गौतम अडानी का इस्तीफा और मोदी सरकार का अटल किला: अफवाहों का कीजिए थप्पड़ से स्वागत

2-13.jpeg

अहमदाबाद : भारत के व्यापारिक जगत में गौतम अडानी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक साधारण परिवार से निकलकर वैश्विक स्तर पर भारत का परचम लहराने वाले इस उद्योगपति की कहानी प्रेरणा और संघर्ष की मिसाल है।

5 अगस्त 2025 को, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) ने घोषणा की कि गौतम अडानी ने कार्यकारी अध्यक्ष (एग्जीक्यूटिव चेयरमैन) के पद से इस्तीफा दे दिया है और अब वे गैर-कार्यकारी अध्यक्ष (नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन) की भूमिका निभाएंगे। इस खबर ने न केवल व्यापारिक हलकों में हलचल मचाई, बल्कि कुछ लोग इसे नरेंद्र मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी के रूप में प्रचारित करने लगे। यह लेख गौतम अडानी के इस कदम, उनके संघर्ष, कारोबार और इस इस्तीफे के पीछे के तथ्यों को विस्तार से बताएगा।गौतम अडानी: एक साधारण शुरुआत से वैश्विक साम्राज्य तकगौतम अडानी का जन्म 1962 में गुजरात के अहमदाबाद में एक साधारण जैन परिवार में हुआ था। स्कूल के बाद उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़ दी और 19 साल की उम्र में मुंबई में हीरे के व्यापार में कदम रखा। 1988 में उन्होंने अडानी एंटरप्राइजेज की स्थापना की, जो शुरू में कृषि उत्पादों के निर्यात से शुरू हुई। उनके दूरदर्शी नेतृत्व और जोखिम उठाने की क्षमता ने उन्हें भारत के सबसे बड़े बुनियादी ढांचा समूह का नेतृत्व करने वाला बनाया। आज अडानी समूह का कारोबार बंदरगाह, ऊर्जा, रसद, रक्षा, डेटा सेंटर, और हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। अडानी पोर्ट्स, जिसका बाजार पूंजीकरण 2.93 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, भारत का सबसे बड़ा निजी बंदरगाह संचालक है, जो देश के 28% बंदरगाह कार्गो को संभालता है।

2025 की पहली तिमाही में अडानी पोर्ट्स ने 6.5% की वृद्धि के साथ 3,311 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ और 31% की वृद्धि के साथ 9,126 करोड़ रुपये की आय दर्ज की। यह प्रदर्शन दर्शाता है कि कंपनी मजबूत स्थिति में है। फिर भी, गौतम अडानी के कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटने की खबर को कुछ लोग गलत संदर्भ में पेश कर रहे हैं।इस्तीफा: एक रणनीतिक कदम, न कि पतन का संकेतगौतम अडानी का कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटना कोई अचानक या संकटग्रस्त निर्णय नहीं है। यह कदम कंपनी अधिनियम (सेक्शन 203, उप-धारा 3) के प्रावधानों के अनुपालन के लिए उठाया गया है, जो यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ दो कंपनियों में कार्यकारी भूमिका (जैसे कार्यकारी अध्यक्ष या प्रबंध निदेशक) नहीं निभा सकता। अडानी पोर्ट्स में पहले से ही दो कार्यकारी निदेशक हैं—प्रबंध निदेशक करण अडानी और पूर्णकालिक निदेशक व सीईओ अश्वनी गुप्ता। ऐसे में, गौतम अडानी का गैर-कार्यकारी अध्यक्ष बनना एक कानूनी और रणनीतिक कदम है, जिससे वे अडानी समूह की अन्य कंपनियों, विशेष रूप से अडानी एंटरप्राइजेज, पर अधिक ध्यान दे सकें।

अडानी एंटरप्राइजेज समूह की प्रमुख कंपनी है, जो हवाई अड्डों, डेटा सेंटर, और तांबे जैसे नए कारोबारों का आधार है। इसके अलावा, कंपनी ने मनीष केजरीवाल को गैर-कार्यकारी स्वतंत्र निदेशक के रूप में नियुक्त किया है, जो केदारा कैपिटल के संस्थापक हैं। यह नियुक्ति कंपनी के कॉरपोरेट गवर्नेंस को और मजबूत करने की दिशा में एक कदम है। गौतम अडानी का गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में बने रहना दर्शाता है कि वे कंपनी की रणनीतिक दिशा में अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, लेकिन दैनिक कार्यों से मुक्त होकर समूह की अन्य इकाइयों पर ध्यान दे सकेंगे।अफवाहों का बाजार और मोदी सरकार पर हमलाअडानी के इस कदम को कुछ लोग, विशेष रूप से विपक्षी नेता और सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ समूह, नरेंद्र मोदी सरकार के पतन से जोड़कर देख रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। पिछले 11 सालों से, जब से नरेंद्र मोदी ने 2014 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, कुछ लोग और समूह लगातार यह प्रचार करते रहे हैं कि उनकी सरकार अस्थिर है और जल्द ही गिर जाएगी। कांग्रेसी नेता पवन खेड़ा जैसे लोग समय-समय पर दावे करते रहे हैं कि “मोदी सरकार दो महीने में गिर जाएगी” या “छह महीने में इसका अंत होगा।” ये दावे न केवल आधारहीन हैं, बल्कि बार-बार गलत साबित हुए हैं।

मोदी सरकार ने 2014, 2019, और 2024 के लोकसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। आर्थिक सुधारों, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, और स्वच्छ भारत जैसे कार्यक्रमों ने देश को नई दिशा दी। भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और 2030 तक इसके तीसरे स्थान पर पहुंचने की संभावना है। ऐसे में, अडानी के एक रणनीतिक कदम को सरकार के पतन से जोड़ना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह दर्शाता है कि कुछ लोग तथ्यों से ज्यादा अफवाहों पर भरोसा करते हैं।अफवाह फैलाने वालों को करारा जवाबये वही लोग हैं जो पिछले एक दशक से सोशल मीडिया और यूट्यूब पर रोजाना नई कहानियां गढ़ते हैं। कभी वे दावा करते हैं कि अडानी और मोदी के बीच “साठगांठ” है, तो कभी कहते हैं कि अडानी का कोई भी कदम सरकार की अस्थिरता का संकेत है। इनका एकमात्र उद्देश्य भ्रम फैलाना और जनता को गुमराह करना है। हिंदनबर्ग रिसर्च जैसे विदेशी संगठनों की रिपोर्ट्स को आधार बनाकर ये लोग अडानी समूह और मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि अडानी समूह ने बार-बार इन आरोपों को खारिज किया है और कानूनी कार्रवाई की बात कही है।उदाहरण के लिए, हिंदनबर्ग ने 2023 में अडानी समूह पर धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, जिसके बाद समूह के शेयरों में गिरावट आई थी। लेकिन अडानी समूह ने न केवल उस संकट से उबरकर अपनी स्थिति मजबूत की, बल्कि गौतम अडानी 2025 में फोर्ब्स की सूची में भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए, जिनकी संपत्ति 60.3 बिलियन डॉलर है। यह दर्शाता है कि अडानी का कारोबार और नेतृत्व कितना मजबूत है। फिर भी, कुछ लोग उनके एक रणनीतिक कदम को उनके “अंत” के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। यह उनकी नासमझी और पक्षपातपूर्ण सोच का परिचायक है।मोदी सरकार पर क्या फर्क पड़ता है?अडानी का इस्तीफा एक कॉरपोरेट निर्णय है, जिसका सरकार की स्थिरता से कोई लेना-देना नहीं है। मोदी सरकार की नीतियां और नेतृत्व देश की प्रगति पर केंद्रित हैं। अडानी समूह भारत के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, और रसद क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, और यह योगदान गौतम अडानी की भूमिका बदलने से रुकने वाला नहीं है। उनके बेटे करण अडानी पहले से ही अडानी पोर्ट्स के प्रबंध निदेशक हैं और कंपनी के दैनिक कार्यों को संभाल रहे हैं। यह एक सुनियोजित उत्तराधिकार योजना का हिस्सा है, न कि किसी संकट का संकेत।

दूसरी ओर, जो लोग इसे मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी बता रहे हैं, वे वही लोग हैं जो 2014 से हर छोटी-बड़ी घटना को सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। चाहे वह नोटबंदी हो, जीएसटी हो, या कोविड-19 का प्रबंधन, हर बार इन्होंने कहा कि “मोदी सरकार गई।” लेकिन हर बार जनता ने इनके दावों को नकारा और मोदी सरकार को और मजबूत समर्थन दिया।अफवाहों का अंत, तथ्यों की जीतगौतम अडानी का कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटना एक रणनीतिक और कानूनी कदम है, जो उनके कारोबारी साम्राज्य को और मजबूत करने की दिशा में उठाया गया है। इसे मोदी सरकार के पतन से जोड़ना न केवल मूर्खता है, बल्कि यह उन लोगों की हताशा को दर्शाता है जो पिछले 11 सालों से सरकार के खिलाफ आधारहीन कहानियां गढ़ रहे हैं। अडानी समूह की वृद्धि और भारत की आर्थिक प्रगति दोनों ही अटल हैं। अफवाह फैलाने वालों को यह समझना होगा कि तथ्यों के सामने उनकी कहानियां ज्यादा दिन नहीं चलतीं। गौतम अडानी का भविष्य उज्ज्वल है, और मोदी सरकार का किला अडिग है। जो लोग इस तरह की अफवाहें फैलाते हैं, उन्हें जनता का जवाब वक्त के साथ मिलता रहेगा।

बुरहानपुर हत्याकांड और चन्द्रशेखर की सियासी चुप्पी

Screenshot-2025-08-06-at-11.11.43-PM.png

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के नावरा गांव में 4 अगस्त 2025 को हुई दलित युवती भाग्यश्री धानुक की नृशंस हत्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। शेख रईस नामक एक व्यक्ति ने कथित तौर पर उसकी गला रेतकर हत्या कर दी, जिसका कारण भाग्यश्री का इस्लाम कबूल करने और रईस से शादी करने से इनकार था। इस जघन्य अपराध ने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए, बल्कि “भीम आर्मी” के नेता चन्द्रशेखर आजाद की राजनीति पर भी गहरी छींटाकशी की है। चन्द्रशेखर ने अपने ट्विटर हैंडल (@BhimArmyChief) पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट (ID: 1952415408637567003) डाला, जिसमें उन्होंने इसे दलित उत्पीड़न और पुलिस की लापरवाही का मुद्दा बनाया, लेकिन अपराधी का नाम या हत्या का वास्तविक कारण-धार्मिक दबाव-का जिक्र तक नहीं किया। यह चुप्पी उनकी विश्वसनीयता और मंशा पर सवाल उठाती है।

चन्द्रशेखर ने अपने पोस्ट में नेपानगर थाने की उदासीनता और पीड़िता के परिवार को सहायता देने की मांग की, जो सही है, लेकिन उन्होंने शेख रईस का नाम छिपाकर मामले को जानबूझकर जातिगत रंग देने की कोशिश की। अपराधी की पहचान और हत्या का मकसद—जो ऑपइंडिया की रिपोर्ट में स्पष्ट है—को दबाना उनकी राजनीति का हिस्सा लगता है। रिपोर्ट के अनुसार, रईस ने लंबे समय से भाग्यश्री पर धर्म परिवर्तन और शादी का दबाव बनाया था, और इनकार के बाद उसने रात में उसके घर में घुसकर हत्या कर दी। पीड़िता की बहन सुब्हद्रा ने भी इस बात की पुष्टि की है कि रईस अक्सर उसे पीटता और धमकाता था।

चन्द्रशेकर की यह चुप्पी उनकी वोट बैंक की राजनीति को उजागर करती है। ‘भीम आर्मी’ दलितों और बहुजन समाज के हितों की बात करती है, लेकिन जब अपराधी मुस्लिम समुदाय से है, तो उनकी हिम्मत नाम लेने में क्यों नहीं पड़ती? अगर अपराधी सवर्ण या हिंदू होता, तो शायद चन्द्रशेखर का आक्रोश सोशल मीडिया पर तूफान मचा देता। यह दोहरा रवैया उनकी सियासी चाल को दर्शाता है, जहाँ सत्य को कुचलकर अपनी छवि चमकाने की कोशिश की जा रही है। क्या यह मुस्लिम वोट को न खोने की रणनीति है? यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है, लेकिन उनकी चुप्पी इसे बल देती है।

वहीं, मध्य प्रदेश सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए रईस की संपत्ति पर बुलडोजर चलाया, जो न्याय की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। पुलिस ने मामले में SC/ST एक्ट और BNS के तहत कार्रवाई शुरू की है, और फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई की मांग उठ रही है। लेकिन चन्द्रशेखर की निष्क्रियता ने इस घटना को सियासी रंग देने का अवसर गंवा दिया। वह दलितों के मसीहा बनने का दावा करते हैं, पर इस मामले में उनकी चुप्पी ने उनके इरादों पर शक पैदा कर दिया है।

बुरहानपुर हत्याकांड ने समाज में व्याप्त धार्मिक कट्टरता और पुलिस की नाकामी को उजागर किया है, लेकिन चन्द्रशेखर की राजनीति ने इसे और जटिल बना दिया। उनकी हिम्मत सत्य बोलने में नहीं, बल्कि उसे छिपाने में दिखती है, जो दलितों के हितों से ज्यादा उनकी सियासी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। यह घटना न केवल एक युवती की हत्या का शोक है, बल्कि सत्य को दबाने वाली राजनीति का भी आईना है।

Reference : https://hindi.opindia.com/news-updates/bulldozer-action-on-stable-of-the-accused-of-murdering-a-hindu-woman-in-burhanpur-madhya-pradesh/

जब वह पलटकर वार करेगी तब मनुष्य को कौन बचाएगा?

river-Nature.jpg

व्यक्ति जिस तरह पहाड़ों को समतल करने का प्रयास कर रहा है। जंगल काटता जा रहा है, यहाँ तक कि धरती माता को संपदाविहीन बना रहा है, प्राकृतिक स्रोतों के जल-प्रवाहों को प्रतिबंधित करते हुए उन्हें अपनी पसंद एवं निर्मिति के अनुरूप प्रवाहित होने के लिए बाध्य कर रहा है, वह सब सृष्टि के प्रति उसके अत्यल्प सम्मान को बतानेवाला है। अति आत्मतुष्टि व स्वकेंद्रित दर्प से युक्त होकर वह अति विशाल प्रकल्पों को हाथ में ले रहा है, मानो वह त्रिकालदर्शी एवं सर्वशक्तिमान हो, अथवा प्रकृति की उत्पत्ति व लय में सक्षम द्वितीय विधाता बन गया है। वह अपनी हठधर्मिता के कारण विशाल उद्यमों के प्रभावों को देखने को तैयार नहीं है।*

*प्रकृति जब तक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती, तब तक उसके साथ खिलवाड़ करना सरल है, किंतु जब वह पलटकर वार करेगी (अनिवार्य रूप से करेगी ही), तब मनुष्य को कौन बचाएगा?…*

*….ऐसे समूह विज्ञान की सहायता से प्राकृतिक शक्तियों को खोजकर और उनपर नियंत्रण कर, अपने स्वार्थी उद्देश्यों की पूर्ति करने में जुटे हुए हैं। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में विश्व विनाश की आशंका से भयकंपित है, उसकी कृष्णछाया में जीने के लिए विवश है। एक ओर तो मनुष्य को सुखी बनाने के लिए योजनाएँ बनाई जा रही हैं तो दूसरी ओर प्रकृति की गूढ़ शक्तियों को नियंत्रण में लाकर सृष्टि पर विजय प्राप्त कर स्वामी बनने के अनधिकार प्रयास कर आत्मविनाश को निमंत्रण दिया जा रहा है।”*

–श्रीगुरुजी के द्वारा ऑर्गनायजर, १४ नवंबर १९५५ में लिखे एक आलेख का अंश।

रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत की बड़ी बचत

Screenshot-2025-08-06-at-4.37.22-PM.png

अनुराग पुनेठा

पिछले तीन साल (अगस्त 2022 से अगस्त 2025) में भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर करीब 26.3 बिलियन डॉलर (लगभग 2.21 लाख करोड़ रुपये) बचाए। अगर यही तेल सऊदी अरब से खरीदा जाता, तो भारत को 187.3 बिलियन डॉलर खर्च करने पड़ते, लेकिन रूस से खरीदने पर खर्च सिर्फ 161 बिलियन डॉलर हुआ। यह बचत इसलिए हुई क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण अपने तेल पर 10-20 डॉलर प्रति बैरल की छूट दी, जो सऊदी तेल से सस्ता था।

रूस से तेल खरीद में बढ़ोतरी

2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से तेल खरीद बढ़ा दी। 2022 में भारत ने 25 बिलियन डॉलर का तेल खरीदा, 2023 में 48.63 बिलियन डॉलर, 2024 में 52.73 बिलियन डॉलर और 2025 के पहले आठ महीनों में 35 बिलियन डॉलर का तेल लिया। भारत ने हर दिन औसतन 1.5 से 1.8 मिलियन बैरल तेल रूस से मंगवाया। सऊदी अरब का तेल ब्रेंट बेंचमार्क की कीमत पर बिकता है, जो रूसी तेल से महंगा है। मिसाल के तौर पर, 2023 में रूसी तेल 70-80 डॉलर प्रति बैरल था, जबकि सऊदी तेल 80-100 डॉलर प्रति बैरल।

बचत का महत्व

Investment Information and Credit Rating Agency of India Limited (IICRA India) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 2023 में 5.1 बिलियन डॉलर और 2024 के 11 महीनों में 7.9 बिलियन डॉलर की बचत की। यह बचत भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि भारत अपनी तेल जरूरत का 85% से ज्यादा आयात करता है। 2024 में भारत का कुल तेल आयात बिल 137 बिलियन डॉलर था, जिसमें रूस का हिस्सा 35-40% था। अगर भारत सऊदी अरब से तेल खरीदता, तो पेट्रोल-डीजल और परिवहन की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ सकती थी।

भारत का रुख और वैश्विक प्रभाव

ट्रंप प्रशासन की धमकियों के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा, क्योंकि मध्य पूर्व जैसे दूसरे स्रोत ज्यादा महंगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत रूस से तेल न खरीदता, तो वैश्विक तेल की कीमतें 130-140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती थीं। रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत ने न सिर्फ पैसे बचाए, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत किया।

scroll to top