सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है – डॉ. मोहन भागवत जी

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जयपुर, 15 नवम्बर। आज एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान की ओर से आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन विचार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश, काल, परिस्थिति के अनुसार एकात्म मानव दर्शन का नया नाम देकर लोगों के समक्ष रखा। यह विचार नया नहीं है, 60 वर्ष बाद भी वर्तमान समय में यह एकात्म मानव दर्शन पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक है।
एकात्म मानव दर्शन को एक शब्द में समझना है तो वह शब्द है धर्म। इस धर्म का अर्थ रिलिजन, मत, पंथ, संप्रदाय नहीं है। इस धर्म का तात्पर्य गंतव्य से है, सब की धारणा करने वाला धर्म है। वर्तमान समय में दुनिया को इसी एकात्म मानव दर्शन के धर्म से चलना होगा। सरसंघचालक जी ने कहा कि भारतीय जब भी बाहर गए किसी को लूटा नहीं, किसी को पीटा नहीं, सबको सुखी किया।

भारत में भी पिछले कई दशकों में रहन-सहन, खानपान, वेशभूषा सब बदला होगा, किंतु सनातन विचार नहीं बदला। वह सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है और उसका आधार यह है कि सुख बाहर नहीं, हमारे भीतर ही होता है। हम अंदर का सुख देखते हैं, तब समझ में आता है कि पूरा विश्व एकात्म है। इस एकात्म मानव दर्शन में अतिवाद नहीं है।

उन्होंने कहा कि सत्ता की भी मर्यादा है। सबका हित साधते हुए अपना विकास करना यह वर्तमान समय की आवश्यकता है। पूरे विश्व में अनेक बार आर्थिक उठापटक होती हैं, लेकिन भारत पर इसका असर सबसे कम होता है क्योंकि भारत के अर्थतंत्र का आधार यहां की परिवार व्यवस्था है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि वर्तमान में विज्ञान की प्रगति चरम पर जा रही है। विज्ञान के आधार पर सबका जीवन भौतिक सुविधाओं से संपन्न हो, ऐसे प्रयास हो रहे हैं। लेकिन क्या मनुष्य के मन में शांति और संतोष भी बढ़ रहा है। विज्ञान की प्रगति के कारण बहुत सी नई दवाइयां बनी हैं, किंतु क्या स्वास्थ्य पहले की तुलना में अधिक ठीक हुआ है। कुछ बीमारियों का तो कारण ही कुछ दवाइयां हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां प्रारंभ से ही अनेक विषयों में विविधता रही है, लेकिन हमारे यहां की विविधता कभी झगड़े का कारण नहीं बनी। अपितु हमारे यहां की विविधता उत्सव का विषय बनी। हमारे यहां पहले से अनेक देवी देवता थे, कुछ और भी आ गए तो हमें कोई समस्या नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया यह तो जानती है कि शरीर, बुद्धि और मन का सुख होता है। लेकिन उसे एक साथ कैसे प्राप्त किया जाए, यह दुनिया नहीं जानती। यह केवल भारत जानता है क्योंकि भारत में शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा सभी के सुख का विचार है।

कार्यक्रम की प्रस्तावना एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा ने रखी। उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि एकात्म है। सृष्टि का एक कण भी हिलता है तो संपूर्ण सृष्टि पर असर दिखता है। इस समय वंदे मातरम् की रचना का 150वां वर्ष चल रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में पूरा वंदे मातरम गाना अत्यंत आवश्यक है।

स्वास्थ्य कल्याण ग्रुप के निदेशक डॉ. एस.एस. अग्रवाल ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं डॉ. नर्बदा इंदौरिया ने कार्यक्रम का संचालन किया।

संघ स्वयंसेवकों के भाव बल और जीवन बल से चलता है – डॉ. मोहन भागवत जी

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जयपुर, 16 नवंबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने ज्ञान गंगा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘…और यह जीवन समर्पित’ का विमोचन किया। कार्यक्रम का आयोजन पाथेय कण संस्थान के नारद सभागार में किया गया। यह पुस्तक राजस्थान के दिवंगत 24 प्रचारकों की जीवन गाथा का संकलन है।

इस अवसर पर सरसंघचालक जी ने कहा कि स्वयंसेवकों के भाव बल और जीवन बल से ही संघ चलता है। मानसिकता से हर स्वंयसेवक प्रचारक ही हो जाता है। संघ की यही जीवन शक्ति है। संघ यानी हम स्वयंसेवक हैं। संघ यानी स्वयंसेवकों का जीवन और उनका भाव बल है। आज संघ बढ़ गया है। कार्य की दृष्टि से अनुकूलताएं और सुविधाएं भी बढ़ी हैं, परंतु इसमें बहुत सारे नुकसान भी हैं। हमें वैसा ही रहना है जैसा हम विरोध और उपेक्षा के समय थे, उसी भाव बल से संघ आगे बढ़ेगा।

उन्होंने कहा कि संघ ऐसे ही समझ में नहीं आता है। इसे समझने के लिए प्रत्यक्ष अनुभूति की आवश्यकता होती है, जो संघ में प्रत्यक्ष आने के बाद ही प्राप्त हो सकती है। कई लोगों ने संघ की स्पर्धा में संघ जैसी शाखाएं चलाने का उपक्रम किया। लेकिन पंद्रह दिन से ज्यादा किसी की शाखा नहीं चली। हमारी सौ साल से चल रही है और बढ़ भी रही है। क्योंकि संघ स्वंयसेवकों के भाव बल और जीवन बल पर चलता है।

मोहन भागवत जी ने कहा कि आज संघ का काम चर्चा और समाज के स्नेह का विषय बना हुआ है। संघ के स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने क्या-क्या किया है, इसके डंके बज रहे हैं। सौ साल पहले कौन कल्पना कर सकता था कि ऐसे ही शाखा चलाकर राष्ट्र का कुछ होने वाला है? लोग तो कहते ही थे कि हवा में डंडे घुमा रहे हैं। ये क्या राष्ट्र की सुरक्षा करेंगे? लेकिन आज संघ शताब्दी वर्ष मना रहा है और समाज में संघ की स्वीकार्यता बढ़ी है।

उन्होंने प्रचारकों और वरिष्ठ स्वयंसेवकों के जीवन पर आधारित पुस्तक ‘…और यह जीवन समर्पित’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक केवल गौरव की भावना नहीं जगाती, बल्कि कठिन रास्ते पर चलने की प्रेरणा भी देती है। स्वयंसेवकों का आह्वान किया कि वे इस परंपरा को न केवल पढ़ें, बल्कि अपने जीवन में उतारें। यदि उनके तेज का एक कण भी हमने अपने जीवन में धारण कर लिया, तो हम भी समाज और राष्ट्र को आलोकित कर सकते हैं।

कार्यक्रम के आरंभ में पुस्तक का परिचय और प्रस्तावना संपादक भागीरथ चौधरी ने रखी। आभार ज्ञान गंगा प्रकाशन समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरलीधर शर्मा ने प्रकट किया। समिति के उपाध्यक्ष जगदीश नारायण शर्मा ने सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया।

सनातनी मिथिला में डेमोग्राफी चेंज – आहट से आतंक तक का सफर।

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इम्पल्स कोटा

दरभंगा । 13वीं सदी के उत्तरार्ध तक, मिथिला में नव्यन्याय की तार्किक धारा के किनारे, सनातनी व्यवस्था पुष्पित-पल्लवित होती आ रही थी।

इसके पूर्व गंगेश उपाध्याय द्वारा ‘तत्वचिंतामणि’ पुस्तक की रचना हुई थी।

उससे पहले जयंतभट्ट की ‘न्यायमंजरी’, उदयनाचार्य की ‘न्यायकुसुमांजली तथा तात्पर्यशुद्धिविवेक’ और वाचस्पति मिश्र की ‘न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका’ द्वारा ‘मिथिला’ न्यायदर्शन को अपनी विद्वत परंपरा से अभिसिंचित कर चुका था।

मैथिल अक्षपाद गौतम ‘न्यायदर्शन’ के प्रणेता थे।

गौतम लिखित ग्रंथ ‘न्यायसूत्र’ से ही महात्मा बुद्ध को पूर्व के ‘विचार-प्रवाह’ को परिष्कृत करने की आवश्यकता जान पड़ी थी।

पक्षधर मिश्र या उनके बाद के कुछ दसकों तक, मिथिला के विद्वान अपनी ‘ज्ञान परंपरा’ को मिथिला से बाहर नहीं जाने देते थे। उस ज्ञान-परंपरा पर केवल मिथिला में रहनेवाले लोगों का अधिकार था।

यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि इस समय तक मिथिला में ‘इस्लाम’ की उपस्थिति का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

उदयनाचार्य सदृश नैयायिकों द्वारा बौद्ध मत को पहले ही निर्मूल कर दिया गया था।

मंडन मिश्र तथा आदि शंकराचार्य प्रकरण के बाद संपूर्ण मिथिला क्षेत्र ‘सनातन संस्कृति’ का क्षीर-सागर बन चुका था।

अनगिनत राज्याश्रित शिक्षण केंद्रों द्वारा ‘विद्या बल’ का संचय कर मिथिला सम्पूर्ण भारतवर्ष को सनातन दृष्टि प्रदान कर रही थी।

इस तरह से मिथिला ‘सनातन धर्म दर्शन परंपरा’ का सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र बन चुका था।

यह अलग बात है कि उसी समय मिथिला के चारों ओर इस्लामी प्रचार-प्रसार केंद्र विकसित हो चुके थे।

काशी में भी सनातनी व्यवस्था ध्वस्त होती जा रही थी।

12वीं-13वीं सदी में मोहम्मद गोरी और बख्तियार खिलजी के आक्रमणों से दिल्ली, जौनपुर, बिहारशरीफ, लखनौती तथा मालदा आदि क्षेत्र इस्लाम के राजनैतिक, सैनिक तथा जिहादी केंद्र के तौर पर विकसित हो चुके थे।

ऐसी स्थिति में भी मिथिला हिन्दू धर्म, संस्कार तथा संस्कृति की शरणस्थली बना हुआ था।

इसी बीच नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त कर बख्तियार खिलजी ने तत्कालीन मिथिला नरेश कर्णाट वंशी रामसिंह देव को परास्त किया।

मिथिला में लूटपाट कर खिलजी गौड़ बंगाल की ओर निकल गया।

यही वह समय था जब पहली बार मिथिला का सामना इस्लामी अतिक्रमण से हुआ। जिहादी तत्वों की पहली ‘आहट’ तभी सुनाई पड़ी।

कर्णाट वंश के बाद भी लेकिन मिथिला पर हिन्दू शासन ओइनवार राजाओ के रूपः में यथावत चलता रहा।

इसका कारण यह था कि उस समय राजनीतिक स्थिति में भले परिवर्तन आ गया परंतु धरातल पर स्थिति हिंदुत्व के पक्ष में थी।

पूरे मिथिला क्षेत्र में हिन्दू धर्म को मानने वाली जनता के दवाब के सम्मुख इस्लामी राजनीतिक सत्ता-केंद्र असहाय ही रहा।

क्षेत्रीय स्तर पर मिथिला की बागडोर हिन्दू राजाओं के हाथ रही।

राज्याश्रित कौलिक शैक्षणिक व्यवस्था निरंतर अपने संचित ज्ञान-बल द्वारा मिथिला समाज को प्रदीप्त करती रही।

इस हिन्दू शासन का अंत 1527 में तब हुआ जब सिकंदर लोदी ने अंतिम ओइनवार राजा कंसनारायन लक्ष्मीनाथ देव को पराजित किया।

इस बीच यह जानना आवश्यक है कि बख्तियार खिलजी से सिकंदर लोदी तक, मिथिला के दरभंगा पर ग्यारह बार आक्रमण हुए।

इन आक्रमणों के पीछे लूटमार तथा इस्लामी जिहाद प्रमुख कारक थे। मिथिला की हिन्दू जनता के साथ अत्याचार उनमें ‘गाजी’ की भावना विकसित करती थी।

इन्हीं आक्रमणों के बीच मिथिला में इस्लामी उन्माद की आहट जोरदार ढंग से सुनाई देने लगी।

1326 ईसवी में हिन्दू राजा हरिसिंह देव की पराजय के बाद इस्लामी ताकतों द्वारा दरभंगा के क़िलाघाट में एक जामा मस्जिद, एक टकसाल तथा एक किला बनाकर उसका नाम तुग़लकपुरी रखा गया।

मिथिला के स्थानीय हिन्दू लोगों के प्रतिरोध के कारण ही दिल्ली सल्तनत ने ओइनवार ब्राह्मण भोगीस्वर ठाकुर को लगभग 1335 में मिथिला का राजा नियुक्त किया था।

ऊपर बताया जा चुका है कि 1527 में सिकंदर लोदी से हार के बाद यह हिन्दू शासन खत्म हो गया।

तत्पश्चात दिल्ली से बंगाल की यात्रा के लिए ‘मिथिला’ के भूभाग का उपयोग किया जाने लगा।

इसके पीछे उनकी मंशा यही थी की स्थानीय हिन्दू बहुल जनता को भयाक्रांत रखा जा सके और सनातनी व्यवस्था के प्रमुख केंद्रों को भी लगातार कमजोर किया जाता रहे।

मुख्य रूप से निम्नलिखित मार्गो का उपयोग किया जाता था-

1. जौनपुर- गोरखपुर- बनारस- सिवान- केसरिया- तुर्की- मुजफ्फरपुर- दरभंगा- पुर्णिया- दिनाजपुर- लखनौती।

2. दरभंगा- बहेड़ा- रोसड़ा- बलिया- मुंगेर।

3. दरभंगा- समस्तीपुर- बाजिदपुर- तेघरा- बलिया- मुंगेर।

इन मार्गों का उपयोग कर बख्तियार खिलजी, इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान, गयासुद्दीन, मुहम्मद बिन तुगलक, फिरोजशाह, सिकंदर लोदी तथा शेरशाह सूरी के सैनिको ने गौड़ बंगाल पर आक्रमण किया था।

इन लगातार आक्रमणों से उत्पन्न इस्लामी आतंक को देख मिथिला के विद्वानों का यह निश्चय दृढ़ होता गया कि सनातन धर्म व्यवस्था के प्राचीन मान्यताओं को नवीन, समयानुकूल और सोद्देश्यपूर्ण आधार पर सुदृढ़ कर समाज के प्रत्येक वर्ग को एकता के सूत्र में बांधकर सनातनी आदर्शों के प्रति एकनिष्ठ रखने का प्रयास किया जाए।

मिथिला के विद्वानों को यह आभास हो गया था कि राजनीतिक रूप से मजबूत हो रहे इस्लामी झंझावात से सनातनी मैथिल सामाजिक बंधन शिथिल हो सकते हैं।

विदेशी विधर्मी आक्रमणकारियों से सनातनी मैथिल जीवन पूर्ववत स्वायत्त रहे इसीलिए तब मिथिला के विद्वानों ने मिथिला ही नहीं वरन संपूर्ण भारतीय जनमानस को सांस्कृतिक रूप से ‘एकसूत्र’ में पिरोने के लिए प्राचीन धर्मशास्त्रों का नवीन प्रणयन शुरू किया।

इस प्रणयन की मेखला तो ‘न्याय दर्शन’ को बना परंतु परिधि पर अन्य धर्मशास्त्रीय निबंधों, साहित्यिक पदावलियों तथा भगवद लोकगीतों को रखा गया।

मिथिला के निकट, बंगाल का नवद्वीप क्षेत्र था। उस क्षेत्र को भी प्राचीन धर्म दर्शन जीवन परंपरा से संपृक्त रखने की जिम्मेदारी मिथिला ने उठाया।

नवद्वीप के वासुदेव सार्वभौम तथा रघुनाथ शिरोमणि अध्धयन के लिए मिथिला आए।

तत्समय महापंडित पक्षधर मिश्र से शिक्षा ग्रहण कर उन्होंने नवद्वीप में न्याय विद्यापीठ की स्थापना किया। समय के गर्भ से उसी नवद्वीप में चैतन्य महाप्रभु ने ‘कृष्ण-भक्ति’ को नई ऊंचाई तक पहुंचाया।

इसी विद्यापीठ से उत्पन्न मथुरानाथ तर्कवागीश, जगदीश तर्कालंकार, गदाधर भट्टाचार्य प्रभृत विद्वानों ने उस क्षेत्र में सनातनी धर्म व्यवस्था की ध्वजा को मजबूती से थामे रखा।

इतना ही नहीं, पक्षधर मिश्र के नाटक ‘प्रसन्नराघव’ से प्रभावित गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना कर, इस्लामी अतिक्रमण से उद्वेलित उत्तर भारतीय जनमानस को श्रीराम के रूप में अपना अनन्य नायक प्रदान किया।

इस्लामी अतिक्रमण से उत्पन्न अराजकता से सनातनी मर्यादा के टूटते तंतुओं को एक ऐसे नायक की आवश्यकता थी जिसके व्यक्तित्व में वही पुरातन कौलिक आदर्शों की उपस्थिति संभव हो जिनके दम पर आजतक हिंदुत्व की सरिता से अपना जीवन-जल प्राप्त कर रहा समाज, अविकल अपने दैनिक जीवन में ‘धर्म’ के आचरणों को धारण करता आ रहा था।

मैथिल सीता और अवधेश श्रीराम के कठिन परंतु आदर्श जीवन को श्रीरामचरितमानस के माध्यम से घर-घर तक पहुंचाकर, सम्पूर्ण सनातनी समाज को वह आवश्यक संबल प्रदान किया गया जिसकी उपादेयता तब के समय सर्वाधिक थी।

काशी तब हिंदुत्व की हृदयस्थली था जिसे मिथिला की पांडित्य परंपरा का रक्त पर्याप्त पोषण प्रदान कर रहा था।

मगर केंद्र में संगठित हो रहे मुगल साम्राज्य ने मिथिला क्षेत्र में ‘इस्लामी प्रचार प्रसार’ को तब महत्वपूर्ण सहायता प्रदान किया जब मुगल सम्राट अकबर ने 1570 ईसवी में गंगा के दक्षिणी तथा गंगा के उत्तरी क्षेत्रों को जोड़कर एक ‘सूबा’ बना दिया।

अब मिथिला अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो चुका था।

इसके साथ ही दरभंगा, मधुबनी, रोसड़ा, बेलसंड, परसरमा, महुआ, दलसिंहसराय, बलिया, तुर्की, महिषी आदि स्थानों में इस्लामी सैन्य छावनियों का निर्माण किया गया।

सनातनी धर्म व्यवस्था के केंद्रों तथा उसके उन्नायकों की अनुपस्थिति में यह इस्लामी जिहादी अतिक्रमण निर्बाध चलता रहा।

इस काल में इस्लामी फ़क़ीर, मौलवी, मखदूम, मुल्ला लोगों ने इस्लामी शासन के सहयोग से ‘धर्म प्रचार’ करना शुरू किया। इनमें से कइयों ने तो मिथिला पर हो रहे आक्रमणों में जिहादी तत्वों का साथ भी दिया।

अंग्रेजी शासन व्यवस्था आने तक यह इस्लामी प्रचार-प्रसार पूरी सक्रियता से चलता रहा, जिससे मिथिला की ‘जननांकिय स्थिति’ प्रभावी रूप से परिवर्तित होने लगी।

इस बीच सनातन धर्म दर्शन परंपरा के जितने भी ‘संदर्भ केंद्र’ थे वो धराशायी हो गए। याज्ञवल्क्य, वाचस्पति, मंडन, उदयन तथा पक्षधर सदृश केंद्रों का संरक्षण और संवर्धन क्षीण होता गया।

परिणामस्वरूप 1872 की प्रथम जनगणना में मिथिला क्षेत्र में मुस्लिम जनसंख्या 12 प्रतिशत दर्ज की गई।

आज के समय मे 2011 की जनगणना के अनुसार मिथिला क्षेत्र के अधिकांश भागों में मुसलमानों की जनसंख्या 35 प्रतिशत से अधिक हो गई है।

मिथिला के सुदूरवर्ती कुछ क्षेत्रों में तो मुस्लिम जनसंख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है।

इस स्थिति की शुरुआत धर्म-परिवर्तन से हुई जिसे उनकी जनसंख्या-विस्फोट ने आगे बढ़ाया।

नेपाल तथा बांग्लादेश से जुड़े होने के कारण भारत के सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्लामी उन्माद की जो आहट चौदहवीं शताब्दी में सुनी गई, वह खतरनाक आहट आज केवल सात सौ वर्षों के बाद एक आसन्न ‘संकट’ में परिणत हो चुकी है।

स्पष्ट है कि जिस मिथिला ने मध्य काल में बंगाल, आसाम तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘हिंदुत्व’ का जोरदार संरक्षण किया, वही मिथिला 19वीं-20वीं-21वीं सदी में इतना कमजोर हो गया है कि आसाम-बंगाल से पूर्वी उत्तर प्रदेश तक की संपूर्ण भारतीय सीमा संकटापन्न हो गई है।

देश एवं समाज के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ प्रचारक ओम प्रकाश गर्ग

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गाजियाबाद । ओमप्रकाश गर्ग जी का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मोरटा नामक ग्राम में स्व0 बेनी प्रसाद गर्ग जी के घर में दिनांक 21 जून, 1926 को हुआ।

बाल्यकाल में ही आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आ गए एवं बाल गणशिक्षक के रूप में दायित्व सम्भाला तत्पश्चात् विज्ञान विषय में स्नातक करने के उपरान्त वर्ष 1946 में वाराणसी से प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करके उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद में नगर प्रचारक, वर्ष 1947 में भरतपुर से द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करके फर्रूखाबाद के जिला प्रचारक बने एवं वर्ष 1954 में नागपुर से तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात् वर्ष 1956 में लखीमपुर के जिला प्रचारक के दायित्व का निर्वहन किया।

वर्ष 1960 में लखनऊ जिले में भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री का दायित्व सम्भाला तत्पश्चात् वर्ष 1972 तक आप आगरा, मथुरा, गया, भागलपुर एवं पटना विभाग के विभिन्न दायित्वों पर कार्यरत रहे।

संगठन के प्रति आपकी लगन एवं निष्ठा को देखते हुए संगठन द्वारा आपको वर्ष 1974 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पटना विभाग के विभाग प्रचारक के रूप में दायित्व सौंपा गया। वर्ष 1981 में बिहार प्रान्त के सह प्रान्त प्रचारक के रूप में दायित्व सम्भाला और आपकी कार्यकुशलता को देखते हुए वर्ष 1985 में आपको उत्तर बिहार के प्रान्त प्रचारक के रूप में दायित्व प्रदान किया गया।

संगठन ने आपको वर्ष 1991 में नेपाल राष्ट्र के प्रचारक का दायित्व सौंपा एवं इस अवधि में आपका केन्द्र काठमाण्डू रहा तत्पश्चात् आपने सीमा सुरक्षा संगठन के अन्तर्गत भारत के बिहार एवं उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाली नेपाल देश के सीमा का दायित्व का निर्वहन किया तथा इस दौरान आपका केन्द्र लखनऊ रहा।

संगठन के प्रति आपकी निष्ठा को देखते हुए संगठन ने आपको वर्ष 2007 में विश्व हिन्दू परिषद में केन्द्रीय मंत्री एवं नेपाल प्रभारी का दायित्व सौंपकर आपका केन्द्र दिल्ली कर दिया। वर्ष 2015 से अपने जीवन के अन्तिम समय तक विहिप के प्रबन्ध समिति के सदस्य के रूप में अनवरत आठ वर्षों तक आप विहिप कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करते रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक तथा राष्ट्र और समाज के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले श्री ओमप्रकाश गर्ग जी का देहावसान पटना के एक अस्पताल में लम्बी अस्वस्थता के पश्चात् दिनांक 06 नवम्बर, 2021 को सायंकाल 4.05 बजे हुआ।

समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व समझते हुए आपने दधीचि देहदान समिति को अपना नेत्रदान एवं देहदान करके कार्यकर्ताओं के समक्ष एक सर्वोच्चतम उदाहरण प्रस्तुत किया है।

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