बिहार की ऐतिहासिक एवं प्रचंड जीत!

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पटना । यह भारत का मन है, वह मन, जिसमें कृतज्ञता जन्म से ही संस्कार बनकर बहती है। बिहार भारत से अलग कोई भूमि नहीं; यह उसी महान भारतवर्ष की तप्त मिट्टी है, जिसके पोर-पोर में आभार की सुगंध रची-बसी है। जिसने हमारे लिए कुछ किया—चाहे छोटा हो या बड़ा—भारत का मन उसे जीवन भर हृदय में संजोकर रखता है। स्वार्थ के इस दुष्काल में भी निःस्वार्थ सेवा का मर्म समझने वाले लोग कम नहीं, बहुत हैं।

इस वीडियो में दिख रही माताराम के शब्द सुनकर मन ठहर-सा जाता है। वे करुणा और कृतज्ञता के बीच झूलती हुई आवाज़ में कहती हैं— “अपनी ही गोद का जना, अपना बेटा, एक कौर तक नहीं पूछता। पर वो बेचारा… (मोदी) वह 30 किलो चावल देता है, अनाज देता है, 11–1100 रुपये देता है। मैं नमकहराम नहीं हूँ… वोट तो उसी को दूँगी। जिस बेटे को सींचकर बड़ा किया, वह पेट भरने को नहीं देता; पर वह, जो मेरा कुछ नहीं, वह इतना तो देता ही है। इसके अलावा और क्या चाहिए किसी बूढ़ी माँ को?”

वाह! यह दृश्य, यह स्वर, यह भाव – बार-बार देखने पर भी मन तृप्त नहीं होता। कृतज्ञता का ऐसा निर्मल, निष्कलुष रूप दुर्लभ है, अप्रतिम है। इस माताराम के कथन ने मन के किसी भीतरी कोने को छू लिया। मैं तो अब तक ‘मुफ़्त राशन’ योजना का घोर विरोधी रहा… पर इस एक माँ ने मुझे एक नए भावलोक तक पहुँचा दिया, एक नए सामाजिक यथार्थ से परिचित करा दिया! सामाजिक न्याय का मिथ्या नारा गढ़ने वाले क्या इस अंतर्मन की थाह ले पाएँगें? इस सामाजिक यथार्थ की टोह ले पाएँगें? ये एक नया वर्ग है, राजनीति की भाषा में “नई जाति” है। सचमुच के छूटे हुए लोगों की, वंचितों की, गाँव-देहात तक विस्तारित स्वजनों की कोई तो सुधि लेने वाला है। बात-बात में धमकी की भाषा बोलने वाले, विभाजन का विष बोने वाले ऐसे कृतज्ञ हृदय की गहराई कदाचित माप ही नहीं सकते। इसलिए बिहार ने उन्हें ठुकरा दिया, ठीक से ठुकरा दिया।

माता-पिता, वृद्ध-निराश्रित की सेवा से जो पुण्य उपजता है, वह अंततः आशीर्वाद बनकर लौटता ही है, चाहे व्यक्ति, समाज या शासन कोई भी क्यों न हो।

हमारा भारतवर्ष उदार है, विशालहृदय है; यहाँ लोग चाहे जैसे हों, पर कृतघ्न नहीं होते। वे नमक का हक अदा करना जानते हैं, और दिल से, पूरी निष्ठा के साथ अदा करते हैं। बिहार की इस ऐतिहासिक व प्रचंड जीत को सचमुच समझना है तो किसी चुनावी विश्लेषक की आँखों से नहीं, अपितु इस माताराम की आँखों से देखिए, तभी सही निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगें।

संघ समर्पित माधवराव मुले

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अक्षय

रत्नागिरी । नवम्बर, 1912 (कार्तिक कृष्ण 13, धनतेरस) को ग्राम ओझरखोल (जिला रत्नागिरी, महाराष्ट्र) में जन्मे माधवराव कोण्डोपन्त मुले प्राथमिक शिक्षा पूरी कर आगे पढ़ने के लिए 1923 में बड़ी बहन के पास नागपुर आ गये थे।

यहाँं उनका सम्पर्क संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार से हुआ। मैट्रिक के बाद इन्होंने डिग्री कालिज में प्रवेश लिया; पर क्रान्तिकारियों से प्रभावित होकर पढ़ाई छोड़ दी। इसी बीच पिताजी का देहान्त होने से घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी इन पर आ गयी। अतः इन्होंने टायर ट्यूब मरम्मत का काम सीखकर चिपलूण में यह कार्य किया; पर घाटा होने से उसे बन्द करना पड़ा।

इस बीच डा. हेडगेवार से परामर्श करने ये नागपुर आये। डा. जी इन्हें अपने साथ प्रवास पर ले गये। इस प्रवास के दौरान डा. जी के विचारों ने माधवराव के जीवन की दिशा बदल दी। चिपलूण आकर माधवराव ने दुकान किराये पर उठा दी और स्वयं पूरा समय संघ कार्य में लगाने लगे। 1937 में निजाम हैदराबाद के विरुद्ध हुए सत्याग्रह तथा 1938 में पुणे में सोना मारुति सत्याग्रह के दौरान वे जेल भी गये।

1939 में माधवराव प्रचारक बने। 1940 में उन्हें पंजाब भेजा गया। विभाजन की चर्चाओं के कारण वहाँ का वातावरण उन दिनों बहुत गरम था। ऐसे में हिन्दुओं में हिम्मत बनाये रखने तथा हर स्थिति की तैयारी रखने का कार्य उन्होंने किया। गाँव और नगरों में शाखाओं का जाल बिछ गया। माधवराव ने सरसंघचालक श्री गुरुजी का प्रवास सुदूर क्षेत्रों में कराया। इससे हिन्दुओं का मनोबल बढ़ा और वे हर स्थिति से निबटने की तैयारी करने लगे।

पाकिस्तानी षड्यन्त्रों की जानकारी लेने के लिए अनेक स्वयंसेवक मुस्लिम वेष में मस्जिदों और मुस्लिम लीग की बैठकों में जाने लगे। शस्त्र संग्रह एवं प्रशिक्षण का कार्य भी बहुत प्रभावी ढंग से हुआ। इससे विभाजन के बाद बड़ी संख्या में हिन्दू अपने प्राण बचाकर आ सके। आगे चलकर भारत में इनके पुनर्वास में भी माधवराव की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण रही।

देश के स्वतन्त्र होते ही पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। माधवराव के निर्देश पर स्वयंसेवकों ने भारतीय सैनिकों के कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य किया। जम्मू और श्रीनगर के हवाई अड्डों को स्वयंसेवकों ने ही दिन-रात एक कर ठीक किया। इसी से वहां बड़े वायुयानों द्वारा सेना उतर सकी। अन्यथा आज पूरा कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में होता।

1959 में उन्हें क्षेत्र प्रचारक, 1970 में सहसरकार्यवाह तथा 1973 में सरकार्यवाह बनाया गया। 1975 में इन्दिरा गान्धी ने देश में आपातकाल थोपकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया। सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस जेल चले गये। ऐसे में लोकतन्त्र की रक्षार्थ हुए सत्याग्रह का स॰चालन माधवराव ने ही किया। एक लाख स्वयंसेवक जेल गये। इनके परिवारों को कोई कष्ट न हो, इस बात पर माधवराव का जोर बहुत रहता था। 1977 के लोकसभा चुनाव में इन्दिरा गान्धी पराजित हुई। संघ से भी प्रतिबन्ध हट गया।

यद्यपि माधवराव कभी विदेश नहीं गये; पर उन्होंने विदेशस्थ स्वयंसेवकों से सम्पर्क का तन्त्र विकसित किया। आज विश्व के 200 से भी अधिक देशों में संघ कार्य चल रहा है। इस भागदौड़ से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। 1978 में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने रज्जू भैया को सरकार्यवाह चुना। मुम्बई में माधवराव की चिकित्सा प्रारम्भ हुई; पर हालत में सुधार नहीं हुआ। 30 सितम्बर 1978 को अस्पताल में ही उनका देहान्त हो गया।

हिन्दी में विज्ञान लेखक प्रो. महेश चरण सिन्हा

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अक्षय

लखनऊ । हिन्दी में सर्वप्रथम विज्ञान संबंधी लेख एवं पुस्तकें लिखने वाले प्रो. महेश चरण सिन्हा का जन्म छह नवम्बर, 1882 को लखनऊ (उ.प्र.) में हुआ था। लखनऊ के बाद उन्होंने प्रयाग से बी.ए. और कानून की शिक्षा पाई।

एक बार जापान के सिन्धी सेठ आसूमल द्वारा जापान में तकनीकी शिक्षा पाने वाले भारतीय छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति का समाचार छपा। लखनऊ के नगराध्यक्ष बाबू गंगाप्रसाद वर्मा एडवोकेट का पत्र तथा कुछ धन लेकर महेश जी बर्मा, मलाया, चीन आदि घूमते हुए जापान जा पहुंचे; पर वहां पहुंचने पर उस सेठ ने पढ़ाई की पूरी राशि देने से मना कर दिया।

तब तक महेश जी की जेब खाली हो चुकी थी। अतः कई दुकानों तथा उद्योगों में काम करते हुए उन्होंने टोकियो वि.वि. से टेक्नो केमिस्ट की डिग्री ली। अब आगे पढ़ने के लिए वे अमरीका जाना चाहते थे। उनसे प्रभावित होकर जापान के एक मंत्री ने अपने राजदूत को पत्र लिखा कि जब तक इनके आवास का उचित प्रबन्ध न हो, तब तक इन्हें राजदूतावास में रहने दिया जाए।

महेश जी जिस जहाज से अमरीका गये, उसका कप्तान सभी धर्मों के बारे में इनकी जानकारी से बहुत प्रभावित था। उसने वहां इनके कई व्याख्यान कराये। इससे इन्हें धन तथा प्रतिष्ठा दोनों ही प्राप्त हुईं। एम.एस-सी. करते समय उन्होंने कुछ व्यापारियों द्वारा कॉफी पाउडर में की जा रही मिलावट का सप्रमाण भंडाफोड़ किया। इससे ये प्रसिद्ध हो गये और बड़े-बड़े पत्रों में इनके लेख छपने लगे। इन्होंने भारत के हिन्दी व उर्दू पत्रों में भी कई लेख लिखे।

महेश जी की खूब पढ़ने तथा घूमने की इच्छा थी; पर इसके लिए पैसा चाहिए था। अतः बर्तन साफ करने से लेकर बाग में फल तोड़ने जैसे काम इन्होंने किये। अमरीका से ये इंग्लैंड चले गये। वहां स्वतंत्रता संबंधी इनके विचार पढ़ और सुनकर इनके पीछे जासूस लग गयेे। अतः फ्रांस, जर्मनी, इटली, मिस्र आदि की शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन करते हुए ये मुंबई आ गये। उन्होंने हर जगह वहां रह रहे भारतीयों से स्वाधीनता के लिए सक्रिय होने को कहा।

भारत आकर वे लोकमान्य तिलक और गरम दल वालों के साथ कांग्रेस में काम करने लगे। उच्च शिक्षा के कारण इन्हें कई अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव मिले; पर इन्होंने अंग्रेजों की नौकरी स्वीकार नहीं की। वे चाहते थे कि भारत में भी विदेशों जैसे अच्छे विद्यालय और स्वदेशी उद्योग हों, जिनमें युवक अपनी भाषा में तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

इसके लिए इन्होंने अनेक उद्योगपतियों से संपर्क किया; पर निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद वे गुरुकुल कांगड़ी में पढ़ाने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने अयोध्या में अपना एक उद्योग लगाया; पर वहां प्लेग फैलने से इनकी दो पुत्रियों की मृत्यु हो गयी। कर्मचारी भी भाग खड़े हुए और उद्योग बन्द हो गया।

अब लखनऊ आकर महेश जी ने हिन्दी में विज्ञान संबंधी पुस्तकें लिखनी प्रारम्भ कीं। उनकी सफलता से हिन्दी में विज्ञान लेखन की धारा चल पड़ी। इसके साथ ही उन्होंने अनेक सफल वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों तथा देशभक्तों की जीवनियां भी लिखीं। वे नौ वर्ष तक लगातार नगर पार्षद भी रहे।

महेश जी ने हिन्दी, अंग्रेजी तथा उर्दू के कई पत्रों का सम्पादन किया। वे लाला हरदयाल, वीर सावरकर, भाई परमानंद जैसे स्वाधीनता सेनानियों के पत्रों में नियमित लिखते थे। लखनऊ की अनेक सामाजिक संस्थाओं में सक्रिय रहते हुए 23 जून, 1940 को उनका देहांत हुआ।

उत्तराखंड हिमालय की गोद में छिपे सबसे सेंसेटिव इलाके

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डॉ. हरीश चन्द्र

देहरादून । चारधाम की धरती और प्रकृति का स्वर्ग देवभूमि उत्तराखंड अब प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र बनता जा रहा है. यहां पहाड़ियां लगातार दरक रही हैं. नदियां बेकाबू हो रही हैं और आसमान से बादल मौत बनकर बरस रहे हैं. उत्तरकाशी के धराली में बादल फटने से जो तबाही मची, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिमालय की गोद में बसे ये क्षेत्र अब सुरक्षित रह गए हैं? IIT रुड़की और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) जैसी संस्थाओं की रिसर्च बताती है कि उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं की फ्रीक्‍वेंसी लगातार बढ़ रही है. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि राज्य का एक बड़ा हिस्सा अब डिजास्‍टर प्रोन क्षेत्र में बदल चुका है. उत्तरकाशी की तो यहां जमीन लगातार दरक रही है. यहां भूस्खलन, बादल फटना जैसी घटनाएं दिख रही हैं. साल 2012, 2013, 2019 और 2024 और अब धराली में बादल फटना जैसी बड़ी घटनाएं यहां पर हुई हैं, जिनमें जानमाल का बड़ा नुकसान हुआ है. बड़ा खतरा यमुनोत्री और गंगोत्री के रूट पर है, जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. हालांकि उत्तरकाशी में अब तक ग्लेशियर झील विस्फोट की कोई घटना रिकॉर्ड नहीं हुई है, लेकिन उत्तरकाशी जैसे ऊंचाई वाले हिमालयी जिलों में GLOF का भौगोलिक खतरा हमेशा बना रहता है, क्योंकि यहां कई छोटे-बड़े ग्लेशियर मौजूद हैं, जिनके नीचे और आसपास अक्सर ग्लेशियल लेक (हिमनदीय झीलें) बन जाती हैं.

IIT रुड़की, वाडिया इंस्‍टीट्यूट और NDMA जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों में यह जरूर चेताया गया है कि उत्तरकाशी समेत उत्तराखंड के कई ऊंचाई वाले क्षेत्र GLOF के लिए संभावित हॉटस्पॉट हैं. यहां हर साल 10 से अधिक ऐसे इलाके चिन्हित किए जाते हैं जहां जमीन अस्थिर होती जा रही है. बादल फटने जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं. चमोली का, जहां लगातार पहाड़ धंस रहे हैं. उदाहरण जोशीमठ के रूप में सबके सामने है, जहां घर धंस रहे हैं. ये जगह भी फ्लैश फ्लड और भूस्खलन के लिहाज से बेहद सेंसेटिव है. फरवरी 2021 में रैणी गांव में ग्लेशियर टूटने से NTPC परियोजना को भारी नुकसान हुआ. 7 फरवरी 2021 को रैणी गांव में एक ग्लेशियर टूटने से यहां भीषण तबाही हुई थी. इस बड़ी आपदा में 200 से ज्‍यादा लोग मारे गए और कई तो लापता हुए. यहां सबसे बड़ी चिंता जोशीमठ भू-धंसाव है, जिसको लेकर सरकार भी चिंतित है. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और धारचूला क्षेत्र की बात करें तो यह राज्य के सबसे संवेदनशील और आपदा प्रवण यानि आपाद के लिहाज से सेंसेटिव इलाकों में गिना जाता है. यह सीमांत जगहें भले ही अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सामरिक महत्व के लिए जाने जाते हों, लेकिन हर मानसून सीजन में यहां की जिंदगी मौत के साये में आ जाती है. यहां खतरा तीन तरफ से होता है. भूस्खलन, बादल फटना और सड़क कटाव.

पिथौरागढ़ जिले में खासकर धारचूला तहसील और उसके आसपास के गांवों में हर साल भूस्खलन, बादल फटना और नदी द्वारा सड़क या गांवों के कटाव जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं. इन आपदाओं का सबसे बड़ा कारण है यहां की नाजुक भौगोलिक बनावट और बढ़ते इंसानी हस्तक्षेप. अगस्त 2023 में धारचूला क्षेत्र में बादल फटने की घटना हुई थी, जिसमें कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई थी. इस घटना में दर्जनों मकान और सड़कें बह गई थीं और पूरे इलाके में कनेक्टिविटी ठप हो गई थी. यह घटना साफ बताती है कि पहाड़ों में मौसम की जरा सी करवट कितनी जानलेवा साबित हो सकती है. दरअसल, धारचूला और पिथौरागढ़ भारत-नेपाल और चीन की सीमा से सटे हुए क्षेत्र हैं. यहां बुनियादी ढांचे की स्थिति बेहद कमजोर है. अच्‍छा, यह इलाका न केवल भौगोलिक दृष्टि से अस्थिर है, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है. धारचूला से लिपुलेख पास होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा जाती है और यहां सेना की गतिविधियां भी बनी रहती हैं. ऐसे में किसी भी आपदा का असर सामरिक गतिविध‍ियों पर भी पड़ सकता है. उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले का नाम लेते ही श्रद्धा और विनाश दोनों बातें साथ उभरती हैं. यहां एक ओर केदारनाथ धाम जैसी दिव्य आस्था का केंद्र है तो दूसरी ओर 2013 की भीषण त्रासदी की कड़वी यादें भी. मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों के संगम पर बसा यह जिला उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील आपदा क्षेत्रों में से एक है. रुद्रप्रयाग का भौगोलिक स्थान इसे विशेष रूप से संवेदनशील बनाता है.

यहां दोनों नदियों का जलस्तर बारिश के दौरान अचानक बढ़ जाता है. बरसात के दिनों में नदी अपना रुख बदल लेती है, जिससे तटवर्ती इलाके बर्बाद हो जाते हैं. भूस्खलन और चट्टानों का खिसकना भी यहां सबसे बड़ी चुनौती होती है. पहाड़ों की ढलानों पर बसे गांव और सड़कें हर साल लैंडस्लाइड की चपेट में आ जाते हैं. यहां सबसे भयानक अनुभव 2013 में सामने आया, जब केदारनाथ में अचानक आई बाढ़ और लैंडस्लाइड ने हजारों लोगों की जान ले ली. मंदाकिनी नदी का रौद्र रूप ऐसा था कि पूरा केदार घाटी मलबे में तब्दील हो गई थी. IIT रुड़की, IMD और NDMA की रिपोर्टों में मंदाकिनी-अलकनंदा संगम क्षेत्र को अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है. इसका सीधा मतलब है कि यहां प्राकृतिक आपदाओं की संभावना अत्यधिक है और थोड़ी सी बारिश या हल्का भूकंप भी बड़ी तबाही ला सकता है. यहां हर साल लाखों श्रद्धालु यात्रा पर आते हैं. टिहरी और पौड़ी गढ़वाल जिले, कभी स्थिर और मजबूत माने जाने वाले ये पहाड़ी इलाके अब भूस्खलन, जमीन दरकने और दरारों के लिए जाने जाते हैं. खासतौर पर टिहरी झील के आसपास के गांवों में हर मानसून के साथ डर में रहते हैं. इन दोनों जिलों में बीते दो दशकों में तेज गति से सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण और जल विद्युत परियोजनाएं शुरू हुईं. विशेषज्ञों के अनुसार, ये पहाड़ों की भू-संरचना को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं. टिहरी झील के किनारे बसे डोबरा, प्रतापनगर, गजा, घनसाली जैसे गांव हर साल बारिश में खतरे की जद में आ जाते हैं. कई गांवों में पुराने भूस्खलन जोन अब दोबारा एक्टिव हो रहे हैं, जिससे नई दरारें पड़ने लगी हैं. पौड़ी के कोटद्वार, सतपुली, द्वारीखाल जैसे इलाकों में सड़कें बार-बार धंस रही हैं.

कई रिपोर्टों के मुताबिक, टिहरी और पौड़ी क्षेत्र में जमीन की बाइंडिंग क्षमता अब पहले जैसी नहीं रही. यहां मिट्टी की पकड़ कमजोर हो चुकी है. भूगर्भीय हलचलें अब यहां आम होती जा रही हैं. हिमालय की तलहटी में बसे कुमाऊं क्षेत्र खासकर नैनीताल को भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहते हैं, क्‍योंकि यहां की हरियाली, झीलें और शांत वातावरण देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाते हैं. लेकिन इस सुंदरता के नीचे छिपा है एक गहरा और चुपचाप बढ़ता संकट. यह हर साल भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने के रूप में बारिश के साथ बाहर आता है. नैनीताल शहर और आसपास का कुमाऊं क्षेत्र खासकर भीमताल, भवाली, रामगढ़ और मुक्तेश्वर अब हर मानसून सीजन में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाओं का गवाह बन रहा है. बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों से भारी मलबा और पत्थर शहर की ओर बहते हैं, जिससे न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, बल्कि जान का भी खतरा बना रहता है. यहां बड़े आपदा खतरे में नैनी झील का जलस्तर असंतुलित हो रहा है. बारिश के समय यह अत्यधिक भर जाती है और गर्मी में सूखने लगती है. जल निकासी के पुराने सिस्टम जाम हो चुके हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार, उत्तराखंड भूकंपीय जोन-5 में आता है, जो भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है. हिमालय की तलहटी में बसे कुमाऊं क्षेत्र खासकर नैनीताल को भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहते हैं, क्‍योंकि यहां की हरियाली, झीलें और शांत वातावरण देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाते हैं. लेकिन इस सुंदरता के नीचे छिपा है एक गहरा और चुपचाप बढ़ता संकट. यह हर साल भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने के रूप में बारिश के साथ बाहर आता है.

नैनीताल शहर और आसपास का कुमाऊं क्षेत्र खासकर भीमताल, भवाली, रामगढ़ और मुक्तेश्वर अब हर मानसून सीजन में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाओं का गवाह बन रहा है. बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों से भारी मलबा और पत्थर शहर की ओर बहते हैं, जिससे न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, बल्कि जान का भी खतरा बना रहता है. यहां बड़े आपदा खतरे में नैनी झील का जलस्तर असंतुलित हो रहा है. बारिश के समय यह अत्यधिक भर जाती है और गर्मी में सूखने लगती है. जल निकासी के पुराने सिस्टम जाम हो चुके हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार, उत्तराखंड भूकंपीय जोन-5 में आता है, जो भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है. हिमालय की तलहटी में बसे कुमाऊं क्षेत्र खासकर नैनीताल को भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहते हैं, क्‍योंकि यहां की हरियाली, झीलें और शांत वातावरण देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाते हैं. लेकिन इस सुंदरता के नीचे छिपा है एक गहरा और चुपचाप बढ़ता संकट. यह हर साल भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने के रूप में बारिश के साथ बाहर आता है.

नैनीताल शहर और आसपास का कुमाऊं क्षेत्र खासकर भीमताल, भवाली, रामगढ़ और मुक्तेश्वर अब हर मानसून सीजन में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाओं का गवाह बन रहा है. बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों से भारी मलबा और पत्थर शहर की ओर बहते हैं, जिससे न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, बल्कि जान का भी खतरा बना रहता है. यहां बड़े आपदा खतरे में नैनी झील का जलस्तर असंतुलित हो रहा है. बारिश के समय यह अत्यधिक भर जाती है और गर्मी में सूखने लगती है. जल निकासी के पुराने सिस्टम जाम हो चुके हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार, उत्तराखंड भूकंपीय जोन-5 में आता है, जो भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है.

(लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं)

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