मैने उन्हें भारतीय राजनीति में सफलता का पाठ पढाया था, सत्यनिष्ठा अनिवार्य है

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*आचार्य श्रीहरि*

दिल्ली । गुजरात विधान सभा 2012 की बात है। गुजरात विधान सभा चुनाव के एक नियंत्रक, प्रवेक्षक और विश्लेषक मैं भी था। मेरी जिम्मेदारी चुनाव प्रचार की खामियां, कमजोरियां निकालना था और प्रचार के मुद्दे खोजने थे, चुनाव प्रचारको की उपियोगिता भी देखनी थी। साथ ही साथ मुझे हिन्दी अखबारों और सोशल मीडिया के लिए विश्लेषनात्मक आलेख भी प्रतिदिन लिखने थे। मेरा काय्र्र बहुत ही दुरूह था, भाषा की समस्या थीं, गुजराती से अनभिज्ञ था और अंग्रेजी में हाथ तंग थे। मेरी दिलचस्पी इस विषय में ज्यादा थी कि बाहर से आने वाले नेता कितना चाकचैबंद चुनाव प्रचार करते हैं या फिर हवाहवाई मनोरंजन करते हैं। इसी सर्वेक्षण के दौरान में मुझे सीपी राधाकृष्णन का नाम मालूम हुआ। सीपी राधाकृष्णन को मैं अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल से जानता था, वे 1998 में संसद बने थे। सिर्फ नाम से जानता था और उनसे कभी नहीं मिला था।

नरेन्द्र मोदी की विघान सभा क्षेत्र मणिनगर में अनुराग ठाकुर की सभा थी। उस समय अनुराग ठाकुर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। मैं भी अंकेक्षण के लिए वहां उपस्थित था। उसी दौरान मुझे सीपी चन्द्रशेखर के आने की सूचना मिली। मैं अनुराग ठाकुर की सभा में ही सीपी राधाकृष्णन से मिला। सीपी राधाकृष्णन हिन्दी नहीं जानते थे और न ही उन्हें गुजराती आती थी। दुभाषीय के माध्यम से मेरी उनसे बात होती है। इसी दौरान समाजवादी नेता और राजनारायण के शिष्य क्रांति प्रकाश मिल गये। क्रांति प्रकाश पहले से ही सीपी राधाकृष्णन के घनिष्ठ मित्र थे। मेरीे तारीफ क्रांति प्रकाश ने जमकर की, इस कारण सीपी राधाकृष्णन हमसे प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी सभाओं के लिए मुझे आमंत्रित कर लिया। वे आमंत्रित नहीं करते तो भी मैं उनकी सभाओं में सक्रियता रखता ही, क्योंकि मेरी जिम्मेदारी में वह निहीत था। सीपी राधाकृष्णन की चुनावी दृष्टिकोण और तमिल लोगों को आकर्षित करने के कारक विन्दु को भी मुझे जानना था।
सीपी राधाकृष्णन जब हिन्दी, गुजराती नहीं जानते हैं तब उन्हें गुजरात विधान सभा चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित क्यों किया गया? मेरे मन में बहुत ही क्रोधित करने वाले प्रश्न खडे हो रहे थे। मैंने सीधे भाजपा कार्यालय को फोन लगा दिया। पता चला कि कुछएक वोट तमिल भाषाई लोगों के हैं। इसी कारण उन्हें प्रचार के लिए आमंत्रित किया गया है। सीपी राधाकृष्णन के साथ चुनाव प्रचार के लिए मैं जाता हूं। क्रांति प्रकाश भी साथ रहते हैं। एक तमिल भाषाई कालोनी में जाते हैं जहां पर उनकी सभा रखी गयी थी। पर वहां सभा नाम का कोई चिन्ह और तैयारी नहीं थी। एक मंदिर में बीस-पच्चीस लोग होते हैं। शायद ये तमिल भाषायी मछुआरे और मजदूर थे पर बहुत ही गरीब थे। बीस-पच्चीस लोगों के बीच भी उन्होंने आराम से अपना भाषण तमिल में दिया। मुझे याद है कि उन्होंने कहा था कि व्यक्तिगत लाभ के लिए देश को खतरे में नहीं डालना चाहिए और हमारे लिए देश महत्वपूर्ण है। चूंकि गुजरात सीमावर्ती प्रदेश हैे, इसीलिए पाकिस्तान के निशाने पर है, नरेन्द्र मोदी की वीरता को पराजित करने का अर्थ राष्ट्र की अस्मिता को कमजोर करना होगा। सभा समाप्त होने के बाद हमलोग गांधी आश्रम लौट गये, जहां पर राधाकृष्णन ठहरे हुए थें वहां पर उन्होंने रात में रूकने का आग्रह किया और साथ में खाना भी खाया। रात के काफी देर तक चन्द्रशेखर, मैं और क्रांति प्रकाश देश की राधाकृष्णन और नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक वीरता और सत्यनिष्ठा पर बात करते रहे थे। उनकी बातों से मुझे समझ में आ गया था कि वे राष्ट्रीय स्तर के ज्ञान रखते हैं और हिन्दी नहीं जानने के कारण उनकी राजनीतिक उडान आसमान नहीं छुऐगी। मैने उन्हें महात्मा गांधी का पाठ पढाना जरूरी समझा। मैंने उन्हें सीधे तौर पर कह दिया कि बडा बनना है तो हिन्दी को जानिये, उदाहरण मैं महात्मा गांधी को देता हूं, महात्मा गंाधी हिन्दी भाषी नहीं थे, वे गुजराती थे, लेकिन उन्होंने गुजराती की जगह हिन्दी को अपने संवाद की भाषा बनायी। अगर आप हिन्दी-गुजराती जानते तो इस विधान सभा चुनाव में आपके विचार मीडिया के सिर चढ कर बोलते। यही कारण है कि आपकी सभा के भाषण मीडिया बाजार में धमाका नहीं कर सका। सीपी राधाकृष्णन ने मेरी इस सीख पर सिर्फ इतना कहा था यू आर राइट।
हिन्दी को लेकर उनकी राय स्पष्ट होने से मैं प्रसन्न था। सीपी राधाकृष्णन ने मुझसे कहा कि दक्षिण का हिन्दी विरोध आंदोलन आत्मघाती था, बेवहियात था और अदूरदर्शी था। उनका कहना साफ था कि हिन्दी विरोध का प्रश्न सस्ती राजनीति थी। अपने फायदे के लिए हिन्दी के खिलाफ वातावारण बनाया गया। हिन्दी नहीं जानने के कारण दक्षिण के युवाओं को उत्तर भारत में रोजगार नहीं मिल पाया। रजनीतिज्ञ भी इसका शिकार हुए हैं। हिन्दी नहीं जानने वाले राजनीतिज्ञ अखिल भारतीय स्तर पर अपना जनाधार विकसित नहीं कर पाये। तमिल के राजनीतिज्ञ हिन्दी इलाके मे तो क्या बल्कि कर्नाटक और आध्रप्रदेश में भी विख्यात नहीं हो सके, जहां पर कन्नड और तेलगू का प्रभाव है। उनकी यह समझ बहुत ही चाकचैबंद थी। दक्षिण में सिर्फ तमिल ही नहीं बल्कि कन्नड, मलयालम, तेलगू जैसे मजबूत भाषाएं हैं और इनकी पहचान भी अलग है। इसी के साथ ही साथ राधाकृष्णन अंग्रेजी के प्रति भी आग्रही हैं। अंग्रेजी भाषा का विरोध को भी वे असंगत मानते हैं।
लंबे समय तक राजनीति के मुख्य धारा में होने के बाद भी इनकी पहचान राष्ट्रीय नेता की नहीं बन सकी थी। कारण उपर के तथ्यों में निहित है। एकाएक इनके भाग्य का पिटारा खुलता है और ये राज्यपाल बना दिये जाते हैं। मुझे यह खबर सुनकर अच्छा लगा। सौभाग्य से ये हमारे गृह प्रदेश्ज्ञ झारखंड के राज्यपाल थे। लेकिन मैं ठहरा संत और फक्कड संस्कृति का मनुष्य। किसी के पीछे भागना मुझे अच्छा लगता नहीं है, यह मेरी कार्य संस्कृति का हिस्सा नहीं है। मैंने गुजरात के बाद फिर कभी सीपी राधाकृष्णन से मिलने और बात करने की जरूरत ही नहीं समझी। जब ये झारखंड के राज्यपाल थे तब भी मुझे इनसे बात करने की इच्छा नहीं हुई और न ही मैं कभी गुजरात प्रसंग के इतिहास पर चर्चा करने की जरूरत समझी।
अब ये उप राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। भाजपा ने इन्हें उप राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। भाजपा के पास बहुमत है। इसलिए ये निश्चित तौर पर उपराष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति बनाना भाजपा की दूरदष्टि हैं और नरेन्द्र मोदी का मास्टर पोलिटकल स्ट्रोक हैं। निशाना दक्षिण की राजनीति है, तमिल की राजनीति है। तमिलनाडु की राजनीति में इसका प्रभाव पडने वाला है। तमिलनाडु की राजनीतिक सत्ता द्वार पर भाजपा दस्तक दे रही है, जनाधार लगातार मजबूत हो रहा है। तमिल भाषाई आबादी के बीच नरेन्द्र मोदी और भाजपा के प्रति हमदर्दी बढी होगी और भविष्य में बढेगी। ऐसी उम्मीदो को खारिज करना मुश्किल है।
सीपी राधाकृष्णन को दूरदर्शिता दिखाने की जरूरत होगी। इसके पहले भी भाजपा ने बैेंक्टैया नायडू को उपराष्ट्रपति बनाया था। लेकिन नायडू ने अपनी कोई पहचान नहीं छोड पाये और दक्षिण में भाजपा का कोई लाभ नहीं दिला सके। सीपी राधाकृष्णन को अति महत्वाकांक्षा से मुक्त होना होगा, आत्मघाती बनने की मानसिकता से दूर रहना होगा। राज्य सभा के संचालन में शक्ति प्रदर्शन करने की जरूरत होगी। नरमी घातक होगी। सख्ती की भाषा से ही सदन की गरिमा बचेगी, शांति की उम्मीद बनेगी। इस मंत्र को अपना कर्म बनाना होगा।
हमें गर्व है कि उप राष्ट्रपति के पद पर बैठने जाने वाले सीपी राधाकृष्णन कभी मेरे चुनावी सहचर्य और संवाद के शख्सियत रहे है, मैंने उन्हें हिन्दी की अनिवार्यता और स्वीकारता का पाठ भी पढाया थां। पर मैं जिस तरह गुजरात के बाद फिर कभी सीपी राधाकृष्णन से मिलने और बात करने की जरूरत नहीं समझी उसी तरह से मैं आगे भी उनसे शायद ही मिल पाउंगा या फिर कोई बात कर पाउंगा। क्योंकि मेरा कर्म राजनीति नहीं बल्कि सनातन है। ऐसे भी जब कोई बडी कुर्सी पर बैठ जाता है तो फिर उसकी दृष्टि उपर की ओर हो जाती है, सफल बनना है तो पीछे नहीं आगे देखों की मानसिकता पर सवार हो जाता है।
मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद सीपी राधाकृष्णन के साथ जरूर है। पर ध्यान यह रखना होगा कि कोई बडी कुर्सी मिलने से महान नहीं होता है बल्कि महान राष्ट्र के प्रति समर्पण और सत्य निष्ठा के प्रदर्शन से होता है।

इंस्टाग्राम कॉन्फेशन्स पेज ने बंगलुरू स्कूल में मचाई खलबली

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दिल्ली । साउथ के एक नामी स्कूल में 16 साल की एक लड़की से शिक्षकों द्वारा की गई सामान्य पूछताछ ने डिजिटल युग का एक डरावना सच सामने ला दिया, जिससे छात्रों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की अंधेरी दुनिया उजागर हो गई।

शिक्षकों और प्रिंसिपल द्वारा ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर पूछे गए सवालों ने एक “पिटारा खोल दिया”—जिसमें दर्जनों छात्रों से जुड़ी शिकायतें, अश्लील बातचीत और इंस्टाग्राम के एक “कन्फेशन्स पेज” में शामिल होने के आरोप सामने आए।
तनाव तब और बढ़ गया जब एक फोटो पोस्ट के कारण एक जोड़े का ब्रेकअप हो गया, और फिर कुछ लड़कों ने उस लड़की को धमकियां दीं जिसने तस्वीरें डाली थीं। मामला तेजी से बिगड़ता गया—पैरेंट्स को बुलाया गया, शिक्षक खुद को असहाय महसूस करने लगे, और काउंसलर्स ने चेतावनी दी कि अगर स्थिति नहीं संभाली गई, तो पुलिस और साइबर क्राइम विभाग को शामिल करना पड़ सकता है।
हालांकि, बढ़ते विवाद के बाद भी पैरेंट्स ने शिकायतें वापस ले लीं, क्योंकि वे लंबी कानूनी लड़ाई और बदनामी से डर गए थे। एक अभिभावक ने कहा, “सब बेकार लगा। हमें लगा कि हार मान लेना ही एकमात्र विकल्प है।”
लेकिन यह घटना एक डरावना सबक छोड़ गई है। शिक्षकों ने इसे “आंखें खोल देने वाली घटना” बताया, जबकि काउंसलर्स ने सख्त हस्तक्षेप की जरूरत पर जोर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि पैरेंट्स और स्टाफ एकमत हो गए—अब उनकी मांग है कि स्कूली बच्चों को सोशल मीडिया के खतरों से बचाने के लिए एक **राष्ट्रीय डिजिटल उपयोग नीति बनाई जाए।
सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो ‘लाइक्स’ को असली रिश्तों से ज्यादा अहमियत देती है। अगर जल्द ही कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बनी, तो नुकसान और बढ़ जाएगा।”
क्या हो सकता है समाधान? स्क्रीन टाइम की लिमिट तय करना, डिजिटल लिटरेसी प्रोग्राम चलाना, साइबर सुरक्षा की शिक्षा देना, गलत जानकारी रोकने के अभियान चलाना ।
मानसिक असर: ज़्यादा स्क्रीन टाइम से बेचैनी, नींद की दिक़्क़त, ध्यान की कमी और पढ़ाई में गिरावट।
सोशल मीडिया का जाल: तुलना और वैलिडेशन की दौड़ से बच्चों में डिप्रेशन, बॉडी-इमेज की समस्या और साइबर बुलिंग।
पढ़ाई पर असर: बग़ैर निगरानी डिजिटल टूल्स नकल, ध्यान भटकाने और AI पर ज़्यादा निर्भरता का सबब।
हिंसक गेम्स और एडल्ट कंटेंट: नाबालिग़ बच्चों में वक़्त से पहले परिपक्वता और इंसानी रिश्तों से दूरी।
असमानता: शहरी बच्चों पर डिजिटल ओवरलोड और ग़रीब या देहाती बच्चों पर रिसोर्स की कमी।
ध्यान की कमजोरी: लगातार स्क्रॉलिंग से याददाश्त और फ़ोकस पर नकारात्मक असर।
डेटा का शोषण: टेक्नोलॉजी कंपनियाँ बच्चों का डेटा मुनाफ़े के लिए बेच रही हैं।
ऑनलाइन ख़तरे: स्कैम, फ़िशिंग और Predatory Grooming से बच्चे आसानी से शिकार बनते हैं।
सांस्कृतिक असर: एल्गोरिदम उपभोक्तावाद और एकरूप ग्लोबल कल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे स्थानीय तहज़ीब कमज़ोर हो रही है।
कौशल की कमी: सिर्फ़ स्क्रॉलिंग करने वाले बच्चे डिजिटल इकॉनमी में पिछड़ सकते हैं।
अगर अब भी राष्ट्रीय डिजिटल वेलबीइंग पॉलिसी नहीं बनी तो टेक्नोलॉजी कंपनियाँ बच्चों का बचपन, तालीम और आने वाली शहरी-देहाती ज़िंदगी को अपनी मर्ज़ी से ढालेंगी।
यह सिर्फ़ स्क्रीन टाइम का मामला नहीं—यह पूरी नस्ल की सेहत, मानसिक हालत और पहचान को बचाने का सवाल है।

जब राजनैतिक व्यवस्था सुस्त और लचर बनी रहेगी तो ज्यूडिशियरी को हस्तक्षेप करना पड़ेगा

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दिल्ली । भारत की सुप्रीम कोर्ट को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरेदार माना जाता है। महिलाओं के अधिकार, LGBTQ बराबरी और पर्यावरण सुरक्षा जैसे ऐतिहासिक फ़ैसलों ने अदालत की साख मज़बूत की है। लेकिन हाल के बरसों में कई फ़ैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि अदालतें अपने दायरे से बाहर निकलकर नीति और प्रशासन का काम करने लगी हैं। न्यायिक सक्रियता पर एक बहस 1993 में भी हुई थी जब जस्टिस कुलदीप सिंह बेंच ने MC मेहता के PIL पर ताज ट्रिपेजियम जोन में प्रदूषणकारी उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दी थीं। उस वक्त Presumptive justice का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था।

आजकल आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर न्यायिक दखल पर फिर से आधे अधूरे सवाल उठ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में न्यायिक सक्रियता को लेकर राजनैतिक सर्कल्स में असहजता देखी गई है। कुछ लोग ज्यूडिशियरी को parallel government के रूप में देखने लगे हैं! लेकिन ज्यूडिशियरी अपनी रिस्पांसिबिलिटी के प्रति जागरूक है और अपनी हदों से वाकिफ है। वो राष्ट्र का conscience है, जनता की आखिरी उम्मीद है।

हाल के वर्षों में कुछ केसेस में न्यायिक सक्रियता को लेकर, राज नेताओं ने कन्फ्यूजन फैलाया और ये भी कहा कि नेताओं की आजादी पर बेवजह अंकुश लगाया गया। जैसे, फ़रवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स योजना को रद्द कर दिया। चुनाव से कुछ ही हफ़्ते पहले आए इस फ़ैसले ने राजनीतिक उथल पुथल पैदा कर दी थी। आलोचकों का कहना था कि अदालत ने पार्लियामेंट की पॉलिसी को बिना ज़रूरी बहस पलट दिया।

इसी साल अदालत ने गवर्नरों और राष्ट्रपति को लंबित बिलों पर तय वक़्त में कार्रवाई का आदेश दिया। इतना ही नहीं, आर्टिकल 142 के तहत कुछ बिलों को “अपने आप क़ानून” मान लिया गया। क़ानूनविदों का कहना है कि यह आर्टिकल 200 की रूह से टकराता है और केंद्र व सूबों के ताल्लुक़ात पर असर डाल सकता है।
तक़नीकी और सामाजिक मामलों में भी अदालत ने दख़ल दिया। 2017 में हाईवे किनारे शराब दुकानों पर पाबंदी से लाखों लोगों की रोज़ी पर असर पड़ा, बाद में यह पाबंदी ढीली करनी पड़ी। पटाखों पर “ग्रीन क्रैकर्स” का फ़ैसला भी आया, जिसकी नीयत नेक थी मगर सवाल यह उठा कि क्या अदालतें वैज्ञानिक और सांस्कृतिक मसलों पर नीति तय करेंगी।

2018 में अदालत ने भारत को 2020 तक BS-6 उत्सर्जन मानकों पर ला दिया। उद्योग और ग्राहकों पर बड़ा बोझ पड़ा, और यह बहस उठी कि क्या ऐसे मसले अदालत के बजाय पॉलिसी-निर्माताओं के लिए नहीं छोड़े जाने चाहिए।
2025 में अदालत ने आवारा कुत्तों पर सुओ मोटू नोटिस लेकर आठ हफ़्तों में उन्हें शेल्टर भेजने का हुक्म दिया। मगर दिल्ली की हक़ीक़त यह है कि वहाँ मुश्किल से ढाई हज़ार कुत्तों की जगह है, जबकि आबादी आठ-दस लाख है। यह डायरेक्टिव Animal Birth Control Rules, 2023 से भी टकराता दिखा, हालांकि अभी फाइनल ऑर्डर आना बाकी है।

इन मिसालों ने न्यायिक सक्रियता को पॉलिसी बनाने की हद तक पहुँचा दिया है। अदालत की भूमिका हक़ की हिफ़ाज़त करना है, लेकिन जब वही हुकूमत या पार्लियामेंट का काम करने लगे, तो नाज़ुक संतुलन बिगड़ भी सकता है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन कहते हैं, “अदालतें आमतौर पर शक्तियों के पृथक्करण का सम्मान करती हैं और लक्ष्मण रेखा पार करने से बचती हैं। लेकिन जब नीतिगत गतिरोध या कानूनी शून्यता होती है, जो मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करती है और समाज को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाती है, तो न्यायपालिका मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती। ऐसे मामलों में, विधायिका या कार्यपालिका द्वारा कदम बढ़ाने तक नागरिकों की सुरक्षा के लिए अंतरिम निर्देश आवश्यक हो जाते हैं। अगर कोई राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चित काल तक बैठा रहे, तो यह कब तक चल सकता है? संविधान का अनुच्छेद 200 स्पष्ट करता है — राज्यपाल का उद्देश्य विधायी प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक रोकना नहीं है। अंततः, निर्वाचित सरकार की इच्छा ही प्रभावी होनी चाहिए।”

सार्वजनिक टिप्पणीकार प्रो. पारस नाथ चौधरी न्यायिक सक्रियता का समर्थन करते हैं। वे कहते हैं, “एक गतिशील समाज में न्याय को बनाए रखने और अधिकारों की रक्षा करने में न्यायिक सक्रियता एक महत्वपूर्ण शक्ति है। यह अदालतों को कानूनों को लचीले ढंग से व्याख्यायित करने का अधिकार देती है, ताकि कठोर विधान या अन्य अंगों की निष्क्रियता से पैदा हुए अंतराल को भरा जा सके। जब विधायिका नागरिक अधिकारों, पर्यावरणीय संकटों या प्रणालीगत असमानताओं जैसे जरूरी मुद्दों से निपटने में विफल होती है, तो सक्रिय न्यायाधीश हस्तक्षेप करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि संविधान एक जीवित दस्तावेज बना रहे, जो आधुनिक चुनौतियों के अनुकूल हो। अन्यायपूर्ण कानूनों या नीतियों को साहसपूर्वक रद्द करके, अदालतें हाशिए के समुदायों की सुरक्षा करती हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखती हैं। न्यायिक सक्रियता अतिक्रमण नहीं है; यह सत्ता पर एक आवश्यक अंकुश है, जो अन्य संस्थाओं के विफल होने पर निष्पक्षता और प्रगति को बढ़ावा देती है।”
भारत का लोकतंत्र अदालत की निगहबानी से ही मज़बूत होता है। लेकिन अदालत अगर पॉलिसी बनाने लगे तो बैलेंस बिगड़ने का ख़तरा भी बना रहेगा। बेहतर होगा संसद और हमारी पॉलिटिकल पार्टीज, समय रहते सचेत हो जाएं, और फटाफट नीतिगत फैसले लेने की पहल करें। जागो, सोने वालो।

यह भारत विरोधी शक्तियों के “स्लीपर सेल” का षड्यंत्र तो नहीं

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दिल्ली । काँग्रेस नेता राहुल गाँधी और इंडी गठबंधन के सदस्य दल विहार में मतदाता सूची के सत्यापन का तो विरोध कर रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग पर फर्जी मतदाता बनाने का आरोप लगाकर सड़क से लेकर संसद तक देश में नया तनाव पैदा रहे हैं। यह ठीक वही शैली है जो पाकिस्तान में इमरान खान और बंगलादेश में खालिदा जिया के विरुद्ध अपनाई गई थी। यह आँदोलन ऐसे समय तीव्र हुआ जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ हमला बोला।
विदेशी षड्यंत्र का उत्तर तो भारत दे देगा। यह वही अमेरिका है जिसने अटलजी के समय भारत द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद प्रतिबंध लगाये थे। लेकिन भारत अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। इस बार भी अमेरिका के टैरिफ हमले से भारत अपेक्षाकृत अधिक सक्षम होकर निकलेगा। लेकिन भारत को सदैव समस्या आन्तरिक तत्वों से रही। इन्हें आधुनिक शब्दावली में “स्लीपर सेल” कहते हैं। यह स्वयं सामने नहीं आते लेकिन भारत में भारत के ही चेहरों को अपना “मोहरा” बनाते हैं, इसी से विदेशी षड्यंत्र कारी सफल हुये हैं। वर्तमान समय में मतदाता सूची के बहाने उत्पन्न किये जा रहे राजनैतिक तनाव से भी कुछ प्रश्न उठ रहे हैं जो किसी षड्यंत्र की ओर संकेत कर रहे हैं। इस आँदोलन में तीन प्रकार के प्रश्न उठ रहे हैं जिनपर देश के प्रबुद्ध जनों को विचार करना आवश्यक है। पहली तो काँग्रेस और इंडी गठबंधन बिहार में मतदाता सूची का सत्यापन रोकने केलिये पूरी शक्ति लगा रहा है। आशंका है इन प्राँतों में कुछ बांग्लादेशी घुसपैठिये मतदाता बन गये हैं। जिनकी जांच चल रही है। इसे रोकने केलिये उच्चतम न्यायालय का दरबाजा भी खटखटाया गया है। लेकिन दूसरी ओर केवल मीडिया के सामने मतदाता सूची को मुद्दा बनाकर एक धुंध फैलाई जा रही है। फर्जी मतदाता के बहाने कुछ नाम उछाले गये हैं, दो महिलाओं के नाम लिये गये, बनारस में एक सूची भी दिखाई गई। ये नाम सब हिन्दुओं के हैं। काँग्रेस द्वारा प्रचारित सूची में किसी ऐसी बस्ती का नाम नहीं है जो मुस्लिम बाहुल्य हो। तीसरा प्रश्न इस आँदोलन का समय है। काँग्रेस ने आठ अगस्त से बहुत तेजी दिखाई। पहले “प्रेजेंटेशन” दिया, फिर सांसद सड़क पर निकले। नौ अगस्त रक्षाबंधन का दिन था। रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक सनातन त्यौहारों का एक क्रम रहता है। लेकिन काँग्रेस ने पूरे देश का ध्यान त्यौहारों से हटाकर मोदी सरकार और चुनाव आयोग की ओर खींचा। जिस दिन काँग्रेस और उनके साथी भारत की सड़क पर आँदोलन कर रहे थे उन्हीं दिनों पाकिस्तान की ओर से रक्षामंत्री मुनीर भारत को परमाणु हमले की धमकी दे रहे थे। इस बार मुनीर की धमकी ऐसे समय आई जब एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप टैरिफ के बहाने भारत को धमका रहे थे और दूसरी ओर भारत की सड़कों पर यह आँदोलन इतना तीव्र था कि जन सामान्य का ध्यान अमेरिका और पाकिस्तान की धमकी से हटकर केवल आँदोलन से उत्पन्न तनाव में ही लग गया।
इन दिनों पूरी दुनियाँ के कुछ भागों में सत्ता हथियाने की एक नई शैली विकसित हुई है। इसमें सकारात्मक मुद्दों के आधार पर जन सामान्य में अपना समर्थन नहीं बढ़ाया जाता, अपितु भ्रामक और झूठे मुद्दे उछालकर सरकारों को अस्थिर करने का कुचक्र किया जाता है, संवैधानिक संस्थाओं पर हल्ला बोला जाता है। इस शैली में सत्य पर, तथ्य पर अथवा तर्क पर कोई बात नहीं होती केवल धुंध फैलाई जाती है। ऐसी धुंध कि जिसमें कुछ भी साफ न दिखे, जन सामान्य भ्रमित होकर सड़कों पर आ जाये और सत्ता भयभीत होकर सिमट जाय। रूस में जारशाही के विरुद्ध पूरा वामपंथी आंदोलन इसी शैली पर चला था और इसी शैली से चीन में माओवाद प्रभावी हुआ था। इसी शैली से पाकिस्तान में इमरान खान और बंगलादेश में खालिदा जिया की सत्ता पलट हुआ। काँग्रेस और इंडी गठबंधन के कुछ दल इन दिनों भारत में इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। 2014 में केन्द्रीय सत्ता से बाहर होने के बाद काँग्रेस ने जितने भी मुद्दे उठाये गये हैं वे सभी नकारात्मक रहे हैं। उनके निशाने पर पहले प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी थे। उनको लक्ष्य करके “चौकीदार चोर” जैसे नारे उछाले गये। सीएए को मुद्दा बनाकर देश में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न करने का प्रयास हुआ। किसान आँदोलन के बहाने गाँवों में असंतोष भड़काने का प्रयास हुआ। ओबीसी आरक्षण का मुद्दा उछालकर देश में सामाजिक अलगाव की रेखा गहरी की गई। लेकिन मोदीजी बिना विचलित हुये भारत राष्ट्र को सशक्त बनाने के अभियान में जुटे रहे। वे विकसित देशों की पंक्ति में भारत को अग्रणी बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह मोदीजी की संकल्पशीलता और सकारात्मक चिंतन का ही परिणाम था कि विपक्ष द्वारा उछाले गये नकारात्मक मुद्दों का कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ा और मोदीजी के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनी। 2024 के चुनाव परिणाम के बाद काँग्रेस और उनके सहयोगी दलों ने अपनी नकारात्मक रणनीति को ही विस्तार देकर अधिक आक्रामक बनाया और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले तेज किये गये। ये हमले ईडी, सीबीआई, एनआईए पर हुये। सेना और न्यायालय तक को नहीं छोड़ा गया। अब चुनाव आयोग, चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम पर अधिक फोकस किया जा रहा है। पहले ईवीएम मशीन को “हैक” करने का शोर मचाया गया था। और अब मतदाता सूची हाथ में लेकर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने का शोर है। काँग्रेस और राहुल गांधी अपनी शिकायत लेकर सिधे चुनाव आयोग नहीं पहुँचे, आयोग ने बुलाया प्रमाण माँगे फिर भी नहीं पहुँचे। लेकिन सड़क से संसद तक अपनी आवाज तेज और तीखी करते रहे।

मतदाता सूची बनाने की प्रक्रिया में काँग्रेस के बीएलए भी शामिल होते हैं

मतदाता सूची तैयार करने की एक प्रक्रिया होती है। मतदाता सूची बनाने अथवा चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का काम चुनाव आयोग के निर्देशन में तो होता है लेकिन इसके लिये चुनाव आयोग के पास कोई अपना “स्टाॅफ” नहीं होता। यह काम राज्यों में काम करने वाला प्रशासन तंत्र करता है। देश में कुल 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। प्रशासनिक दृष्टि से इन्हें कुल 780 जिला केन्द्रों में विभाजित किया गया है। जिला प्रशासन का मुखिया कलेक्टर होता है। चुनाव आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है और सभी राज्यों की राजधानी में “राज्य निर्वाचन आयोग कार्यालय” तो होते हैं। पर उनमें इतना स्टाॅफ नहीं होता कि यह वे स्वयं यह काम कर सकें। चुनाव आयोग केवल “नीति निर्देशिका” अर्थात “गाइड लाइन” तैयार करता है। जो देश के सभी कलेक्टरों को भेजी जाती है। उसके अनुसार चुनाव प्रक्रिया आरंभ होती है। संबंधित सभी जिला कलेक्टर अपने प्रशासनिक दायित्वों के साथ “जिला निर्वाचन अधिकारी” भी माने जाते हैं। वे ही मतदाता सूची बनाने केलिये घर घर जाकर सर्वे करने अथवा मतदान प्रक्रिया पूरी करने के काम का समन्वय करते हैं। इसमें शिक्षक और पटवारी से लेकर डिप्टी कलेक्टर तक पूरा प्रशासनिक अमला लगता है। ये सब स्थानीय होते हैं। भारत में अलग अलग राज्यों में अलग अलग राजनैतिक दलों की सरकारें हैं। अनेक प्राँतों में भारतीय जनता पार्टी सरकार में भी नहीं हैं। मतदाता सूची तैयार करने का काम केवल प्रशासनिक अमले तक ही सीमित नहीं रहता। इसमें मान्यता प्राप्त दल भी सहभागी होते हैं। जिस प्रकार मतदान प्रक्रिया में प्रत्येक मतदान केन्द्र पर राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि सहभागी रहते हैं, उसी प्रकार मतदाता सूची बनाने में भी होते हैं। निर्वाचन अधिकारी के रूप में कलेक्टर की ओर से उस क्षेत्र के सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल को पत्र लिखे जाते हैं जिसमें उनसे अपना कोई कार्यकर्ता जोड़ने केलिये कहा जाता है। इस पत्र के आधार पर राजनैतिक दल अपना कार्यकर्ता नियुक्त करते हैं जिन्हें “बीएलए” अर्थात ब्लाक लेवल एजेंट कहा जाता है। सभी दलों के बीएलए के समन्वय से ही मतदाता सूचियाँ तैयार होती हैं।
इस प्रक्रिया से स्पष्ट है कि जहाँ भी मतदाता सूचियाँ तैयार हुईं हैं उनमें काँग्रेस कार्यकर्ता भी बीएलए के रूप में सहभागी रहे हैं। यदि कहीं कोई गड़बड़ी थी तो उसकी शिकायत स्थानीय स्तर पर ही क्यों नहीं की गई। इसके अतिरिक्त एक बात और है। मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन पहली बार में कभी नहीं होता। इन्हें तैयार करके पहले सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाता है, सुझाव और आपत्तियाँ माँगी जातीं हैं। सुझाव और आपत्ति भेजने की भी अंतिम तिथि निर्धारित होती है। इस अवधि में आईं शिकायतों के निराकरण के बाद ही मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन होता है। काँग्रेस नेता श्री राहुल गाँधी के हंगामेदार आरोपों से पहले किसी प्रदेश में काँग्रेस के किसी नेता ने कोई शिकायत प्रस्तुत नहीं की।

धुँध फैलाने का सुनियोजित कुचक्र : आरोपों का झूठ भी सामने आया

काँग्रेस की राजनीति अपने वोट और जीत केलिये होती है। वह अपनी सुविधा केलिये मुद्दे भी बदल लेती है। काँग्रेस द्वारा मुद्दे बदलने की घटनाओं से इतिहास भरा है। फिर भी दो ऐसे मुद्दे हैं जो आज के राजनैतिक आकाश में धुँध की भाँति फैले हैं। इनमें जातीय आधारित जन गणना और दूसरा ईवीएम द्वारा मतदान है। काँग्रेस का कभी नारा था- “जात और न पांत पर, मोहर लगेगी हाथ पर”। लेकिन अब जातिवाद की राजनीति उसकी प्राथमिकता पर है। दूसरा ईवीएम द्वारा मतदान। 1989 के चुनाव परिणाम के बाद स्वर्गीय राजीव गाँधी “वैलेट पेपर” के बजाय ईवीएम पर मतदान कराने की माँग उठाई थी। लेकिन अब श्री राहुल गाँधी और पूरी काँग्रेस ईवीएम मशीन को निशाना बना रही है। काँग्रेस अपनी लगातार चुनावी हार से कोई सीख नहीं ले रही। मतदाता में प्रभाव बढ़ाने केलिये कोई सकारात्मक मुद्दा नहीं उठा रही। वह भ्रामक मुद्दे उछालकर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। श्री राहुल गाँधी ने मीडिया के सामने एक मनोवैज्ञानिक योजना से काम किया था। वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। स्वाभाविक रूप से मीडिया के कैमरे उनकी ओर होते हैं। उन्होंने पहले भूमिका बनाई और प्रचारित किया वे “बम फोड़ने वाले हैं। बम फोड़ने की बात से पूरे देश की जिज्ञासा जागी। फिर कम्प्यूटर के माध्यम से एक “प्रजेंटेशन” रखा। इस प्रजेंटेशन को मीडिया के माध्यम से पूरे देश ने देखा । उन्होंने अपने प्रजेंटेशन में पांच प्रमुख आरोप लगाये। श्री राहुल गांधी ने कर्नाटक के एक विधानसभा महादेवापुरा का उल्लेख किया और आरोप लगाया कि यहां पर 1,00,250 वोटों की चोरी की गई है। उन्होंने फर्जी वोटर जोड़ने के पांच तरीके बताये। 1-11,965 डुप्लीकेट वोटर बनाए गए। 2- 40,009 मतदाताओं के पते फर्जी हैं। 3- 10,452 वोटर बड़ी संख्या में एक ही पते पर रजिस्टर हैं। 4- 4,132 वोटर बिना फोटो या अवैध फोटो के साथ जोड़े गए। 5- 33,692 नए वोटर फॉर्म-6 का गलत तरीके से जोड़े गए।

अपनी बात के समर्थन में उन्होंने दो महिलाओं के नाम लिये। एक सकुन रानी का राहुल गाँधी का आरोप था कि इस महिला दो बार मतदान किया। दूसरी महिला मन्टी देवी। इनकी आयु 125 साल लिखी है। राहुल ने एक मकान नम्बर बताया जिस पर साठ मतदाताओं के नाम अंकित हैं। उन्होने कुछ पते ऐसे दिखाये जिनपर मकान नम्बर शून्य लिखा था। श्री राहुल गाँधी के आरोपों के आधार पर मीडिया के कैमरे वहाँ पहुँच गये। सकुन रानी ने मीडिया को राहुल जी के आरोप झूठे बताये और कहा कि उन्होने कोई दो बार मतदान नहीं किया। एक बार ही मतदान किया था। उसी प्रकार मन्टी देवी की जन्मतिथि वर्ष 1990 है लेकिन उनकी लिखावट कुछ ऐसी थी जिससे कम्प्यूटर ने 1900 अंकित कर लिया। जिस पते पर साठ मतदाता अंकित किये गये थे। वह मकान मालिक काँग्रेस समर्थक निकला। तीसरा मकान नम्बर का शून्य होना। भारत गाँवों का देश हैं। यहाँ गांव में लाखों ऐसे घर हैं जिनका कोई नम्बर नहीं होता। कम्प्यूटर उन्हें शून्य ही लिख देता है। वोट चोरी के श्री राहुल गाँधी ने जो पाँच विन्दु उछाले थे वे उसी दिन शाम ढलते ढलते ही भ्रामक प्रमाणित हो गये थे। फिर भी काँग्रेस अपनी बात पर अड़ी रही।

चुनाव आयोग ने सभी भ्रामक आरोपों को भ्रामक बताया

भारत के चुनाव आयोग ने राहुल गांधी द्वारा जारी मतदाता सूची को भ्रामक बताया। चुनाव आयोग ने ‘निराधार’ और ‘गैर-जिम्मेदाराना’ बताया। आयोग ने यह भी कहा कि श्री राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से कभी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक एक्स सोशल मीडिया पर कांग्रेस की पोस्ट को साझा करते हुए लिखा, यह बयान पूरी तरह भ्रामक है। अगर राहुल गांधी को लगता है कि उनकी तरफ से साझा की जा रही सूची सही है तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्हें बिना देरी कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को जवाब भेजना चाहिए। आयोग ने कहा कि श्री राहुल गाँधी अपने द्वारा उठाए गए मुद्दों पर हस्ताक्षरित शपथ पत्र दें अथवा देश से माफी मांगे।

काँग्रेस समर्थक भी सहमत नहीं हुये राहुल गाँधी के आरोप से

श्री राहुल गाँधी द्वारा वोट चोरी के आरोपों की सच्चाई तो शाम तक सामने आ ही गई थी। उनके आरोपों से अनेक काँग्रेस जन और भाजपा एवं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आलोचक भी सहमत नहीं हुये। इनमें सबसे पहला नाम काँग्रेस की कर्नाटक सरकार में सहकारिता मंत्री के एन राजन्ना का है। उन्होंने महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में “वोट चोरी” के लिए अपनी ही पार्टी को दोषी माना और कहा कि ये “अनियमितताएं हमारी आंखों के सामने हुईं”। उन्होंने यह भी कहा कि “यह हमारे लिए शर्म की बात कि हम निगरानी नहीं कर सके”। दूसरा बड़ा नाम चर्चित पत्रकार श्री राजदीप सरदेसाई का है। उन्होंने कहा कि “यदि वोट चोरी होती तो भाजपा 240 पर नहीं रूकती 340 भी हो सकती थी” तीसरा नाम एआईएमआईएम के नेता औबेसुद्दीन उबैसी का है। उनका कहना है कि इससे काँग्रेस को नुकसान होगा।

काँग्रेस अभी रुकेगी नहीं इस मुद्दे को आगे भी बढ़ा सकती है

श्री राहुल गाँधी के आरोपों का चुनाव आयोग की ओर से भी खंडन आ गया और मीडिया ने सच्चाई को भी सामने ला दिया है। इन दोनों बातों से संतोष तो किया जा सकता है लेकिन यह मुद्दा अभी समाप्त नहीं हुआ है। इस बात की संभावना प्रबल है कि काँग्रेस इसे आगे बढ़ायेगी। धुंध की उस राजनीति का एक और सिद्धांत है “एक झूठ को सौ बार बोलो तो लोग सच समझने लगते हैं”। काँग्रेस इस नीति पर चलकर इस मुद्दे और आगे बढ़ा सकती है। इसे दो बातों से समझा जा सकता है। सबसे पहला तो यही है कि कर्नाटक सरकार के मंत्री राजन्ना सच्चाई सामने लाये तो उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त किया गया। मुख्यमंत्री त्यागपत्र लेना चाहते थे लेकिन काँग्रेस महासचिव वेणुगोपाल ने मुख्यमंत्री सीतारमैया से बात की और बर्खास्त करने का निर्देश दिया। इस निर्णय से काँग्रेस में अब असहमति का स्वर नहीं उठेगा अपितु इस आरोप को और तेजी से आगे बढ़ाने केलिये काँग्रेस जन आगे आयेंगे। कर्नाटक के मंत्री को बर्खास्त करने के बाद एक समाचार बनारस से आया। बनारस में काँग्रेसजनों ने अपने पराजित प्रत्याशी अजय राज के सम्मान में जुलूस निकाला। मालाएँ पहनाई और मोदीजी की जीत का आधार वोट चोरी बताया। अजय राज केवल अपने स्वागत तक ही नहीं रूके। उन्होने बनारस के राम जानकी मठ के पते पर अंकित मतदाताओं की सूची जारी की। इस सूची में साठ से अधिक मतदाताओं के नाम अंकित हैं और पिता के नाम के स्थान पर एक ही नाम “रामकमल दास” लिखा है। अजयराज ने इसे वोट चोरी का प्रमाण बताया। वस्तुतः राम जानकी मठ के महंत रामकमल दास जी हैं और मतदाता सूची में जितने नाम हैं वे सब महंत जी के शिष्य हैं और इसी मठ में रहते हैं। संन्यास के बाद पिता के स्थान पर पिता के रूप में गुरू का नाम लिखने की परंपरा हैं। इसे कानूनी मान्यता भी है। इस बात को सब जानते भी हैं फिर भी मीडिया में स्थान बनाने केलिये इसे उछाला गया। बनारस के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी कुछ क्षेत्रों अपने पराजित प्रत्याशियों का स्वागत किया।
सच्चाई कहने पर कर्नाटक में अपने मंत्री को बर्खास्त करना। बनारस में अपने पराजित प्रत्याशी का स्वागत और मठ के मतदाताओं को फर्जी बताना इस बात के संकेत हैं कि काँग्रेस अभी रुकेगी नहीं। वह इसे आगे बढ़ायेगी।

चुनाव आयोग के दुरुपयोग से पुराना नाता है काँग्रेस का

काँग्रेस नेता राहुल गाँधी चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” का आरोप लगा रहे हैं। उनके द्वारा अब तक उछाले गये आरोपों में कोई भी प्रमाणित नहीं हो सका लेकिन इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो काँग्रेस को ही चुनाव आयोग का दुरुपयोग करने के कटघरे में खड़ा करती हैं। श्री राहुल गाँधी द्वारा चुनाव आयोग पर की गई पत्रकार वार्ता का उत्तर केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी पत्रकार वार्ता में ही दिया। उन्होंने पहला उदाहरण बाबा साहब अंबेडकर के चुनाव हारने का दिया और बताया कि अंबेडकर जी केवल 14561 वोटों से चुनाव हारे जबकि इस चुनाव में 74,333 वोट निरस्त किए गए थे। इसके विरुद्ध आंबेडकर जी ने 18 पन्नों की याचिका भी लगाई। इतने वोटों का निरस्त होना सामान्य घटना नहीं है यह चुनाव आयुक्त की भूमिका पर एक बड़ा प्रश्न उपस्थित करती है। एक अन्य घटना 1971 में श्रीमती इंदिरा गाँधी के रायबरेली से शासकीय साधनों का दुरूपयोग करके लोकसभा चुनाव जीतने की है। न्यायालय ने आरोप प्रमाणित माने और चुनाव को निरस्त कर दिया था। एक घटना श्रीमती सोनिया गाँधी के मतदाता बनने की है। 1980 की मतदाता सूची में श्रीमती सोनिया गांधी का नाम दर्ज था। लेकिन वे तब तक भारत की नागरिक नहीं बनी थीं। सोनिया जी का राजीव जी से विवाह तो 1968 में हो गया था लेकिन विवाह के पन्द्रह वर्ष तक सोनिया जी इटली की नागरिक ही रहीं थीं। भारत की विधिवत नागरिक वे 1983 में बनीं।

मतदान की प्रक्रिया गोपनीय होती है। वोट अकेले में डाला जाता है लेकिन अब सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरे और वीडियों वायरल हो रहे हैं जिसमें 1991 मतदान बूथ पर श्री राजीव गाँधी, श्रीमती सोनिया गाँधी और सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना दिखाई दे रहें हैं। एक और किसी मतदान का फोटो वायरल हो रहा है जिसमें श्रीमती सोनिया गाँधी और श्री राहुल गाँधी साथ दिखाई दे रहे हैं। यह मतदान के गोपनीयता कानून का उल्लंघन है लेकिन चुनाव आयुक्त ने इसका संज्ञान नहीं लिया। जो चुनाव आयुक्त की अनुकूलता के बिना संभव नहीं है।
काँग्रेस शासन काल में कुछ आयुक्तों को जिस प्रकार पद प्रतिष्ठा दी गई उससे इस आरोप को बल मिलता है कि काँग्रेस शासन काल में चुनाव आयोग कि दुरुपयोग हुआ। जिन प्रमुख चुनाव आयुक्तों अतिरिक्त पद प्रतिष्ठा मिली उनमें भारत के आठवें चुनाव आयुक्त रहे राम कृष्ण त्रिवेदी भी हैं। उन्हें 1986 में गुजरात का राज्यपाल बनाया गया था। भारत की नौवीं चुनाव आयुक्त रमादेवी रहीं। बाद में इनको कर्नाटक राज्यपाल बनाया गया। रमा देवी के बाद टीएन शेषन चुनाव आयुक्त बने। शेषन अपने समय के सबसे चर्चित चुनाव आयुक्त रहे हैं। उन्हें चुनाव सुधारों के लिये जाना जाता है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस टिकिट पर गांधीनगर निर्वाचन क्षेत्र से 1999 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। भारत के ग्यारहवें मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एम एस गिल भी सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस में शामिल हो गए। वे राज्यसभा सदस्य बने। उन्हें 2008 में पहले युवा एवं खेल मंत्री और 2011 में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्री बनाया गया।
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