Bihar Education Minister MithileshTiwari was welcomed at the Sanskrit University and held a key discussion with Vice-Chancellor Prof. MurlimanoharPathakon the development of Sanskrit.

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Delhi : A significant and meaningful courtesy meeting was held in New Delhi, focusing on the preservation, promotion, and global resurgence of the Sanskrit language.On this occasion, Bihar’s Education Minister, ShrMithileshTiwarii, paid a courtesy visit to the Hon’ble Vice-Chancellor of ShriLalBahadur National Sanskrit University, New Delhi, Professor MuraliManoharPathak. The distinguished presence of the University’s Registrar, Professor Pawan Kumar Sharma, added further formality, structure, and purpose to the meeting.The high-level interaction provided an opportunity for in-depth deliberations on the holistic development of the Sanskrit language, its current academic status, and future prospects. Both sides widely concurred that Sanskrit is not merely an ancient language, but a foundational pillar of Indian civilization, culture, philosophy, and its rich knowledge tradition. It was therefore emphasized that its study, teaching, and research must be advanced in a more effective and integrated manner within the modern education system.During the meeting, detailed discussions were also held regarding the expansion of Sanskrit education in the state of Bihar. The Education Minister informed that the state government is consistently working towards strengthening Sanskrit schools and colleges, appointing qualified teachers, and fostering interest in Sanskrit among students. He further stated that if Sanskrit is integrated with modern technology, digital learning methodologies, and employment-oriented curricula, it could become more relevant and appealing to the younger generation.Vice-Chancellor Professor MuraliManoharPathak presented a comprehensive account of the university’s academic achievements, research initiatives, and Sanskrit promotion programmes being conducted at both national and international levels. He underlined that the university’s objective is not confined to traditional education alone, but extends to making Sanskrit relevant in contemporary contexts. To this end, continuous expansion is being undertaken in digital resources, online courses, and global academic collaborations.

Registrar Professor Pawan Kumar Sharma outlined the administrative and academic framework of the university, highlighting ongoing efforts to make its functioning more transparent, efficient, and outcome-oriented. He also noted that continuous innovation and reformative measures are being adopted to ensure the delivery of quality education to students.The discussion further explored the prospects of promoting the Indian knowledge tradition on the global stage alongside the preservation of Sanskrit. There was a shared view that Sanskrit is not merely a heritage of the past, but a vibrant intellectual, cultural, and philosophical asset for the future.In conclusion, the meeting proved to be highly successful, productive, and inspiring, infusing new direction and positive momentum into efforts for the development of the Sanskrit language.The Assistant Engineer of the University, Ajani Rai, was also present on the occasion.

नरेंद्र मोदी कार्यकाल के उत्कृष्ट 12 वर्ष

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सर्वेश कुमार सिंह

दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने आज देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना दिया। उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का 4398 दिन के कार्यकाल का रिकॉर्ड तोड़ा है। इसके साथ ही उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल को 12 वर्ष 15 दिन आज पूरे हुए। श्री मोदी ने 26 मई 2014 को भाजपा नीत राजग गठबंधन के नेता के रूप में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। दूसरी बार 30 मई 2019 और तीसरी बार 9 जून 2024 को शपथ ली।

मोदी ने अपने 12 साल के कार्यकाल में भाजपा के मुख्य और चिरप्रतीक्षित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया और उन मांगों को पूरा किया। इसमें सबसे प्रमुख श्रीरामजंभुमि मंदिर निर्माण, कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति शामिल है। एक और ऐसा मुद्दा और मांग है जिसे भाजपा और संघ विचार परिवार उठाता रहा है, वह है देश में समान नागरिक संहिता लागू करना। ये अभी कुछ राज्यों में लागू हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय कानून की आवश्यकता है।

अगर हम मोदी जी के कार्यकाल को सफलता और विकास के पैमाने पर मापने की कोशिश करे तो ये उत्कृष्ट कार्यकाल है। किसी भी देश की प्रगति उसकी तीन तरह की सुरक्षा पर निर्भर करती है। सामाजिक,आर्थिक सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और बाहरी सुरक्षा। मोदी सरकार इन तीनों में खरी साबित हुई है। सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार ने जो काम किए है वे इससे पहले की किसी सरकार ने ना तो सोचे और ना ही क्रियान्वित हुए। समाज के तीनों वर्गों किसान और मजदूर, व्यापारी और उद्योग तथा सेवा क्षेत्र सभी के लिए मोदी सरकार ने कोई न कोई नई और लाभकारी योजना शुरू की है। इसमें किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, गांव में हर घर शौचालय, और हर नल से पानी, संपूर्ण विद्युतीकरण जैसी योजनाओं को धरातल पर उतारा है। किसान सम्मान निधि के रूप में गत 12 साल में 4 लाख 30 हजार करोड़ रुपए वितरित हुए है। लगभग 9 करोड़ किसान परिवार लाभान्वित हो रहे है।

व्यापारियों के लिए मुद्रा ऋण, जीएसटी का सरलीकरण, आयकर में छूट की सीमा बढ़ाना शामिल है। विश्व व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नए विश्व बाजार की खोज कर निर्यात को बढ़ाया गया है। सेवा क्षेत्र सर्वाधिक प्रगति वाला क्षेत्र बना हुआ है। इसमें यूपीआई लेनदेन ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। आज हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 345 लाख करोड़ के आसपास है,जोकि वर्ष 2014 में 180 लाख करोड़ था। गत वित्तीय वर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही है। विदेशी मुद्रा भंडार जून के प्रथम सप्ताह में 682 अरब डॉलर है, ये 2014 में 304 अरब डॉलर था। मोदी सरकार के 12 साल में स्वर्ण भंडार भी दो गुना हो गया है। वर्तमान स्वर्ण भंडार 880 मीट्रिक टन है जोकि 2914 में 557 मीट्रिक टन था।

आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भारत के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां थीं। एक जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पर नियंत्रण और दूसरी माओवादी उग्रवादियों नक्सलियों का खत्मा। दोनों मोर्चों पर मोदी सरकार ने गृहमंत्री अमित शाह के कुशल नेतृत्व को प्रोत्साहित कर और उन्हें खुली छूट देकर निर्णायक प्रहार कर दिया। जम्मू कश्मीर में कानून व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है। वहां अब सेना और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी नहीं होती बल्कि वहां अब वंदे भारत जैसी आधुनिक रेल संचालित हो रही है। नक्सलवाद की समाप्ति एक दिवास्वप्न माना जाता था। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह ने तो एक बार कह दिया था कि नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन उनकी सरकार कुछ कर नहीं सकी। मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षाबलों के संयुक्त अभियान, अमित शाह की सफल रणनीति से आज देश नक्सलवाद मुक्त हो गया है। अमित शाह ने तारीख तय करके इस समस्या को जड़ मूल से उखाड़ फेंका। उन्होंने 31 मार्च 2026 की तारीख तय की थी नक्सलवाद की समाप्ति के लिए और इसी तारीख को संसद में नक्सलमुक्त भारत होने की घोषणा कर दी। पाक प्रायोजित और आईएसआई से संचालित नेटवर्क को भी मोदी सरकार ने तोड़ दिया है। बाहरी सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की ताकत को मई 2025 में सम्पूर्ण विश्व ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में देख लिया। आज हम रक्षा क्षेत्र में आयातक देश से निर्यातक देश बन गए है। हम ब्रह्मोस मिसाइल और तेजस विमान निर्यात करने की तैयारी में है।

मोदी है तो मुमकिन है, ये नारा अब 2047 में विकसित भारत के स्वप्न को भी साकार करेगा। हम अगले दो वित्तीय वर्ष में यानी कि लगभग 2030 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। सामाजिक,आर्थिक, और आंतरिक सुरक्षा के लिए देश को एक समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून की भी सख्त आवश्यकता है। ये उम्मीद भी मोदी जी ही निकट भविष्य में पूरी करेंगे।

आरएसएस और शाखा: अनुशासन, चरित्र तथा राष्ट्र-निर्माण की अमर परंपरा

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दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) आधुनिक भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथा सांस्कृतिक आंदोलनों में से एक है। विश्व का सबसे बड़ा स्वैच्छिक संगठन होने के नाते यह न केवल लाखों व्यक्तियों के जीवन को आकार देता है, बल्कि राष्ट्र के सामूहिक चरित्र को मजबूत बनाने में भी निरंतर योगदान देता है। आज जब युवा पीढ़ी आधुनिक चुनौतियों-मानसिक तनाव, मूल्यहीनता और सामाजिक विखंडन-से जूझ रही है, तब आरएसएस की शाखा पुनः प्रासंगिक हो उठती है। यह कोई राजनीतिक मंच नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण का एक सजीव विद्यालय है, जहां नियमित एक घंटे की गतिविधियां व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति समर्पित बनाने का कार्य करती हैं।

आरएसएस की विचारधारा व्यक्ति निर्माण को राष्ट्र निर्माण का आधार मानती है। इस दृष्टिकोण में शाखा केंद्रीय भूमिका निभाती है। यहां शारीरिक व्यायाम, बौद्धिक चर्चा और आध्यात्मिक प्रेरणा का सामंजस्यपूर्ण मेल मिलता है। स्वयंसेवक बिना किसी भेदभाव के एकत्र होते हैं और अनुशासन की कठोर लेकिन प्रेरणादायी शिक्षा ग्रहण करते हैं।

आरएसएस की स्थापना और विकास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के शुभ अवसर पर नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन भारत में हिंदू समाज संगठनहीनता और साम्प्रदायिक विभाजन की समस्या से ग्रस्त था। डॉक्टर जी ने महसूस किया कि स्वाधीनता के बाद भी यदि समाज में चरित्र और अनुशासन की कमी रही तो राष्ट्र सच्ची प्रगति नहीं कर सकेगा। इसलिए उन्होंने ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ का सूत्र दिया।

आरएसएस की पहली नियमित दैनिक शाखा 28 मई 1926 को नागपुर के मोहितेबाड़ा मैदान में प्रारंभ हुई। शुरू में मात्र 15-20 युवाओं का समूह था, जो आज लाखों स्वयंसेवकों तक फैल चुका है। संगठन का नाम 17 अप्रैल 1926 को तय हुआ। आरएसएस ने अपनी यात्रा में कई चुनौतियों का सामना किया। 1948, 1975 और 1992 में तीन बार प्रतिबंध लगाए गए, परंतु प्रत्येक बार यह और अधिक मजबूती के साथ उभरा। 1975 के आपातकाल में भूमिगत रहकर लोकतंत्र की रक्षा में इसकी भूमिका उल्लेखनीय रही।

1940 में डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) दूसरे सरसंघचालक बने। उनके 33 वर्ष के कार्यकाल में आरएसएस अखिल भारतीय स्तर का संगठन बन गया। बाद में बालासाहेब देवरस, राजेंद्र सिंह, के.एस. सुदर्शन और वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आज आरएसएस 60,000 से अधिक दैनिक शाखाओं के माध्यम से कार्य करता है और 36 से अधिक सहयोगी संगठनों का मार्गदर्शन करता है।

शाखा: समग्र व्यक्तित्व विकास का अनुपम केंद्र

शाखा आरएसएस की मूल इकाई है। यह रोजाना एक निश्चित समय और स्थान पर आयोजित होती है, जहां स्वयंसेवक लगभग एक घंटे तक विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते हैं। शाखा का कार्यक्रम अत्यंत व्यवस्थित होता है। आरंभ में वार्म-अप के रूप में जॉगिंग, फिर सूर्यनमस्कार, योगासन, देशी खेल जैसे कबड्डी, खो-खो और दंड-बैठक। इसके बाद बौद्धिक सत्र में संस्कृत श्लोकों का पाठ, देशभक्ति गीत तथा समसामयिक विषयों पर चर्चा होती है। समापन ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ प्रार्थना और ‘भारतमाता की जय’ के साथ होता है।

यह एक घंटा मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं है। इसमें अनुशासन, टीम वर्क, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रप्रेम की भावना का विकास होता है। शाखा में सभी वर्गों के लोग बिना जाति, धर्म या आर्थिक भेद के सम्मिलित होते हैं। यही सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। शाखा के माध्यम से स्वयंसेवक न केवल अपने व्यक्तिगत चरित्र को मजबूत करते हैं, बल्कि आपदा प्रबंधन, सामाजिक सेवा और सांस्कृतिक जागरण में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

संघ शिक्षा वर्ग (अभ्यास वर्ग) शाखा से आगे का प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। इन शिविरों में स्वयंसेवकों को गहन बौद्धिक और शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता है। पहला बड़ा शिविर 1929 में नागपुर में आयोजित हुआ था। आज देशभर में ये शिविर नियमित रूप से लगाए जाते हैं।

भगवा ध्वज: शाश्वत गुरु और प्रेरणा का प्रतीक

आरएसएस में भगवा ध्वज को गुरु का स्थान दिया गया है। डॉ. हेडगेवार ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि व्यक्ति में सीमाएं होती हैं, जबकि ध्वज शाश्वत मूल्यों-त्याग, शौर्य, ज्ञान और राष्ट्रभक्ति-का प्रतीक है। हर वर्ष गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) को भगवा ध्वज की पूजा ‘गुरु पूजा’ के रूप में की जाती है। यह परंपरा 1928 से निरंतर चली आ रही है।

भगवा ध्वज भारतीय इतिहास से गहरा जुड़ा है। वैदिक काल से लेकर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह और 1857 के क्रांतिकारियों तक यह शौर्य का प्रतीक रहा है। शाखा में प्रतिदिन इसका सम्मान किया जाता है। प्रार्थना संस्कृत में होती है, जो प्राचीन ज्ञान और स्मृति शक्ति को बढ़ावा देती है। आधुनिक शोध भी संस्कृत मंत्रों के नियमित जाप से संज्ञानात्मक क्षमता में वृद्धि की पुष्टि करते हैं।

प्रचारक: निःस्वार्थ त्याग की मिसाल

आरएसएस की सबसे बड़ी शक्ति उसके प्रचारक हैं। ये पूर्णकालिक कार्यकर्ता परिवार, वैयक्तिक सुख और आर्थिक लाभ त्यागकर पूरे समय संगठन को समर्पित हो जाते हैं। पहले प्रचारकों में दादाराव परमार्थ, बाबासाहेब आप्टे आदि शामिल थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लंबे समय तक प्रचारक रहे।

प्रचारकों का जीवन सादगी, अनुशासन और सेवा का आदर्श प्रस्तुत करता है। वे देश के कोने-कोने में जाकर शाखाएं प्रारंभ करते हैं, युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं और सामाजिक समरसता का कार्य करते हैं। आज हजारों प्रचारक इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके त्याग के कारण ही आरएसएस इतने बड़े पैमाने पर विस्तारित हो सका है।

अनुशासन: संघ की आत्मा

आरएसएस में अनुशासन कोई बाहरी दबाव नहीं, बल्कि आंतरिक संस्कार है। शाखा में सीटी बजते ही स्वयंसेवक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। निर्देशों का पालन, समय की पाबंदी और सामूहिक कार्य करने की क्षमता विकसित होती है। यह अनुशासन जीवन के हर क्षेत्र-शिक्षा, करियर, सामाजिक दायित्व-में सहायक सिद्ध होता है।

संघ का दर्शन ‘एकात्म मानवदर्शन’ पर आधारित है। यह हिंदुत्व को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में देखता है, जो समावेशी और बहुलवादी है। विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना इसका प्रमुख उद्देश्य है।

संघ का सेवा कार्य और सामाजिक प्रभाव

आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन देशभर में दो लाख से अधिक सेवा परियोजनाएं चला रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण और जनजातीय कल्याण इनके प्रमुख क्षेत्र हैं। प्राकृतिक आपदाओं के समय स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचते हैं। कोविड महामारी में भी संघ के कार्यकर्ताओं ने व्यापक सेवा प्रदान की।

राम जन्मभूमि आंदोलन जैसे सांस्कृतिक आंदोलनों में भी संघ की भूमिका निर्णायक रही, जिसका परिणाम अयोध्या में भव्य राम मंदिर के रूप में सामने आया।

युवाओं के लिए शाखा की प्रासंगिकता

आज का युवा उच्च शिक्षा और करियर की दौड़ में व्यस्त है। लेकिन जीवन का अर्थ केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रह सकता। शाखा में शामिल होकर युवा अनुशासन सीखते हैं, राष्ट्र के प्रति समर्पण विकसित करते हैं और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा पाते हैं। यहां मिलने वाला ज्ञान और अनुभव उन्हें बेहतर नागरिक, बेहतर नेता और बेहतर मनुष्य बनाता है।

अनेक अभिभावक अपने बच्चों को शाखा में भेजते हैं क्योंकि वे वहां सकारात्मक परिवर्तन देखते हैं। शाखा युवाओं को स्क्रीन से हटाकर वास्तविक दुनिया से जोड़ती है। खेल, चर्चा और सामूहिक गतिविधियां उन्हें नई ऊर्जा प्रदान करती हैं।

शाखा की ओर एक कदम

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा कोई पुरानी रीति नहीं, बल्कि चिरंतन मूल्यों का सजीव रूप है। यहां भगवा ध्वज के नीचे खड़े होकर, प्रार्थना में शामिल होकर और अनुशासन में भाग लेकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है।

जो युवा राष्ट्र के प्रति कुछ करने की इच्छा रखते हैं, उनके लिए शाखा सर्वोत्तम प्रारंभिक बिंदु है। नजदीकी शाखा में एक बार अवश्य जाएं। एक घंटे का निवेश पूरे जीवन को परिवर्तित कर सकता है।

आरएसएस का संदेश स्पष्ट है-राष्ट्र प्रथम। इस आदर्श को अपनाकर हम एक मजबूत, समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से जागृत भारत का निर्माण कर सकते हैं।

एक टिपिकल शाखा का शेड्यूल (लगभग 60 मिनट):

5 मिनट: वार्म-अप – जॉगिंग।
30-40 मिनट: शारीरिक गतिविधियां – सूर्यनमस्कार, योग, देशी खेल (कबड्डी, खो-खो), दंड-बैठक या लाठी (दंड युद्ध)।
10-15 मिनट: बौद्धिक सत्र – संस्कृत श्लोक, देशभक्ति गीत, समसामयिक मुद्दों पर चर्चा।
5 मिनट: समापन – सामूहिक प्रार्थना ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ और ‘भारतमाता की जय’।
सब कुछ भगवा ध्वज के सामने, पूरी अनुशासन में। सीटी बजते ही लाइन बन जाती है। यह Gen Z के लिए स्क्रीन टाइम से ब्रेक और रियल वर्ल्ड स्किल्स (टीमवर्क, फिटनेस, पब्लिक स्पीकिंग) का कॉम्बिनेशन है।

शाखा सिर्फ व्यायाम नहीं, बल्कि समग्र व्यक्तित्व विकास का माध्यम है। यहां अनुशासन आदत बन जाता है, राष्ट्र प्रथम की भावना जागती है और सामाजिक समरसता (जाति-धर्म से ऊपर) सीखी जाती है।

प्रचारक: वो त्याग जो प्रेरित करता है

आरएसएस की रीढ़ हैं प्रचारक – पूर्णकालिक कार्यकर्ता। ये परिवार, नौकरी और व्यक्तिगत जीवन त्यागकर पूरे समय संघ के लिए समर्पित हो जाते हैं।

पहले प्रचारकों में दादाराव परमार्थ, बाबासाहेब आप्टे जैसे नाम शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लंबे समय तक प्रचारक रहे। इनका जीवन सादगी, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा का उदाहरण है। Gen Z के लिए यह मैसेज है – सक्सेस सिर्फ मनी या फेम नहीं, बल्कि बड़े उद्देश्य के लिए त्याग भी है।

आज हजारों प्रचारक देशभर में काम कर रहे हैं। उनके त्याग से ही 36+ सहयोगी संगठन (ABVP, BMS, VHP आदि) चले।

Gen Z के लिए क्यों मायने रखती है शाखा?

मेंटल स्ट्रेंथ: स्ट्रेस और डिप्रेशन के दौर में अनुशासन और टीमवर्क।
स्किल्स: लीडरशिप, कम्युनिकेशन, प्रॉब्लम सॉल्विंग।
परपज: सिर्फ करियर नहीं, राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदारी।
फन फैक्टर: खेल, गाने, नई दोस्ती – सब कुछ।
नेटवर्क: पूरे देश में साथी।
अभिभावक बच्चों को इसलिए भेजते हैं क्योंकि वे बदलाव खुद महसूस करते हैं।

शाखा – Gen Z का हिडन जिम

आरएसएस की शाखा कोई पुरानी रस्म नहीं, बल्कि लाइफ हैक है। यहां स्वयंसेवक बनकर आप अनुशासित, राष्ट्रप्रेमी और समर्थ बनते हैं। ‘राष्ट्र प्रथम’ का सिद्धांत जीवन को सरल और अर्थपूर्ण बना देता है।

अगर आप भी सोच रहे हो ‘कुछ करना है’, तो नजदीकी शाखा ढूंढो। बस एक बार जाओ। एक घंटा काफी है, फर्क महसूस करने के लिए।

एक बार जाएं शाखा

कल्पना कीजिए – सुबह या शाम एक घंटा, भगवा ध्वज के नीचे, साथियों के साथ। शरीर फिट, दिमाग शार्प, दिल राष्ट्र से जुड़ा।

आरएसएस कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन है। यहां आकर आप खुद को बदल सकते हैं और समाज को भी।

शाखा का एक घंटा आपकी जिंदगी का सबसे पावरफुल इन्वेस्टमेंट हो सकता है। Gen Z, अगर ‘कुछ करना है’ सोच रहे हो, तो नजदीकी शाखा ढूंढो। बस एक बार जाकर देखो।

PEC condemns murder of Balochistan scribe Lala Israfil Khan

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Nava Thakuria

Geneva: Condemning the murder of senior journalist Lala Israfil Khan in Musakhel locality of Balochistan, the global media safety and rights body Press Emblem Campaign (PEC) demands a transparent probe so that the assailants can be booked under the law. Lala Israfil (35), who contributed for Hum news channel and other media outlets, was shot dead by the miscreants on Saturday evening. Meanwhile, the Rural Media Network Pakistan and Balochistan Union of Journalists strongly condemned the killing and called on authorities to conduct an immediate investigation so that the motives behind the murder can be uncovered.

“We in PEC strongly denounce the murder of Lala Israfil Khan, who becomes the first journo-victim this year in Pakistan and globally 34th media professionals to be assassinated. Balochistan province government chief Mir Sarfraz Bugti must look into the matter and bring all the culprits to justice,” said Blaise Lempen, president of PEC (pressemblem.ch/pec-news), adding that the Pakistani regime in Islamabad should investigate all assault cases against the media workers as raised by the Pakistan Press Foundation and break the chain of immunity enjoyed by the culprits while targeting the journalists in the south Asian nation.

PEC’s south and southeast Asia representative Nava Thakuria reported that victim Lala Israfil was a fearless journalist, who often highlighted the public issues with accountability. Not only as a journalist, but he was very popular in his locality as a dignified individual too. Last year, the Muslim majority country of over 257 million witnessed the killing of AD Shar (resident of Sindh province), Abdul Latif (Balochistan), Syed Mohammed Shah (Sindh), Imtiaz Mir (Sindh) and Tufail Rind (Sindh).

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