वृंदावन की आत्मा बुलडोजर के निशाने पर: वृंदावन धाम को टूरिस्ट स्पॉट क्यों बनाया जा रहा है?

Screenshot-2025-07-25-at-11.08.53-PM.png

मथुरा। वृंदावन की आत्मा हौले हौले मर रही है। श्री कृष्ण की पावन लीला भूमि, जहाँ कभी बाँसुरी की तान गूँजती थी, आज कंक्रीट के जंगल और भ्रष्टाचार की चीखों में दम तोड़ रही है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश लगती है-सरकार की वह नीति, जो वृंदावन को आध्यात्मिक धाम से चकाचौंध भरे टूरिस्ट स्पॉट में बदलने पर तुली है। यह प्रगति नहीं, बल्कि पवित्रता का निर्मम विनाश है। सवाल यह नहीं कि वृंदावन क्यों बदल रहा है-सवाल यह है कि सरकार इस पवित्र धरती की आत्मा को कुचलने पर क्यों आमादा है?

वह वृंदावन कहाँ गया, जिसे भागवत पुराण में कृष्ण की लीला भूमि कहा गया? वह धरती जहाँ यमुना की लहरें भक्तों के पाप धोती थीं, जहाँ कदम्ब के वृक्षों की छाँव में गोपियाँ नाचती थीं, जहाँ ब्रज की धूल को माथे पर लगाना तीर्थयात्रियों का गर्व था? आज वह सब खतरे में है। यमुना, जो कभी देवी कहलाती थी, अब एक जहरीली नाली बनकर रह गई है। उसका जल काला पड़ चुका है, औद्योगिक कचरे और सीवेज से भरा हुआ। घाट, जहाँ संध्या आरती की धुन गूँजती थी, अब टूटे-फूटे हैं या बिल्डरों के कब्जे में। बाढ़ के मैदानों पर अवैध कॉलोनियाँ और सरकारी मंजूरी वाले होटल खड़े हो गए हैं। वृंदावन की हरियाली-वो वन, वो उपवन—अब कंक्रीट के टावरों और पाँच सितारा आश्रमों की चपेट में हैं।
आकाश, जो कभी मंदिरों के शिखरों से सजा था, अब ऊँची-ऊँची इमारतों की भेंट चढ़ चुका है। ब्रज की वह पवित्र धूल, जिसे देवता भी पूजते थे, अब प्लास्टिक, मलबे और गंदे पानी से दब गई है। हर गली-नुक्कड़ पर कूड़े के ढेर और दिखावटी सौंदर्यीकरण की परियोजनाएँ—नियॉन लाइट्स, पत्थर की पट्टियाँ, फव्वारे—भ्रष्टाचार की गंध फैलाती हैं। यह वृंदावन नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक जाल है, जो भक्तों की आस्था को लूटने के लिए बिछाया गया है।

सबसे बड़ा घाव है तथाकथित “वृंदावन कॉरिडोर”। यह कॉरिडोर किसके लिए? भक्तों ने तो इसकी माँग नहीं की थी। स्थानीय मंदिर समुदायों से सलाह तक नहीं ली गई। वाराणसी और उज्जैन की तर्ज पर बन रही इस परियोजना के नाम पर सदियों पुराने मंदिरों को ध्वस्त करने की योजनाएं बताई जा रही हैं। उनकी संपत्ति हड़पने की धमकी दी जा रही है। क्या यह विकास है, या वृंदावन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का चुपके से विनाश? स्थानीय लोग, संत और मंदिर संगठन सड़कों पर हैं। विरोध प्रदर्शन गूँज रहे हैं। यहाँ तक कि भाजपा सांसद हेमा मालिनी, जो पहले इस परियोजना की समर्थक थीं, अब खुद को शक्तिशाली लॉबी के जाल में फँसा पा रही हैं।

विडंबना यह है कि जो सरकार वृंदावन की विरासत को बचाने का दावा करती है, वही उसे रौंद रही है। अगर सरकार को सचमुच इस धाम की परवाह होती, तो वह यमुना को साफ करती। वनों को पुनर्जनन देती। घाटों को पुनर्जनन देती। वृंदावन को वाहन-मुक्त क्षेत्र बनाती, गोल्फ कार्ट जैसे पर्यावरण-अनुकूल साधनों को बढ़ावा देती। स्थानीय लोगों को उनके भविष्य का फैसला करने का हक देती। लेकिन इसके बजाय, हम एक धीमी हत्या देख रहे हैं। लालच और अदूरदर्शिता का कालिया नाग फिर से सिर उठा रहा है।

वृंदावन की आत्मा आज रो रही है। कृष्ण के पदचिह्नों वाली माटी, यमुना की लहरों में गूँजती मुरलियाँ, भक्तों के जयकारे—सब कुछ दम तोड़ रहा है। सरकारी फाइलों में इसे “विकास” का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह ब्रज की आत्मा पर हमला है। सवाल उठता है: क्या सरकार वृंदावन को बचाना चाहती है, या व्यवसाय के लिए बेचना? क्या कृष्ण की इस लीला भूमि को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करना ही हमारा भाग्य है? यह सिर्फ वृंदावन का सवाल नहीं—यह हमारी आस्था, हमारी संस्कृति और हमारे इतिहास का सवाल है। अगर आज हम चुप रहे, तो कल वृंदावन सिर्फ एक टूरिस्ट स्पॉट बनकर रह जाएगा— क्या यही ब्रज मंडल की नियति है?

वो रेडियो का ज़माना: यादों का सुरीला सफर

images-11.jpeg

दिल्ली। रेडियो की दुनिया एक जादुई दरवाज़ा थी, जहाँ आवाज़ें सपने बुनती थीं और गीत दिलों को छू लेते थे। बिनाका गीतमाला उस दौर का सबसे चमकता सितारा था, जिसने 1952 से हर बुधवार की शाम को लाखों श्रोताओं को अमीन सयानी के मधुर स्वर और फिल्मी गीतों के जादू में बाँध दिया। “जाएँ तो जाएँ कहाँ…” जैसे गीतों ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए, और श्रोताओं के वोट से तय होता था कौन सा गीत “सरताज” बनेगा । यह कार्यक्रम सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि एक सामूहिक भावनात्मक अनुभव था, जिसमें रेडियो सीलोन से विविध भारती तक का सफर शामिल था।

विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रम तो दिलों की धड़कन थे। श्रोताओं के पत्र खासतौर से झुमरी तलैया से पढ़कर उनकी पसंद के गीत बजाने का यह अनूठा तरीका रिश्तों को गीतों से जोड़ देता था। समाचारों की दुनिया में मेलविल डिमेलो और पांडे जी जैसे आइकॉनिक न्यूज़ रीडर्स की गंभीर और स्पष्ट आवाज़ें लोगों के दिन की शुरुआत और अंत तय करती थीं। उनकी प्रस्तुति में एक ऐसा विश्वास था जो आज भी याद किया जाता है।

उस ज़माने का रोमांटिसिज़्म सिर्फ गीतों में नहीं, बल्कि उस इंतज़ार में था जब रेडियो पर कोई खास कार्यक्रम प्रसारित होता था। यह वह दौर था जब आवाज़ें इतिहास रचती थीं और शब्दों में जादू बसता था — एक ऐसा जादू जो आज भी हमारी यादों में जिंदा है।

1936 में शुरू हुआ एआईआर भारत के सामाजिक-संस्कृतिक और राजनीतिक ढांचे का आधार रहा है, जिसने राष्ट्रीय विकास, संस्कृति संरक्षण, और संकटकाल में संचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन इंटरनेट, मल्टीमीडिया प्लेटफॉर्म्स, और सोशल मीडिया के आगमन के साथ, एआईआर की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि प्राइवेट एफएम चैनल और डिजिटल मीडिया का दबदबा बढ़ गया है।
एआईआर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति को संरक्षित करने में जबरदस्त योगदान दिया है। डिजिटल युग से पहले, एआईआर हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत को बढ़ावा देने का मुख्य मंच था, जहां पंडित रवि शंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, और एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी जैसे उस्तादों को मंच मिला। नेशनल प्रोग्राम ऑफ म्यूजिक और एआईआर संगीत सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों ने शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाया, जिससे इसकी सराहना बढ़ी। एआईआर के आर्काइव्स, जिसमें हजारों घंटों की रिकॉर्डिंग्स हैं, भारत की संगीतमय विरासत का अनमोल खजाना हैं, जो दुर्लभ रचनाओं और प्रदर्शनों को संरक्षित करते हैं। संगीत के अलावा, एआईआर ने युवा वाणी और विविध भारती जैसे कार्यक्रमों के जरिए क्षेत्रीय साहित्य, लोक परंपराओं, और भाषाओं को बढ़ावा दिया, जिससे भारत की सांस्कृतिक विविधता मजबूत हुई।

एआईआर ने राष्ट्र-निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। 1960 और 1970 के दशक की हरित क्रांति के दौरान, कृषि दर्शन जैसे प्रसारणों ने किसानों को उच्च-उपज वाली बीजों, खाद, और सिंचाई तकनीकों, खासकर “रेडियो राइस” जैसे IR8 की जानकारी दी। स्वास्थ्य और परिवार नियोजन जागरूकता अभियानों ने कम साक्षरता वाले ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों लोगों तक पहुंच बनाई। एआईआर ने सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को प्रसारित करके दूरदराज के समुदायों को विकास योजनाओं से जोड़ा।

चीन (1962) और पाकिस्तान (1965, 1971) के साथ युद्धों के दौरान, एआईआर ने राष्ट्रीय एकता और मनोबल को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। इसके प्रसारणों ने दुश्मन के प्रचार का मुकाबला किया, रीयल-टाइम अपडेट्स दिए, और देशभक्ति गीतों व भाषणों के जरिए नागरिकों को प्रेरित किया। एक सरकारी प्रसारक के रूप में इसकी विश्वसनीयता ने इसे संकटकाल में देश की आवाज बनाया।
मास कम्युनिकेशन एक्सपर्ट मुक्ता बेंजामिन के मुताबिक इन उपलब्धियों के बावजूद, तकनीकी प्रगति ने एआईआर की प्रासंगिकता को कम किया है। इंटरनेट, ऑन-डिमांड कंटेंट, स्ट्रीमिंग सेवाएं, और सोशल मीडिया ने मीडिया खपत को बदल दिया है। प्राइवेट एफएम चैनल्स, अपने जीवंत और युवा-केंद्रित कंटेंट के साथ, एआईआर के पुराने प्रारूपों पर भारी पड़ रहे हैं। स्पॉटिफाई, यूट्यूब, और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स वैश्विक संगीत, समाचार, और मनोरंजन तक तुरंत पहुंच प्रदान करते हैं, जिससे एआईआर की कठोर समय-सारिणी और सीमित क्षेत्रीय पहुंच कम आकर्षक हो गई है। आलोचक कहते हैं कि टैक्सपेयर के पैसे से चलने वाला एआईआर अब संसाधनों की बर्बादी है, जो बाजार-आधारित मीडिया इकोसिस्टम में टिक नहीं पा रहा।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “प्रासंगिक बने रहने के लिए, एआईआर को तकनीक का इस्तेमाल करके और अपनी मिशन को फिर से परिभाषित करके खुद को नया करना होगा। एआईआर को अपने विशाल आर्काइव्स को डिजिटाइज करना चाहिए, शास्त्रीय संगीत और सांस्कृतिक रिकॉर्डिंग्स को ऐप्स या स्ट्रीमिंग सेवाओं पर उपलब्ध कराना चाहिए। स्पॉटिफाई जैसे वैश्विक प्लेटफॉर्म्स के साथ साझेदारी या एक समर्पित एआईआर ऐप युवा दर्शकों को आकर्षित कर सकता है। एआईआर को हाइपर-लोकल कंटेंट पर ध्यान देना चाहिए ताकि एफएम की शहरी अपील का मुकाबला किया जा सके। अपने नेटवर्क के तहत सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को सशक्त करके, एआईआर जलवायु परिवर्तन से लेकर शिक्षा तक स्थानीय मुद्दों को स्थानीय भाषाओं में संबोधित कर सकता है। साथ ही युवा इन्फ्लूएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के साथ समन्वय करते हुए, रेडियो प्रासंगिक हो सकता है।”

समाजवादी आस्था का दोहरा मापदंड

kanwar-yatra.jpg

श्रावण माह शिव भक्ति का पवित्र माह है जिसमें उत्तर भारत के अनेक राज्यों में पवित्र कांवड़ यात्रा निकलती है। कांवड़ यात्रा में कांवड़िये पहले गंगा नदी तक पैदल जाकर पवित्र जल लेते हैं फिर शिवालयों जाकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। कांवड़िये अपनी यात्रा में 200 से 600 किमी तक पैदल चलते हैं। पूरी यात्रा में कांवड़िये सात्विक जीवन का पालन करते हैं। इस कठिन यात्रा में उनके पावों में छाले तक पड़ जाते हैं। कांवड़ यात्रा में स्त्रियाँ और बच्चे भी सम्मिलित होते हैं। जो सनातनी हिन्दू इस कथों यात्रा का व्रत नहीं ले पाते वे स्थान -स्थान पर कांवड़िओं की भिन्न- भिन्न प्रकार से सेवा करके अपना जीवन धन्य करना चाहते हैं।

ये अत्यंत दुखद है कि छद्म धर्मनिरपेक्ष और वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों ने इस वर्ष ऐसी पवित्र यात्रा पर क्षोभजनक अमार्यदित टिप्पणियां करीं। समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा कांवड़ यात्रियों को बेरोजगार, दंगाई और आतंकवादी तक कहा गया। समाजवादी नेता एस. टी. हसन ने कावड़ियों को आतंकवादी कहकर अपमानित कर किया। समाजवादी सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं ने कांवड़ यात्रा व यात्रियों को बदनाम करने में कोई कोर कसर शेष नहीं रखी। गंदे मीस्म बनाए गये। कावड़ियों के जत्थों में घुसकर उत्पात मचाया गया जिसके कारण श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ घर से सैकड़ो मील दूर शिवालयो में अपार श्रद्धा भाव समर्पित करने के लिए निकले कांवड़िये आहत हैं।

कुछ चैनलों ने बिना ये पड़ताल किये कि वास्तविक अपराधी कौन है, एक- दो समूह के कावड़ियों द्वारा की गई रोडरेज ओर अराजकता के समाचार खूब बढ़ा चढ़ाकर दिखाए और कावड़ यात्रा की नकारात्मक छवि बनाने का पूरा प्रयास किया किंतु ये चैनल ये बताना और दिखाना भूल गये कि कई स्थानों पर कांवड़ यात्रियों जिनमें महिलाएं और बच्चे भी सम्मिलित थे उन पर सुनियोजित हमले किए गए। यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कावड़ियों से भी अनुशासित रहने की अपील की थी और पुलिस ने कांवड़ियों की अनुशासनहीनता पर उनको भी उचित दंड देने में विलम्ब नहीं किया। जिसमें एक स्थान पर कांवड़ियों और सीआरपीएफ जवान के बीच मारपीट का विडियो आने पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने त्वरित कार्यवाही की ।
कांवड़ यात्रा और यात्रियों पर विपक्ष, उसके सोशल मीडिया और कुछ टी.वी. चैनल द्वारा लगातार आक्रमण होने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़े तेवर अपना लिये और स्पष्ट शब्दों मे चेतावनी देते हुए कहा कि, कुछ असमाजिक तत्व कांवड़ यात्रा की आड़ में वातावरण खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार की प्राथमिकता है कि यात्रा निर्विध्न संपन्न हो। जो भी व्यक्ति किसी प्रकार का हुड़दंग करेगा यात्रा के पश्चात उसके विरुद्ध कठोर कर्रावाई की जाएगी। दोनों उपमुख्यमंत्रियों ने सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि कांवड़ यात्रा को बदनाम करने के लिए समाजवादी पार्टी के कुछ अराजक तत्व यात्रा में घुस आए हैं और माहौल को खराब करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।

जब भी हिंदुओं का कोई ऐसा पर्व आता है जिसमें हिन्दू एकता और सामूहिकता परिलक्षित होती है वैसे ही जाती वादी और तुष्टीकरण के बल पर जीवित परिवारवादी समाजवादी दल के नेताओं की आस्था का दोहरा मापदंड सामने आ जाता है और यह स्पष्ट दिखने लगता है कि समाजवादी हिंदुओ के प्रति कितनी नफरत रखते हैं। समाजवादियों को अयोध्या का दिव्य, भव्य राम मंदिर रास नहीं आ रहा, महाकुम्भ -2025 को कलुषित करने व हिंदू सनातन आस्था की छवि को विकृत करने के लिए तो इन्होने महाअभियान ही छेड़ दिया था।

जब प्रदेश में सपा, बसपा की सरकारें हुआ करती थी तब कांवड़ यात्रा व यात्रियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था वह किसी से छुपा नहीं है। सपा के कार्यकर्ता और समर्थक कांवड़ियों पर हमले किया करते थे। महिला कांवड़ियों के साथ अभद्रता व दुर्व्यवहार किया जाता था। कांवड़ यात्रा का अपमान करने पर कांग्रेस भी पीछे नहीं है उसके नेता दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर कांवड़ यात्रा को लक्षित करते हुए सड़क पर नमाज पढ़ने को उचित बताया था।

इस वर्ष कांवड़ यात्रा से जुड़े चार प्रान्तों क्रमशः उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों योगी आदित्यनाथ, रेखा गुप्ता, नायब सिंह सैनी और पुष्कर सिंह धामी ने कांवडियों के लिए विशिष्ट व्यवस्था की है जिससे भी विपक्ष चिढ़ा हुआ है । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो कांवडियों पर स्वयं पुष्पवर्षा भी की। उत्तर प्रदेश में शिवालयों को खूब अच्छे ढंग से सजाया -संवारा जा रहा है जो हिन्दू विरोधी विपक्ष के लिए आपत्तिजनक है।

कांग्रेस, सपा ,बसपा सहित सभी विरोधी दलों का हिंदू पर्वो व आस्था के प्रति सदा से ही दोहरा मापदंड रहा है। यही कारण है कि जो लोग मोहर्रम के जुलूसों में फिलीस्तीन और पाकिस्तानन , ईरान का झंडा फहराते हैं उन्हें ये दल आतंकवादी नहीं कहते वहीं जो लोग भारत माता की जय, वंदेमातरम का नारा लगाते हुए भक्तिभाव के साथ शिवालयों में जल चढ़ाने जाते हैं वे इनको आतंकवादी नजर आते हैं।सपा के एक मुस्लिम विधायक इकबाल महमूद ने तो यहां तक कह दिया कि यह “शिव भक्त कम गुंडे ज्यादा नरक में जाना होगा“। यह हिंदू आस्था के अपमान की पराकाष्ठा है।

कांवड़ यात्रा पर हल्ला बोलने वाले समाजवादी नेता संसद के मानसून सत्र के बीच संसद भवन के पास बनी एक मस्जिद में बैठक करने पहुँच गए। भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा ने तस्वीर जारी कर आरोप लगाया है कि अखिलेश यादव ने इस मस्जिद को सपा कार्यलाय बना दिया है। अब यह तथ्य स्थापित हो गया है कि समाजवादी पार्टी राम शिव और श्रीकृष्ण विरोधी और मस्जिदों में आधार खोजने वाली पार्टी है । समाजवादी आस्था के प्रति खतरनाक दोहरा मापदंड अपना रहे है। इनकी पीडीए की राजनीति केवल हिंदू समाज को बांटने के लिए है।

अपनी बात : मेरी पुस्तक, खजाने की शोधयात्रा लिखने के पिछे मेरी भूमिका

2-17.jpeg

प्रशांत पोळ

भारतीय ज्ञान का खजाना इस पुस्तक का मराठी संस्करण प्रकाशित हुआ, 14 मई 2017 को। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केबिनेट मंत्री चंद्रकांत दादा पाटिल की उपस्थिति में यह भव्य समारोह, पुणे में संपन्न हुआ। मेरी यह पहली ही पुस्तक थी। इस पुस्तक में, आशीर्वाद के रूप में परम पूज्य सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी की प्रस्तावना थी।

मेरे लिए यह सुखद अनुभव था। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अनेकों ने कहां, कि इसका दूसरा भाग भी आना चाहिए। कइयों ने तो इसके लिए मेरा फॉलोअप लिया।

लगभग 2015 से में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ इस विषय पर थोड़ा बहुत लिखने लगा। उन दिनों इस विषय पर ज्यादा कुछ नहीं लिखा गया था। माननीय सुरेश सोनी जी की दो पुस्तकें थी, जो इस विषय पर पढ़ने / लिखने के लिए प्रेरणा दे रही थी। पर इसके इतर, ज्यादा कुछ पढ़ने के लिए नहीं था। अभी जो प्रचलन में है, वह ‘आईकेएस’ (इंडियन नॉलेज सिस्टम), यह शब्द तो बहुत दूर था। सोशल मीडिया पर भी उन दिनों ज्यादा कुछ नहीं मिलता था।

ऐसे में इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हुआ। मराठी के अतिरिक्त यह हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई। अनेक विद्वानों ने इस पुस्तक की प्रशंसा की। सभी भाषाओं में, इसके अनेक संस्करण निकले और निकल रहे हैं। अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे संदर्भ ग्रंथ के रूप में मान्यता दी हैं।

तो, ऐसे अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक का अगला भाग (सीक्वल) लिखना, यह मेरे सामने एक बड़ी चुनौती थी। *खजाने की शोधयात्रा* लिखते समय इसकी पूरी गंभीरता मुझे थी।

अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा इतनी समृद्ध हैं, कि विषयों की कमी नहीं थी। बस, ज्यादा से ज्यादा शोध करना; प्रमाणिक, वास्तविक और अधिकृत संदर्भ ढूंढना, उन्हें सत्यापित करना, यह बहुत बड़ा काम था। अनेक बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ने पड़े। संस्कृत को समझना पड़ा। अनेक संदर्भ खोज कर निकालने पड़े… ऐसा बहुत कुछ।

पर यह सब करते हुए बड़ा मजा आया। आनंद आया। यह मेरा प्रिय विषय हैं। पसंदीदा हैं। इसलिए, इस विषय से संबंधित पुस्तकों में / ग्र॔थों में अवगाहन करना, यह एक आनंदमयी अनुभव था। पुस्तक लिखने के इस पूरे प्रवास में मैंने इस आनंद का भरपूर अनुभव लिया।

*यह सब अभ्यास करते समय मुझे बार-बार यह अनुभूति होती थी, कि हमारी ज्ञान परंपरा कितनी समृद्ध और संपन्न हैं। हम उन दिनों तत्कालीन दुनिया से बहुत आगे थे। ग्यारहवीं – बारहवीं सदी में, यदि इस्लामी आक्रांता भारत नहीं आते, तो शायद भारत ही नहीं, अपितु विश्व का इतिहास और भूगोल, दोनों बदले हुए रहते।*

यह पुस्तक लिखते समय, ‘पुराना हैं, तो ही सब सुहाना हैं’ या, ‘मात्र भारतीयों के पास ही सब कुछ ज्ञान था’ यह मेरी भूमिका नहीं थी। यह उचित भी नहीं हैं। किंतु यह भी सत्य हैं, कि कुछ हजार वर्ष, अपना भारत विश्व में सर्वाधिक समृद्ध, संपन्न और ज्ञानवान देश था।

*भारत में ‘भाष्य’ की परंपरा सनातन हैं। इसलिए, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार, परिवर्तन होते रहेंगे, संकल्पनाएं बदलती रहेंगी, ज्यादा अच्छी चीजों का शोध सतत लगता रहेगा, नई तकनीकी आती रहेगी.. इन सारी बातों पर अपने पूर्वजों की दृढ़ श्रद्धा थी। आद्य शंकराचार्य समवेत अनेकों ने, लगभग प्रत्येक विषय पर भाष्य लिखे। इसके कारण अनेक नई बातें सामने आती गई। सारे विश्व में अपनी ज्ञान परंपरा श्रेष्ठ रही, कारण भाष्य के रूप में, प्रत्येक सिद्धांत का, प्रत्येक संकल्पना का, खंडन – मंडन करते हुए आगे जाना, यह हमारे समाज का स्थाई भाव रहा हैं।*

ऋग्वेद के एक सूक्त पर भाष्य लिखकर, विजयनगर साम्राज्य के सायणाचार्य ने प्रकाश के वेग की सटीक गणना की, तो आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों पर भाष्य लिखकर जीवन के मूल्य, दैनिक व्यवहार के नियम, व्यवस्थापन के सिद्धांत आदि विषयों की नए सिरे से व्याख्या की। न्यायशास्त्र के कात्यायन स्मृति, पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथों पर अनेक भाष्य लिखे गए और अपने देश में स्थल-काल-परिस्थिति अनुरूप, न्यायव्यवस्था विकसित होती गई।

*विश्व के इतिहास में, दूसरे किसी धर्म में, राष्ट्र में या व्यवस्था में, इस प्रकार की ‘कंटीन्यूअस करेक्शन मेकैनिज्म’ अस्तित्व में नहीं हैं..!*

खजाने की शोधयात्रा इस पुस्तक में इन सब बातों की समीक्षा की हैं। सूर्य मंदिरों की अद्भुत रचना से लेकर तो भारत की प्राचीन और परिपूर्ण न्यायव्यवस्था तक, अनेक विषय इस पुस्तक में लेने का प्रयास किया हैं। प्राकृतिक खेती पर हमारे पुरखों ने कितना गहन विचार किया था, यह इस विषय पर अभ्यास करते हुए समझ में आया। पिंगल ऋषि ने आज के कंप्यूटर / डिजिटल प्रणाली का आधार, ‘बाइनरी सिस्टम’, का भी विचार करके रखा था। आज की कृत्रिम प्रज्ञा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) यह मानवी मन का शोध लेते समय, ‘भाषा’ इस माध्यम का उपयोग करती हैं। इस भाषा का मानवी मन (बुद्धि) के संदर्भ में पाणिनि ने किस प्रकार से विचार किया था, यह देखकर हम दंग रह जाते हैं..!

*खजाने की शोधयात्रा* के निमित्त, अक्षरश: हजारों संदर्भ देखें। पढे। उनका अध्ययन किया। किंतु यह सब करते हुए एक बात दिल को कचोट रही थी, कि अपनी इस समृद्ध ज्ञान परंपरा पर अपने भारतीयों ने ज्यादा शोध नहीं किए हैं। इन विषयों पर न तो ज्यादा प्रबंध हैं, और न हीं पीएचडी। इसलिए संदर्भों के लिए, कई बार विदेशी खोजकर्ताओं के संदर्भों की ही मदद लेनी पड़ती हैं। समरांगण सूत्रधार, बृहत्संहिता जैसे ग्रंथों के लिए, अधिकतर संदर्भ विदेशी शोधकर्ताओं के ही मिलते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य हैं।

यह सब अभ्यास करते समय मन में बार-बार प्रश्न निर्माण हो रहा था, कि कृषि पाराशर, वृक्षायुर्वेद, बृहत्संहिता, समरांगण सूत्रधार, ब्राह्मस्फूट सिद्धांत, न्याय कंदली, सहदेव भाळकी, कात्यायन स्मृति, युक्ति कल्पतरु… जैसे ग्रंथों पर, अपने विश्वविद्यालयों में ज्यादा शोध न होने का कारण क्या हैं? इन विषयों पर पीएचडी करने की कोई सोचता क्यों नहीं हैं..? मुझे विश्वास हैं, इन शोध के प्रयासों से, अनेक नई और उपयोगी बातें सामने आएगी। कृषि पाराशर में दिया हुआ पर्जन्य (वर्षा) का अनुमान, यह सचमुच शोध का विषय हैं। यह अनुमान अगर सत्य हैं, तो अपना सारा कृषि का चित्र बदल सकता हैं। वर्षा के अनुसार फसल लेना यह अपने प्राकृतिक कृषि की प्राचीन संकल्पना हैं। वह ठीक से लागू हो सकेगी।

कुछ वर्ष पहले मैंने ‘वैश्विक गणेश’ यह श्रृंखला लिखी थी। वह सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया में अत्यंत लोकप्रिय हुई। इस निमित्त से, ‘विश्व में भगवान श्री गणेश का अस्तित्व, अनेक स्थानों पर हैं’, यह रेखांकित हुआ। वर्तमान में, पूरे विश्व में हिंदुत्व का पुनर्जागरण हो रहा हैं। इस प्रक्रिया में भगवान गणेश का स्थान कितना महत्व का हैं, यह समझ में आता हैं। पाठकों के आग्रह पर, ‘वैश्विक गणेश’ का समावेश, इस पुस्तक में किया हैं।

यह पुस्तक तैयार करने में अनेकों की मदद हुई। मेरी पत्नी सुमेधा के बिना इस पुस्तक की कल्पना संभव नही थी। उसने न केवल अनेक संदर्भ मुझे उपलब्ध कराएं, वरन् इस पुस्तक के हिंदी अनुवाद में बहुत मदद की। इंद्रनील और निहारिका ने समय निकालकर, मुझे अनेक संदर्भ और ग्रंथ उपलब्ध करवाएं।

scroll to top