प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन का आयोजन

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अंडमान एवं निकोबार: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में अंडमान एवं निकोबार विभाग द्वारा 14 दिसंबर 2025 को डी.बी.आर.ए.आई.टी. ऑडिटोरियम में “प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन” का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

सम्मेलन में जनप्रतिनिधि, नगर परिषदों के निर्वाचित सदस्य, ज़िला परिषद व पंचायत राज संस्थाओं के प्रतिनिधि, वरिष्ठ नागरिक, सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षाविद्, चिकित्सक, अधिवक्ता, प्रतिष्ठित व्यापारी, कलाकार, विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक गैर-सरकारी संगठनों के सदस्य, मीडिया प्रतिनिधि और श्री विजयपुरम् के अनेक सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित नागरिक उपस्थित रहे।

प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन में मोहन भागवत जी ने संघ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास की चर्चा करते हुए बताया कि संघ किस प्रकार गुणवान स्वयंसेवकों के निर्माण के माध्यम से स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण हेतु कार्य करता है। उन्होंने संघ से जुड़ी विभिन्न भ्रांतियों का भी निराकरण करते हुए कहा कि आरएसएस का उद्देश्य केवल “सज्जनों” अर्थात् गुणवान मनुष्यों का निर्माण करना है, जो निःस्वार्थ भाव से समाज में मूल्य आधारित जीवन का प्रसार कर राष्ट्र गौरव और विकास को सुदृढ़ करें।

कार्यक्रम के अंतर्गत प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें श्री विजयपुरम् के नागरिकों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, शिक्षा, और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से जुड़े प्रश्न प्रस्तुत किए। सरसंघचालक जी ने कहा कि प्रत्येक नागरिक अपनी प्राचीन भारतीय सनातन संस्कृति को अपनाकर, आत्मनिर्भरता (स्वदेशी आत्मनिर्भरता) को प्रोत्साहित करते हुए, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकता है।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” के साथ हुआ।

मिशनरी के नए हथकंडे: कन्वर्जन के नए षड्यंत्रों को पहचानिए

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रवि पाराशर

दिल्ली । किसी व्यक्ति, समूह या विषय को लेकर समय-समय पर धारणा-अवधारणा बदलना मनुष्य का मूल स्वभाव है। औषधियों और खाद्य पदार्थों समेत उपभोग की तमाम भौतिक वस्तुओं और उनके विशेषज्ञों के गुणधर्म और अनुभव स्थिर रहने पर भी उन्हें बरतने के मामले में व्यक्तियों की राय बदलना भी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है। किंतु बड़ा प्रश्न यह है कि किसी व्यक्ति या समूह की मौलिक आस्था में क्या परिवर्तन संभव है? मूल प्रकृति के उगाए ‘आलू’ को किसी तरह का कर्मकांड कर ‘POTATO’ कहने से उसके गुणधर्म में मौलिक तो छोड़िए, क्या कोई भी परिवर्तन हो सकता है? उत्तर के लिए कोई पोथी पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा जवाब है कि नहीं हो सकता।

कन्वर्जन अमानवीय है
यदि सैद्धांतिक और मौलिक व्यावहारिक व्याख्या सिद्ध करती है कि आध्यात्मिक आस्थाओं का मौलिक स्वरूप भौतिक कर्मकांड के माध्यम से नहीं बदल सकता, तो फिर बड़ा प्रश्न यह है कि इस्लाम और ईसाई धर्म दूसरी मान्यताएं, आस्थाएं रखने वाले लोगों के कन्वर्ज़न की मुहिम में क्यों लगे हैं? इसके लिए वे छल-कपट के तमाम प्रपंच क्यों रच रहे हैं? विद्वानों को इस बारे में व्यापक विवेचना करनी चाहिए कि दुनिया के दो बड़े और शक्तिशाली समूह संगठित तौर पर साम-दाम-दंड-भेद के सिद्धांत पर अमल करते हुए भारत में कन्वर्ज़न की काली मुहिम में क्यों जुटे हुए हैं?
एक स्थूल उत्तर अक्सर यह मिलता है कि इस्लाम का प्रचार करने वाले भारत समेत पूरी दुनिया को इस्लामिक वर्ल्ड में बदलना चाहते हैं, यह उनका अंतिम धार्मिक उद्देश्य है। पता नहीं ईसाई मिशनरी का भी अंतिम धार्मिक उद्देश्य यही है या नहीं। किंतु विश्व को मुस्लिम वर्ल्ड बनाने की लालसा क्या किसी भी तरह आध्यात्मिक कर्तव्य के दायरे में रखी जा सकती है और क्या ऐसा करना मानवीय हो सकता है? क्या नृविज्ञान में इस मानवीय प्रवृत्ति की कोई स्पष्ट व्याख्या है? इन प्रश्नों की विवेचना भी आवश्यक है।

परिवर्तनीय नहीं है हिंदुत्व
एक और प्रश्न पर भी संक्षेप में विचार कर लिया जाए कि क्या किसी तरह का कर्मकांड कर देने से किसी शाश्वत सनातनी मौलिक हिंदू का धर्म उसकी इच्छा या अनिच्छा से बलपूर्वक या छल-कपट से बदला जा सकता है? सनातन परंपरा में धर्म शब्द का आशय अंग्रेज़ी के रिलीजन शब्द जैसा नहीं है, बल्कि कर्तव्यों का द्योतक है। कोई हिंदू जानबूझ कर या धोखे से कन्वर्जन कर ले या षड्यंत्र का शिकार हो जाए, तो भी सैद्धांतिक तौर पर वह हिंदू ही रहेगा। पूजा पद्धति, वेशभूषा, खान-पान बदल लेने से मूल हिंदू नागरिक ईसाई या मुसलमान नहीं हो जाएगा।
भारतीय चिंतन परंपरा के हिसाब से सैद्धांतिक तौर पर ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी कुचेष्टाओं के आगे झुकने से व्यावहारिक तौर पर नकारात्मक संदेश ही समाज में जाता है। इसलिए बहुत से संतों, महात्माओं, सिख गुरुओं ने प्राणों की आहुतियां दीं, लेकिन कन्वर्ज़न नहीं किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि धर्म बदलना सबसे बड़ा पाप है। इस चर्चा के बीच यह भी हम जानते ही हैं कि संवैधानिक तौर पर भारत आज पंथ-निरपेक्ष राष्ट्र है। कोई भी भारतीय स्वेच्छा से किसी रिलीजन को अपना सकता है। संविधान में हर धर्म का आदर सुनिश्चित किया गया है। इसलिए डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुष बड़े विमर्श के साथ धर्म बदलते हैं, तो वे हिंदू समाज के लिए तिरस्कृत या कम सम्माननीय नहीं हो जाते। बहुत से विदेशी महापुरुषों ने अपना मूल धर्म त्याग कर सनातन धर्म अपनाया है, तो वे अधिक आदरणीय नहीं हो जाते।

ईसाई मिशनरी ने ओढ़ा छद्म चोला
इस लेख में हम बताने का प्रयास कर रहे हैं कि धर्म परिवर्तन या मतांतरण या कन्वर्ज़न सबसे बड़ा पाप है, फिर भी इस्लाम और ईसाइयत के दलाल अमानवीय हरकतों में लिप्त हैं। हमें पता है कि जब दुनिया कोविड-19 महामारी से लड़ रही थी, तब भी ईसाई मिशनरी मानवता की सेवा के बजाय कन्वर्जन का कुचक्र रचने में जुटी थी। इसके लिए तरह-तरह के नए हथकंडे अपनाए जा रहे थे। अब तो कन्वर्जन के षड्यंत्रों को भारतीयता के रंग में रंगा हुआ दिखाया जा रहा है, ताकि निश्छल लोगों को आसानी से भ्रमित किया जा सके।

यीशु के भारतीयकरण का छद्म
मिशनरी ने अब ईसाई धर्म को भारतीय धार्मिक आवरणों, प्रतीकों, संस्कृति के अनुसार ढालना शुरू कर दिया है। भोले-भाले अशिक्षित लोगों को लगता है कि वे जो देख रहे हैं, गा रहे हैं, वह सनातन वैदिक परंपरा के रंग में ही रंगा हुआ है। लेकिन असल में वह ईसाइयत की मान्यताओं से ही जुड़ा है। इस्लाम धर्म के उलट हिंदुत्व की तरह ईसाई धर्म में भी मूर्ति पूजा निषिद्ध नहीं है। भारत में इस बात का ही लाभ मिशनरी उठाना चाहती है। लोगों को समझाया जा रहा है कि कृष्ण भक्ति छोड़े बिना यीशु की भक्ति की जा सकती है, क्योंकि दोनों में बहुत समानता है। कृष्ण, जगत को पालने वाले हैं, तो यीशु भी जगत के परमेश्वर हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि श्रीमद्भागवत और गीता के उद्धरण देकर, बचकाने तर्क गढ़ कर हिंदुओं को ईसाइयत अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हमारे विचार से ही हम पर प्रहार किया जा रहा है।
ब्रज सहित पूरे भारत में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को बहुत रुचिकर लगता है। मिशनरी ने इसका लाभ लेने का षड्यंत्र रचा और ईसा मसीह को बाल रूप में कृष्ण की तरह दिखाया जाने लगा है। मदर मेरी की छवि भी माता यशोदा जैसी बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, मदर मैरी की गोद में बाल गणेश या बाल कृष्ण के बैठे होने की तस्वीरों का सहारा भी लिया गया, ताकि भोले-भाले हिंदुओं को भ्रमवश अनुभव हो कि वे किसी विधर्मी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि हिंदुत्व की ही किसी दूसरी सनातन परंपरा से जुड़ रहे हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
सनातन आस्था के बड़े केंद्रों और जनजातीय क्षेत्रों में काम कर रहे मिशनरी कार्यकर्ताओं की वेशभूषा में भी आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया गया है। कन्वर्जन के षड्यंत्रकारियों ने कोट-पेंट छोड़ कर भगवा कपड़े, माथे पर तिलक और गले में रुद्राक्ष, तुलसी इत्यादि की माला, हाथ में कलावा इत्यादि हिंदुत्व के प्रतीक अपना लिए हैं। परंपरागत भारतीय मालाओं में छोटे क्रॉस डालकर पहने-पहनाए जा रहे हैं। ईसाइयत के प्रति आस्था की व्याख्या वे खड़ी हिंदी में नहीं, बल्कि ब्रज भाषा और जनजातीय भाषाओं में ही उतने ही सधे हुए देशज उच्चारण में करते हैं। कुल मिला कर जिस तरह ‘साई’ अब ‘ओउम् साई राम’ हो गए हैं, उसी तरह जीसस या यीशु का भी विशुद्ध भारतीयकरण कर दिया गया है।
ब्रज में कृष्ण की उपासना के लिए तरह-तरह के लोकगीत आरती के रूप में ब्रजभाषा में वहां की लोकधुनों में गाए जाते हैं। इसी तरह मिशनरी ने ईसा मसीह की प्रार्थनाएं ब्रज भाषा में रच डाली हैं, जो कृष्ण भक्ति के गीतों की लोकधुनों पर ही आधारित हैं। यीशु के कृष्ण सदृश्य चित्रों, आरतियों की सीडी और पुस्तकों का वितरण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। देखने में वे बिल्कुल भारतीय धार्मिक साहित्य जैसी लगती हैं। यीशु के लिए ‘परमेश्वर’ शब्द का ही प्रयोग मुख्य रूप से हो रहा है। परमेश्वर शब्द भारतीय आध्यात्मिक चिंतन प्रक्रिया में ईश्वर की परम् सत्ता के लिए प्रयुक्त होता है, इसलिए भ्रम की स्थिति बनती है। लोगों को लगता है कि यह कोई बहुत भिन्न राह नहीं है। दोनों राहें साथ-साथ अपनाई जा सकती हैं। कृष्ण भक्ति छोड़नी नहीं है, यीशु भक्ति अपनानी है, जिसके लिए उत्कोच (पैसे, अनाज, दूसरी वस्तुएं, रोजगार, इलाज, स्कूलों में प्रवेश इत्यादि) भी मिल रहा है, तो फिर परेशानी क्या है!
ब्रज की लोकधुनों पर आधारित यीशु के गीतों के वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं। चमत्कारी कहानियों पर आधारित वीडियो में यीशु के बाल रूप को कृष्ण के जैसा दिखाया जा रहा है। आम तौर पर भेड़ चराते यीशु की तस्वीरें देखने को मिलती हैं, लेकिन ब्रज क्षेत्र में गोवंश चराते हुए यीशु के चित्र प्रचलित किए जा रहे हैं। कुल मिला कर कृष्ण भक्तों को लालच देकर कन्वर्जन के जाल बुने जा रहे हैं। उन्हें समझाया जा रहा है कि यीशु और कृष्ण की भक्ति में कोई अंतर नहीं है। यदि वे यीशु की पूजा करेंगे, तो उनका परलोक तो सुधरेगा ही, जीवित रहते कई तरह की भौतिक सुविधाएं भी मिलेंगी। कुछ सेटेलाइट धार्मिक टीवी चैनलों पर स्लॉट लेकर और बहुत से यूट्यूब चैनलों के माध्यम से दुष्प्रचार को धार दी जा रही है। लोग झांसे में आ भी रहे हैं। हालांकि विश्व हिंदू परिषद और दूसरे कई संगठन इस दुष्प्रचार की धार कुंद करने में लगे हैं।

शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से सॉफ्ट कन्वर्जन
ईसाई मिशनरी देश भर में बहुत से शिक्षण संस्थान चला रही है। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति की गहरी जड़ों की वजह से देश में कॉन्वेंट शिक्षा के प्रति आग्रह बढ़ा है। हालांकि अब नई शिक्षा नीति लाई गई है, लेकिन शिक्षा के पूरी तरह भारतीयकरण में समय लगेगा। मिशनरी द्वारा संचालित स्कूलों में दैनिक प्रार्थनाओं और दूसरी कई नियमित परंपराओं के माध्यम से विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के मन में ईसाइयत के प्रति निष्ठा के बीज बोने का प्रयास किया जाता है। क्रिसमस और दूसरे ईसाई उत्सवों के अवसर पर छात्र-छात्राओं और अभिभावकों को प्रार्थना सभाओं और दूसरे कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए चर्च आने को विवश किया जाता है।
मिशनरी स्कूलों में भारतीय वेशभूषा निषिद्ध है। कोट-पेंट-टाई और स्कर्ट पहनना अनिवार्य है। गले में तुलसी या रुद्राक्ष की माला, जनेऊ, माथे पर तिलक, हाथ पर कलावा या सिर पर चोटी जैसे हिंदू प्रतीक छात्र-छात्राएं धारण नहीं कर सकते। अंग्रेज़ी नव वर्ष के अवसर पर सेंटा क्लॉज के माध्यम से अबोध बच्चों के मन में ईसाइयत के प्रति प्रेम जगाने के प्रयास किए जाते हैं। क्रिसमस पर बहुत से सनातनी परिवार छोटे-छोटे बच्चों को सेंटा की वेशभूषा पहनाने लगे हैं। घरों में क्रिसमस ट्री भी सजाने लगे हैं।
‘जिंगल बेल’ जैसी धुनें बहुत से लोगों की जुबान पर चढ़ चुकी हैं। जन्मदिन और दूसरे शुभ अवसरों पर पूजा-पाठ, कथा, हवन की बजाय केक काटने की परंपरा आम हो चुकी है। विरोध जताने के लिए या किसी मांग के समर्थन में मोमबत्तियां जला कर रैलियां या प्रदर्शन करने की परंपरा भी चर्च की ही देन है। मालाओं में सजावटी क्रॉस पहनना आम होता जा रहा है। इस तरह धर्म बदले बिना ही एक तरह से सॉफ़्ट कन्वर्जन किया जा रहा है। बहुत से सनातनधर्मी अज्ञानतावश या मजबूरी में इसके शिकार हो रहे हैं।

इलाज, सहायता के नाम पर कन्वर्जन
ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी इलाज के नाम पर कन्वर्जन की मुहिम चला रही है। उचित चिकित्सा व्यवस्था नहीं होने और आसपास के शहरी क्षेत्रों में महंगा इलाज होने के कारण अनुसूचित जनजाति और पिछड़े इलाकों के लोग मिशनरी के जाल में फंस जाते हैं। पंजाब में चंगाई सभाओं के माध्यम से ईसाइयत का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। विषम परिस्थितियों में या प्राकृतिक आपदाओं के समय सेवा कार्यों के माध्यम से सहानुभूति जता कर भी कन्वर्जन के लिए विपन्न लोगों को प्रेरित किया जा रहा है।

आयुर्वेद को नीचा दिखाने का षड्यंत्र
कोविड-19 महामारी के दौरान रोजगार दे कर और खाने-पीने की व्यवस्था कर भी कन्वर्जन की कई घटनाओं का पता चला है। इतना ही नहीं, कन्वर्जन के अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र के अंतर्गत बहुत सुनियोजित तरीके से भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को नीचा दिखाने का हरसंभव प्रयास काफी समय से किया जा रहा है। कोरोना महामारी के काल में आयुर्वेद के प्रति दुष्प्रचार की गति बढ़ी। वह तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारतीय योग परंपरा को वैश्विक स्तर पर मान्यता देने के बाद आयुर्वेद का सिक्का पूरी दुनिया में चल निकला है। फिर भी षड्यंत्र जारी हैं।

आईएमए के दुरुपयोग का षड्यंत्र
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन अर्थात आईएमए की आड़ में कन्वर्जन के प्रयासों का भी पता चला है। सोचिए कि षड्यंत्र कितना बहुआयामी है। मई, 2021 के आखिर में दिल्ली की एक कोर्ट ने आइएमए के अध्यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयालाल को समन जारी किया। उन्होंने अपने एक लेख में कोविड-19 महामारी के प्रकोप को कन्वर्जन का सही अवसर मानते हुए बीमारी से जूझ रहे लोगों के ईसाई धर्म में कन्वर्जन के प्रयास तेज करने का सुझाव दिया था। जून की शुरुआत में कोर्ट ने डॉ. जयालाल को बाकायदा निर्देश दिया कि वे धर्म के प्रचार के लिए अपने पद का दुरुपयोग करते हुए आईएमए के मंच का प्रयोग न करें। एक रिपोर्ट के अनुसार अनफोल्डिंग वर्ल्ड के प्रमुख डेविड रीव्स ने अप्रैल में मिशनरी न्यूज नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ‘कोरोना वर्ष यानी 2020 में भारत में चर्च प्लांटिंग पार्टनरों ने इतने चर्च बनाए, जितने इससे पहले के 25 वर्षों में नहीं बनाए गए थे।

जाल में फंसने से कैसे बचें?
ईसाई मिशनरी के कन्वर्जन के प्रयासों को नाकाम करना है, तो बहुत से स्तरों पर सावधानियां बरतने की आवश्यकता है। बच्चों में शुरुआत से ही सनातन संस्कार डालें। उन्हें संस्कारों से जुड़ी वैज्ञानिक अवधारणाओं के बारे में बताएं। जहां-जहां ईसाइयत को भारतीय जामा पहनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, उन क्षेत्रों में सनातन समाज को साधु-संतों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाना चाहिए। भारतीयता की श्रेष्ठता और महत्ता के प्रति जागरूकता अभियान चलाना बहुत आवश्यक है।
कॉन्वेंट स्कूलों के सॉफ्ट कन्वर्जन के प्रयासों का दृढ़ता पूर्वक विरोध करें। जिस सीमा पर लगे कि बच्चों में कन्वर्जन के बीज रोपे जा रहे हैं, सामाजिक स्तर पर संस्थागत सोच के साथ इसका विरोध होना चाहिए। भागवत कथाओं और दूसरे धार्मिक आयोजनों में बच्चों को नियमित रूप से ले जाना चाहिए, ताकि कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने के बाद भी उनके मन में ईसाइयत के रंग में रंगने का विचार न उभरे। घर में आंगन या बालकनी में तुलसी का पौधा अनिवार्य रूप से रखें। घर के मंदिर में नियमित रूप से पूजा-पाठ करें। बच्चों को भी इसकी आदत डलवाएं।
31 दिसंबर को अंग्रेजी नव वर्ष का अंत होता है, यह बात बच्चों के साथ-साथ युवाओं के मन में भी बैठानी चाहिए। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के संदेशों में ‘ईयर’ शब्द से पहले ‘इंग्लिश’ जोड़ने की परंपरा विकसित करने का आग्रह बच्चों से करें। पहले चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवरात्रि की शुरुआत से हिंदू नव वर्ष प्रारंभ होता है। उस दिन सपरिवार समारोह पूर्वक उत्सव मनाएं। शुभ अवसरों पर केक काटने की परंपरा से बचें। केक कटे, तो पूजा-पाठ भी हो। बच्चों को क्रॉस या दूसरे धार्मिक चिन्ह धारण करते पाएं, तो उन्हें सजग करें। ऐसी ही छोटी-छोटी सावधानियां बरत कर सॉफ्ट कन्वर्जन से बचा जा सकता है। सनातन संस्कारों की नींव शक्तिशाली होगी, तो बाद में आस्था के भवन पर दूसरा रंग नहीं चढ़ पाएगा। हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि का प्रयोग बढ़ाएं। सोशल मीडिया पर रोमन में हिंदी लिखने से बचें।
भारत का संविधान सभी धर्मों के आदर का संदश देता है। धर्मांतरण या मतांतरण या कन्वर्जन एक तरह से राष्ट्रांतरण ही है। कन्वर्जन मात्र आस्था या पूजा पद्धि बदलने का प्रश्न नहीं, इससे कहीं अधिक संवेदनशील मामला है। ईसाई मिशनरी यदि भगवान कृष्ण और दूसरे सनातन देवी-देवताओं से बहुत प्रभावित है, श्रीमद्भागवत और गीता में ईसाइयत का सार निहित है, तो वे ईसाइयत छोड़ कर हिंदुत्व क्यों नहीं अपना लेते?

क्या सनातन का विरोध और अपमान ही सेक्युलर राजनीति है ?

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दिल्ली । भारत विभाजन के साथ मिली स्वाधीनता से कोई सबक न लेते हुए भारत की राजनीति आज तक तुष्टिकरण के आधार पर चलती रही है। मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए तथाकथित समाजवादी लालू ने सम्मानित नेता आडवाणी जी को जेल में डाल दिया और एक कदम आगे बढ़ते हुए मुलायम सिंह ने निहत्थे रामभक्तों को गोलियों से भुनवा दिया, कांग्रेस साम्प्रदायिक हिंसा बिल ले आई वो तो भला हो उस समय विपक्ष में होने के बाद भी भाजपा ने इसे पारित होने से बचा लिया। मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण ही पाकिस्तान को सटीक उत्तर देने की जगह अमन का तमाशा किया जाता रहा। मात्र इतना ही नहीं मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए भारत की सनातन संस्कृति को अनेकानेक प्रकार से चोट पहुंचाई जाती रही । वर्ष 2014 में केन्द्रीय नेतृत्व प्रदान करते हुए नरेन्द्र मोदी जी ने तुष्टिकरण के कारण सनातन संस्कृति को हुई क्षति की भरपाई करने के प्रयास किए हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दल और अधिक कटु होकर सनातन हिंदू धर्म पर प्रहार कर रहे हैं । रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को उनकी दो दिवसीय भारत यात्रा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता का रूसी अनुवाद भेंट किया। इसको देखकर कांग्रेस और वामपंथी दलों ने न केवल प्रधानमंत्री वरन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करते हुए इसका विरोध किया। कांग्रेसियों ने गीता के लिए माल शब्द का प्रयोग किया जो एक अक्षम्य अपराध है ।

वर्ष 2026 में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं अतः इन दो प्रान्तों में सनातन प्रतीकों तथा हिन्दू समाज को अपमानित करने का कार्य भी सबसे अधिक और सबसे तेजी से हो रहा है। पश्चिम बंगाल में वहां के तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर ने गुलामी की मानसिकता से ग्रसित होकर बाबर के नाम की एक मस्जिद की आधारशिला रखी और प्रशासन चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि इस हरकत को मुख्यमंत्री का मौन समर्थन था। उसकी देखादेखी बिहार और तेलंगना में भी कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने बाबरी नाम की मस्जिद व स्मारक बनाने का ऐलान करके साप्रंदायिक तनाव बढ़ाने का काम आरम्भ कर दिया है। इस बाबरी भूत को वह सभी दल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समर्थन दे रहे हैं जिनकी राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण से चलती है और जो संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमते हैं ।

उत्तर प्रदेश में सपा मुखिया सपरिवार शौर्य दिवस को सलीम चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाकर हिन्दुओं को चिढ़ाते दिखे । सपा मुखिया का तुष्टिकरण में संलिप्त यह कृत्य जनता समझ रही है। सपा मुखिया समय समय पर ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे सनातन हिन्दू समाज आहत हो। महाकुंभ से लेकर लेकर अयोध्या के दीपोत्सव तक उन्होंने हिन्दू परम्पराओं का उपहास करते हुए उन्हें ढोंग बताया।

वहीं कांग्रेस ने तो हिदू सनातन आस्था के सभी केन्द्रों का अपमान करने की सुपारी ही ले रखी है। कर्नाटक में तो मुस्लिम तुष्टिकरण का खुला खेल चल ही रहा है। हिमाचंल प्रदेश कि कांग्रेस सरकार मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह “सुक्खू “ को हिंदू बच्चों के राधे -राधे बोलने पर आपत्ति है। तेलंगाना के कांग्रेस मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी लगातार सनातन और हिंदुओं के विरुद्ध आग उगल रहे हैं। रेवंत रेड्डी ने हिंदुओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि हर व्यक्ति और हर काम के लिए एक अलग भगवान होता है। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा हिंदू कितने भगवानों को मानते हैं ? तीन करोड़ हैं, इतने सारे क्यों हैं? जो लोग अविवाहित हैं उनके लिए एक भगवाण है हनुमान, जो लोग दो शादी करते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं और जो लोग शराब पीते हैं व मुर्गी खाते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं। हर ग्रुप का अलग भगवान है। रेड्डी के बयान से हिंदुओं की भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक था । हिंदू संगठनों ने मुख्यमंत्री से माफी मांगने को कहा किंतु मुस्लिम परस्त रेवंत रेड्डी अपने बयान पर कायम हैं ।

उधर तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के मंदिर में दीप जलाने को लेकर द्रमुक सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए न्यायालय की भी अवहेलना कर रही है। तमिलनाडु से ही हिन्दू और सनातन समाज को डेंगू -मलेरिया जैसे रोगों की संज्ञा दी जाती रही है।

आश्चर्य की बात ये है कि सनातन हिन्दू धर्म का अपमान करने वाली इस राजनीति को “सेक्युलर” कहा जाता है। छद्म धर्मनिरपेक्षता का ये खेल लम्बा चल चुका है अब इसे समाप्त होना ही होगा।

घर वापसी: इतिहास और प्रक्रिया

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विनोद बंसल

दिल्ली । “घर वापसी”, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है किसी व्यक्ति या समूह का अपने घर में पुनः आगमन। यह केवल धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक महत्त्वपूर्ण धारा है। यह उन व्यक्तियों या समुदायों की अपने मूल स्वधर्म में वापसी की सात्विक प्रक्रिया है, जो ऐतिहासिक कारणों, लोभ-लालच, जोर-जबरदस्ती या सामाजिक परिस्थितियों के चलते अन्य मत, मजहबों को अपनाने के लिए विवश हुए थे।
*ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:*
भारत में हजारों वर्षों से बहुलतावादी संस्कृति रही है, लेकिन मध्यकालीन आक्रमणों के दौर में, विशेषकर मुगल और इस्लामी आक्रांताओं द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का बलपूर्वक या प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण हुआ। यही स्थिति अंग्रेजी शासन के औपनिवेशिक काल में भी रही, जब मिशनरियों ने लालच और सामाजिक सेवा की आड़ में लाखों हिन्दुओं, विशेषकर अनुसूचित जातियों, जनजातियों व अन्य पिछड़े वर्ग का धर्मान्तरण करवाया।

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में जब राष्ट्र प्रेम की भावना जोर पकड़ रही थी, तब आर्य समाज के मूर्धन्य सन्त पूज्य स्वामी श्रद्धानन्द और अन्य हिन्दू संगठनों ने ‘शुद्धि आंदोलन’ की शुरुआत की, जिसे आज ‘घर वापसी’ का मूल कहा जा सकता है। हालांकि घर वापसी की प्रक्रिया बहुत पुरातन काल से चली आ रही है।

स्वामी श्रद्धानन्द ने विशेष रूप से उत्तर भारत में जबरन मुसलमान बनाए गए मेवाती और अन्य जनजातीय समुदायों को पुनः हिन्दू धर्म में लौटाने का पुनीत कार्य किया। उन्होंने इसे सामाजिक पुनरुद्धार मानकर “राष्ट्रीय कर्तव्य” की संज्ञा दी। इसी शुद्धि आंदोलन के कारण 1926 में उनकी हत्या अब्दुल रशीद नामक मुसलमान ने धोखे से कर दी।

वर्ष 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की पृष्ठभूमि में भी धर्मान्तरण के अभिशाप से मुक्ति ही थी। मध्यप्रदेश में ईसाई मिशनरियों के द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण मामले में आई नियोगी कमीशन की रिपोर्ट ने 70 के दशक में देशव्यापी बहस व नव चेतना को जन्म दिया।

हिन्दू की परिभाषा करते हुए विहिप के संविधान में कहा गया कि “जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है या जो व्यक्ति स्वयं को हिन्दू कहता है वह हिन्दू है”। अपनी स्थापना के दूसरे ही वर्ष में 22 से 24 जनवरी, 1966 को कुम्भ के अवसर पर 12 देशों के 25 हज़ार प्रतिनिधियों की सहभागिता के साथ संगठन का प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन तीर्थराज प्रयागराज में सम्पन्न हुआ। इसमें 300 प्रमुख सन्तों के साथ पहली बार प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मान्तरण पर रोक व परावर्तन (घर वापसी) का बड़ा सार्वजनिक संकल्प लिया गया। इसी सम्मेलन में परावर्तन यानी घर वापसी को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ, वहीं विहिप के बोध वाक्य “धर्मो रक्षति रक्षितः” और बोध चिह्न “अक्षय वटवृक्ष” भी तय हुआ।

विहिप द्वारा आयोजित 1969 की उडुपी धर्म संसद में पूज्य सन्तों का यह उदघोष कि ‘हिन्दाव: सोदरा सर्वे, ना हिन्दू पतित भवेत्’, ने भी देश भर में नई बहस को जन्म दिया और कहा कि हिन्दू कभी पतित या नीचा नहीं होता। सभी हिन्दू भाई-भाई हैं। जिन्होंने दबाव, लालच या किसी विवशतावश हिन्दू धर्म छोड़ा, वे भी स्वेच्छा से स्वधर्म में पुनः वापस आ सकते हैं। ऐसे अपने सभी बिछड़े बन्धु भगिनियों का हम मिलकर हृदय से स्वागत करेंगे। यह बात पूजनीय श्री गुरुजी की उपस्थिति में सभी पूजनीय जगतगुरू शंकराचार्यों व देश के वरिष्ठ हिन्दू नेतृत्व से उद्घोषित की। इससे पूर्व समाज का एक वर्ग घर वापसी को ठीक नहीं मानता था। वह कहता था कि मुसलमान बनने से वह अपवित्र हो गया और ऐसे पथ भ्रष्ट व्यक्तियों के साथ हम कैसे सम्बन्ध बना सकते हैं।

वास्तव में धर्मान्तरण ने ही ‘घर वापसी’ को संगठित आन्दोलन का रूप दिया। विहिप का मानना है कि धर्मान्तरण भारतीय समाज को विभाजित कर राष्ट्रान्तरण का कारक बन, न सिर्फ देश की सांस्कृतिक अस्मिता को खतरे में डालता है, अपितु अपने ही पूर्व स्वधर्मियों का शोषण कर अमानवीय रूप धारण कर लेता है। भारत से अलग हुए पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति इसका जीता जागता उदाहरण है। इसीलिए, घर वापसी को ‘धर्मान्तरण’ नहीं बल्कि, ‘स्वधर्म की पुनर्प्राप्ति’ माना जाता है।

विहिप समेत अनेक पूज्य सन्त व हिंदू संगठन, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक चौकन्ने रहते हैं, जहां हिन्दू समाज के अनुसूचित जाति, जनजातियों या अन्य सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोग अधिक संख्या में पहले हिन्दू थे और बाद में ईसाई बन गए या इस्लाम में चले गए।

*घर वापसी की प्रक्रिया:*
हालांकि घर वापसी की कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं बताई जा सकती, यह देश, काल व परिस्थिति के अनुसार बदली रहती है किन्तु, सामान्य तौर पर यह निम्नलिखित चरणों में होती है:
1. *सम्पर्क एवं सम्वाद:* पहले उन व्यक्तियों या परिवारों से सम्पर्क किया जाता है जो अपने पूर्वजों के धर्म में लौटने को स्वयं इच्छुक होते हैं।
2. *सत्यापन* : जांच की जाती है कि सम्बन्धित व्यक्ति या उनके पूर्वज वास्तव में कभी हिन्दू थे। यह पहचान व्यक्तियों के ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक व पारिवारिक परिवेश के आधार पर होती है।
3. *धार्मिक अनुष्ठान:* घर वापसी की प्रक्रिया एक पवित्र वैदिक विधान के अन्तर्गत ‘शुद्धि यज्ञ’, ‘संकल्प’, ‘हवन’, और ‘गंगा जल स्नान’ इत्यादि धार्मिक अनुष्ठान के द्वारा सम्पन्न होती है।
4. *सामाजिक पुनः स्वीकार:* स्थानीय समाज के वरिष्ठ जन और पुरोहित वर्ग उस व्यक्ति या पारिवारिक समूह को पुनः हिन्दू समाज में अभिनन्दन पूर्वक स्वीकार कर उन्हें उनका मूल गोत्र प्रदान करते हैं।
5. *सामाजिक समरसता:* उनके पुनः हिन्दू समाज में आने के बाद उनके साथ भेदभाव, विशेषकर जाति या वर्ग के आधार पर न हो, यह शेष समाज द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। साथ ही उनके साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध बना कर एकता और एकात्मकता का संकल्प भी लिया जाता है।

पूज्य सन्तों के आशीर्वाद व हिन्दू समाज के जागरूक लोगों व समूहों के साथ विश्व हिन्दू परिषद के गत छह दशकों में किए गए विविध प्रयासों ने इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण देश में नव चेतना का संचार किया है। विहिप ने अवैध धर्मान्तरण पर रोक तथा धर्मान्तरित हिन्दू भाई-बहनों को अपनी जड़ों से पुन: जोड़ने की दिशा में भी बड़ा कार्य किया है। अभी तक लगभग 40 लाख हिन्दुओं के धर्मान्तरण को रोका गया है। साथ-साथ लगभग नौ लाख लोगों की घर वापसी भी कराई जा चुकी है। अनुसूचित जाति, जन जाति, वनवासी व गिरिवासी समाज के बीच सेवा, समर्पण व स्वावलन्बन के मन्त्र के साथ अनेक राज्यों में छल-बल पूर्वक धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर दंड की व्यवस्था वाले कानून विहिप के सतत प्रयासों के कारण ही बन पाए हैं।

अभी तक लगभग 25 हजार बहनों को लव जिहाद के षडयन्त्र से बचाया गया है। इतना ही नहीं, गत एक दशक में देश के दर्जन भर राज्यों में अवैध धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर कानून बनवाकर धर्मद्रोही चर्च, जिहादी और कम्युनिस्टों को जेल पहुंचाया गया है। कुछ वर्ष पूर्व तक लव जिहाद व धर्मान्तरण की घटनाओं को जो लोग सिरे से नकारकर भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं का उपहास उड़ाते थे, वे अब स्वयं उसे मानने को मजबूर हुए हैं। समाज में घर वापसी के प्रति नई लहर चल पड़ी है। यूपी में छांगुर जैसे जिहादी जमालुद्दीनों के अनगिनत देश विरोधी व धर्मान्तरण के अड्डों को अब समाज स्वयं अग्रणी होकर ध्वस्त कर रहा है। विहिप समेत अब सम्पूर्ण भारत का यह संकल्प है कि देश को हम धर्मान्तरण की इस विभीषिका से मुक्ति दिला कर ही रहेंगे।

(लेखक विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)

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