प्रेस कार्ड, यूट्यूब मोनोलॉग और पत्रकारिता की परिभाषा

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दिल्ली। जंतर-मंतर के आसपास इन दिनों एक नया दृश्य आम हो गया है। गले में लेमिनेटेड कार्ड लटकाए कुछ लोग कैमरा थामे खड़े होते हैं और खुद को पत्रकार बताते हैं। हाल की एक घटना ने इस दावे की कमजोरी खोल दी। रोजी नाम की एक कार्यकर्ता, जो खुद को पत्रकार कह रही थी, वास्तव में कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ी एक्टिविस्ट निकली। उसके दावे को कैमरे पर बार-बार मजबूत करने वाले अजीत अंजुम जैसे लोग भी यूट्यूब पर कंटेंट बनाने वाले रचनाकार हैं। जब हकीकत सामने आई तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रहा। सवाल यह बन गया कि भारत में पत्रकार कहलाने की न्यूनतम शर्त क्या है।

गोल मार्केट से पचास रुपये में छपवाया गया कार्ड, किसी निजी कंपनी का पहचान-पत्र या सोशल मीडिया पर खुद को इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट लिख देना, इनमें से कोई भी सरकारी मान्यता नहीं है। प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो या राज्य स्तरीय मान्यता की प्रक्रिया अलग है। उसमें संगठन का पंजीकरण, प्रकाशन या प्रसारण का रिकॉर्ड, और आवेदक की रिपोर्टिंग का सत्यापन शामिल होता है। इसके विपरीत, कुछ कार्ड ऐसी कंपनियों के नाम पर जारी दिखते हैं जो विरोध-प्रदर्शन से कुछ महीने पहले बनी हों। ऐसे कार्ड का कोई आधिकारिक दर्जा नहीं होता। इन्हें लेकर कोई भी कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या किसी अन्य दल से जुड़ा व्यक्ति प्रदर्शन स्थल पर मंडरा सकता है और खुद को प्रेस बता सकता है। इससे पत्रकारिता और प्रभाव बनाने के बीच की रेखा मिटती है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस अंतर को अधिसूचना के जरिए स्पष्ट करना चाहिए। कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार एक नहीं हैं। कंटेंट क्रिएटर किसी विषय पर अपनी राय, विश्लेषण या अभियान चला सकता है। उसकी स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है। लेकिन जब वह प्रेस कार्ड लगाकर समाचार एकत्र करने, स्रोतों तक पहुंच बनाने या आधिकारिक ब्रीफिंग में जगह मांगने का दावा करता है, तब पारदर्शिता जरूरी हो जाती है। मंत्रालय यह स्पष्ट कर सकता है कि केवल पंजीकृत मीडिया संगठनों से जुड़े और निर्धारित मानदंड पूरे करने वाले व्यक्ति ही आधिकारिक प्रेस सुविधाओं के हकदार होंगे। बाकी लोग अपने चैनल या पेज के नाम से काम करें। इससे न तो अभिव्यक्ति रुकेगी, न ही फर्जी पहचान से जनता को गुमराह करने की गुंजाइश बचेगी।

इस बहस में एक और पक्ष है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। जिन्हें गोदी मीडिया कहकर निशाना बनाया गया, उनके पैनल चर्चाओं में विरोधी पक्ष के प्रवक्ता नियमित रूप से शामिल होते रहे। वहां सवाल-जवाब की जगह थी, भले ही संपादकीय झुकाव स्पष्ट हो। इसके विपरीत रवीश कुमार, आरफा खानम, नवीन कुमार, अजीत अंजुम, पूण्य प्रसून बाजपेयी, साक्षी जोशी और अभिसार शर्मा जैसे रचनाकारों के यूट्यूब चैनलों पर वर्षों से एकतरफा मोनोलॉग चलता रहा है। वहां दूसरा पक्ष बोलने के लिए आमंत्रित नहीं होता। दर्शक को पहले से तय निष्कर्ष सुनने को मिलता है। इसे पत्रकारिता कहना कठिन है। यह राय-निर्माता कंटेंट है, जो अपने दर्शक वर्ग को मजबूत करता है और विज्ञापन या सदस्यता से आय कमाता है। आय कमाना गलत नहीं। गलत यह दावा है कि ऐसा कंटेंट निष्पक्ष समाचार है।


सच्ची पत्रकारिता का मानदंड न सत्ता के पक्ष में बोलना है, न विपक्ष के। जो हर सरकारी कदम का गुणगान करे और बदले में लाभ ले, वह भी पत्रकार नहीं। जो हर सरकारी कदम को षड्यंत्र बताए और केवल एक राजनीतिक खेमे की कहानी दोहराए, वह भी नहीं। पत्रकार का पहला दायित्व तथ्यों की जांच, संदर्भ देना और जहां संभव हो वहां दूसरे पक्ष को जगह देना है। दिल जनता के हित के लिए धड़कना चाहिए, किसी मालिक या चैनल के मुनाफे के लिए नहीं। यह आदर्श शर्त है। इसे पूरा करना कठिन है। आज के समय में आदर्श को परिभाषा नहीं बनाया जा सकता लेकिन परिभाषा कम से कम इतनी स्पष्ट हो कि फर्जी कार्ड और एकतरफा प्रचार, पत्रकारिता की आड़ न ले सकें।

रोजी प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दावा और हकीकत के बीच की दूरी सार्वजनिक हुई। एक्टिविस्ट होना सम्मानजनक काम हो सकता है। किसी मुद्दे पर अभियान चलाना भी अभिव्यक्ति का हिस्सा है। लेकिन एक्टिविज्म को पत्रकारिता का लेबल देकर पेश करना दोनों को कमजोर करता है। पाठक या दर्शक को यह जानने का हक है कि जो व्यक्ति घटनास्थल पर खड़ा है, वह समाचार जुटा रहा है या किसी संगठन का संदेश पहुंचा रहा है। जब यह भेद मिट जाता है, तब विश्वसनीयता दोनों तरफ से घटती है।

भारत में डिजिटल माध्यमों ने आवाज पहुंचाने का रास्ता आसान किया है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है। लेकिन आसान रास्ते के साथ जिम्मेदारी भी आती है। अगर कोई व्यक्ति केवल अपने चैनल के लिए कंटेंट बनाता है, तो उसे कंटेंट क्रिएटर कहना अधिक ईमानदार होगा। पत्रकार शब्द उन लोगों के लिए सुरक्षित रहे जो समाचार संगठनों से जुड़े हों, या जिन्होंने स्वतंत्र रूप से भी तथ्यों की जांच और संतुलन का न्यूनतम मानक पूरा किया हो। मंत्रालय की अधिसूचना इस दिशा में पहला कदम हो सकती है। वह कार्ड जारी करने वाली निजी कंपनियों से पारदर्शिता मांगे, पीआईबी मान्यता और स्व-घोषित पहचान में अंतर लिखे, और प्रदर्शन स्थलों पर प्रेस सुविधाओं के उपयोग के नियम स्पष्ट करे।

सवाल व्यक्तिगत हमले का नहीं है। सवाल व्यवस्था का है। जब कोई भी पचास रुपये का कार्ड लटकाकर पत्रकार बन सकता है, और जब वर्षों तक एकतरफा मोनोलॉग को पत्रकारिता कहा जाता रहे, तब जनता के पास सच और प्रचार में फर्क करने का भरोसेमंद तरीका नहीं बचता। स्पष्ट परिभाषा दोनों पक्षों की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी। जो राय रखना चाहते हैं, वे खुलकर रखें। जो समाचार देने का दावा करते हैं, वे उसके मानदंड पूरे करें। यही भेद पत्रकारिता को एक्टिविज्म और कंटेंट किएटर्स से अलग करेगा।

विदेशी अंशदान को नियमित करना आज के समय की आवश्यकता 

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भोपाल। वैश्विक स्तर पर आज विभिन्न देशों के बीच भौगोलिक सीमाएं जैसे समाप्त सी होती दिखाई दे रही हैं। एक तरह से आज हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं। इन परिस्थितियों के बीच एक देश से दूसरे देश में सहायता के रूप में धनराशि को हस्तांतरित करना भी बहुत आसान बन गया है। धनराशि का हस्तांतरण करने का उद्देश्य सचमुच में यदि छोटे, अविकसित अथवा विकासशील देशों की मदद करना हो तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। परंतु, आज कुछ देश अन्य देशों में राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृति उथल पुथल करने के उद्देश्य से धनराशि का हस्तांतरण करने का प्रयास करने लगे हैं। विशेष रूप से विकसित देश अपनी औपनिवेशिक, विस्तारवादी एवं भूमंडलकारी नीतियों के अंतर्गत इन देशों में गैर सरकारी संस्थाओं (NGO), न्यास एवं सामाजिक संगठनों एवं संस्थानों के माध्यम से अथवा अन्य माध्यमों से भारी मात्रा में धनराशि का हस्तांतरण करते हैं ताकि इन देशों के गरीब नागरिकों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई अथवा मुसलमान बनाया जा सके। हालांकि, धनराशि का हस्तांतरण कुछ अन्य घोषित उद्देश्यों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, धार्मिक, अनुसंधान, मानवीय सेवाओं और आपदा राहत आदि क्षेत्रों में इन देशों की सहायता करने का रहता है। हाल ही में, श्रीलंका, नेपाल, बंगलादेश आदि छोटे विकासशील देशों में सत्ता परिवर्तन करने में भी विदेशी अंशदान की विशेष भूमिका रही है।

विदेशी अंशदान को नियमित करने हेतु विभिन्न देशों में बनाए जाने लगे कानून
वैश्विक स्तर पर कुछ देशों में जब अन्य देशों द्वारा भेजी जाने वाली राशि का उपयोग इन देशों के नागरिकों का धर्म परिवर्तन करने में अथवा निर्धारित उद्देश्यों के अतिरिक्त होता हुआ दिखाई देने लगा तो कई देशों ने विदेशी अंशदान को नियमित करने के उद्देश्य से कानून बनाए जाने के बारे में विचार करना शुरू किया और कालांतर में इन देशों यथा संयुक्त राज्य अमेरिका (1938), आस्ट्रेलिया (2018), कनाडा (2024), यूनाइटेड किंगडम (2025), आदि देशों में इस संदर्भ में कुछ सख्त कानून बनाए भी गए। यूरोपीय संघ भी वर्तमान में ऐसी ही व्यवस्था को विधिक रूप देने की प्रक्रिया में है। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सका एवं भारत में पात्र संस्थानों द्वारा विदेशी योगदान प्राप्त करने और उसके उपयोग को नियमित करने के उद्देश्य से वर्ष 1976 में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act – FCRA) बनाया गया। इस अधिनियम को भारत में लागू करने का मुख्य उद्देश्य भारत में विदेशी अंशदान में पारदर्शिता, जवाबदेही, कानूनी अनुपालन, वैध कार्यों को सक्षम बनाना, जनविश्वास, सुनिश्चित करना है। साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और व्यापक राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। अमेरिका में वर्ष 1938 में बनाए गए कानून में परिस्थिति अनुसार वर्ष 1960 में एवं समय समय पर संशोधन भी किए गए है।

भारत की तुलना में अन्य देशों में कानून सख्त
भारत में एफसीआरए गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और धार्मिक एवं राजनैतिक संगठन, जो विदेशी अंशदान प्राप्त करते हैं, पर लागू होता है। जबकि कुछ अन्य देशों में तुलनीय वैश्विक कानून का कार्यक्षेत्र विस्तृत हैं एवं यह लॉबिस्ट, जनसंपर्क (पीआर) फर्म, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय तथा कंपनियों सहित उन सभी संस्थाओं या व्यक्तियों पर लागू होते हैं, जो किसी विदेशी प्रधान के निर्देश पर कार्य करते हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र से संबंधित हों।

भारत में एफसीआरए में पूर्व में भी संशोधन किए जाते रहे हैं
भारत में समय समय पर भारत सरकार द्वारा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में तात्कालिक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन भी किए जाते रहे हैं। यह परिवर्तन विदेशी अंशदान को निरुत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि पारदर्शिता को सुदृढ़ करने, अधिक प्रकटीकरण करने, मजबूत जवाबदेही सुनिश्चित करने और बेहतर प्रशासन व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से किए गए हैं। भारत ने विदेशी अंशदान की प्राप्ति और उसके उपयोग के विनियमन के लिए 1976 में पहला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया था। जैसे जैसे अंतरराष्ट्रीय सहभागिता बढ़ी और सीमापार वित्तीय प्रवाह अधिक जटिल होता गया, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। वर्ष 1984 में संशोधन के माध्यम से विदेशी धन प्राप्त करने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया, न्यायाधीशों को अधिनियम के दायरे में लाया गया, “विदेशी अंशदान” और “राजनीतिक दल” की परिभाषाओं का विस्तार किया गया तथा लेखापरीक्षण संबंधी शक्तियां जोड़ी गईं। एफसीआरए, 2010 ने 1976 के अधिनियम का स्थान लेते हुए उसे समेकित किया और अधिक सुदृढ़ अनुपालन ढांचा स्थापित किया। इसे 26 सितंबर 2010 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके माध्यम से किए गए प्रमुख संशोधनों में शामिल है, प्रत्येक पांच वर्ष में पंजीकरण का अनिवार्य नवीनीकरण, पंजीकरण के लिए विस्तृत एवं कठोर शर्तें, पंजीकरण का निलंबन, निरस्तीकरण, परिसंपत्तियों का निहित होना तथा अपराधों का शमन (कम्पाउंडिंग)। वर्ष 2011 में विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम अधिसूचित किए गए, जिनके माध्यम से पंजीकरण, नामित बैंक खातों और प्रतिवेदन प्रारूपों को क्रियान्वित किया गया। वर्ष 2020 में प्रमुख संशोधन अधिनियम लाया गया। इसके अंतर्गत संस्थानों के पदाधिकारियों के लिए आधार/पासपोर्ट पहचान अनिवार्य की गई; विदेशी अंशदान केवल नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एकल नामित खाते में प्राप्त करने का प्रावधान किया गया; अन्य संघों को उप-अनुदान (सब-ग्रांटिंग) देने पर प्रतिबंध लगाया गया; प्रशासनिक व्यय की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई तथा पंजीकरण का नवीनीकरण सरकारी जांच के अधीन कर दिया गया। वर्ष 2022 में एफसीआरए नियमों में पुनः संशोधन किया गया, इसके अंतर्गत विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से प्राप्त अंशदान की सीमा ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख प्रति वर्ष कर दी गई, जिससे सामान्य परिवारों के लिए अनुपालन आसान हुआ साथ ही कुछ अपराधों के शमन (कम्पाउंडिंग) से संबंधित प्रावधान भी जोड़े गए। वर्ष 2024 में नियमों में पुनः संशोधन किया गया एवं प्रशासनिक व्यय के लिए आवंटित अप्रयुक्त राशि को आगे ले जाने की अनुमति दी गई; टीडीएस रिफंड के संबंध में प्रावधानों को स्पष्ट किया गया; तथा आवेदनों के शीघ्र निस्तारण के लिए आवेदन के चरण में आवश्यक दस्तावेज संबंधी प्रावधानों को सुदृढ़ किया गया। अब वर्ष 2026 में प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 में यह प्रस्ताव किया गया है कि किसी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या उसके निरस्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाए। अधिसूचित एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 के तहत पंजीकरण को निर्दिष्ट उद्देश्यों तथा अनुमोदित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा गया है तथा अनुमत धार्मिक गतिविधियों के दायरे से धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए जाने वाले प्रचार-प्रसार (प्रोसिलिटाइजेशन) को बाहर रखा गया है। इस संदर्भ में एक बिल लोक सभा में दिनांक 25 मार्च 2026 को पेश किया गया है, जिसे बाद में 12 अगस्त 2026 को संयुक्त संसदीय समिति को आगे विचार के लिए सौंप दिया गया है। वैसे भी, किसी भी देश में लोकतंत्र बाहरी शक्तियों से प्रभावित नहीं हो, इस हेतु स्थानीय सरकार के लिए यह जरूरी है कि उस देश में आने वाला विदेशी अंशदान जिन उद्देश्यों के लिए देश में आ रहा है, उसी उद्देश्य के लिए उपयोग हो, इसकी निगरानी करना उस सरकार का धर्म है। एफसीआरए भी इसी निगरानी का कानूनी माध्यम है। यह कानून उन गतिविधियों पर रोक लगाता है जो भारत की संप्रुभता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था अथवा अन्य देशों के साथ संबंधो को प्रभावित कर सकती है।

कानून की कुछ धाराओं के विरुद्ध असत्य विमर्श खड़े किए जाने का हो रहा है प्रयास
उक्त संशोधन बिल के लोक सभा में पेश किए जाने के उपरांत भारत में कुछ बिंदुओं पर विपरीत विमर्श खड़ा करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। इस संदर्भ में भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय की वेब्सायट पर पर्याप्त जानकारी प्रदान की गई है। इसी उपलब्ध जानकारी के आधार पर असत्य विमर्श को ध्वस्त करने का प्रयास इस लेख में किया गया है। जैसे एक विमर्श यह खड़ा किया जा रहा है कि भारत सरकार अब विदेशी फंडिंग पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना चाहती है, अतः उक्त अधिनियम में संशोधन किया जा रहा है। जबकि, वस्तुस्थिति यह है कि केंद्र सरकार विदेशी फंडिंग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना चाहती है। इससे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध विदेशी प्रभाव को रोका जा सकेगा। वर्ष 2024–25 में लगभग 16,200 संस्थाएं भारत में सक्रिय रूप से पंजीकृत थीं और उन्होंने लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त किया, जो किसी प्रतिबंधात्मक व्यवस्था का संकेत नहीं है। हाल ही के समय में ईसाई मिशिनरीयों द्वारा भारत के आदिवासी इलाकों में हिंदू आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाए जाने के मामले ध्यान में आए हैं। इस संदर्भ में भारत सरकार के पूर्व विदेश सचिव और राजदूत श्री कंवल सिब्बल का मत है कि FCRA भारत का घरेलू कानून है। भारत में मिशनरी कामों के लिए विदेशी फंडिंग की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। विदेशी पैसे से मुख्य रूप से हिंदुओं का ही धर्म परिवर्तन कराया जाता है। हमें अपने आंतरिक मामलों में किसी भी तरह के दखल को नकार देना चाहिए। भारत में ईसाई लॉबी को बढ़ावा देने की कोशिश करके अमेरिका धर्मनिरपेक्षता का पालन नहीं कर रहा है।

विदेशी अंशदान का दुरुपयोग होने के मामले आए हैं प्रकाश में
हाल ही में इंटेलिजेन्स ब्यूरो (IB) ने प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रस्तुत एक विस्तृत प्रतिवेदन में दर्शाया है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय समर्थनकारी नेट्वर्क तथा विदेशी वित्तपोषित स्थानीय गैर-सरकारी संगठन लगातार ऐसे आंदोलनों को प्रोत्साहित करते आ रहे हैं, (जैसे, तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विरुद्ध लम्बे समय तक चला विरोध) जिससे भारत की रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा तथा कूटनीतिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। सीमापार अनुदानों से प्रेरित सक्रियता द्वारा प्रायः पर्यावरण अथवा मानवाधिकारों की वकालत के नाम पर भारत के औद्योगिक विस्तार, ऊर्जा सुरक्षा तथा विकास की दिशा से सम्बंधित प्रमुख परियोजनाओं को लक्षित किया गया है। इसी संदर्भ में एक अनुमान लगाया गया है कि अंतरराष्ट्रीय समर्थनकारी समूहों द्वारा संचालित समन्वित कानूनी चुनौतियों, विरोध प्रदर्शनों एवं स्थानीय नाकाबंदी ने कोयला आधारित बिजली संयंत्रो और यूरेनियम खनन सहित मेगा परियोजनाओं में अनिश्चित काल तक विलम्ब करके भारत के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि में अनुमानित 2 से 3 प्रतिशत तक की कमी की है। इसी प्रकार, केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने आक्सफेम इंडिया के खिलाफ सीबीआई जांच की सिफारिश की क्योंकि इस संगठन पर वैधानिक प्रतिबंधो की सीमा का उल्लंघन करते हुए विदेशी योगदान को अन्य संस्थाओं (सेंटर फार पॉलिसी रिसर्च) को अंतरित करके नियमों को व्यवस्थित रूप से दरकिनार करने का आरोप लगाया गया है। कभी कभी विदेशी धनराशि प्राप्त संस्थानों द्वारा देश की निर्वाचन एवं राजनैतिक प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी किया जाता है। विदेशी धन का उपयोग गुप्त रूप से जनमत को प्रभावित करने, स्थानीय प्रचार को वित्त पोषित करने अथवा संवेदनशील राजनैतिक अवसरों के दौरान विघटनकारी जन आंदोलनों को संगठित करने के लिए भी किया जाता है। इससे लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने की सम्भावना उत्पन्न होती है। गैर लाभकारी तथा धर्मार्थ क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से हवाला लेनदेन, कर अपवंचन तथा आतंकवादी वित्तपोषण के लिए माध्यम के रूप में दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील रहे हैं। इसका एक कारण मानवीय कार्यों से जुड़ी भावनात्मक अपील तथा अपेक्षाकृत अधिक गुमनामी है।

एफसीआरए किसी एक समुदाय को लक्षित नहीं करता है
एक और विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है कि भारत में एफसीआरए विशेष रूप से किसी एक धर्म या समुदाय को लक्षित करता है, जबकि ऐसा नहीं है यह अधिनियम धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियां, जिनमें धार्मिक शिक्षा, उपासना स्थलों का रखरखाव तथा सभी धर्मों के संगठनों द्वारा किए जाने वाले परोपकारी कार्य शामिल हैं, विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने के लिए निरंतर पात्र बने हुए हैं। भारत में यह भी एक मिथ है कि एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकरण कराने से किसी संगठन की अनुमत गतिविधियां बदल जाती हैं, जबकि एफसीआरए अधिनियम केवल यह चाहता है कि ये गतिविधियाँ पारदर्शी रू से संचालित हों।
एफसीआरए में सामान्य परिस्थितियों में परिसंपतियां जब्त करने की व्यवस्था नही
भारत में कुछ लोगों द्वारा यह झूठा विमर्श फैलाया जा रहा है कि 2026 के संशोधनों के तहत सरकार किसी भी एनजीओ की परिसंपत्तियां जब्त कर सकती है। जबकि संशोधन प्रस्ताव के अनुसार नामित प्राधिकरण विदेशी अंशदान से सृजित परिसंपत्तियों का केवल प्रबंधन करेगा, और वह भी तभी जब किसी संगठन का पंजीकरण विधिसम्मत रूप से समाप्त हो चुका हो। परिसंपत्तियों का निहित होना प्रारंभ में अस्थायी होता है और पंजीकरण के नवीनीकरण पर उन्हें पूर्णतः वापस कर दिया जाता है। प्रत्येक स्थिति में उपासना स्थल विधि द्वारा अपने धार्मिक स्वरूप को बनाए रखते हैं। नामित प्राधिकरण के आदेश पुनरीक्षण तथा जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील के अधीन होते हैं। एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संगठनों में विदेशी नागरिकों की प्रमुख भूमिकाओं पर अत्यधिक प्रतिबंध है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि भारत में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों का संचालन ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाए, जिनका भारत से सत्यापित संबंध हो। यह अधिनियम के उस मूल उद्देश्य के अनुरूप है, जिसके तहत घरेलू मामलों में अनुचित विदेशी प्रभाव को रोकना सुनिश्चित किया गया है।
यह सोच भी उचित नहीं है कि एफसीआरए पंजीकरण का निरस्तीकरण हमेशा यह दर्शाता है कि संगठन ने कोई गलत कार्य किया है। अनेक पंजीकरण निरस्तीकरण और नवीनीकरण न होने के मामले केवल प्रशासनिक कारणों से होते हैं, जैसे वार्षिक विवरणियां दाखिल न करना, अवधि समाप्त होने से पहले नवीनीकरण न कराना या नामित बैंक खाते का अनुरक्षण न करना। किसी भी पंजीकरण निरस्तीकरण की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार न्यायालयों के पास बना रहता है। यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि राज्य स्तर पर एफसीआरए जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की स्वीकृति की आवश्यकता राज्यों की स्वायत्तता का अतिक्रमण है। एफसीआरए विदेशी संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित एक केंद्रीय कानून है, जो संसद के विशिष्ट विधायी अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विषय हैं। केंद्रीय कानून के अंतर्गत समानांतर या परस्पर विरोधी जांचों को रोकने के लिए समन्वित स्वीकृति का प्रावधान किया गया है, जो अन्य केंद्रीय कानूनों में उपलब्ध समान प्रावधानों के अनुरूप है।
एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएं भारत के नागरिक समाज के अधिकांश हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं। मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएं भारत में कार्यरत सभी गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का केवल एक छोटा-सा हिस्सा हैं। सक्रिय एफसीआरए डेटाबेस में लगभग 14,500 संस्थाएं पंजीकृत हैं, जबकि देश में पंजीकृत एनजीओ की संख्या कई लाख है। अतः यह कानून व्यापक नागरिक समाज को नहीं, बल्कि विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने वाले एक विशिष्ट माध्यम को विनियमित करता है। पंजीकरण बनाए रखने के लिए न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता का कोई वास्तविक उद्देश्य नहीं है। 10 लाख रुपये के न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता यह सुनिश्चित करती है कि सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण केवल वास्तव में कार्यरत संगठनों के पास ही बने रहें। इससे निष्क्रिय संस्थाओं को पंजीकरण बनाए रखते हुए बिना किसी घोषित गतिविधि के विदेशी अंशदान प्राप्त करने की वैधानिक पात्रता बनाए रखने से रोका जा सकेगा।
(उक्त आलेख भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय की वेब्सायट पर उपलब्ध जानकारी का उपयोग करते हुए बनाया गया है।)

वाहनों से ज्यादा इंसानों को इज्जत दो

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आगरा । आगरा की सड़कें पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बनें, यूरोप की तरह हो लेन अनुशासन
जेब्रा क्रॉसिंग, लाल रंग की साइकिल लेन, ट्रैफिक कैमरे और बेवजह हॉर्न पर रोक की मांग
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आगरा, 4 अक्टूबर।
आगरा में सड़क पर चलना अब सामान्य नागरिक के लिए भी किसी जोखिम भरे सफर से कम नहीं है। स्कूली बच्चे तेज रफ्तार वाहनों से बचते हुए सड़क पार करते हैं, बुजुर्ग टूटे और अतिक्रमित फुटपाथों के कारण सड़क पर चलने को मजबूर हैं और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित रास्ते लगभग गायब हैं।
रिवर कनेक्ट कैंपेन ने संडे शाम को आयोजित सभा में टीटीजेड अध्यक्ष, मंडलायुक्त, नगर निगम और यातायात पुलिस से आगरा में पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल विशेष अभियान शुरू करने की मांग की है।
यमुना आरती भक्तों ने का तौर पर, मांग की “यमुना किनारा रोड पर, किले से वाटर वर्क्स तक लाल रंग से रंगी अलग लेन चिह्नित की जाए जिस पर सिर्फ पैदल और साइकिल वाले चलें, जेब्रा crossings paint किए जायें, होम गार्ड्स को नियुक्त किया जाए ताकि ट्रैफिक रोक कर, पैदलीय सड़क क्रॉस करें। आए दिन उत्सव, विसर्जन, जुलूस, झांकिया, निकालने के लिए अलग मार्ग चिह्नित करें, ताकि पूरी व्यवस्था सुचारू पूर्वक चलती रहे। जब सारी दुनिया के शहरों में ट्रैफिक नियंत्रण के लिए वन वे ट्रैफिक व्यवस्था लागू की जाती है तो आगरा में ही क्यों नहीं हो पाती? इसका जवाब पुलिस या प्रशासन दे।
बृज खंडेलवाल ने कहा कि हाल में यूरोप की यात्रा के दौरान उन्होंने देखा कि वहां सड़क व्यवस्था में पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों को विशेष प्राथमिकता दी जाती है। लाल रंग से स्पष्ट साइकिल लेन, चौड़ी जेब्रा क्रॉसिंग, पैदल यात्री सिग्नल, निर्धारित लेन और कैमरों से लगातार निगरानी सड़क अनुशासन का हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा, “आगरा को भी अब गाड़ियों का शहर नहीं, लोगों का शहर बनाने की जरूरत है। सड़क पर पहला अधिकार इंसान का होना चाहिए, केवल मोटर वाहन का नहीं।”
उन्होंने मांग की कि आगरा की प्रमुख सड़कों पर पैदल यात्रियों के लिए स्पष्ट और बाधामुक्त फुटपाथ तथा साइकिल चालकों के लिए अलग लेन बनाई जाए। साइकिल लेन को लाल रंग से स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जाए और फुटपाथों पर पार्किंग तथा अतिक्रमण पूरी तरह रोका जाए।
सभी प्रमुख चौराहों, स्कूलों, अस्पतालों, बाजारों और पर्यटन स्थलों पर बोल्ड और चमकीले जेब्रा क्रॉसिंग बनाए जाने चाहिए। व्यस्त चौराहों पर पैदल यात्रियों के लिए अलग ट्रैफिक सिग्नल भी लगाए जाएं।
उन्होंने कहा कि आगरा को लेन अनुशासन की नई संस्कृति सिखाने की जरूरत है। गलत दिशा में वाहन चलाना, लालबत्ती तोड़ना, खतरनाक ओवरटेकिंग, फुटपाथ या साइकिल लेन पर वाहन चलाना और अवैध पार्किंग के खिलाफ लगातार कार्रवाई होनी चाहिए। “बेवजह हॉर्न बजाना भी सड़क अनुशासन का उल्लंघन है। हर चौराहे पर हॉर्न बजाना कोई उपलब्धि नहीं है। यह शहर के लोगों के कान और दिमाग दोनों पर हमला है।”
रिवर कनेक्ट अभियान ने प्रमुख चौराहों और दुर्घटना संभावित स्थानों पर आधुनिक सीसीटीवी और यातायात निगरानी कैमरे लगाने की मांग की। इन कैमरों से केवल चालान ही नहीं, बल्कि यातायात के व्यवहार और सड़क सुरक्षा की लगातार निगरानी की जानी चाहिए।
ताजमहल आने वाले विदेशी और देशी पर्यटकों के लिए भी सुरक्षित पैदल मार्ग जरूरी हैं। फतेहाबाद रोड, एमजी रोड, सिकंदरा, शाहगंज और यमुना किनारे के मार्गों को प्राथमिकता के आधार पर पैदल यात्री अनुकूल बनाया जाना चाहिए।
श्री खंडेलवाल ने कहा कि “जिस शहर में बच्चा सुरक्षित सड़क पार न कर सके, बुजुर्ग फुटपाथ पर न चल सके और साइकिल चालक सड़क पर अपनी जान बचाता फिरे, उसे स्मार्ट सिटी कहने का कोई अर्थ नहीं है।” उन्होंने प्रशासन से आगरा के 25 सबसे खतरनाक चौराहों और सड़क मार्गों की पहचान कर तत्काल सुधार योजना बनाने तथा उसके लिए निश्चित समय सीमा तय करने की मांग की।
पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य ने कहा सुरक्षित पैदल मार्ग केवल सुविधा का मामला नहीं है। यह नागरिकों की गरिमा, सड़क सुरक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य और आगरा की पर्यटन छवि से जुड़ा सवाल है।
वाहनों से पहले, इंसानों की कद्र करो, इज्जत दो।
रिवर कनेक्ट कैंपेन ने मांग की है कि मंडलायुक्त की अध्यक्षता में नगर निगम, विकास प्राधिकरण, पीडब्ल्यूडी और यातायात पुलिस की संयुक्त बैठक बुलाकर ‘आगरा पैदल यात्री और साइकिल सुरक्षा योजना’ बनाई जाए और उसकी प्रगति सार्वजनिक की जाए।
अंतिम सवाल यही है: आगरा की सड़कें आखिर किसके लिए हैं; सिर्फ गाड़ियों के लिए या उन इंसानों के लिए भी, जो इस शहर में रहते और इसे देखने आते हैं?
आज सांय सभा में सर्वश्री रंजन शर्मा, राज कुमार माहेश्वरी, चतुर्भुज तिवारी, सत्यम शर्मा, राजवीर सिंह एडवोकेट, मुकेश चौधरी, गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय, प्रशांत कौशिक, आदि उपस्थित रहे।

उत्तर प्रदेश: क्या बदल रहा है प्रदेश का चेहरा, और कितनी दूर है मंजिल?

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लखनऊ । अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। टिकटों के लिए घेराबंदी तेज है, विपक्षी दल तालमेल की गांठें कस रहे हैं और भाजपा नेता पूरे भरोसे से कह रहे हैं, “हमारा काम बोलेगा।”
लेकिन इस बार असली सवाल वोटर पूछ रहा है। क्या सिर्फ जातीय गणित से चुनाव जीता जाएगा? वह पूछ रहा है, योगी सरकार ने ऐसा क्या बुरा किया है कि उसे सत्ता से बाहर किया जाए? और दूसरी तरफ विपक्ष के पास आखिर ऐसा नया क्या है, जिसके भरोसे जनता उसे एक और मौका दे?

कभी उत्तर प्रदेश का नाम सुनते ही जेहन में अपराध, रंगदारी, माफिया और राजनीतिक उठापटक की तस्वीर उभरती थी। शाम ढलते ही परिवारों की चिंता बढ़ जाती थी और गांव का नौजवान अक्सर एक ही सवाल पूछता था, “यहां काम मिलेगा या दिल्ली की ट्रेन पकड़नी पड़ेगी?”
आज तस्वीर कुछ अलग है। सड़कों पर पहले जैसी बेचैनी नहीं दिखती। कानून व्यवस्था को लेकर भरोसा बढ़ा है। एक्सप्रेसवे दौड़ रहे हैं, एयरपोर्ट चमक रहे हैं और निवेश के बड़े-बड़े ऐलान हो रहे हैं। लेकिन असली सवाल फिर भी वहीं खड़ा है। क्या यह सिर्फ तस्वीर बदलने का मामला है, या उत्तर प्रदेश सचमुच छलांग लगा रहा है?
यही सवाल इस समय सबसे दिलचस्प है।
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने कई मोर्चों पर बड़ा बदलाव देखा है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद करीब 13 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 36 लाख करोड़ रुपये बताया जा रहा है। प्रति व्यक्ति आय भी तीन गुने से ज्यादा बढ़कर 1.20 लाख रुपये के पार पहुंच गई है।
यूपी अब देश की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है।
लेकिन आंकड़ों की अपनी जुबान होती है और जिंदगी की अपनी।
आगरा के किसी छोटे दुकानदार से पूछिए कि उसे बदलाव कैसा लगा। बुंदेलखंड के किसी नौजवान से पूछिए कि क्या उसे अपने गांव के पास नौकरी मिली। फिरोजाबाद के किसी कांच कारीगर से पूछिए कि उसकी मेहनत की कीमत बढ़ी या नहीं। इन जवाबों में शायद विकास की असली कहानी छिपी मिलेगी।

2017 से पहले उत्तर प्रदेश की छवि अपराध, रंगदारी और राजनीतिक संरक्षण पाने वाले माफिया से गहराई से जुड़ी थी। कई परिवारों के लिए पुलिस और प्रशासन भरोसे का नहीं, मजबूरी का नाम था।
योगी सरकार ने कानून व्यवस्था को अपनी प्राथमिकता बनाया। सरकार के अनुसार हजारों इनामी अपराधी गिरफ्तार किए गए और माफिया की अरबों रुपये की संपत्तियों पर कार्रवाई हुई। अपराध में गिरावट और माफिया पर कार्रवाई को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाती है।
इसका एक मनोवैज्ञानिक असर जरूर दिखाई देता है। निवेशक के लिए सड़क और बिजली जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भरोसा भी है कि उसका कारोबार किसी बाहुबली की जेब में नहीं जाएगा।
लेकिन यहां भी एक सवाल बाकी है।
क्या पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक अधिकार भी उतने ही मजबूत हुए हैं? क्या गरीब और कमजोर आदमी को भी वही इंसाफ मिलता है जो ताकतवर आदमी को मिलता है? बुलडोजर की तस्वीर प्रभावशाली हो सकती है, मगर लोकतंत्र की असली कसौटी निष्पक्ष कानून है।

योगी आदित्यनाथ जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनके भगवा वस्त्र भी चर्चा का विषय बने थे। आलोचक पूछते थे, “एक संन्यासी अर्थव्यवस्था क्या चलाएगा?”
समय ने इस सवाल का एक जवाब जरूर दिया है।
संन्यास का मतलब हमेशा निष्क्रियता नहीं होता। निजी मोह से दूरी कभी-कभी प्रशासन में कठोर फैसले लेने की ताकत भी दे सकती है। समर्थकों का कहना है कि योगी सरकार ने मंदिर और मठ की राजनीति से आगे बढ़कर सड़क, उद्योग, निवेश और राजस्व को भी शासन के एजेंडे में रखा।
लेकिन सरकार की असली परीक्षा मठ में नहीं होती।
वह बाजार में होती है। कारखाने में होती है। खेत में होती है। स्कूल में होती है। अस्पताल में होती है। और सबसे ज्यादा उस घर में होती है, जहां बेरोजगार बेटा मां से पूछता है, “अम्मा, अब बाहर जाने की जरूरत तो नहीं पड़ेगी?”

2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में करीब 40 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों की घोषणा हुई थी। बाद में सरकार ने 2017 के बाद प्रस्तावित निवेश का आंकड़ा लगभग 45 से 50 लाख करोड़ रुपये तक बताया।
इनमें से करीब 12 से 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं के जमीन पर उतरने या ग्राउंड-ब्रेकिंग होने का दावा किया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, फार्मा, अक्षय ऊर्जा और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की योजनाएं सामने आई हैं।
सरकार का सपना 2029-30 तक यूपी को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है।
सपना बड़ा है। हौसला भी बड़ा चाहिए।
लेकिन निवेश प्रस्ताव और चलती हुई फैक्ट्री के बीच वही फर्क है जो शादी के कार्ड और बारात में होता है। कार्ड छपना आसान है, बारात का पहुंचना थोड़ा मुश्किल।
इसलिए अब असली सवाल है। कितने कारखाने चालू हुए? कितने लोगों को स्थायी रोजगार मिला? कितने स्थानीय युवाओं को नौकरी मिली? और कितने निवेशक सरकारी फाइलों के जंगल से निकलकर उत्पादन की जमीन तक पहुंचे?

उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर इस बदलाव का दिलचस्प उदाहरण है। कानपुर, झांसी, चित्रकूट, लखनऊ, अलीगढ़ और आगरा इसके प्रमुख केंद्र हैं।
बुंदेलखंड कभी सूखे, गरीबी और पलायन के लिए जाना जाता था। वहां का नौजवान अक्सर गांव छोड़कर दिल्ली, सूरत या मुंबई की ओर निकल जाता था।
अब उसी इलाके में रक्षा उत्पादन और औद्योगिक निवेश की बातें हो रही हैं।
लखनऊ में ब्रह्मोस एयरोस्पेस की सुविधा शुरू होना भी इस नई तस्वीर का हिस्सा है। रक्षा उद्योग बढ़ता है तो उसके साथ छोटे कारखाने, तकनीकी प्रशिक्षण, परिवहन और स्थानीय कारोबार भी बढ़ सकते हैं।
लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण किरदार मिसाइल नहीं, स्थानीय नौजवान है।
अगर बुंदेलखंड के लड़के और लड़कियों को अपने ही इलाके में सम्मानजनक रोजगार मिलता है, तभी यह बदलाव सचमुच ऐतिहासिक कहलाएगा।
खजाना भर रहा है, मगर घर कितना सुधरा?
राज्य की अपनी कर आय में भी बड़ा इजाफा हुआ है। 2016-17 में अपना कर राजस्व करीब 86 हजार करोड़ रुपये था। अब यह दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है।
जीएसटी, आबकारी और स्टांप शुल्क से भी राजस्व बढ़ा है।
सरकार इसे बढ़ती आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय अनुशासन का परिणाम बताती है। बात सही भी हो सकती है।
लेकिन आम आदमी का सवाल बड़ा सीधा है।
“हुजूर, खजाना भर रहा है तो हमारी जिंदगी कितनी सुधरी?”
कर राजस्व तभी सार्थक है जब उससे अच्छी सड़क, साफ पानी, बेहतर अस्पताल, मजबूत स्कूल और सम्मानजनक रोजगार मिले। सरकारी खजाने की चमक तभी जनता के चेहरे पर दिखाई देगी।

उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था केवल बड़े उद्योगपतियों से नहीं बनती। इसे बनाने वाले हजारों छोटे हाथ हैं।
बनारस का बुनकर, मुरादाबाद का पीतल कारीगर, फिरोजाबाद का कांच मजदूर, आगरा का जूता कारीगर और लखनऊ का चिकनकारी कामगार। इनके हाथों में यूपी की पुरानी तहजीब भी है और नई अर्थव्यवस्था की उम्मीद भी।
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट यानी ओडीओपी ने इन स्थानीय उत्पादों को नई पहचान देने की कोशिश की है। सरकार के अनुसार लाखों कारीगरों को प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने का काम हुआ है।
मगर कारीगर की असली खुशी तब होगी जब उसके हुनर की कीमत बिचौलिये की जेब में नहीं, उसके अपने घर में पहुंचेगी।
उसे उचित दाम चाहिए। सस्ता कच्चा माल चाहिए। बाजार चाहिए। और सबसे बढ़कर अपने काम पर भरोसा चाहिए।

जेवर का नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, यमुना एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और दूसरे बड़े संपर्क मार्ग उत्तर प्रदेश के बदलते ढांचे की तस्वीर पेश कर रहे हैं।
सड़कें बेहतर होंगी तो उद्योग आएंगे। एयरपोर्ट बढ़ेंगे तो कारोबार बढ़ेगा। माल तेजी से पहुंचेगा तो यूपी का बाजार देश और दुनिया से ज्यादा जुड़ सकेगा।
लेकिन केवल सड़क बना देने से विकास नहीं आता।
बिजली चाहिए। पानी चाहिए। कुशल श्रमिक चाहिए। साफ-सुथरा प्रशासन चाहिए। पर्यावरण की हिफाजत चाहिए।
वरना एक्सप्रेसवे चमकता रहेगा और उसके किनारे का गांव रोजगार की तलाश में धूल फांकता रहेगा।
असली फैसला अभी बाकी है
योगी सरकार के समर्थक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश ने अपनी पुरानी छवि को पीछे छोड़ दिया है। उनके पास कानून व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश, राजस्व और रक्षा उत्पादन के आंकड़े हैं।
विपक्ष और आलोचक दूसरी तस्वीर दिखाते हैं। उनका सवाल है कि रोजगार कहां है? महंगाई से राहत कितनी मिली? सरकारी स्कूल और अस्पताल कितने बदले? किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार और बेरोजगार युवा इस नई अर्थव्यवस्था में कहां खड़े हैं?
शायद सच इन दोनों तस्वीरों के बीच कहीं है।
उत्तर प्रदेश बदल रहा है। यह बदलाव पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। सड़कें, एयरपोर्ट, उद्योग और प्रशासनिक संस्कृति में फर्क दिखाई देता है। कानून व्यवस्था को लेकर भी पहले की तुलना में एक नया आत्मविश्वास नजर आता है।
लेकिन मंजिल अभी दूर है।
क्योंकि विकास की असली पहचान बड़े होर्डिंग नहीं होते। विकास तब दिखाई देता है जब गांव का नौजवान मजबूरी में नहीं, अपनी पसंद से बाहर जाए। जब कारीगर को अपने हुनर की पूरी कीमत मिले। जब किसान को बाजार मिले। जब शहर में पैदल चलने वाला भी सुरक्षित महसूस करे। जब उद्योग आए तो नदी और हवा साथ-साथ बचें।
उत्तर प्रदेश की असली छलांग तब होगी जब विकास का स्वाद लखनऊ और नोएडा से निकलकर बुंदेलखंड, पूर्वांचल, ब्रज और गांव की चौपाल तक पहुंचेगा।
तब कोई मां अपने बेटे से यह नहीं पूछेगी, “कब लौटोगे?”
वह शायद पहली बार पूछेगी, “बेटा, अब यहीं काम मिल गया है न?”
यही वह दिन होगा जब भगवा चोले से विकास की दौड़ तक पहुंची उत्तर प्रदेश की कहानी सचमुच पूरी होगी।

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