मस्जिद में डिंपल यादव के कपड़ों पर बवाल: मौलाना साजिद रशीदी का विवादित बयान

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लखनऊ: हाल ही में समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव के मस्जिद दौरे को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मौलाना साजिद रशीदी ने डिंपल के कपड़ों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा, “डिंपल यादव की पीठ दिख रही है,” और उनके कपड़ों को अनुचित बताया। यह बयान सोशल मीडिया, विशेषकर एक्स पर, तीखी बहस का कारण बन गया है। कुछ लोग इसे एक महिला सांसद के सम्मान पर हमला मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे धार्मिक संवेदनशीलता से जोड़ रहे हैं।

डिंपल यादव, जो समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की पत्नी हैं, अक्सर अपनी सादगी और सामाजिक कार्यों के लिए जानी जाती हैं। उनके मस्जिद दौरे का उद्देश्य समुदाय के बीच सद्भावना को बढ़ावा देना था, लेकिन मौलाना साजिद के इस बयान ने इस घटना को राजनीतिक रंग दे दिया। एक्स पर कई यूजर्स ने मौलाना की टिप्पणी को “घटिया” और “महिलाओं के प्रति अपमानजनक” करार दिया है। कुछ ने सवाल उठाया कि अखिलेश यादव इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं, और क्या यह उनकी “मुस्लिम समर्थक” छवि के कारण है।

वहीं, इस विवाद ने धार्मिक और सामाजिक मानदंडों पर बहस को जन्म दिया है। कुछ लोग मानते हैं कि मस्जिद जैसे पवित्र स्थल पर ड्रेस कोड का पालन करना चाहिए, जबकि अन्य का कहना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस मामले ने भारतीय राजनीति में धर्म और लैंगिक समानता के बीच तनाव को फिर से उजागर किया है।

यह विवाद समाजवादी पार्टी और उनके समर्थकों के लिए भी चुनौती बन सकता है, क्योंकि यह उनकी छवि को प्रभावित कर सकता है। डिंपल यादव ने अभी तक इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा आगे कौन सा रंग लेता है।

पश्चिमी मुल्कों की ढोंग वादी राजनीति

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बेंगलुरु : पश्चिमी देशों का अंतरराष्ट्रीय मामलों में ढोंग कोई नई बात नहीं है। ये एक ऐसी चाल है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों से शुरू हुई और आज तक चल रही है। पश्चिमी देश जो कहते हैं, वो करते नहीं-ये उनकी पुरानी आदत है। ब्रिटिश साम्राज्य ने दुनिया को बांटने और झगड़े पैदा करने में महारत हासिल की थी, और आज की कई समस्याएं उसी की देन हैं।

ब्रिटिश साम्राज्य ने दुनिया को टुकड़ों में बांटा। 1916 का साइक्स-पिकोट समझौता इसका बड़ा सबूत है, जिसने मध्य पूर्व को मनमाने ढंग से बांट दिया, बिना वहां के लोगों की परवाह किए। इससे इराक, सीरिया और इजरायल-फलस्तीन जैसे झगड़े पैदा हुए। 1919 का वर्साय संधि जर्मनी को सजा देकर द्वितीय विश्व युद्ध की ज़मीन तैयार की। 1947 में भारतीय सब कॉन्टिनेंट में सीमाएं अधूरी छोड़ीं, जिससे आज तक तनाव है। मैकमोहन-हुसैन पत्राचार में अरबों से आज़ादी का वादा किया, मगर बाद में धोखा दे दिया। ये सब गलतियां नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई चालबाज़ियां थीं ताकि भविष्य में तनाव बना रहे और पश्चिमी देश फायदा उठा सकें। अफ्रीका और एशिया के तमाम मुल्क बेवजह विभाजित किए गए, जहां आज भी आग सुलग रही है।

एक्सपर्ट्स बताते हैं, 2003 में इराक पर हमला इसका बड़ा नमूना है। अमेरिका और ब्रिटेन ने दावा किया कि सद्दाम हुसैन के पास खतरनाक हथियार हैं, जो बाद में झूठ साबित हुआ। डाउनिंग स्ट्रीट मेमो से पता चला कि उन्हें सच पता था, फिर भी झूठ बोला गया। इस हमले ने इराक को बर्बाद कर दिया, आईएसआईएस जैसा आतंकी समूह पैदा हुआ, और लाखों लोग मरे। मगर कोई जवाबदेही नहीं। लीबिया में 2011 में “मानवता” के नाम पर हमला किया, जो बाद में अराजकता में बदल गया। सीरिया में चुनिंदा बागियों को समर्थन देकर गृहयुद्ध को और भड़काया।

अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार मुक्ता बेंजामिन कहती हैं, “रूस के साथ यूरोप का रवैया भी दोमुंहा है। यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा तो करते हैं, मगर 2022 तक रूसी गैस पर निर्भर रहे। ऊपर से इंसाफ की बात करते हैं, नीचे से मुनाफे की। अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार में भी यही ढोंग है। यूरोपीय यूनियन के “पार्टनरशिप” समझौते गरीब देशों को फायदा कम, नुकसान ज़्यादा देते हैं। ये औपनिवेशिक लूट का नया रूप है।”

पुराने झूठ भी कम नहीं। 1953 में ईरान में मोसद्दक को हटाने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने तख्तापलट किया, क्योंकि उसने तेल का राष्ट्रीयकरण किया था। इसे साम्यवाद के खिलाफ बताया गया, मगर असल में तेल का लालच था। इससे 1979 की इस्लामी क्रांति की नींव पड़ी। सऊदी अरब जैसे दोस्तों के मानवाधिकार उल्लंघन पर चुप्पी और चीन जैसे दुश्मनों की आलोचना भी इस दोहरे चरित्र को दिखाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “झूठ बोलना बुरा है, लेकिन झूठ के जाल पर जीवन बसर करना और भी बुरा है। पश्चिमी राजनीति संस्थागत झूठ के अलावा कुछ भी नहीं है। यूरोप रूस के साथ अपने संबंधों की बात करते समय झूठ बोलता है, यह तथ्य छिपाते हुए कि यूक्रेन के खिलाफ रूस की बिना उकसाव की आक्रामकता के बावजूद, उसने ऊर्जा क्षेत्र में पुतिन के देश के साथ संबंध तोड़े नहीं हैं। वह व्यापार और अर्थव्यवस्था में कम विकसित देशों के साथ व्यवहार करते समय भी झूठ बोलता है। ऐसे उदाहरणों की सूची लंबी है। याद करें तो पश्चिम के झूठ का पहला और सबसे चौंकाने वाला उदाहरण 2003 में सद्दाम हुसैन के इराक पर आक्रमण था। तब से वह असत्य बोलने और नैतिक बुलंदियों से गिरने का दोषी रहा है। हालाँकि, इसने पश्चिम और उसकी उपलब्धियों को धूमिल कर दिया है। अब वह केवल निर्दयी स्वार्थी और लाभ के पीछे भागने वालों का समूह लगता है। संयोग से, सच्चाई के मामले में दुनिया का बाकी हिस्सा भी बेहतर नहीं कर रहा है। विश्व स्तर पर झूठ के खिलाफ एक आंदोलन शुरू करने की आवश्यकता है। हम एक उच्च सभ्यता का निर्माण तभी कर सकते हैं जब हम असत्य तथ्यों का उपयोग करना बंद कर दें।”

ये सारी समस्याएं ब्रिटिश औपनिवेशिक ढोंग से शुरू हुईं, जिन्होंने वादे तोड़े, सीमाएं अधूरी छोड़ीं, और लोगों को बांट दिया। आज कश्मीर, फलस्तीन, इराक—सब उसी की देन हैं। पश्चिमी देशों का “महानता” का दावा अब खोखला लगता है। वो बस अपने फायदे के लिए झूठ बोलते हैं। दुनिया को बेहतर बनाने के लिए झूठ के खिलाफ एक आंदोलन चाहिए। जब तक कहने और करने में फर्क रहेगा, पश्चिमी देशों की साख डूबती रहेगी, और दुनिया उनकी चालबाज़ी का खामियाज़ा भुगतेगी।

हजार साल बाद हिंदू पुनर्जागरण का दौर: सिर्फ हिन्दू राष्ट्र की घोषणा शेष

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आज दक्षिण भारत के एक शहर में RSS के गुरु सम्मान कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। बड़ी संख्या में डॉक्टर्स, व्यापारी, प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा हिन्दू संस्कृति, गौरव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन उत्साहित कर रहा था।

विचार विमर्श के दौरान आभास हुआ कि 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस ने हिंदुस्तान के सियासी, समाजी और मज़हबी तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया है। यह ऐतिहासिक वाक़या, जिसमें विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे संगठनों ने अहम भूमिका निभाई, एक मुकम्मल आंदोलन की शुरुआत थी। इस आंदोलन का मकसद न सिर्फ़ हिंदू पहचान को मज़बूत करना था, बल्कि समाज के दबे-कुचले तबकों को मुख्यधारा में लाना, मंदिर प्रबंधन को जन-जन से जोड़ना और हिंदू संस्कृति की रौनक़ बढ़ाना भी था। दरअसल, यह सिर्फ़ एक धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का इंजन बन गया।

हिंदू धर्म में जाति की दीवारें सदियों से मज़बूत रही हैं, जिसने दलितों और पिछड़ों को मंदिरों और धार्मिक रस्मों से दूर रखा। इसी वजह से कई लोगों ने बौद्ध, इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया। लेकिन अब RSS और BJP ने इस फ़र्क़ को मिटाने की कोशिश शुरू की है। मिसाल के तौर पर, 2024 में उत्तर प्रदेश के 60 से ज़्यादा मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति हुई, जो एक इतिहासी क़दम था। तमिलनाडु के श्री मुथु मरिअम्मन मंदिर में दलितों को पूजा का हक़ मिला, हालांकि कुछ उच्च जाति के लोगों ने इसका विरोध भी किया। मगर, ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के साथ यह कोशिश हिंदुओं को जोड़ने और धर्मांतरण रोकने की दिशा में अहम कदम था।

पिछले कुछ वर्षों में मंदिर प्रबंधन को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। सरकार ने कई प्रसिद्ध मंदिरों का प्रशासन अपने हाथ में लेकर पारदर्शिता बढ़ाई है। 2023-25 के बीच, केंद्र और राज्य सरकारों ने 3,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च कर काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे मंदिरों की शान बढ़ाई। वाराणसी का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन का महाकाल कॉरिडोर और अब वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर का कॉरिडोर सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं, बल्कि पर्यटन और आर्थिक विकास के केंद्र भी बन रहे हैं। 2025 के प्रयागराज कुंभ मेले के लिए 7,500 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, करोड़ों लोगों ने कुंभ स्नान किया। इसके अलावा, कांवर यात्रा और चारधाम यात्रा को बढ़ावा देने के लिए ख़ास रेल और सड़क सुविधाएं शुरू की गई हैं, जो हिंदू तीर्थों को वैश्विक पहचान दिला रही हैं।

इस हिंदू पुनर्जागरण में सामाजिक बदलाव भी शामिल है। सरकार ने दहेज मुक्त सामूहिक विवाह को बढ़ावा दिया है, जैसे उत्तर प्रदेश की ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’, जिसके तहत 2024 में 1.5 लाख से ज़्यादा जोड़ों की शादी हुई। कन्यादान और मुफ्त बस यात्रा जैसी योजनाएँ महिलाओं को सशक्त बना रही हैं। पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण और दलितों के लिए ख़ास योजनाएँ समानता की दिशा में क़दम हैं। साथ ही, हिंदू संगठनों ने लंगर और भंडारों के ज़रिए मुफ्त भोजन वितरण बढ़ाया है। हरिद्वार में सिर्फ़ 2024 में ही 12 लाख से ज़्यादा लोगों ने इन भंडारों से भोजन पाया, जो हिंदू समाज की सेवा भावना को दिखाता है। अमर नाथ यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाया गया है और कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से प्रारंभ हुई है।

एक अहम पहल narratives को सही करना और इतिहास लेखन में जान बूझकर की गई विकृतियों को दूर करने की भी हुई है। अंग्रेज़ों, मुस्लिम शासकों, कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा बिगाड़े गए इतिहास को सुधारने के लिए NCERT की किताबों में बदलाव किए गए हैं। हिंदी, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। योग और आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया गया है, जहाँ 2025 के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस में 100 से ज़्यादा देशों ने हिस्सा लिया। वाराणसी की गंगा आरती अब एक वैश्विक आकर्षण बन चुकी है, जो हिंदू संस्कृति की शान को प्रदर्शित करता है। यमुना समेत कई अन्य पवन नदियों के घाटों पर भी आरती का आयोजन हो रहा है।
बीजेपी का खुला एजेंडा धर्मनिरपेक्षता को नया रूप दे रहा है। आलोचक कहते हैं कि यह संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर करता है, जबकि समर्थक इसे तुष्टिकरण की राजनीति का अंत मानते हैं। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर का अभिषेक, जो बाबरी मस्जिद की जगह बना, इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे राम राज्य’ की शुरुआत बताया।
यह हिंदू पुनर्जागरण कई रंगों वाला आंदोलन है, जो पुरानी परंपराओं को नए ज़माने से जोड़ रहा है। यह हिंदुओं को एकजुट करने और सशक्त बनाने की कोशिश है, लेकिन भारत की विविधता पर इसके असर को लेकर बहस अब भी जारी है। क्या यह देश को एक नए युग में ले जाएगा, या फिर समाज में नए तनाव पैदा करेगा-यह वक़्त ही बताएगा।

संक्षिप्त में, निम्न उदाहरण संकेत देते हैं कि इंडिया किस दिशा में बढ़ रहा है।

1. राम मंदिर निर्माण का समर्थन और भूमि पूजन में प्रधानमंत्री की भागीदारी (2020)
2. धारा 370 हटाना (2019)
3. सीएए (Citizenship Amendment Act) 2019
4. संवेदनशील धार्मिक स्थलों का पुनर्प्रस्ताव: काशी और मथुरा विवाद
5. ‘लव जिहाद’ विरोधी कानूनों का प्रस्ताव और पारित करना (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में)
6. संस्कृत और वैदिक शिक्षा को बढ़ावा
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में संस्कृत को विशेष दर्जा मिला।
7. गौरक्षा कानूनों और ‘बीफ बैन’ को बढ़ावा
8. NCERT और इतिहास की पुस्तकों में बदलाव
9. ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारों को राष्ट्रवाद से जोड़ना
10. हिंदू प्रतीकों और रीति-रिवाज़ों का राजनीतिक मंचों पर उपयोग

इन उदाहरणों से यह तर्क दिया जाता है कि मोदी सरकार “धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र” की अवधारणा से हटकर एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित “हिंदू राष्ट्र” के विचार की ओर बढ़ रही है। सरकार इसे “भारतीयता” या “सनातन मूल्यों की वापसी” कहती है, वहीं आलोचक इसे धर्मनिरपेक्ष संविधान के विरुद्ध एक रणनीतिक बदलाव मानते हैं।

भारत में शिक्षा का संकट: परख सर्वे ने उजागर की चिंताजनक खामियां

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आगरा। गांव के बुजुर्ग राम नाथ, रिटायर्ड मास्साब कहते हैं, ‘क्लास रूम’ में दीवारें हैं, पर दिशा नहीं। ब्लैकबोर्ड है, पर बुनियादी समझ नदारद। भारत की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था गहरे संकट में है। हर साल करोड़ों बच्चे स्कूल तो जाते हैं, पर सीखते क्या हैं – यह एक राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं!”

तमाम रिपोर्ट बार-बार चीख-चीख कर कह रही है कि आठवीं क्लास के बच्चे तीसरी की किताब भी नहीं पढ़ पाते। सरकारी स्कूलों में शिक्षक तो हैं, पर पढ़ाने की लगन नहीं। निजी स्कूलों में फीस है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का घोर अभाव। पाठ्यक्रम रटंत विद्या को बढ़ावा देते हैं, सोचने-समझने की क्षमता को कुचलते हैं।

बुनियादी गणित और भाषा कौशल की भारी कमी से ये पीढ़ी एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रही है जहाँ न नौकरी मिलेगी, न समझदारी से फैसले लेने की योग्यता। यह सिर्फ शिक्षा का नहीं, देश की आत्मा का संकट है। अगर अब नहीं जागे, तो एक “डिग्रीधारी परंतु दिशाहीन भारत” तैयार हो रहा है — और यह त्रासदी किसी महामारी से कम नहीं होगी, कहते हैं प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।

हाल ही में, शिक्षा मंत्रालय के तहत एनसीईआरटी द्वारा आयोजित परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 ने भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर किया है। इस सर्वे में 781 जिलों के 74,229 स्कूलों में तीसरी, छठी और नौवीं कक्षा के 21.15 लाख से अधिक छात्रों का मूल्यांकन किया गया। नतीजे बताते हैं कि बुनियादी साक्षरता, गणित और तार्किक सोच में छात्रों की कमी चिंता का सबब है।
परख सर्वे, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत है, ने भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन (तीसरी और छठी कक्षा) और विज्ञान व सामाजिक विज्ञान (नौवीं कक्षा) में छात्रों का आकलन किया। नतीजों से पता चलता है कि जैसे-जैसे छात्र ऊपरी कक्षाओं में जाते हैं, उनकी योग्यता कम होती जाती है। गणित सबसे कमजोर विषय रहा। तीसरी कक्षा में केवल 55% छात्र 99 तक की संख्याओं को क्रम में लगा पाते हैं, और 58% ही दो अंकों की जोड़-घटाव कर पाते हैं। छठी कक्षा में सिर्फ 53% छात्र 10 तक का पहाड़ा जानते हैं, और केवल 29% साधारण भिन्नों को समझ पाते हैं। नौवीं कक्षा में हालात और खराब हैं, जहां गणित में राष्ट्रीय औसत स्कोर 37% है, और 63% छात्र भिन्न और पूर्णांक जैसे बुनियादी अवधारणाओं को नहीं समझ पाते।

भाषा में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। छठी कक्षा में 43% छात्र पाठ की मुख्य बातें समझने या निष्कर्ष निकालने में असमर्थ हैं। नौवीं कक्षा में विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में स्कोर 40% के आसपास है, जिसमें छात्र बिजली, ज्यामिति और वैज्ञानिक तर्क जैसी चीजों को समझने में कमजोर दिखे। ये कमियां बताती हैं कि शुरुआती कक्षाओं में बुनियादी कौशल मजबूत नहीं हो पा रहे, जो बाद में और बिगड़ता है।
सर्वे में असमानताएं भी सामने आईं। तीसरी कक्षा में ग्रामीण छात्र शहरियों से भाषा और गणित में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, शायद निपुण भारत मिशन जैसे प्रयासों के कारण। लेकिन छठी और नौवीं कक्षा में शहरी छात्र ग्रामीणों से आगे निकल जाते हैं। लिंग के आधार पर अंतर कम है, लेकिन लड़कियां भाषा में थोड़ा बेहतर (तीसरी कक्षा में 65% बनाम 63%) हैं, जबकि गणित में दोनों बराबर हैं। केंद्रीय स्कूल, जैसे केंद्रीय विद्यालय, नौवीं कक्षा में भाषा में बेहतर हैं, लेकिन तीसरी कक्षा में गणित में पीछे हैं। सरकारी स्कूल शुरुआती कक्षाओं में अच्छे हैं, जबकि निजी स्कूल विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में बेहतर हैं, लेकिन गणित में कमजोर हैं।

पंजाब, केरल, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और दादरा व नगर हवेली जैसे राज्य शीर्ष पर हैं, जबकि झारखंड, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के जिले सबसे नीचे हैं। ये अंतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण की कमी को दर्शाते हैं।

शिक्षाविदों ने एनईपी के अनुरूप नई शिक्षण विधियों और डिजिटल लर्निंग पर जोर दिया है।
भारत अगर डेटा-आधारित शिक्षा सुधार चाहता है, तो परख सर्वे एक बड़ा अलार्म है। यह न केवल नीतिगत सुधारों की मांग करता है, बल्कि परीक्षा-केंद्रित शिक्षा के बजाय समग्र सीखने की संस्कृति की जरूरत को रेखांकित करता है। तत्काल हस्तक्षेप के बिना, समान और योग्यता-आधारित शिक्षा का सपना अधूरा रहेगा।

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