा ले रहा है। इसी सोच का विस्तार अयोध्या पर दिया गया उसका वह हलफनामा है जिसमें उन्होंने कहा था कि “अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे ऐसे किसी मंदिर का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है जिसे राम का जन्मस्थान माना जा सके,” जबकि बाद में ASI को वहां 50 से ज्यादा मंदिर स्तंभों के बेस मिले थे।

कोर्ट ने थापर की बात को नहीं माना लेकिन पिछले कई दशकों से थापर के झूठ को लिख पढ़ कर भारत के प्रोफेसर, सिविल सर्वेंट तैयार हुए। आप स्वयं सोचिए रोमिलाई स्कूल में प्रशिक्षित लोगों का भारत बोध क्या होगा।

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