गांधी की विरासत का बाजारीकरण: शांति प्रतिष्ठान में टूटती गांधीवादी आत्मा की पीड़ा

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दिल्ली। गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली। यह नाम सुनते ही कई गांधीवादी कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और सामाजिक आंदोलनकारियों की आंखों के सामने एक ऐसा परिसर उभर आता है जहां विचारों की गंध हवा में घुली रहती थी। जहां सस्ते कमरों में रात बिताकर दूर-दराज से आए किसान, नेता, पर्यावरण कार्यकर्ता और अहिंसावादी अपनी बात रखते थे। जहां सभागार में दो-चार हजार रुपये में बैठकें होती थीं और कैंटीन में सादगीपूर्ण चाय-चर्चा चलती थी। लेकिन आज उसी प्रतिष्ठान में तोड़-फोड़ का शोर है, दीवारें खुल रही हैं, कुर्सियां गायब हैं, कैंटीन बंद है और एक नया स्वरूप उभर रहा है- जिसकी कीमत पर गांधी के सिद्धांतों की बलि चढ़ रही है।

2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार, संस्थान घोर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। देश भर के 150 केंद्र बंद हो चुके थे, सालाना एक-डेढ़ करोड़ जुटाना मुश्किल हो गया था। कोरोना ने स्थिति और बिगाड़ दी। ऐसे में नवीनीकरण की जरूरत कोई नकार नहीं सकता। लेकिन सवाल यह है कि यह नवीनीकरण किस दिशा में जा रहा है? क्या यह गांधीवादी मूल्यों को मजबूत करने के लिए है या बाजार की शर्तों पर संस्थान को व्यावसायिक केंद्र में बदलने की तैयारी?

प्रतिष्ठान के स्वागत कक्ष से सोफे-कुर्सियां हटा दी गई हैं। बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है। सबसे गंभीर मुद्दा है निजी कॉर्पोरेट फंडिंग। आरोप है कि एक निजी कॉर्पोरेट समूह ने भारी धनराशि दी है, लेकिन नाम का कोई आधिकारिक खुलासा नहीं हुआ। पारदर्शिता की कमी गांधीवादी सिद्धांतों के ठीक उलट है। गांधी जी पारदर्शिता को नैतिकता का आधार मानते थे। सार्वजनिक धन या संस्था का संचालन गुप्त सौदों से नहीं चल सकता।

लेखक चिंतक किशन कालजयी के अनुसार, प्रतिष्ठित गांधीवादी विचारक पी.वी. राजगोपाल, सुदर्शन अयंगार, सुरेंद्र कुमार, निशांत अखिलेश और अन्यों ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं। नवनिर्माण के लिए पैसा किसने दिया? शर्तें क्या हैं? क्या लिखित समझौता हुआ? क्या प्रबंधन ने गांधीवादी समुदाय को विश्वास में लिया? इन सवालों के जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं आए।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुमार प्रशांत जी, जो संस्थान के अध्यक्ष हैं, पर गांधीवादी परंपरा बनाए रखने की जिम्मेदारी है, लेकिन परिवर्तन की इस प्रक्रिया में कई पुराने साथी दुखी हैं।

आर्थिक दबाव में संस्थान को बचाने की कोशिश सराहनीय हो सकती है, लेकिन तरीका चिंताजनक है। चर्चा है कि सभागार का किराया ₹2,000-₹4,000 से बढ़कर ₹50,000-₹55,000 हो सकता है। शोधकर्ताओं और कार्यकर्ताओं के लिए कमरे, जो ₹800-₹900 में मिलते थे, अब ₹3,000-₹3,500 प्रतिदिन तक पहुंच सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो सामान्य गांधीवादी कार्यकर्ता, जो सीमित संसाधनों के साथ दिल्ली आते हैं, यहां से वंचित हो जाएंगे। संस्थान जो विचार और आंदोलनों का केंद्र था, धीरे-धीरे उन लोगों के लिए हो जाएगा जिनके पास भुगतान की क्षमता है। यह गांधी की समानता और सादगी के विरुद्ध है।

लेखक गिरिश पंकज के अनुसार : गांधी शांति प्रतिष्ठान को जिस तरीके से ‘गांधी व्यावसायिक प्रतिष्ठान’ बनाने की निर्लज्ज कोशिश की जा रही है, यह दुर्भाग्यजनक है।अब यह बात साफ हो गई है कि गांधी के नाम पर इस देश में कुछ लोग मलाई खा रहे हैं। उनके तन पर भले खादी का कपड़ा हो, लेकिन वे विचार से पूरी तरह से पूंजीवादी हो चुके हैं।गांधी शांति प्रतिष्ठान में मैं भी कई बार रुक चुका हूँ। बहुत पहले तीन सौ रुपये में एक पलंग मिल जाता था फिर बाद में वह 700 भी हुआ, लेकिन अब जिस तरह से उसका कायाकल्प हो रहा है, उसे देखते हुए यह आशंका गलत नहीं है कि अब यह संस्था महंगे होटल में तब्दील होने जा रही है।

गिरिश पंकज आगे लिखते हैं : ऐसा करना गांधी का अपमान होगा, और यह भी साबित हो जाएगा कि गांधी के नाम पर किस तरह से पूंजीवादी सत्ता पनप रही है। इसका खुलकर विरोध होना चाहिए।

गांधी शांति प्रतिष्ठान केवल एक इमारत नहीं है। 1958 में स्थापित यह संस्थान स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक और गांधीवादी परंपरा का जीवंत स्मारक रहा है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरू, आर.आर. दिवाकर जैसे नेताओं से जुड़ा, जेपी आंदोलन के दौरान लोकतंत्र की रक्षा का केंद्र। 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण को यहीं से गिरफ्तार किया गया था। यहां अनुपम मिश्र जैसे पर्यावरणविदों की यादें जुड़ी हैं। अब उसी अनुपम भाई वाले कमरे का टूटना कई गांधीवादियों के दिल को चीर रहा है।

कुमार प्रशांत के नेतृत्व में संस्थान को गांधी से अलग करने की शिकायतें पहले भी रही हैं। कुछ लोग आरफा खानम शेरवानी, अजीत अंजुम जैसे पत्रकारों को गांधी पुरस्कार से जोड़ने पर सवाल उठाते हैं। अब तोड़-फोड़ का विरोध हो रहा है, लेकिन प्रबंधन पर कोई असर नहीं दिखता।

यह विवाद सिर्फ एक संस्थान का नहीं है। यह बड़े सवाल को उठाता है-क्या गांधी की संस्थाएं भी बाजार के दबाव में आत्मसमर्पण कर रही हैं? आज कई एनजीओ, ट्रस्ट और स्मारक आर्थिक तंगी में कॉर्पोरेट फंडिंग ले रहे हैं, लेकिन शर्तें अक्सर छिपी रहती हैं। नतीजा होता है मिशन का भटकना। गांधी जी ने कहा था कि साधन और साध्य एक होने चाहिए। अगर साधन बाजारू हो गए तो साध्य गांधीवादी कैसे रहेगा?

कुछ लोग कहते हैं कि आधुनिक सुविधाएं जरूरी हैं, पुराना ढांचा जर्जर हो गया है। यह तर्क सही हो सकता है, लेकिन बिना पारदर्शिता के, बिना गांधीवादी समुदाय से परामर्श के, और बिना यह सुनिश्चित किए कि मूल उद्देश्य बना रहे, यह नवीनीकरण विश्वासघात जैसा लगता है। दिल्ली में काना-फूसी है कि फंडिंग एक विपक्षी राजनीतिक दल के करीबी शराब कारोबारी से आई है। चाहे सच हो या अफवाह, गुप्तता ही इन अफवाहों को हवा दे रही है।

गांधीवादियों के लिए यह पीड़ा गहरी है। वे देख रहे हैं कि वह संस्थान, जो उनके आंदोलनों का आश्रय था, अब व्यावसायिक हो रहा है। जहां पहले विचारों की बहस होती थी, वहां अब कॉर्पोरेट इवेंट्स की संभावना नजर आ रही है। जहां शांतिवादी और सामाजिक कार्यकर्ता घर जैसा माहौल पाते थे, वहां अब महंगे किराए की दीवार खड़ी हो रही है।

इस संकट का समाधान क्या है? प्रबंधन को तुरंत पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए-फंडिंग स्रोत, शर्तें, नवीनीकरण की योजना और भावी उपयोग नीति। गांधीवादी विचारकों के साथ खुला संवाद होना चाहिए। किराए की व्यवस्था ऐसी हो कि सामान्य कार्यकर्ता वंचित न हों-शायद सब्सिडी या अलग श्रेणी। संस्थान का मूल चरित्र-गांधीवादी अध्ययन, शांति कार्य, सामाजिक न्याय-बनाए रखना चाहिए।

गांधी शांति प्रतिष्ठान को बचाना भवन बचाना नहीं, उसकी आत्मा बचाना है। अगर यह बाजार के हाथों चला गया तो गांधी की विरासत पर एक और गहरी चोट होगी। जो लोग गांधी में विश्वास रखते हैं, उन्हें यह पीड़ा समझ आएगी-यह टूटती दीवारों की नहीं, टूटते आदर्शों की पीड़ा है। समय अभी है, संवाद से रास्ता निकाला जा सकता है। अन्यथा, इतिहास गवाह रहेगा कि एक बार फिर गांधी को उनके ही घर से बेदखल कर दिया गया।

बाबा रामदेव को क्या सगे ही दे रहे धोखा: कैसे हुआ पतंजलि सिविल सर्विसेज अकादमी में सनातन-द्रोही अवध ओझा का प्रवेश

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हरिद्वार : स्वामी रामदेव जी हिंदू समाज के प्रेरणा स्रोत रहे हैं। योग, आयुर्वेद और स्वदेशी के माध्यम से उन्होंने राष्ट्र जागरण का अभियान चलाया है। लेकिन हाल ही में पतंजलि सिविल सर्विसेज अकादमी के शुभारंभ के साथ उनकी टीम में अवध ओझा का शामिल होना गंभीर सवाल खड़ा करता है। यह लेख तथ्यों पर आधारित है और रामदेव जी के शुभचिंतकों को सजग करने का प्रयास है।

अवध ओझा कौन हैं? यूट्यूब से राजनीति तक सफर

अवध ओझा (जिन्हें Ray Avadh Ojha के नाम से जाना जाता है) एक प्रोपगेंडाबाज यूट्यूबर और यूपीएससी कोच हैं। अब तक उकनी कोचिंग से पढ़कर कितने बच्चे आईएएस बने, इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी सार्वजनिक नहीं है। वे खुद को बकैत बोलते हैं और उनसे पढ़ने से अधिक उनकी बकैती में रूचि रखने वालों ने उन्हें सब्सक्राइब किया है। उनके यूट्यूब चैनल 9 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स वाला है। कोविड काल में ऑनलाइन क्लासेस के जरिए उन्होंने ख्याति कमाई। इलाहाबाद जैसे कोचिंग हब्स में पढ़ाने के बाद उन्होंने आईक्यूआरए आईएएस जैसी अपनी संस्था भी चलाई।

2024 में उन्होंने आम आदमी पार्टी (आप) जॉइन की। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में पटपड़गंज सीट से उम्मीदवार बने। परिणाम? भारी मतों से हार और जमानत जब्त। उनकी बकैती को जनता ने गंभीरता से नहीं लिया। बीजेपी प्रत्याशी रविंदर सिंह नेगी से वे 28,000+ वोटों से हारे। हार स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत हार है और वे जनता से नहीं जुड़ सके। बाद में उन्होंने राजनीति से संन्यास की घोषणा भी कर दी। उनके जाल में बाबा रामदेव कैसे फंस गए? या बाबा रामदेव किसी तरह की ठगी का शिकार हो गए हैं? क्योंकि रामदेव जी ने हाल ही में (जून 2026) पतंजलि योगपीठ में सिविल सर्विसेज अकादमी शुरू की और इसकी कमान जिस तरह अवध ओझा को सौंपी। यह फैसला कई सनातनी विचारकों को चौंकाने वाला लग रहा है।

ओझा की ऐतिहासिक दृष्टि: वामपंथ से भी आगे?

यह बात ओझा नहीं छुपाते कि उनकी दृष्टि वामपंथियों से भी अधिक विकृत, एकांगी और सनातन-विरोधी हैं। ओझा के कई वीडियो में हिंदू समाज, परंपराओं और मूल्यों पर तीखे प्रहार दिखते हैं।

ओझा ने इस्लाम के विस्तार को मुख्यतः ‘भाईचारे और एकेश्वरवाद’ का परिणाम बताया, जबकि ऐतिहासिक तथ्य आक्रामकता, जिहाद और राजनीतिक-धार्मिक विस्तार को प्रमुख कारक मानते हैं। उनके वीडियो में युवाओं में हिंदू संस्कृति के प्रति गौरव के बजाय हीनता का भाव पैदा होता है। एक वीडियो में वे इस्लाम की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि अंधकार के युग में इसने महिलाओं का सम्मान बढ़ाया, जबकि हिंदू समाज पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाते हैं।

तैमूर लंग, नादिरशाह और अब्दाली जैसे आक्रमणकारियों पर उनके विचार भी विवादास्पद रहे हैं। कुछ संदर्भों में वे इन आक्रमणों को सामान्य ऐतिहासिक घटनाओं की तरह प्रस्तुत करते दिखते हैं, जबकि भारतीय इतिहास में इनका उल्लेख मंदिर-विध्वंस, नरसंहार और सनातन संस्कृति पर हमले के रूप में है। एक इंटरव्यू में अकबर की तारीफ करते हुए उन्होंने तैमूर के आक्रमण का जिक्र किया, लेकिन संदर्भ सनातन परंपरा की रक्षा की बजाय अन्य दृष्टिकोण अपनाते दिखे।

गौतम बुद्ध जैसे महापुरुषों के लिए अपमानजनक शब्दों (अय्याश आदि) का इस्तेमाल और जातिसूचक शब्दों का उल्लेख उनकी क्लासेस में रिपोर्टेड है, जो उनकी मानसिकता को दर्शाता है।

सनातन विरोध की पैटर्न: तथ्य और उदाहरण

ओझा के वीडियो सीरीज ‘इस्लाम की पूरी कहानी’ या हिंदू-मुस्लिम तुलना वाले एपिसोड्स में हिंदू समाज को कलंकित करने वाले बयान मिलते हैं। वे हिंदू समाज में महिलाओं की स्थिति, जाति व्यवस्था आदि पर बार-बार प्रहार करते हैं, जबकि इस्लाम की ‘एकता’ और ‘ज्ञान’ की तारीफ करते हैं।

यह दृष्टि एनसीईआरटी की वामपंथी इतिहास-लेखन से मिलती-जुलती है, जहां आक्रमणकारियों को शासक दिखाया जाता है और प्रतिरोध को नजरअंदाज। सनातनी युवा, जो रामदेव जी की अकादमी में आएंगे, ऐसे गुरु से प्रेरणा लेकर सांस्कृतिक गौरव के बजाय संशय और हीनता ग्रस्त हो सकते हैं।

रामदेव जी की टीम में तिजारावाला जैसे मीडिया सलाहकार हैं। इस पृष्ठभूमि से अनजान नहीं हो सकते। फिर भी यह नियुक्ति कैसे हुई है?

पतंजलि अकादमी का सपना और खतरा

पतंजलि सिविल सर्विसेज अकादमी का उद्देश्य योग, नैतिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा से युक्त आईएएस—आईपीएस तैयार करना है। रामदेव जी का संकल्प सराहनीय है। लेकिन यदि टीम में ऐसे व्यक्ति हों जिनकी मूल दृष्टि सनातन-विरोधी हो, तो नींव कमजोर हो जाती है।

रामदेव जी के पास अकूत संसाधन और योग्य टीम है। उन्हें चाहिए कि एक स्वतंत्र समिति ओझा के पूरे यूट्यूब आर्काइव, पुरानी क्लासेस और बयानों की समीक्षा करे।

रामदेव जी के शुभचिंतकों का आह्वान

स्वामी जी हिंदू समाज के ऋणी हैं। उन्होंने बाबा रामदेव ब्रांड को सनातन मूल्यों का प्रतीक बनाया है। ऐसे में ‘प्रचार के लिए ऐसे-वैसे को सारथि’ बनाने से बचना चाहिए।

सनातन संस्कृति की रक्षा केवल योग और आयुर्वेद से नहीं, बल्कि सही ऐतिहासिक दृष्टि और सांस्कृतिक गौरव से होती है। एक गलत गुरु पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर सकता है।

संकल्प की शुद्धता जरूरी

रामदेव जी का सपना शुभ है, लेकिन नींव में यदि बुरे तत्व घुल गए तो सफलता संदिग्ध है। इतिहास गवाह है-जिस आंदोलन की नींव विकृत विचारों पर हो, वह लंबे समय तक टिक नहीं पाता।

स्वामी जी से अपील:
अपनी टीम को सनातन-समर्थक, प्रामाणिक इतिहासकारों और राष्ट्रवादी विचारकों से भरें। अवध ओझा जैसे विवादित व्यक्तियों को जिम्मेदारी सौंपने से पहले गहन जांच जरूरी है।

हिंदू समाज आप पर भरोसा करता है। इस भरोसे को बनाए रखें। सावधान रहें, सजग रहें, और सही निर्णय लें।

एक साधारण स्वयंसेवक की भावानुभूति डॉ मोहन भागवत जी से हुई भेंट पर निःसृत भाव-धारा

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जयपुर : यद्यपि स्वयंसेवक साधारण नहीं होता। वह विशिष्ट है। उसकी विशिष्टता “कुल” अथवा “विराट” के अंश होने में है। उसकी विशिष्टता “बूँद” बनकर “समाज-सिंधु” में स्वयं को विसर्जित कर देने में है। साधारणत्व का यह बोध भी विसर्जन व समर्पण के भाव को परिपुष्ट करता है। बिना विसर्जन के सृजन नहीं, समर्पण नहीं। जहाँ समर्पण व ध्येयनिष्ठा नहीं, वहाँ संगठन का भाव भी नहीं। इसलिए साधारणत्व का सतत बोध ही स्वयंसेवक के लिए वरेण्य व अभीष्ट है। यह अलग बात है कि संघ का हर साधारण स्वयंसेवक शिखर तक की यात्रा की सामर्थ्य व पात्रता रखता है। साधारणत्व में से तपकर ही एक दिन वह वैशिष्ट्य को प्राप्त होता है और समय व आवश्यकता आने उसे सिद्ध भी करता है।
कल का दिन मेरे लिए बड़ा शुभ व सुखद रहा। कल परम् पूजनीय सरसंघचालक जी से पुनः मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पिछले वर्ष 26 एवं 27 जुलाई को उनसे भेंट अवश्य हुई थी। परंतु कल की बात कुछ विशेष थी। ईश्वर की कृपा से उनसे प्रत्यक्ष भेंट का सौभाग्य उदित हुआ। यह संघ की कार्यपद्धति में ही संभव है कि एकदम धरातल पर सक्रिय स्वयंसेवक भी शीर्ष से मिल सकता है। मुझे तीन सरसंघचालक – परम् पूजनीय रज्जू भैया, परम् पूजनीय सुदर्शन जी और परम् पूजनीय मोहन भागवत जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त रहा है। आप सबके मार्गदर्शन व आशीर्वाद से अनेकानेक जिज्ञासाओं का समाधान भी मिला। एक साधारण स्वयंसेवक के जीवन में ऐसे अवसर व सौभाग्य का उदित होना, संघ की रीति-नीति-पद्धति की अनूठी विशेषता ही कही जाएगी।

कल भेंट के लिए समय मिलने के तुरंत बाद से ही मन में यह द्वंद्व चल रहा था कि अपने प्राणप्रिय भारतवर्ष में किसी आत्मीय अथवा श्रद्घेय से खाली हाथ मिलने जाने की परंपरा नहीं रही है, परंतु पुनः ध्यान आया कि संघ में कुछ उपहार आदि ले जाने को सामान्यतः हतोत्साहित किया जाता है। हाँ, किसी स्थान विशेष अथवा नगर की कोई प्रसिद्ध मिठाई आदि ले जाने पर उसे स्वयंसेवकों में ही बाँट देने की परिपाटी अवश्य रही है। सोचा साफा ले चलता हूँ, वह राजस्थान की परंपरा व संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। परंतु तुरंत ध्यान आया कि सार्वजनिक समारोह होता तो साफा चल जाता, पर यहाँ अवसर ऐसा था कि उसके लिए भी मानस नहीं बना सका। अंत में एक विचार विद्युत की भाँति मन-मस्तिष्क में कौंधा कि क्यों न अपने चुनिंदा लेखों की प्रति ले चलूँ! अब तक मेरे प्रकाशित लेखों की संख्या सैकड़ों में हो चुकी है, इसलिए उनमें से कुछ लेख चुनने भी कठिन थे। लेखक के लिए यह और कठिन इसलिए भी हो जाता है कि सृजन की जिस “प्रसव-पीड़ा” या “मातृत्व-सुख” से गुजरते हुए वह सृजन करता है, वह बिलकुल लोकेतर अनुभूति-प्रक्रिया होती है। उनमें से प्रिय-अप्रिय का चयन कठिन ही नहीं, असंभव होता है। तय किया कि वे लेख ले चलता हूँ, जो ध्येयनिष्ठा या भारतबोध को गहरा करते हैं। चूँकि कल स्वातंत्र्यवीर सावरकर की जयंती थी तो मन में यह विचार भी आया कि क्यों न वे पत्रिकाएँ ले चलूँ, जिन्होंने अपने किसी अंक में उन पर आवरण-कथा प्रकाशित की हो। स्वाभाविक रूप से *#पाञ्चजन्य* व *#राष्ट्रधर्म* की प्रतियाँ दिखीं। संयोग कहें या योजनाबद्धता पाञ्चजन्य ने 11 मई को प्रकाशित अंक में #स्वातंत्र्यवीर_सावरकर पर आवरण-कथा प्रकाशित की है। राष्ट्रधर्म की भी वह प्रति मिली, जिसमें स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर आवरण-कथा थी। अपने लेखों के साथ इन दोनों पत्रिकाओं की प्रति भी परम् पूजनीय सरसंघचालक जी को भेंट की। उन्होंने मेरे सामने ही मेरे लेखों के शीर्षक पढ़े। उन्हें सरसरी तौर पर देखा। दोनों पत्रिकाओं के सभी पृष्ठ पलटे। उनमें प्रकाशित लेखों को देखा और लगभग 8-10 मिनट देखने के बाद उन्हें अपने सहायक को सहेजकर रखने और साथ ले चलने का निर्देश दिया। अचानक कौंधे इस विचार से मुझे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का ध्यान हो आया। इन दिनों सामान्य समाज में महँगे उपहारों की लेन-देन का चलन बढ़ गया है। यदि इसके स्थान पर अच्छे लेखों, अच्छे विचारों, अच्छी पुस्तकों को साझा करने का चलन बढ़े तो समाज व विशेष रूप से भावी पीढ़ी को बड़ा लाभ होगा। कल की भेंट में प.पू सरसंघचालक जी से संघ के शताब्दी-वर्ष पर कतिपय विषयों पर पुस्तक लिखने का भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। ईश्वर की कृपा रही और संयोग बना तो निश्चय ही उस दिशा में भी कुछ सार्थक प्रयास करने की प्रेरणा जगी है।

मैंने बारंबार दुहराया है कि मेरे जीवन में जो भी शुभ है, सुंदर है, सार्थक है, उनमें से अधिकतम संघ की ही देन है। संघ से जुड़ने से पूर्व मैं एक दिशाहीन युवा था, अनुशासन रहित, निरर्थक, निरुद्देश्य जीवन जिए चला जा रहा था। ठीक है कि जीवन का ध्येय केवल जीवन है और जीवन ही होना चाहिए। पर निष्क्रिय, अकर्मण्य, आत्म-केंद्रित जीवन भी कोई जीवन होता है! केवल खाओ, पियो और मौज करो का तात्कालिक लक्ष्य लेकर चलना तो जीवन की ऊँचाई, जीवन की उपादेयता, जीवन के विस्तार व वैविध्य को बहुत कम करके आँकना होगा। जड़ता व एकरसता तो ऊब पैदा करती है। खाओ, पियो और मौज करो में आनंद ढूँढ़ने वाला व्यक्ति अंततः ऊब व दुहराव का शिकार बनता है और उस दुष्चक्र से चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाता। पल-पल परिवर्तित जीवन में वह न बदलने वाले तत्त्व तक पहुँच ही नहीं पाता।

प्रश्न यह भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या केवल अकेले सुखी रहा जा सकता है? इसका उत्तर कदाचित न में आए! सुखी जीवन के लिए भी एक समाज चाहिए, उस समाज के साथ अपना नाभिनाल, आत्मिक एवं रागात्मक संबंध चाहिए। उसी समाज के प्रति आत्मिक जुड़ाव व अखंड निष्ठा रखते हुए माँ भारती की सेवा में जीवन होम करने वाले सेवाव्रती साधकों-तपस्वियों का दूसरा नाम *’#प्रचारक’* है। उन्हें हम श्वेत वस्त्रधारी संत भी कह सकते हैं। उनका त्याग व समर्पण उसी स्तर का है। प्रचार व प्रसिद्धि, निंदा व स्तुति से दूर वे राष्ट्र-यज्ञ में अहर्निश जुटे रहते हैं। सभी प्रचारकों का जीवन प्रेरणा का जीवंत स्रोत होता है। संघ की कार्यप्रणाली ऐसी है कि व्यक्तित्व का शोधन-परिमार्जन-परिष्करण वहाँ सतत चलता रहता है। घिस-घिसकर ही साधारण प्रस्तर शालिग्राम बनता है। प्रचारक-जीवन में प्रवेश करने व रह जाने के पश्चात प्रस्तर से शालिग्राम बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। अनुशासन की छेनी-हथौड़ी और ध्येय की उत्कट निष्ठा कोई अनगढ़-नुकीला “कोना” नहीं रहने देती। व्यक्ति-निर्माण की सतत प्रक्रिया व चरित्र का उत्तरोत्तर विकास संघ की कार्यप्रणाली का सहज क्रम है और प्रचारक उसकी केंद्रीय धुरी हैं। “स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः” – की प्रत्यक्ष व जीवंत अनुभूति प्रचारकों के जीवन को देखकर होती है। आज के भौतिकवादी दौर में भी वे इसके सजीव-जीवंत दृष्टांत हैं।

संघ से जुड़ने के बाद ही समाज और राष्ट्र के प्रति मेरे भीतर भी संवेदना जगी, जो शनैः-शनैः प्रगाढ़ होती चली गई। और उस समाज से गहरे तादात्म्य के कारण ही मुझे आसेतु हिमाचल कहीं भी जाने पर पराएपन की अनुभूति नहीं होती। जितना मैं बूँद बनकर स्वयं को समाज-सिंधु में विलीन करता जाता हूँ, उतनी ही विराटता व प्रसन्नता की अनुभूति गहरी होती जाती है। पर इस अनुभूति के लिए “बिंदु का सिंधु”, “लघु का विराट” और “खंड का कुल” में विसर्जन आवश्यक है।

मैंने हर बार कहा और अध्ययन व अनुभव से भी यही पाया कि व्यक्ति नहीं, विचार ही महत्त्वपूर्ण व स्थाई होते हैं। पर विचार अमूर्त्त होते हैं, जो अमूर्त्त है, वह मूर्त्त के माध्यम से ही अभिव्यक्त होता है, अतः व्यक्तियों का भी अपना महत्त्व है। उनके प्रति भी शुद्ध-सात्विक श्रद्धा अंततः ध्येय से ही जोड़ती है। इसलिए संघ में अपरिचित को परिचित, परिचित को मित्र व मित्र को कार्यकर्त्ता बनाने के महत्त्वपूर्ण सोपान तय किए गए हैं। हृदय के तल पर जुड़े बिना गहरी मित्रता-आत्मीयता भला कैसे संभव होगी! इसलिए भाव व श्रद्धा निरर्थक नहीं, निष्प्रयोज्य नही, उनका भी अपना महत्त्व व प्रयोजन है। श्रद्धा सनातन की शक्ति है, आधारशिला है। ठोस वैचारिक अधिष्ठान भी श्रद्धा की नींव पर खड़े किए जा सकते हैं, खड़े किए गए हैं, खड़े किए जा रहे हैं। वर्तमान में श्रद्धा-केंद्रों को ध्वस्त करने का जो यत्र-तत्र-सर्वत्र अभियान चल पड़ा है, वह अंततः समाज के लिए घातक व त्रासद ही सिद्ध होगा। उन्हें बनाए रखने में आपका, हमारा, परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण है। विश्वास न हो तो वर्तमान पीढ़ी या संततियों को देख लें, उनके उलझन-भटकन का प्रमुख कारण श्रद्धा से विचलन है, विकर्षण है। अलग-अलग नाम पर उन्हें उकसाया गया, भरमाया गया, परिवार के श्रद्धा-केंद्रों – यहाँ तक कि माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों से दूर करने के प्रयत्न-षड्यंत्र किए गए, परिणामतः न उनमें आस्था बची, न आस्तिकता, न अनुभवजनित सत्य के बल जीवन की चुनौतियों से पार पाने का विश्वास, न बड़ों के अनुभव से सीखने की ललक और न ही बात मानने की रुचि, प्रवृत्ति, प्रकृति। यहाँ यह भी स्मरण रहे कि श्रद्धा केवल दूसरों की ही दिशा-दशा नहीं सुधारती, वह स्वयं को भी सभी द्वंद्वों-प्रश्नों से मुक्त करती है। द्वंद्व से घिरा मन अस्थिर-आकुल-विचलित रहता है। एक बिंदु-पड़ाव पर पहुँचकर उसे ठौर चाहिए, भटकाव नहीं। पथ व ध्येय चाहिए, विपथगामी वृत्ति व मृग-मरीचिका नहीं।

यों ही नहीं हमारी पूजा-परंपरा में भगवान के विग्रह स्वरूप का विशेष महत्त्व है। उस विग्रह-स्वरूप को देखकर, जीवन और स्वयं को कृतकृत्य समझने वाले हृदय की थाह भला कौन-सा विचार अथवा तत्त्व-चिंतन ले सकता है! भाव, भक्ति व श्रद्धा को मापने का भी क्या कोई उपकरण हो सकता है! नहीं न! भाव और श्रद्धा पर अधिष्ठित समाज के मन व मर्म को समझे जाने की आवश्यकता है। भगवान के विग्रह को हम अपना सर्वोत्तम सौंपकर हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सब उस पर छोड़ देते हैं। बिलकुल निर्द्वंद्व व मुक्त हो जाते हैं। इस एक विश्वास ने हमें आक्रांताओं से लड़ने की अजेय शक्ति दी। अपने आस्था-केंद्रों, परंपराओं एवं सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के सिद्ध मंत्र व संकल्प दिए। इसलिए यदि संघ या भारत के सनातनी समाज के मर्म को समझना है तो उसे श्रद्धा की भाव-भूमि पर ही गहराई व संपूर्णता से समझा जा सकता है। अतः आइए, पहले अपने-अपने हृदय में श्रद्धा के दीप जलाएँ और तदनंतर सामाजिक श्रद्धा-केंद्रों को जागृत-स्थापित करें। हममें से हरेक को यह स्मरण रखना होगा कि उन केंद्रों को नष्ट करने की आँच व लपटें देर-सबेर हमें भी अपने घेरे में लेगी।

रामचंद्र गुहा का “Control Freaks!” कॉलम या विकास की गति को रोकने वाली निराशावादी प्रोपेगैंडा

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दिल्ली। रामचंद्र गुहा का 13 जून 2026 का कॉलम “Control Freaks!” एक बार फिर पुरानी लेफ्ट-लिबरल सोच का नमूना है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, चुनिंदा आंकड़ों से यथार्थ छिपाकर और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से भरे आरोप लगाकर मोदी सरकार की उपलब्धियों को बदनाम करने की कोशिश की गई है। यह लेख आर्थिक चुनौतियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। गुहा की निराशा BJP की लोकप्रियता और हिंदू बहुसंख्यक राष्ट्र की सकारात्मक दिशा से उपजी है, न कि तथ्यों से।

सबसे पहले अर्थव्यवस्था: गुहा दावा करते हैं कि अर्थव्यवस्था अच्छी नहीं चल रही—रुपया कमजोर, पूंजी भाग रही, निजी निवेश सुस्त, खपत कमजोर, विनिर्माण ठप। सच्चाई उलट है। FY26 में भारत का GDP ग्रोथ 7.4-7.7% रहा, जो वैश्विक मंदी और ईरान संकट के बावजूद मजबूत है। विश्व बैंक, IMF और अन्य एजेंसियां भारत को सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था मानती हैं। प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन और ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन दोनों 7-8%+ बढ़े। मैन्युफैक्चरिंग में 8-10% ग्रोथ दर्ज की गई, खासकर PLI स्कीम्स के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो और व्हाइट गुड्स में। FDI मजबूत रहा, मार्च 2026 में 6 बिलियन USD+। UPI, डिजिटल इकोनॉमी और इंफ्रास्ट्रक्चर बूम से खपत मजबूत है।

रुपया दबाव में है, लेकिन यह वैश्विक तेल कीमतों (ईरान युद्ध) का असर है, न कि नीतिगत विफलता। भारत ने रिजर्व्स मैनेजमेंट, निर्यात बढ़ावा और गोल्ड इंपोर्ट कटौती से संभाला। स्टॉक मार्केट: सेंसक्स-निफ्टी बार-बार नए हाई बना रहे हैं (जून 2026 में सेंसक्स 75,000+), IT सेक्टर AI चुनौती के बावजूद अनुकूलित हो रहा है। गुहा का ‘दो साल पहले के स्तर’ दावा सही नहीं जान पड़ता।

गुहा अर्थशास्त्रियों की “सुधार” सलाह का हवाला देते हैं—कस्टम्स-टैक्स ब्यूरोक्रेसी कम मनमानी, हेल्थ-एजुकेशन पर खर्च, लेबर इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग आदि। लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें पहले ही अमल में लाया। GST ने टैक्स सिस्टम को सरल बनाया, IBC ने दिवालिया प्रक्रिया सुधारी, लेबर कोड सुधार किए। PLI स्कीम (2 लाख करोड़+) ने लाखों नौकरियां पैदा कीं। इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व खर्च (सड़कें, रेल, एयरपोर्ट) से हेल्थ-एजुकेशन इंडायरेक्ट बूस्ट मिला। आयुष्मान भारत, NEP 2020, PM SHRI स्कूल्स—ये सब साक्ष्य हैं। फर्टिलाइजर सब्सिडी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से बेहतर टारगेटेड हुई। BJP-शासित राज्यों में विकास तेज, गैर-BJP राज्यों में भी केंद्र सहयोग देता है। अब पूर्वोत्तर भारत नहीं बल्कि भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा कहा जाता है, असम से लेकर मिजोरम,अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय जैसे राज्यों को। वहां आ रहे परिवर्तन को जाकर रामचन्द्रजी को एक बार देखना चाहिए।

ईरान युद्ध का असर स्वीकार्य है, लेकिन सरकार ने तेल डायवर्सिफिकेशन, रिजर्व बिल्डअप और कंजर्वेशन से सामना किया। रेमिटेंस में गिरावट अस्थायी है।

मोदी की महत्वाकांक्षाएं: तथ्यों का विकृत चित्रण

गुहा लिखते हैं कि मोदी सत्ता में बने रहना चाहते हैं, चौथा चुनाव जीतकर नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ना चाहते हैं, पर्सनालिटी कल्ट, हिंदू राष्ट्र। यह व्यक्तिगत हमला है। मोदी 2014 से सुशासन, विकास और राष्ट्र-निर्माण पर फोकस्ड हैं। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” नारा जारी है। 25 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले (NFHS, UNDP डेटा)। राम मंदिर और सोमनाथ—ये सांस्कृतिक पुनरुत्थान हैं, न कि विभाजन। हिंदू बहुसंख्यकवाद का आरोप मुस्लिम तुष्टिकरण की पुरानी कांग्रेस संस्कृति को छिपाने का प्रयास है। CAA, UCC, Article 370 जैसे कदम समान नागरिकता और राष्ट्रीय एकता के लिए थे।

व्यक्तित्व पूजा? हर नेता की छवि होती है, लेकिन मोदी का फोकस डिलीवरी पर है—2 करोड़+ घर, बिजली, शौचालय, जल जीवन मिशन, उज्ज्वला। पेट्रोल पंप, एयरपोर्ट पर नाम—ये ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी के प्रतीक हैं, न कि वेनिटी। अमित शाह पर हमला भी राजनीतिक पूर्वाग्रह दिखाता है। वे कुशल संगठक हैं, जिन्होंने BJP को 22+ राज्यों तक पहुंचाया।

त्ता का ‘फॉर्मूला’: हिंदुत्व + हैंडआउट्स + संस्थाएं + क्रोनी कैपिटलिज्म?

यह सबसे घृणित आरोप है। BJP का वोट बैंक विकास, राष्ट्रवाद और अच्छे शासन पर आधारित है। 2014 में कांग्रेस 14 राज्यों में, BJP 4 में। 2026 में BJP/NDA 20+ राज्यों में, कांग्रेस मुट्ठी भर में। यह ‘इनेप्ट कांग्रेस’ नहीं, बल्कि मोदी-शाह की रणनीति—ग्रासरूट कनेक्ट, डिजिटल कैंपेन, डायरेक्ट बेनिफिट्स (पीएम किसान, उज्ज्वला, लाडली बहना सम्मान आदि) का परिणाम है। महिलाएं, किसान, युवा, गरीब—सबको लाभ।

संस्थाओं पर कब्जा? चुनाव आयोग स्वतंत्र चुनाव कराता है। ED/CBI ने भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की—कांग्रेस के घोटालों (2G, कोल, CWG) का जवाब। क्रोनी कैपिटलिज्म? Adani-Ambani पर हमला पुराना है। वास्तव में, Ease of Doing Business में सुधार, इंसॉल्वेंसी कोड, डिफेंस-रेलवे में FDI से हजारों कंपनियां फलीं। स्टार्टअप्स बूम (1 लाख+), MSME सपोर्ट। ओलिगार्की (जिसमें राजनीतिक शक्ति मुख्य रूप से धनवान अभिजात्य वर्ग के हाथों में होती है) नहीं, बल्कि इंक्लूसिव ग्रोथ।

प्रेस पर दबाव और ‘गोदी मीडिया’? विपक्षी चैनल खुलेआम सरकार की आलोचना करते हैं। Godi मीडिया का आरोप उन मीडिया हाउस पर है जो कांग्रेस के जमाने में चापलूसी करते थे। आज डिबेट विविध हैं। आज सभी को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है। रवीश कुमार, अजीत अंजुम, पूण्य प्रसून, अभिसार शर्मा, साक्षी जोशी जैसे पत्रकार एक दशक से अधिक समय से लगातार आलोचना ही कर रहे हैं और कहते हैं कि कहने की आजादी नहीं है। अब उनके प्रोपगेंडा को जनता समझ चुकी है और उन्हेंं समाचार के लिए कम और मनोरंजन के लिए अधिक देख सुन रही है तो इसमें मोदी सरकार को कसूरवार कैसे ठहराया जा सकता है?

कांग्रेस का पतन और BJP की सफलता

2013-14 में यूपीए भ्रष्टाचार, नीति लकवे, उच्च मुद्रास्फीति और जीडीपी 5% के आसपास छोड़ गई। मोदी ने इसे स्थिरता, सुधार और महत्वाकांक्षी विकास से बदला। 22 राज्यों में बीजेपी की सरकार का अर्थ है कि लोगों का उन पर विश्वास है। कांग्रेस का पतन उसकी विरासत राजनीति, परिवारवाद और वोट बैंक पॉलिटिक्स का नतीजा है।

पर्यावरण और दीर्घकालिक स्वास्थ्य

गुहा पर्यावरण का जिक्र करते हैं। मोदी सरकार ने सोलर, रिन्यूएबल एनर्जी में विश्व लीडरशिप ली (450 GW टारगेट), इंटरनेशनल सोलर अलायंस, वन कवर बढ़ाया, स्वच्छ भारत। चुनौतियां हैं, लेकिन पर्यावरण की दिशा में प्रगति साफ दिखाई दे रही है।

रामचंद्र गुहा जैसे कमेंटेटर्स का निराशावाद भारत की उभरती ताकत को स्वीकार नहीं कर पाता। मोदी-शाह की प्राथमिकता राष्ट्र-निर्माण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास है। क्रोनीज्म छोड़कर ओपन कॉम्पिटिशन—PLI, स्टार्टअप इंडिया, ऑटोमेशन और स्किल इंडिया यही कर रहे हैं। संस्थाएं मजबूत हो रही हैं। हिंदुत्व ‘मेजॉरिटेरियनिज्म’ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास है।

भारत 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है। चुनौतियां (तेल, वैश्विक मंदी) हैं, लेकिन नेतृत्व सक्षम है। गुहा की “कंस्ट्रक्टिव” सलाहें पहले से लागू हैं; उनकी निराशा केवल राजनीतिक है। भारत जाग रहा है—विकास, एकता और गौरव के पथ पर।

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