नेशन फर्स्ट, रिलिजन लास्ट — यही भारत का सच्चा राष्ट्रधर्म है: डॉ. इंद्रेश कुमार

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लखनऊ, 27 जनवरी। विकसित भारत के संकल्प काल में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक समरसता और नागरिक कर्तव्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए लखनऊ के एरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज में “एक क़ौम, एक वतन – हिंदुस्तान” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक डॉ. इंद्रेश कुमार ने कहा कि “नेशन फर्स्ट, रिलिजन लास्ट और वतन की मुहब्बत जन्नत पहुंचाती है”—यही भारत की आत्मा और सच्चा राष्ट्रधर्म है। उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने कहा कि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में हर नागरिक की जिम्मेदारी निर्णायक है। संगोष्ठी में राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर विमर्श हुआ।

कार्यक्रम में इंद्रेश कुमार और उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ एवं हज राज्यमंत्री दानिश अंसारी के साथ साथ एनसीएमईआई के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर, आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति राज कुमार मित्तल, जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफा, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक सैयद रज़ा रिज़वी और डॉ. शालिनी अली, एरम ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर ख्वाजा फैज ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में शौकत अली, ठाकुर राजा रईस, आलोक चतुर्वेदी, जियारत बाबा मलंग, ताहिर शाह, कारी अबरार जमाल, मज़ाहिर खान, पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद, पूर्व कुलपति माहरुख मिर्ज़ा, समाजसेवी सहर बानो, सुन्नी वक्फ बोर्ड की सदस्य सबिहा अहमद समेत बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, समाजसेवी और छात्र-छात्राएं मौजूद रहीं।

डॉ. इंद्रेश कुमार ने नफरत, अलगाव और कट्टरता की राजनीति करने वालों को समाज और देश दोनों का दुश्मन बताते हुए सभी समुदायों से आपसी भाईचारा, संविधान के सम्मान और राष्ट्र निर्माण में एकजुट होकर योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता है और इसी भावना के साथ आगे बढ़कर ही देश विश्वगुरु बनेगा।

इंद्रेश कुमार ने कहा कि बांग्लादेशी मुसलमान जो घुसपैठिए हैं वो भारतीय मुसलमानों का हक खा रहे हैं। भारतीय मुसलमान बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं जबकि घुसपैठिए नौकरी कर रहे हैं, रोजगार में लगे हैं, व्यापार कर रहे हैं, सड़कों पर ठेले लगा रहे हैं। हज पर जाने वाले मुसलमान वहां आवाज उठाएं कि बांग्लादेश के मुसलमानों को कुछ कुछ लाख सभी 59 मुस्लिम देश रख लेंगे तो ये सबका भला होगा। भारतीय मुसलमानों को उनका हक मिल सकेगा।

राज्यमंत्री दानिश अंसारी ने इस अहम मुद्दे पर आयोजित संगोष्ठी को वक्त की मांग बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत’ का संकल्प पूरे देश को साथ लेकर आगे बढ़ने की सोच है। उन्होंने कहा कि यह सरकार दल से ऊपर उठकर पूरे देश को एकजुट कर भारत को आगे बढ़ाने में लगी है। विकसित भारत का संकल्प बहुत बड़ा है और इसके लिए पूरे देश में इंद्रेश कुमार और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की विकसित भारत की सोच पूरे देश को विकसित करने की सोच है, जिससे भारत दुनिया के बड़े देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होगा, जो हर भारतीय के लिए गर्व की बात है।

दानिश अंसारी ने कहा कि यदि भारत का एक-एक नागरिक अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभा ले तो देश खुद-ब-खुद विकसित हो जाएगा। गांव में बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक की जिम्मेदारी उतनी ही है जितनी सरहद पर खड़े सैनिक की है। आज़ादी के लिए हमने बड़ी कीमत चुकाई है और लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। उन्होंने कहा कि हम सब भारतीय हैं और हमें एकजुट होकर सोचना और आगे बढ़ना है, तभी एक भारत, सशक्त भारत और श्रेष्ठ भारत का सपना साकार होगा।

एनसीएमईआई (NCMEI) के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि 140 करोड़ लोगों के इस देश में विविधता के बीच एकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और बहुलतावाद में बसती है, और यही मूल्य हमें विश्व में एक अनूठी पहचान देते हैं।

प्रो. अख्तर ने नफरत फैलाने वाली सोच और विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के हर वर्ग की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों को संवाद, समझ और सकारात्मक मार्गदर्शन के जरिए सही रास्ते पर लाया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कानून या सरकार ही नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षण संस्थान, धार्मिक नेता और सामाजिक संगठन मिलकर ही सौहार्दपूर्ण वातावरण बना सकते हैं।

उन्होंने सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और एक-दूसरे के त्योहारों में सहभागिता को राष्ट्रीय एकता की मजबूत नींव बताते हुए कहा कि जब हम एक-दूसरे की खुशियों और परंपराओं में शामिल होते हैं, तो आपसी अविश्वास और दूरी अपने आप कम हो जाती है।

प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर ने युवाओं से विशेष अपील करते हुए कहा कि वे सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदार नागरिक की तरह व्यवहार करें, अफवाहों और नफरत भरे संदेशों से दूर रहें तथा सद्भाव, शांति और राष्ट्रीय एकता के संदेश को आगे बढ़ाएं।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि भारत तभी सशक्त और समृद्ध बनेगा, जब हर नागरिक, चाहे वह किसी भी धर्म, भाषा या क्षेत्र से हो, खुद को इस देश का समान भागीदार महसूस करे और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के संकल्प को व्यवहार में उतारे।

आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति राज कुमार मित्तल ने युवाओं की शक्ति को शिक्षा, राष्ट्रहित और रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि गरीबी, बेरोजगारी और भेदभाव से मुक्त, सौहार्द और समरसता से भरा भारत ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

डॉ. शालिनी अली ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में एकता है। उन्होंने कहा, “हम सब एक हैं। हमारी पूजा-पद्धतियाँ भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हमारा संविधान एक है और हमारा डीएनए भी एक है। यही भारतीयता की पहचान है।” उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्माण बच्चों की सही तालीम और संस्कारों से होता है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, राष्ट्रप्रेम और जिम्मेदार नागरिक बनने की शिक्षा भी दें।

डॉ. अली ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि बिना सत्यापन के किसी भी प्रकार की सामग्री साझा करना समाज में भ्रम, नफरत और वैमनस्य फैलाने का कारण बन सकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे किसी भी खबर, वीडियो या संदेश को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सच्चाई की जांच अवश्य करें और अफवाहों का हिस्सा न बनें।

उन्होंने “मोमिन” और “मुसलमान” के फर्क को समझाने पर भी जोर दिया और कहा कि सिर्फ नाम या पहचान से नहीं, बल्कि अपने आचरण, चरित्र और कर्म से ही कोई सच्चा मोमिन बनता है। उन्होंने कहा कि सच्चा मुसलमान वही है जो देश के कानून का सम्मान करे, समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखे और इंसानियत की सेवा को अपना धर्म माने। उनके विचारों ने उपस्थित लोगों को आत्ममंथन और सकारात्मक सोच के लिए प्रेरित किया।

कर्नल ताहिर मुस्तफा ने कहा कि “एक कौम, एक वतन हिंदुस्तान” हमारा मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम के विचारों का उल्लेख करते हुए श्रेष्ठ भारत और विकसित भारत की मुहिम को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और देश में नफरत फैलाने वालों का समाज को मिलकर मुकाबला करने की जरूरत बताई।

यूजीसी के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ का उद्देश्य महत्वपूर्ण, परंतु विनियमों में स्पष्टता और संतुलन आवश्यक : अभाविप।

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दिल्ली । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी अधिसूचना “विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026” का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, परंतु इन विनियमों में स्पष्टता और संतुलन अत्यंत आवश्यक है।अभाविप मानती है कि यूजीसी तथा सभी शैक्षणिक संस्थानों को लोकतंत्र में अंतर्निहित भावना को अक्षुण्ण रखना चाहिए, जहाँ प्रत्येक नागरिक के पास समान अधिकार हों और भारत भेदभाव मुक्त तथा समता युक्त बने।

अभाविप सदैव ही शैक्षिक परिसरों में सकारात्मक और समतायुक्त परिवेश बनाने की दिशा में कार्य करती रही है और लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन की पक्षधर रही है। आगामी वर्षों में ‘विकसित भारत’ की संकल्पना को सिद्ध करने के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है। यूजीसी के इस समता संबंधी विनियम के कुछ प्रावधानों और शब्दावली को लेकर समाज, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों के बीच जो अस्पष्टता और भ्रांतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, इनपर यूजीसी को त्वरित संज्ञान लेते हुए तत्काल कार्यवाही करनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की विभाजनकारी स्थिति उत्पन्न न हो सके। ध्यातव्य हो, यह विषय वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है अतः अभाविप मानती है कि यूजीसी को इस संदर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए न्यायालय में शीघ्र हलफनामा दाखिल करना चाहिए।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि, “शैक्षणिक परिसरों में सौहार्द एवं समानता सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है, जिसके लिए अभाविप ने सदैव प्रयास किए हैं। शैक्षणिक परिसरों में सभी वर्गों के लिए सामाजिक समानता होनी चाहिए तथा परिसरों में किसी भी प्रकार के भेदभावों के लिए कोई स्थान नहीं हैं। इस विनियम को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं हितधारकों के मध्य भ्रांतियाँ व्याप्त हैं, जिन पर यूजीसी को सभी हितधारकों से संवाद करते हुए संबंधित भ्रांतियों को दूर करने हेतु तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए। लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने तथा सभी विद्यार्थियों के लिए भेदभाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करने हेतु समाज के सभी वर्गों के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।”

उत्तराखंड में यूसीसी लागू हुए एक साल पूरा, जानिए क्या हैं फायदे?

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 रवि पाराशर

देहरादून । उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू हुए एक साल पूरा हो गया है। पिछले साल 27 जनवरी को राज्य में यूसीसी लागू किया गया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद उत्तराखंड ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बन रहा है। मंगलवार, 27 जनवरी को संहिता लागू होने के एक साल पूरा होने के मौके पर राज्य में यूसीसी दिवस मनाया गया।

समान नागरिक संहिता के तहत उत्तराखंड में शादियों का रजिस्ट्रेशन अब पहले के मुकाबले ज्यादा सरल और पारदर्शी हो गया है। आर्थिक कारणों से राज्य का कोई भी नागरिक अधिकार से वंचित न हो, इसके लिए 26 जुलाई 2025 तक शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए कोई फीस वसूल नहीं की गई। अब तक करीब चार लाख 75 हजार शादियों का रजिस्ट्रेशन यूसीसी के प्रावधानों के तहत किया जा चुका है। साफ है कि देश में पहली बार यूसीसी लागू कर उत्तराखंड दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बन गया है।

उत्तराखंड सरकार ने समान नागरिक संहिता संशोधन अध्यादेश 2026 लागू कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद अध्यादेश तत्काल रूप से प्रभावी हो गया है। इसके जरिए यूसीसी एक्ट 2024 के कई प्रावधानों में प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक और दंडात्मक सुधार किए गए हैं, ताकि इसे असरदार, पारदर्शी और सुचारू रूप से लागू किया जा सके।

यूसीसी अध्यादेश के अनुसार नए नियमों के तहत शादी के वक्त पहचान छिपाना या झूठी जानकारी देना विवाह को रद्द करने का आधार बना दिया गया है। इसके साथ ही शादी और लिव-इन रिलेशनशिप में जबरदस्ती, दबाव, धोखाधड़ी या अवैध कृत्य करने वालों को कड़ी सजा के प्रावधान किए गए हैं। संशोधन में यह भी प्रावधान किया गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप खत्म होने पर रजिस्ट्रार टर्मिनेशन सर्टिफिकेट जारी करेगा। इसके अलावा कानून में “विधवा” शब्द की जगह अब “पति/पत्नी” शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।

अध्यादेश के तहत रजिस्ट्रार जनरल को शादी, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप और उत्तराधिकार से जुड़े रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार भी दिया गया है। साथ ही अगर सब-रजिस्ट्रार तय समय में कार्रवाई नहीं करता है, तो मामला अपने आप रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रार जनरल के पास भेज दिया जाएगा।

सजा के प्रावधानों में भी बदलाव कर दिया गया है। अब दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय दंड संहिता 1860 की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 को लागू किया गया है। लगाए गए जुर्माने के खिलाफ अपील का अधिकार भी दिया गया है और जुर्माने की वसूली भू-राजस्व की तरह की जाएगी।

यूसीसी लागू होने से पहले राज्य में शादियों का रजिस्ट्रेशन उत्तराखंड अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम 2010 के तहत किया जाता था। इसकी पूरी प्रक्रिया ऑफलाइन थी। लेकिन यूसीसी के तहत अब करीब-करीब 100 प्रतिशत विवाह पंजीकरण ऑनलाइन किए जा रहे हैं। आंकड़ों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके अच्छे नतीजे देखने को मिल रहे हैं।

समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 44 में किया गया है। यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसमें कहा गया है कि है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता यानी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में एक जैसे अधिकार सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 44 में दिए गए सुझाव का मुख्य मकसद निजी कानूनों में एकरूपता लाकर सभी नागरिकों को एक जैसे अधिकार देना है, ताकि धर्म, संप्रदाय या लिंग के आधार पर भेदभाव खत्म हो सके।

लेकिन आजादी के बाद उत्तराखंड को छोड़ कर किसी भी राज्य ने इस ओर कोई पहल ही नहीं की। हालांकि गोवा में 1867 के पुर्तगाली कानून के तहत समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है। अब गौर करने वाली बात यह भी है कि देश के कई हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहुत बार अपने ऐतिहासिक निर्णयों में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत प्रमुख रूप से रेखांकित की है, लेकिन राज्यों ने यूसीसी लागू करने की कोई जरूरत अभी तक क्यों नहीं समझी है, इस बड़े प्रश्न का एक मुख्य उत्तर तो यही है कि वोट बैंक की राजनीति या कहें कि तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से पार्टियों या गठबंधनों की सरकारों ने इसे लागू करने के बारे में किसी भी स्तर पर विचार ही नहीं किया।

उत्तराखंड में भी समान नागरिक संहिता लागू किए जाने पर कई कट्टरपंथी संगठनों ने इसका भरपूर विरोध किया, लेकिन महिलाओं, खास कर मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने की बात समझ में आने के बाद वे इसका विरोध नहीं कर रही हैं। यूसीसी लागू होने के बाद अब हलाला, इद्दत और तलाक जैसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लग गया है। इसने संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं के लिए समान अधिकार तय किए हैं। शादी और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। जो जोड़े विवाह या तलाक का पंजीकरण नहीं कराएंगे, उन्हें सरकारी फायदे नहीं मिलेंगे। लिव-इन रिश्तों का रजिस्ट्रेशन भी जरूरी कर दिया गया है। ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को भी यूसीसी के तहत वैधता दी गई है।

उत्तराखंड सरकार ने विवाह, तलाक, उत्तराधिकार अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया है। पोर्टल पर अपनी परेशानी की शिकायत भी की जा सकती है। सीमित इंटरनेट पहुंच वाले दूरदराज या ग्रामीण इलाकों में लोगों की मदद के लिए कॉमन सर्विस सेंटर यानी सीएससी को रजिस्ट्रेशन के लिए अधिकृत किया गया है। सीएससी एजेंट जरूरी रजिस्ट्रेशन के लिए पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में घरों का दौरा कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों को इस प्रक्रिया में मदद0 के लिए उप-रजिस्ट्रार के तौर पर नामित किया गया है।
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वामपंथी लेखकों से अब विमर्श करना, दीवार में सिर मारना है

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। वामपंथी लेखकों से जो लोग विमर्श की चोंच लड़ाते हैं , उन को देख कर तरस आता है। [ गो कि बहुत संभलने के बावजूद कभी-कभार मैं भी यह ग़लती कर जाता हूं। ] क्यों कि अब उन के यहां विमर्श का मतलब या तो डिक्टेशन सुनना है या हां में हां मिलाना है। जो उन का डिक्टेशन यानी इमला नहीं सुन सकता है , वह भाजपाई , संघी , हिंदुत्ववादी आदि-इत्यादि होता है। तो विमर्श के नौसिखियों से पूछता हूं कि आप लोग कहां फंस गए हैं। गो कि कुछ पके और तजुर्बेकार दोस्तों को भी इस विमर्श के दलदल में फंसे देखता हूं तो हंसी आती है। कुछ मित्र तो इन दिनों सफाई पर सफाई का झंडा भी फहरा रहे हैं, नित्य-प्रति।

तो फिर से पूछता हूं कि आप लोग कहां फंस गए हैं। क्यों कि वामपंथी लेखकों से अब विमर्श करना, दीवार में सिर मारना है। इस्लामिक कट्टरपंथ से , कठमुल्लों से भी ज़्यादा कट्टर वामपंथी लेखक हो चले हैं। बल्कि कट्टरपंथ से भी बड़ा इन का अहंकार होता है। हिमालय से बड़ा अहंकार। तो इन से विमर्श करना सिर्फ़ और सिर्फ़ वक्त बरबाद करना है। इन की चुनी हुई चुप्पी, चुने हुए विरोध किसी बैल की तरह इन्हें अपने जुआठ में बांधे रहते हैं। तेली के बैल की तरह यह लोग अपनी परिधि नहीं छोड़ सकते। किसी सूरत नहीं छोड़ सकते। यह बीमार लोग हैं। बहुत बीमार।

तिस पर अधिकांश वामपंथी लेखक एन जी ओ चलाने वाले लोग हैं।कभी मानव संसाधन मंत्री रहे अर्जुन सिंह ने इन लोगों के एन जी ओ को विपुल धनराशि दे-दे कर इन की आदतें बिगाड़ दीं । मनबढ़ बना दिया। कहूं कि अपना कुत्ता बना लिया। यह एन जी ओ अनुदान का काकस मोदी राज ने तोड़ दिया है। किताबों की सारी सरकारी खरीद, सारी विदेश यात्राओं पर ग्रहण लगा दिया है। तो यह बिन पानी की मछली बन गए हैं। छटपटा रहे हैं। हर असहमत को संघी , हिंदुत्ववादी , भाजपाई कहने की मिर्गी का दौरा रह-रह कर पड़ रहा है।

हालत यह हो गई है कि अगर आप कह दीजिए कि सूरज पूरब से उगता है तो यह कहेंगे कि अरे, यह तो दक्षिणपंथी है। संघी है। हिंदुत्ववादी है । जैसे भी हो , इन्हें सच सुनना किसी सूरत गवारा नहीं है। तथ्य से नहीं, विचारधारा के थर्मामीटर से हर बात को नापने की बीमारी है।

इन की विचारधारा अगर इन्हें बता देती है कि सूरज पश्चिम से निकलता है तो यह इसी को मानेंगे। ठीक वैसे ही जैसे जब तक अरब में चांद नहीं दिखा तो भारत में नहीं दिखा मान लेने की परंपरा है। अरब में चांद दिखा तब ही ईद मनेगी , वरना नहीं। खुदा न खास्ता अगर आप ने टोक दिया कि नहीं, सूरज तो पूरब से ही निकलता है। तो यह फौरन आप को संघी आदि का सर्टिफिकेट थमा कर खुश हो लेंगे। गोया पूरा देश ही संघी हो गया हो। सो, कुतर्क की इन्हें लत है। तो इन्हें बिन पानी के छोड़ दीजिए। इन की चर्चा होती है तो इन्हें लगता है, यह अभी भी ताकतवर हैं। तो इन्हें बेदम ही छोड़ दीजिए। इन की सांस उखड़ चुकी है।

इसी लिए यह लोग अब लिखना छोड़ कर ऐक्टिविस्ट बन गए हैं। इन के पास अब रचना नहीं, सिर्फ़ फतवा है। भौ-भौ और कांव-कांव ही शेष रह गया है इन के हिस्से। तो दोस्तों , इन्हें इन के हाल पर छोड़ कर आगे बढ़ लिजिए। कुछ अप्रतिम, कुछ सार्थक रचिए।

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