महाशय राजपाल ने किया स्वाभिमान और आर्य संस्कृति की रक्षा के लिये जीवन समर्पित

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दासता के दिनों में भारतीय अस्मिता पर चौतरफा हमला हुआ है । आक्रांताओं ने केवल सत्ताओं को ही ध्वस्त नहीं किया अपितु भारतीय संस्कृति और साहित्य को भी विकृत करने का प्रयास किया है । एक ओर यदि भारतीय जन स्वाधीनता संघर्ष के लिये आगे आये तो दूसरी ओर भारतीय साहित्य और संस्कृति को सहेज कर संकलित करने वालों की भी एक लंबी श्रृंखला रही है । महाशय राजपाल ऐसे ही बलिदानी थे जिन्होंने आर्य साहित्य को सहेजकर प्रकाशन करने के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया ।

वे आर्य साहित्य के प्रमुख प्रकाशक थे। उन्होंने अपना जीवन आर्य साहित्य के संकलन, युवाओं में संस्कार और भय अथवा लालच से मतान्तरित व्यक्तियों की घर वापसी में लगाया था और यही उनकी हत्या का कारण बना ।

महाशय राजपाल का जन्म आषाढ़ कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत 1942 (2 जुलाई 1885) को अमृतसर में हुआ था।

उनके बचपन का नाम घसीटाराम था।उनके पिता लाला रामदास खत्री एक छोटे व्यवसायी थे । परिवार भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपराओं के प्रति समर्पित था । राजपाल जी बचपन से बहुत संवेदनशील और कुशाग्र बुद्धि थे । पढ़ाई में भी सदैव प्रथम आते । राजपाल जी जब छोटे ही थे, तब अचानक उनके पिता कहीं गायब हो गये । उनकी किसी ने हत्या की या वे स्वयं किसी कारण घर परिवार छोड़कर चले गये यह रहस्य सदैव बना रहा । पिता के चले जाने से परिवार गहन आर्थिक संकट में आ गया । माँ ने भी छोटे मोटे काम किये और राजपाल जी ने भी । इस प्रकार परिवार आगे बढ़ा । इसी संघर्ष में उन्होंने मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर काम की तलाश की । उनकी आवश्यकता वैद्य फकीर चंद जी यहाँ पूरी हुई । फकीरचंद जी अमृतसर में एक प्रसिद्ध वैद्य और आर्यसमाज के कार्यकर्ता थे । उनको एक सहायक की आवश्यकता थी।

और राजपाल जी को काम की खोज थी । अतएव दोनों की आवश्यकता पूरी हुई । राजपाल जी बारह रुपये मासिक पर उनके सहयोगी हो गये । और आर्यसमाज से भी जुड़ गए। अपने कार्य के प्रति समर्पण, जिज्ञासु स्वभाव के चलते उन्होंने न केवल वैद्य जी के हृदय में अपितु आसपास के क्षेत्र में भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था । राजपाल नाम इन्हीं वैद्य फकीरचंद जी ने दिया । वे अपने चिकित्सा व्यवसाय के साथ भारत राष्ट्र के मूल्यों और आर्य समाज के सिद्धांतों के प्रति जागरूकता का कार्य करते थे । एक ओर जहाँ युवकों में साँस्कृतिक जागरण का अभियान चलाये हुये थे वहीं 1905 से स्वदेशी आँदोलन भी जुड़ गये । वैद्य जी ने इस काम में राजपाल जी भी जोड़ लिया । राजपाल जी ने युवाओं से संपर्क किया और एक टोली बना ली । यह टोली पूरे नगर में घूम घूम कर युवाओं को संस्कारों से जोड़ने का कार्य करने लगी । इसके लिये सांस्कृतिक और मानवीय विन्दुओं को तार्किक तरीके से लोगों को समझाकर अपने धर्म और परंपरा से जोड़ने का अभियान चला । उन्होंने यह कार्य अमृतसर से लाहौर तक फैलाया। इस अभियान से उन लोगों को कठिनाई हुई जो कुतर्क के आधार पर युवाओं को सनातन परंपरा से तोड़कर मतान्तरण का अभिमान चला रहे थे । कयी बार सार्वजनिक शास्त्रार्थ भी हुये । पर राजपाल जी अध्ययन बहुत करते थे । उनकी तार्किक क्षमता भी अद्भुत थी इसीलिए हर बार वे ही भारी पड़ते। उन्होने प्रतिदिन रात्रि आठ बजे युवाओं की एक संस्कार बैठक करने की परंपरा भी आरंभ की और एक संगठन भी बनाया जिसका नाम “सुधार सभा” रखा । राजपाल जी इस सभा में बच्चों और युवाओं को व्यक्तित्व और जीवन निर्माण के लिए संस्कारों के अनुरुप जीवन जीने का संदेश देते थे। इस सभा में मांस-भक्षण, तम्बाकू व मदिरा पान आदि से दूर रहने का आव्हान होता । इस सभा के प्रचार से अनेक युवकों ने दुर्व्यसनों का परित्याग किया। कितने ही युवक कुसंगति से बचे ।समय के साथ विवाह हुआ और राजपाल जी लाहौर आ गये । यहाँ उन्होंने दो संस्थाएँ बनाई एक “आर्य पुस्तकालय और दूसरी “सरस्वती प्रकाशन” । सरस्वती उनकी पत्नि का नाम था । सरस्वती प्रकाशन पत्नि के नाम पर ही रखा था । उन दिनों पंजाब में हिन्दी का प्रचलन बहुत कम था । अधिकतर पुस्तकें उर्दू या पंजाबी में ही प्रकाशित होती थीं। हिन्दी के प्रकाशक भी नगण्य थे । इस बात को भाँप कर राजपाल ने ‘आर्य पुस्तकालय’ तथा ‘सरस्वती आश्रम’ नामों से हिन्दी के प्रचार का अभियान छेड़ा ।

राजपाल जी ने उन विपरीत परिस्थिति में हिन्दी के स्तरीय प्रकाशन का आयाम स्थापित किया वह अपने आप में एक आश्चर्यजनक है ।उनका सौम्य और आत्मीय व्यवहार सबको प्रभावित करता । यहाँ उन्हें सबलोग महाशय संबोधन से पुकारने लगे । अब उनका नाम महाशय राजपाल हो गया ।
1920 और 1930 के दशक में महाशय राजपाल ने चार भाषाओं में एक साथ स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित कीं। हिन्दी और उर्दू में उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 200 से ऊपर थी । वे स्वयं अच्छे लेखक एवं कुशल सम्पादक थे। अनेक पुस्तकें स्वयं लिखीं तथा अन्य लेखकों के लेखों तथा भाषणों का संपादन और प्रकाशन किया। समय के साथ स्वामी श्रद्धानन्द से जुड़े और न केवल स्वामी जी के पत्र ‘सद्धर्म-प्रचारक’ में सहायक सम्पादक बने अपितु स्वामी जी शुद्धीकरण अभियान में सहभागी भी बन गये । । कालान्तर में वे लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘प्रकाश’ के वर्षों सह-सम्पादक रहे। इसी पृष्ठभूमि के साथ उन्होंने राजपाल प्रकाशन संस्था गठित कर पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में भी पदार्पण किया । लाहौर में उन दिनों हिन्दी प्रकाशन आरंभ करना सरल नहीं था । तब इस व्यवसाय में संघर्ष अधिक और पैसा कम था । लगभग पन्द्रह वर्षों के अपने प्रकाशकीय जीवन में उन्होंने अनेक हिन्दी पुस्तकों के प्रकाशन किए और सुदूर देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों तक उन्हें पहुंचाने का काम भी किया। उनके प्रकाशन मॉरिशस, फिजी, पूर्वी अफ्रीका, ब्रिटिश तथा डच गयाना आदि स्थानों पर बड़ी संख्या में जाते थे। पुस्तकों के माध्यम से भारतीय विचारधारा और संस्कृति के संदेशवाहक साहित्य के निर्यात में भी उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही थी। स्वामी श्रृद्धानंद जी सानिध्य के कारण वे कुछ कट्टरपंथियों के निशाने पर तो आ ही गये थे । स्वामी श्रृद्धानंद जी की हत्या की उन्होंने कठोर शब्दों में निंदा की और लेख भी लिखे । इससे उनके विरुद्ध गुस्सा और बढ़ा।

तभी लाहौर में एक घटना घटीउन्हीं दिनों लाहौर के बाजार में दो पुस्तकें आईं। जिनमें भारतीय मान विन्दुओं पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ थीं। एक पुस्तक का नाम ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और दूसरी पुस्तक का नाम ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’था । पहली पुस्तक में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और दूसरी पुस्तक में महर्षि दयानन्द सरस्वती पर बहुत ही भद्दे और अश्लीलता से भरा कीचड़ उछाला गया था।सनातन परंपरा और उसके आदर्शों पर इस प्रकार कीचड़ बाजी पहली नहीं थी । उन दिनों लाहौर में आम बात थी । इस प्रकार का प्रचार उस समूह की ओर से होता था जो युवाओं के मतान्तरण का अभियान चला रहा था । लेकिन इस बार इसके उत्तर में एक पुस्तक बाजार में आई जिसमें पैगंबर साहब पर टिप्पणियाँ थीं। “रंगीला रसूल” नाम से सामने आई । इस पुस्तक पर लेखक और प्रकाशन का नाम नहीं था पर यह प्रचार हो गया कि इसके प्रकाशक राजपाल जी हैं। पुस्तक को लेकर तनाव हुआ । राजपाल जी से लेखक का नाम पूछा गया । पर उन्होंने अनभिज्ञता व्यक्त कर दी । इस पुस्तक पर गाँधी जी ने भी आपत्तिजनक माना और यंग इंडिया में लेख लिखा । राजपाल जी गिरफ्तार हुये । उनपर मुकदमा चला । उनपर निचली अदालत में कारावास और जुर्माने की सजा हुई । उन्होंने अपील की और हाई कोर्ट से बरी हो गये । उनके बरी हो जाने को से कट्परपंथी समाज में नाराजी बढ़ी।उन्हे जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं। उन पर हमले भी हुये । वे दो बार के हमलों में बच गये । वे हमलावर पकड़े भी गये पर तीसरी बार का हमला प्राणलेवा बना । वह 6 अप्रैल 1929 का दिन था एक इल्मदीन नामक कट्टरपंथी पुस्तक देखने के बहाने दुकान में घुसा और अवसर देखकर छुरे से हमला बोल दिया । राजपाल जी आर्य वैदिक धर्म तथा सत्य वैदिक साहित्य के प्रकाशन के लिये बलिदान हो गये। हमलावर इल्मदीन को पकड़ लिया गया । उस पर मुकदमा चला और अदालत ने उसे फाँसी की सजा सुनाई ।

राजपाल जी चौथे बलिदानी थे उनसे पहले महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रृद्धानंद और पं. लेखराम जी भी वैदिक परंपरा की रक्षा में बलिदान हुए। थे । राजपाल जी एक निर्भीक पत्रकार, लेखक, प्रकाशक और वैदिक संस्कृति के लिये समर्पित थे । उनके बलिदान दिवस पर सादर नमन्

चिकित्सा शिक्षा द्वारा आत्मनिर्भर भारत और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति

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समीर कौशिक

दिल्ली। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, भारत के शिक्षा क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव का संकेत देती है। इसका उद्देश्य शिक्षा को अधिक समग्र, बहुविषयक और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाना है। विशेष रूप से, चिकित्सा शिक्षा में सुधार और नवाचार की दिशा में इसे अत्यधिक महत्व दिया गया है। NEP का उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा को आत्मनिर्भर और प्रौद्योगिकी आधारित बनाना है, जो अंततः आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सहायक होगा।
चिकित्सा शिक्षा में नवाचार और सुधार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा को बहुविषयक और समग्र दृष्टिकोण से विकसित करना है। इसमें चिकित्सा के पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, और भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को भी एकीकृत करने की योजना है। इससे भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चिकित्सा ज्ञान विज्ञान को मान्यता मिलेगी और वैश्विक स्तर पर भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का प्रचार-प्रसार होगा।

मल्टीडिसिप्लिनरी और इंटीग्रेटेड शिक्षा का महत्व NEP में मल्टीडिसिप्लिनरी (बहुविषयक) और इंटीग्रेटेड (समग्र) शिक्षा का प्रस्ताव किया गया है। इसका उद्देश्य छात्रों को केवल एक क्षेत्र में विशेषज्ञता नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर प्रदान करना है। चिकित्सा शिक्षा में इसका मतलब है कि छात्रों को अन्य विषयों जैसे विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के साथ चिकित्सा के क्षेत्र में भी शिक्षा प्राप्त हो, ताकि वे एक समग्र दृष्टिकोण से समस्याओं का समाधान कर सकें।

स्वदेशी अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्वदेशी चिकित्सा शोध को बढ़ावा देने की बात की गई है। भारत में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों जैसे आयुर्वेद, योग और यूनानी चिकित्सा का धरोहर रूपी खजाना है, जो विश्व में अपनी पहचान बना सकता है। नीति का उद्देश्य इन पद्धतियों का वैज्ञानिक आधार पर पुनर्निर्माण करना और उन्हें समकालीन चिकित्सा विज्ञान में समाहित करना है। इसके द्वारा न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में नवाचार होगा, बल्कि भारत को चिकित्सा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद मिलेगी।

डिजिटल शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी का समावेश NEP में डिजिटल शिक्षा और प्रौद्योगिकी के उपयोग पर जोर दिया गया है। चिकित्सा शिक्षा में डिजिटल संसाधनों का इस्तेमाल छात्रों को अधिक लचीलापन और सुलभता प्रदान करेगा। ऑनलाइन शिक्षा, वर्चुअल कक्षाएं, और टेलीमेडिसिन जैसे उपकरणों के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रों को भी उच्च गुणवत्ता की चिकित्सा शिक्षा मिल सकेगी। इसके साथ ही, चिकित्सा विज्ञान में नवीनतम तकनीकों का समावेश, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स, चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा।

प्रैक्टिकल और क्षेत्र आधारित शिक्षा का महत्वNEP में प्रैक्टिकल और क्षेत्र आधारित शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है। चिकित्सा शिक्षा में यह आवश्यक है कि छात्र केवल सैद्धांतिक ज्ञान से अधिक, वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रशिक्षित हों। चिकित्सा में प्रैक्टिकल अनुभव का महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि इससे छात्र सीधे तौर पर रोगियों से संबंधित समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने में सक्षम होते हैं। क्षेत्र आधारित शिक्षा के माध्यम से छात्रों को समुदायों में स्वास्थ्य सेवाओं का अनुभव होगा, जो उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में चिकित्सा प्रणालियों को समझने में मदद करेगा।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में योगदान चिकित्सा शिक्षा में इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य एक आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है। जब भारतीय चिकित्सा शिक्षा उच्च गुणवत्ता वाली और वैश्विक मानकों के अनुरूप होगी, तो न केवल भारतीय छात्र बल्कि विदेशी छात्र भी भारत में चिकित्सा अध्ययन के लिए आकर्षित होंगे। यह भारत को एक वैश्विक चिकित्सा शिक्षा केंद्र बना सकता है, जो न केवल ज्ञान का आदान-प्रदान करेगा, बल्कि भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को भी प्रमुखता देगा।

निष्कर्ष नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में चिकित्सा शिक्षा में सुधार और नवाचार की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। यह नीति भारतीय चिकित्सा प्रणाली को न केवल आधुनिक बनाने की दिशा में काम करेगी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को भी साकार करेगी। बहुविषयक शिक्षा, स्वदेशी अनुसंधान, डिजिटल शिक्षा, और क्षेत्र आधारित शिक्षा के माध्यम से यह नीति चिकित्सा शिक्षा को एक नई दिशा प्रदान करेगी, जो भारतीय समाज और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए लाभकारी होगी।

भए प्रगट कृपाला

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हेमंत शर्मा

‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी’ यह राम के जन्म पर बाबा तुलसीदास लिखते हैं. सब हर्षित हैं. पुलकित हैं. मगन हैं. चकाचौंध हैं. पर बालक राम की लीला और तेजस्विता कौशल्या को रास नहीं आ रही है. वे कहती हैं, “तजहु तात यह रूपा. कीजै सिसु लीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा”. हे पुत्र! यह रूप छोड़कर मेरे लिए प्रिय बाल-लीला करो. यह सुख परम अनुपम है. यह सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान राम ने बालक होकर रोना शुरू किया. वे मनुष्य शरीर में आए. उन्हीं राम का आज जन्मदिन है. जन्मदिन नहीं जन्मोत्सव है. उनके सारे कार्य मानवी है. उनमें ईश्वरत्व का चमत्कार नहीं है. इसलिए वे आम आदमी के ज़्यादा निकट हैं. लोक में उनकी जबरदस्त व्याप्ति है. स्त्री वियोग में दुखी होते हैं. रोते हैं. भाई के वियोग में विलाप करते हैं. उनकी इस स्थिति को देखकर पार्वती को संदेह होता है क्या राम भगवान हैं? ब्रह्म हैं? अगर राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे? ब्रह्म हैं तो स्त्री के वियोग में बुद्धि बावली क्यों? ऐसा ही संदेह भारद्वाज को भी हुआ. पर राम तो जनसामान्य के हैं. टूटे को जोड़ते हैं. आमजन का विश्वास हैं. ढाढस हैं. हारे हुए की जीत हैं. यही राम होने के मायने हैं.

यह देश राम का है. राम कण कण में हैं. भाव की हर हिलोर में राम हैं. कर्म के हर छोर में राम हैं. राम यत्र-तत्र, सर्वत्र हैं. जिसमें रम गए वही राम है. सबके अपने-अपने राम हैं. गांधी के राम अलग हैं. लोहिया के राम अलग. वाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है. भवभूति के राम दोनों से अलग हैं. कबीर ने राम को जाना. तुलसी ने माना. निराला ने बखाना. राम एक हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न. भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता और संयम का नाम है राम. आप ईश्वरवादी न हो, तो भी घर-घर में राम की गहरी व्याप्ति से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानना ही पड़ेगा. स्थितप्रज्ञ, असंम्पृम्त, अनासक्त. एक ऐसा लोक नायक, जिसमें सत्ता के प्रति निरासक्ति का भाव है. जो जिस सत्ता का पालक है, उसी को छोड़ने के लिए सदैव तैयार है.

राम इस देश की उत्तर दक्षिण एकता के अकेले सूत्रधार हैं. राम अयोध्या के थे. महान विचारक डॉ राममनोहर लोहिया भी अयोध्या के ही रहने वाले थे. डॉ लोहिया ने हमारी संस्कृति के तीन देवताओं को एक ही लाइन में परिभाषित किया है. उनका कहना है कि राम मर्यादित व्यक्तित्व के स्वामी थे. तो कृष्ण उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी. राम पूरी तरह धर्म के स्वरूप हैं. जिसे राम प्रिय नहीं है उसे धर्म प्रिय नहीं है. कबीर राम को परम ब्रह्म मानते है. “कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढे बन माही. ऐसे घट घट राम है दुनिया देखत नाही.”

तो आख़िर वो राम कौन हैं जिनका नाम लेकर एक बूढ़ा गांधी अंग्रेज़ी साम्राज्य से लड़ गया. जिसके नाम पर इस देश मे आदर्श शासन की कल्पना की गयी. उसी रामराज्य के सपने को देख देश आज़ाद हुआ. गांधी ने यही सपना देखा था. सरकारी संत विनोबा इसे प्रेम योग और साम्ययोग के तौर पर देखते थे. तो वाल्मीकि रामराज्य की व्याख्या कुछ इस तरह करते है.

काले वर्षति पर्जन्य: सुभिक्षंविमला दिश:
ह्रष्टपुष्टजनाकीर्ण पुरू जनपदास्तथा.
नकाले म्रियते कश्चिन व्याधि: प्राणिनां तथा.
नानर्थो विद्यते कश्चिद् पाने राज्यं प्रशासति.

यानी जिस शासन मे बादल समय से बरसते हों, सदा सुभिक्ष रहता हो, सभी दिशाएँ निर्मल हों, नगर और जनपद हष्ट पुष्ट मनुष्यों से भरे हों, वहां अकाल मृत्यु न होती हो, प्राणियों में रोग न होता हो, किसी प्रकार का अनर्थ न हो, पूरी धरा पर एक समन्वय और सरलता हो और प्रकृति के साथ तादात्म्य, वही रामराज्य है. तुलसी ने इसी रामराज्य को विस्तार दिया. मैथिली शरण गुप्त इसे ही अपने महाकाव्य साकेत में अर्थाते हैं. राम अगम हैं. सगुण भी हैं निर्गुण भी. कबीर कहते हैं निर्गुण राम जपहुं रे भाई. मैथलीशरण गुप्त मानते हैं कि राम तुम्हारा चरित्र स्वंय ही काव्य है. कोई कवि बन जाय सहज सम्भाव्य है.

निर्गुणिया कबीर भी राम की बहुरिया बनकर रहना चाहते हैं. यही राम मेरे भी अवलंब बने. इनके सहारे ही मैंने जीवन का सबसे बड़ा काम पूरा किया. अयोध्या पर किताब लिखने का काम. हालांकि अयोध्या से मेरा निजी, सांस्कृतिक, धार्मिक और भावनात्मक रिश्ता रहा है. बाप दादा वहीं के रहने वाले थे. इसलिए अयोध्या मेरे संस्कारों में है. वह मन से कभी उतरती नहीं. श्रद्धा का वह स्तर है कि मेरी दादी कभी अयोध्या नहीं कहती थीं. उनके मुँह से हरदम “अयोध्या जी” ही निकलता था. इसी निकटता में मैंने राम को जिया है.

हमारे राम लोकमंगलकारी हैं. ग़रीब नवाज़ हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम हैं. वो इक्ष्वाकु वंश के राजा थे. इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे. इनके वंश में आगे चलकर दिलीप, रघु, अज, दशरथ और राम हुए. रघु सबसे प्रतापी थे इसलिए वंश का नाम रघुवंश चला. रघुवंश के कारण ही राम को राघव, रघुवर ,रघुनाथ भी कहा गया. कहानी पुरानी है. फिर से सुनाता हूँ. महाराज दशरथ के तीन रानियाँ थीं. लेकिन कोई संतान नहीं थी. इसलिए उन्होंने पुत्रेष्टी यज्ञ के लिए श्रृंगी मुनि को बुलाया. यज्ञ के आख़िर में अग्नि देव प्रकट हुए और दशरथ को खीर भेंट की. दशरथ ने खीर अपनी रानियों को खिलायी. आधी खीर कौशल्या को दिया आधी कैकेयी को दोनों ने अपने अपने हिस्से की आधी आधी खीर सुमित्रा को दी. नतीजतन कौशल्या ने राम को आज ही के दिन जन्म दिया. “नौमी तिथि मधु मास पुनीता. सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता. मध्यदिवस अति सीत न घामा, पावन काल लोक बिश्रामा”. इसी दिन राम का आगमन हुआ. कैकेयी से भरत, सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए. यही राम के होने की कहानी है.

राम साध्य है, साधन नहीं. गांधी का राम सनातन, अजन्मा और अद्वितीय है. वह दशरथ का पुत्र और अयोध्या का राजा नहीं है. जो आत्मशक्ति का उपासक प्रबल संकल्प का प्रतीक है. वह निर्बल का एक मात्र सहारा है. उसकी कसौटी प्रजा का सुख है. वे समाज के सभी वर्गों को आगे बढ़ने की प्रेरणा और ताकत देते हैं. हनुमान, सुग्रीव, जाम्बवंत, नल, नील सभी को समय-समय पर नेतृत्व का अधिकार राम ने दिया. उनका जीवन बिना किसी का हड़पे हुए फलने की कहानी है. वह देश में शक्ति का सिर्फ एक केन्द्र बनाना चाहते है. देश में इसके पहले शक्ति और प्रभुत्व के दो प्रतिस्पर्धी केन्द्र थे. अयोध्या और लंका. राम अयोध्या से लंका गए. रास्ते में अनेक राज्य जीते. राम ने उनका राज्य नहीं हड़पा. उनकी जीत शालीन थी. जीते राज्यों को जैसे का तैसा रहने दिया. लंका विभीषण को और किष्किन्धा सुग्रीव को सौंप दी. चाहते तो राज्य का विस्तार कर लेते. अल्लामा इकबाल कहते हैं- “है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज, अहले नजर समझते हैं उनको इमाम-ए-हिन्द.”

राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है. लांघी तो अनर्थ. सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन. राम जाति वर्ग से परे हैं. नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव, दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है. अगड़े पिछड़े से ऊपर निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ ले चलने वाले वे अकेले देवता हैं. भरत के लिए आदर्श भाई. हनुमान के लिए स्वामी. प्रजा के लिए नीति-कुशल न्यायप्रिय राजा हैं. परिवार नाम की संस्था में उन्होंने नए संस्कार जोड़े. पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा दी. ऐसे वक्त जब खुद उनके पिता ने तीन विवाह किए थे, राम ने अपनी दृष्टि सिर्फ एक महिला तक सीमित रखी. उस निगाह से किसी दूसरी महिला को कभी देखा नहीं. जब सीता का अपहरण हुआ वे व्याकुल थे. रो-रो कर पेड़, पौधे, पहाड़ से उनका पता पूछ रहे थे. इससे उलट जब कृष्ण धरती पर आए तो उनकी प्रेमिकाएं असंख्य थीं. सिर्फ एक रात में सोलह हजार गोपिकाओं के साथ उन्होंने रास किया था. वहीं राम ने पिता की अटपटी आज्ञा का पालन कर पिता पुत्र के रिश्तों को नई ऊंचाई दी.

राम राजा हैं. ताक़तवर हैं. ऐसा राजा जिसे जनस्वीकृति मिली है. बेशुमार ताकत से अहंकार का एक खास रिश्ता हो जाता है. पर उनमें अंहकार छू तक नहीं गया था. यही वजह है कि अपार शक्ति के बावजूद राम मनमाने फैसले नहीं लेते थे. वे लोकतांत्रिक हैं. सामुहिकता को समर्पित विधान की मर्यादा जानते हैं. धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी. नर हो या वानर इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं. वे मानवीय करुणा जानते हैं. वे मानते हैं- परहित सरिस धर्म नहीं भाई. डॉ. लोहिया कहते हैं “जब कभी गांधी ने किसी का नाम लिया तो राम का ही क्यों लिया? कृष्ण और शिव का भी ले सकते थे. दरअसल राम देश की एकता के प्रतीक हैं. गांधी राम के जरिए हिन्दुस्तान के सामने एक मर्यादित तस्वीर रखते थे”. वे उस रामराज्य के हिमायती थे, जहां लोकहित सर्वोपरि था. जो गरीब नवाज था. इसीलिए लोहिया भारत मां से मांगते हैं- “हे भारत माता हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो, राम का कर्म और वचन दो”. लोहिया जी अनीश्वरवादी थे. पर धर्म और ईश्वर पर उनकी सोच मौलिक थी.

राम लोक से सीधे इसलिए जुड़ते हैं कि राम का जीवन बिल्कुल मानवीय ढंग से बीता. उनके यहां दूसरे देवताओं की तरह किसी चमत्कार की गुंजाइश नहीं है. आम आदमी की मुश्किल उनकी मुश्किल है. वे लूट, डकैती, अपहरण और भाइयों से सत्ता से बेदखली के शिकार होते हैं. जिन समस्याओं से आज का आम आदमी जूझ रहा है. कृष्ण और शिव हर क्षण चमत्कार करते हैं. राम की पत्नी का अपहरण हुआ तो उसे वापस पाने के लिए अपनी गोल बनाई. लंका जाना हुआ तो उनकी सेना एक-एक पत्थर जोड़ पुल बनाती है. वे कुशल प्रबन्धक हैं. उनमें संगठन की अद्भुत क्षमता है. जब दोनों भाई अयोध्या से चले तो महज तीन लोग थे. जब लौटे तो एक पूरी सेना के साथ. एक साम्राज्य का निर्माण कर. राम कायदे कानून से बंधे हैं. उससे बाहर नहीं जाते. एक धोबी ने जब अपहृत सीता पर टिप्पणी की तो वे बेबस हो गए. भले ही उसमें आरोप बेदम थे. पर वे इस आरोप का निवारण उसी नियम से करते हैं, जो आम जन पर लागू है. वे चाहते तो नियम बदल सकते थे. संविधान संशोधन कर सकते थे. पर उन्होंने नियम कानून का पालन किया. सीता का परित्याग किया जो उनके चरित्र पर धब्बा है. लेकिन फिर मर्यादा पुरुषोत्तम और क्या करते? उनके सामने एक दूसरा रास्ता भी था, सत्ता छोड़ सीता के साथ चले जाते. लेकिन जनता(प्रजा) के प्रति उनकी जवाबदेही थी. इसलिए इस रास्ते पर वे नहीं गए.

मान्यता है कि सबसे पहले राम की कथा भगवान शंकर ने देवी पार्वती को सुनाई थी. उस कथा को वहाँ मौजूद एक कौवे ने भी सुन लिया. उसी कौवे का पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ. काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में शंकर के मुख से सुनी वह रामकथा पूरी याद थी. उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई. तुलसी अपने रामचरितमानस में इसका जिक्र करते हैं.

बाद में यही कथा ‘अध्यात्म रामायण’ के नाम से प्रसिद्ध हुई. हालांकि रामकथा के बारे में एक और मत प्रचलित है जिसके मुताबिक़ सबसे पहले रामकथा हनुमानजी ने लिखी- ‘हनुमन्नाटक’. उसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की. ‘हनुमन्नाटक’ को हनुमानजी ने एक शिला पर लिखा था. मान्यता है कि जब वाल्मीकि ने अपनी रामायण तैयार कर ली तो उन्हें लगा कि हनुमानजी के हनुमन्नाटक के सामने यह टिक नहीं पाएगी और इसे कोई नहीं पढ़ेगा. हनुमानजी को जब महर्षि की इस व्यथा का पता चला तो उन्होंने उन्हें बहुत सांत्वना दी और अपनी रामकथा वाली शिला उठाकर समुद्र में फेंक दी, जिससे लोग केवल वाल्मीकि जी की रामायण ही पढ़ें और उसी की प्रशंसा करें. समुद्र में फेंकी गई हनुमानजी की रामकथा वाली शिला राजा भोज के समय समुद्र से निकाली गयी.

भगवान राम के बारे में आधिकारिक रूप से जानने का मूल स्रोत महर्षि वाल्मीकि की रामायण ही है. हालांकि पुराणों में भी रामकथा का उल्लेख है. वामन, वाराह, नारदीय, लिंग, अग्नि, बर्ह्मवैवर्त, पद्म, स्कन्द, गरूण पुराण में रामकथा के प्रसंग हैं. रामायण संस्कृत साहित्य का आरम्भिक महाकाव्य है यह अनुष्टुप छन्दों में लिखा गया है. महर्षि वाल्मीकि को ‘आदिकवि’ मानते हैं. इसीलिए यह महाकाव्य ‘आदिकाव्य’ माना गया. इस ग्रंथ में 24 हजार श्लोक, 500 उपखंड, तथा 7 काण्ड हैं. इसके रचना काल के बारे में अनेक मत हैं. कामिल बुल्के इसके रचनाकाल को छह सौ ईसा पूर्व मानते हैं. आठवीं शताब्दी में संस्कृत के महान कवि और नाटककार भवभूति हुए. उनकी किताब उत्तर रामचरित राम के राज्याभिषेक के बाद की कथा ज्यादा प्रभावशाली ढंग से कहती है.

लोक में सबसे ज्यादा व्याप्ति तुलसी के राम चरित मानस की है. तुलसी ने लोकभाषा में रामकथा का बखान कर इसे लोक तक पहुँचाया. पन्द्रहवीं शती में लिखे इस ग्रन्थ का बड़ा हिस्सा बनारस में लिखा गया है. 7 काण्डों में बँटे रामचरितमानस में छन्दों की संख्या के अनुसार बालकाण्ड और किष्किन्धाकाण्ड क्रमशः सबसे बड़े और छोटे काण्ड हैं. मध्यकाल में जब हिन्दू धर्म के उपर अनेक तरह के संकट थे, वेद शास्त्रों का अध्ययन कम हो गया था, तो इस ग्रन्थ ने समूचे हिन्दू समाज में नए जीवन का संचार किया था. तुलसी दास ने इसे आम लोगों तक पहुँचाने के लिए रामलीलाएं भी कराईं.

संस्कृत में रामकथा पर कालिदास का रघुवंश महाकाव्य भी है. इस महाकाव्य में 19 सर्गों में रघु के कुल में उत्पन्न बीस राजाओं का इक्कीस प्रकार के छन्दों का प्रयोग करते हुए वर्णन किया गया है. इसमें दिलीप, रघु, दशरथ, राम, कुश और अतिथि का विशेष वर्णन किया गया है. वे सभी समाज में आदर्श स्थापित करने में सफल हुए. राम का इसमें विषद वर्णन है. 19 में से छह सर्ग उनसे ही संबंधित हैं.

बंगाल की कृतिवास रामायण और तमिल की कंब रामायण भारतीय भाषाओं में रामकथा की सर्वोत्कृष्ट कृति हैं. तेलुगू में बारहवीं शताब्दी में लिखी रंगनाथ रामायण मलयालम की भास्कर रामायण, मोल्ला रामायण प्रसिद्ध हैं. गुजराती, असमिया, उड़िया और मराठी में भी रामकथा पर ग्रन्थ लिखे गए. नेपाली की अपनी रामायण घर घर में है. बौद्ध ग्रन्थों में भी इसका पर्याप्त उल्लेख है. बौद्धों ने बोधिसत्व के रूप में और जैनियों ने आठवें बलदेव के रूप में राम को अपने यहाँ स्थान दिया है. उनकी जातक कथाओं में राम कथा के अलग अलग सन्दर्भ हैं पर बौद्ध धर्म सनातन धर्म के ख़िलाफ़ पैदा हुआ था इसलिए उसमें रामकथा के बिगड़े सन्दर्भ हैं. जैसे दशरथ जातक में तो सीता को राम की बहन बताया गया है.

भारत के बाहर भी रामकथा का विस्तार व्यापक रहा है. रामायण के अध्येता फ़ादर कामिल बुल्के ने रामायण के तीन सौ आख्यानों की चर्चा की है. थाईलैंड की रामकथा रामकियेन के नाम से जानी जाती है जबकि इंडोनेशिया में रामायण काकावी के नाम से प्रसिद्ध है. कंबोडिया में रामकेर तो बर्मा (म्यांमार) में रामवत्थु. तुर्की में रवोतानी रामायण, लाओस में फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक). और फिलिपींस में मसलादिया लाबन नाम से रामकथा का प्रचलन है. मलयेशिया में हिकायत सेरीराम, श्रीलंका में जानकी-हरण, नेपाल में भानुभक्त कृत रामाजान, जापान में होबुत्सुशू रामकथा पर आधारित ग्रन्थ है. चीनी साहित्य में राम कथा पर आधारित कोई मौलिक रचना नहीं हैं लेकिन बौद्ध धर्म में त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएँ मिलती हैं. ‘अनामकं जातकम्’ और ‘दशरथ कथानम्’. इससे चीन में भी इस कथा की व्याप्ति का पता चलता है.

विश्व साहित्य में राम सा चरित्र दूसरा नहीं. न कहीं राम सी मर्यादा है, न राम सा पौरूष और न ही राम सी तितिक्षा. राम इस दुनिया का संतुलन हैं. अमीरों की माया है तो गरीबों के राम हैं. उनका नाम भर ही दुनिया भर के गरीब-ग़ुरबों के भीतर जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों से टकराने का हौसला है. वे इस पृथ्वी पर त्रेतायुग में जन्मे, फिर यहीं के होकर रह गए. भक्तों के मोह में उन्होंने जीवन-मरण के चक्र को भी तोड़ डाला. देश के हर रामभक्त के पास उसके हिस्से की कहानियां हैं. राम कब कब और किन किन परिस्थितियों में उसकी मदद के लिए आए, उसकी ज़ुबान पर चढ़ा हुआ है. राम के आगे विज्ञान का संसार बौना है. चिकित्सा शास्त्र और रसायन शास्त्र के सूत्र अधूरे हैं. ये सब बाहरी आँखों से दिखते हैं. पर राम अंर्तमन के हैं. भाव जगत की लगन के हैं. जीवन की सृष्टि के, सृष्टि के जीवन के हैं. राम जन जन के हैं.

ऐसे राम के जन्मदिन को लेकर देश में तनाव समझ से परे है. राम जोड़ने वाले हैं, तोड़ने और बांटने वाले नहीं. रामराज्य की संकल्पना सर्वे भवन्तु सुखिनः, परहित सरिस धर्म नहीं भाई और अभयं न पशुभ्यः पर आधारित है. परम श्रद्धेय देवानंद जी ने अपनी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में कहा था- “देखो ऐ दिवानों तुम ये काम ना करो, राम का नाम बदनाम ना करो”. जिनकी आस्था विवेकानंद से ज्यादा देवानंद में हो, कम से कम उन्हीं की दुहाई मानकर ये बात मान लीजिए.

आप सबको रामनवमी की मंगलकामनाएँ.
जय जय.

(सोशल मीडिया से साभार)

कवि चिराग जैन की संगीतमय काव्य प्रस्तुति पुरुषोत्तम

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दिल्ली। रविवार को रामनवमी के अवसर पर देश भर में सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों की धूम रही। इस अवसर पर दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन स्थित आईपेक्स भवन में कवि चिराग़ जैन की संगीतमय काव्य प्रस्तुति पुरुषोत्तम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन श्री रामलीला कमिटी इंद्रप्रस्थ ने किया।

कार्यक्रम में ख्यातिलब्ध कवि चिराग़ जैन ने अपने महाकाव्य के एक हिस्से का पाठ किया। काव्य के संगीतमय पाठ ने अंत तक लोगों का मन बांधे रखा। इस प्रस्तुति में रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड के तीन प्रसंग प्रस्तुत किए गए जिनमें राम वन गमन, भरत-कैकेयी संवाद और राम-भारत मिलाप को कविता में प्रस्तुत किया गया। लोगों ने चिराग़ जैन की विशिष्ट काव्य शैली और गहरी संवेदनात्मक प्रस्तुति की बड़ी सराहना की। उल्लेखनीय है कि कवि चिराग़ जैन ने देश-विदेश में हिन्दी कविता की प्रस्तुति दी है। पिछले दिनों पुणे में दिया गया उनका एक भाषण काफ़ी वायरल रहा था।

श्री रामलीला कमिटी इंद्रप्रस्थ की तरफ़ से राम दरबार स्थापित कर श्री रामचंद्र का पूजन किया गया। साथ ही संस्था के अध्यक्ष सुरेश बिंदल ने सभा को सम्बोधित भी किया। उन्होंने कहा कि इंद्रप्रस्थ की रामलीला पूरी दिल्ली में प्रसिद्ध है और इसकी विशेषता ये है कि हर वर्ष की रामलीला में कुछ नए प्रसंग अलग-अलग राम-कथाओं से जोड़े जाते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि

कार्यक्रम का संचालन मुंबई से आए बॉलीवुड लेखक प्रबुद्ध सौरभ ने किया। संगीत की टीम में ज़फर मिर्ज़ा, राजन बेनीवाल और अविजीत चक्रवर्ती का योगदान रहा। रामलीला कमिटी की तरफ़ से आयोजन में संस्था के संरक्षक श्री तरुण गुप्ता चेयरमैन दिलीप बिंदल मंत्री मुकेश कौशिक, वाइस चेयरमैन अमित गोयल, वाइस चेयरमैन अरुण गुप्ता, संयोजक सत्येंद्र अग्रवाल, मुख्य संयोजक अश्विनी वत्ता, महामंत्री नितिन गर्ग श्री राजकुमार गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष श्री योगेंद्र बंसल ने सहयोग दिया।

इस कार्यक्रम में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल, पूर्व विधायक नसीब सिंह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दयानन्द जी, विधायक संजय गोयल शामिल हुए।

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