भारत का शोर उत्सव: जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है!

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दिल्ली । भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है, खामोशी।
जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा।
यह देश त्योहारों का है, रस्मों का है, जुलूसों का है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ है, अखंड और असीम शोर।
शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा, पीछे डीजे का ट्रक।बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हुए। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान।
अजीब विडंबना है।
शादी प्यार का उत्सव है, लेकिन संगीत ऐसा कि दिल नहीं, कान फट जाएं।
और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है, प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे।
मृत्यु, जो कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी, अब एम्पलीफायर पर विदाई बन गई है।
भजन भी ऐसे बजते हैं जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो।
भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल जैसा है।होली आती है, ढोल, डीजे, चीखती भीड़। घिसे पिटे फिल्मी गाने।
कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे, रात्रि जागरण, जयकारे, मूर्ति विसर्जन, बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस, ढोल-ताशे और सबवूफर। पूजा होती है, कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं।दीवाली पर आसमान पटाखों से नहीं, डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार एक प्रतियोगिता हो रही है! कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।
कागज पर नियम मौजूद हैं। 2000 के Noise Pollution Rules साफ कहते हैं कि रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है।
दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह 100 तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की आवाज़ में जी रहे हैं। कोई प्रेशर हॉर्न बजाता है, कोई साइलेंसर निकलकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है!
सवाल उठता है, हम इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? इतिहास कुछ संकेत देता है।
प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है और देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है।
लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम और सामाजिक प्रदर्शन ज्यादा है।
राजनीति ने इसे और बढ़ाया।
चुनावी रैलियाँ, माइक, स्पीकर, नारे, गाड़ियों के काफिले।
ऐसा लगता है लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं, लाउडस्पीकर में है।
धार्मिक मंच भी पीछे नहीं हैं।
हर उपदेशक के हाथ में माइक्रोफोन।
ज्ञान कम, वॉल्यूम ज्यादा।
टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर प्रवचन तक; एक ही नियम है: जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा।
फिर आया तकनीक का चमत्कार या आविष्कार, लाउडस्पीकर देव।
1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ सौ decks लगाए जाते हैं, कोई चैन से न जीए।
आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस, हर सभा, सबके पास अपनी ध्वनि सेना है। जहाँ पहले घंटी बजती थी, अब बास स्पीकर गूंजते हैं।
कभी-कभी लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता भक्ति से नहीं, वॉट्स से होकर जाता है।
दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से जगह बनाते हैं।
लगातार शोर का असर गंभीर है; हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, मानसिक तनाव, सुनने की क्षमता का ह्रास।
हर साल हजारों लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं; कारण कोई वायरस नहीं, डेसिबल।
लेकिन शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब सुरक्षित नहीं रहीं।
त्योहारों और पर्यटन के मौसम में 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।
पक्षी घोंसले छोड़ देते हैं।
जानवर जंगलों में भाग जाते हैं।
प्रकृति, जिसे हमने ध्यान और योग की भूमि कहा था, अब लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है।
विडंबना देखिए।
ऋषियों की भूमि में योग शिविर भी माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी ! प्राणायाम की गहरी सांसें भी स्पीकर से गूंजती हैं।
खामोशी, जो आध्यात्मिक अनुभव की आत्मा है, अब एलिट शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद थोड़ी असहज है।
यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा जितना ही हमारी सामूहिक बेचैनी का संकेत भी है। एक ऐसा समाज जहाँ हर कोई सुना जाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका है, आवाज़ बढ़ा देना।
इसलिए हर मंच पर माइक है।
हर जुलूस में स्पीकर।
हर गली में डीजे।
लेकिन सवाल अभी भी वही है?
क्या भगवान सचमुच इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल चाहिए?
या हम अपनी ही खालीपन को आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं?
भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, उसकी संस्कृति है, उसका उत्सव है।
लेकिन उत्सव का मतलब कोलाहल नहीं होना चाहिए।
कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान शोर नहीं, संयम होती है।
शायद समय आ गया है कि हम जश्न मनाना सीखें: बिना पड़ोसी के कान फाड़े। माइक थोड़ा कम।
ढोल थोड़ा धीमा। और शायद, बस शायद, भारत फिर से खामोशी की संगीत सुन सके।

औरतों का सम्मान करना है तो गालियों में उनका जिक्र न कीजिए!

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आगरा ताजमहल के लिए मशहूर है।
मोहब्बत की निशानी। लेकिन ज़रा शहर की गलियों में घूमिए। एक और “स्मारक” नज़र आएगा।
गालियों का स्मारक।
यहाँ तालीम मायने नहीं रखती।
तहज़ीब भी नहीं। दौलत भी नहीं।
आगरा में एक लोकतांत्रिक ज़बान है;
गालियों की ज़बान।
सब्ज़ी बेचने वाला। स्कूटर मिस्त्री।कॉलेज का छात्र। पान की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग। गुटके की पीक बौछार के साथ गालियों का मधुर रस!
लेकिन इस कहानी में एक अजीब मोड़ है।
ज़्यादातर गालियाँ औरतों के नाम पर टिकती हैं। माँ। बहन। बेटी ।
झगड़ा चाहे पार्किंग का हो या बिजली बिल का; इज़्ज़त किसी की माँ-बहन की ही उछलती है।
आगरा की हवा में भाषाई प्रदूषण तैरता है। लेकिन किसी को तकलीफ़ नहीं। लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी है। जैसे सड़क का शोर।
औरतें भी पीछे नहीं। वे भी इस कला में कम उस्ताद नहीं। उम्र की कोई पाबंदी नहीं। दादी-नानी भी ऐसी शब्दावली चला सकती हैं कि ट्रक ड्राइवर भी शर्मा जाए।
एक ज़माना था जब बातों में नज़ाकत होती थी। मुहावरों से बात सजती थी।कहावतों से तर्क मजबूत होते थे।शेर-ओ-शायरी से बात में नूर आ जाता था।
आजकल ग़ुस्सा बढ़ा है। सब्र घटा है।और ज़बान गरीब हो गई है। जब लफ़्ज़ कम पड़ते हैं; गाली हाज़िर हो जाती है।
हर वाक्य में जिस्मानी इशारे। हर झगड़े में माँ-बहन का जिक्र। असल ग़ुस्सा ट्रैफिक पर होता है; लेकिन निशाना औरत बनती है।
यह सवाल शायद ही किसी को परेशान करता है। ग्रामीण आगरा हो या शहर, गाली कई लोगों के लिए ग़ुस्सा निकालने का सबसे आसान ज़रिया है।
ज़िंदगी मुश्किल है। नाइंसाफ़ी बहुत है। दिल में भड़ास भरी है। तो लोग गाली देते हैं। न खून-खराबा। न पुलिस केस। बस ज़बानी आतिशबाज़ी।
कुछ लोग तो इसे सामाजिक हथियार भी बताते हैं। “गाली एक तरह का अहिंसक विरोध है। गोली नहीं चलती। बस ज़बान चलती है।”
अजीब ख्याल है।
लेकिन पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं।
गालियाँ अक्सर उस ग़ुस्से की आवाज़ होती हैं जो व्यवस्था से निराश आम आदमी के भीतर जमा होता रहता है।
फिर भी एक सवाल बार-बार उठता है। हर गाली औरत के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है? माँ। बहन। बेटी।
यह कैसी मानसिकता है जिसमें औरत को इज़्ज़त का बर्तन बना दिया गया है?
सामाजिक विश्लेषक श्रीवास्तव तो और आगे जाते हैं। उनका कहना है; समाज में बदलाव गोलियों से नहीं, गालियों से आता है। भारत जैसे अहिंसा-प्रिय समाज में गाली ग़ुस्से का वैध इज़हार है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गालियों का दायरा बढ़ना चाहिए।
नई तरह की, एलजीबीटी-दोस्त गालियाँ भी बननी चाहिए।
बात चौंकाने वाली है। लेकिन हमारी परंपरा भी कम अजीब नहीं।
उत्तर भारत की शादियों में दूल्हे की बारात का स्वागत औरतें लयबद्ध गालियों से करती हैं। सब हँसते हैं।मज़ा लेते हैं। एक सांस्कृतिक रस्म।
गली-मुहल्लों की मिली-जुली संस्कृति में भी गाली का अपना मुकाम है। चाय की दुकान। बाज़ार। बस अड्डा। हर जगह यह खुरदुरी भाषा सुनाई देती है।
पुलिस की नौकरी करनी हो तो शायद गाली-शास्त्र में पारंगत होना भी ज़रूरी है।
कवि खुसकेट अकबराबादी ने बरसों पहले लिखा था “जिसे गाली देना नहीं आता, उसकी ज़िंदगी अधूरी है।”
आगरा इस बात को पूरी शिद्दत से साबित करता है। यहाँ लोग लड़ाई में हथियार कम निकालते हैं। गालियाँ ज़्यादा।
जहाँ समाज बीमार होता है; वहाँ पिस्तौल चलती है।
जहाँ लोग थोड़े सभ्य होते हैं; वहाँ गाली से काम चल जाता है।
लेकिन आगरा की गाली संस्कृति पर एक नया खतरा मंडरा रहा है।
पश्चिमी असर। शहर संस्कृति के जानकार एक पंडित दुखी हैं। उनका कहना है कि आज के नौजवानों ने गालियों की पूरी विरासत बरबाद कर दी। उनकी पूरी शब्दावली बस दो अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों में सिमट गई है;
“ओह शिट।”
बस। न कोई तर्ज़। न कोई रंग।
आगरा की पुरानी गालियों में रचनात्मकता थी। लय थी। अदायगी थी। अब सब कुछ ग्लोबलाइजेशन की भेंट चढ़ रहा है।
फिर भी शहर चलता जा रहा है।
ताजमहल में दुनिया मोहब्बत देखने आती है। और बाहर गलियों में लोग ग़ुस्सा निकालते रहते हैं।
शायद बुज़ुर्ग ठीक ही कहते हैं; गालियां भाषा का श्रृंगार हैं। गालियाँ ज़बान में करंट भर देती हैं। बात में बेबाकी लाती हैं।
बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है। अगली बार ग़ुस्सा आए: किसी की माँ को बख्श दीजिए। बेचारी भाषा में बहुत पहले ही शहीद हो चुकी है।

दुश्मन कैसे बढ़ाएँ, दोस्त कैसे खोएँ , ट्रंप से सीखिए क्या ईरान बनेगा ट्रम्प का वाटरलू?

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बृज खंडेलवाल

लखनऊ । क्या ईरान डोनाल्ड ट्रंप का वाटरलू बनेगा?
तारीख़ गवाह है कि इतिहास को ऐसे लम्हे बहुत पसंद आते हैं।
एक फैसला। एक जुआ। एक जंग।

और अचानक जो अजेय लगता था, वह भी कमजोर नज़र आने लगता है।
28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नाटकीय सैन्य कार्रवाई का हुक्म दिया: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी। सब कुछ बहुत तेज़ हुआ। खामोशी से। लेकिन धमाकेदार अंदाज़ में।

अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त फौजी कार्रवाई ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइलें कमांड सेंटरों को चीरती हुई गुज़रीं। हवाई हमलों ने बेस और इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह किया। फिर सबसे बड़ा झटका आया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई इन हमलों में मारे गए।
पूरा मध्य-पूर्व सांस रोके खड़ा था।

वॉशिंगटन में जश्न। तेहरान में गुस्सा और आग। देखते देखते जंग दूसरे हफ्ते में दाखिल हो गई।

व्हाइट हाउस ने इसे मजबूत लीडरशिप बताया। एक बहादुर कदम। ज़रूरी कार्रवाई। सरकार का दावा था कि इससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कुचल जाएगा। शायद हुकूमत भी बदल जाए।

खुद ट्रम्प का लहजा भरोसे से भरा था। “ताकत के ज़रिए अमन,” उन्होंने कहा। उनका कहना था कि यह टकराव “बहुत जल्दी खत्म” हो सकता है।
लेकिन जंगें अक्सर राष्ट्रपति की टाइमलाइन नहीं मानतीं। खासतौर पर मध्य-पूर्व में।

बिना तालियों की जंग

अगर ट्रम्प को लगा था कि अमेरिका में जबरदस्त देशभक्ति की लहर उठेगी, तो ऐसा नहीं हुआ। माहौल कुछ और है। बेचैनी। शक।और घबराहट।
सर्वे इस कहानी को साफ बताते हैं।

CNN/SSRS के सर्वे में

59% अमेरिकियों ने हमलों को गलत बताया। सिर्फ 41% ने समर्थन किया।

NPR/PBS/Marist के पोल में

56% लोग फौजी कार्रवाई के खिलाफ हैं। 44% इसके हक में।

Reuters/Ipsos का आंकड़ा और सख्त है। सिर्फ 27% लोग हमलों का समर्थन कर रहे हैं।

यह जोश नहीं है। यह हिचक है।

हमलों के बाद ट्रम्प की कुल लोकप्रियता भी गिरकर 40–45% के बीच आ गई है। इसे जबरदस्त समर्थन नहीं कहा जा सकता।

अमेरिका साफ-साफ बंटा हुआ है।

रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84% लोग इस कार्रवाई के साथ हैं।

डेमोक्रेट्स में 86% लोग इसके खिलाफ हैं।

इंडिपेंडेंट मतदाता भी ज्यादातर विरोध में हैं।

कई सर्वे में 55–59% लोग जंग को बढ़ाने के खिलाफ दिखते हैं।

यह एकता नहीं है। यह गहरी ध्रुवीकरण की तस्वीर है। और बिना राष्ट्रीय एकता की जंग अक्सर सियासी दलदल बन जाती है।
झंडे के पीछे भीड़ नहीं

पहले की जंगों में जनता तुरंत साथ खड़ी हो जाती थी। 11 सितंबर के हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को 92% समर्थन मिला था। इराक युद्ध से पहले करीब 72% लोग समर्थन में थे।

आज?

मुश्किल से आधा देश साथ है। कई जगह इससे भी कम। न कोई राष्ट्रीय उबाल। न देशभक्ति की लहर। बस चिंता।

अमेरिकियों को पिछली मध्य-पूर्व की जंगें याद हैं। और उनका अंजाम भी।

एक और सवाल व्हाइट हाउस का पीछा कर रहा है। आख़िर असली प्लान क्या है?

कई सर्वे बताते हैं कि अमेरिकियों को लगता है कि साफ योजना ही नहीं है।

क्या यह सीमित हमला है? क्या यह सरकार बदलने की कोशिश है? या फिर एक और अंतहीन जंग की शुरुआत?
वॉशिंगटन अभी तक भरोसे से जवाब नहीं दे पाया है। और अनिश्चितता डर को जन्म देती है।
एक और मसला संवैधानिक है। कांग्रेस ने इस हमले को मंजूरी नहीं दी थी। यह बात अहम है।
सर्वे बताते हैं कि 59% अमेरिकी मानते हैं कि फौजी कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति जरूरी होनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि व्हाइट हाउस ने अकेले फैसला लिया।

हर जंग का एक अंधेरा पहलू होता है।

अब नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी हमले में ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों का स्कूल भी निशाने पर आ गया, ऐसा बताया जा रहा है।

विदेशों में नाराज़गी बढ़ी है। और अमेरिका में भी असहज सवाल उठ रहे हैं। युद्ध कक्षों में लक्ष्य और नक्शे होते हैं। जमीन पर इंसान होते हैं।
सबसे दिलचस्प असर ट्रम्प के अपने समर्थक खेमे में दिख रहा है। कुछ प्रमुख कंज़र्वेटिव आवाज़ें भी बेचैन हैं।

टीवी होस्ट Tucker Carlson ने गहरे फौजी दखल से सावधान रहने की बात कही है। उन्हें डर है कि यह एक और अंतहीन जंग बन सकती है।
यहाँ तक कि Laura Ingraham ने भी प्रशासन से नागरिक मौतों पर ज्यादा ईमानदार जवाब मांगा है। दरारें छोटी हैं। लेकिन दिख रही हैं।
अमेरिकी राजधानी में सियासी जंग तेज़ है। रिपब्लिकन इसे जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान परमाणु खतरा बन चुका था।

डेमोक्रेट्स की राय बिल्कुल अलग है।

वे इसे “चुनी हुई जंग” कहते हैं। एक खतरनाक बढ़ोतरी। बिना साफ वजह के शुरू हुआ संघर्ष। बहस तेज़ है।कड़वी है। और बहुत जानी-पहचानी भी। अमेरिका यह बहस पहले भी देख चुका है।

वॉशिंगटन से बाहर भी माहौल उबल रहा है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस आग की तरह फैल रही है।
समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था।

विरोधियों का कहना है कि देश फिर से इराक वाली गलती दोहरा रहा है।

सच शायद हमेशा की तरह गोलियों और बमों के बीच कहीं दबा पड़ा है।

रणनीति से परे एक गहरा सवाल खड़ा है। जंग की कीमत क्या होती है? हर मिसाइल के साथ नतीजे आते हैं।अमेरिकी सैनिक खतरे में पड़ते हैं।ईरानी नागरिक तबाही झेलते हैं।पूरा इलाका अस्थिर हो जाता है। बमबारी शायद ही कभी नफरत खत्म करती है। अक्सर वह अगली जंग के बीज बो देती है। इतिहास इस बात का बेरहम गवाह है।

ट्रम्प के लिए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी एक बड़ा जुआ है। अगर ईरान जल्दी ढह गया, तो वह इसे ऐतिहासिक जीत बताएंगे। लेकिन अगर जंग लंबी खिंची, तो सियासी कीमत बहुत भारी हो सकती है। जंगों ने पहले भी राष्ट्रपतियों की कुर्सी हिलाई है। और इराक और अफगानिस्तान की परछाइयाँ अभी भी अमेरिका की यादों में जिंदा हैं।

इसलिए सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है। धीरे-धीरे। बेचैनी के साथ। क्या यह ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत बनेगी? या वही पल जिसे इतिहास उनका वाटरलू कहेगा?

श्रेय लेने का उतावलापन: सेल्फ़ी युग में सेवा कम, पोस्ट ज़्यादा

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भोपाल : सेवा का काम शोर नहीं, असर होना चाहिए ।
लेकिन आज के समय में असर से पहले पोस्ट आ जाती है।
गौर से देखें, समाजसेवा भी कुछ-कुछ क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। सबकी नज़र स्कोरबोर्ड पर है; किसने सबसे पहले ट्वीट किया। किसने फेसबुक पर “ब्रेकिंग” डाली। किसने फोटो के साथ लिखा ; “मेरे प्रयासों से…”
मुद्दा क्या था, यह बाद में याद आता है। पहले याद आता है : पोस्ट किसकी वायरल हुई।
आजकल सेवा कम, सेल्फ़ी ज़्यादा होती है।
किसी ने गड्ढे की शिकायत की। गड्ढा भरने से पहले पाँच पोस्ट आ गईं : “देखिए, मेरे प्रयास से नगर निगम हरकत में।”
नगर निगम बेचारा सोचता रह जाता है, गड्ढा हमने भरा, श्रेय किसी और ने भर लिया।
एक्टिविस्ट हैं या डिजिटल इन्फ्लुएंसर?
एक ज़माना था जब समाजसेवक चुपचाप काम करते थे। लोग बाद में बताते थे : “अरे, यह काम फलाँ व्यक्ति ने करवाया था।”
अब दौर उल्टा है। पहले घोषणा होती है। फिर पोस्ट होती है। फिर टैगिंग होती है। फिर हैशटैग चलता है।
काम कब होता है ?
यह कभी-कभी प्रशासन को भी बाद में पता चलता है।
अब एक्टिविस्ट और इन्फ्लुएंसर में फर्क करना मुश्किल हो गया है।
फर्क बस इतना है कि इन्फ्लुएंसर साबुन बेचता है और एक्टिविस्ट श्रेय बेचता है।
RTI: सूचना का अधिकार या श्रेय का अधिकार?
RTI एक शानदार औज़ार है। लोकतंत्र का एक्स-रे मशीन। सवाल पूछो, तो सरकार को जवाब देना पड़ता है।फाइलें खुलती हैं। सच बाहर आता है।
लेकिन हमारे यहाँ RTI का एक नया संस्करण भी आ गया है :
RTI = “Recognition Through Internet.”
यानी सूचना बाद में, पहचान पहले।
RTI लगाई नहीं कि पोस्ट तैयार :
“मेरी RTI से बड़ा खुलासा!” खुलासा क्या हुआ, यह तो बाद में पढ़ा जाएगा।
पहले यह देख लिया जाए कि पोस्ट पर कितने लाइक आए। कभी-कभी लगता है
RTI फाइल कम, प्रेस रिलीज़ ज़्यादा हो गई है। मुद्दा पीछे, चेहरा आगे, आजकल हर आंदोलन में दो मोर्चे होते हैं।
एक असली मोर्चा ; जहाँ समस्या है।दूसरा सोशल मीडिया मोर्चा ; जहाँ फोटो है।
पहले लोग वृक्ष बचाते थे।
अब लोग किनारे खड़े होकर
सेल्फ़ी बचाते हैं।
किसी ने सफाई अभियान में झाड़ू उठाई।
अगले ही पल फोटो पोस्ट ; “ शहर सफाई के लिए मेरी लड़ाई।” शहर बेचारा मन में सोचता होगा :
“भाई, झाड़ू चलाओ या कैमरा?”
श्रेय की राजनीति
हमारे समाज में श्रेय भी राजनीति जैसा हो गया है। सबको चाहिए। और तुरंत चाहिए। कुछ विशेषज्ञ छपास रोग को दोष देते हैं।
अगर कहीं कोई अच्छा काम हो जाए
तो पाँच लोग तुरंत प्रकट हो जाते हैं ,
“यह मेरे प्रयासों से हुआ।”
छठा व्यक्ति थोड़ा विनम्र होता है। वह लिखता है ; “मेरे छोटे से प्रयास का परिणाम।”
छोटा प्रयास इतना छोटा होता है कि कभी-कभी दिखता ही नहीं। लेकिन पोस्ट बहुत बड़ी होती है।
सेवा या व्यक्तिगत ब्रांडिंग?
सोशल मीडिया ने एक नई चीज़ पैदा की है : “पर्सनल ब्रांड एक्टिविज़्म।”
यहाँ उद्देश्य समस्या हल करना नहीं, प्रोफ़ाइल चमकाना होता है। जैसे ही कोई मुद्दा ट्रेंड करता है, कुछ लोग तुरंत पहुँच जाते हैं।
एक फोटो। एक लंबा पोस्ट। दो-चार टैग। और अंत में लिखा ; “संघर्ष जारी रहेगा।”
संघर्ष कहाँ जारी है ; यह पता नहीं।
लेकिन पोस्ट जरूर जारी रहते हैं।
सच थोड़ा सादा होता है। सच यह है कि समाज का कोई भी काम एक व्यक्ति से नहीं होता। कई लोग मेहनत करते हैं। कुछ सामने दिखते हैं। कई लोग पर्दे के पीछे रह जाते हैं।
लेकिन आजकल पर्दे के पीछे रहना। किसी को पसंद नहीं। शायद बदबू आती है।
हर किसी को लगता है, इतिहास उसी से शुरू होता है। मर्यादा आजकल थोड़ा पुराना फ़ैशन लगती है।
संयम का मतलब है : काम होने दो,
फिर बोलो। लेकिन सोशल मीडिया का नियम है , पहले बोलो, फिर काम होने का इंतज़ार करो।
असली संतोष कहाँ है?
सच पूछिए तो सेवा का असली सुख, लाइक और शेयर में नहीं होता। वह उस दिन होता है, जब समस्या सच में हल हो जाती है।
ताली की आवाज़ दो सेकंड रहती है।परिवर्तन की गूँज वर्षों तक। लेकिन यह बात समझने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए।
और धैर्य…
सोशल मीडिया की दुनिया में, सबसे दुर्लभ संसाधन है।

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