मनु स्मृति पर सबसे बड़ा खुलासा

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राकेश उपाध्याय

दिल्ली। मनु स्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? षड्यंत्रकारी अंग्रेजों के संपादन से, उनकी प्रेस से छपकर जो देश भर में बांटा गया, वही असली मनु स्मृति है, इसे कैसे सत्य मान लें? भारत में प्रेस प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इस ग्रंथ मनु स्मृति को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया?

आंख मूंद कर, दिमाग बंदकर सब कुछ मानने का समय अब जा चुका है। अब तो हर मुद्दे पर सवाल उठकर ही रहेगा। कुछ बड़े लोग कुछ ज्यादा बोलने के आदी हो गए हैं, उनसे निवेदन है कि अब सावधान हो जाएं, बिना शोध और अनुसंधान के कुछ। भी बोलने से बचें। क्योंकि बोलेंगे तो सवाल भी उठेंगे। हर विषय को सवालों की तीखी बौछार से गुजरना होगा। सवाल उठाने से रोकना गैर-अकादमिक है।

सबसे बड़ा सवाल है कि मनु स्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कामंदक, बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर नाम लेकर कटाक्ष क्यों नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय बौद्धिक मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? अंग्रेजों के पहले पूरे भारतीय भक्ति साहित्य या किसी अन्य साहित्य में बौद्ध-जैन आदि में मनु के विरूद्ध एक पंक्ति नहीं लिखी है तो क्यों नहीं लिखी है? क्या बुद्ध ने इसलिए मनु स्मृति के विरूद्ध बोलना उचित नहीं माना कि वह उन्हीं के कुल में जन्में थे? ध्यान रहे कि बुद्ध इक्ष्वाकु कुल के थे और इक्ष्वाकु कुल के मूल आदिपुरुष मनु महाराज ही बताए गए हैं।
तो इतना आसान नहीं है किसी निष्कर्ष पर पहुंचना।

सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया था। इसके पीछे बंगाल (ब्रिटिश इंडिया) के पहले गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स का सीधा निर्देश था।

कहते हैं कि इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ने एक बड़े प्रोजेक्ट के अंतर्गत देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। कहा गया कि न्याय को मानने वाली ब्रिटिश राज की कोर्ट हिंदू प्रजा को उसकी विधि से न्याय देगी, इसलिए हिंदुओं की विधि का संकलन, प्रकाशन आवश्यक है। मुस्लिम प्रजा को मुस्लिम विधि से न्याय दिया जाएगा। इसी घोषणा के द्वारा विभाजन के विषबीज को ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में रोप दिया।

इस समिति में पंडित तर्कवाचस्पति, तर्क पंचानन, न्याय पंचानन, बाणेश्वर विद्यालंकार (बर्दवान) आदि अनेक शाही संरक्षण में अथवा सरकारी धन पर आश्रित बंगाली पंडित सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। क्यों ऐसा किया गया? क्योंकि काशी गणराज्य में कभी भी कोई अछूत जाति इतिहास के किसी काल में नहीं रही। आज तो होने का कोई प्रश्न ही नहीं।

अंग्रेजी राज की पहली संपादन समिति विलियम जोन्स की अध्यक्षता में गठित की गई। इसमें जो 11 विद्वान थे, सभी बंगला भाषी, संस्कृत परंपरा से लिए गए। विधि के जानकार थे। सभी अंग्रेजों द्वारा उपकृत जमींदारों, राजपरिवारों की परंपरा से शिक्षा सेवा में जुटे थे, अनेक नए सरकारी स्कूलों में पद प्रतिष्ठित हो गए थे।

इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने इनके सामने एक समग्र विधि संग्रह और विशेष रूप से मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की।

इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकते हैं, काफी सामग्री लंदन स्थित ऑफिस से मिल सकती है, जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की कथित मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक जीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गईं। उनकी जांच परम आवश्यक है कि क्या वह सचमुच मनु स्मृति थी? वह प्रतियां विलियम जोन्स को सबसे पहले मिली तो कहां से मिली? किसने दी? उन प्रतियों का मिलान क्या दूसरी पांडुलिपियों से किया गया? केरल, कश्मीर, कोलकाता, काशी, जयपुर, पुणे, भुवनेश्वर, कांची, बदरीनाथ मठ, केदारनाथ, द्वारिका, उज्जैन से कौन कौन सी पांडुलिपियां मिलीं और क्या उनका भी मिलान किया गया? इन प्राचीन स्थानों से यदि मनु स्मृति की पांडुलिपि नहीं मिली तो क्यों नहीं मिली, और यदि मिली हैं तो वह कहां कहां सुरक्षित और संरक्षित हैं, आदि अनेक सवालों का उत्तर आज की नई पीढ़ी मांग रही है।

इस आरोप के संदर्भ में अनेक तथ्य प्रकाश में हैं कि इस संपादन प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था।

पहला प्रकाशन 1776 में ही हो गया। किंतु बाद में ध्यान में आया कि बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका। तो पुनः 1886 में, 1894 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया।
यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर रॉयल एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, ऑर्कियालॉजी या प्राचीन इतिहास पर काम कर रहे अंग्रेज विद्वानों को जारी कर दिया।

यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं।

इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है।

इसमें जितनी मिलावटें की गईं, इनके विरोधाभासी श्लोक मनु स्मृति में मिलते हैं तो यही कारण है कि मिलावट की गई, जिसमें विलियम जोन्स ने संपादन किया।

मुझे मेरे गुरुदेव ने बताया था कि पूरे भारतीय वांग्मय में मनु स्मृति के भेदभाव परक श्लोक अन्य नीतिग्रंथों में या प्रमुख नीतिकारों के ध्यान में क्यों नहीं आए?

आखिर मनु स्मृति के श्लोकों पर महात्मा बुद्ध का ध्यान क्यों नहीं गया? क्यों कौटिल्य के ग्रंथ में भेदभाव का मनु स्मृति आधारित उल्लेख उद्धृत नहीं है? क्यों नीति मयूख में या कामंदकीय नीतिसार में जो पांचवीं सदी का नीति ग्रंथ है, या उसके बाद के नीतिकार सोमदेव सूरि के ग्रंथ में, वीर मित्रोदय में, मानसोल्लास में मनु स्मृति के भेदभावपरक श्लोक का कोई उल्लेख नहीं है?

क्योंकि अनेक नीति ग्रंथ अंग्रेजों का हाथ नहीं लग सके। कौटिल्य अर्थशास्त्र का प्रकाशन तो गणपति शास्त्री और शाम शास्त्री ने 1904-05 में किया। अंग्रेज खोजते रह गए लेकिन कौटिल्य अर्थशास्त्र उन्हें नहीं मिला।
वो उसे लेकर उसमें मिलावट कर पाते, उसके पहले ही मैसूर के महाराज ने उसे छाप दिया। अंग्रेज को काटो तो खून नहीं। इसलिए तब के अंग्रेज विद्वानों ने इस कौटिल्य अर्थशास्त्र को सच मानने से इंकार किया। ये तो बाद में एक पांडुलिपि बाली से मिल गई, कुछ मूल बौद्ध पांडुलिपियां श्रीलंका से मिलीं जिसमें कौटिल्य का जिक्र था, और इनका मूल से मिलान हुआ तब पता चला कि कौटिल्य अर्थशास्त्र सत्य है।

आज इन मौलिक प्रश्नों का उत्तर खोजा जाना अनिवार्य है कि

1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है।

2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? क्यों पहली प्रति आउट ऑफ प्रिंट बताकर फिर से 1786, 1794 में मनु स्मृति का प्रकाशन किया गया?

3-और जिन पांडुलिपियों के आधार पर मनु स्मृति प्रकाशित की गई, वह पांडुलिपियां आखिर रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने क्यों जला दीं?

4-जिन पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि आज भी सुरक्षित हैं तो कहां हैं, और उन्हें क्योें कभी विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? केवल अंग्रेजों द्वारा संकलित प्रति ही क्यों देश भर में बांटी जाने लगी या वितरित कराई गई, फिर जलाने और उसे लेकर सरकारी संरक्षण में गुलामी के समय में बहस आदि का प्रबंध कराया जाने लगा।

जबकि देश जानता है कि परंपरा से किसी हिंदू घर में कभी मनु स्मृति रखने का ही विधान नहीं रहा।
3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर रॉयल सोसायटी के दफ्तर जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।

4-संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार Narendra Modi PMO India Gajendra Singh Shekhawat और आईसीएचआर-भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद और आईसीएसएसआर- भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद से मेरा विनम्र निवेदन है कि

-तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए।

-जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया, उन पांडुलिपियों का पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

-इस शोध आधारित अध्ययन के लिए वरिष्ठ विद्वानों की देख-रेख में समिति बनाकर इस कार्य के लिए सुदीर्घ प्रोजेक्ट स्वीकृत किए जाने चाहिए।

-शोध पूर्वक इनमें देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु स्मृति की हैं भी या नहीं है? या बनावटी और जाली, फर्जी पांडुलिपियों के जरिए भारत में बंटवारे की राजनीति को ही पुस्तक के रूप में प्रथम प्रकाशित किया गया।
आईसीएचआर और आईसीएसएसआर में बैठे हुए बड़े विद्वान प्रोफेसरों से मेरा आग्रह है कि यदि उन्हें कठिनाई है तो मैं स्वयं इस कार्य में समय देने को तैयार हूं। और भी लोग हो सकते हैं जिनके संपर्क में विद्वान प्रोफेसरों की बड़ी टोली रहती है। उनमें से भी नाम लिए जा सकते हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय महत्व का कार्य है। जो इस कार्य को बड़े पवित्र रूप से, बिना किसी पूर्वाग्रह के करने को तैयार हैं और सारी शोध प्रक्रिया को पारदर्शी ढंग से करना जानते हैं, उन्हें इस कार्य में शीघ्र लगाया जाना चाहिए।

मनु स्मृति की वह मूल पांडुलिपि खोजने का यही सही समय है। वह पांडुलिपि जो कम से कम किसी इंग्लिश विद्वान के हाथ न लगी हो और कम से कम 300-400 साल पुरानी हो, तभी दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है।

निवेदन है कि जब तक यह शोध कार्य समाप्त न हो जाए तब तक मनु के नाम से किसी भी पुस्तक को गलत तरीके से उद्धृत करने पर रोक लगाई जानी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं है तो जो पुस्तक अंग्रेजी राज में षड्यंत्रपूर्वक संपादित, प्रकाशित है, उसे मनु स्मृति का नाम देने की बजाए विलियम जोन्स द्वारा संपादित कथित मनु स्मृति ही कहा और लिखा जाना चाहिए।

मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी का निष्कर्ष था कि वर्तमान मनु स्मृति में बहुत से प्रक्षिप्त अंश संपादक विलियम जोन्स और वॉरेन हेस्टिंग्स के षडयंत्र का परिणाम है। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने अनेक पौराणिक ग्रंथ की पांडुलिपि जुटाकर उसमें गड़बड़ी पैदा की थी।

माया और नाम का तत्वज्ञान

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दिव्या तिवारी

दिल्ली । गुरु तेग बहादुर की वाणी माया से मुक्ति और ईश्वर के नाम सेजुड़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने त्याग, करुणा, निर्भीकता औरआत्म-बौथ का संदेश देकर मानवता, समानता और सत्य केमार्ग पर चलने का आह्वान किया। उनका उपदेश आज भीजन-जन का मार्गदर्शन करतागु रु तेग बहादुर की रचनाएं सरल, सशक्त और प्रभावशाली हैं, जो सीधे पाठक के हृदय से जडतीहैं। उन्होंने पांचवें गुरु अर्जनदेव द्वारा संकलित ‘आदिग्रंथ’ कासंपादन कर उसे पूरा किया। गुरु तेग बहादुर की रचनाएंमानवता और आत्मिक उच्चता का संदेश देती हैं. जिनमें ‘माया’ से उबरकर ‘नाम’ से जुडने की प्रेरणा मिलती है। उनकी वाणी मेंसंसार की मायावी प्रवृत्तियों – लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार- को’माया’ कहा गया है, जबकि परमात्मा से जुड़ने और सांसारिकबंधनों से मुक्त होने की भावना को ‘नाम’ के रूप में प्रस्तुतकिया गया है। वे व्याप्त मानवीय संकटों के बारे में समझाते हैंकि संसार की सुख-सुविधाओं और संबंधों का दास बनने सेव्यक्ति संकुचित एवं अधूरा हो जाता है। उनकी रचनाओं में यहसंदेश निहित है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य सांसारिकमोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर के नाम से जुड़कर आत्मिकशांति और पूर्णता प्राप्त करना है। उनकी वाणी में त्याग,साहस, धैर्य और सेवा जैसे गुणों का विशेष स्थान है, जो आज भी मानवजीवन के प्रेरणा स्रोत हैं।गुरु महाराज का साहित्य जीवन कोसार्थक बनाने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का एक प्रबलमाध्यम है। उनके काल में समाज अपने वृहत्तर जीवन-आदर्शोंके भूलकर कंचन और कामिनी की अराधना में ही डूबा हुआथा। व्यक्ति की ऐसी मानसिकता को चित्रित करते हुए उन्होंनेकहा-कहउ कहा अपनी अधमाई।उरझिओ कनक कामिनी केरस नह कीरति प्रेम गाई। जग झूठे कउ साचु जानि कै ता सिउरुच उपजाई ।।दीन बंध सिमरिओ नहीं कबहूं होतु जु संगिसहाई। मगन रहिओ माइआ मै निस दिनि छुटी न मन की काई॥ कहि नानक अब नाहि अनत गति बिनु हरि की सरनाई ।।गुरुमहाराज अपनी रचनाओं में माया के प्रपंच और उससे मुक्ति काप्रमाण देते हैं। वे बताते हैं कि माया के प्रपंच में फंसा हुआव्यक्ति सोचता है कि ‘मैं अपनी अधमता का वर्णन किसतरहकरूं। मैं सोने और स्त्री में ही उलझकर रह गया हूं, संसार कीझूठी चीजों को ही सच मान बैठा हूं, इसलिए उन्हीं में रुचि रहीहै। चूंकि रात-दिन माया में ही मग्न रहता हूं, इसलिए मन-अज्ञानकी काई दूर नहीं होती। मुझे चाहिए क्या? दीनबंधु का स्मरणकरूं। बिना उसकी शरण में गए मेरी गति नहीं है।’गुरु महाराजहमें अपने मोह-बंधन से ऊपर उठकर ईश्वर-नाम के व्यापकधरातल पर पहुंचने की प्रेरणा देते हैं। उनका कहना है किअसली ईश्वर बाहर नहीं, हमारे भीतर है, जैसे पुष्प में सुगंधऔर दर्पण में छाया होती है। इसलिए पहले अपने आप कोपहचानना आवश्यक है, क्योंकि अपने आप को बिना पहचानेभ्रम दूर नहीं हो सकता। यह शिक्षा उनकी सभी रचनाओं कासार है जो मनुष्य को आंतरिक आत्म-बोध और मोक्ष के मार्गपर ले जाती है।उन्होंने जिस ईश्वर के गुणों की ओर संकेतकिया है, वे हैं सहनशीलता, दया, क्षमा, और विनम्रता। वे कहतेथे कि एक सज्जन व्यक्ति वह होता है, जो जाने या अनजाने मेंकिसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाता। उनका मानना थाकि वैसे भी छोटे-छोटे कार्यों से ही महान कार्य बनते हैं तथा हारऔर जीत आपकी सोच पर निर्भर करती है। उनके अनुसार, वहईश्वर जो हमसे जुड़ा है, वह हमारे अंदर है और हमें उसे पहचानकर, अपने मन में दया, प्रेम और करुणा का भाव पालनाचाहिए।पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ। कहु नानकतिह जानिए सदा बसतु तुम साथ।अर्थात् ईश्वर पतितों काउद्धारक है, भय का नाश करने वाला और अनाथों का नाथ है।वह सदा हमारे साथ रहता है।उस समय मुगल शासक हिंदुओंका जबरन कन्वर्जन कर रहे थे। लोग डरे-सहमे और स्वयं कोअनाथ महसूस कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने कहा, ईश्वर का स्मरणभय मुक्त करता है।

गुरु नानक ने ‘जपुजी’ में में ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुणको ‘निरभउ'(निर्भय) बताया था। इसलिए उसका साथ किभी भीव्यक्ति को निर्भय बनाता है। गुरु महाराज ने कहा-भै नासनदुरमति हरन कलि मैं हरि को नाम। निस दिन जो नानक भजैसफल होहि तिह काम ।।अर्थात् कलियुग में हरि का नाम भयका नाश करता है, दुरमतिको नष्ट करता है। जो इसे याद रखताहै, उसके सभी काम सफल हो जाते हैं। साथ ही, वह कहतेहैं-मद माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै। करि परपंचुजगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ।।अर्थात् जो व्यक्ति माया केमोह में अंधा होकर पागल हो गया है। वह परमात्मा की स्तुतिनहीं करता। ऐसा व्यक्ति केवल छल-कप्ट करके दुनिया कोधोखा देता है और अपने स्वार्थ के लिए अनैतिक कार्य करता है।अपनी रचनाओं में गुरु महाराज उस समाज की आलोचना करतेहैं, जहां व्यक्ति अपनी सुख-साधना में लिप्त होकर उच्चतरदायित्वों को भूल चुका था। वे बताते हैं कि माया के जाल मेंफंसा मन वेद-पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथ तो सुनता था, पर जीवनमें उनका पालन नहीं करता। यानीवेद-पुरान साध मग सुनिकरि। निमष न हरि गुन गावै ।। दुरलभ देह पाई मानस कीबिरथा जनमु सिरावै ।। वे अपने शिष्य को चेतावनी देते हैं किऐसे मनुष्य दुर्लभ मानवजातिगए हैं। वे समाज में व्याप्तअंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और के लिए प्राप्त दुर्लभता कीतरह होते हैं, जो अपने सत्य मार्ग से भटक धार्मिक कुप्रथाओंकी भी कटु आलोचना करते हैं। उनके अनु सच्चे ईश्वर के साथआत्मीयता स्थापित करनी चाहिए। उनका सत्य की ओर लौटनेके लिए मनुष्य को अपनी माया से मुक्त आज भी समानता, न्याय और आध्यात्मिक जागृति का आधार गुरु तेग बहादुर नेसंसार की नश्वरता पर विशेष बल दिया।उनका उद्देश्य यहसमझाना था कि उच्च आदर्शों के बिना सांसारिक सुख-भोगव्यर्थ है। उन्होंने सत्ता के अहंकार में डूबे शासकों को याददिलाया कि राम और रावण जैसे शक्तिशाली भी इस संसार मेंनहीं रहे। यह संसार और इसकी उपलब्धियां स्वप्नवत अस्थिरहैं और पृथ्वी का राज रेत की दीवार के समान है। अतःअभिमान निरर्थक है। दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो सांसारिक मोहऔर लालसाओं में इतने डूबे हैं कि जीवन बचाने और इच्छाएंप्राप्त करने के लिए अपमान सहते हैं, अपना स्वाभिमान भूलजाते हैं। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान जगानेके लिए उन्हें छोटे मोहों से मुक्त करके यह समझाना आवश्यकहै कि यह भौतिक शरीर मिथ्या है, जबकि आत्मा ही वास्तविकसत्य है। सिख गुरु संसार त्यागने का उपदेश नहीं देते। वेसांसारिक दायित्वों का पालन करते हुए जीवन जीने का आग्रहकरते हैं।

उनके अनुसार, संसार मिथ्या तब होता है, जब व्यक्तिमाया में लिप्त होकर अपने व्यापक कर्तव्यों को भूल जाता है।उनके पितामह गुरु अर्जन देव ने उद्यम करने, धन कमाने औरईश्वर से जुड़ने का संदेश दिया, जिसमें कर्मठता और अध्यात्मका समन्वय है।गुरु तेग बहादुर का उद्देश्य व्यक्ति को उसमानसिक स्तर पर लाना था, जहां वह अपने लक्ष्य के लिएनिःसंकोच सर्वोच्च बलिदान कर सके और हंसते हुए मृत्यु काभी वरण कर सके। यह स्थिति तब आती है जब व्यक्तिदुख-सुख, भय, लोभ, मोह, मान-अपमान और क्रोध जैसेसांसारिक द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है, सोने को मिट्टी के समानमानता है और उसके हृदय में माया की जगह ब्रह्म का वास होताहै। ऐसा साधक मृत्यु से नहीं डरता, क्योंकि वह जानता है कियह अटल है। गुरु तेग बहादुर जीवन की क्षणभंगुरता कोस्वीकार करते हुए लोगों को सत्य और उच्च आदर्शों की ओरउन्मुख होने का आह्वान करते थे। वे बार-बार ईश्वरीय शक्ति, जो व्यक्ति के अपने अंदर की ही शक्ति है, पर भरोसा रखने, उसे उत्पन्न करने का आग्रह करते थे। जीवन में एक स्थिति ऐसीआती है, जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका बल छूटगया है, उस पर अनेक बंधन पड़ गए हैं और उसके सम्मुख कोईउपाय नहीं रह गया है। अपने एक दोहे में वे इसी तरह कीमनःस्थिति को उभारते हैं-बलु छुटकिउ बंधन परें कछु न होतउपाइ।कहु नानक अब ओट हरि गजि जिउ होहु सहाइ ।।फिरइस मनःस्थिति का समाधान करते हुए कहते हैं-बल होआ बंधनछुटे सम किछु होत उपाइ।नानक सब किछु तुमरै हाथ मै तुम हीहोत सहाइ ।।एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब व्यक्ति कोसभी संगी-साथी बेसहारा छोड़कर चले जाते हैं-संग सखा सभतजि गए कोऊ न निबहिओ साथ।कहु नानक इह बिपत मै टेकएक रघुनाथ ।। ऐसी स्थिति में वे साधक को आश्वासन देते हुएकहते हैं-नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंद । कहुनानक इह जगत में किन जपिओ गुरमंत ।।गुरु महाराज काउपदेश था कि निर्भय पद प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग मन में’माया’ के स्थान पर ‘राम नाम’ को धारण करना है, जिससेसंकट मिटते हैं और ईश्वर का दर्शन होता है। ऐसा निर्भयसाधक होता है। इस प्रकार, गुरु तेग बहादुर के जीवन आदर्शोंने समाज को न किसी को भयभीत करता है और न स्वयंभयभीत सामाजिकता और ईश्वरीय सत्ता का समन्वयसिखाकर नई दिशा दी।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ, वैश्विक व्यापार चुनौतियां और भारत की रणनीति

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ग्वालियर। अमेरिका में 20 जनवरी 2025 को श्री डॉनल्ड ट्रम्प ने 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। श्री ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से ही पूरी दुनिया में, विशेष रूप आर्थिक क्षेत्र में भारी उथल पुथल दिखाई दी है। ट्रम्प ने “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” – अमेरिका को पुनः महान बनायें – के नारे के साथ यह राष्ट्रपति चुनाव जीता था। अतः उन्होंने अमेरिका को एक बार पुनः विश्व के विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करने का बीड़ा उठाया है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर टैरिफ लगाने का निर्णय लेते हुए, इस निर्णय को शीघ ही लागू भी कर दिया। उनका सोचना था कि उनके इस निर्णय से विभिन्न उत्पादों के निर्यातक अमेरिका में इन उत्पादों को निर्यात करने के प्रति निरुत्साहित होकर इन उत्पादों का उत्पादन अमेरिका में ही प्रारम्भ कर देंगे। इस कार्य को यदि धीमे धीमे एवं संरचित रूप से किया जाता तो सम्भव है कि पूरे विश्व में अफरा तफरी जैसा माहौल नहीं बनता। परंतु, ट्रम्प ने कुछ देशों (चीन, आदि) से विभिन्न वस्तुओं के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी एवं अन्य देशों को भी लगातार इस प्रकार की धमकी देना प्रारम्भ कर दिया।

ट्रम्प ने भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर भी 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया एवं 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ यह कहते हुए लगाया कि भारत, रूस से कच्चे तेल का आयात करता है एवं इसे प्रसंस्कृत करने के उपरांत यूरोपीय देशों को पेट्रोल एवं डीजल के रूप में निर्यात करता है। इस प्रक्रिया में ट्रम्प ने यह निष्कर्ष निकाला भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल को खरीदने से रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले को बल मिलता है और भारत इस युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंडिंग कर रहा है। इस प्रकार, भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर दिनांक 27 अगस्त 2025 से 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया गया है। इससे भारत के पूंजी (शेयर) बाजार में हाहाकर मच गया एवं विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारत से अपने निवेश को निकाल रहे हैं।

श्री ट्रम्प अमेरिका में होने वाले विभिन्न वस्तुओं के आयात पर लगाए गए टैरिफ पर ही नहीं रुके बल्कि अपनी साम्राज्यवादी सोच को पुनः लागू करने के उद्देश्य को भी स्पष्ट रूप से झलका दिया। प्रभुतासम्पन्न देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका में लाया गया एवं उन पर अमेरिका में मुकदमा चलाया गया। दरअसल, अमरीका की नजर वेनेजुएला के कच्चे तेल के अपार भंडार पर है। जिस पर अमेरिका अपना कब्जा स्थापित करते हुए इसके उपयोग पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। साथ ही, डेनमार्क के नियंत्रण में एक द्वीप, ग्रीनलैंड पर अमेरिका अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता है। इसी प्रकार की धमकियां, मेक्सिको, क्यूबा, ईरान आदि देशों को भी दी गई हैं।

श्री ट्रम्प के उक्त प्रकार के निर्णयों के चलते अब तो वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के बीच आपसी सम्बंधो पर प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत भी अछूता नहीं रहा है एवं हाल ही के समय में भारत के अमेरिका के साथ सम्बन्धों में कुछ खटास आई है। अन्यथा, कुछ समय पूर्व तक भारत एवं अमेरिका एक दूसरे के रणनीतिक साझेदार माने जाते रहे हैं। विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा साझीदार रहा है। भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात के मामले में भी अमेरिका प्रथम स्थान पर हैं। श्री ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लागू किए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के उपरांत भारत का विदेश व्यापार कुछ हद्द तक विपरीत रूप से प्रभावित हुआ है। परंतु, भारत ने इस समस्या का हल निकालने की रणनीति पर तुरंत विचार करना प्रारम्भ किया एवं कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए। ताकि, विशेष रूप अमेरिका को होने वाले वस्त्र एवं परिधान, जेम्स एवं ज्वेलरी, समुद्रीय पदार्थ, खिलौना उद्योग एवं चमड़ा उद्योग जैसे श्रम आधारित उद्योगों पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को तुरंत ही रोका जा सके अथवा कम किया जा सके। अन्यथा, की स्थिति में भारत में बेरोजगारी की समस्या एक ज्वलंत समस्या के रूप खड़ी हो सकती थी। भारत ने उक्त उत्पादों के निर्यात हेतु रूस, चीन, जापान, आस्ट्रेलिया एवं यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के रूप में नए बाजार तलाशे एवं इन देशों को उक्त उत्पादों का निर्यात प्रारम्भ किया। वर्ष 2025 में भारत ने विदेशी व्यापार परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों पर गहन वार्ताओं और रणनीतिक अद्यतनों को अंतिम रूप देने का प्रयास किया है। वर्ष के अंत में, भारत ने यूनाइटेड किगडम, ओमान एवं न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए। इसके साथ ही, अफ्रीकी देशों एवं लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भी प्रारम्भिक वार्ताओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि नवम्बर एवं दिसम्बर 2025 माह में भारत से विभिन्न वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि दर को बनाए रखने में सफलता मिली है। सितम्बर एवं अक्टोबर 2025 माह में विशेष रूप से अमेरिका को भारत से होने वाले वस्तुओं के निर्यात पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ा था। 27 जनवरी 2026 को तो भारत ने यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देकर इतिहास ही बना डाला है। इस समझौते को “मदर आफ ऑल डील्स” की संज्ञा दी जा रही है। यह मुक्त व्यापार समझौता 18 वर्षों के उपरांत सम्भव हो सका है। अब तो कनाडा के राष्ट्रपति भी मार्च 2026 माह में भारत आने वाले हैं एवं कुछ क्षेत्रों में मुक्त व्यापार समझौते के अंतिम रूप दिए जाने की प्रबल सम्भावना है।

भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौतों का विश्व के अन्य देशों को सकारात्मक संदेश गया है। भारत वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न कर रहा है। इससे, समझौता करने वाले देशों के नागरिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होने की सम्भावनाएं प्रबल हो रही हैं क्योंकि इन देशों में आर्थिक प्रगति के तेज होने के चलते इन देशों में खुशहाली आने की सम्भावनाएं बन रही हैं। इस दृष्टि से विभिन्न देशों का भारत के प्रति दृष्टिकोण हाल ही के समय में बदला है एवं वे अब भारत की ओर आशाभारी नजरों से देख रहे हैं। भारत एक युवा देश है एवं विभिन्न उत्पादों के लिए भारत एक विशाल बाजार के रूप में विश्व के सामने उपलब्ध है। विशेष रूप से इस धरा के दक्षिणी भाग के देश तो अब भारत के वैश्विक स्तर पर इन देशों का नेतृत्व करने के लिए श्रद्धा के भाव से उम्मीद भारी नजरों से देख रहे हैं।

उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भारत के सामने भी कुछ समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। जैसे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में डालर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत का लगातार गिरते जाना। एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की क़ीमत 92 रुपए के स्तर को भी पार कर गई है एवं वर्ष 2025 में भारतीय रुपए का लगभग 5 से 6 प्रतिशत के बीच अवमूल्यन हुआ है। दरअसल, यह समस्या, विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय पूंजी (शेयर) बाजार से लगातार अपने निवेश को निकालने के चलते खड़ी हुई है। इससे अमेरिकी डॉलर का भारत से बाहर जाने का सिलसिला बढ़ गया है। इस समस्या के हल हेतु भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मात्रा को बढ़ाने का प्रयास लगातार कर रहा है। साथ ही, भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात को भी गति देने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि भारत में अमेरिकी डॉलर के आने की मात्रा में वृद्धि हो। यदि भारत को इन प्रयासों में सफलता मिलती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए पर दबाव कुछ कम होगा।

श्री ट्रम्प द्वारा हाल ही के समय में लिए गए निर्णयों के चलते वैश्विक स्तर पर प्रारम्भ हुई उथल पुथल को कम करने के लिए आज विश्व के कई देश भारत की ओर ही देख रहे हैं क्योंकि भारत अपने आप को विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाकर इस तरह की समस्याओं का हल निकालने का प्रयास कर रहा है एवं इस कार्य में भारत को कुछ सफलता प्राप्त होती हुई भी दिखाई दे रही है। भारत के पास युवा शक्ति की बेजोड़ उपलब्धता है, विभिन्न क्षेत्रों में इनके कौशल को विकसित कर, भारत आज पूरे विश्व को श्रमबल उपलब्ध करा सकने की क्षमता रखता है और भारतीय सनातन संस्कृति को “वसुधैव कुटुम्बकम” के भाव के साथ, पूरे विश्व में फैला सकता है ताकि विभिन्न देशों में हो रहे संघर्षों को कम अथवा समाप्त किया जा सके।

माधव सृष्टि समालखा में होगी संघ की सबसे बड़ी बैठक

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• 13,14,15 मार्च से देशभर के 1487 प्रतिनिधि जुटेंगे संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में
• शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम, सामाजिक चुनौतियों और संगठन विस्तार पर होगा मंथन
• शताब्दी वर्ष में अभी तक कुछ प्रांतों में गृह संपर्क अभियान के माध्यम से 10 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंच
• बैठक में संत शिरोमणि रविदास की 650वीं जयंती वर्ष के कार्यक्रमों पर भी चर्चा होगी
समालखा (पानीपत)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी बैठक अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 13 से 15 मार्च तक समालखा स्थित माधव सृष्टि परिसर में आयोजित होगी। तीन दिन चलने वाली इस बैठक में देशभर से संघ और संघ प्रेरित संगठनों के कुल 1487 प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह जानकारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने माधव सृष्टि परिसर में आयोजित प्रेस वार्ता में पत्रकारों को दी। इस दौरान उनके साथ मंच पर उत्तर क्षेत्र के संघचालक पवन जिंदल भी उपस्थित रहे। आंबेकर ने बताया कि बैठक का शुभारंभ 13मार्च की सुबह 9 बजे सरसंघचालक डा.मोहनराव भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले की उपस्थिति की में होगा। इसमें संघ के अखिल भारतीय पदाधिकारी, क्षेत्र-प्रांत संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक तथा संघ प्रेरित 32संगठनों के शीर्ष पदाधिकारी भी भाग लेंगे। आंबेकर ने बताया कि इस समय देशभर में संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम चल रहे हैं। बैठक में इन कार्यक्रमों की समीक्षा और आगामी योजनाओं पर चर्चा होगी। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष में अब तक देशभर में 10 करोड़ से अधिक घरों तक गृह संपर्क अभियान के माध्यम से पहुंच बनाई जा चुकी है। अगले दिनों में शेष प्रांतों में यह अभियान आगे जारी रहेगा। बैठक में संत शिरोमणि रविदास की 650वीं जयंती वर्ष के कार्यक्रमों पर भी चर्चा होगी। यह कार्यक्रम 1 फरवरी से अगले वर्ष 20 फरवरी तक पूरे देश में चलेगा और समाज में समरसता के संदेश के साथ आयोजित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि 15 मार्च को बैठक के अंतिम दिन सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले प्रेसवार्ता कर बैठक में लिए गए निर्णयों और प्रस्तावों की जानकारी देंगे तथा पत्रकारों के सवालों के जवाब भी देंगे। इस दौरान संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी और उत्तर क्षेत्र प्रचार प्रमुख अनिल कुमार उपस्थित रहे।

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समसामयिक सामाजिक मुद्दों पर भी होगा मंथन

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बैठक में देशभर से आए कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों के सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव साझा करेंगे। इन अनुभवों के आधार पर वर्तमान सामाजिक चुनौतियों और परिस्थितियों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

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32 संगठनों के शीर्ष पदाधिकारी मौजूद रहेंगे

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आंबेकर ने बताया कि बैठक में संघ प्रेरित संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी विशेष आमंत्रित के रूप में शामिल होंगे। इनमें प्रमुख रूप से विश्व हिंदू परिषद से एडवोकेट आलोक कुमार व मिलिंद परांडे, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से डॉ रघुराज किशोर व आशीष चौहान, सेविका समिति से सुश्री शांता अक्का व सुश्री ए सीता, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ आदि के राष्ट्रीय पदाधिकारी शामिल हैं।

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संघ का विस्तार, एक साल में 5500 से ज्यादा शुरु नई शाखाएं

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आंबेकर ने बताया कि बैठक में संगठन विस्तार पर भी चर्चा होगी। पिछले एक वर्ष में देशभर में 5500 से अधिक नई शाखाएं शुरू होने की जानकारी प्राप्त हुई है। इसके अलावा संघ से जुड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लगातार रुचि बढ़ रही है। हर साल लगभग 1.25 लाख लोग ज्वायन आरएसएस के माध्यम से जुड़ने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं।

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प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन

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आंबेकर ने बताया कि शताब्दी वर्ष के दौरान संघ के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी बड़े पैमाने पर होंगे। इस वर्ष देशभर में 97 प्रशिक्षण वर्ग आयोजित किए जाएंगे।

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