भारतीय क्रिकेट का नया युग – श्रेयस और वैभव बनेंगे पहचान

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दिल्ली । वर्ष- 2026 भारतीय क्रिकेट में बड़े बदलाव के लिये याद किया जाएगा । आईपीएल -2026 की समाप्ति के बाद भारतीय क्रिकेट टीम में कप्तान से लेकर खिलाड़ियों के चयन तक में व्यापक बदलाव हो गया है। मात्र 15 वर्ष की आयु में ही अपनी बल्लेबाजी से सभी को रोमांचित कर देने वाले आक्रामक युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को को टीम में जगह मिल गई है। वैभव को एशियन गैम्स के साथ आयरलैंड व इंग्लैंड के विरुद्ध होने वाली टी -20 श्रृंखला के लिए चुना गया है। वैभव ने मात्र 15 वर्ष ओर 71 दिन की आयु में राष्ट्रीय टीम में अपना स्थान बनाया है। यदि वैभव को आगामी श्रृंखलाओं में खेलने का अवार मिलता है तो वह सचिन तेंदुलकर का 37 वर्ष पुराना रिकार्ड तोड़ देंगे । सचिन ने 16 वर्ष 205 दिन में पाकिस्तान के विरुद्ध 1989 में टीम में पदार्पण किया था। वैभव ने आईपीएल में कई शानदार व यादगार पारियां खेली जिस कारण टीम प्रबंधन उन्हें भविष्य के खिलाड़ी के रूप में देख रहा है। वैभव ने 12 वर्ष की उम्र से ही रणजी ट्राफी में अपना करिश्मा दिखाना आरम्भ कर दिया था । 27 मार्च 2011 को बिहार के समस्तीपुर के ताजपुर में जन्मे वैभव का बल्ला बचपन से ही आग उगलता था। पटना एअरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आशीर्वाद लेने के बाद तो वैभव सोशल मीडिया की भी चर्चा का विषय बन गए थे।

पार्थिव पटेल, हरभजन सिंह, मनिंदर सिंह और विजय मेहरा जैसे युवा खिलाड़ी भी कम आयु में ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण कर नाम और यश कमा चुके हैं । एक समय वैभव की तरह खेलने वाले सलामी बल्लेबाज पृथ्वी शॉ का भी नाम हुआ करता था, उन्हें भी टीम प्रबंधन ने कई अवसर दिए थे किंतु आज वह खेल परिदृश्य से ही बाहर हो चुके हैं। अब वैभव का सामना वास्तविक क्रिकेट से होने जा रहा है, साथ ही विदेशी धरती के मैदान भी अलग होते हैं। अब वैभव को वैश्विक क्रिकेट में अपने आपको साबित करना है।

अपने पहले ही आईपीएल- 2026 में राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलते हुए वैभव ने 16 मैचों में 775 रन बनाकर आरेंज कप जीता था और पूरे सीजन में 72 छक्के जड़कर वेस्टइंडीज के क्रिस गेल के एक सीजन में सबसे अधिक छक्कों का रिकार्ड भी तोड़ दिया था । अब देखना है क्या वो ऐसे ही करिश्मे विदेश की धरती पर भी करेंगे ? कुछ लोग वैभव की तुलना अभी से ही सचिन और सहवाग से करने लगे हैं जो अनुचित है और एक उभरती प्रतिभा के ऊपर मानसिक दबाव डालने जैसा है। अभी तो वैभव के कैरियर की शुरुआत भर हो रही है अतःअभी केवल सकारात्मक भाव व सोच के साथ वैभव के खेल का आनंद लेना चाहिए और उसे पूरा अवसर देना चाहिए।

वर्ष- 2026 की आगामी श्रृखलाओं के लिए टीम को श्रेयस अय्यर के रूप में नया कप्तान भी मिल गया है जबकि युवा बल्लेबाज तिलक वर्मा को उपकप्तान बनाया गया है। ऐसा करके भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने सभी खिलाड़ियों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भारतीय टीम मे अब केवल उन्हीं खिलाड़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा जिनका प्रदर्शन लगातार उत्कृष्ट रहेगा।

श्रेयस की दमदार वापसी – दिसंबर -2023 से विभिन्न कारणों से बाहर चल रहे श्रेयस की कप्तान के रूप में वापसी किसी आश्चर्य से कम नहीं है।आईपीएल में उनकी नेतृत्व क्षमता व लगातार अच्छे प्रदर्शन के चलते टीम प्रबंधन उनसे प्रभवित हुए बिना नहीं रह सका और अनेक दावेदारों को पछाड़ते हुए श्रेयस कप्तान के रूप में पहली पसंद बनकर उभरे। श्रेयस ने 2024 में कोलकाता नाइट राइडर्स को आईपीएल का चैपिंयन बनाया और उसके बाद पंजाब किंग्स को फाइनल की राह दिखाई थी। श्रेयस ने लगातार दो बार आईपीएल के सफल सत्र खेले और अपने बल्ले से दमदार प्रदर्शन किया।
धैर्य व नेतृत्व का नया चेहरा बकर उभरे श्रेयस ने 914 दिन बाद टीम में वापसी की वह भी कप्तान के रूप में। सरपंच जी नाम से लोकप्रिय श्रेयस की टीम में वापसी प्रेरणादायक है क्योंकि आमतौर पर क्रिकेट अब एक ऐसा खेल बन गया है जहां प्रतिभाओं की कोई कमी नही रह गई है । ऐसे में अगर किसी भारतीय क्रिकेटर के जीवन में इतना उतार -चढ़ाव, संघर्ष के बाद सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है तो वह श्रेयस अय्यर ही हैं। जब कभी उन्हें किसी कारणवश टीम से अंदर -बाहर किया गया तब वह सोशल मीडिया से दूर रहे और किसी भी प्रकार की बयानबाजी नहीं की वरन अपने खेल को निखारने में ही लगे रहे जिसका उन्हें सुखद पुरस्कार मिला।

क्रिकेट के मैदान के ये बदलाव उम्मीद दिलाते हैं भारतीय क्रिकेट टीम विजय पथ पर अग्रसर रहेगी। एक समय रणजी जैसी घरेलू प्रतियोगिताओं मे बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को टीम चयन में प्राथमिकता दी जाती थी किंतु अब टीम में चयन का एक और आधार आईपीएल भी बन गया है।

सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयंसेवकों का योगदान

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— कैलाश चन्द्र

दिल्ली । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। इसमें अनेक संगठन, विचारधाराएँ, क्रांतिकारी, समाजसुधारक और लाखों सामान्य नागरिक सम्मिलित रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महान यज्ञ में अनेक ऐसे व्यक्तित्व और संगठन भी थे जिन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया, किंतु अपने कार्य का प्रचार या श्रेय लेने का आग्रह नहीं किया। “सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया” यह वाक्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति और उसके स्वयंसेवकों की कार्यसंस्कृति को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की। डॉ. हेडगेवार स्वयं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी थे। उन्हें अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलनों में भाग लेने के कारण दो बार एक-एक वर्ष का सश्रम कारावास भुगतना पड़ा। पहली बार असहयोग आंदोलन के दौरान और दूसरी बार सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतर्गत जंगल सत्याग्रह में सहभागिता के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। जंगल सत्याग्रह में संघ के लगभग 150 स्वयंसेवकों ने भी सक्रिय भागीदारी की थी। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि संघ का स्वतंत्रता संघर्ष से संबंध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष सहभागिता का भी था।

स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में संघ के अनेक स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से सक्रिय रहे। विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ के अनेक प्रचारक और कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत गतिविधियों, जनसंपर्क, संगठन तथा आंदोलन के संचालन में जुड़े। उस समय संघ एक नवोदित संगठन था, फिर भी उसके स्वयंसेवकों ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए अपना योगदान दिया।

स्वाधीनता संघर्ष के दौरान जिन स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई, उनमें राजस्थान के जयदेवजी पाठक का नाम उल्लेखनीय है, जो आगे चलकर विद्या भारती के कार्य में सक्रिय रहे। विदर्भ के आर्वी क्षेत्र में डॉ. अण्णासाहब देशपांडे ने राष्ट्रजागरण का महत्वपूर्ण कार्य किया। छत्तीसगढ़ के जशपुर क्षेत्र में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे ने समाज जागरण और संगठन निर्माण का कार्य किया तथा आगे चलकर वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की, जिसने वनवासी समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दिल्ली में वसंतराव ओक ने स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड में महत्वपूर्ण कार्य किया। बाद में वे दिल्ली के प्रांत प्रचारक बने और संगठन विस्तार में उनका बड़ा योगदान रहा। बिहार में प्रसिद्ध अधिवक्ता कृष्ण वल्लभ प्रसाद नारायण सिंह, जिन्हें स्नेहपूर्वक “बबुआजी” कहा जाता था, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और बाद में बिहार के संघचालक बने। इसी प्रकार दिल्ली के चंद्रकांत भारद्वाज स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गोली लगने से घायल हुए। उनके पैर में धँसी गोली जीवनभर नहीं निकाली जा सकी। बाद में वे एक प्रसिद्ध कवि बने और अनेक प्रेरणादायी संघ गीतों की रचना की।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव देवड़े ने राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर वे प्रांत प्रचारक बने। मध्य प्रदेश के उज्जैन क्षेत्र में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे का भी स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान रहा। इन सभी कार्यकर्ताओं की विशेषता यह थी कि उन्होंने राष्ट्रकार्य को व्यक्तिगत यश और प्रसिद्धि से ऊपर रखा।
स्वतंत्रता संग्राम में संघ परंपरा से जुड़े अनेक अन्य व्यक्तित्व भी उल्लेखनीय हैं। दैवी पंथ चौधरी, जगतपति कुमार, अण्णासाहब देशपांडे, रमाकांत केशव देशपांडे, वसंतराव ओक, नारायण सिंह, मुकुन्द हूद्दार, चंद्रकांत भारद्वाज, दादानाईक चिमूर, बाबूराव बेगड़े, लाला हंसराज तथा बालाजी रायपुरकर जैसे अनेक नाम स्वतंत्रता संघर्ष के विविध अध्यायों से जुड़े रहे। इनमें से कई व्यक्तित्वों ने जेल यात्राएँ कीं, अनेक ने संगठनात्मक कार्य संभाला और कुछ ने प्रत्यक्ष संघर्षों में भाग लेकर राष्ट्रीय चेतना को सशक्त बनाया।

विशेष रूप से हेमू कालाणी का बलिदान भारतीय युवाशक्ति के साहस का अनुपम उदाहरण है। सिंध के इस युवा क्रांतिकारी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसी प्रकार राजाभाऊ महाकाल का बलिदान भी राष्ट्रभक्ति और त्याग का प्रेरक प्रसंग है। इनका स्मरण हमें यह बताता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि अनगिनत बलिदानों की परिणति थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी राष्ट्रीय एकीकरण का कार्य समाप्त नहीं हुआ था। गोवा, दमन और दीव अभी भी पुर्तगाली शासन के अधीन थे। इन क्षेत्रों की मुक्ति के लिए चले आंदोलनों में भी अनेक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। मास्टर गोविंद तथा मोहन रानाडे जैसे कार्यकर्ताओं ने गोवा मुक्ति आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। यह संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता की अवधारणा केवल 1947 तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत की पूर्ण राष्ट्रीय एकता और अखंडता तक विस्तारित थी।

संघ की कार्यपद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बजाय राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का संस्कार दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने अनेक क्षेत्रों में कार्य किया, परंतु अधिकांश ने अपने योगदान का प्रचार नहीं किया। उनका विश्वास था कि यदि समाज जागृत और संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेगा। इसीलिए संघ की परंपरा में श्रेय प्राप्ति की अपेक्षा कर्तव्यपालन को अधिक महत्व दिया गया।

आज जब सार्वजनिक जीवन में छवि-निर्माण, प्रचार और त्वरित प्रसिद्धि को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, तब “सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया” का आदर्श विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह दृष्टिकोण बताता है कि राष्ट्रनिर्माण का कार्य किसी एक व्यक्ति या संगठन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक दायित्व है। जो व्यक्ति या संगठन समाज को संगठित कर, प्रेरित कर और आगे बढ़ाकर स्वयं पीछे रहने की क्षमता रखता है, वही दीर्घकालीन परिवर्तन का आधार बनता है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन करते समय आवश्यक है कि हम उसके सभी आयामों को समझें। यह इतिहास केवल प्रसिद्ध नेताओं का इतिहास नहीं है; यह उन हजारों ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं का भी इतिहास है जिन्होंने राष्ट्रहित में अपना सर्वस्व समर्पित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके स्वयंसेवकों का योगदान भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उनके कार्यों का मूल संदेश यही था कि राष्ट्र सर्वोपरि है, समाज ही शक्ति का स्रोत है, और सेवा का सर्वोच्च रूप वह है जिसमें सहभागिता तो हो, परंतु श्रेय की अपेक्षा न हो।
“सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्रजीवन में विनम्रता, समर्पण, संगठन और कर्तव्यनिष्ठा का एक स्थायी आदर्श है। यही आदर्श स्वतंत्रता संग्राम के अनेक स्वयंसेवकों के जीवन में दिखाई देता है और यही आदर्श आज भी राष्ट्रनिर्माण की दिशा में प्रेरणा प्रदान करता है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

निकोला टेस्ला पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव

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(आगामी एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की बैठक की रिपोर्ट)

दिल्ली । आज सायंकाल चार बजे कंस्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया में 
भारत-क्रोएशिया के मैत्री, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक आदान प्रदान हेतु बैठक का आयोजन किया गया । इस बैठक में क्रोएशिया वैज्ञानिक निकोला टेस्ला पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव विषय पर आयोजित होने वाले एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की गतिविधियों पर विचार विमर्श किया गया । यह सम्मेलन भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री माननीय संजय पासवान जी के संरक्षण में सम्पन्न होगा । इस सम्मेलन में भारत सरकार के महत्वपूर्ण पदाधिकारी व क्रोएशिया के प्रतिनिधि मंडल भाग ले सकते हैं ।

स्वामी विवेकानंद की वैश्विक आध्यात्मिक विचारधारा और निकोला टेस्ला की वैज्ञानिक प्रतिभा दोनों देशों के बीच पुल का काम करती हैं।1890 के दशक में न्यूयॉर्क में स्वामी विवेकानंद और निकोला टेस्ला की भेंट हुई थी । विवेकानंद जी ने टेस्ला को वेदांत दर्शन, प्राण (ऊर्जा) और आकाश (मूल पदार्थ) की अवधारणाओं से परिचित कराया। टेस्ला ने बाद में अपनी रचनाओं में इन संस्कृत शब्दों का उपयोग किया और ब्रह्मांड को गतिशील ऊर्जा प्रणाली के रूप में देखा। टेस्ला की वैकल्पिक धारा (AC), वायरलेस ऊर्जा संचरण और मुक्त ऊर्जा की अवधारणाओं पर वेदांतिक विचारों का प्रभाव पड़ा ।

इस सम्मेलन के कारण संभवतः स्वामी विवेकानंद के दर्शन और टेस्ला की वैज्ञानिक उपलब्धियों का संयोजन भारत-क्रोएशिया संबंधों को नई ऊंचाई दे सकता है। साथ ही दोनों देशों के बीच विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संस्कृति और शिक्षा क्षेत्र में नियमित आदान-प्रदान बढ़ाया जा सकता है।
इस बैठक में कार्यकम संयोजन समिति के अध्यक्ष श्री अनूप पांडेय जी, स्वागत समिति के अध्यक्ष प्रो. पीयूष जैन जी, सचिव डॉ. सुशील द्विवेदी जी तथा आयोजन समिति के सदस्य- श्री हरदेव सिंह जी, श्री अरुण उपाध्याय जी, श्री मंजीत चौधरी जी , डॉ. विभा नायक जी , श्री शुभनीत चौधरी जी आदि उपस्थित थे।

यह कार्यक्रम 10 जुलाई 2026 को कंस्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित किया जाएगा ।

कचरा उत्सर्जन में न्यूनता से पर्यावरण संरक्षण

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संजय स्वामी

दिल्ली । जून 1973 में प्रथम बार विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम सम्मेलन में इस दिवस को मनाने की घोषणा की थी। उद्देश्य स्पष्ट था कि दुनिया के सभी देश अपनी भौगोलिक सीमाओं के दायरे से निकल इस पृथ्वी के लिए विचार करें। लोग अपने संकुचित मानसिक घरोंदो से बाहर आएं, हम सभी की केवल एक पृथ्वी (ओनली वन अर्थ) इस तत्व को समझें।

पृथ्वी तो एक ही है। पंछियों के लिए पूरा आकाश एक है। अपनी आदतें, व्यवहार तथा क्षमता से वे अपना आवास तथा परिमंडल निश्चित करते हैं। गौरैया, मोर आदि भोजन की तलाश में बहुत लंबी दूरी तय नहीं करते। ग्रामीण क्षेत्रों में मनुष्य के आसपास ही अपना वास रखते हैं। दूसरी ओर साइबेरिया के सारस हजारों मील की यात्रा करते हैं। विशिष्ट मौसम में जब साइबेरिया में बहुत अधिक सर्दी बढ़ जाती है। तापमान माइनस – 50 डिग्री पहुंच जाता है तब वे भारत जैसे क्षेत्रों की ओर उड़ान भरते हैं। हजारों मील लंबी यात्रा करके भारत के दलदलीय क्षेत्रों, झीलों में सर्दी प्रारंभ होने से पूर्व अक्टूबर नंबर माह में आते हैं तथा कुछ महीने वास कर मौसम बदलने पर जब यहां फरवरी मार्च में ग्रीष्म ऋतु का आगमन प्रारंभ होता है, वापस लौट जाते हैं। सदियों से यह क्रम चल रहा है। उनके लिए पूरा आकाश सम्पूर्ण पृथ्वी एक घर जैसा है। इसलिए प्रकृति से ही प्रेरणा लें।
प्रकृति अपना नियोजन करने में समर्थ है। मनुष्य को स्वार्थी कहा गया है। कोई बात नहीं, स्वार्थ के वशीभूत ही सही, वह अपने भविष्य के लिए सजग हो। भावी पीढ़ी के प्रति दायित्व को समझे। उनके भविष्य का चिंतन करते हुए पर्यावरण के लिए अपनी आवश्यकताओं को मर्यादित करे।

पुरातन राजतंत्रिक व्यवस्था में राजाओं ने अपनी ताकत से भूमंडल को सीमाओं में बांट लिया। आधुनिक कालखंड की लोकप्रिय लोकतांत्रिक प्रणाली में भी यह निश्चित सीमाओं में बंधी हुई है। दुनिया में लगभग 200 देश हैं। सभी की एक निश्चित सीमा है। साम्राज्यवादी प्रवृति में कोई सीमा नहीं थी। राजतंत्र था प्राकृतिक संसाधनों से देश संपन्न थे। एक दूसरे की धन सम्पदा को लूटने के उद्देश्य से आक्रमण करते थे। बलात प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य स्थापित करते थे। वर्तमान यूक्रेन-रूस या इजरायल-इराक संघर्ष भी प्राकृतिक संसाधनों के बलात आधिपत्य के लिए ही है।
प्रतिवर्ष विश्व पर्यावरण दिवस आता है और चला जाता है। धीरे-धीरे विश्व के लगभग सभी देश इस अवसर पर पर्यावरण के प्रति कुछ नए संकल्प लेते हैं, कुछ नई योजनाएँ बनाते हैं। कहीं पौधारोपण होता है, तो कहीं संगोष्ठी-सेमिनारों का आयोजन। किंतु संकल्प की स्याही सूखते ही सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। वही धुआँ, वही कचरा, वही कटते वृक्ष, मानो विश्व पर्यावरण दिवस मनाना एक औपचारिकता मात्र है, कोई दायित्व बोध नहीं। इस वर्ष एक बार, कुछ क्षण के लिए, दैनिक कार्य-व्यवहार और व्यापार को एक ओर रख कर शांत चित्त से बैठिए, प्रकृति की ओर निहारिए। अपने आसपास के वृक्षों, पौधों, झाड़ियों से मौन संवाद करिए। कुछ पल नदियों के कल-कल निनाद की व्यथा सुनिए। पहाड़ों के मौन आर्तनाद को अनुभव करने का प्रयास करें। जिस धरती ने हमें अन्न दिया, जल दिया, वायु दी, उसके प्रति हमारी कृतज्ञता केवल किसी एक दिन विशेष की नहीं होनी चाहिए। पर्यावरण-चेतना हमारी जीवनशैली बने, केवल नारा नहीं। प्रकृति मनुष्य की सेवक नहीं, वह मानव की जीवनदात्री माँ है।

विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष हमें हमारे भविष्य के प्रति सचेत होने का संकेत देता है। प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु की तपिश बढ़ती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप एसी-कूलर आदि वातानुकूलन यंत्रों की माँग निरंतर बढ़ रही है। मानवीय उपयोग हेतु जल की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। भवन-निर्माण और उद्योगों में पानी की खपत अपरिमित है। भूजल स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है। वर्षाकाल को छोड़ दें तो बारहमासी नदियों का जल प्रवाह भी क्षीण होता जा रहा है। कभी विशाल कही जाने वाली झीलें आज न जल-मात्रा में विशाल हैं और न ही क्षेत्रफल की दृष्टि से विस्तृत। तालाबों का स्थान स्विमिंग पूल ने ले लिया और कुएँ अब बोरवेल-समर्सिबल में रूपांतरित हो गए। गाँव की बावड़ियाँ, जो सैकड़ों प्राणियों की प्यास बुझाती थीं वह आज मलबे और कचरे से भर चुकी हैं। तालाब, बावड़ी, पोखर, झील और नदियाँ, जो लाखों जीव-जंतुओं के लिए थे, मनुष्य ने उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार रूपांतरित कर लिया। वन-क्षेत्र के सिकुड़ने लगे। वन-वृक्षों के कटने से जंगली जीव भटककर आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश करने लगे हैं। विशाल वृक्षों की घटती संख्या से पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। झीलों में जलस्तर घटने से जलीय जीवों की संख्या न्यून होती जा रही है। मिट्टी की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अंधाधुंध रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग से भूमि की जीवंतता नष्ट हो रही है। वह मिट्टी, जिसमें करोड़ों सूक्ष्मजीव प्रति वर्ग इंच निवास करते थे और फ़सल को जीवन देते थे, अब बंजर होती जा रही है। खेत अधिक उपज दे रहे हैं, पर वह उपज पोषण से रहित है। मनुष्य अन्न खा तो रहा है, पर भूखा ही रह रहा है।

आज के युग में आविष्कारक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि उद्योगपति और विज्ञापन कंपनियाँ हैं। बाज़ारवाद ने सर्वत्र कचरे का अंबार लगा दिया है। इसका एक कारण कि प्रत्येक वस्तु पैकिंग में बिकती है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। अस्पताल से घर आने वाले शिशु का पालना प्लास्टिक की पैकिंग में है, और अंतिम विदाई के समय शमशान भूमि तक सामग्री पॉलिथीन की थैलियों में जाती है। त्योहारों और उत्सवों का भी यही हाल है। आज पर्यावरण के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, अत्यधिक उपभोग और उससे उत्पन्न कचरा। बाजारवाद ने सुविधा तो दी है, परंतु पैकेजिंग संस्कृति ने कचरे का पहाड़ खड़ा कर दिया है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन का लगभग प्रत्येक उत्पाद प्लास्टिक, थर्मोकोल या अन्य अजैविक सामग्री में पैक होकर आता है। प्रकृति का निर्माण केवल मनुष्य के लिए नहीं हुआ है। नदियाँ, झीलें, वन और पर्वत असंख्य जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों के जीवन का आधार हैं। किंतु आधुनिक विकास मॉडल में अक्सर केवल मानवीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाती है। प्रकृति, पर्यावरण और समस्त जीव-जंतु अब मनुष्य से यही अपेक्षा करते हैं कि वह केवल अपने को ही संभाल ले। वन और जंगलों पर अतिक्रमण करना कम करे। अपनी भोगवादी प्रवृत्ति को नियंत्रित करे। जनसंख्या के अनियंत्रित विस्तार पर विचार करे। व्यक्तिगत स्तर पर छोटे-छोटे निर्णय बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। कपड़े का थैला लेकर बाज़ार जाइए। बोतलबंद पानी की जगह अपनी पुनः उपयोगी बोतल साथ रखिए। घर की रसोई से निकला जैविक कचरा गमले की खाद बने। त्योहारों पर मिट्टी की मूर्तियाँ खरीदिए, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की नहीं। ये निर्णय क्रांति नहीं, किंतु इन्हीं से क्रांति का आरंभ होता है।

विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी को बचाने का अर्थ केवल भाषण देना या पौधे लगाना नहीं है। वास्तविक परिवर्तन हमारी जीवनशैली, उपभोग की आदतों और विकास की अवधारणाओं में निहित है। सत्य को ग्रहण करें, अविवेक का त्याग करें और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की ओर बढ़ें। यही विश्व पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा संकल्प हो सकता है। सत्य यही है कि पर्यावरण दिवस पर भाषण देने से नहीं, बल्कि प्रतिदिन की छोटी-छोटी आदतों को बदलने से हमारी पृथ्वी बचेगी। धरती माँ के आंचल को मैला होने से बचाने के लिए अपना थैला व पानी बोतल साथ रखें। एक वृक्ष का रोपण-पोषण स्वयं करें। एक जागरूक नागरिक बन पर्यावरण संरक्षण का संदेश परिवारों, विद्यालयों और जनमानस के साथ साझा करें, समाज को प्रेरित करें। इस पर्यावरण दिवस पर अपनी दैनिक गतिविधियों में कचरा उत्सर्जन न्यून करने का संकल्पित विचार करें।

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