अपनी पहचान के लिए संघर्षरत आगरा को कब मिलेगा विरासत का ताज?

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आगरा, केवल एक शहर नहीं, बल्कि सदियों की मुहब्बत की जीती-जागती निशानी है। यह वह धरती है जिसने ताजमहल को अपनी गोद में पाला है, जो हिंदुस्तान की मिश्रित संस्कृति की अद्वितीय गाथा कहता है। यहाँ सिर्फ़ एक अजूबा नहीं बसता, बल्कि आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे तीन-तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल इसकी ऐतिहासिक गहराई को बयान करते हैं। और इनके अलावा? हेरिटेज रेलवे स्टेशन, अनगिनत प्राचीन इमारतें, शिव मंदिरों की पवित्र श्रृंखला, ऐतिहासिक गुरुद्वारे, ईसाई समुदाय के गिरिजाघर और शांत कब्रिस्तान, राधा स्वामी धर्म का आध्यात्मिक केंद्र, विश्व प्रसिद्ध पैठे की मिठास और मेहनतकश हाथों से तैयार होते जूतों का उद्योग, हुनरमंदों का पच्चीकारी कौशल – इतनी विविधता और विशिष्टता भला किस शहर में एक साथ मिलेगी?

फिर भी, एक प्रश्न दिल में कांटे की तरह चुभता है, एक पीड़ा बनकर उभरता है: आगरा को अब तक “वैश्विक विरासत शहर” की प्रतिष्ठित पहचान क्यों नहीं मिल पाई? क्या हमारी अनमोल धरोहरें इतनी उपेक्षित रहने की हकदार हैं?

आगरा की नैसर्गिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। मुग़ल काल में यह शहर दुनिया के सबसे वैभवशाली नगरों में गिना जाता था, जिसकी भव्यता लंदन और पेरिस जैसे महानगरों को भी मात देती थी। मगर आज? आज यह शहर बेलगाम शहरीकरण के बोझ तले कराह रहा है, अतिक्रमण के मकड़जाल में फँसता जा रहा है, और सबसे दुखद यह है कि अपने ही शहर के प्रति स्थानीय लोगों की उदासीनता इसे और गहरा घाव दे रही है।

टूरिज्म सेक्टर के डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, “ताजमहल, प्रेम का अमर प्रतीक, हर साल लाखों पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। आगरा किला और फतेहपुर सीकरी मुग़ल बादशाहों की शानदार जीवनशैली और हुकूमत की कहानियाँ सुनाते हैं। लेकिन, क्या इन शानदार विरासतों का यही नसीब है कि इनके चारों ओर अतिक्रमण का क्रूर घेरा बढ़ता जाए? दिल्ली गेट हो या ताजगंज, सिकंदरा हो या एत्मादुद्दौला – हर ऐतिहासिक ढाँचा खतरे की घंटी बजा रहा है। मानो हमारी विरासतें दम तोड़ रही हैं और हम बेबस होकर तमाशा देख रहे हैं।”

यमुना, जिसे कभी आगरा की आत्मा कहा जाता था, आज एक बीमार और बेजान शरीर बनकर रह गई है। कभी कलकल करती बहती नदी अब सूखी रेत और गाद का ढेर बन चुकी है, जो हवा में उड़कर शहर की साँसों में ज़हर घोल रही है। शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) खतरनाक स्तरों को पार कर गया है। क्या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इस प्रदूषित हवा में साँस लेंगी? क्या हम उन्हें एक स्वस्थ और सुंदर आगरा सौंप नहीं सकते?

यह देखकर हैरानी और पीड़ा होती है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते जा रहे हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) के लिए एक दूरदर्शी दस्तावेज़ की बात की थी, मगर वह आज भी फाइलों की धूल चाट रहा है। क्या हमारी न्यायपालिका के आदेशों का भी कोई मोल नहीं? क्या हमारी धरोहरों का भविष्य सिर्फ कागज़ों में सिमट कर रह जाएगा?

आगरा हेरिटेज लवर्स ग्रुप के कनवीनर गोपाल सिंह के मुताबिक, “अगर आगरा को “विरासत शहर” का बहुमूल्य दर्जा मिल जाए, तो न केवल यहाँ की ऐतिहासिक इमारतों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित की जा सकेगी, बल्कि छोटी-बड़ी हवेलियाँ, पुराने जीवंत बाज़ार, लोक संस्कृति की समृद्ध परंपरा और खानपान की विशिष्ट पहचान भी सुरक्षित रह पाएगी। यह स्मार्ट सिटी की तरह केवल कंक्रीट के जंगल और बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित नहीं करेगा, बल्कि शहर की आत्मा, उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखेगा। यह हमारे अतीत को वर्तमान से जोड़ेगा और भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रखेगा।”

लेकिन, इस सपने को साकार करने में सबसे बड़ी बाधा है – आगरा के लोगों में अपने शहर के प्रति उस गहरे जुड़ाव और गर्व की कमी, जो किसी भी विरासत को बचाने के लिए पहली शर्त होती है। जहाँ जयपुर, उदयपुर, मैसूर और वाराणसी जैसे शहर अपनी विरासत को एक उत्सव की तरह मनाते हैं, वहीं आगरा में हमारे शानदार स्मारक और सदियों पुराना इतिहास आम ज़िंदगी की पृष्ठभूमि बनकर रह गए हैं, मानो वे हमारी रोज़मर्रा की आपाधापी में कहीं खो गए हों। क्या हम अपनी जड़ों को भूल गए हैं? क्या हमें अपनी विरासत की महानता का एहसास नहीं है?

टूरिस्ट गाइड वेद गौतम कहते हैं, “भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की तरफ से कुछ प्रयास ज़रूर होते हैं – जैसे फोटो प्रदर्शनियाँ आयोजित करना या स्मारकों में मुफ्त प्रवेश देना – मगर ये प्रयास उस विशाल चुनौती के सामने बहुत छोटे और अपर्याप्त हैं। इतिहासकार सही कहते हैं कि अब विभाग में वह जुनून और समझदारी नहीं रही, जो जॉन मार्शल जैसे दूरदर्शी अधिकारियों के समय में हुआ करती थी। क्या हम अपनी संस्थाओं को इतना कमज़ोर होने देंगे कि वे हमारी अनमोल धरोहरों की रक्षा भी न कर सकें?”

सैलानी तो आते हैं, दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं, लेकिन शहर की बदहाल स्थिति देखकर निराश और हताश होकर लौटते हैं। न ढंग की सड़कें हैं, न सुगम हवाई संपर्क, और न ही एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण। अगर आगरा की संकरी गलियों में विरासत वॉक टूर शुरू किए जाएं, तो शहर की असली ज़िंदगी, इसकी सदियों पुरानी संस्कृति और इसकी आत्मा दुनिया के सामने आ सकेगी। लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति और समर्पण की आवश्यकता है, ये कहना है श्री राजीव गुप्ता का।

कुछ विशेषज्ञ यह बहुमूल्य सुझाव देते हैं कि आगरा को तीन विशिष्ट हिस्सों में बाँटकर – मुग़ल काल, ब्रिटिश काल और आधुनिक काल – संरक्षण और विकास की योजनाएं बनाई जाएं। यह एक दूरदर्शी विचार है जो शहर की बहुस्तरीय पहचान को सुरक्षित रख सकता है। मगर अफ़सोस की बात यह है कि स्थानीय प्रशासन की सुस्ती और लोगों की उदासीनता के कारण यह विचार भी फाइलों में कैद होकर रह गया है। क्या हम अपनी निष्क्रियता के कारण इस सुनहरे अवसर को भी खो देंगे?

रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्यों के मुताबिक, हक़ीक़त तो यह है कि “विरासत शहर” का प्रतिष्ठित दर्जा आगरा के लिए सिर्फ एक तमगा या अलंकरण नहीं होगा, बल्कि यह इस ऐतिहासिक शहर के लिए एक नई ज़िंदगी का रास्ता खोल सकता है। इससे शहर को पर्यावरणीय सुरक्षा मिलेगी, बेहतर बुनियादी ढांचा विकसित होगा, और सबसे बढ़कर, इसे एक नई वैश्विक पहचान मिलेगी, जो इसकी खोई हुई गरिमा को वापस लाएगी। यह हमारी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा, पर्यटन को नई ऊंचाइयाँ देगा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा।

अब फैसला सरकार को करना है – क्या वह ताज के इस ऐतिहासिक शहर को वाकई उसकी असली शान वापस लौटाएगी? क्या वह हमारी अनमोल विरासत को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगी? या इतिहास, विरासत और संस्कृति यूँ ही सिसकती रहेगी, हमारी आँखों के सामने धीरे-धीरे दम तोड़ती रहेगी?

विश्व संवाद केन्द्र में बाबा साहेब को अर्पित की गयीं पुष्पांजलि

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लखनऊ। भारत रत्न डा. भीमराव आम्बेडकर की जयंती के अवसर पर सोमवार को जियामऊ स्थित विश्व संवाद केन्द्र में बाबा साहेब के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर कृतज्ञतापूर्वक उन्हें नमन किया गया। सामाजिक समरसता गतिविधि की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र सम्पर्क प्रमुख मनोज ने कहा कि भारत रत्न बाबा साहेब डा. भीमराव आम्बेडकर विलक्षण क्षमता और प्रतिभा के धनी थे। उन्हें अधिकांश लोग केवल संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं। बाबा साहेब ने वंचित समाज को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। अनेक प्रलोभनों के बावजूद उन्होंने ईसाई व इस्लाम नहीं अपनाया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्त प्रचारक प्रमुख यशोदानंदन ने कहा कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी से बाबा साहब का बहुत ही घनिष्ठ संबंध था। बाबा साहेब के चुनाव में दत्तोपंत ने काम किया था। संघ के प्रति बाबा साहब निष्ठा रखते थे।

सामाजिक समरसता गतिविधि की प्रान्तीय टोली के सदस्य व मीडिया प्रमुख बृजनन्दन राजू ने कहा कि बाबा साहेब का जीवन सबके लिए अनुकरणीय है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक समरसता गतिविधि के माध्यम से देशभर में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए कार्य कर रहा है।

इस अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र के कार्यालय प्रमुख सनी सिंह,सह नगर संघचालक विजय विश्वकर्मा, सह नगर कार्यवाह शशिकांत,नगर बौद्धिक प्रमुख अवधेश पाण्डेय एडवोकेट,नगर सम्पर्क प्रमुख डा. मदन मोहन मिश्रा, सायं कार्यवाह अर्जुन,शाखा कार्यवाह डा.उमेश कुमार राय, आशीष कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट,सुधांश एडवोकेट व विकास पाठक एडवोकेट प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

30 Youth Volunteers Complete 15-Day Campaign to Raise Awareness against Perverted Content

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New Delhi – The Save Culture Save Bharat Foundation has successfully concluded the first batch of its 15-day volunteer campaign, aimed at spreading awareness about the harmful effects of perverted content on individuals and society. The campaign culminated with the distribution of certificates to 30 young and dedicated volunteers who gave their time, energy, and voice to this important cause.

Over the span of two weeks, the volunteers worked both online and offline conducting awareness drives, engaging in thought-provoking discussions, and using digital platforms to highlight how perverted content is silently corroding the moral and cultural fabric of our society, especially among the youth.

This first batch wasn’t just a group of volunteers; it was a community of changemakers united by a shared concern for the future of our culture. Their commitment and sincerity turned this campaign into a movement, sparking meaningful conversations and inspiring others to reflect on the kind of content we consume and normalize.

As we honour their efforts with certificates, we also celebrate their courage to speak up, educate others, and stand for a cause that many shy away from. The Save Culture Save Bharat Foundation extends its heartfelt thanks to every volunteer and wishes them the very best in all their future endeavours. Their contribution is a powerful reminder that real change begins with awareness and a few determined individuals can make a big difference.

This is just the beginning. More batches will follow, and with them, a growing community of young minds committed to protecting the values that define us as a nation.

30 युवा स्वयंसेवकों ने पूरा किया 15 दिवसीय जागरूकता अभियान, विकृत कंटेंट के खिलाफ उठाई आवाज

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नई दिल्ली – सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन ने अपने पहले 15-दिवसीय वालंटियर अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इस अभियान का उद्देश्य लोगों को विकृत कंटेंट के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना था। अभियान के समापन में 30 युवा और समर्पित स्वयंसेवकों को उनके योगदान के लिए प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

पिछले दो हफ्तों के दौरान, इन स्वयंसेवकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से जागरूकता फैलाने का काम किया। उन्होंने जागरूकता रैलियां निकालीं, विचारोत्तेजक चर्चाएं कीं, और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से यह बताया कि कैसे विकृत कंटेंट धीरे-धीरे हमारे समाज और विशेष रूप से युवाओं की सोच को प्रभावित कर रहा है।

यह सिर्फ एक वालंटियर बैच नहीं था, बल्कि एक ऐसा समूह था जो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए एकजुट हुआ। उनकी लगन और ईमानदारी ने इस अभियान को एक आंदोलन का रूप दे दिया, जिससे समाज में जरूरी बातचीत शुरू हुई और लोगों को सोचने पर मजबूर किया कि हम क्या देख रहे हैं और क्या सामान्य मान रहे हैं। फाउंडेशन के अनुसार, यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत है, जिसमें युवा जागरूकता के जरिए समाज में बदलाव लाने के लिए जुटे हैं। स्वयंसेवकों ने न केवल अपने विचार रखे, बल्कि दूसरों को भी इस विषय पर सोचने और सजग होने के लिए प्रेरित किया।

फाउंडेशन ने सभी प्रतिभागियों के समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि यह पहला बैच देशभर में जागरूकता की एक नई लहर की शुरुआत है।सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन हर स्वयंसेवक को दिल से धन्यवाद देता है और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। उनका योगदान यह साबित करता है कि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है और कुछ संकल्पित लोग भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

आने वाले समय में और भी युवाओं को इस अभियान से जोड़ा जाएगा, ताकि सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा और स्वस्थ सामाजिक वातावरण को बढ़ावा दिया जा सके।

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