जीतेगा भाई जीतेगा, नया भारत जीतेगा!

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दिल्ली। भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां यह सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है। यह संघर्ष केवल आतंकवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मध्ययुगीन मानसिकता के विरुद्ध है, जो मानवता को गुलाम बनाना चाहती है। यह जंग है—आधुनिकता बनाम बर्बरता, प्रगति बनाम पिछड़ापन, एकता बनाम टुकड़ों में बंटी सोच!

1947 का विभाजन भारत के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय था। लाखों लोगों की जानें गईं, करोड़ों विस्थापित हुए, और एक जहरीली विचारधारा ने जड़ें जमा लीं—वह विचारधारा जो आज भी भारत को तोड़ने का सपना देखती है। लेकिन आज, हमारे सामने वह ऐतिहासिक मौका है कि हम उन गलतियों को सुधारें और एक नए, अखंड भारत का निर्माण करें।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “नई दिल्ली अब चुप नहीं रह सकती। आधे-अधूरे उपायों और तुष्टिकरण का समय खत्म हो चुका है। भारत को इस मौके को भुनाकर इन बंटवारे वाली ताकतों का मुकाबला करना होगा और जिहादी मानसिकता को जड़ से उखाड़ना होगा। यह युद्ध सिर्फ सीमाओं को सुरक्षित करने का नहीं, बल्कि भारत के भविष्य को सुरक्षित करने का है। नफरत के ढांचे—आतंकी नेटवर्क, उनके वैचारिक समर्थक, या सहानुभूति रखने वाले—को पूरी तरह नष्ट करके भारत यह स्पष्ट संदेश दे सकता है: आधुनिक दुनिया में मध्ययुगीन बर्बरता की कोई जगह नहीं।”
पश्चिमी सीमा पर चल रहा संघर्ष सिर्फ बंदूकों और गोलियों का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का युद्ध है: एक तरफ भारत—जो विविधता में एकता, बहुलवाद, और प्रगतिशील सोच का प्रतीक है।

दूसरी तरफ वह सोच—जो महिलाओं को हूर समझती है, बच्चों को हथियार बनाती है, और असहमति को गुनाह मानती है।

यह सोच न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरा है। आज दुनिया देख रही है कि कैसे यह विचारधारा अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक तबाही मचा चुकी है। भारत को इसका मुकाबला करना ही होगा, नहीं तो यह हमारी आने वाली पीढ़ियों को गुलाम बना लेगी।
इतिहास गवाह है—जो सभ्यताएं नफरत और हिंसा पर टिकी होती हैं, वे अंततः ध्वस्त हो जाती हैं। मौर्य साम्राज्य, गुप्त काल, चोल साम्राज्य—भारत ने हमेशा प्रगति और शांति का मार्ग चुना है। आज फिर वही समय आया है, जब भारत को अपनी सभ्यता की रक्षा करनी है।

यह संघर्ष कठिन है, लेकिन असंभव नहीं।हर सैनिक का बलिदान, हर युवा का जोश, और हर नागरिक का विश्वास मिलकर इस जंग को जीत लेगा। हम न केवल आतंकवाद को खत्म करेंगे, बल्कि उसकी जड़ों को भी जला देंगे। हमें यह याद रखना होगा—यह लड़ाई सिर्फ सेना की नहीं, हर भारतीय की है। जब तक हम साथ हैं, तब तक कोई ताकत हमें नहीं हरा सकती। यह नया भारत है—जो डटकर खड़ा होगा, लड़ेगा और जीतेगा!

एक तरीके से भारत पूरी दुनिया के लिए ये जंग लड़ रहा है। क्योंकि ये कोई साधारण संघर्ष नहीं है। यह सभ्यताओं का टकराव है, दो विचारधाराओं की लड़ाई: एक आधुनिक, उदारवादी मूल्यों वाली खुली समाज की, और दूसरी बर्बर, मध्ययुगीन, तानाशाही, बंद सोच वाली, जो पूरी दुनिया पर हावी होना और उसे गुलाम बनाना चाहती है, ऐसी सभ्यता जहां मानव मूल्यों को हूरों की गिनती से तौला जाता है।

भारत, जो सभ्यता की बाधाओं को पार कर वैश्विक नेता बनने की राह पर है, उसे देश के अंदर और बाहर की प्रतिगामी ताकतों ने लंबे अरसे से बंधक बना रखा है। ये ताकतें ऐसी कट्टरता थोपना चाहती हैं, जो असहमति या अलग विचारों को बर्दाश्त नहीं करती। पश्चिमी सीमाओं पर चल रहा टकराव सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं है; यह उन regressive पीछे देखू ताकतों को खत्म करने का ऐतिहासिक मौका है।

लंबे समय से, भारत की प्रगति को उन संकीर्ण ताकतों ने रोका है, जो नफरत और बंटवारे पर पलती हैं। इनकी जड़ें 1947 के बंटवारे में हैं, जब विभाजनकारी विचारधाराओं ने उपमहाद्वीप को तोड़ा, जिसके घाव आज भी हरे हैं। जिहादी सोच, जो मध्ययुगीन मानसिकता से प्रेरित है, सह-अस्तित्व, संवाद और आपसी सम्मान के सिद्धांतों को नकारती है, जो एक आधुनिक, बहुलवादी समाज की पहचान हैं। यह न केवल भारत की संप्रभुता को चुनौती देती है, बल्कि इसके समावेशी मूल्यों को ही नष्ट करना चाहती है।

यह खतरा सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का है, जो भारत के उदार लोकतंत्र की प्रगतिशील भावना को एक पुरातन सोच के खिलाफ खड़ा करता है, जो हिंसा और दमन की प्रशंसा करती है।दांव बहुत ऊंचे हैं। भारत के दुश्मन, अपनी तानाशाही सोच से प्रेरित, एक बंद समाज थोपना चाहते हैं, जहां असहमति को कुचल दिया जाए और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कट्टरता की भेंट चढ़ा दिया जाए। यह सोच भारत के संवैधानिक मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता और विविध विश्वासों के अधिकार—के खिलाफ है। जो नफरत फैलाते हैं—चाहे आतंकवाद, प्रचार, या आंतरिक तोड़फोड़ के जरिए—वे भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों में विश्वास नहीं रखते। वे भारत की उदारता का दुरुपयोग करते हैं, इसकी विविधता को हथियार बनाकर अशांति फैलाते हैं।

यह संघर्ष, भले ही कठिन हो, नई संभावनाएं खोलेगा। एक दृढ़ भारत, जो उदार मूल्यों की रक्षा में अडिग है, और मजबूत बनकर उभरेगा, इसके लोकतांत्रिक संस्थान और वैश्विक कद दोनों मजबूत होंगे।

जीत न केवल तात्कालिक खतरों को खत्म करेगी, बल्कि दुनिया भर में तानाशाही विचारधाराओं की खोखली सच्चाई को उजागर करेगी।भारत की लड़ाई उन सभी के लिए एक आह्वान है, जो खुले समाज को महत्व देते हैं। इसे पूरी दृढ़ता के साथ नफरत फैलाने वालों को खत्म करना होगा, ताकि इसका प्रगतिशील, समावेशी विश्व दृष्टि जीत सके। युद्ध कठिन हो सकता है, लेकिन दमनकारी सोच के सामने आत्मसमर्पण अकल्पनीय है।
इस युद्ध की आग से तपकर भारत अखंड और मजबूत बनकर उभरेगा, अपनी सभ्यतागत नियति को पूरा करने के लिए तैयार, एक ऐसी दुनिया की ओर अग्रसर, जो नफरत से नहीं, बल्कि उम्मीद से परिभाषित हो।

सनातन हिंदू धर्म एवं भारत में उत्पन्न समस्त मत पंथ विश्व में शांति चाहते हैं

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भारत में सनातन हिंदू धर्म तो अनादि एवं अनंत काल से चला आ रहा है परंतु बाद के खंडकाल में भारत में कई अन्य प्रकार के मत पंथ भी विकसित हुए हैं जैसे बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म आदि। भारत में विकसित विभिन्न मत पंथ मूलतः सनातन हिंदू संस्कृति का ही अनुपालन करते हुए दिखाई देते हैं और ऐसा कहा जाता है कि यह समस्त मत पंथ सनातन हिंदू धर्म की विभिन्न धाराएं ही हैं। भारत में विकसित मत पंथ सामान्यतः अपने दर्शन, कर्मकांड एवं सामाजिक ताने बाने के दायरे में अपने धर्म का अनुपालन करते हैं। भारत में हिंदू धर्म के सिद्धांतों पर चलने वाले नागरिकों की संख्या सबसे अधिक हैं एवं यह भारत का सबसे बड़ा धर्म है, जिसमें विभिन्न देवी देवताओं और पूजा प्रथाओं की एक विस्तृत प्रणाली शामिल है।

भारत में विकसित हुए मत पंथों में बौद्ध धर्म की उत्पत्ति भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के आधार पर हुई है। यह शिक्षाएं मानव जीवन से दुःख और उसके कारणों को दूर करने के सम्बंध में हैं। बौद्ध धर्म में ध्यान, प्रेम एवं करुणा पर जोर दिया जाता है। बौद्ध धर्म में कर्मकांड के महत्व को भी रेखांकित किया गया है परंतु इसका उद्देश्य ईश्वर की आराधना नहीं बल्कि मोक्ष की प्राप्ति करने से है।

भारत में ही विकसित दूसरे महत्वपूर्ण मत पंथ, जैन धर्म में अहिंसा, आत्म संयम, सत्य एवं ईमानदारी पर अधिक जोर दिया जाता है। जैन धर्म में ऐसा माना जाता है कि मोक्ष की प्राप्ति स्वयं के प्रयासों से ही सम्भव है।

भारत में ही विकसित तीसरा महत्वपूर्ण मत पंथ है सिख धर्म जिसकी स्थापना श्री गुरु नानक देव जी ने की थी। सिख धर्म ईश्वर में विश्वास, सेवा, समानता एवं सत्यनिष्ठा पर आधारित है। सिख धर्म में ईश्वर की उपासना की जाती है परंतु यह उपासना कर्मकांड से परे हैं।

भारत की सनातन हिंदू संस्कृति को पूरे विश्व में अति प्राचीन संस्कृति के रूप में देखा जाता है। मूल रूप से भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति में आध्यात्म का विशेष महत्व है जिसके अंतर्गत “वसुधैव कुटुंबकम”, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय”, “विश्व का कल्याण हो”, “किसी भी जीव का अहित न हो” जैसे भावों पर अमल करने का प्रयास किया जाता है। भारत में चूंकि मनुष्य के साथ साथ जीव जंतुओं, नदियों, पहाड़ों, पेड़ पौधों एवं जंगलों, आदि में भी ईश्वर का वास माना जाता है इसलिए किसी भी जीव को कोई क्षति न हो इस भावना को न केवल को आगे बढ़ाया जाता है बल्कि इस सिद्धांत पर अमल भी किया जाता है। इसीलिए भारत मूलतः शांतिप्रिय देश माना जाता है तथा भारत में हिंसा के लिए तो कोई जगह ही नहीं है। भारत के धर्मग्रंथों में भी जाने अनजाने में भी की गई जीव हत्या को पाप की संज्ञा दी गई है। सनातन हिंदू संस्कृति के ग्रंथों, उपनिषदों, आदि द्वारा काम, कर्म एवं अर्थ को धर्म के साथ जोड़कर ही सम्पन्न करने के उपदेश दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, महाभारत में वेद व्यास जी ने धर्म के आठ तरीके बताए हैं – (i) यज्ञ – जिसका आश्य है कि ऐसा कर्म जो समाज के लाभ के लिए किया जाता है। (ii) दान – समाज की सहायता करना। (iii) तप – अर्थात स्वयं में सुधार करते रहना, स्वयं का मूल्यांकन करना तथा नकारात्मक गुणों को दूर कर सकारात्मक गुणों का विस्तार करना। (iv) सत्यम् – सत्य के मार्ग पर चलना। (v) क्षमा -दूसरों तथा स्वयं को गलतियों के लिए क्षमा करना। (vi) दंभ – इंद्रियों को वश में रखना। (vii) आलोभ – लालच नहीं करना एवं लालच में न आना। (viii) अध्ययन – स्वयं और दुनिया का अध्ययन करना। सनातन हिंदू धर्म एवं भारत में उत्पन्न मत पंथों के अनुयायी सामान्यतः धर्म के उक्त वर्णित आठ तरीकों पर चलने का प्रयास करते पाए जाते हैं। धर्म की इस राह पर चलकर उन्हें समाज में शांति पूर्वक रहने की प्रेरणा मिलती है एवं अंततः उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इसके साथ ही, विश्व के अन्य देशों में विकसित मत पंथों का अनुसरण करने वाले नागरिक भी भारत में पर्याप्त मात्रा में निवास करते हैं जैसे यहूदी, ईसाई एवं इस्लाम के अनुयायी, आदि। विश्व के अन्य भागों में विकसित उक्त वर्णित मत पंथों को सेमेटिक रिलिजन की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि इनकी साझा उत्पत्ति एवं कुछ सामान्य अवधारणाएं होती हैं, जैसे एक ही ईश्वर में विश्वास, नैतिकता एवं कर्मकांड।

यहूदी धर्म एक धर्मग्रंथ (ताल्मुद) पर आधारित है। इस धर्मग्रंथ में यहूदी लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया गया है। यहूदी धर्म सेमेटिक धर्म की श्रेणी में आता है क्योंकि इसमें एक ईश्वर (येहव) में विश्वास, अनुष्ठान एवं नैतिक नियमों का पालन किया जाता है। ईसाई धर्म ईसा मसीह की शिक्षाओं पर आधारित है, जो एक ईश्वर में विश्वास एवं ईसा मसीह के द्वारा उद्धार करने एवं उनके द्वारा ही मोक्ष करने पर जोर देता है। इसी प्रकार इस्लाम भी पैगंबर मुहम्मद साहब की शिक्षाओं पर आधारित है, जो कि एक ईश्वर (अल्लाह) में विश्वास एवं कुरान का पालन करने पर जोर देता है।

भारत में उत्पन्न विभिन्न धर्मों एवं मत पंथों में ईश्वर की अवधारणा विविध है, परंतु सेमेटिक धर्मों में केवल एक ईश्वर में ही विश्वास किया जाता है। भारतीय मत पंथों में कर्मकांड का महत्व कम है, जबकि सेमेटिक धर्मों में कर्मकांड की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। भारतीय मत पंथों में मोक्ष की प्राप्ति के विभिन्न मार्ग उपलब्ध हैं जिन पर चलकर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है परंतु सेमेटिक धर्मों में मोक्ष की प्राप्ति केवल ईश्वर की कृपा से ही सम्भव है। भारतीय मत पंथों में विविध सामाजिक संरचना रहती है जबकि सेमेटिक धर्मों में एक समान सामाजिक संरचना रहती है एवं इसमें विविधता का अभाव है। भारत में उत्पन्न धर्मों एवं मत पंथों में तथा सेमेटिक धर्मों में सामाजिक संरचना एवं दर्शन भी अलग अलग है।

भारत के बारे में यह कहा जाता है कि यहां विविधता में भी एकता दिखाई देती है क्योंकि आज भारत में विभिन्न धार्मिक आस्थाओं एवं विभिन्न धर्मों की उपस्थिति तथा उनकी उत्पत्ति तो दिखाई ही देती है, साथ ही, व्यापारियों, यात्रियों, आप्रवासियों, एवं यहां तक कि आक्रमणकारियों द्वारा भी यहां लाए गए धर्मों को आत्मसात करते हुए उनका सामाजिक एकीकरण दिखाई देता है। सभी धर्मों के प्रति हिन्दू धर्म के आतिथ्य भाव के विषय में जॉन हार्डन लिखते हैं, “हालांकि, वर्तमान हिन्दू धर्म की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसके द्वारा एक ऐसे गैर-हिन्दू राज्य की स्थापना करना है जहां सभी धर्म समान हैं…….।”

पूरे विश्व में संभवत: केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता एवं धार्मिक सहिष्णुता को समाज द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है। सनातन हिंदू संस्कृति में धर्म को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भारतीय नागरिक स्वयं को किसी न किसी धर्म से सम्बंधित अवश्य बताता है। इसी के चलते, भारतीय नागरिक विश्व के किसी भी कोने में चला जाय परंतु अपनी संस्कृति को छोड़ता नहीं है। इसी कारण से यह कहा जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर आज की परिस्थितियों की बीच केवल भारतीय सनातन संस्कृति के माध्यम से ही पूरे विश्व में एक बार पुनः शांति स्थापित की जा सकती है।

प्राइवेट को पब्लिक क्यों कर रहे हैं लोग?

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दिल्ली। मानव इतिहास, गुफाओं की दीवारों पर उकेरी गई आदिम कला से लेकर आधुनिक महानगरों की आसमान छूती इमारतों तक एक अविश्वसनीय यात्रा है। इस विकास क्रम में, एक महत्वपूर्ण बदलाव जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, वह है शरीर को, विशेषकर जननांगों को ढकने की प्रथा का उदय।

यह परिवर्तन मात्र एक शारीरिक आवश्यकता नहीं थी, बल्कि सभ्यता के अंकुरण का पहला स्पष्ट संकेत था। लगभग 10,000 ईसा पूर्व, जब मनुष्य ने कृषि का विकास किया, स्थायी बस्तियाँ बसाईं और सामाजिक संरचनाओं की नींव रखी, तभी उसने यह भी निर्धारित किया कि शरीर के कौन से अंग सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए जा सकते हैं और किन पर पर्दा जरूरी है।

सिंधु घाटी सभ्यता, मेसोपोटामिया, प्राचीन मिस्र और कैटलहोयूक जैसी प्रारंभिक सभ्यताओं से प्राप्त पुरातात्विक अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि कमरबंध, स्कर्ट और लपेटने वाले वस्त्र जननांगों को ढकने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पहले परिधानों में से थे। सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध “पुजारी राजा” की मूर्ति या पशुपति मुहर, दोनों ही आकृतियों में शरीर के उस भाग पर किसी न किसी प्रकार का वस्त्र दर्शाया गया है जिसे समुदाय के लिए ‘निजी’ माना जाता था। उष्ण जलवायु, कृषि कार्यों की व्यावहारिक आवश्यकता, और इन वस्त्रों का धार्मिक एवं सामाजिक प्रतीकों के रूप में महत्व, सभी ने इस प्रथा को बढ़ावा दिया।

मेसोपोटामिया की सुमेरियन कला, विशेष रूप से गिलगमेश के महाकाव्य में एन्किदु का एक जंगली प्राणी से सभ्य नागरिक में रूपांतरण, वस्त्र धारण करने के साथ शुरू होता है। यह परिवर्तन वास्तव में शालीनता, आत्म-अनुशासन और सामाजिक स्वीकृति का प्रतीक था। प्राचीन मिस्र के लोग ‘शेंटी’ नामक लंगोट पहनते थे और महिलाएँ ‘शीथ ड्रेस’ (शरीर से चिपकी लंबी पोशाकें) पहनती थीं। नील नदी की गर्म जलवायु के बावजूद, शरीर के संवेदनशील हिस्सों को छिपाना सामाजिक रूप से आवश्यक माना जाता था।

क्या यह केवल सूर्य की किरणों, कीड़ों या बदलते मौसम से सुरक्षा का मामला था? संभवतः नहीं। यह एक गहरा सांस्कृतिक मानदंड था। जैसे-जैसे समाज अधिक जटिल होता गया, जननांगों को ढकना एक अपरिहार्य सामाजिक नियम बन गया। इसने यौन आकर्षण पर नियंत्रण स्थापित करने, पारिवारिक संरचना की स्थिरता बनाए रखने और सामाजिक पदानुक्रम को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ तक कि पापुआ न्यू गिनी के कुछ आदिवासी समुदाय आज भी ‘लिंग म्यान’ (पेनिस शीथ) पहनते हैं, जो इस प्रवृत्ति को एक सार्वभौमिक मानवीय व्यवहार दर्शाता है।
भारतीय पौराणिक कथाएँ इस द्वंद्व को एक रोचक आयाम देती हैं। नागा साधुओं या कुछ देवियों की ऐसी छवियाँ जो पूर्णतः नग्न या अर्धनग्न होती हैं, सांसारिक बंधनों से मुक्ति और आध्यात्मिक ऊँचाई का प्रतीक मानी जाती हैं। इसके विपरीत, महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण की कथा, जहाँ उसकी लाज बचाने के लिए वस्त्र चमत्कारिक रूप से बढ़ता चला जाता है, यह दर्शाती है कि सामाजिक रूप से शील की रक्षा करना कितना महत्वपूर्ण था।

संक्षेप में, नग्नता का कभी-कभी एक पवित्र या विशेष स्थान ज़रूर रहा, लेकिन समाज में पर्दा एक आवश्यक प्रथा के रूप में स्थापित हो गया। यह ‘प्रकृति बनाम कृत्रिम सभ्यता’ के बीच एक शाश्वत बहस की तरह था—एक ओर आध्यात्मिकता थी, तो दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था।
आज, जब हम “फ्री द निप्पल” जैसे आंदोलनों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर नग्नता के बढ़ते प्रदर्शन और फैशन की दुनिया में बढ़ते हुए खुलेपन को देखते हैं, तो यह प्रश्न उठता है: क्या हम उस प्रारंभिक बिंदु की ओर लौट रहे हैं जहाँ से हमने यात्रा शुरू की थी? क्या यह ‘आज़ादी’ की अभिव्यक्ति है या एक ऐसी सांस्कृतिक उदासीनता है जो उन बुनियादी नियमों को नकारती है जिनके आधार पर मानव समाज ने प्रगति की है?
इंटरनेट, पोर्नोग्राफी और लोकप्रिय संस्कृति के माध्यम से नग्नता का महिमामंडन उस आदिम युग की याद दिलाता है जहाँ कोई सामाजिक प्रतिबंध नहीं थे—न शर्म, न हया, न लाज का कोई बंधन। जबकि प्राचीन सभ्यताओं ने यह स्थापित किया था कि जननांगों को ढकना मानव सभ्यता की पहली सीढ़ी थी, आज का समाज इसे ‘दमन’ और ‘पिछड़ी सोच’ कहकर खारिज करने लगा है।

क्या यह वास्तविक स्वतंत्रता है या अराजकता की ओर एक खतरनाक कदम? सभ्यता के इस लंबे सफर में, जहाँ एक साधारण लंगोट ने ‘वस्त्र क्रांति’ की नींव रखी थी, वहीं आज की बढ़ती हुई नग्नता एक नए सामाजिक प्रयोग की तरह उभर रही है। यह अनिश्चित है कि यह प्रयोग मनुष्य को और अधिक ‘सभ्य’ बनाएगा या उसे उसी आदिम अंधकार में वापस धकेल देगा जहाँ न कोई नियम थे, न कोई स्थापित रीति-रिवाज।
शायद अब समय आ गया है कि हम गहराई से विचार करें: क्या पर्दा केवल शरीर का आवरण था, या यह मन और मर्यादा की भी सुरक्षा थी?

भारतीय सेना की ऐतिहासिक उपलब्धि – ऑपरेशन सिंदूर आतंकिस्तान अब भी नहीं सुधरा तो रण भीषण होगा

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पहलगाम में विगत 22 अप्रैल 2025 को हुए वीभत्स आतंकी हमले के बाद भारत की सेना ने 6-7 मई की रात को पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की सफल कार्यवाई की। पाकिस्तान की सेना ने इसमें आतंकियों का साथ देने का निर्णय किया और भारत के नागरिक तथा सैन्य ठिकानों को चोट पहुँचाने के लिए हमले किये। 10 मई 2025 को भारतीय सेना के आक्रामक प्रहार के पश्चात अंततः पाकिस्तान ने युद्ध विराम की गुहार लगाई। भारतीय सेना का आतंकवाद के खिलाफ यह अभियान पूर्णतः सफल रहा जिसमें पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को लगभग तबाह कर दिया गया।

भारतीय सेना द्वारा जो जानकारी साझा की गई है उससे स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों सहित वहां के 11 एयर बेस भी पूरी तरह से तबाह हो गये हैं जिसमें रणनीतिक महत्व वाले सरगोधा जैसे अड्डे भी शामिल हैं। माना जाता है कि सरगोधा वही स्थान है जहाँ पाकिस्तान के परमाणु हथियार रखे थे। किराना के हिलने के बाद आतंकिस्तान सहित अमेरिका आदि देशों की नींद उड़ गई और पाकिस्तान को हमेशा की तरह एक बार फिर घुटनों पर आकर युद्ध विराम की मांग करनी पड़ी । जब भारतीय हमले की सीमा में पाकिस्तान का परमाणु जखीरा भी आ गया और उनके परमाणु कमांड सेंटर के पास ब्रह्मोस मिसाइल गिरी तब जाकर पाकिस्तान ने अमेरिका से गुहार लगाई और यह सीजफायर हुआ किंतु यह सीजफायर भी भारत की ही शर्तों पर हुआ है। विश्व के इतिहास में पहली बार किसी देश ने किसी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के अंदर घुसकर आतंकी कैम्पों पर इस तरह की कार्यवाही की है इसकी तुलना अमेरिका द्वारा एबटाबाद पर हमला करके बिन लादेन से नहीं की जा सकती है। संपूर्ण कार्यवाही के दौरान भारत के कूटनीतिक प्रयास भी उत्कृष्ट रहे। चीन, तुर्किंए और अजरबैजान को छोड़कर दुनिया का कोई भी देश पाकिस्तान के साथ खुलकर खड़ा होने का साहस नही कर पाया।ईरान ने अवश्य कुछ प्रयास किया किन्तु वह भी सफल नहीं हुआ।

भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब अगर पाकिस्तान एक भी गोली चलाएगा तो फिर भारत गोला ही दागेगा। अपनी रणनीति को बदलते हुए भारत ने तय किया है कि अब पाक प्रायोजित किसी भी आतंकवादी घटना का इसी प्रकार जवाब दिया जायेगा और किसी भी आतंकी घटना को युद्ध के समान ही माना जायेगा।

ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत आधुनिक रक्षा प्रणालियों का उपयोग करते हुए पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर निर्दिष्ट हमले करकर न केवल आतंकी ठिकानों को समाप्त किया गया वरन सौ से अधिक आतंकवादियों को भी मिटटी में मिला दिया गया। सेना द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार नौ प्रमुख आतंकी ठिकानों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है। बहावलपुर स्थित मरकज सुभानअल्लाह जो आतंकियों का सबसे बड़ा मुख्यालय तथा प्रशिक्षण केंद्र था, मुरिदके स्थित मरकज तैयबा और मुजफ्फराबाद स्थित मरकज सैयादानी बिलाल पूरी तरह से तबाह हो गये हैं। इन तीनों ठिकानों की शुरुआत अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना के खिलाफ युद्ध करने वाले कट्टरपंथियों के जरिये पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई ने करी थी। इन्हें पाक पुलिस व स्थानीय सेना उसी तरह से संरक्षण दे रही थी जिस तरह वह कई वर्षों तक ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को पोषित करती रही थी । सियालकोट में हिजबुल मुजाहिदीन के सरजल और मेहमूना जोया आतंकी कैप को भी बर्बाद कर दिया गया। इसके अलावा पांच आतंकी ठिकाने पीओके में थे जिसमें मुजफ्फाराबाद में लश्कर का सवाईलाना कैंप और जैश का सैयदना बिलाल केपपूरी तरह से तबाह कर दिया गया। इसके अलावा भिंबर में भी बरनाला आतंकी कैंप भी तबाह कर दिया गया है।

आतंक के खिलाफ इस कार्यवाही में 100 से अधिक आतंकी मारे गये हैं। मारे गए ये सभी आतंकी किसी न किसी बड़ी आतंकी घटना में शामिल रहे थे। इनमें कंधार विमान अपहरण कांड का मुख्य आरोपी, पुलवामा घटना को अंजाम देने वाला मुख्य आरोपी तथा पांच प्रमुख आतंकवादी सरगना मारे गए हैं जिससे आतंकी संगठनों का तंत्र पूरी तरह से हिला हुआ है। भारत द्वारा आतंक के खिलाफ छेड़े गए इस युद्ध को पाकिस्तान ने अपने ऊपर ले लिया और भारत पर हमला बोल दिया।

पाकिस्तानी हमले के बाद भारत के पलटवार से पाकिस्तान के 11 एयसरबेस को भारी नुकसान पहुंचा है। नूरखान एयरबेस तबाह होना पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका है क्योंकि पकिस्तानी वायुसेना यहीं से अपने विमानों में ईंधन भरती है। भारत ने इस एयरबेस पर इतना भयानक हमला किया कि यह एयरबेस पूरी तरह से तबाह हो या । इधर भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तानी ड्रोन विमान व मिसाइल को अंदर नहीं घुसने दिया। भारत के पास आज इतनी अच्छी तकनीक है कि यदि कोई मिसाइल, ड्रोन या लड़ाकू विमान इसकी सीमा के अंदर घुसता है तो उसका मार गिराया जाना सुनिश्चित है।

यह स्ट्राइक इतनी सटीक थी कि सभी इसकी प्रशंसा कर रहे हैं। भारत ने अब सिद्ध कर दिया है कि उसने आतंक से लड़ने के निमय बदल दिये हैं। अब भारत की सेना दुश्मन के ठिकानों को उनके घर में घुसकर ठोक रही है। आतंकियों को पाताल से भी खोजकर सजा दी जा रही है । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ आतंक का बीज बोकर भारतवासियों को बार -बार रुलाया है, अब बहुत हुआ ।
ऑपरेशन सिंदूर की गहराई को अगर देखा जाये तो पता चलता है कि इस ऑपरेशन की जद में आज तक हुई सभी प्रमुख आतंकी घटनाओं के गुनाहगार आ गए , वे या तो मारे गए हैं या बनकर में छुपे हुए मौत का इंतज़ार कर रहे हैं। भारत ने अपनी रणनीति, संकल्प, संयम सभी की नई परिभाषा गढ़ी है । भारत ने किसी सैन्य बेस को तब तक निशाना नहीं बनाया जब तक पाकिस्तान ने हमला नहीं किया। ऑपरेशन सिंदूर ने एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी है जिसे कोई भी आतंकी अब नजरअंदाज नहीं कर सकता। चीन और तुर्किए के हथियार आत्मनिर्भर भारत के स्वदेशी हथियारों के समक्ष कमजोर साबित हुए हैं। आकाश ब्रह्मोस ने ही पाकिस्तान को घुटने पर ला दिया।

उधर पाकिस्तानी और भारत के लेफ्ट लिबरल मीडिया ने भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार के युद्ध का मोर्चा खोला हुआ था, किन्तु भारतीय सेना उनके एक- एक झूठ को प्रमाण के साथ बेनकाब कर रही थी। भारतीय सेना का सन्देश स्पष्ट है कि, “अब हम अपने लोगों की सुरक्षा के लिए जब चाहें, जहां चाहें घुस कर वार कर सकते हैं। हम पूरी तरह से तैयार व तत्पर है। हमने अगले मिशन के लिए तैयारी पूरी कर ली है।“हमारे पास आज एक से बढ़कर एक अति आधुनिक तकनीक है। आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है अगर पाकिस्तान व आतंकी नहीं सुधरे तो रण बहुत भीषण होगा।

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