अक्टूबर में डीप स्टेट की तख्ता पलट की है साजिश

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विमर्श भारत का
@vimarshbharatkaदिल्ली। अक्टूबर में भारत में तख्तापलट करने की “डीप स्टेट” की साजिश; 8 चरणों में सत्ता पलट करने की है योजना।

ओपन सोर्स इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार “डीप स्टेट” भारत में बांग्लादेश और नेपाल की तरह तख्तापलट करने के लिए ऑपरेशन चल रहा है। इसके लिए भारत में 8 चरणों में योजना बनाई गई है।

1) जिसमें से पहला है, “कम्युनिस्ट मोर्चा”- इसमें सभी प्रकार की कम्युनिस्ट राजनीतिक पार्टियां और उनकी युवा संगठन शामिल होंगे।

CPI और उसका युवा संगठन AISF
CPI(M) और उसका युवा संगठन SFI
CPI(ML) और उसका युवा संगठन AISA
AAP और उसका युवा संगठन CJP

इन सभी संगठनों ने 2 अक्टूबर से शुरुआत करने की खुले आम घोषणा कर दी है।

2) दूसरा है, “कांग्रेस मोर्चा”-  इसमें कांग्रेस एवं उनके सभी सहयोगी पार्टियां जैसे समाजवादी पार्टी, NCP, शिवसेना (UBT), RJD आदि पार्टी एवं उनके कार्यकर्ता शामिल होंगे। इन सब ने अलग-अलग मोर्चे पर काम करना शुरू भी कर दिया है। बाद के चरण में यह सब कम्युनिस्ट मोर्चे में शामिल हो जाएंगे।3) तीसरा है, “वामपंथी बुद्धिजीवी मोर्चा”-  इसमें वामपंथी-उदारवादी एक्टिविस्ट, मीडिया, वकील, अभिनेता, नेता, प्रोफेसर एवं इनफ्लुएंसर शामिल होंगे। ये कम्युनिस्ट और कांग्रेस मोर्चे के बीच एक सेतु का कार्य करेंगे। जो दोनों को बौद्धिक सुरक्षा प्रदान करेंगे।

मीडिया झूठी बातों को फैलाने की कोशिश करेगा, वकील कानूनी सुरक्षा प्रदान करेंगे और एक्टिविस्ट भीड़ जुटाएंगे, अभिनेता एवं इन्फ्लुएंस मासूम लोगों को बहकाकर भारत विरोधी माहौल बनाने का कार्य करेंगे।

4) चौथा है, “इस्लामिक मोर्चा”- यह खुले तौर पर सामने नहीं आएंगे। ताकि इसके जबाव में हिंदुओं का ध्रुवीकरण न हो। बल्कि यह चुपके से अन्य सभी मोर्चों को सड़क पर ताकत प्रदान करेंगे। जैसे दिल्ली में तिलचट्टा जनता पार्टी के आंदोलन में किया था।
बांग्लादेशी और रोहिंग्या भी जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं वो भी शामिल होंगे।

5) पांचवा है, “किसान यूनियन और ट्रेड यूनियन”- किसान और ट्रेड यूनियन जो वामपंथी और कांग्रेस से जुड़े समूह के बाद के चरण में शामिल होंगे।

6) छठा है, “ईसाई मिशनरी संगठन”-  यह संगठन आर्थिक एवं तार्किक और ऑपरेशनल सहायता प्रदान करेंगे।

7) सातवां है, “अंबेडकरवादी समूह”- कई वामपंथी झुकाव वाले दलित समूह जैसे- भीम आर्मी, VBA आदि इसमें शामिल होंगे।

8) आठवां है, “संस्थागत विरोध”- ये आंदोलन के सबसे बाद के चरण में खासकर जब विरोध प्रदर्शन अपने चरण पर पहुंच चुका होगा, तो कई सरकारी अधिकारी जिसमें नौकरशाह, पुलिस, यहां तक की सेना के कुछ लोग भी शामिल होंगे। जो अपने कार्यों से इस्तीफा देंगे और प्रदर्शनकारियों को खुलकर समर्थन देंगे।

ताकि लोगों में विश्वास हो जाए कि विरोध प्रदर्शन वाकई सही दिशा में हो रहा है।

यह पूरा ऑपरेशन लंदन वाशिंगटन और रावलपिंडी से कोऑर्डिनेटर कियाजाएगा।

वैश्विक पत्रकार (ग्लोबल मीडिया) ने इसको लेकर पहले ही माहौल बनाना शुरू कर दिया है। कहा तो ऐसा भी जा रहा है कि 2 अक्टूबर एवं उसके बाद भारत में कई वैश्विक पत्रकारों का जमावड़ा होने वाला है। जो भारत में तख्तापलट हो इस अनुकूल वातावरण बनाएगा। ताकि “भारत में लोकतंत्र खतरे में है” इस तरह का माहौल बने और भारत पर अंतरराष्ट्रीय स्तर से भी दबाव बनाया जाए मोदी सरकार को हटाने का।

एम. ए. सर : एक जीवन, अनेक प्रेरणाएँ

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कैलाशचंद्र जी

रायपुर : कुछ व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में केवल काम नहीं करते, वे अपने पीछे एक कार्यपद्धति, एक संस्कार और एक पीढ़ी छोड़ जाते हैं। श्री एम. ए. कृष्णन जी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। केरल में स्नेहपूर्वक ‘एम. ए. सर’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस वरिष्ठ प्रचारक का जीवन बताता है कि किसी विचार को समाज में स्थापित करने के लिए केवल भाषण पर्याप्त नहीं होते। उसके लिए जीवन की साधना, निरंतर परिश्रम, संगठन-निर्माण और समाज के मन को समझने की क्षमता आवश्यक होती है।एम. ए. सर का जीवन इसलिए विशेष है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए केवल संगठन का विस्तार नहीं किया, बल्कि समाज के सांस्कृतिक जीवन में अपनी उपस्थिति बनाई।

कठिन परिस्थितियों में कार्य का संकल्प :

1954 में प्रचारक जीवन स्वीकार करने के बाद एम. ए. सर ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और संगठन के कार्य को समर्पित किया। केरल में उस समय सामाजिक और वैचारिक परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण थीं। ऐसे वातावरण में संघ कार्य करना केवल शाखा लगाने का काम नहीं था; समाज के बीच विश्वास पैदा करना, कार्यकर्ताओं का निर्माण करना और भारतीय विचार को समाज के सामने सहज रूप में रखना भी उतना ही आवश्यक था।यही उनके जीवन की पहली बड़ी सीख है—परिस्थितियाँ अनुकूल हों, तभी कार्य करना कार्यकर्ता का स्वभाव नहीं हो सकता। कार्यकर्ता परिस्थितियों को समझकर उनमें कार्य की संभावना खोजता है।एम. ए. सर ने कठिनाइयों को शिकायत का विषय नहीं बनाया; उन्हें कार्य की चुनौती के रूप में स्वीकार किया।

केवल संगठन नहीं, समाज का सांस्कृतिक पुनर्जागरण :

उनके जीवन की दूसरी बड़ी विशेषता थी—समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचने की दृष्टि। बालगोकुलम् इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। बच्चों को भारतीय संस्कृति, कथा, उत्सव और संस्कारों से जोड़ने का प्रयास केवल बच्चों के लिए कार्यक्रम खड़ा करना नहीं था। इसके पीछे यह समझ थी कि आने वाली पीढ़ी के मन में अपनी संस्कृति के प्रति सहज आत्मीयता बचपन से ही विकसित होनी चाहिए। इसी प्रकार तपस्या कलासाहित्य वेदी के माध्यम से साहित्य और कला के क्षेत्र में कार्य का विस्तार हुआ। यहाँ से एक महत्वपूर्ण दिशा मिलती है—समाज परिवर्तन केवल राजनीतिक या संगठनात्मक गतिविधियों से नहीं होता। समाज का मन साहित्य, कला, संस्कृति, परिवार और शिक्षा से भी बनता है।एम. ए. सर ने इस बात को अपने कार्य से प्रमाणित किया।

बाल मन को समझने वाला कार्य :

आज जब बच्चों का बचपन अनेक प्रकार के दबावों से प्रभावित हो रहा है, तब बालगोकुलम् जैसे प्रयोगों की प्रासंगिकता और अधिक दिखाई देती है।बच्चे को केवल परीक्षा, प्रतियोगिता और भविष्य की नौकरी के लिए तैयार करने के बजाय उसके भीतर कल्पना, संस्कार, जिज्ञासा, आनंद और अपनी संस्कृति से आत्मीय संबंध विकसित करना आवश्यक है।एम. ए. सर के कार्य से यह प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा होता है—हम बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं या अच्छा मनुष्य भी बनाना चाहते हैं?उनकी दृष्टि का यही पक्ष आज के माता-पिता, शिक्षक, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए विशेष प्रेरणा बन सकता है।

विचार को समाज की भाषा में पहुँचाना :

एम. ए. सर केवल संगठनकर्ता नहीं थे। वे लेखक, संपादक, शिक्षक और संस्कृत के गंभीर अध्येता भी थे।1964 से 1990 तक मलयालम साप्ताहिक ‘केसरी’ के संपादन से जुड़ा उनका कार्य यह बताता है कि विचार को समाज तक पहुँचाने के लिए प्रभावी संवाद कितना आवश्यक है।यहाँ उनकी कार्यशैली से एक और सूत्र मिलता है—विचार कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, यदि वह समाज की भाषा में नहीं पहुँचता तो उसका प्रभाव सीमित रह जाता है।इसलिए लेखन, पत्रकारिता, साहित्य और संवाद केवल प्रचार के साधन नहीं हैं; वे समाज-निर्माण के उपकरण हैं।

व्यक्ति नहीं, पीढ़ी निर्माण :

किसी प्रचारक या सामाजिक कार्यकर्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने स्वयं कितना काम किया। बड़ी उपलब्धि यह है कि उसके जाने के बाद भी उसके द्वारा तैयार किए गए लोग और संस्थाएँ काम करती रहें।एम. ए. सर ने अपने आसपास कार्यकर्ताओं, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और विचारशील लोगों की एक पीढ़ी तैयार करने में भूमिका निभाई। यही किसी जीवन की वास्तविक सामाजिक पूँजी है। एक दीपक की सार्थकता केवल उसके स्वयं जलने में नहीं, बल्कि दूसरे दीपकों को प्रकाशित करने में है।
एम. ए. सर का जीवन इसी अर्थ में दीप से दीप जलाने की साधना था।आज उनके जीवन से हमें क्या सीखना है?एम. ए. सर को स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके जीवन से कुछ कार्य-सूत्र ग्रहण करना है।

पहला— कठिन परिस्थिति में कार्य से पीछे नहीं हटना। परिस्थिति चाहे जैसी हो, कार्य की संभावना खोजनी चाहिए।
दूसरा— बच्चों और युवाओं को केवल सूचना नहीं, संस्कार देना। समाज का भविष्य उसके विद्यालयों के साथ-साथ उसके परिवार और सांस्कृतिक वातावरण में भी तैयार होता है।
तीसरा— साहित्य और कला को समाज-निर्माण से जोड़ना। कलम और संस्कृति भी समाज परिवर्तन की शक्तिशाली साधनाएँ हैं।
चौथा— विचार को समाज की भाषा में रखना। जटिल विचार को सरल और आत्मीय बनाकर समाज तक पहुँचाना चाहिए।
पाँचवाँ— स्वयं से अधिक कार्यकर्ताओं का निर्माण करना। सच्चा संगठन वही है जो व्यक्ति के जाने के बाद भी चलता रहे।
छठा— अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिक समाज से संवाद करना। परंपरा का अर्थ अतीत में ठहर जाना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक चेतना के आधार पर वर्तमान से संवाद करना है।

एक जीवन का अंतिम संदेश :

एम. ए. सर का जीवन हमें यह विश्वास देता है कि परिवर्तन हमेशा बड़े मंचों से शुरू नहीं होता। कभी वह एक शाखा से शुरू होता है, कभी एक बच्चे से, कभी एक पुस्तक से, कभी एक लेख से और कभी किसी एक समर्पित कार्यकर्ता के जीवन से। एक व्यक्ति चुपचाप अपना जीवन किसी विचार और समाज के लिए लगा देता है। वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि उसके श्रम से अनेक धाराएँ निकलीं और उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया।यही किसी तपस्वी कार्यकर्ता की पहचान है।आज एम. ए. सर हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनके द्वारा खड़े किए गए कार्य, उनके संस्कार से निकली पीढ़ियाँ और उनके जीवन से मिलने वाली प्रेरणा आगे भी चलती रहेगी।उनकी स्मृति हमें केवल अतीत की ओर देखने के लिए नहीं, अपने वर्तमान के दायित्व को पहचानने के लिए प्रेरित करे।उनकी श्रद्धांजलि का सबसे अच्छा अर्थ यही होगा कि हम स्वयं से पूछें—मैं अपने समय की कठिन परिस्थिति में क्या कर रहा हूँ?मैं कितने लोगों को जोड़ रहा हूँ?मैं अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहा हूँ?क्योंकि अंततः जीवन की पहचान इस बात से नहीं होती कि हमने अपने लिए कितना अर्जित किया, बल्कि इससे होती है कि हमारे जाने के बाद हमारे जीवन से समाज को क्या प्राप्त होता है।एम. ए. कृष्णन जी की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन।ॐ शांति।

Nation First Policy Research and Change Foundation’s (NFPRC) Workshop for Parliamentarians and Legislators on Strengthening India’s Employment Architecture For Viksit Bharat@2047

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New Delhi: The Nation First Policy Research and Change Foundation (NFPRC) convened a workshop for Legislators at Gulmohar Hall, India Habitat Centre, bringing together Members of Parliament, Members of Legislative Assemblies, and policy experts for discussions on strengthening India’s employment ecosystem. The deliberations focused on key areas including education and skilling, investment-led industrialisation, and the use of digital communication in legislative processes. The workshop saw participation from 40 public representatives from the Lok Sabha, Rajya Sabha, and State Assemblies from across the country.

Following the strong participation and response to its earlier legislative programs, NFPRC organised the workshop to facilitate meaningful dialogue between elected representatives and policy experts. Discussions focused on strengthening the link between education, skills and employment, expanding job opportunities through investment and industrial growth, and improving constituency-level communication and outreach. The programme also highlighted the importance of evidence-based policymaking and effective implementation frameworks to help legislators address local priorities and deliver better outcomes for their constituents.

Inaugurating the workshop, Shri Abhinav Prakash, Board Member, NFPRC Foundation, highlighted the central role of employment and economic opportunity in the nation’s journey towards Viksit Bharat @2047. He emphasised the importance of building on India’s progress by strengthening the linkages between education, skills and industry requirements, while promoting investment and industrial growth aligned with local strengths and opportunities. Encouraging legislators to translate these discussions into constituency-level action, he underscored their pivotal role in fostering local economic growth and expanding employment opportunities.

In address as the Presiding Chair of the workshop, Shri Vasudev Devnani, Hon’ble Speaker of the Rajasthan Legislative Assembly, emphasised the need to systematically map the skills, capabilities and aspirations of local youth with emerging employment opportunities in their respective regions. He highlighted the importance of strengthening education–skills–industry linkages, enabling institutions to respond to local economic needs, and encouraging investments that build on regional strengths. He underscored the role of legislators in promoting government schemes and ensuring that their benefits reach the eligible working population, facilitating industry–institution partnerships, and creating an enabling ecosystem where local talent can access meaningful employment opportunities closer to home.

Shri Shashank Mani, Member of Parliament, Lok Sabha, delivered a session virtually titled “Driving Employment through Investment & Industrialisation.” He highlighted the significant opportunity to expand livelihoods by combining formal employment with entrepreneurship, particularly across India’s Tier-2 and Tier-3 districts. Drawing on his decade-long initiative in Deoria and neighbouring districts, he presented the “Amrit Prayas” and “Jagriti”models, built around six pillars spanning high-employment manufacturing, agri-processing and tourism. He outlined a ten-year strategy to strengthen the local economic ecosystem, catalyse investment and create lakhs of additional jobs in the constituency. Reflecting on India’s employment journey, he described the evolution of the national approach through a building metaphor: “In Modi 1.0, the foundation for employment was laid; in Modi 2.0, the walls were built; and in Modi 3.0, the roof is being built.” He said this progression reflects the continued strengthening and expansion of the country’s employment and entrepreneurship ecosystem.

Shri Rahul Ahluwalia, Director at Foundation For Economic Development, delivered a session titled “Driving Employment through Investment & Industrialisation.” The session examined how India can accelerate export-led growth and job creation through greater global investment, lower input costs, and a stress-free business environment, with Vietnam and GIFT City as models. Discussions also highlighted the significant potential of manufacturing exports and tourism to expand employment opportunities, while emphasising how states can accelerate reforms that simplify compliance and create a more enabling business environment. Legislators can play a proactive role by identifying local constraints, supporting the development of investment opportunities, attracting anchor investors, facilitating businesses, and promoting reforms that streamline licensing and inspection processes, helping ensure that increased investment translates into sustainable jobs, livelihoods, and broad-based local growth.

Communication expert Dr. Rohit Upadhyay, conducted a capacity-building session on digital and social media communication for legislators. The session provided legislators with practical insights into social media platforms, citizen engagement, analytics, and digital content strategies. It also covered countering misinformation, and the responsible use of AI in public communication. The discussion highlighted how digital tools can help legislators understand public sentiment, tailor content across platforms, respond to emerging narratives, and strengthen communication and engagement with constituents.

In his closing remarks, Shri Vasudev Devnani acknowledged the valuable contributions of the distinguished speakers and participating legislators for their active engagement. He reiterated the Foundation’s commitment to promoting informed policy dialogue, strengthening legislative capacity, and encouraging evidence-based decision-making through research and collaboration.

The workshop reinforced NFPRC’s commitment to connecting policy research with practical governance. Discussions focused on institutional strengthening, innovative policymaking, and improved public service delivery. The programme concluded with a collective emphasis on stronger partnerships and the sharing of best practices to advance inclusive and results-driven governance in line with the vision of Viksit Bharat@2047.

Participating legislators welcomed the workshop as a useful platform for constructive policy dialogue, exchange of experiences, and sharing of best practices. The discussions also supported continuous learning and contributed to strengthening legislative capacity. NFPRC plans to build on this engagement through future dialogues, thematic consultations, and ongoing research-based initiatives focused on informed policymaking and effective legislative practices.

रुपए को भारतीय नागरिक ही दिला सकते हैं मजबूती

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ग्वालियर । अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत लगातार नीचे गिर रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि भारत में विभिन्न उत्पादों के आयात बहुत अधिक मात्रा में हो रहे हैं, जबकि तुलनात्मक रूप से भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात कम मात्रा में हो रहे हैं और इससे भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। बाजार में किसी भी वस्तु की कीमत उसकी मांग एवं आपूर्ति से तय होती है, भारत में विभिन्न वस्तुओं के आयात अधिक होने के चलते एवं इन आयातित वस्तुओं का भुगतान करने के लिए भारत को अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता अधिक है और तुलनात्मक रूप से निर्यात कम होने के चलते भारत को अमेरिकी डॉलर की आपूर्ति कम मात्रा में हो रही है। अतः अमेरिकी डॉलर की मांग अधिक होने एवं आपूर्ति कम होने से अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत लगातार नीचे गिर रही है। पिछले 90 दिनों के दौरान एक अमेरिकी डॉलर की कीमत अधिकतम 96.7908 रुपए और न्यूनतम कीमत 94.3986 तक रही है। आज यह पुनः 96 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर से ऊपर पहुंच गई है। इस स्थिति को सुधारने में भारतीय नागरिकों को अपना महत्वपूर्ण योगदान देने की अधिक आवश्यकता है। दरअसल, भारतीय नागरिकों की आय में वृद्धि दर्ज होने के चलते वे समाज में अपने रुतबे को बढ़ता हुआ दिखाने के लिए आयातित वस्तुओं का उपयोग करने लगते हैं, जबकि देश में ही निर्मित यह उत्पाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। भारतीय नागरिकों द्वारा आयातित उत्पादों के अधिक उपयोग के कारण देश में वस्तुओं का आयात बढ़ता है और यह अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि करता है।

हाल ही के समय में भारतीय शेयर बाजार से भी विदेशी संस्थागत निवेशक भारी मात्रा में अपने निवेश को वापिस निकाल रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत कम हो रही है और इससे विदेशी निवेशकों को नुक्सान हो रहा है। केलेंडर वर्ष 2026 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2.8 लाख करोड़ रुपए की राशि निकाल ली है। सितम्बर 2024 तक के 24 माह में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 38,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था जबकि सितम्बर 2026 तक के 24 माह में 56,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निकासी की गई हैं। हालांकि, इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत बनी हुई है और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हो रही है। इस बीच अमेरिका में बांड यील्ड में भी तेजी से वृद्धि हुई है और यह यील्ड 30 वर्ष की अवधि के बांड पर 5.595 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच गई है जो पिछले 20 वर्षों से अधिक समय (वर्ष 2002 के बाद) में सबसे अधिक है। दरअसल, भारत में ब्याज दरें अमेरिका से अधिक होने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक भारत के शेयर बाजार में अपना निवेश बढ़ाते जा रहे थे। परंतु, हाल ही के वर्षों में अमेरिका में ब्याज दरों में वृद्धि दृष्टिगोचर है, जिसके चलते इन विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा अब भारतीय शेयर बाजार से निवेश निकाल कर अमेरिकी शेयर बाजार में निवेश किया जा रहा है। वैसे भी, भारत की आर्थिक प्रगति को विश्व के कई देश सहन नहीं कर पा रहे हैं एवं भारत को वे अपना प्रतिस्पर्धी मान रहे हैं। अतः भारत को इन परिस्थितियों से अपने नागरिकों के बल पर स्वयं ही निपटना होगा, किसी भी अन्य देश से सहायता की उम्मीद करना उचित नहीं होगा। आज भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

भारत में केवल आर्थिक विकास की दर ही आकर्षक नहीं रही है बल्कि भारत के लिए विदेश व्यापार के मोर्चे पर भी अगस्त 2026 माह में मजबूत प्रदर्शन देखने को मिला है। अगस्त 2026 माह में भारत से कुल निर्यात (उत्पादों एवं सेवाओं सहित) 25.41 प्रतिशत बढ़कर 8,268 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा है, जो बीते वर्ष की समान अवधि में 6,593 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। वहीं, अगस्त 2026 माह में आयात 9,209 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा है, जो बीते वर्ष अगस्त 2025 में 7,755 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। इस तरह से निर्यात में तेज बढ़ोतरी के चलते देश का व्यापार घाटा घटकर 941 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रह गया है। बीते वर्ष अगस्त 2025 माह में व्यापार घाटा 1,162 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। इसी प्रकार अगस्त 2026 माह में विभिन्न उत्पादों (वस्तुओं) का निर्यात 26.12 प्रतिशत बढ़कर 4,381 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है, जो अगस्त 2025 माह में 3,473 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। अगस्त 2026 माह में पिछले 10 वर्षों के दौरान सबसे अधिक वस्तुओं का निर्यात हुआ है। इस अवधि में सेवाओं के निर्यात में भी अच्छी वृद्धि दर्ज हुई है।

इसी प्रकार, अगस्त 2026 माह में ही भारत में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में भी 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। विनिर्माण क्षेत्र में तो और अधिक 9 प्रतिशत एवं बिजली एवं गैस आपूर्ति क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज हुई हैं। केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्चों में वृद्धि दर्ज हुई है एवं अब निजी क्षेत्र द्वारा भी पूंजीगत खर्चों में वृद्धि की जा रही है। विनिर्माण क्षेत्र की इकाईयों की उत्पादन क्षमता का उपयोग 75 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है, इसके बाद सामान्यतः विनिर्माण इकाईयां अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार करने पर विचार प्रारम्भ करती है।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर आकर्षक है, औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर उल्लेखनीय है, विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात भी तेज गति से बढ़ रहे हैं, फिर भी भारतीय शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशक अपना निवेश क्यों निकाल रहे हैं एवं भारतीय रुपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार क्यों गिर रही है। इस विषय पर गम्भीरता से विचार करने की आज आवश्यकता है। दरअसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत द्वारा आयातित वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं और भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। जिससे भारत को अमेरिकी डॉलर की अधिक आवश्यकता महसूस हो रही है एवं इससे अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि दिखाई दे रही है जिससे अमेरिकी डॉलर भारतीय रुपए की तुलना में मजबूत हो रहा है एवं रुपया कमजोर हो रहा है। इस ट्रेंड को बदलने के लिए भारत को विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त करने की आज सबसे अधिक आवश्यकता है, ताकि विभिन्न उत्पादों के आयात को कम किया जा सके और भारत अपने व्यापार घाटे को व्यापार आधिक्य में बदलने में सफल हो सके। इसलिए आज भारतीय नागरिकों को गम्भीरता से चिंतन/मनन/विचार करने की महती आवश्यकता है एवं किस प्रकार केवल देश में ही निर्मित उत्पादों का उपयोग किया जाय और आयातित वस्तुओं के उपभोग को बंद कर दिया जाय। विभिन्न सामाजिक संस्थानों को भी इस दृष्टि से आम नागरिकों को जागरूक करने का काम प्रारम्भ करना होगा। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं स्वदेशी जागरण मंच द्वारा लगातार यह प्रयास किए जा रहे हैं कि भारत में केवल स्वदेशी उत्पादों का ही उपयोग होना चाहिए। इस अभियान के अंतर्गत नागरिकों को यह भी जानकारी दी जाती है कि कौन सा उत्पाद विशेष आयातित है एवं कौन सा उत्पाद विशेष देश में ही निर्मित है। अब समय आ गया है कि धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्थानों एवं एनजीओ को मिलकर इस अभियान को समाज एवं नागरिकों के बीच ले जाना होगा। ताकि, भारत में विभिन्न उत्पादों के आयात को कम किया जा सके एवं भारतीय रुपए पर आ रहे दबाव को कम किया जा सके।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं और यह लगातार 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर गई हैं। भारत तो कच्चे तेल की अपनी कुल खपत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। कच्चे तेल के आयात का भुगतान भी अमेरिकी डॉलर में ही करना होता है, इससे भारतीय रुपए पर दबाव बढ़ रहा है। महंगे कच्चे तेल के आयात से भारत में मंहगाई का भी आयात हो रहा है। भारत में भी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रा स्फीति की दर 4.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है और थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर तो यह 10 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। दूसरे, अमेरिका एवं अन्य कई देशों में बांड यील्ड अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गई हैं। अतः बहुत सम्भव है कि भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में लाने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा माह अक्टोबर 2024 के दौरान रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि की घोषणा की जाय। रेपो दर में वृद्धि से भारत में ऋण पर अदा की जाने वाली ब्याज की राशि में वृद्धि होगी और इससे अंततः विभिन्न वस्तुओं की उत्पादन लागत में वृद्धि होगी और बाजार में उत्पादों की कीमतें भी बढ़ना प्रारम्भ होंगी।

कुल मिलाकर आज, उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भारतीय नागरिकों, भारतीय समाज एवं विभिन्न प्रकार की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थानों तथा विभिन्न क्षेत्रों एवं समाज के बीच में कार्य कर रहे एनजीओ को मिलकर एक अभियान ही चलाना होगा कि केवल भारत में निर्मित वस्तुओं का उपयोग किया जाय तथा आयातित वस्तुओं के प्रयोग को एकदम बंद कर दिया जाय। साथ ही, पेट्रोल एवं डीजल की खपत को भी नियंत्रित करने की आवश्यकता है, इससे कच्चे तेल के आयात को कम किया जा सकेगा। भारतीय नागरिकों द्वारा अपने दो पहिया एवं चार पहिया वाहनों के स्थान पर पब्लिक ट्रान्स्पोर्ट के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है।

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