जेल में घासलेट डालकर जिन्दा जलाया था

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास बलिदानों से भरा है । क्राँतिकारी लेखक सागरमल गोपा को जेल में इसलिये जलाकर मार डाला गया था कि उन्होंने अपने ओजस्वी साहित्य से जन जागरण अभियान चलाया था ।

सागरमल गोपा मूलतः राजस्थान की जैसलमेर रियासत के थे । उनका जन्म तीन नवम्बर 1900 को जैसलमेर में हुआ था । उनकी आरंभिक शिक्षा जैसलमेर में हुई । उन्होंने संस्कृत और हिन्दी के साथ अंग्रेजी की शिक्षा भी ली । वे बहुत कुशाग्र बुद्धि थे । स्मरण शक्ति भी असामान्य थी ।

उनके पूर्वज रियासत के राजगुरु रहे हैं। पिता अखैराज गोपा भी रियासत के दरबारी थे । उन दिनों जैसलमेर में महरावल जवाहर सिंह का शासन था । पर जवाहर सिंह नाम के महरावल थे रियासत का शासन वहाँ तैनात अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट के इशारे पर चलता था । अंग्रेजों का प्रमुख काम जनता का शोषण करके अधिक से अधिक राजस्व बसूली था । इस वसूली के लिये रियासत के सिपाही पूरी रियासत में भीषण अत्याचार कर रहे थे ।

इस वातावरण से किशोर वय सागरमल को प्रभावित किया । समय के साथ युवा हुये । जब वे केवल अठारह वर्ष के थे तब 1918 में उन्होंने जैसलमेर में एक सभा की जिसमें अंग्रेजीराज की तो आलोचना की ही । इसके साथ इस अत्याचार में सहभागी होने केलिये महरावल की भी आलोचना की और इन अत्याचारों केलिये राजा को ही दोषी माना । इसके साथ अपने मित्रों से मिलकर एक पुस्तकालय की स्थापना की जिसमें कुछ राष्ट्रवादी साहित्य और समाचारपत्र मंगाना आरंभ किये जिससे जन जागरण पैदा हो । इसके साथ जैसलमेर रायासत में वसूली के लिये हो रहे अत्याचारों पर एक पुस्तिका “जैसलमेर का गुण्डाराज” भी तैयार की और इसे वितरित करना आरंभ किया । इससे अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट और राजा दोनों कुपित हुये । महरावल ने गिरफ्तारी के आदेश दिया । युवा सागरमल बंदी बना लिये गये । पिता ने राजा से रिहाई की विनती की । राजा सहमत तो हुये पर जैसलमेर से निष्कासन की शर्त पर । पिता ने सहमति दे दी । पिता ने सागरमलजी को रिहा होते ही परिवार सहित नागपुर भेज दिया । यह 1920 का वर्ष था । सागरमल नागपुर आ गये पर यहाँ भी शांत न बैठे । 1921 में असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ तो सहभागी हुये और गिरफ्तार कर लिये गये । उन्हे छै माह की सजा हुई । रिहा होकर पुनः जन जाग्रति और लेखन में ही जुट गये । उन्होने दिल्ली से प्रकाशित “विजय” एवं वर्धा से प्रकाशित “राजस्थान केसरी” में जैसलमेर सहित देशभर में राजनीतिक एवं सामाजिक सुधारों पर लेख लिखे ।

सागरमल गोपाजी ने रघुनाथसिंह मेहता के साथ मिलकर जैसलमेर में माहेश्वरी नवयुवक मंडल की स्थापना की । रघुनाथ सिंह जैसलमेर में ही रहते थे जबकि सागरमल जी नागपुर में रहकर ही इस संस्था से जुड़े थे । यह संस्था गुप्त रूप से राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचारार्थ राष्ट्रीय साहित्य वितरण एवं राष्ट्रीय भावना जागृत करने का कार्य कर रही थी ।

महारावल ने इस संस्था पर प्रतिबंध लगाकर पुस्तकालय जब्त कर लिया और रघुनाथसिंह मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया ।

सागरमल गोपा ने नागपुर में रहकर ही जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना की संस्था प्रजामंडल काँग्रेस की ही ईकाई थी जो उन क्षेत्रों में सक्रिय थी जहाँ अंग्रेजों का सीधा शासन नहीं था । रियासती राज था पर अंग्रेजों द्वारा नियंत्रित। जैसलमेर प्रजा मंडल ने नागरिक अधिकारों और सम्मान जनक जीवन के अधिकार के लिये अनेक अभियान चलाये । और राजनीतिक सुधारों की भी मांग की ।

1938 में जैसलमेर से उनके पिता के निधन का समाचार आया । वे जैसलमेर पहुँचे। पिता के अंतिम संस्कार कर वहीं रहने लगे । और स्वतंत्रता आँदोलन के लिये जन जागरण का अभियान आरंभ किया । 25 मई 1941 में बंदी बना लिये गये । उनपर निष्कासन आदेश का उल्लंघन करने और राजद्रोह का आरोप लगा । छो वर्ष की सजा दी गई। सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयनारायण व्यास जी ने इनकी रिहाई के लिये काँग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू जी से भी संपर्क किया । पर सफलता नहीं मिली । जेल में सागरमल जी के दो ही कार्य थे एक लेखन कार्य और दूसरा जेल अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाना । इससे उनपर जेल अधिकारियों की भृकुटी सदैव तनी रहती। जेल के भीतर उनपर अमानुषिक अत्याचार हुये । 4 अप्रैल 1946 को थानेदार गुमान सिंह ने उन्हे बाँधकर घासलेट डाला और आग लगा दी । और सागरमल जी का बलिदान हुआ ।
भारत सरकार ने 1986 में उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया और एक नहर का नाम भी उनके नाम पर रखा गया ।

सागरमल जी का पूरा जीवन सामाजिक जागरण के लिये समर्पित रहा । लेखन कार्य से भी और सभा संगोष्ठियों के माध्यम से भी । उन्होंने भारत भर के समाचारपत्रों में जैसलमेर के हालात लिखे । उनकी तीन पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया गया उनमें “जैसलमेर का गुंडाराज” दूसरी “रघुनाथ सिंह का मुकदमा” और तीसरी “आज़ादी के दीवाने” पहली पुस्तक में जैसलमेर के राज्य में सरकारी तंत्र के अत्याचारों का वर्णन था । दूसरी पुस्तक में न्याय व्यवस्था के प्रति सतर्क रहने और तीसरी पुस्तक में देश के स्वतंत्रता आँदोलन में सक्रिय रहने और बलिदान होने वालों का विवरण था । अंग्रेजीराज और रियासत दोनों ने उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध लगाये जो आजादी के बाद ही हट सके ।

Indian journalist found dead in Andaman islands, PEC demands fair investigation

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Nava Thakuria

Geneva: Press Emblem Campaign (PEC), the global media safety and rights body, expressed serious concern over the suspected killing of online journalist Sahadev Dey at Diglipur area of Andaman and Nicobar islands on 29 March 2025 and demanded a fair probe to identify the probable culprits and punish them under the law. Local media in Post Blair reported that Dey (35), who used to run local news channel ‘Republic Andaman’, went missing on Saturday evening from Diglipur fish market. His charred body was recovered from a field in Deshbandhu Nagar on Tuesday.

According to the police, Dey was targeted for personal feuds and four individuals (namely Gangaiah, who runs a restaurant cum bar in Diglipur, two of his staff members Ramesh and Rama Subramanian along with Bitika Mallik, a local woman) are already arrested in connection with the murder. The police authority in Post Blair however apprehended that the journalist was targeted by the concerned individuals for very personal enmities.

“PEC learns that Sahadev Dey was vocal against illegal timber smuggling, soil cutting and hooch racket & gambling in his locality. Hence we expect a high level probe to unearth the perpetrators of the brutal crime. Being a journalist, Dey might have earned enmity from various elements and that should be brought to the public domain. We also hope that the bereaved family will be compensated by the relevant authorities,” said Blaise Lempen, president of PEC (www.pressemblem.ch/).

PEC’s south and southeast Asia representative Nava Thakuria informed that Dey becomes the third journalist to be killed in India since 1 January ( 46th media victim across the globe till date). Speaking to the PEC from Port Blair, local journalists claimed that Dey’s family members and various civil society groups were offended by the police version where his personal life (read an extramarital affair with the local lady) was dragged into the episode and they now demand a impartial probe by the Central Bureau of Investigation over the matter.

डॉ. राधा मोहनदास अग्रवाल के वक्तव्य पर संजय तिवारी मणिभद्र की टिप्पणी

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गोरखपुर वाले डॉ राधामोहनदास अग्रवाल ने आज राज्यसभा में वक्फ बिल पर जो बोला है उसे हर व्यक्ति एक बार सुने जरूर। फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान।

लेकिन एक बात जो उन्होंने कही और जिसकी बहुत चर्चा हो रही है वह यह कि मैंने भी कुरान पढी है। इस्लाम को समझते हैं और कुरान में क्या लिखा है अगर यह बता देंगे तो मार हो जाएगी, मार।

उनके वक्तव्य में जो महत्वपूर्ण है वह यह कि वो एक गैर मुस्लिम होकर इस्लाम को समझते हैं। वो तो हिन्दू महासभा वाले रहे हैं लेकिन आज बहुत से सामान्य हिन्दू हैं जो इस्लाम को समझ रहे हैं। खासकर नयी पीढी वाले लोग इस्लाम को मुल्ला के कुतर्कों से नहीं बल्कि सीधे उसको स्रोत से समझ रहे हैं।

यही मैं भी कहता हूं। मुसलमान को समझने की कोशिश मत करो। इस्लाम को समझो। आज एक राधामोहन दिखाई दिया है कल हजार लाख राधामोहन दिखाई देंगे। कोई लड़ाई झगड़ा नहीं। सिर्फ इस्लाम को समझो। बस। उसके बाद खुद तय करना कि गैर मुस्लिम के रूप में क्या बोलना है और क्या करना है।

वक्फ बिल पर राज्यसभा में गरजे डॉ. राधामोहन अग्रवाल

आप चाहे जितना भी पीएम मोदी का विरोध कर लें, वह मजबूती के साथ एक काम करते रहेंगे। वह है गरीब, मुसलमान, दलित, पिछड़े, महिला और अनाथ बच्चों के विकास का काम। वह हमेशा उनके साथ खड़े रहने वाले हैं। उन्होंने किसी भी संपत्ति को वक्फ किए जाने पर भी बड़ी बात कही। मोहम्मद साहब ने कहा था कि आपके पास अपनी कोई संपत्ति हो तो दूसरों के भले के लिए दान करो।

पवित्र ग्रंथ कुरान में भी लिखा था यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी संपत्ति है, वह संपत्ति का एक हिस्सा वह दान कर सकता है। उसके आय के साधन कैसे होंगे? लिख सकता है। आय से होने वाली आमदनी किस वर्ग के उपयोग में आएगी, उसके भी निर्देश दे सकता है। लेकिन, वक्फ बोर्ड क्या कर रहा है। किसी फिल्मी गुंडे की तरह जिस संपत्ति पर हाथ रख दी, वह संपत्ति वक्फ की हो गई। जैसे फिल्मों में गुंडे हुआ करते थे, जिस औरत पर हाथ रख दी, वह औरत उनकी हो गई। इसी प्रकार की तरह काम इन लोगों ने किया है।

जिस जमीन पर हाथ रखो, वह जमीन वक्फ की कैसे हो सकती है? इसके कागजात तो उन्हें दिखाने होंगे। किसने वक्फ की? कैसे वक्फ की? किस मकसद से वक्फ की? कहीं कोई जिक्र नहीं। उन्होंने कहा कि कुरान में या किसी हदीस में यह लिखा है कि अगर हमने कोई संपत्ति दान नहीं की तो कोई गड़बड़ होगी। मेरे मन में ऐसा सवाल आया। हमने जब यह सवाल किया तो असदुद्दीन ओवैसी ने मेरा नाम रख दिया मौलाना डॉक्टर राधा मोहन अग्रवाल। मैंने उनसे पूछा कि इस बात पर बहस तो बहुत होती है। कहीं कुछ लिखित नहीं है। मैंने उनसे कहा कि जब हजरत मोहम्मद साहब कहते हैं कि एक भी पैसा अगर किसी को दो तो उसको लिखो। कल तुम्हारे देने को कोई चुनौती न दे। एक भी पैसा दो तो लिखित दो।

वक्फ बोर्ड कहता है कि उसके पास सारी संपत्ति है जिसका कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है। इसके बाद भी वक्फ है। मेरी एक भी सवाल का जवाब दिया गया। मैं उस कमेटी में था। उसकी बातों को बोलना नहीं चाहता, लेकिन इन्होंने कमिटी का उल्लेख कर दिया। इसलिए, मैंने एक्सपोज कर रहा हूं। मेरे एक भी प्रश्न का जवाब यह लोग नहीं दे पाए। खाली मुझे कहने लगे कि कुरान पढ़ते हैं। मौलाना हैं। अरे मैं कुरान पढ़ता हूं। तुम तो मुसलमान हो। बचपन से पढ़ते हो ना।

मैं तो पढ़ा हूं, बताओ कुरान में क्या लिखा है? मार हो जाएगी मार। यह हिंदुओं की भलमनसाहत है जो कुरान पढ़ के तुम्हें बताता नहीं है। दूसरी चीज, सरकार जब इनकी थी तो इन्होंने वक्फ को अभयदान दे दिया। नारा दिया गया, जो जमीन सरकारी है, वह जमीन हमारी है। सरकारी संपत्तियों पर कब्जा करने का ऐतिहासिक कारनामा इन्होंने किया है। उत्तर प्रदेश में 74 फीसदी वक्फ संपत्तियां सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनी है। तेलंगाना में 50 फीसदी संपत्तियां सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनी है। कांग्रेस सरकार ने इन्हें पूरा अभयदान दिया था।

भोपाल के समीप भीमबैठका और वैदिककालीन मानव सभ्यता के प्रमाण इन्हीं ने खोजे थे

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डाक्टर हरिभाऊ वाकणकर की गणना संसार के प्रमुख पुरातत्वविदों में होती है । उन्होंने भारत के विभिन्न वनक्षेत्र के पुरातन जीवन और भोपाल के आसपास लाखों वर्ष पुराने मानव सभ्यता के प्रमाण खोजे । भीम बैठका उन्ही की खोज है । उनके शोध के बाद विश्व भर के पुरातत्वविद् भारत आये और डाक्टर वाकणकर से मार्गदर्शन लिया ।

उनका पूरा नाम श्रीविष्णु श्रीधर वाकणकर था । लेकिन वे हरिभाऊ वाकणकर के नाम से प्रसिद्ध थे । उनका जन्म 4 मई 1919 को मध्यप्रदेश के नीमच नगर में हुआ । पिता श्रीधरजी वाकणकर वैदिक विद्वान थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे । बड़े भाई लक्ष्मण वाकणकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से केमिकल इंजीनियर थे। उन्हे सिरेमिक कला में विशेषज्ञता प्राप्त थी । लिपियों के विकास विशेषकर देवनागरी के डिजिटलीकरण में विशेषज्ञ के रूप में उनकी ख्याति थी । हरिभाऊ जी की प्रारंभिक शिक्षा नीमच में ही हुई और उच्च शिक्षा केलिये बनारस गये । पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनके भीतर भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट स्वाभिमान जाग्रत किया और राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ से जुड़ने केलिये प्रेरित किया । वे बालवय में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे । हरिभाऊ जी बहुत अध्ययन एवं कल्पनाशील थे, स्मरण शक्ति और स्वत्व वोध विलक्षण था । छात्र जीवन में अपनी कक्षा के साथियों और अन्य मित्रों से परस्पर चर्चा में तर्क सहित वे उन धारणाओं का खंडन करते थे जो विदेशी लेखकों ने भारतीय वाड्मय की गरिमा कम करने के लिये स्थापित की थीं। शिक्षा पूरी कर उन्होंने इसी दिशा में कदम बढ़ाये। उन्होंने भारतीय पुरातन साहित्य का विस्तृत अध्ययन किया और पुराणों कथाओं से संबंधित विवरणों के सजीव प्रमाण खोजे । और अनेक उन तथ्यों को प्रमाणित किया जिन्हे मिथक कहकर नकारा जाता रहा था । इसमें वेद वर्णित सरस्वती नदी का अस्तित्व भी है ।

वाकणकर जी ने सरस्वती नदी खोज केलिये विश्व इतिहास के इस तथ्य को आधार बनाया कि संस्कृतियों के विकास और इतिहास के प्रमाणीकरण में नदियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है । वाकणकर जी ने वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती नदी की खोज आरंभ की । उन्होंने उपग्रह छवि से प्रमाणित किया कि सरस्वती नदी का प्रवाह हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से होकर गुजरता है । आगे चलकर इस मार्ग केलिये एक परियोजना का गठन हुआ जिसके सलाहकार मंडल कै संयोजक वाकणकर जी बनाये गये । उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता को भी सरस्वती नदी से जुड़े होने के प्रमाण दिये । पुरातात्विक खोज के लिये उन्होने उन्होंने पूरे देश की यात्रा की । गंगा और नर्मदा के किनारे, विन्धय एवं सतपुड़ा पर्वत क्षणियों के मैदानों में लाखों वर्ष पुराने मानव सभ्यता के चिन्ह खोजे । पर उन्हें मालवा से बहुत लगाव था । इसलिये उन्होने नीमच, रतलाम, उज्जैन, इंदौर, कायथा, शाजापुर के साथ भोपाल, रायसेन, विदिशा आदि क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया और वनक्षेत्र में पदयात्राएँ कीं। उनके जीवनवृत के अध्ययन से लगता है प्रकृति से उन्हें कोई अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त थी । वे पुरातात्विक और खंडित प्रतिमाओं को इतने ध्यान से देखते थे कि लगता था उनसे बातें कर रहे हो। कयी बार तो बैठे बैठे उठकर किसी विशिष्ठ स्थान की ओर चल देते थे अथवा चलती ट्रेन में अपनी यात्रा अधूरी छोड़कर जंगल में उतर जाते थे और उन्हें वहाँ कुछ न कुछ पुरातात्विक खजाना मिल ही जाता था ।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग चालीस किलोमीटर दूर

भीमबेटका के प्राचीन शिलाचित्रों की खोज वाकणकरजी ने की थी । भीमबैठका और भोजपुर के आसपास के कुछ चित्र तो लगभग पौने दो लाख वर्ष पुराने प्रमाणित हुये । इन सभी चित्रों का कार्बन-डेटिंग पद्धति से परीक्षण किया गया । इसका सत्यापन अंतराष्ट्रीय शोध कर्ताओं ने किया । इसी शोध के चलते उन्हें 1975 में पद्मश्री अलंकरण मिला ।

वाकणकर जी उज्जैन के सिंधिया ओरियंटल इंस्टीट्यूट से जुड़े थे और घंटाकार के समीप भारतीय कला मंदिर उनकी साधना स्थली था । वे न केवल पुरातत्वविद् थे अपितु अच्छे चित्रकार भी थे । उन्हे जितनी विशिष्टता पुरातात्विक अनुसंधान में प्राप्त थी वे उतने ही श्रेष्ठ संगठक थे । उनका पूरा जीवन ऋषि परंपपरानुरूप था । उन्होंने अपने शिष्यों की एक विशाल मंडली तैयार की । उनमें श्याम सुंदर सक्सेना, गोमती संकुशल, सचिदा नागदेव , मुजफ्फर कुरेशी, रहीम गुट्टीवाला आदि प्रमुख रहे । अपने शिष्यों की टोली के साथ उन्होंने चंबल और नर्मदा के बीहड़ों की खोज की और इंग्लैड तक यात्रा की । उनका शिष्य मंडल मानों परिवार था, उनके व्यक्तित्व का अंग था । वे सुनते अधिक थे बोलते कम थे । और जो बोलते मानों ब्रह्म वाक्य होता । उन्होंने जीवन में कभी विश्राम नहीं किया । उन्होंने निरंतर यात्राएँ कीं। भारत के सभी महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थानों के साथ विश्व के अनैक स्थानों की । वे कभी भी एक झोला कंधे पर टाँग कर निकल पड़ते थे । जिस प्रकार उनके जीवन का आरंभ भारतीय परंपरा, संस्कृति और श्रेष्ठा को प्रतिष्ठित करने के अभियान के साथ हुआ था । जीवन का समापन भी कर्मपथ पर ही हुआ । उन्होंने 4 मई 1988 को सिंगापुर में जीवन की अंतिम श्वाँस ली ।
यह उनके व्यक्तित्व और कार्य क्षमता और ऊर्जा की विलक्षण विशेषता थी कि पुरातात्विक अन्वेषण में अपने अतुलीय और अथक कार्य के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रकल्पों में भी उनकी सक्रियता निरन्तर रही । वे 1981 में स्थापित संस्कार भारती के संस्थापक महामंत्री रहे । वनक्षेत्र में अपने शोध कार्य के साथ उन्होने संघ की योजनानुसार सामाजिक और शैक्षणिक उत्थान कार्य भी किये ।

पुरातात्विक अनुसंधान और सामाजिक कार्यों के साथ वाकणकरजी ने सिक्कों और शिलालेखों का संग्रह भी किया । उन्होंने ईसापूर्व 5 वीं शताब्दी से लेकर अब तक के लगभग 5500 सिक्कों और संस्कृत, प्राकृत, ब्राह्मी आदि भाषाओं के लगभग 250 शिलालेखों का संग्रह किया । उनके योगदान की स्मृति को सजीव रखने केलिये संस्कार भारती ने 4 मई 2019 से 3 मई 2020 के बीच उनकी जन्म शताब्दी वर्ष का आयोजन किया था ।
उनका शरीर भले आज संसार में नहीं है पर उनके अनुसंधान सजीव है । वे पुरातात्विक अनुसंधान के मील के पत्थर थे । उनके द्वारा स्थापित मानदंड आज भी अनुसंधानकर्ताओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

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