लालच और तपती ज़मीन से जूझती यह दुनिया महात्मा गांधी को अनदेखा कर सकती है?

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अहमदाबाद । वर्तमान दौर के भारत में महात्मा गांधी आउट ऑफ फैशन हैं। ये अलग बात है कि विदेशों में भारत की पहचान महात्मा गांधी से ही है। विदेशी मेहमानों को आज भी सबसे पहले राज घाट स्मारक पर ले जाया जाता है।

तो क्या गांधी गलत थे, या दुनिया के लालची इरादे ही सही थे?
वह आदमी जिसने लाठी हाथ में लेकर नहीं बल्कि अहिंसा की ताकत दिखाकर रास्ता बताया था, आज की मिसाइलों, परमाणु हथियारों, लड़ाकू विमानों और अरबों डॉलर की दौलत वाली दुनिया में अजीब लगने लगा है। उनका चरखा अब स्मार्टफोन से बदल गया है, चिट्ठियों की जगह व्हाट्सऐप ने ले ली है, और सादगी के बदले “ज्यादा पाने, ज्यादा दिखाने” की होड़ लगी है।
फिर भी विडंबना देखिए: जितनी तेजी से दुनिया आधुनिक हो रही है, उतनी ही बेचैनी से उसे गांधी के मूल्यों की ज़रूरत महसूस हो रही है।
दुनिया बाहर और अंदर दोनों तरह से जल रही है। ग्लोबल वार्मिंग मौसम बदल रही है। युद्ध शहरों को खंडहर बना रहे हैं। नफ़रत आतंक को ताकत दे रही है। असमानता बढ़ रही है, जबकि कुछ लोग अकूत दौलत जमा कर रहे हैं। करोड़ों लोग तनाव और अकेलेपन से जूझ रहे हैं, और सोशल मीडिया पर फ़रेब और शोर के पिरामिड खड़े हो रहे हैं।
इन सब के बीच गांधी एक असुविधाजनक सवाल पूछते दिखते हैं: आखिर कितना काफ़ी है?
गांधी का दर्शन सिर्फ़ चरखा, उपवास या अंग्रेजों के ख़िलाफ़़ लड़ाई नहीं था। उसके बीच में थे सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, सादगी, निर्भीकता, समानता, स्थानीय आत्मनिर्भरता और हर इंसान के इज़्ज़त का ख़्याल।
उनके व्रतों में सत्य और अहिंसा सबसे आगे थे; साथ में अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम), अपरिग्रह (ज़रूरत से ज़्यादा न जमा करना), शरीरिक श्रम, स्वाद पर क़ाबू, सभी धर्मों का इज़्ज़त और अस्पृश्यता का उन्मूलन भी शामिल था।
पहली नज़र में ये किसी आश्रम के नियम लग सकते हैं। पर सोचिये: क्या यह सभ्य समाज के लिए भी ज़रूरी नहीं है, जो अपनी ही बनाई समस्याओं के दल दल में फँसता जा रहा है?
सत्य की बात लीजिए। जब राजनीति में प्रचार-प्रपंच और झूठ बढ़ जाए, विज्ञापन हमारी ज़रूरतों को इच्छाओं में बदल दें और झूठ सच से तेज़ी से फैले, तो गांधी का सत्य बहुत आधुनिक लगता है।
अहिंसा को देखिए। जब किसी राष्ट्र के पास लाखों लोगों को नष्ट करने की ताकत हो, तब गांधी का सवाल और भी ज़्यादा चुनौती देता है, क्या हिंसा से स्थायी शांति मिल सकती है?
गांधी का उत्तर था सत्याग्रह: सत्य की ताकत, अहिंसक प्रतिरोध, सविनय अवज्ञा और आत्मबल: दोषी को मिटाने की बजाय उसके अंदर की समझ को जगाना। आज की बदले की राजनीति में यह विचार सबसे कठिन और शायद सबसे ज़रूरी है। हम किसी ग़लती पर उसे गलत से ज़्यादा बदले में टुकड़े करना चाहते हैं, और इसे हम रणनीति कह देते हैं। गांधी इसे जाल कहते थे।
आर्थिक सोच में भी गांधी आज के उपभोक्तावादी तंत्र को बेचैन करते हैं। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र को नैतिकता से अलग नहीं रखा जा सकता। ज़्यादा दौलत रखने वाले को इसे समाज की अमानत समझना चाहिए, यही उनका ट्रस्टिशिप सिद्धांत था। सर्वोदय का मतलब सबका कल्याण, पर शुरुआत सबसे कमज़ोर से।
उनका यह वाक्य शायद हर कंपनी की दीवार पर होना चाहिए:
“धरती हर व्यक्ति की ज़रूरतें पूरी करने के लिये काफ़ी है, पर हर व्यक्ति के लालच के लिये नहीं।”
जलवायु संकट ने इस बात को और कड़ा कर दिया है। हम ज़्यादा खोदते हैं, ज़्यादा बनाते हैं, ज़्यादा फेंकते हैं, और आश्चर्य करते हैं कि धरती हांफ क्यों रही है। हमने उपभोग को सफलता का पैमाना बना लिया है। गांधी पूछते, क्या हमारी यह सफलता धीरे-धीरे हमारी विफलता बन रही है?
उनका अपरिग्रह हमें यह नहीं कहता कि आधुनिकता छोड़ दो; वह बस पूछता है: क्या हर इच्छा को खरीदकर पूरा करना ज़रूरी है? उनका स्वदेशी दरवाज़े बंद करने की बात नहीं करता था, बल्कि स्थानीय हुनर और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की सलाह देता था। और शरीर श्रम यह सिखाता था कि इज़्ज़त सिर्फ़ कुर्सी पर बैठे लोगों की बात नहीं है।
शायद आज गांधी की सबसे बड़ी चुनौती हमारी अपनी ज़िन्दगी है:
क्या हम कम ख़पत कर सकते हैं? कम नफ़रत? कम भंडार? कम डर? ज़्यादा सुनना? ज़्यादा बाँटना?
आधुनिक सभ्यता ने अद्भुत ताकत पा ली है, पर आत्मसंयम खो रहा है। हम दूसरे ग्रह भेज सकते हैं, पर अपना गुस्सा काबू में लाना अब भी मुश्किल लगता है। हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना रहे हैं, पर मानवीय पारखी समझ तलाश रहे हैं। यही गांधी की विडंबना है: दूरियाँ घट गईं, मगर नफ़रत नहीं; परमाणु हासिल कर लिए, पर क्रोध नहीं; बीमारी से लड़ लिए, पर लालच पर जीत नहीं।
तो क्या गांधीवाद अप्रासंगिक है? नहीं।
दुनिया को गांधी की पूजा करने की ज़रूरत नहीं, न ही उनकी मूर्ति पर सवाल उठाना पाप घोषित करने की। ज़रूरत है उन असुविधाजनक सवालों को सुनने की जो गांधी ने छोड़े हैं:
– अगर धरती रहने लायक ही न रहे तो विकास का क्या मतलब?
– अगर करोड़ों लोग पीछे छूट जाएँ तो समृद्धि किस काम की?
– अगर शांति के नाम पर हमेशा युद्ध की तैयारी करनी पड़ी तो वह शांति कैसी?
– अगर डर हमारे फ़ैसले तय करने लगे तो आज़ादी कैसी?
– और अगर खुश रहने के लिये हमें लगातार और खरीदारी करनी पड़े तो यह कैसी सभ्यता है?
गांधी ने कोई जादू की छड़ी नहीं दी थी। उन्होंने एक मुश्किल चीज दी थी: नैतिक दिशा-निर्देश। दुनिया गांधी को अनदेखा कर सकती है: यह उसका हक़ है। मगर सत्य, संयम, करुणा और अहिंसा की अनदेखी करने के नतीजों से बचना सम्भव नहीं।

कॉकरोच आशुतोष रांका, साधन की शुचिता के बिना गांधी का नाम केवल नारा है

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दिल्ली। गांधी का नाम दशकों से राजनीतिक उत्तराधिकार का विषय रहा है, पर उनकी विचारधारा पर किसी एक धारा का पक्का दावा अब तक बन नहीं पाया है। कांग्रेस गांधी सरनेम का इस्तेमाल जनता को भ्रमित करने के लिए करती रही। गांधी परिवार का फिरोज जहांगीर के परिवार से कोई रिश्ता नहीं रहा। अब तक वह पेपर सार्वजनिक भी नहीं की गई, जिसमें यह बात लिखी हो कि फिरोज जहांगीर के परिवार का सरनेम जहांगीर से गांधी होगा। विचारधारा के नाम पर दूसरी पार्टी आम आदमी पार्टी ने तीन बंदरों को उठा लिया लेकिन उसके संदेश पर कभी अमल नहीं किया। अन्ना आंदोलन जब अरविन्द केजरीवाल पार्टी बनी तो उसने इन तीन बंदरों के संदेश को हमेशा उलटा ही पढ़ा और उसे उलटकर ही अमल में लाया।
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने ही अन्ना हजारे को दूसरा गांधी बताकर प्रचारित किया था, और अब उनमें से ही एक आशुतोष रांका कॉकरोच जनता पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंच गए भाषण देने। तीन अक्टूबर को प्रतिष्ठान की व्याख्यानमाला में आशुतोष रांका का ‘जेनजी के गांधी’ विषय पर बोलने के लिए जाना, गांधी की विचारधारा पर दावे की पहल जैसा ही था। मंच से आशुतोष ने एक तरफ सोनम वांगचुक को तीसरा और अभिजीत दीपके को चौथा गांधी साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दूसरी तरफ गांधीवाद का चोला ओढ़ने के प्रयास में वे गांधीवादियों के बीच कॉकरोच की ब्रांडिंग करने में भी सफल रहे।
इस ब्रांडिंग की जड़ 15 मई 2026 की सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी में है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक याचिका की सुनवाई में उन लोगों की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से की थी, जो रोजगार या पेशे में जगह न पाकर मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई कार्यकर्ता बनकर व्यवस्था पर हमला करते हैं। अगले दिन उन्होंने स्पष्ट किया कि टिप्पणी फर्जी या बोगस डिग्री लेकर पेशे में घुसे लोगों के बारे में थी, युवाओं की सामान्य आलोचना नहीं। फिर भी उसी शब्द को राजनीतिक पहचान बना लिया गया और अब उसे आशुतोष रांका पीटरमैरिट्जबर्ग की घटना से जोड़ रहे हैं। जहां वैध टिकट के बावजूद नस्लीय अपमान सहकर गांधी ने कानून के भीतर सत्य और अहिंसा का रास्ता चुना था। मौखिक टिप्पणी को उत्पीड़न का प्रमाण बनाना और उससे ‘सत्य के लिए लड़ाई’ का दावा करना दोनों घटनाओं को एक कर देता है, जबकि संदर्भ बिल्कुल अलग हैं। जो कॉकरोच की मंशा पर संदेह पैदा करता है।
गांधी साधन और साध्य की एकता पर जीवन भर अड़े रहे। उन्होंने कहा कि अन्यायपूर्ण साधन से न्यायपूर्ण साध्य नहीं निकलता। सत्याग्रह में सूचना, खुला संवाद और स्वयं पर अनुशासन अनिवार्य थे। कॉकरोच आशुतोष रांका जो जीपीएफ में गांधी और कॉकरोच के बीच साम्य तलाश रहे थे, उन्हें समझना चाहिए कि भीड़ बढ़े तो नेता उसे संभाले, न कि भीड़ नेता को। अनुमति न मांगने की बात गांधी नागरिक अवज्ञा के नैतिक दायरे में कहते थे, जहां गिरफ्तारी स्वीकार करना, हिंसा से दूर रहना और अपने आचरण की जवाबदेही लेना शर्त थी। पारदर्शिता उनके लिए नारा नहीं, रोजमर्रा का नियम था।
जो भीड़ ‘कॉकरोच’ नाम से जुट रही है, उसमें ये शर्तें नहीं दिखतीं। जंतर मंतर पर नेता बढ़ती भीड़ को अनुशासित नहीं रख पाए। प्रदर्शनकारी अराजक झुंड में बदल गए। सरकार को सूचना देने लेकिन अनुमति न लेने की घोषणा सत्याग्रह नहीं, अवज्ञा का ‘शॉर्टकट’ है। जब अनुशासन टूटता है, हिंसा या अव्यवस्था की आशंका बनती है और प्रतीकों की होड़ चलती है, तब उसे गांधी मार्ग कहना हास्यास्पद है। गांधीवाद भीड़ का ब्रांड नहीं, साधन की शुचिता और आत्मसंयम का नाम है। नाम और व्याख्यान से वह दावा पक्का नहीं होता।

जनादेश का अनादर, अमर्यादित भाषा और संवैधानिक संस्थाओं पर चौतरफा प्रहार

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अखिलेश चौधरी

दिल्ली । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की शक्ति केवल उसकी विशाल जनसंख्या या नियमित चुनावों में नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक परंपराओं, संविधान के प्रति आस्था, स्वतंत्र संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक मर्यादाओं में निहित है। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन स्वाभाविक है, असहमति आवश्यक है और सरकार की आलोचना नागरिकों का अधिकार है। किंतु जब राजनीतिक असहमति तर्क और तथ्य की सीमा पार कर व्यक्तिगत आक्रमण, हिंसा, धमकी, सामाजिक विद्वेष, संस्थाओं के प्रति अविश्वास और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश का रूप लेने लगे, तब प्रश्न केवल किसी दल या सरकार का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा का हो जाता है।

हाल के वर्षों में राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आई हैं, जिनसे यह चिंता उत्पन्न होती है कि कहीं राजनीतिक संघर्ष स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर अराजकता की दिशा तो नहीं ले रहा। चुनाव में पराजय के बाद आत्ममंथन और संगठनात्मक सुधार के स्थान पर यदि लगातार चुनावी संस्थाओं, संवैधानिक पदों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर प्रश्न उठाए जाएँ, तो स्वाभाविक रूप से यह पूछना आवश्यक हो जाता है कि आरोपों के साथ प्रमाण और वैधानिक प्रक्रिया कहाँ है?

लोकतंत्र को बचाने का वास्तविक मार्ग लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें और अधिक मजबूत बनाना है।

*संवैधानिक मर्यादाओं की अवहेलना*

लोकतांत्रिक विरोध नागरिक अधिकार है। सरकार, निर्वाचन आयोग या किसी संवैधानिक संस्था के निर्णय से असहमति व्यक्त करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक अंग है। किंतु शांतिपूर्ण विरोध और अराजकता के बीच एक स्पष्ट सीमा है।

हाल में उत्तर प्रदेश के आगरा में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निजी आवास के बाहर हुए विरोध-प्रदर्शन से संबंधित जिस प्रकार की घटनाओं की खबरें सामने आईं, उन्होंने इसी सीमा पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। यदि किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के निजी आवास की दीवारों पर अभद्र भाषा लिखी जाए, संपत्ति को विरूपित किया जाए अथवा परिवार को भयभीत करने का प्रयास हो, तो इसे लोकतांत्रिक असहमति नहीं कहा जा सकता।

किसी संवैधानिक पदाधिकारी के निर्णय की आलोचना की जा सकती है, उसके विरुद्ध वैधानिक मंच पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं, किंतु उसके निजी जीवन और परिवार को निशाना बनाना लोकतांत्रिक अधिकार की सीमा में नहीं आता।

राजनीतिक नेतृत्व की भाषा का प्रभाव उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों तक पहुँचता है। जब सार्वजनिक विमर्श में असंसदीय और अपमानजनक भाषा सामान्य होने लगती है, तो वही भाषा धीरे-धीरे सड़क के व्यवहार में भी दिखाई देने लगती है। इसलिए राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे असहमति को मर्यादित भाषा और लोकतांत्रिक आचरण के साथ व्यक्त करें।

*असहमति लोकतंत्र है, अराजकता नहीं*

यह अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है कि विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, जबकि हिंसा और भय लोकतंत्र की कमजोरी।

संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। किंतु ये अधिकार निरंकुश नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, कानून, दूसरों के अधिकार और राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए संविधान स्वयं युक्तिसंगत सीमाओं की व्यवस्था करता है।

इसलिए किसी सरकार की आलोचना करना, निर्वाचन आयोग से प्रश्न पूछना, किसी नीति के विरुद्ध आंदोलन करना या न्यायालय में चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन हिंसा, धमकी, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश, निजी आवास पर हमला या किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा फैलाना उसी लोकतांत्रिक अधिकार का विस्तार नहीं माना जा सकता।

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा यही है कि हम अपने विरोधी के अधिकारों की भी उतनी ही रक्षा करें, जितनी अपने अधिकारों की।

*सामाजिक ताने-बाने पर हमला*

राजनीतिक संघर्ष का दूसरा चिंताजनक पक्ष समाज में विभाजन की प्रवृत्ति है। जाति, वर्ग, लिंग, धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटने वाली भाषा यदि राजनीतिक आंदोलन का साधन बनने लगे तो उसका प्रभाव केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहता।

कभी किसी जाति के विरुद्ध, कभी किसी वर्ग के विरुद्ध और कभी पूरे पुरुष या महिला समाज के विरुद्ध अपमानजनक भाषा वाले पोस्टर और तख्तियाँ दिखाई देती हैं। किसी समुदाय के सभी लोगों को एक ही दृष्टि से देखना और उनके विरुद्ध घृणा उत्पन्न करना सामाजिक समरसता के लिए गंभीर खतरा है।

*सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का सम्मान*

भारत की सामाजिक संरचना हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपराओं से निर्मित हुई है। यहाँ अनेक मत, पंथ, उपासना-पद्धतियाँ और जीवन-दृष्टियाँ साथ-साथ विकसित हुई हैं।

किसी भी धर्म या परंपरा की आलोचना का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन आलोचना और अपमान में अंतर है। देवी-देवताओं, धार्मिक ग्रंथों, मंदिरों अथवा किसी समुदाय की श्रद्धा का जानबूझकर अपमान करना सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।

लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे की आस्था और गरिमा को कुचलने का माध्यम बन जाए।

*कानून का राजनीतिक उपयोग*

सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कानूनों का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय और अत्याचार से सुरक्षा देना है।

ऐसे कानूनों के वास्तविक उद्देश्य की रक्षा तभी संभव है जब उनका प्रयोग निष्पक्षता और विधि के अनुसार हो। किसी भी कानून के संभावित दुरुपयोग की शिकायत हो तो उसका समाधान कानून में सुधार, न्यायिक परीक्षण और उचित जाँच से होना चाहिए; किसी वर्ग के विरुद्ध सामान्यीकृत आरोप लगाकर नहीं।

न्याय और सामाजिक समरसता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

*निर्वाचन आयोग में बहुमत और मतभिन्नता की ऐतिहासिक वास्तविकता*

निर्वाचन आयोग के भीतर सदस्यों के बीच मतभिन्नता को लेकर भी राजनीतिक विमर्श में अनेक दावे किए जाते हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि बहु-सदस्यीय संस्था का उद्देश्य ही विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच विचार-विमर्श और सामूहिक निर्णय सुनिश्चित करना है।

भारतीय निर्वाचन आयोग में अतीत में भी सदस्यों के बीच मतभिन्नता के उदाहरण रहे हैं। 1990 के दशक में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी. एन. शेषन के कार्यकाल से लेकर 2019 के चुनावों के दौरान तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा द्वारा दर्ज की गई असहमतियों तक, आयोग के भीतर मतभिन्नता लोकतांत्रिक संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा रही है।

अतः किसी सदस्य की असहमति अपने आप में षड्यंत्र का प्रमाण नहीं है। उसी प्रकार बहुमत का निर्णय अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि अल्पमत की राय निरर्थक थी।

बहु-सदस्यीय संस्था का सौंदर्य ही यही है कि उसमें विचार-विमर्श, मतभिन्नता और अंततः निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निर्णय होता है। असहमति को लोकतंत्र की कमजोरी के बजाय संस्थागत विमर्श का स्वाभाविक अंग समझना चाहिए।

*वोट चोरी के आरोप और प्रमाण की कसौटी*

चुनावी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि किसी राजनीतिक दल को मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया, मतगणना या किसी अन्य चुनावी व्यवस्था में अनियमितता का संदेह है तो उसे प्रमाण सहित उचित संस्थागत मंच पर रखना चाहिए।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब गंभीर आरोप सार्वजनिक सभाओं और सामाजिक माध्यमों पर बार-बार लगाए जाएँ, लेकिन उनके समर्थन में उपलब्ध प्रमाणों को विधिक प्रक्रिया के सामने प्रस्तुत न किया जाए।

यदि किसी के पास चुनावी अनियमितता के ठोस प्रमाण हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके लिए निर्वाचन आयोग, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय जैसे वैधानिक मंच उपलब्ध हैं। चुनाव परिणाम को चुनौती देने की भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया है।

सार्वजनिक जीवन में एक मूल सिद्धांत होना चाहिए – आरोप जितना गंभीर हो, प्रमाण की आवश्यकता उतनी ही अधिक होनी चाहिए।

वोट चोरी जैसे गंभीर आरोप केवल राजनीतिक नारे नहीं हो सकते। वे करोड़ों मतदाताओं के विश्वास से जुड़े प्रश्न हैं। इसलिए ऐसे आरोपों की जाँच भी तथ्य, प्रमाण और विधि के आधार पर होनी चाहिए।

*ईवीएम पर प्रश्न और तकनीकी पारदर्शिता*

इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों ने प्रश्न उठाए हैं। चुनाव आयोग ने विभिन्न अवसरों पर राजनीतिक दलों को मशीनों की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था समझाने तथा निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से अपनी शंकाएँ रखने का अवसर दिया है।

यहाँ भी दो अतियों से बचने की आवश्यकता है। बिना प्रमाण ईवीएम को स्वतः अविश्वसनीय घोषित करना उचित नहीं, लेकिन किसी भी तकनीकी व्यवस्था के संबंध में पारदर्शिता, स्वतंत्र परीक्षण और जनविश्वास सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

लोकतंत्र में तकनीक का उद्देश्य विश्वास बढ़ाना होना चाहिए। इसलिए निर्वाचन प्रक्रिया में तकनीकी पारदर्शिता, परीक्षण, अभिलेखों की सुरक्षा और स्पष्ट संचार को लगातार मजबूत किया जाना चाहिए।

*स्वदेशी उद्यमियों पर राजनीतिक आक्रमण*

राजनीतिक संघर्ष का प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। भारत में अनेक उद्यमी लाखों लोगों को रोजगार देते हैं, उत्पादन और निर्यात बढ़ाते हैं तथा आधारभूत संरचना के निर्माण में योगदान देते हैं।

किसी उद्योगपति या कंपनी की आलोचना करना गलत नहीं है। यदि भ्रष्टाचार, एकाधिकार, पर्यावरणीय उल्लंघन, श्रम अधिकारों या अन्य अनियमितताओं के संबंध में प्रमाण हों तो जाँच और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन किसी उद्यमी को केवल राजनीतिक विरोध के कारण खलनायक बना देना या प्रत्येक बड़ी परियोजना को संदेह की दृष्टि से देखना अर्थव्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।

*विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन*

एक्सप्रेसवे, बंदरगाह, ऊर्जा परियोजनाएँ, खनन और निर्माण जैसी आधारभूत परियोजनाएँ आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं। दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकार और भूमि संबंधी प्रश्न भी वास्तविक लोकतांत्रिक विषय हैं।

इसलिए हर विकास परियोजना का मूल्यांकन तथ्य और विधि के आधार पर होना चाहिए। वास्तविक पर्यावरणीय आपत्ति लोकतांत्रिक अधिकार है; लेकिन तथ्यहीन राजनीतिक अवरोध को पर्यावरण संरक्षण का नाम देना उचित नहीं।

भारत को ऐसा विकास चाहिए जिसमें अर्थव्यवस्था, रोजगार, पर्यावरण और सामाजिक हितों के बीच संतुलन हो।

*गोदी मीडिया और अंधभक्त जैसे तमगे*

राजनीतिक विमर्श में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति है कि असहमति रखने वाले व्यक्ति को तर्क से उत्तर देने के बजाय उसे किसी विशेष राजनीतिक खांचे में रख देना।

जो पत्रकार सरकार अच्छे कार्यों की आलोचना नहीं करता, उसे ‘गोदी मीडिया’ कह देना और जो सरकार की किसी नीति का समर्थन करता है, उसे ‘अंधभक्त’ कहना ये दोनों ही प्रवृत्तियाँ स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श को कमजोर करती हैं।

इसी प्रकार किसी पूर्व सैन्य अधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता या सामान्य नागरिक के विचारों से असहमति होने पर उसे किसी राजनीतिक या वैचारिक समूह का सदस्य बताकर खारिज करना भी तर्क की कमजोरी है।

लोकतंत्र में व्यक्ति की पहचान उसके तर्क से होनी चाहिए, उसके लगाए गए तमगे से नहीं।

*सामाजिक माध्यम और दुष्प्रचार का नया खतरा*

आज राजनीतिक संघर्ष का बड़ा क्षेत्र सामाजिक माध्यम बन चुका है। कुछ सेकंड का वीडियो, भ्रामक शीर्षक, काट-छाँटकर प्रस्तुत किया गया वक्तव्य या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित दृश्य लाखों लोगों तक कुछ ही समय में पहुँच सकता है।

यह परिस्थिति लोकतंत्र के लिए नई चुनौती है। राजनीतिक दलों, पत्रकारों और नागरिकों—सभी की जिम्मेदारी है कि किसी सामग्री को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जाँच करें।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में दृश्य प्रमाण भी हमेशा वास्तविक प्रमाण नहीं होते। इसलिए तथ्य-जाँच, मूल स्रोत की पहचान और सूचना की पुष्टि लोकतांत्रिक नागरिकता का आवश्यक अंग बनते जा रहे हैं।

*सत्ता-विरोध की राजनीति और राष्ट्रहित*

सत्ता में बैठी किसी भी सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आवश्यक अंग है। लेकिन सरकार और राष्ट्र में अंतर करना भी उतना ही आवश्यक है।

किसी सरकार की नीति का विरोध भारत का विरोध नहीं है। उसी प्रकार सरकार का समर्थन करना भी राष्ट्रभक्ति का एकमात्र प्रमाण नहीं है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब राजनीतिक लाभ के लिए देश की संस्थाओं, लोकतांत्रिक व्यवस्था या राष्ट्रीय क्षमता के संबंध में विदेशी मंचों पर ऐसे दावे किए जाएँ जिनका आधार प्रमाण के बजाय राजनीतिक प्रचार हो।

भारत की लोकतांत्रिक कमियों पर चर्चा करना गलत नहीं है। बल्कि लोकतंत्र में आत्मालोचना आवश्यक है। लेकिन आलोचना तथ्यपरक और उत्तरदायी होनी चाहिए।

*सेना के शौर्य को राजनीतिक विवाद का विषय न बनाएँ*

भारतीय सेना देश की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा करती है। सर्जिकल स्ट्राइक, वायु कार्रवाई या सीमा पर सैन्य अभियानों के संबंध में राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं। किसी सैन्य कार्रवाई की रणनीतिक या राजनीतिक समीक्षा भी लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हो सकती है।

लेकिन सेना के शौर्य को राजनीतिक दलगत संघर्ष में घसीटना और बिना प्रमाण उसके कार्यों को संदेहास्पद बताना सैनिकों के मनोबल तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक हितों के लिए उचित नहीं है।

सैन्य कार्रवाई से संबंधित संवेदनशील सूचनाओं का राजनीतिक उपयोग करने के बजाय तथ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थागत मर्यादा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

*राजनीतिक दलों के लिए समान लोकतांत्रिक कसौटी*

लोकतंत्र की रक्षा पर चर्चा करते समय यह स्पष्ट रहना चाहिए कि लोकतांत्रिक मर्यादा की कसौटी केवल विपक्ष के लिए नहीं हो सकती।

सत्ता पक्ष को भी विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए, संसद की गरिमा बनाए रखनी चाहिए, पत्रकारों और नागरिकों के प्रश्नों का सम्मान करना चाहिए और संस्थाओं की स्वतंत्रता को मजबूत करना चाहिए।

विपक्ष को भी चुनाव परिणामों और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए तथ्य एवं प्रमाण के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए।

लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन संस्थाएँ स्थायी होती हैं।

आज जो दल सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है और जो विपक्ष में है, वह भविष्य में सत्ता में आ सकता है। इसलिए किसी संस्था को तत्काल राजनीतिक लाभ के लिए कमजोर करना अंततः उसी व्यवस्था को कमजोर करता है जिसका उपयोग भविष्य में सभी दलों को करना है।

*जनादेश का सम्मान ही लोकतंत्र का मूल*

चुनाव लोकतंत्र का अंतिम नहीं, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय-बिंदु है। जनता किसी दल को सत्ता देती है तो उसे शासन का अवसर देना लोकतांत्रिक मर्यादा है। उसी प्रकार जनता यदि किसी दल को विपक्ष में बैठाती है तो उसे भी रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए।

चुनाव हारने के बाद आत्ममंथन करना लोकतांत्रिक परिपक्वता है। मतदाताओं को दोष देना, चुनावी संस्थाओं को बिना प्रमाण कटघरे में खड़ा करना या हर पराजय को षड्यंत्र बताना राजनीतिक विश्वसनीयता को कमजोर करता है।

जनता को कमतर समझना किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी भूल हो सकती है।

*लोकतंत्र को आंदोलन नहीं, मर्यादा बचाती है*

संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के निजी आवासों को निशाना बनाना, सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं का अपमान करना, जातीय एवं सामाजिक विद्वेष को बढ़ावा देना, चुनावी प्रक्रिया पर बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाना, संस्थागत मतभिन्नता को षड्यंत्र बताना, आर्थिक विकास को राजनीतिक द्वेष का विषय बनाना, असहमति रखने वालों को अपमानजनक तमगे देना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को दलगत संघर्ष में घसीटना—इनमें से कोई भी लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता।

लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। लोकतंत्र जनादेश का सम्मान, संविधान में आस्था, संस्थाओं की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण असहमति, प्रमाण-आधारित सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक मर्यादा का समुच्चय है।

यदि किसी राजनीतिक दल को चुनावी प्रक्रिया पर संदेह है, तो उसके पास संवैधानिक और न्यायिक मार्ग उपलब्ध हैं। यदि किसी परियोजना में अनियमितता है, तो जाँच और न्यायिक प्रक्रिया का मार्ग खुला है। यदि किसी नीति से असहमति है, तो शांतिपूर्ण आंदोलन और सार्वजनिक विमर्श का अधिकार है। यदि किसी संस्था के निर्णय पर प्रश्न है, तो उसके लिए वैधानिक समीक्षा के मंच उपलब्ध हैं।

लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता।

जनता ही लोकतंत्र की अंतिम शक्ति है। वह चुनाव के माध्यम से अपना निर्णय देती है और समय-समय पर राजनीतिक दलों को स्वीकार या अस्वीकार करती है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता को भड़काकर, समाज को बाँटकर, संस्थाओं को बदनाम करके, प्रमाणहीन आरोप लगाकर अथवा अराजकता का वातावरण बनाकर स्थायी राजनीतिक विश्वास प्राप्त नहीं किया जा सकता।

भारत को आज ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जिसमें तीखा मतभेद हो सकता है, लेकिन शत्रुता नहीं; कठोर आलोचना हो सकती है, लेकिन अपमान नहीं; आंदोलन हो सकता है, लेकिन हिंसा नहीं; सत्ता की चुनौती हो सकती है, लेकिन संविधान की अवमानना नहीं।

असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन अराजकता उसका विनाश।

भारत का लोकतंत्र किसी एक दल, नेता या विचारधारा की संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों के विश्वास से निर्मित राष्ट्रीय व्यवस्था है। इसकी रक्षा सत्ता और विपक्ष दोनों की समान जिम्मेदारी है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी एक पक्ष की विजय से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादा की विजय की है। क्योंकि मजबूत संस्थाएँ, जागरूक नागरिक और संविधान के प्रति अटूट विश्वास ही एक सशक्त, समरस और विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला हैं।

यह संस्करण मूल लेख के सभी प्रमुख विषयों को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक असहमति बनाम अराजकता, अभिव्यक्ति की संवैधानिक सीमा, सामाजिक माध्यम/कृत्रिम बुद्धिमत्ता से दुष्प्रचार, सत्ता-विपक्ष दोनों की जवाबदेही और विकास बनाम वैध पर्यावरणीय आपत्ति जैसे पक्ष भी जोड़ता है।

सोशल मीडिया के सहारे अफवाहों की राजनीति

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दिल्ली । सोशल मीडियाा का बढ़ता प्रभाव समाज व राजनीतिक व्यवस्था को अराजकता की ओर घसीट रहा है। अभी देश में तीन ऐसी घटनाएं घटी हैं जिनमें यह प्रतीत हो रहा है कि सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाहें फैलाकर देश को अराजकता की आग में झोंका जा रहा है। पंजाब के फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफैशनल यूनिवर्सिटी के कैंपस में एक अज्ञात छात्रा के साथ रेप और उसकी हत्या की अफवाह सोशल मीडिया के माध्यम से इस तेजी से फैली कि विश्वविद्यालय परिसर का वातावरण हिंसा की आग में झुलस गया। किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि बताई जा रही घटना सत्य है या फिर झूठी । इससे पूर्व आईआईटी मुंबई में एक छात्र द्वारा आत्महत्या कर लेने के मामले में भी सोशल मीडिया में अफवाहो का बाजार गर्म रहा और जब तक एक प्रोफेसर का इस्तीफा नहीं हो गया तब तक छात्रों का आंदोलन समाप्त नहीं हुआ हालाँकि अब आईआईटी मुंबई ने समस्त घटनाक्रम की जांच के लिए एक 10 सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया है ।
उज्जैन में शाही मस्जिद प्रकरण में भी एआई के माध्यम से बनाए गए वीडियो प्रसारित करके दंगा फैला दिया गया जबकि उज्जैन की शाही मस्जिद के अवैध हिस्से को ध्वस्त करने के लिए सरकार व शहर काजी के साथ समझौता हो चुका था। उज्जैन में सिंहस्थ महाकुंभ के भव्य आयोजन के लिए सड़क चौड़ीकरण का कार्य चल रहा है, जिसकी सीमा में आने वाले 20 मंदिरों व 10 मस्जिदों को पहले ही हटाया जा चुका है उसके बावजूद कुछ अराजकतवादी कट्टरपंथी तत्वों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर पुलिसबलों पर पत्थरबाजी करके हिंसा फैला दी।
आश्चर्यजनक रूप से उज्जैन में कुछ सोशल मीडिया इन्लुएंसर भी विरोध प्रदर्शन में पहुंचे। पुलिस प्रशासन ने अपनी सतर्कता से स्थिति पर जल्द ही काबू पा लिया। अभी तक की जांच के आधार पर पता चला है कि 500 सोशल मीडिया एकाउंट्स के माध्यम से अफवाहें फैलाई गयीं और लोगों को हिंसा के लिए एकत्र किया गया। उज्जैन में सुनियोजित तरीके से सोशल मीडिया के माध्यम से मुस्लिम समाज की भावनाओं को भड़काया गया और फिर उसमें जिस प्रकार से एआईएमआईएम की इंट्री हुई वह अत्यंत चिंताजनक है ।
पंजाब की घटना – पंजाब के दो विश्वविद्यालय भी सोशल मीडिया की अफवाहों के कारण अशांत हो गए । पंजाब की चितकारा युनिवर्सिटी और लवली प्रोफेशनल युनिवर्सिटी में फैली हिंसा की वजह व्हाट्स एप के माध्यम से शेयर होने वाली अफवाहें थीं। अफवाहों के कारण छात्रों में आक्रोश व्याप्त हो गया किंतु न तो वास्तविक पीड़िता ही सामने आई और न ही उसके परिवार ने पुलिस प्रशासन से कोई मदद मांगी। बस छात्र समुदाय व्हाट्स एप फारवर्ड करता रहा और इंस्टाग्राम रील्स को लाईक्स और शेयर करता रहा। दोनों युनिवर्सिटी में कहीं पर भी हिंसक छात्र समुदाय ने घटनाओं की वास्तविकता जानने का प्रयास नहीं किया। जब पीड़िता अगले दिन कक्षा में उपस्थित हो गई तब उसे भूत भी कहा गया । परिणामतः विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं स्थगित हो गयीं तथा विश्वविद्यालयों को दस दिन के लिए बंद कर दिया गया। अब जब पुलिस की कार्यवाही चल रही है तब कहा जा रहा है कि दोनों ही विश्वविद्यालयों में हिंसा व आगजनी के लिए बाहर से अराजक तत्व आ गये थे।
सोशल मीडिया के माध्यम से फ़ैल रही अफवाहें देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण को बिगाड़ रही हैं । उज्जैन की घटना को लेकर मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले सभी दल भारतीय जनता पार्टी को बदनाम करने के लिए मैदान में उतर पड़े। वहीं दूसरी ओर पंजाब विश्वविद्यालय में घट रही घटनाओं पर उस क्रॉकरोच जनता पार्टी ने मौन साध लिया जो छात्रों की हर बात पर प्रतिक्रिया देती है। छात्रों की गूंज अभियान चलाने वाले राहुल गांधी को पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों की गूंज व आक्रोश नहीं दिखलाई पड़ रहा है क्योकि वहां इंडी गठबंधन की आम आदमी पार्टी की सरकार है।
आज यह समय की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया का सही ढंग से उपयोग किया जाए ताकि अफवाहों और अराजकता के वातावरण से बचा जा सके। आज देशभर में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के दुरुपयोग को लेकर स्पष्ट चिंता दिखाई दे रही है।
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