गांधी की ‘अंतिम इच्छा’ को क्या साकार कर रहा है आरएसएस

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दिल्ली। क्या आप जानते हैं, स्वतंत्र भारत के निर्माण के समय महात्मा गांधी ने एक ऐसा सपना देखा था, जो आज भी अधूरा है। 27 जनवरी 1948 को, अपनी हत्या से महज तीन दिन पहले, उन्होंने एक नोट में लिखा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। अब इसे राजनीतिक संगठन के रूप में भंग कर देना चाहिए और यह ‘लोक सेवक संघ’ हो जाए-एक ऐसा संगठन जो सत्ता की प्रतिस्पर्धा से दूर रहकर जनसेवा, सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता और नैतिक उत्थान पर केंद्रित हो। गांधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कांग्रेस ” It must be kept out of unhealthy competition with political parties and communal bodies. For these and other similar reasons, the A.I.C.C. resolves to disband the existing Congress organization and flower into a Lok Sevak Sangh under the following rules with power to alter them as occasion may demand. . “। उन्होंने इसे ‘His Last Will and Testament’ के रूप में प्रस्तुत किया, जो उनकी हत्या से एक दिन पहले 29 जनवरी 1948 को हरिजन में प्रकाशित हुआ। अगले दिन 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या के बाद यह इच्छा अनसुनी रह गई। कांग्रेस ने सत्ता की कुर्सी संभाली और गांधीजी के सपने को राजनीतिक महत्वाकांक्षा में बदल दिया।

आज, जब हम गांधीजी के इस अंतिम संदेश को याद करते हैं, तो एक सवाल उठता है—क्या कोई संगठन उनके लोक सेवक संघ के विचार को वास्तविकता में जमीन पर उतार सकता है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यों पर नजर डालें तो कई पहलुओं में यह गांधीजी के उस सपने से मेल खाता नजर आता है।

आरएसएस एक गैर-राजनीतिक, स्वयंसेवी संगठन है, जो अनुशासन, राष्ट्रसेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और आपदा राहत पर जोर देता है। कोरोना महामारी के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवकों ने बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के लाखों लोगों को भोजन, ऑक्सीजन और चिकित्सा सहायता पहुंचाई। प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, स्वच्छता अभियान, सामाजिक सद्भाव और युवाओं में राष्ट्रभक्ति का प्रसार-ये सभी प्रयास गांधीजी के उस विचार से जुड़ते हैं जिसमें उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से अलग कर एक सेवा-केंद्रित सामाजिक संगठन बनाने की बात कही थी।

गांधीजी ने लोक सेवक संघ को स्वयंसेवी आधारित, गांव-केंद्रित और नैतिक मूल्यों पर टिका हुआ बताया था। आरएसएस की शाखाएं, सेवा कार्य और संगठनात्मक संरचना इस दिशा में एक व्यावहारिक रूप दिखाती है। हालांकि गांधीजी और आरएसएस के बीच वैचारिक मतभेद रहे हैं—खासकर अहिंसा, अल्पसंख्यक सुरक्षा और समावेशिता पर—लेकिन उनके अंतिम नोट को यदि मूल रूप से देखें, तो आरएसएस जैसा संगठन सत्ता-मुक्त सेवा के उनके सपने के करीब दिखता है। जहां कांग्रेस ने गांधीजी की इच्छा को नजरअंदाज कर परिवार-केंद्रित राजनीति अपनाई, वहीं आरएसएस ने सत्ता से दूरी बनाकर लोक-सेवा का मार्ग चुना।

दूसरी ओर, कांग्रेस की यात्रा गांधीजी के सपने से पूरी तरह विपरीत रही। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता की लालसा में आंतरिक लोकतंत्र और नैतिकता को ताक पर रख दिया। गांधीजी की हत्या के बाद सुरक्षा में लापरवाही के सवालों पर कोई गंभीर जांच नहीं हुई। 20 जनवरी 1948 को उन पर पहले हमला हुआ था, फिर भी 30 जनवरी को सुरक्षा इतनी ढीली क्यों रही-इस पर मीडिया और कांग्रेस ने चुप्पी साध ली। महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों पर हुए हमलों और नरसंहार पर भी कांग्रेस सरकार से कोई सवाल जवाब नहीं हुआ। आरएसएस पर गांधी हत्या की सारी जिम्मेवारी डाल कर, केन्द्र में मौजूद उस समय की कांग्रेस सरकार को सभी तरह की जवाबदेही से मीडिया ने मुक्त कर दिया।

कांग्रेस शासनकाल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के संरक्षण में रहा। इमरजेंसी (1975-77) के दौरान सेंसरशिप के बावजूद कांग्रेस-अनुकूल पत्रकारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। नीरा राडिया टेप्स कांड में प्रमुख पत्रकारों के नाम आए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1984 के सिख नरसंहार में कांग्रेस सरकार थी, लेकिन मीडिया ने पार्टी नेताओं से कड़े सवाल नहीं पूछे। बोफोर्स घोटाले में भी कई पत्रकारों ने इसे दबाने की कोशिश की। राजीव शुक्ला जैसे पत्रकारों ने स्वीकार किया कि कांग्रेस की आलोचना करने पर राजीव गांधी ने तारीफ की, क्योंकि इससे एक कांग्रेसी पत्रकार, निष्पक्ष दिखता था और उसकी विश्वसनीयता बढ़ती थी- और पार्टी को भी उनकी कांग्रेस-निष्ठा पर कभी संदेह नहीं हुआ। सुप्रिया श्रीनेत जैसे उदाहरण भी इसी इकोसिस्टम को दर्शाते हैं, जहां राजनीतिक कनेक्शन से पत्रकारिता में अच्छी नौकरी आसानी मिलती रही।

2014 के बाद कई पत्रकार खुद को ‘विपक्ष की भूमिका’ में देखने पर जोर देते दिखाई देते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया को सत्ता के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। लेकिन कांग्रेस की सरकारों के समय से आज तक ये पत्रकार महात्मा गांधी की अंतिम इच्छा या उनकी सुरक्षा में हुई लापरवाही पर कोई सवाल नहीं उठा पाते हैं? फिर भी चाहते हैं कि इन्हें निष्पक्ष माना जाए!

भाजपा के खिलाफ तो दशकों से एक मजबूत विरोध की दीवार खड़ी की गई थी। उसकी साम्प्रदायिक और बनिया ब्राम्हणों की पार्टी की छवि देश भर में मीडिया ने ही बनाई। दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ ‘नियंत्रित आलोचना’ की नीति पर मीडिया काम कर रहा था। इसलिए सोनिया गांधी को लेकर मीडिया में आलोचना के तेवर हमेशा सुस्त रहे। याद है ना, कैसे जेवियर मोरो की द रेड साड़ी भारत में प्रतिबंधित कर दी गई लेकिन मीडिया ने इसकी खबर कानों कान किसी को नहीं होने दी।

आज पूरे देश के सामने यह बड़ा सवाल है—क्या महात्मा गांधी का सपना राजनीतिक दलों की सत्ता की लालच में कहीं खो गया? या फिर लोक-सेवा के रास्ते पर कोई संगठन आज भी उस सपने को जिंदा रख सकता है?

आरएसएस का कामकाज इस दिशा में एक संभावना जरूर दिखाता है। ऐसे समय में कांग्रेस को गंभीर आत्मचिंतन करना होगा-क्या वह वाकई महात्मा गांधी के सच्चे उत्तराधिकारी है, या उनके सपनों को अनदेखा करने वाली राजनीतिक पार्टी?

UGC के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, अब 19 मार्च को सुनवाई, पक्षकारों से CJI ने पूछे तीखे सवाल

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डॉ. करुणा शंकर 

दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के हाल ही में अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026′ का नियम 3 (सी) ‘गैर-समावेशी” है, जो छात्र और शिक्षक आरक्षित श्रेणियों के नहीं हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले की सुनवाई 19 मार्च को होगी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि फिलहाल यूजीसी का 2012 का रेगुलेशन ही जारी रहेगा। इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों से कई तीखे सवाल भी पूछे। सीजेआई ने पूछा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके है और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं? मामले पर सनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां इस प्रकार हैं-

यूजीसी के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई।

सुनवाई के दौरान क्या हुई बहस
सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ मामले पर आज सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि हम यूजीसी के रेगुलेशन के सेक्शन 3 c को चैलेंज कर रहे जिसमें जातिगत भेदभाव की बात की गई है। उन्होंने कहा कि जो परिभाषा रेगुलेशन में भेदभाव की दी गई है वो पूरी तरह से सही नहीं है। संविधान के विपरीत है। संविधान के मुताबिक भेदभाव देश के सभी नागरिकों से जुड़ा है। लेकिन यूजीसी का कानून सिर्फ विशेष वर्ग के प्रति भेदभाव की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो भी आदेश दिया है ये उस भावना के खिलाफ है। इससे समाज में वैमनस्य बढ़ेगा। ये संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा?
इस पर CJI ने पूछा कि अगर दक्षिण भारत के किसी छात्र को उत्तर भारत के विश्विद्यालय में एडमिशन मिलता है, उस पर टिप्पणी होती है तो क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इसके लिए अलग से प्रावधान है किसी के जन्मस्थान के आधार पर अगर भेदभाव होता है तो उस पर एक्शन लिया जा सकता है।

रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए?
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, यूजीसी के नियम से रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए? यूजीसी का नया नियम प्रगतिवादी ने होकर हमें पीछे ले जा रहा है। कल कोई फ्रेशर लड़का जो सामान्य जाति से आता है, वो पहले ही दिन अपराधी बनकर जेल के पीछे चला जाएगा। ऐसा अंदेशा है। इसे लेकर CJI ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं.और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं? याचिकाकर्ता ने यूजीसी के रेगुलेशन को समाप्त किए जाने की मांग की और इस पर तुरंत रोक लगाए जाने की मांग की। याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर हमें इजाजत मिले तो इससे बेहतर रेगुलेशन बनाकर दें।

29 जनवरी 1528 : चंदेरी में बाबर का विध्वंस : 1500 क्षत्राणियों के साथ महारानी मणिमाला का जौहर

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-रमेश शर्मा

भोपाल । भारतीय इतिहास के कुछ पन्ने रक्त से ऐसी रंजित घटनाओं से भरे हैं जिनका विवरण आज भी रोंगटे खड़े देता है । ऐसा ही एक विवरण चंदेरी का है जहाँ लाशों के ढेर लगाकर आक्रांताओं ने अट्टास किया ।

मध्यप्रदेश में ग्वालियर संभाग के अंतर्गत अशोक नगर जिले में स्थित है। यह वही चंदेरी है जो पूरे संसार में अपनी साड़ियों की शिल्पकला के लिये प्रसिद्ध है । उन दिनों भी यह वस्त्र कला निर्माण ही नहीं व्यवसाय का भी एक बड़ा केन्द्र था । चंदेरी में यह विध्वंश मुगल हमलावर बाबर ने किया था । बाबर ने चंदेरी में केवल विध्वंस ही नहीं किया था बल्कि जिन सैनिकों और नागरिकों को जान बख्शी का आश्वासन देकर समर्पण कराया था उन सब बंदियों के शीश काटकर ऊँचा पहाड़ बनाया था। फिर कटे हुये असंख्य शीश के उस पहाड़ पर अपनी जीत का झंडा फहराया था । निर्दोष स्त्री बच्चों को पकड़ कर गुलाम बनाया था, अत्याचार किये थे और कुछ को गुलामों के बाजार में बेचने के लिये खुरासान भेज दिया था और इसी विध्वंस के बीच अपने स्वत्व की रक्षा केलिये महरानी मणिमाला ने 1500 क्षत्राणियों तथा अन्य स्त्रियों के साथ जौहर किया था। इस जौहर की स्मृति को एक स्मारक के रूप में चंदेरी किले में सहेज लिया गया है । इस स्मारक पर पहुँचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, शरीर में सिरहन भी पैदा होती हैं ।

यह युद्ध वर्ष 1528 जनवरी के अंतिम सप्ताह में हुआ था । किसी विश्वासघाती द्वारा चंदेरी दरबाजा खोलने की तिथि 28 और 29 जनवरी के बीच की रात है । रात भर वीरों का खून बहा, स्त्रियों की चिता जली, इसलिये कुछ इतिहासकारों ने विध्वंस की तिथि 28 जनवरी मानी और कुछ ने 29 जनवरी 1528 माना ।

उन दिनों चंदेरी पर प्रतिहार वंशीय शासक मेदनीराय का शासन था । अंतराष्ट्रीय रेशम के व्यापार का बड़ा केन्द्र के रूप में भी चंदेरी की ख्याति रही है । मेदिनीराय अपनी सेना लेकर चितौड़ के शासक राणा साँगा की कमान में बाबर से युद्ध करने के लिये खानवा के मैदान में गये थे। चित्तौड से कुछ रिश्तेदारियाँ भी थीं। राणा साँगा मेदनीराय को पुत्रवत् मानते थे । दुर्योग से खानवा के युद्ध में राणाजी की पराजय हुई । इस युद्ध में राणा जी की हार के दो कारण रहे एक तो उनकी सेना में

विश्वासघात और दूसरा बाबर ने अपने तोपखाने के आगे गायों को बाँध कर खड़ा कर दिया था । गायों को सामने देखकर राणाजी का तोपखाना रुक गया । बाबर की रणनीति काम आई । बाबर का तोपखाना गरज उठा और युद्ध का नक्शा ही बदल गया । राणा जी के घायल होकर निकल जाने के बाद बाबर ने अपनी जीत का जश्न मनाया । बाबर ने उन सभी राजपूत राजाओं के दमन का अभियान चलाया जो राणा साँगा की कमान में बाबर से युद्ध करने खानवा पहुँचे थे । इनमें मेदिनीराय का नाम प्रमुख था । खानवा युद्ध के बाद मेदिनी राय चंदेरी लौट आये और राणा जी के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करने लगे ।

चंदेरी अभियान के लिये बाबर 9 दिसम्बर 1527 को सीकरी से रवाना हुआ । इसकी खबर मेदिनी राय को लग लग गयी थी उन्होंने सहायता के लिये मालवा के अन्य राजाओं को संदेश भेजे और आवश्यक सामग्री एकत्र करके स्वयं को किले में सुरक्षित कर लिया था। चंदेरी का यह किला पहाड़ी पर बना है । इसकी गणना देश के अति सुरक्षित किलों में की जाती है । बाबर और उसकी फौज रास्ते भर लूट हत्याएँ और बलात्कार करती हुई आगे बढ़ी और 20 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुँची ।

बाबर ने रामनगर तालाब के पास अपना कैंप लगाया और दो संदेश वाहक शेख गुरेन और अरयास पठान को राजा मेदिनी राय के पास भेजा । संदेश वाहकों ने तीन संदेश दिये एक मुगलों की आधीनता स्वीकार करो और मुगलों के सूबेदार बनों दूसरा चंदेरी का किला खाली करदो इसके बदले कोई दूसरा किला ले लो और तीसरा रनिवास एवं मालखाने का पूर्ण समर्पण । स्वाभिमानी मेदनी राय ने शर्तों को अस्वीकार कर दिया । मेदिनी राय को लगता था कि बाबर की फौज पहाड़ी न चढ़ पायेगी । लेकिन बाबर के पास तोपखाना और बारूद का पर्याप्त भंडार था । उसने पहाड़ी काटकर रास्ता बना लिया था और किले के दरबाजे तक आ गया । दूसरी तरफ राजपूतों के पास न बारूद था न तोपखाना । उनके पास तीर कमान, तलवार, भाला या आग के गोलों के अतिरिक्त कुछ नहीं था । वह 26 जनवरी 1528 की तिथि थी जब समर्पण के लिये बाबर का अंतिम संदेश राजा मेदिनीराय को मिला । संदेश पाकर राजा ने रणभेरी बजाने का आदेश दिया । 27 जनवरी से युद्ध आरंभ हुआ पर मुगलों के तोपखाने के सामने राजपूत सेना कमजोर पड़ी । बाहर घेराबंदी भी तगड़ी थी । राजा घायल हो गये उन्हे किले के भीतर लाकर पुनः किले के द्वार बंद कर दिये गये । 28 जनवरी को दिन भर बाबर का तोपखाना चंदेरी किले दीवार पर गरजता रहा । दीवार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी थी ।

 

महारानी मणिमाला को भविष्य का अंदाजा हो गया । उन्होंने जौहर करने का निर्णय लिया । वे किले के भीतर विराजे महाशिव के मंदिर में चली गई । उनके साथ राज परिवार और किले एवं नगर की अन्य स्त्रियाँ भी थीं। जिनकी संख्या 1500 से अधिक लिखी है । सभी स्वाभिमानी स्त्रियों ने पहले शिव पूजन किया फिर स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया । यह जौहर 28 और 29 जनवरी की मध्य रात्रि से आरंभ हुआ । जिस समय ये देवियाँ जौहर कर रहीं थी तभी किसी विश्वासघाती ने किले का दरबाजा खोल दिया । मुगलों की फौज भीतर आ गयी । किले के भीतर यूँ भी मातम जैसा माहौल था । जिसके हाथ में जो आया उससे मुकाबला करने लगा । पर यह युद्ध नाममात्र का रहा । रातभर मारकाट हुई । हमलावरों ने किले के भीतर किसी पुरूष को जीवित न छोड़ा । जो स्त्रियाँ जीवित मिलीं उन्हें और बच्चों बंदी बना लिया गया । 29 जनवरी की सुबह बाबर ने किले में प्रवेश किया । जौहर की लपटें तेज थीं। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ीं थीं । सारी लाशे एकत्र की गयीं । उनके के शीश काटे गये, सिरों का ढेर लगाया गया और उस पर मुगलों का ध्वज फहराया गया । बाबर चंदेरी में पन्द्रह दिन रुका । किले में खजाना खोजा गया । आसपास जहाँ तक बन पड़ा लूटपाट की गयी । लाशों के ढेर किले और नगर में ही नहीं गांवो में भी लगे । मकानों को ध्वस्त किया गया । यातनायें देकर छुपा हुआ धन वसूला गया । अपने एक जमादार अय्यूब खान को चंदेरी का सूबेदार बनाकर बाबर लौट गया

(इस युद्ध और जौहर का वर्णन “प्रतिहार राजपूतों का इतिहास” लेखक देवी सिंह पुस्तक में विस्तार से है । जबकि युद्ध वर्णन ग्वालियर और गुना जिले के गजट में भी है । चंदेरी में जौहर स्थल भी बना है वहां महिलाएं पूजन करने भी जातीं हैं)

गाली, घमंड और ग्लोबल गिरावट के बाद अब दुनिया है आगे, और अमेरिका छूटेगा पीछे

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दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ पर उनकी कैप्स-लॉक वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियाँ कोई साधारण बयान नहीं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं। लेकिन असल में ये उससे कहीं गहरी हैं, एक व्यक्ति और उसके पीछे के पूरे राजनीतिक आंदोलन का एक खौफनाक आत्मचित्र, जो पश्चिमी सभ्यता की उन बुनियादों को ही तोड़ रहा है, जिन पर अमेरिका खड़ा है।
यह नीति नहीं, एक दबंग की आदिम दहाड़ है। आवाज़ को विज़न समझ बैठना, और बेइज्जती को ताकत। यूरोप को “कंगाल”, “बच्चा” या “नकारा” कहना महाद्वीप का अपमान ही नहीं, यह उस इतिहास पर थूकना है, जिससे अमेरिका की पहचान बनी। ज्यादातर अमेरिकी उसी यूरोप की संतान हैं: वही यूरोप, जिसने एन्लाइटनमेंट की रौशनी दी, वैज्ञानिक सोच को मजबूती, साहित्य-कला को नई ऊँचाइयाँ, और लोकतंत्र को दर्दनाक मगर परिपक्व रास्ता। अमेरिका का संविधान, संस्थाएँ, विचार, सब पर यूरोप की गहरी छाप है। ऐसे में यूरोप का मजाक उड़ाना आत्म-अपमान से कम नहीं।
हकीकत ये कि यूरोप कोई खेल का मैदान नहीं, जहाँ “डैडी टैक्स” जैसे जुमलों से तालियाँ बटोरी जाएँ। यूरोपीय संघ का €15 ट्रिलियन का सिंगल मार्केट दुनिया का सबसे परिष्कृत, नियम-आधारित आर्थिक ढांचा है। अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर: हर साल 600 अरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी सामान-सेवाएँ यूरोप खरीदता है। लाखों अमेरिकी नौकरियाँ इसी पर टिकीं। ऐसे साझेदार का उपहास आर्थिक आत्महत्या है और अमेरिका के अपने आंकड़े ये चीख-चीखकर बता रहे हैं।
अमेरिका आज ट्रेड डेफिसिट से जूझ रहा: बाजार अस्थिर, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही। ट्रंप के टैरिफ, जिन्हें वे ताकत का प्रतीक बताते हैं, असल में अमेरिकी उपभोक्ताओं पर छुपा टैक्स। ये सच्चाई भाषणों से नहीं बदलती।
इस तमाशे में सबसे डरावनी है खामोशी। अमेरिका की तथाकथित लिबरल अंतरात्मा कहाँ? यूनिवर्सिटियाँ, थिंक-टैंक्स, एडिटोरियल बोर्ड्स, मानवाधिकार संगठन, क्यों चुप हैं? जो दुनिया भर में लोकतंत्र की खामियाँ तलाशते हैं, वे अपने घर की सांस्कृतिक-कूटनीतिक आगजनी पर क्यों मौन हैं? ये चुप्पी कायरता नहीं, मानसिक जड़ता का संकेत। ऊपर आइवरी टावरों में बहस, नीचे नींव जल रही है। और फायर ब्रिगेड वाले सो रहे हैं!!
ट्रंप की “रणनीति” डिप्लोमेसी के सर्व मान्य सिद्धांतों को चुनौती देती है। न भाषा का सबूर, न ही तथ्यों का सम्मान, जसपाल भट्टी का उलटा शो चल रहा है। उपनाम गढ़ना, कैप्स-लॉक ट्वीट, स्कूली गालियाँ, ये राज्यकला नहीं। 70 साल के वैश्विक गठबंधन मयखानों की तकरार, बार-फाइट में बदल रहे। ये ताकत नहीं, असुरक्षा बताती है। नियम-आधारित व्यवस्था, जिसने युद्ध रोका, समृद्धि फैलाई, गरिमा की बात की, क्या अहंकार, सौदेबाजी और धमकी से बदली जा सकती है?
असल खतरा इसी सोच में है: संस्थाओं का धीमा, मुस्कुराता क्षरण। यूरोप को संदेश साफ, तुम्हारा इतिहास बेकार, साझेदारी मुफ्त, परिपक्वता कमजोरी। लेकिन ये रणनीतिक भूल है। गठबंधन स्थायी नहीं। बाजारों की याददाश्त लंबी होती है। सब्र, सदियों पुरानी सभ्यताओं का भी, सीमा पर है। सवाल तैर रहा है, कब तक यूरोप ऐसे “सहयोगी” की बेरुखी या दुश्मनी सहेगा?
भारत-ईयू डील कोई तंज नहीं, भविष्य का खाका है। दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक ताकतें जुड़ेंगी, नवाचार करेंगी। अमेरिका जोकर बने तो उसकी मर्जी। यूरोप निर्भरता बदल रहा है; मार-ए-लागो के अपमान इसे तेज कर रहे हैं।
ट्रंप की बौखलाहट अमेरिकी पतन का मील का पत्थर साबित होगा। देश उस ताकत के हाथों हाइजैक हो रहा है, जो विरासत से नफरत करती है, आपसी निर्भरता न समझे, पुल जला दे। ये “अमेरिका को महान” नहीं, अप्रासंगिक बना रहा, हर बचकानी गाली के साथ।
दुनिया आगे बढ़ रही है। लोग गंभीर कमरों में फ्यूचर के सौदे कर रहे हैं। अमेरिका जहरीली छाया में चिल्लाता, खुद को शर्मिंदा करता, सबको खतरे में डालता, पीछे छूट रहा है।
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