विदेशी शासकों की अपनी-अपनी दृष्टि

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सुषमा जुगरान ध्यानी

दिल्ली । हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी यहां हैं भाई-भाई’ का सैद्धांतिक उद्घोष हमारे यहां सुनने और बोलने में जितना कर्णप्रिय लगता है, व्यावहारिक स्तर पर इसमें संतुलन बनाये रखने की चुनौती उतनी ही दुष्कर है। आज देश का सबसे बड़ा सामाजिक विमर्श अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के मुद्दे पर आकर टिक जाता है, सारा राजनीतिक परिदृश्य इसके इर्द-गिर्द उलझता दिखाई देता है। हालांकि अल्पसंख्यकों में गिने जाने वाले सिख, जैन और बौद्ध धर्मावलंबी सनातन धर्म की निर्गुण या ज्ञानाश्रयी शाखा के ही अंग हैं जो साकार ब्रह्म की अवधारणा के तहत मूर्ति पूजा और कर्मकांड का विरोध करते हुए निराकार ब्रह्म के रूप में एक परम सत्ता को इस चराचर जगत का पालनहार मानते हैं। इस लिहाज से देखें तो अपने देश में मुख्यतः हिन्दू, मुसलमान और ईसाई ही भिन्न-भिन्न धर्मावलंबी हुए। इनमें बहुसंख्यक हैं सनातनधर्मी हिन्दू जो भारत भूमि को अपनी माता मानते हैं, अपना मूल देश मानते हैं जबकि अल्पसंख्यक माने जाने वाले मुसलमान और ईसाई दुनिया के दूसरे हिस्सों से यहां आकर अपने धर्म के विस्तार के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहे।

भारतवर्ष के हजारों साल पुराने सनातन धर्म को इस्लाम और क्रिश्चियनिटी से बचाये रखने की चुनौती अब से करीब हजार ग्यारह सौ साल पहले मिलनी शुरू हो गई थी जब चंगेज खां, तैमूर लंग, अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद गोरी और मोहम्मद गजनवी जैसे आक्रांताओं द्वारा पहले यहां लूटपाट और मार-काट की जाती रही और अंततः मुगल बादशाहों के रूप में इस्लाम धर्मावलंबियों का साम्राज्य ही स्थापित हो गया। उसके बाद 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड की ‘ईस्ट इंडिया नाम कंपनी’ व्यापार के उद्देश्य से भारत आयी तो उसके पीछे-पीछे अंग्रेजी हुकूमत भी यहां पैर पसारने लगी। मिशनरी कहलाने वाले अंग्रजों ने यहां मुगलों के अत्याचारी शासन के साथ-साथ राजे रजवाड़ों की आपसी कलह और अस्थिरता का फायदा उठा धीरे-धीरे मुगलों को परास्त कर कभी फूट डालो और राज करो तो कहीं हड़प नीति जैसे षड्यंत्र कर कलकत्ता से शुरू होकर दिल्ली तक अपना यूनियन जैक लहरा दिया। कालांतर में अंग्रजों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को परास्त कर रंगून जेल में कैद कर मुगल साम्राज्य का खात्मा कर दिया और यहां की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संस्कृति को अपने मन मुताबिक ढालने का यत्न करने लगे पर अंततः उन्हें भी देश छोड़कर जाना पड़ा। हां, इन कई सौ सालों में इस्लाम और क्रिश्चियनिटी ने भी यहां अपनी अनिवार्य उपस्थिति दर्ज कर ली और अंग्रेजी हुकूमत से आजादी के बाद देश में संविधान सम्मत धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सभी धर्म और जातियों के अधिकार और कर्त्तव्य तय हो गये।
देश के दो मुख्य अल्पसंख्यक समुदायों मुसलमान और ईसाई धर्मावलंबियों की तुलना करें तो दोनों की प्रचार शैली और आचार व्यवहार में काफी फर्क दिखता है जिसके कारण दोनों के प्रति बहुसंख्यक हिन्दू धर्मावलंबियों की राय कई मायनों में अलग अलग भी हो जाती है।

अंग्रेजों ने भी भारत पर करीब दो-ढाई सौ साल एकछत्र शासन किया। बतौर मिशनरी उन्होंने अपने ईसाई धर्म का खूब प्रचार प्रसार किया, लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया और बड़ी संख्या में लोगों का धर्मांतरण भी करवाया। जाहिर है, इसके लिए उनके द्वारा चर्च या गिरजाघरों का भी बड़ी संख्या में निर्माण हुआ। ईसाई बहुल गोवा जैसे शहरों में तो ऐतिहासिक चर्चों के अलावा गली-गली छोटे-छोटे चर्च- जिन्हें चैपल कहा जाता है ऐसे ही स्थापित मिलेंगे जैसे गांव कस्बों में हिंदू देवी-देवताओं के छोटे-बड़े मंदिर। लेकिन मेरी जानकारी में देश में अब तक कहीं भी ऐसा कोई विवाद खड़ा नहीं दिखा कि फलां गिरजाघर की जगह कोई मंदिर था और उसकी दावेदारी के लिए इन दो धार्मिक समुदायों के बीच अदालतों में मामले चल रहे हों। यहां तक कि गिरजाघर और मंदिर कहीं अपवाद स्वरूप ही आसपास होगें। यानी अंग्रजों ने देश के तमाम हिस्सों में चर्च तो खूब बनाये लेकिन मंदिर परिसरों की भूमि से बिल्कुल अलग। एक सच यह भी है कि अंग्रजों ने गरीब, दलित, वंचित और शोषितों को धन का, समानता का और शिक्षा का प्रलोभन देकर खूब धर्म परिवर्तन कराया। जबकि इसके विपरीत माना जाता है कि मध्य काल में मुगल शासकों ने डरा-धमकाकर और जबरिया हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराया। ‘मार बांधकर मुसलमान बनाना’ जैसी कहावत भी शायद इसी आधार पर प्रचलित हुई होगी। सच यह है उपनिवेशवादी अंग्रेज जानते थे कि उन्हें यहां लंबा नहीं रहना है इसलिए उन्होंने यहां की धार्मिक आस्था के साथ कोई खिलवाड़ न करते हुए स्वेच्छा से लोगों को धर्म परिवर्तन का प्रलोभन दिया। इधर हजारों साल पुराना सनातन धर्म अपनी बहुत सी रूढ़िवादी सामाजिक परंपराओं और भेदभावपूर्ण वर्ण व्यवस्था के कारण कई धाराओं में विभक्त हो रहा था और जनमानस के बीच इसे लेकर एक असंतोष और आक्रोश का भाव भी व्याप्त था। ईसाई मिशनरियों ने भारतीय समाज की इसी दुखती नब्ज को टटोलते हुए ऐसे वंचित लोगों को शिक्षा और समानता का अधिकार देने का वादा किया जिसे अनेक लोगों ने सहर्ष स्वीकार किया। इसके उलट मुसलमान पहले आक्रमणकारी और आक्रांता के रूप में और कालांतर में सल्तनत काल से शुरू होकर अंत में मुगल वंश तक कई सौ साल इस देश पर शासन करते हुए इस कदर रच बस गये कि उन्हें इसका अंदाजा ही नहीं रहा कि भविष्य में कोई उनके शासन की भी नींव हिला सकता है। इसीलिए जनता को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करने के साथ ही इस्लाम के विस्तार के लिए उन्होंने अधिकतर मंदिरों के निकट ही मस्जिदें बनानी शुरू कर दीं। कई मामलों में गर्भगृह पर ज्यादा ध्यान न दे मंदिरों को ऊपर-ऊपर ध्वस्त कर मस्जिद बनवा ली। आज की वैज्ञानिक प्रगति की कल्पना भी पांच छह सौ साल पहले भला किसने की होगी कि एंथ्रोपोलॉजी के माध्यम से नृतृत्वशास्त्रियों द्वारा सौ दो सौ क्या, हजारों साल पुराने अवशेष और कालखंड का पता लगाना भी संभव होगा। अन्यथा बाबर द्वारा अयोध्या के राममंदिर या धार की भोजशाला जैसे सनातन धर्म के आस्था केंद्रों को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के बाद ही तो मस्जिदें निर्मित होतीं। ऐसे में आज की न्याय व्यवस्था के आधार पर अदालतों द्वारा साक्ष्य के अभाव में सनानतधर्मियों के मंदिर और शिक्षा केन्द्रों का अस्तित्व भला कैसे लौटाया सकता था!

संघ राष्ट्र के परमवैभव के लिए उद्भूत ‘वाक्’ है: श्री जे. नंदकुमार

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जलज अनुपम

​दिल्ली विश्वविद्यालय के कालकाजी स्थित देशबंधु कॉलेज में सनातन लाइफ स्टाइल फाउंडेशन तथा प्रज्ञा प्रवाह, दिल्ली प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘राष्ट्रवाक्- 2026’ का भव्य आयोजन दिनांक 07 जून, 2026 को संपन्न हुआ। साहित्य, कला, संस्कृति और राष्ट्रचेतना को समर्पित इस कार्यक्रम में देशभर के शिक्षाविदों, साहित्यकारों, कलाकारों और चिंतकों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ वन्दे मातरम्, दीप प्रज्ज्वलन तथा अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ।

​उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात लेखक व विचारक तथा प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक,श्री जे. नंदकुमार जी ने अपने मुख्य उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस विराट राष्ट्र के परमवैभव के लिए उद्भूत परा, पश्यन्ती, मध्यमा व वैखरी के समस्त सामर्थ्यों को धारण करने वाला ‘वाक्’ है। उन्होंने कहा कि संघ ने अपने सौ वर्षों की यात्रा में समाज में चरित्र निर्माण और व्यक्ति निर्माण का निरंतर कार्य किया है। उन्होंने बताया कि आज भी संघ समाज में व्याप्त विभेदों को समाप्त करने और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ बनाने के लिए ‘पंच परिवर्तन’ जैसे व्यापक कार्यक्रमों का संचालन कर रहा है। उन्होंने राष्ट्रजीवन में सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकात्मता को समय की आवश्यकता बताया।
​उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता इंडिया हैबिटेट सेंटर के माननीय निदेशक, प्रो. के. जी. सुरेश जी ने किया। अपने वक्तव्य में श्री सुरेश जी ने कहा कि इस राष्ट्र के जागरण व उत्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अतुलनीय भूमिका रही है। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथियों के रूप में श्री कमलेश कमल, प्रो. प्रवीण कुमार तिवारी, श्री राजीव रंजन प्रसाद, श्री भगवंत अनमोल, डॉ. दिवाकर राय, श्री राज शर्मा, प्रो. ज्योत्सना तिवारी, श्री आशीष कुमार अंशु, श्रीमती शशि प्रभा तिवारी, श्री राहुल चौधरी रहे।

​इस अवसर पर श्री नन्दकुमार जी, प्रो. के. जी. सुरेश जी व अन्य अतिथियों द्वारा ‘राष्ट्रवाक्’ पत्रिका के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रकाशित नवीन विशेषांक का भी विमोचन किया गया। पत्रिका का यह विशेषांक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘राष्ट्रसेवा के 100 वर्षों’ को समर्पित है। अतिथियों ने इसे राष्ट्रचिंतन और वैचारिक विमर्श के लिए महत्वपूर्ण प्रकाशन बताया।

​कार्यक्रम के सम्मान सत्र में पाँच विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले साहित्यकारों, शिक्षाविदों और कलाकारों को श्री जे. नंदकुमार जी के करकमलों द्वारासम्मानित किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने के लिए प्रो. के. जी. सुरेश जी को पण्डित विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान, अभिनय के क्षेत्र में योगदान के लिए अभिनेता श्री राज शर्मा को देविका रानी स्मृति कला सम्मान, डॉ. दिवाकर राय को चंपारण सत्याग्रह पर आधारित उनके प्रसिद्ध नाटक ‘नील नायक’ के लिए जयशंकर प्रसाद स्मृति साहित्य सम्मान, प्रख्यात लेखक श्री भगवंत अनमोल को 1857 के स्वाधीनता संग्राम पर आधारित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बावनी इमली’ के लिए वैद्य गुरुदत्त स्मृति साहित्य सम्मान, तथा श्री राजीव रंजन प्रसाद एवं श्रीमती रचना नायडू को संयुक्त रूप से माओवाद के अनकहे व अनजाने पक्ष पर आधारित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ के लिए धर्मपाल स्मृति कथेत्तर साहित्य सम्मान प्रदान किया गया।

“स्वतंत्रोत्तर हिन्दी साहित्य में भारतबोध” विषयक चिंतन सत्र में पीयूष द्विवेदी एवं राजीव रंजन प्रसाद ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद रचित भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और आत्मगौरव से जुड़े साहित्य को लंबे समय तक अपेक्षित महत्व नहीं मिला, किंतु अब भारतबोध और भारतीय दृष्टि पर आधारित साहित्य राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में तेजी से उभर रहा है।

​बाद का चिंतन सत्र “समकालीन कला में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम वैचारिक एजेंडा” विषय पर केंद्रित रहा। इस सत्र में प्रो. प्रवीण कुमार तिवारी, श्रीमती शशिप्रभा तिवारी तथा श्री कमलेश कमल ने अपने विचार रखते हुए कला की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और वैचारिक प्रतिबद्धता के विभिन्न आयामों पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि कला समाज का दर्पण होने के साथ-साथ समाज को दिशा देने का माध्यम भी है, इसलिए उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। सत्र का संचालन राहुल चौधरी ने किया।

​चिंतन सत्र के पश्चात राष्ट्रीय कवि सम्मेलन भी सम्पन्न हुआ, जिसमें श्री सर्वेश तिवारी श्रीमुख, श्री ज्ञान प्रकाश आकुल, सुश्री प्रियंका राय, श्री दास आरोही आनंद, श्री ओम शर्मा ‘ओम’, श्री नित्यानंद शुक्ल, सुश्री ज्योतिमा शुक्ल, सुश्री मोहिनी राय, श्री रजनीश राय, श्री निर्देश प्रजापति, श्री प्रशांत सौरभ, श्री सूर्यप्रकाश तथा श्री अवनीश जैसे लेखक व कवियों ने राष्ट्र, संस्कृति, समाज और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित अपनी रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने भरपूर सराहा।

​कार्यक्रम के अंत में सनातन लाइफ स्टाइल फाउंडेशन के संस्थापक जलज कुमार अनुपम ने कहा कि “राष्ट्रवाक् केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का एक उभरता हुआ मंच है। हमारा लक्ष्य ‘राष्ट्रवाक्’ को एक नेशनल डायलॉग फोरम के रूप में विकसित करना है, जहाँ राष्ट्रहित के विषयों पर गंभीर और सकारात्मक संवाद हो सके। प्रज्ञा प्रवाह, दिल्ली प्रान्त के सहयोग से यह मंच भारतीय दृष्टि और राष्ट्रीय विचारों को अभिव्यक्ति देने के साथ-साथ ऐसे लेखकों, कलाकारों और चिंतकों को भी प्रोत्साहित करेगा, जो भारत-केंद्रित वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।”

​कार्यक्रम का संचालन सुश्री नम्रता वर्मा ने तथाअतिथियों का स्वागत ‘राष्ट्रवाक् पत्रिका’ के संपादक श्री कमलेश कमल ने किया। कार्यक्रम के समापन पर प्रो. प्रवीण कुमार तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन व विमर्श मानसिक कॉक्रोचत्व से मुक्ति के लिए अत्यंत प्रभावी औषधि के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

​इस आयोजन हेतु दिल्ली विश्वविद्यालय के आचार्य, प्रो. रजनी रंजन सिंह, डॉ. ओम प्रकाश, जय प्रकाश, पवन सिंह, रोहित राय, सागर चौबे, उद्भव सिंह, डॉ. रीता शर्मा, हेमंत सहित प्रज्ञा प्रवाह, दिल्ली प्रांत के कई कार्यकर्ताओं तथा देशबंधु कॉलेज के प्राचार्य प्रो. राजेंद्र पांडेय जी तथा निदेशक, IQAC, प्रो. आनंद कुमार जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हिन्दी को कुचलकर आगे बढ़ता हुआ हिन्दी मीडिया

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प्रवीण जैन

दिल्ली । के बाद से इन 24 वर्षों में बहुत कुछ परिवर्तित हो गया है, भारत शासन ने इसी वर्ष प्रिंट मीडिया में सबसे पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी थी और एक प्रकार से हिन्दी समाचार पत्रों व हिन्दी के समाचार चैनलों में रोमन लिपि व अंग्रेजी शब्दावली को थोपने का शुभारंभ करने की अनुमति भी दी थी, यह वर्ष था जब समाचार-पत्रों से हिन्दी के देवनागरी अंकों को हकाला गया था क्योंकि रोमन व अंग्रेजी अंक सरल होते हैं और इसी वर्ष से समाचार-पत्रों के पृष्ठों पर रोमन और अंग्रेजी शब्दावली ने अपने चमक बिखेरना प्रारंभ कर दिया था।

2026 आते-आते देश के हर हिन्दी समाचार-पत्र में अंग्रेजी और रोमन लिपि का इतना अधिक प्रयोग किया जा रहा है कि उन्हें ‘हिन्दी समाचार-पत्र’ कहने में भी सही नहीं है। देश में अब एक भी हिन्दी समाचार-पत्र या हिन्दी समाचार चैनल नहीं बचा है, सबको हिंग्लिश निगल चुकी है और अब हिंग्लिश मीडिया देसी अंग्रेजी मीडिया में बदलने को आतुर हैं। देसी अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जिसकी वाक्य रचना तो हिन्दी व्याकरण से प्रेरित है पर आत्मा और शब्द अंग्रेजी और उर्दू के होते हैं जैसे कि बॉलीवुड की फिल्मों की भाषा, जो बिकती तो हिन्दी के नाम पर हैं परंतु 2 घंटे की फिल्म में हिन्दी के 20 शब्द भी हिन्दी के सुनाई नहीं पड़ते हैं इसीलिए कुछ लोग हिन्दी फिल्मोद्योग को उर्दूवुड के नाम से पुकारते हैं तो यह उचित ही है।
मैंने मूल रूप से यह लेख 2011 में लिखा था, तब केवल 2-3 बड़े समाचार समूह अंग्रेजी थोप रहे थे और कुछ पत्रकार व संपादक इसका विरोध कर रहे थे।

देशभर में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ने गाँव-2 तक पैर पसार लिए हैं, भाषा माध्यम के स्कूल बंद हो गए, हिन्दी के प्रकाशनों के पाठक घट चुके हैं, फिल्मों और टीवी में अंग्रेजी का वर्चस्व पूरी तरह स्थापित हो गया। एक उदाहरण से समझिए, गूगल की सेवाओं में 2007 में ही हिन्दी का विकल्प आ गया था। तब गूगल की सेवाओं में नाम हिन्दी में रखे गए थे जैसे आज का गूगल मैप तब गूगल मानचित्र हुआ करता था, जीमेल में प्राथमिक, प्रचार, सामाजिक और नवीनतम जैसे विकल्प दिखाई देते थे, अब उन बेचारों ने भी उर्दूकरण व अंग्रेजीकरण की नकल प्रारंभ कर दी है।

मैंने 2010 से ही कई संपादकों व पत्रकारों से यह आग्रह किया गया कि अपने हिन्दी समाचार माध्यमों को अर्द्ध-अंग्रेजी का स्वरूप न दें, परन्तु इन माध्यमों के संचालकों को न तो अपने पाठकों से कोई सम्बन्ध है और न ही हिन्दी भाषा से। इनके लिए हिन्दी केवल धनार्जन का एक माध्यम है। अब समाचार पत्र केवल एक माल या कमोडिटी बन चुका है जिसे बेचकर लाभार्जित करना ही एकमात्र लक्ष्य है। 1826 में प्रारंभ हुई हिन्दी पत्रकारिता 2026 आते-2 अब हिंग्लिश पत्रकारिता में परिवर्तित हो जाएगी, किसी ने सोचा न था। अंग्रेजी व उर्दू शब्दावली का मैं विरोधी नहीं हूँ पर इनके शब्दों का हिन्दी में प्रयोग आटे में नमक की तरह आवश्यकता पड़ने पर ही होना चाहिए परंतु अब तो आटे की मात्रा कम और नमक की मात्रा बहुत अधिक हो चुकी है, क्या आप ऐसी कनक से बनी रोटी खा सकते हैं, उत्तर है नहीं।

उस समय मैंने कामना की थी कि यह निश्चित है कि आगामी समय में उन्हें अपनी त्रुटि का भान अवश्य होगा, क्योंकि सामान्य दर्शक और पाठक के लिए हिन्दी उनकी अपनी भाषा है, मातृभाषा है पर जब पूरे कुँए में ही भाँग पड़ी हो तो क्या आशा की जा सकती है।

कतिपय लोग हिन्दी को नष्ट करने में संलग्न हैं
आज विश्वभर के लोग हिन्दी के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। विश्व के कई विश्वविद्यालय, संस्थाएं और राजनेता हिन्दी के प्रति अपनी रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं, परन्तु भारत के ही कतिपय लोग हिन्दी और भारत की संस्कृति का हनन करने में संलग्न हैं क्योंकि उनकी वैचारिक क्षमता कुंठित हो चुकी है। दूसरी ओर, इन समाचार माध्यमों के संचालक धनार्जन तो हिन्दी से करते हैं, परन्तु गुणगान अंग्रेजी का करते हैं।

हिन्दी को प्रोत्साहन देने अथवा इसके प्रयोग का विस्तार करने में इन्हें लज्जा का अनुभव होता है। इनके दृष्टिकोण में भारत के उच्च वर्ग (हाई सोसाइटी) में हिन्दी का कोई स्थान नहीं है, और ये सब हिन्दी की कमाई के बल पर उसी उच्च वर्ग का अभिन्न अंग बन चुके हैं। इसलिए बार-बार कुछ ‘नया’ करने के भ्रम में ये हिन्दी का पतन करने में लगे हुए हैं।

प्रारम्भ में देवनागरी के अंकों (१,२,३,४,५,६,७,८,९,०) को टीवी और मुद्रण से निष्कासित किया गया। दुर्भाग्यवश, ये अंक आज इतिहास का भाग बन चुके हैं। अब रोमन लिपि की घुसपैठ की बारी है, जो सुनियोजित ढंग से आरम्भ हो चुकी है, ताकि देवनागरी लिपि को भी धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके। कई समाचार-पत्र और चैनल आज न तो पूरी तरह हिन्दी के रह गए हैं और न ही पूर्णतः अंग्रेजी के। इन्हें आप केवल एक ‘मिश्रित भाषा’ कह सकते हैं।

ऐसा करने वाले समाचार माध्यम अत्यंत गर्वित अनुभव करते हैं। उन्होंने अपने नए आदर्श वाक्य चुन लिए हैं जैसे- ‘नये ज़माने का अखबार’, ‘यंग इण्डिया-यंग न्यूज़पेपर’, ‘नेक्स्ट-ज़ेन न्यूज़पेपर’, ‘इण्डिया का नया टेस्ट’ इत्यादि। ऐसा प्रतीत होता है मानो हिन्दी का प्रयोग पिछड़ेपन का प्रतीक हो। यदि वे ऐसा ही मानते हैं, तो अपने हिन्दी माध्यमों को बंद क्यों नहीं कर देते? उनका सारा अहंकार समाप्त हो जाएगा, क्योंकि हम सभी भली-भांति जानते हैं कि हिन्दी मीडिया समूहों द्वारा प्रारम्भ किए गए अंग्रेजी माध्यमों की क्या स्थिति है।

वैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो सरकारी नियामकों को इनके पंजीयन/लाइसेंस रद्द कर देने चाहिए, क्योंकि इन्होंने ये अनुज्ञप्तियां ‘हिन्दी भाषा’ के नाम पर प्राप्त की हैं। परन्तु इसके लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम पाठक और दर्शक इसके विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाएं और सम्बंधित सरकारी संस्था अथवा मंत्रालय के समक्ष अपनी शिकायत दृढ़ता से दर्ज करवाएं। कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि “इससे क्या अंतर पड़ता है? आधुनिकता के साथ चलें, भाषा अब कोई विषय नहीं है।”

यह विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि आज के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शक्ति ‘हिन्दी’ के कारण ही है। भारत के कई बड़े समाचार चैनल और पत्रिकाएं हिन्दी के कारण ही अरबों की संपत्ति और ख्याति अर्जित कर सके हैं। परन्तु इन सबके उपरांत भी आधुनिकता और सरलता के नाम पर, प्रचलित हिन्दी शब्दों और लिपि को त्याग कर निर्बाध रूप से रोमन लिपि का प्रयोग किया जा रहा है।

हिन्दी के शब्दों का अवमूल्यन

हिन्दी में ‘न्यूज़’ के लिए एक अत्यंत सुन्दर शब्द है— ‘समाचार’, जिसका प्रयोग 2011 तक दूरदर्शन को छोड़कर किसी भी निजी चैनल पर वर्जित सा प्रतीत होता था और 2026 में तो दूरदर्शन ने भी समाचार शब्द पर रोक लगा दी है। इसी प्रकार सैकड़ों सुसंस्कृत हिन्दी शब्दों (यथा: समय, दर्शक, न्यायालय, उच्च शिक्षा, कारावास, असीमित, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, विराम, अधिनियम, ज्वार-भाटा, मार्ग, विमानतल, वायुयान, मंत्री, विधायक, समिति, आयुक्त, न्यायाधीश, न्यायमूर्ति, भारतीय, अर्थदंड, विभाग, स्थानीय, हथकरघा, ग्रामीण, परिवहन, महान्यायवादी, अधिवक्ता, डाकघर, पता, सन्देश, अधिसूचना, प्रकरण, लेखा-परीक्षा, लेखक, महानगर, संवेदी सूचकांक, डिब्बाबंद खाद्यपदार्थ, उत्पाद, भागीदारी संस्था, संस्थान, बहुराष्ट्रीय, खुदरा, थोक, व्यापार, व्यवसाय, प्रयोगशाला, प्राथमिक शाला, परीक्षा-परिणाम, कार्यालय, पृष्ठ, मूल्य इत्यादि) को विलुप्त किया जा रहा है और उनके स्थान पर नवीन अंग्रेजी शब्द थोपे जा रहे हैं। मंत्रालयों, विभागों, शासकीय निगमों और संस्थाओं के नाम अब हिन्दी में नहीं बल्कि अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं।

क्या हम किसी अंग्रेजी चैनल पर हिन्दी शब्दों और देवनागरी लिपि के प्रयोग की कल्पना भी कर सकते हैं? कदापि नहीं। फिर हिन्दी समाचार चैनलों पर रोमन लिपि और अनावश्यक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग क्यों? क्या वास्तव में हिन्दी इतनी दुर्बल और दरिद्र है? नहीं, पूर्णतः नहीं।

हमारी भाषा विश्व की सर्वश्रेष्ठ और अंग्रेजी की तुलना में सहस्र गुना अधिक वैज्ञानिक भाषा है। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी भाषी इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। आज की स्थिति को देखकर यह आशंका होती है कि भारत की हिन्दी भी फिजी की हिन्दी के समान कुछ ही वर्षों में मीडिया के कारण केवल रोमन में ही लिखी जाने लगेगी।

हिन्दी से आत्मीयता होने के कारण अत्यधिक पीड़ा और क्रोध उत्पन्न होता है। यह भय भी सताता है कि कहीं हिन्दी अंकों (१,२,३…) की भांति हमारी लिपि को भी निष्कासित न कर दिया जाए। यद्यपि आज हिन्दी अंक इतिहास बन चुके हैं, परन्तु तकनीकी जगत (जैसे गूगल) का धन्यवाद किया जाना चाहिए जिसने इन्हें डिजिटल रूप में पुनर्जीवित किया है।

हिन्दी संक्षेपाक्षरों की महत्ता और उपेक्षा
हिन्दी संक्षेपाक्षर (शब्द के लघु रूप) सदियों से प्रयोग में आते रहे हैं। मराठी भाषा में तो आज भी संक्षेपाक्षरों का प्रचुर प्रयोग किया जाता है और नए संक्षेपाक्षरों का निर्माण भी होता है। परन्तु आज का हिन्दी मीडिया इनसे बच रहा है और देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि का उपयोग कर रहा है। मीडिया हिन्दी लिपि एवं हिन्दी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को प्रगति में बाधक मानता है, जो पूर्णतः निराधार और भ्रामक है।

यह सत्य है कि बोलचाल की भाषा में हिन्दी संक्षेपाक्षरों की एक सीमा हो सकती है, परन्तु लेखन की भाषा में इनके प्रयोग को अवश्य प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। जब सरल हिन्दी संक्षेपाक्षर उपलब्ध हों अथवा निर्मित किए जा सकते हों, तो अंग्रेजी संक्षेपाक्षरों का प्रयोग सर्वथा अनुचित है।
नए और सरल हिन्दी संक्षेपाक्षरों का निर्माण कर उनका प्रचुर प्रयोग किया जाना चाहिए। यहाँ कुछ हिन्दी संक्षेपाक्षरों की सूची प्रस्तुत है। इनमें से अनेक पूर्व से ही प्रचलन में हैं, परन्तु उनके प्रसार की आवश्यकता है। प्रारम्भ में कुछ शब्द अटपटे प्रतीत हो सकते हैं, परन्तु जब हम एक विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के सैकड़ों जटिल शब्दों और व्याकरण को स्वीकार कर सकते हैं, तो अपनी मातृभाषा के संक्षेपाक्षरों को आत्मसात करने में केवल मानसिक दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है।

हिन्दी हमारी अपनी भाषा है, इसके विकास का उत्तरदायित्व हम सभी पर है, और इसमें मीडिया का उत्तरदायित्व सर्वोपरि है। हमारी मातृभाषा के ही पैरोकार उसे बाज़ारवाद के नाम पर दयनीय और हीन बना रहे हैं। यह समझना आवश्यक है कि हिन्दी का चैनल अथवा समाचार-पत्र हिन्दी में समाचार ग्रहण करने के लिए होता है, न कि अंग्रेजी के लिए। अंग्रेजी के लिए पर्याप्त विकल्प पूर्व से ही उपलब्ध हैं।

हिन्दीभाषी साथियों की ओर से मीडिया से विनम्र निवेदन:

१. हिन्दी चैनल, समाचार-पत्र, पत्रिका अथवा आधिकारिक वेबसाइट में अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों का प्रयोग पूर्णतः बंद होना चाहिए।
२. जहाँ अत्यंत आवश्यक हो, अंग्रेजी के शब्दों को केवल ‘देवनागरी’ लिपि में ही लिखा जाए, रोमन में कदापि नहीं।
३. सभी हिन्दी माध्यमों और आधिकारिक वेबसाइटों पर हिन्दी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

Half-Truths Are More Dangerous Than Falsehood: Prakhar Shrivastava

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Nava Thakuria

Guwahati : Devarshi Narada Jayanti Award Bestowed upon Nava Thakuria; Lakshyajit Gohain, Ranjita Rabha, and Mridul Haloi Felicitated

GUWAHATI: In journalism, the propagation and judgment of half-truths pose a greater danger than outright falsehoods. This significant observation was made by Prakhar Shrivastava, Senior Consulting Editor and Anchor at Delhi Doordarshan Kendra, while delivering the keynote address on the occasion of Narada Jayanti.

Organized under the auspices of the Vishwa Samvad Kendra, Assam on 7 June, the event featured the presentation of the Devarshi Narada Award and a felicitation ceremony. This year, the prestigious Devarshi Narada Award was conferred upon veteran journalist and editor of Ishan Darpan, Nava Thakuria. Additionally, three promising journalists namely Lakshyajyoti Gohain (Senior Journalist, NK TV), Ranjita Rabha (Chief Reporter, Pratham Khabar), and Mridul Haloi (Sub-Editor, Dainik Asam) were accorded special felicitations.

Speaking at the event held at Sudarshanalaya in Barbari locality of Guwahati, Prakhar Shrivastava delivered a factual and profound speech addressing the contemporary socio-political landscape and past historical errors. Shrivastava made significant remarks regarding the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), which is currently celebrating its centenary year.

“While the media maintains a positive outlook toward the Sangh in today’s altered political landscape, such an attitude was rare in the past. When the media paid scant attention to the Sangh, founded in 1925, the nation was on the brink of partition. At that time, senior Congress leaders from Pakistan’s Sindh province migrated to India with their belongings. During that tumultuous period, RSS swayamsevaks (volunteers) risked their lives to rescue Hindus, Sikhs, and others targeted by fundamentalist attacks in Sindh,” Shrivastava stated.

He further highlighted a historical letter written by the then Defence Minister Baldev Singh to Home Minister Vallabhbhai Patel shortly after independence. Sardar Patel had suggested placing the letter before the Cabinet, which urged the government to cooperate with the Sangh’s efforts to rescue people stranded in peril in Pakistan following the partition.

“Regrettably, these developments fueled resentment in Prime Minister Nehru’s mind. Nehru imposed a ban on the RSS not primarily due to the allegations surrounding Gandhi’s assassination, but rather out of displeasure over the rescue operations conducted by the Sangh in Pakistan during partition,” Shrivastava remarked significantly. He added, “The first incident of mass lynching in independent India occurred in the wake of Gandhi’s assassination. This mass violence was perpetrated by a section of self-proclaimed Gandhians, and its first casualties were Dr Narayan Savarkar including the family of Veer Savarkar, who became the first in the country to pay the price of mass lynching.”
Shrivastava also commented on the influx of immigrants since the era of Sir Syed Muhammad Sadullah, demographic changes in Assam, and the roles played by Moinul Hoque Choudhury and Fakhruddin Ali Ahmed. The solemn ceremony witnessed the presentation of the ‘Devarshi Narada Award’ to Nava Thakuria, which carried a cash prize of ₹50,000, a seleng sador (traditional stole), a citation, a portrait of Bharat Mata, and a bundle of valuable books.

In his speech, Thakuria remarked that Narada, who created engagement through incisive questioning and well-meaning counsel, remains a guiding light for journalism today. He emphasized that the credibility of the mythological character Narada is immensely relevant to contemporary journalism. Thakuria also pointed out that the western model of institutionalized, individual-centric journalism has adversely affected India’s culturally rooted and nature-centric news values.

At the commencement of the program, Kishore Shivam, Secretary of Vishwa Samvad Kendra, presented a brief overview of Devarshi Narada, depicting him as the seeker of knowledge and the eradicator of flaws. Shivam noted that a deeper research into Narada’s 84 Bhakti Sutras could enrich the aims and objectives of modern journalism.

The event also featured the unveiling of a souvenir, alongside a captivating rendition of Saraswati Vandana by Tribeni Bujarbaruah. Dr Gouranga Sarma, President of Vishwa Samvad Kendra, also addressed the gathering. The meeting, anchored by Naba Bujarbaruah, concluded with a vote of thanks delivered by Guru Prasad Medhi. The event was attended by over three hundred people representing various sections of society.

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