भारत का बीमार स्वास्थ तंत्र खुद इलाज चाहता है पहले धंधा, बाद में सेवा

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दिल्ली। पिछले तीन दशकों में आगरा भारत की अग्रणी मेडिकल मंडी के रूप में उभरा है। निजी क्षेत्र के हॉस्पिटल्स और नर्सिंग होम्स की कुकुरमुत्तई बढ़त ने सुविधाएं तो निश्चित बढ़ाईं हैं, लेकिन अविश्वास और शोषण के लिए काफी ख्याति भी अर्जित की है। पूरे देश में ही स्वास्थ्य सेवाओं का बेड़ा गर्क है। हाल के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को खूब खरी खोटी सुनाई।

सही में, भारत के डॉक्टर्स के एक वर्ग को खुद इलाज की जरूरत है। मुक्तभोगियों का आरोप है कि मेडिकल फील्ड में सब कुछ सड़ा हुआ है। ” खि़दमत बाद में, तिजारत पहले, पाखंड ‘ओथ ऑफ़ हिपोक्रेटिस’ पर भारी पड़ता है,” फार्मा माफिया और प्राइवेट अस्पतालों, और डॉक्टरों के बीच गठजोड़, एक उभरता हुआ खतरा है लेकिन सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में अस्पतालों में गैर-किफायती चिकित्सा देखभाल, दवाओं और किटों की ज़्यादा क़ीमतों पर ध्यान दिलाया, प्राइवेट अस्पताल मरीज़ों को अपनी दुकानों से तरह-तरह की चीज़ें, इंप्लांट, स्टेंट, बहुत ज़्यादा क़ीमतों पर खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, फैसले में कहा गया कि राज्य और केंद्र सरकारें नियामक तंत्र लगाने और सुधारात्मक उपाय करने में नाकाम रही हैं, वाजिब क़ीमतों पर दवाएं मुहैया कराने में नाकामी ने सिर्फ़ प्राइवेट इकाइयों को बढ़ावा दिया है, अगर वही दवाएं बाहर सस्ती मिलती हैं तो डॉक्टरों को मरीज़ों को अपने इन-हाउस दुकानों से खरीदने के लिए क्यों मजबूर करना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत लोगों को उचित और सस्ती दवाएं पाने का हक है, हालाँकि फार्मा लॉबी इस सड़न को रोकने और इस क्षेत्र को खोलने के प्रयासों को नाकाम कर रही है।

केंद्रीय सरकार शून्य गरीबी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सभी के लिए व्यापक स्वास्थ्य सेवा के लिए काम करने के लिए प्रतिबद्ध है, जैसा कि वित्त मंत्री निर्मला ने अपने बजट भाषण में इशारा किया था।

अदालत के पाक दालानों से निकले हुए बयान और बजट भाषणों में गूंजती हुई ऊंची प्रतिज्ञाएं, भारत के चिकित्सा परिदृश्य की उस भयानक हक़ीक़त के बिलकुल उलट तस्वीर पेश करती हैं जो इसे घेरे हुए है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सही तौर पर “सड़ी हुई” हालत और वित्त मंत्री ने व्यापक स्वास्थ्य सेवा का वादा किया है, ज़मीनी हक़ीक़त एक ऐसे सिस्टम की चीख पुकार है जो लालच से भरा हुआ है, भ्रष्टाचार से लबालब है, और उन लोगों को नाकाम कर रहा है जिनकी खि़दमत के लिए इसे बनाया गया है। मेडिकल पेशा, जिसे कभी एक नेक काम माना जाता था, पर अब खि़दमत पर तिजारत को तरजीह देने का इल्ज़ाम है।

सुप्रीम कोर्ट का इल्ज़ाम बहुत संगीन है। यह प्राइवेट अस्पतालों के शिकारी तौर-तरीक़ों, फार्मा की बड़ी कंपनियों के साथ उनके नापाक गठजोड़, और नतीजतन उन भारी लागतों को उजागर करता है जो लाखों लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा को एक विलासिता बना देती हैं, न कि एक हक। अदालत की यह टिप्पणी कि मरीज़ों को अंदर की दुकानों से ज़रूरत की चीज़ें बढ़ी हुई क़ीमतों पर खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि वही चीज़ें बाहर सस्ती मिलती हैं, शोषण के एक गहरे बैठे सिस्टम को उजागर करती है।

यह महज़ इक्का-दुक्का घटनाओं का मामला नहीं है; बल्कि एक सिस्टमिक सड़न की बात करता है। “फार्मा माफिया” और प्राइवेट अस्पतालों के बीच गठजोड़, जिसमें कुछ डॉक्टर भी शामिल हैं, एक परेशान करने वाली तस्वीर पेश करता है, जहाँ मुनाफ़े के मकसद ने देखभाल के कर्तव्य को पूरी तरह से ग्रहण कर लिया है। डॉक्टर, जिन्हें शिफ़ा देने वाला होना चाहिए, कथित तौर पर इस शोषणकारी सिस्टम के रखवाले के तौर पर काम कर रहे हैं, मरीज़ों को ज़्यादा क़ीमत वाली अंदर की सुविधाओं और नुस्खों की तरफ़ धकेल रहे हैं, अक्सर प्रोत्साहन या रिश्वत के ज़रिए। यह मरीज़ और डॉक्टर के बीच भरोसे को मिटा देता है, एक ऐसे रिश्ते को बदल देता है जो शिफ़ा पर बना था, अब शक और वित्तीय बोझ से दाग़दार हो गया है।

सरकार की निष्क्रियता, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने उजागर किया है, उतनी ही निंदनीय है। वाजिब क़ीमतों पर दवाओं की कमी और प्राइवेट इकाइयों के शोषणकारी तौर-तरीक़ों को रोकने में असमर्थता ने अनजाने में उनकी बेलगाम तरक्की को बढ़ावा दिया है। अदालत की यह याद दिलाना कि लोगों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उचित और सस्ती दवाएं पाने का हक है, राज्य की इस मौलिक अधिकार को बनाए रखने में नाकामी की एक तीखी निंदा है।

इस समस्या की जड़ में फार्मास्युटिकल कंपनियों और डॉक्टरों के बीच का अवैध गठजोड़ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई डॉक्टर विशेष दवा कंपनियों से कमीशन लेकर महंगी दवाएं लिखते हैं, भले ही मरीज के लिए सस्ते विकल्प मौजूद हों।

केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत और जन औषधि केंद्र जैसी योजनाओं के जरिए सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने का दावा किया है, लेकिन जमीन पर इनका प्रभाव नगण्य है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नियामक तंत्र मजबूत करने और मेडिकल क्षेत्र में पारदर्शिता लाने का निर्देश दिया है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इस संदर्भ में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और सरकार को प्राइवेट अस्पतालों पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए। साथ ही, दवाओं, स्टेंट्स और मेडिकल उपकरणों की अधिकतम खुदरा कीमत तय करने की आवश्यकता है। अस्पतालों को बिलिंग में पूरी जानकारी देनी चाहिए ताकि मरीजों को धोखा न दिया जा सके। इसके अलावा, जन जागरूकता बढ़ाकर मरीजों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद, भारत का स्वास्थ्य तंत्र अभी भी लालच, भ्रष्टाचार और अराजकता से जूझ रहा है। जब तक सरकार और नागरिक मिलकर इस व्यवस्था को चुनौती नहीं देंगे, तब तक “सबका साथ, सबका विकास” का सपना अधूरा रहेगा।

पीयूष गोयल की स्टार्ट-अप संस्कृति: एक खोखला हाइप?

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मुंबई। भारत की व्यावसायिक परंपरा कोई आधुनिक आविष्कार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक जीवंत सभ्यता और सुस्थापित परंपरा है। यह स्थिरता, अडिग सामाजिक जिम्मेदारी और उच्च नैतिक मूल्यों की मजबूत नींव पर टिकी है। हमारे देश में व्यापार को कभी भी केवल लाभ कमाने का संकीर्ण साधन नहीं माना गया, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक प्रतिबद्धता के रूप में देखा गया। महात्मा गांधी का कालजयी ट्रस्टीशिप सिद्धांत इसी गहन विचारधारा को दर्शाता है, जहाँ दूरदर्शी व्यवसायी स्वयं को समाज के संसाधनों का ट्रस्टी मानते थे और अपने धन का उपयोग जनहित व सामाजिक कल्याण के लिए प्राथमिकता देते थे। यह सिद्धांत व्यवसाय को केवल आर्थिक गतिविधि तक सीमित नहीं रखता था, बल्कि इसे नैतिक व सामाजिक कर्तव्य के उच्च पायदान पर स्थापित करता था।

इसके बिल्कुल विपरीत, आज की तथाकथित चमकदार स्टार्ट-अप संस्कृति इस शाश्वत सिद्धांत की विपरीत दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। यह संस्कृति त्वरित व अवास्तविक मुनाफे, अनैतिक शॉर्टकट्स और बिना किसी दूरदर्शी दीर्घकालिक रणनीति के व्यापार को बढ़ावा दे रही है, जो न केवल भारत के सतत व समावेशी औद्योगिक विकास के लिए एक गंभीर खतरा है, बल्कि हमारी सदियों पुरानी व्यावसायिक नैतिकता व मूल्यों को भी कमजोर कर रही है।
अतीत के स्वर्णिम दौर में भारतीय व्यापारी अपनी कठिनाई से जुटाई गई बचत, अटूट सामाजिक विश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक प्रतिष्ठा की मजबूत नींव पर धैर्यपूर्वक उद्योग स्थापित करते थे। वे रिस्क उठाने से कभी नहीं हिचकिचाते थे, लेकिन उनका एकमात्र लक्ष्य क्षणिक मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि एक मजबूत, स्थायी व दीर्घकालिक व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा करना होता था, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समृद्धि ला सके। टाटा, बिड़ला, बजाज, गोदरेज जैसे दूरदर्शी उद्योगपतियों ने दशकों की अथक मेहनत, ईमानदारी और समर्पण से अपने विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़े किए, जिन्होंने न केवल लाखों लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान किए, बल्कि देश की आर्थिक संरचना को अभूतपूर्व मजबूती भी दी। इन व्यावसायिक घरानों ने सामाजिक कल्याण और राष्ट्र निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे व्यवसाय और समाज के बीच एक अटूट व पारस्परिक लाभकारी संबंध स्थापित हुआ।

वहीं आज की स्टार्ट-अप संस्कृति पश्चिमी फास्ट फूड बिजनेस मॉडल की एक त्रुटिपूर्ण नकल प्रतीत होती है। यहाँ अधिकांश तथाकथित उद्यमी वास्तविक उत्पादन या गुणवत्तापूर्ण सेवा के बजाय आकर्षक विज्ञापन, निवेशकों से प्राप्त भारी धनराशि और शेयर बाजार में कृत्रिम उछाल व हेराफेरी पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। अधिकांश स्टार्ट-अप्स का प्राथमिक लक्ष्य एक एग्जिट स्ट्रैटेजी होता है—यानी किसी तरह कंपनी को बेचकर रातों-रात भारी मुनाफा कमाना, न कि एक स्थायी व मूल्यवान उद्योग का निर्माण करना, जो दीर्घकाल में देश की अर्थव्यवस्था और समाज के लिए लाभकारी हो। यह सतही मॉडल चीन या अमेरिका जैसे देशों की नकल पर आधारित है, लेकिन भारत की अनूठी आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना इसके लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में स्टार्ट-अप संस्कृति की दिशा और प्राथमिकताओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका स्पष्ट मानना है कि डिलीवरी बॉयज के विशाल नेटवर्क को बढ़ावा देने वाले स्टार्ट-अप्स वास्तविक व स्थायी औद्योगिक विकास में कोई सार्थक योगदान नहीं दे रहे। ये कंपनियाँ अक्सर केवल बिचौलिए का काम करती हैं—न तो ये स्वयं कुछ उत्पादन करती हैं और न ही स्थायी व स्थिर रोजगार के अवसर पैदा करती हैं। स्विगी, ज़ोमेटो, ओला जैसे प्लेटफॉर्म्स ने शहरी बाजारों पर तेजी से कब्जा तो कर लिया है, लेकिन इन्होंने असंगठित क्षेत्र के छोटे दुकानदारों व पारंपरिक व्यवसायों को भारी नुकसान पहुँचाया है, जिससे लाखों लोगों की आजीविका संकट में पड़ गई है। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के 2024 के एक सर्वे के अनुसार, इन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स के उदय के कारण पिछले पाँच वर्षों में 30% से अधिक छोटे व मध्यम स्तर के रेस्तरां बंद हो चुके हैं या गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं।

इसके अलावा, इनका तथाकथित गिग इकॉनमी मॉडल श्रमिकों के हितों के सीधे विरुद्ध है। डिलीवरी एजेंट्स और कैब ड्राइवर्स जैसे कर्मचारियों को न तो नौकरी की सुरक्षा मिलती है और न ही स्वास्थ्य बीमा या पेंशन जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा का कोई प्रावधान। यह व्यवस्था एक नए प्रकार के शोषण को बढ़ावा देती है, जहाँ श्रमिकों को कम मजदूरी में अनिश्चित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि पारंपरिक उद्योगों में कर्मचारियों को स्थायी रोजगार और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिलता था। नीति आयोग की 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गिग वर्कर्स की औसत मासिक आय संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों से 35% कम है, और केवल 12% को किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है।

आजकल शार्क टैंक जैसे टीवी शोज़ के माध्यम से स्टार्ट-अप्स की दुनिया को अत्यधिक ग्लैमरस और आकर्षक बनाकर पेश किया जा रहा है। यहाँ युवा उद्यमी निवेशकों के सामने अपने कथित अभिनव विचार पेश करते हैं और रातों-रात करोड़पति बनने का सपना देखते हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में असली व्यापार है? अधिकांश मामलों में, ये विचार या तो पश्चिमी सफल मॉडल्स की सस्ती नकल होते हैं या बिना किसी गहन बाजार शोध और व्यावहारिक मूल्यांकन के जल्दबाजी में शुरू कर दिए जाते हैं।

इस प्रकार, प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक ये सतही और चमकदार संस्कृति युवाओं को “जल्दी अमीर बनो” का एक खतरनाक भ्रम देती है, जबकि वास्तविक व स्थायी व्यापार में वर्षों का धैर्य, अडिग अनुशासन, सावधानीपूर्वक योजना और दीर्घकालिक दृष्टिकोण आवश्यक होता है। पारिवारिक व्यवसाय, जो पीढ़ियों की मेहनत और ज्ञान के हस्तांतरण से धीरे-धीरे विकसित होते हैं, सफलता की एक मजबूत नींव प्रदान करते हैं, जबकि स्टार्ट-अप संस्कृति अक्सर “फेल फास्ट, लर्न फास्टर” (जल्दी असफल होकर तेजी से सीखो) का एक गलत व गैर-जिम्मेदाराना नारा बढ़ावा देती है।”

कुछ लोग भारत की स्टार्ट-अप संस्कृति की तुलना चीन से करते हैं, लेकिन यह बिल्कुल गलत है। चीन ने अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करके वैश्विक बाजार पर कब्जा किया है। वहाँ के स्टार्ट-अप्स ने प्रौद्योगिकी और उत्पादन पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि भारत में अधिकांश स्टार्ट-अप्स एग्रीगेटर मॉडल पर चल रहे हैं। भारत के कुछ स्टार्ट-अप्स फ्रॉड टेक्नोलॉजी (जैसे बायोमेट्रिक हैकिंग, संवेदनशील डेटा चोरी) में लिप्त पाए गए हैं। पेटीएम, बायजू, OLX जैसी कुछ बड़ी कंपनियों पर हाल के वर्षों में वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों के गंभीर आरोप लग चुके हैं।

क्या यही हमारे देश का “नया व्यावसायिक नैतिकता” है? क्या यही दिशा है जिसमें हम आगे बढ़ना चाहते हैं? भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की 2024 की एक रिपोर्ट में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और फिनटेक कंपनियों से जुड़े मामलों सहित वित्तीय धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर चिंता व्यक्त की गई है।

सरकार को अब इस चमक-दमक के पीछे की सच्चाई को पहचानना चाहिए और वास्तविक आर्थिक विकास के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। हमें लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को प्रोत्साहित करने की सख्त आवश्यकता है, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और लाखों लोगों को वास्तविक रोजगार प्रदान करते हैं, न कि वेंचर कैपिटल फंडेड स्टार्ट-अप्स को। हमें मेक इन इंडिया पहल को उसके वास्तविक अर्थों में लागू करना होगा, जहाँ देश में वास्तविक उत्पादन बढ़े, न कि केवल ऐप-आधारित सेवाओं का विस्तार।

पारिवारिक व्यवसायों को आधुनिक तकनीक अपनाने और विस्तार करने में मदद के लिए विशेष प्रोत्साहन व कर छूट प्रदान की जानी चाहिए। सरकार को उन स्टार्ट-अप्स को सक्रिय रूप से समर्थन देना चाहिए जो विनिर्माण, कृषि और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी विकास जैसे मूलभूत क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। डिलीवरी और कैब ड्राइवर्स जैसे गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा और निष्पक्ष कार्य परिस्थितियों का लाभ मिलना चाहिए। विदेशी मॉडल्स की नकल करके बाजार में आने वाली स्टार्ट-अप कंपनियों को सरकारी फंडिंग और अन्य लाभों से वंचित किया जाना चाहिए।

स्टार्ट-अप संस्कृति का ग्लैमर आकर्षक लग सकता है, लेकिन यह भारत की पारंपरिक व्यावसायिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। हमें स्थायी उद्योग चाहिए, जो दीर्घकालिक रोजगार और समृद्धि प्रदान करें, न कि केवल अल्पकालिक व खोखले फ्लैश इन द पैन स्टार्ट-अप्स।

इतना पैसा अंग्रेजों के राज में एक भारतीय वकील को कैसे मिल रहा था

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दिल्ली। Liasoner शब्द पर आपत्ति हो सकती है लेकिन जितने पैसे बतौर पेशेवर मोतीजी को मिल रहे थे, उससे कम पैसे में अंग्रेज वकील उपलब्ध हो सकते थे। कोई तो बात थी कि मोतीलालजी पर अधिक विश्वास किया गया। उनकी जीवनशैली एक अंग्रेज जैसी ही थी। बस उनकी चमड़ी का रंग भारतीय था लेकिन उनकी जीवनशैली,भाषा, विचारधारा सब अंग्रेजी हो चुकी थी। विषय अध्ययन और शोध का है इसलिए इस टिप्पणी को किसी निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन सवाल तो उठता है।

मोतीलाल ने अपने जीवन में अंग्रेजी जीवनशैली को अपनाया और उनकी शानोशौकत-जैसे आनंद भवन में बिजली, टेलीफोन, और यूरोपीय ढंग का रहन-सहन-उस समय के औसत भारतीय से बिल्कुल अलग थी। उनकी वकालत की सफलता और धन-संपत्ति ने उन्हें उस दौर के भारतीय समाज में एक अभिजात्य वर्ग (elite) का हिस्सा बना दिया था।

यह भी सच है कि उस समय भारत में गरीबी, अकाल और भुखमरी व्यापक थी – खासकर 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजी शासन के दौरान हुए कई अकालों (जैसे 1896-97 और 1899-1900 के अकाल) में लाखों लोग मारे गए थे। इस पृष्ठभूमि में मोतीलाल का ऐश्वर्यपूर्ण जीवन निश्चित रूप से विरोधाभासी दिखता है।

उनकी इस जीवनशैली ने उन्हें आम जनता से दूर रखा, और यह आलोचना स्वाभाविक है कि जब देश भुखमरी और गुलामी से जूझ रहा था, तब वे और उनके जैसे लोग ऐशोआराम में थे।

उनके क्लाइंट्स में उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों के बड़े जमींदार और रियासतों के प्रतिनिधि प्रमुख थे। जितना पैसा वकालत के लिए उस दौर में वे ले रहे थे, यह जानना किसी के लिए भी हैरान करने वाला हो सकता है। क्या इतना पैसा वे दलील के लिए ले रहे थे या अंग्रेज जजों और जमींदारों के बीच वे एक कड़ी का काम कर रहे थे। अपने व्यवहार से उन्होंने अंग्रेज अफसरों से लेकर जज तक का दिल जीत कर रखा था। इसीलिए उनका बेटा जब भी जेल गया, उसकी सुख सुविधा में अंग्रेजों ने कभी कोई कमी नहीं रखी। उन्होंने जो भी चाहा, उन्हें जेल में मिला। जेल भी कई बार उनकी पसंद से ही दी जाती थी। जो अंग्रेजों के सामने कथित माफीवीर थे, उन्हें तो कालापानी मिल रहा था। जो कथित तौर पर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे, उन्हें अंग्रेज समोसा और चाय पेश कर रहे थे। उनसे जेल में मिलने के लिए आने जाने वालों पर भी कोई विशेष पाबंदी नहीं थी।

मोतीलाल एक केस के लिए कितना पैसा लेते थे? इस संबंध में यह दर्ज है कि 1894 में उन्होंने इटावा जिले के लखना राज का एक केस लड़ा, जिसके लिए उन्हें 1 लाख 52 हजार रुपये की फीस मिली थी। यह उस समय की बहुत बड़ी रकम थी, जब सोने का भाव लगभग 45 रुपये प्रति तोला और एक कलेक्टर की मासिक तनख्वाह करीब 100 रुपये हुआ करती थी।

मोतीलाल की फीस के बारे में ठोस जानकारी अलग-अलग स्रोतों में भिन्न-भिन्न मिलती है, लेकिन यह माना जाता है कि उनकी रोजाना की फीस 2500 रुपये से अधिक हो सकती थी, खासकर उनके करियर के शीर्ष पर। कुछ जगह यह भी कहा जाता है कि वे प्रति सुनवाई (per appearance) के लिए हजारों रुपये वसूलते थे। उस समय यह राशि इतनी बड़ी थी कि उनकी शानोशौकत और यूरोपीय जीवनशैली—का मुकाबला करने वाले भारतीय उंगलियों पर गिने जा सकते थे।

मोतीलाल की अंग्रेजी सरकार से नजदीकी और उनके बेटे को मिल रही विशेष सुविधाएं, क्या इसलिए थी क्योंकि मोतीलाल और उनका परिवार अंग्रेजी सरकार के लिए ‘उपयोगी’ थे। इस दिशा में अध्ययन अभी शेष है।
एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (ए. ओ. ह्यूम) ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की। नौ सालों तक उन्होंने कांग्रेस के उदारवादी स्वरूप को बनाकर रखा। 1894 में उनके जाने के बाद धीरे धीरे कांग्रेस का उदारवादी स्वरूप खतरे में आने लगा था। गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव में कांग्रेस का रुझान अधिक आंदोलकारी धारा की तरफ था। ऐसे समय में मोतीलाल नेहरू कांग्रेस के उदारवादी स्वरूप को बचाने के लिए पार्टी में सक्रिय होते हैं।

कांग्रेस ने अपने पिट्ठुओं से इतिहास लिखवाया है। एक कथित इतिहासकार बिना शर्मिन्दा हुए खुद को नेहरूवादी बताते हैं। जब इतिहासकार मोती और जवाहर के प्रभाव में होगा फिर वह इतिहास लिखेगा या नेहरू परिवार का जयगान! यह समझना कोई रॉकेट साईंस है क्या?
इतिहास को लेकर बहुत सारा पढ़ने और झूठ को हटाकर सच को स्थापित करने की जरूरत है। हमारा इतिहासकार जिनका महिमागान कर रहा है, वह डिजर्व भी करते हैं इसे। यह सवाल अब भी देश के सामने है!

कुमार गंधर्व : शून्य शिखर पर अनहद बाजै

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हेमंत शर्मा

गायकी के गन्धर्व और संगीत के कबीर, कुमार गन्धर्व होते तो आज एक सौ एक साल पूरे करते. काल जब प्रतिभा को पूरी निर्ममता और क्रूरता के साथ मसलने की कोशिश करता है तो उस यातना से जन्‍मने वाली कला कालजयी होती है. इसलिए कुमार गन्धर्व कालजयी हैं. रेशम की तरह गुँथी उनकी आवाज़ नैसर्गिक थी. उनके लिए तानपुरा यंत्र नहीं जीवन था. कुमार जी संगीत की सभी स्थापनाओं और परिभाषाओं को पार कर गए थे. कुमार गन्धर्व मौन, संगति असंगत‍ि, प्रकृति, विचार, मनोभाव और रहस्‍य को गाते थे. वह चेतना के स्‍वर से हमारा संवाद थे. कुमार गन्धर्व अनहद नाद से हमारा पहला परिचय थे.

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को जैसे साहित्यिक विमर्श के केन्द्र में स्थापित किया. वैसे ही कुमार गन्धर्व ने कबीर को शास्रीय संगीत के केन्द्र में स्थापित किया. पण्डित कुमार गन्धर्व का संगीत विद्रोह का संगीत है. उनका गायन कालातीत, सर्वकालिक है. बिल्कुल ताज़ा हवा की तरह. कुमार गन्धर्व को सुनने वाले जानते हैं कि वह शून्‍य से स्‍वर उठा लाते थे और फिर सुनने वालों को अपने संगीत लोक में ले जाते थे. यह सब इतना अनायास होता था कि … अवधूता गगन घटा घहरानी…….. उठते ही ताल, स्‍वर, नाद कानों से उतर कर चेतना के तंत्र हिला देता था. उन्‍हें सुनने वाले हर व्‍यक्‍ति ने यह तो कहा होगा कि कबीर अधूरे रह जाते यदि उन्‍हें कुमार जी न म‍िलते. लिंडा हेस ने अपनी किताब “सिंगिंग इम्‍पटीनेस: कुमार गन्धर्व परफ़ॉर्मस पोयट्री ऑफ़ कबीर” में लिखा भी है कि कबीर जिस रिक्‍तता के दर्शन को सुना गए, कुमार गन्धर्व ने उसे सुरों में साध कर अमर कर दिया.

वे नाद के ज़रिए अनहद खोजते थे. देवास के जिस माता की टेकरी पर कुमार जी रहते थे, उसका शिखर उनके न रहने से भले शून्य हो. पर उस शिखर पर उनके स्वर की ध्वजा आज भी फहरा रही है. जिस पर कुमार गन्धर्व का नाम लिखा है. कुमार जी का गायन उनका अपना था. उन्होंने किसी से सीखा नहीं था. ख़ुद गढ़ा था. इसलिए अपने ज़माने में वह सबसे अलग था. सूर, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों से कबीर की तुलना करते हुए कुमार जी कहा करते थे कि बाक़ी के सब परम्परा की कुलीगिरी करते हैं. यानी परम्परा को ढोते हैं. एक कबीर ही हैं जिन्हें दैन्य छू तक नहीं गया है. कबीर को गाते-गाते वे सामान्य जन को भी अपनी तानों के इहलोक से रहस्य लोक में पहुँचा देते. उन्होंने कबीर को गाया ही नहीं जिया भी. इसलिए वे परम्परा, सत्ता, व्यवस्था – सबको ठेंगे पर रखते थे.

जैसे बरसात से गीली ज़मीन में कभी-कभी समय से पहले अँखुआ फूटता है. वैसे ही सिर्फ़ छ साल की उम्र में सिद्धारमैया कोमकाली के गले से स्वर फूटे थे. और ग्यारह बरस की उम्र होते-होते सिद्धारमैया संगीत की अलौकिक साधना से कुमार गन्धर्व बन गए. यानी जिस उम्र में बच्चे तुतलाते हैं. उस उम्र में कुमार गन्धर्व गाने लगे थे. इसी विलक्षणता से कुमार गन्धर्व ने संगीत को और संगीत ने कुमार जी को पूरी तरह आत्मसात कर लिया. कुमार जी रागदारी की शुद्धता में कल्पनाशीलता का मोहक समावेश करते हैं. अपने प्रयोग से शास्त्रीयता में लोक और समकाल की छवि उकेरने वाले कुशल चितेरे बनते हैं. संगीत में चली आ रही धारा से अलग लीक बनाते हैं. निर्गुण को नयी प्रतिष्ठा देने वाले वे अद्भुत शिल्पी हैं. कुमार जी के लिए संगीत और संगीत के लिए कुमार जी कभी किसी दायरे में नहीं बंधे.

दो साल पहले जब कुमार जी की पुत्री कलापिनी कोमकली और पौत्र भुवनेश कोमकली कुमार जी की शताब्दी वर्ष की योजना लेकर आए. तो मैंने कहा कि यह शताब्दी वर्ष किसी एक जगह नहीं पूरे देश में मनाया जाना चाहिए. कुमार जी की जन्मस्थली, कर्मस्थली और देश में संगीत के सभी बड़े केन्द्रों पर उनकी याद में समारोह हो. क्योंकि कुमार जी देश-काल की सीमा से परे हैं. फिर योजना भी ऐसी ही बनी कि मुम्बई से शताब्दी समारोह का आग़ाज़ हुआ जो पुणे, उज्जैन, भोपाल, बंगलुरु, दिल्ली और बनारस तक होता देवास में सम्पन्न हुआ.

एक सौ एक साल पहले कर्नाटक के बेलगाम में सुलभावी गाँव के शिव मन्दिर के पास गायकों के परिवार में शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली का जन्म हुआ. जन्म के वक्त ही पास के मठ के स्वामी ने इस विलक्षण बालक को पहचाना और उसका नाम कुमार गन्धर्व दिया. बचपन से ही वह किसी भी तरह के संगीत को पूरी तरह याद और उसकी नक़ल कर सकते थे. 10 साल की उम्र में वह बी.आर. देवधर से मुम्बई (तब बम्बई) में संगीत की शिक्षा लेने लगे. जिन्होंने बम्बई के ओपेरा हाउस में म्यूज़िक स्कूल खोला था.

यह 1935 की बात है. उस साल बम्बई के जिन्ना हॉल में आयोजित संगीत परिषद के कार्यक्रम में कुमार गन्धर्व को भी बुलाया गया. सारा हॉल खचाखच भरा था. कहीं खड़े रहने की जगह नहीं थी. रसिकों की भारी भीड़ थी. ऐसी स्थिति में उम्र से बारह किन्तु दिखने में नौ वर्ष का बाल कुमार स्टेज पर आ बैठा और उसने सभा पर अपनी आवाज़ का ऐसा सम्मोहन अस्त्र चलाया कि सभा उसकी पकड़ में आ गई. हॉल में उनके स्वर के प्रत्येक हरक़त पर दाद दी जा रही थी. हर चेहरे पर विस्मय का भाव था. उपस्थित रसिक एवम् कलाकारों में इस लड़के की सराहना करने की होड़ मची. पुरस्कारों की झड़ी लग गई. उसकी प्रसिद्धि का ये आलम था कि उस नन्हे गायक का एक कार्टून दूसरे रोज़ 1 मार्च, 1936 को अख़बार में प्रमुखता से छपा.

बम्बई के 1936 के कार्यक्रम से पहले बालक कुमार इंदौर, इलाहाबाद, कलकत्ता, कानपुर और दिल्ली में कार्यक्रम कर चुके थे. अगले ही साल 1937 में एक फ़िल्म ‘नव-जवान’ में भी कुमार गन्धर्व की गायकी पर फ़िल्मांकन किया गया. बालक कुमार संगीत मंच पर अपनी अलग पहचान बना ही रहे थे कि उन्हें तपेदिक (ट्यूबरकुलोसिस) हो गया. यह साल 1947 के आख़िर की बात है. गवैये के फेफड़ों को बीमारी लग गयी. अब क्या होगा? उस वक्त टीबी साध्य रोग नहीं था. सिध्दारमैया कोमकली की गायकी पर रोक लग गयी. हिन्दुस्तानी संगीत के इस उदीयमान कलाकार को टीवी का ग्रहण लग गया. डॉक्‍टरों ने कहा कि अब वह कभी गा नहीं सकेंगे. उन्‍हें थोड़ी गर्म और सूखी जगह जाकर रहने को कहा गया क्‍योंकि बम्बई की नमी से टीबी के बढ़ने का ख़तरा था. यह भारत की आज़ादी का साल था जब कुमार जी के संगीत को रोग की नज़र लग गई. स्वर घुट गया. फेफड़े फूलने लगे. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए जो रिकॉर्डिंग की, उसे लम्बे समय तक उनकी आख़िरी रिकॉर्डिंग माना जाता रहा.

रोग से लड़ने के लिए कुमार जी को आबोहवा बदलनी पड़ी. उन्होंने प्रकृति के क़रीब देवास के माता की टेकरी पर अपना ठिकाना बनाया. यहाँ गायन तो सम्भव नहीं था, पर संगीत के लिए जिस मनन-चिन्तन की अपेक्षा होती है. उसके लिए कुमार जी के पास देवास में ख़ूब समय था. टीबी ने उनके फेफड़ों के फैलाने और फुलाने की ताक़त को सिकोड़ दिया. गायकी के लिए यह लाचारी थी. पर कुमार जी ने इस लाचारी को अपनी ताक़त बनाया. वे गायकी में छोटी तान ही ले पाते. यही उनकी विशिष्टता बनी. तपेदिक से ख़राब हुए फेफड़ों ने कुमार जी के संगीत को अलबेला स्‍वर दिया. बीमारी के छह साल के बाद जब उन्‍होंने दोबारा गाना शुरू किया तो वह और दिव्‍य हो गया. संगीत के समीक्षक मानते हैं कुमार जी के उस लम्बे गानहीन मौन ने उन्हें जो स्‍वर की गमक और नाद की मूर्धन्‍यता दी, वह देवधर स्‍कूल वाले शिक्षक से नितान्त अलग थी. अब कुमार गन्धर्व संगीत के गायक नहीं दार्शनिक हो गए थे. और उनका गायन समय की सीमा को पार कर चेतना से संवाद करने करने लगा था.

मालवा ने कुमार गन्धर्व को नया जीवन दिया. नई साँस दी. बिल्कुल अनल पाखी (फ़ीनिक्स) का तरह. कुमार गन्धर्व के स्वर राख से फिर जिन्दा हो गए. उन्होंने मालवा को उसके ही शब्दों और सुरों में पिरोकर कई अमर गीत दिए. कुमार मालवा के और मालवा कुमार का हो गया. 1952 में स्वस्थ होकर वह फिर से गाने लायक हुए. कुमार गन्धर्व की संगीत-यात्रा की इस दूसरी पारी में और भी गुरुत्व आ गया. कुमार गन्धर्व ने उन्हीं बंदिशों को सुर में बांधा, जो श्रोता आसानी से सुने और समझे.

देवास ने कुमार जी को गढ़ा. उस यंत्रणा ने जिसने उनका स्‍वर छीन लिया था वह स्‍वर की मौन साधना में बदल गई. कुमार जी अब लोक के स्‍वर सुन रहे थे. प्रकृति का हर स्‍वर साध रहे थे. मौन में संगीत सुन रहे थे, बुन रहे थे. देवास में ग्रामीण संगीत घुमक्कड़ संन्यासियों की तान और लोक गायकों के स्‍वर कुमार गन्धर्व को स्‍वस्‍थ कर रहे थे. संगीत अब उनकी शिक्षा ही नहीं, अंतर की ध्‍वनि बन गया था. लिंडा हेस जैसी उनकी संस्‍मरणकार लिखती हैं कि कुमार चिड़‍ियों के स्‍वर को टेप में रिक]र्ड करते थे. वे प्रकृति की अनसुनी ध्‍वन‍ियों और नाद को स्‍मृति में बिठाते थे. यहाँ से कुमार गन्धर्व निर्गुण के हो गए. कबीर में रम गए. उनकी पुत्री कलापिनी कोमकली कहती हैं कि देवास आकर कुमार गन्धर्व संगीतकार से चिन्तक और दार्शन‍िक में बदल गए. उन्‍होंने संगीत से उन रहस्‍यों को तलाशने की साधना प्रारम्भ कर दी जो कबीर अपने निर्गुण से करते थे. संगीत मर्मज्ञ वामनराव देशपांडे की कुमार जी पर एक किताब है- बिटवीन द टू तानपूरास, जिसमें वे कहते हैं कि ऐसा संभवत: इसलिए था कि देवधर स्‍कूल के शिक्षक के तौर पर कुमार जी किराना और आगरा घराने की रवायत सिखाते थे, लेक‍िन संगीत में उन्‍होंने सारी बंदिशें तोड़ दीं. लोक और शास्‍त्रीयता को पूरी शुद्धता के साथ गूँथकर उन्‍होंने संगीत की नई सृष्‍ट‍ि की थी.

मालवा के गाँव वालों और घुमक्कड़ संन्यासियों या सूफ़ी गायकों के गीत हमेशा उनकी ज़िन्दगी में पार्श्व संगीत की तरह नेपथ्य में बजते रहे. उन्होंने लोकसंगीत के तत्वों को राग में तब्दील किया, बिना उनकी शुद्धता से कोई समझौता किए. कुमार गन्धर्व नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ का जादू चलता रहेगा, टूटे दिल की पीर को ये जादू हरता रहेगा, आनन्द का सुख देता रहेगा. ये वो आवाज़ है जिसके सामने सरहदें बेमानी हैं. ये वो आवाज़ है जो हर बन्धन को तोड़कर वहाँ पहुँचती है जहाँ लोग सन्नाटे के शोर में लीन हो जाते हैं. हमें गर्व है कि जब हम रहे तो कुमार गन्धर्व गाते थे.

(सोशल मीडिया से साभार)

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