क्या सर्वोच्च न्यायालय को भी विवाद के केंद्र में लाया जा रहा है?

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दिल्ली । वर्तमान घटनाक्रम का एक पहलू न्यायपालिका से भी जुड़ा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले कुछ न्यायाधीशों की निष्पक्षता और संभावित हित-संघर्ष को लेकर कुछ वकील संगठनों ने सवाल उठाए हैं। इसी तरह CEC के परिवार से जुड़े मामलों को लेकर भी न्यायालय की कार्यवाही पर प्रश्न उठाए गए हैं। हालांकि, किसी वकील संगठन या याचिकाकर्ता द्वारा उठाया गया सवाल न्यायालय का निष्कर्ष नहीं होता; जब तक न्यायालय कोई निर्णय न दे, इन्हें आरोप या चिंता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सबसे बड़ा जोखिम: जनधारणा और न्यायिक निर्णय के बीच अंतर खत्म होना
आरोप, याचिका, मीडिया रिपोर्ट, न्यायिक टिप्पणी और अंतिम न्यायिक निर्णय—इन सभी की कानूनी स्थिति अलग-अलग होती है। किसी याचिका का आरोप न्यायालय का निष्कर्ष नहीं और सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी अंतिम फैसला नहीं होती।
यदि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल CEC ज्ञानेश कुमार पर संस्थागत या राजनीतिक दबाव बनाने के माध्यम के रूप में किया जाता है, तो न्यायालय की किसी टिप्पणी या आदेश को उनके विरुद्ध चलाए जा रहे राजनीतिक या सार्वजनिक अभियान के समर्थन के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके साथ चल रहे मीडिया ट्रायल, सोशल मीडिया अभियानों और लगातार दायर याचिकाओं को भी इसी व्यापक संस्थागत संदर्भ में देखना आवश्यक है।
हालांकि, मीडिया और सोशल मीडिया को अपनी भूमिका निभाने का पूरा अधिकार है, न्यायिक निर्णय का आधार अंततः कानून, तथ्य, साक्ष्य और संविधान होना चाहिए—न कि किसी मुद्दे को मिला सार्वजनिक समर्थन या विरोध।
इसी तरह, किसी कानून की संवैधानिक वैधता पर प्रतिकूल टिप्पणी का अर्थ यह नहीं कि उस कानून के तहत हुई प्रत्येक नियुक्ति या प्रशासनिक कार्रवाई स्वतः समाप्त हो जाती है। हर प्रश्न का परीक्षण उसके अपने संवैधानिक और कानूनी ढांचे में होना चाहिए।
अब असली सवाल क्या हैं?
• क्या SIR संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के भीतर किया गया?
• क्या किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया और क्या यह सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के समक्ष साबित हुआ?
• क्या किसी चुनाव को रद्द करने के लिए कानून में निर्धारित आधार मौजूद हैं?
• और क्या किसी न्यायिक टिप्पणी या आदेश को उसके वास्तविक कानूनी प्रभाव से आगे बढ़ाकर राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है?
इन सवालों का उत्तर राजनीतिक धारणाओं से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, साक्ष्यों, न्यायिक आदेशों और संवैधानिक प्रक्रिया से ही निकलना चाहिए।

सोशल मीडिया के दावे में Form-6 में बदलाव करने की बाद गलत है

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दिल्ली । विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित उन दावों पर निर्वाचन आयोग ने स्पष्टीकरण दिया है, जिनमें कहा जा रहा है कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में बदलाव कर दिया गया है। आयोग के अनुसार, Form-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
निर्वाचन आयोग के अनुसार SIR के दौरान जारी आदेश में Declaration Form की भी व्यवस्था की गई है। मतदाताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए Declaration Form को Form-6 की प्रक्रिया के साथ जोड़ा गया है, ताकि मतदाताओं को अलग-अलग प्रक्रियाओं से न गुजरना पड़े और दो बार OTP सत्यापन की आवश्यकता न हो।
आयोग का कहना है कि SIR का आदेश मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मति से जारी किया गया था। ऐसे में SIR से संबंधित इस व्यवस्था को किसी एक अधिकारी का व्यक्तिगत निर्णय बताना सही नहीं होगा।
Supreme Court में भी उठा था SIR की वैधता का सवाल
SIR की प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग के अधिकार को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। 27 मई 2026 को दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने की निर्वाचन आयोग की शक्ति और अपनाई गई प्रक्रिया की जांच की। न्यायालय ने Article 324 और Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) के संदर्भ में आयोग के अधिकार पर विचार किया और SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज किया।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि SIR के तहत किसी व्यक्तिगत कार्रवाई को चुनौती नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील जैसे सुरक्षा उपायों के महत्व को भी रेखांकित किया।
ऐसे में Form-6 से जुड़े दावों की वास्तविकता समझने के लिए मूल Form-6, SIR Order और Declaration Form—इन तीनों को साथ रखकर देखना अधिक उचित होगा।

क्या Electoral Roll में नाम हटाने की प्रक्रिया वास्तव में दिल्ली से Centralised तरीके से संचालित होती है? 

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क्या Electoral Roll Database को Centralised कर दिया गया है?
जवाब: बिल्कुल नहीं**

दिल्ली । भारत में 4,000 से अधिक Electoral Registration Officers (EROs) हैं, जो अलग-अलग प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आते हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में electoral-roll प्रक्रिया को संभालते हैं। यदि यह आरोप है कि CEC Gyanesh Kumar या दिल्ली में बैठी कोई centralised team सीधे तौर पर eligible voters के नाम काट रही थी, तो इस दावे के समर्थन में documentary evidence क्या है?

Representation of the People Act (RPA) के तहत electoral roll में नाम जोड़ने और हटाने की statutory प्रक्रिया Electoral Registration Officer (ERO) के स्तर पर होती है और निर्धारित कानूनी एवं प्रक्रियात्मक safeguards के तहत निर्णय लिया जाता है। ERO इस प्रक्रिया में एक सक्षम statutory authority है।
ऐसे में केवल CEC का नाम लेकर पूरे electoral-roll revision को एक व्यक्ति की व्यक्तिगत कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना उस व्यापक institutional decision-making chain और ERO की statutory भूमिका को नजरअंदाज करता है। यदि centralised interference का आरोप है, तो उसे स्थापित करने के लिए केवल आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेजी या प्रक्रियात्मक साक्ष्य भी सामने रखना होगा। *Roll of ERONET in decentralization of voter data base*
Electoral Roll Database पहले भी Decentralised था और आज भी Decentralised ही है।
सरल कारण यह है कि Electoral Roll हर राज्य के Electoral Registration Officer (ERO) द्वारा, Chief Electoral Officer (CEO) की देखरेख में, तैयार और maintain किया जाता है। इसलिए इसकी व्यवस्था शुरू से ही Decentralised रही है, और आज भी वैसी ही है।
सच्चाई यह है कि ECINET के ERONET module के तहत Electoral Roll Database को कभी भी Centralised नहीं किया गया है। हर राज्य का Electoral Roll Database पहले की तरह Decentralised ही है और EROs के सभी statutory तथा procedural अधिकार पहले की तरह बरकरार हैं।

System digital हुआ है, लेकिन Electoral Roll की statutory authority और decentralised structure में कोई बदलाव नहीं हुआ है। डिजिटल व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि काम आसान और paperless हो सके।
पहले physical form की वजह से समस्या यह होती थी कि लोग स्थानांतरण पर पुरानी जगह से नाम नहीं कटवाते थे। नई जगह नाम जुड़वा लेते थे, लेकिन पुरानी जगह से हटवाने के लिए अलग से physical आवेदन देना पड़ता था — जो लंबी और कठिन प्रक्रिया थी।
अब डिजिटल सिस्टम ने इसे सरल बना दिया है। जैसे ही कोई मतदाता नई विधानसभा में खुद को पंजीकृत करता है और वह पहले कहीं और registered था, तो पुरानी विधानसभा में उसका Form 7 automatic generate हो जाता है। पुरानी जगह का ERO संबंधित व्यक्ति को notice भेजता है कि आप यहाँ से जा चुके हैं, क्या आपका नाम हटा दिया जाए? फिर proper verification और hearing के बाद final disposal करता है। यानी digital होने से काम आसान हुआ, transparency बढ़ी, लेकिन अधिकार और जिम्मेदारी पूरी तरह ERO के पास ही रही।
यह भी एक भ्रामक नैरेटिव के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें electoral-roll की विकेंद्रीकृत और वैधानिक प्रक्रिया को एक व्यक्ति या केंद्रीय टीम की प्रत्यक्ष कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस तरह की प्रस्तुति से जनता में Election Commission of India (ECI) के प्रति अविश्वास और आक्रोश पैदा होने की संभावना रहती है।
आलोचकों के अनुसार, ऐसे दावे ECI की संवैधानिक और संस्थागत भूमिका को कमजोर करने की धारणा को बढ़ावा दे सकते हैं। हालांकि, किसी भी दावे के पीछे मंशा या उद्देश्य निर्धारित करने के लिए केवल नैरेटिव के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके स्रोत, दस्तावेजी साक्ष्य और प्रक्रियात्मक तथ्यों की जांच आवश्यक है।

क्या Gyanesh Kumar व्यक्तिगत रूप से नाम काट रहे हैं?

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दिल्ली । सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जा रहा है कि “Gyanesh Kumar लोगों के वोट काट रहे हैं।” electoral-roll revision एक prescribed institutional process है। नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन की प्रक्रिया संबंधित electoral authorities के माध्यम से होती है। किसी individual deletion को समझने के लिए देखना जरूरी है कि किस elector का नाम किस आधार पर चिन्हित हुआ, क्या verification हुआ, किस authority ने निर्णय लिया और क्या appeal हुई।
केवल CEC का नाम लेकर पूरी प्रक्रिया को व्यक्तिगत कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना institutional decision-making की पूरी chain को नजरअंदाज करता है। नाम जोड़ने और काटने की शक्ति Electoral Registration Officer पर निहित है, जो Representation of the People Act के तहत काम करता है। CEC या कोई भी व्यक्ति विहित प्रक्रिया से परे जाकर व्यक्तिगत रूप से नाम नहीं जुड़वा या कटवा सकता।
Electoral Registration Officer (ERO) के पास नाम जोड़ने और हटाने की शक्ति मुख्यतः Representation of the People Act, 1950 (RPA) और Registration of Electors Rules, 1960 से आती है।
**नाम जोड़ने का प्रावधान — Section 23, RPA 1950**
Section 23 के तहत, जिसका नाम किसी constituency की electoral roll में नहीं है, वह ERO के समक्ष inclusion के लिए आवेदन कर सकता है। ERO verification के बाद संतुष्ट होने पर नाम शामिल करने का निर्देश देता है। वर्तमान व्यवस्था में इसके लिए Form 6 इस्तेमाल होता है।
**नाम हटाने का प्रावधान — Section 22, RPA 1950**
Section 22 ERO को electoral roll में entry हटाने की शक्ति देता है, यदि enquiry के बाद वह संतुष्ट हो कि व्यक्ति:
– मृत हो चुका है, या
– उस constituency का ordinarily resident नहीं रहा, या
– किसी अन्य कारण से registered होने का entitled नहीं है।
महत्वपूर्ण safeguard यह है कि “ceased to be ordinarily resident” या “not entitled” के आधार पर deletion करने से पहले ERO को संबंधित व्यक्ति को reasonable opportunity of being heard देनी होती है और facts का proper verification करना होता है।
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