अपराध और राजनीति का गठजोड़

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दिल्ली : सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी ने बहस छेड़ दी है कि शाहबुद्दीन जैसे अपराधी के बेटे से उसके पिता के कुकृत्यों के लिए सवाल करना उचित नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने शाहबुद्दीन के बेटे ओसामा को रघुनाथपुर विधानसभा से टिकट दिया है। यहाँ मुद्दा केवल अपराधीकरण का नहीं, बल्कि अपराधियों को राजनीति में लाने और इसे सामान्य बनाने का है। सभी राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट दे रहे हैं, लेकिन राजद ने उस परिवार के युवराज को चुना, जिसके पिता पर तेजाब से एक जीवित व्यक्ति को नहलाने जैसे जघन्य अपराध का आरोप है। उस पीड़ित की असहनीय वेदना को कोई कैसे भूल सकता है?

सवाल यह है कि ऐसी क्या मजबूरी थी? यदि मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देना ही था, तो क्या बिहार में साफ-सुथरे चरित्र वाले मुस्लिम नेताओं की कमी पड़ गई कि शाहबुद्दीन के बेटे को मैदान में उतारा गया?

मान लिया जाए कि ओसामा ने कोई अपराध नहीं किया, जैसा कि उनके समर्थक और सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में तर्क देने वाले दावा करते हैं। लेकिन क्या यह मान लिया जाए कि ओसामा ने अपने पिता की आपराधिक विरासत से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है? क्या वह अपने पिता के कृत्यों पर शर्मिंदगी महसूस करते हैं?

शाहबुद्दीन भले ही दुनिया से चले गए हों, लेकिन सिवान, गोपालगंज से लेकर किशनगंज तक उनके खौफ का साया अब भी कायम है। शायद यही कारण है कि राजद ने उनके बेटे को टिकट दिया। बिहार ने लालू प्रसाद के गुंडाराज से मुक्ति पाई थी, लेकिन अब तेजस्वी प्रसाद उस दौर को फिर से लौटाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

इसके बावजूद, कुछ लोग बेशर्मी से तेजस्वी का समर्थन कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, सीपीएम के दीपांकर, जो शाहबुद्दीन के बेटे को टिकट दिए जाने के बाद भी तेजस्वी के पीछे-पीछे घूम रहे हैं। ऐसे में सीपीएम अब किस मुंह से बिहार में ब्राह्मणवाद और गुंडाराज के खिलाफ बोलेगी? क्या उन्हें जरा भी शर्म नहीं आएगी?

अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की बैठक जबलपुर में

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दिल्ली । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिवर्ष होने वाली ‘अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल’ बैठक इस संघ शताब्दी वर्ष में मध्य प्रदेश के महाकौशल प्रांत में, जबलपुर शहर में आगामी युगाब्द 5127, विक्रमी संवत 2082, कार्तिक शुक्ल अष्टमी, नवमी एवं दशमी अर्थात दिनांक 30-31 अक्टूबर एवं 1 नवम्बर 2025 को होने जा रही है। यह बैठक दीपावली के पश्चात संपन्न होगी। अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल में संघ रचना के सभी 46 प्रांतों के प्रांत संघचालक, कार्यवाह तथा प्रचारक एवं सह प्रांत संघचालक, कार्यवाह तथा प्रचारक अपेक्षित रहते हैं।

इस बैठक में संघ के पूजनीय सरसंघचालक डॉ मोहन जी भागवत, माननीय सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले तथा सभी छह सह सरकार्यवाह एवं अन्य अखिल भारतीय कार्य विभाग प्रमुखों सहित कार्यकारिणी के सदस्य भी उपस्थित रहेंगे।

संघ के शताब्दी वर्ष का शुभारंभ हाल ही में संपन्न विजयादशमी के पावन पर्व पर नागपुर सहित देश भर में आयोजित विशेष उत्सवों से हुआ है। इस अवसर पर पूजनीय सरसंघचालक जी के उद्बोधन में प्रस्तुत महत्वपूर्ण मुद्दों के अनुवर्तन पर इस बैठक में चर्चा होगी। बैठक में शताब्दी वर्ष के सभी कार्यक्रमों की अभी तक तैयारियों की समीक्षा भी होगी। बैठक में सभी प्रांत अपनी शताब्दी योजनाओं के संदर्भ में विस्तृत वृत्त एवं विवरण प्रस्तुत करेंगे।

वर्तमान समय के समसामयिक विषयों पर उपस्थित कार्यकर्ताओं द्वारा व्यापक विचार-विमर्श भी बैठक का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
हमेशा की भांति वर्ष 2025-26 की निर्धारित वार्षिक योजना की समीक्षा तथा संघ कार्य के विस्तार का वृत्तांत भी लिया जायेगा। बैठक में विशेष कर संघ शताब्दी निमित्त सुनिश्चित संगठनात्मक लक्ष्यों को विजयादशमी 2026 तक पूर्ण करने के संबंध में विचार-विमर्श होगा।

माफीवीर राजदीप: पत्रकारिता का कलंक

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दिल्ली। भारतीय पत्रकारिता में सनसनीबाज पत्रकार के तौर पर ख्यात राजदीप सरदेसाई ने ‘माफीवीर’ के रूप में अपनी पहचान बना ली है। उन्होंने अपने पत्रकारिता कॅरियर में कई ऐसी कहानियां बुनी हैं, जो जांच के आगे ढह जाती हैं, और पत्रकारिता की नींव को कमजोर करती हैं।

13 अक्टूबर 2025 को सरदेसाई ने एक और माफी मांगी—2011 में IBN7 के स्टिंग ऑपरेशन ‘दिल्ली के डबल एजेंट्स’ के लिए, जो कोबरापोस्ट के साथ मिलकर किया गया था। इसने बीजेपी पार्षद अजीत सिंह तोकस पर रिश्वत मांगने का झूठा आरोप लगाया, जिसने बीजेपी-विरोधी उन्माद को हवा दी। 14 साल तक अदालत में घसीटे जाने के बाद, सरदेसाई ने अपने फैलाए हुए झूठ से खुद को अलग करते हुए दावा किया कि उन्होंने केवल एक ‘बाहरी एजेंसी’ की जांच को दोहराया, जिसे बाद में तीसरे पक्ष ने खारिज कर दिया।

द्रोणाचार्य सरदेसाई के एकलव्य रवीश कुमार अब तक पूछ लेते कि तोकस के 14 साल कौन लौटाएगा? उनके सबसे पसंदीदा सवाल है। वे खास मौकों पर यह सवाल कई बार पूछ चुके हैं लेकिन इस बार गुरू (घंटाल) का मामला था, इसलिए उनके मुंह से बकार नहीं निकला। वैसे उन्होंने कैश फॉर वोट में भी अहम भूमिका निभाई थी और उसके बाद उनकी वफादारी की मुरीद पूरी कांग्रेस है लेकिन मजाल है कि आईटी सेल वाले यू ट्यूबर्स को कभी राजदीप और उनकी पत्नी में गोदी मीडिया दिखाई दिया हो। जबकि पत्नी अवसर पाते ही तृणमूल की गोद में जा बैठी लेकिन आईटी सेल वाले यू ट्यूबर्स ने उन्हें गोदी मीडिया नहीं कहा।

वैसे दर्जनों मामलों में बिना माफी मांगे चुप्पी साध लेने वाले राजदीप के लिए माफी मांगना कोई नई बात नहीं है। वे भारतीय मीडिया के माफीवीर हैं। 2020 में, उन्होंने आईपीएस अधिकारी राजीव त्रिवेदी से 2007 की CNN-IBN रिपोर्ट के लिए माफी मांगी, जिसमें उन्हें सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में गलत तरीके से फंसाया गया था। हैदराबाद कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार की। राजदीप सरदेसाई ने यह झूठ फैलाया था कि राजीव त्रिवेदी ने नकली नंबर प्लेट वाली कारें उपलब्ध कराई थीं, जिनका इस्तेमाल सोहराबुद्दीन को अहमदाबाद ले जाने के लिए किया गया था।

2021 में, दिल्ली की ट्रैक्टर रैली के दौरान राजदीप ने दावा किया कि पुलिस ने एक किसान को गोली मार दी—जो एक दुर्घटना थी। इसके लिए इंडिया टुडे ने उन्हें दो हफ्ते के लिए हटाया और एक महीने की तनख्वाह काटी।

2017 में, उन्होंने BHU के कुलपति को मोदी रैली में गलत पहचाना और प्रणब मुखर्जी की मृत्यु की झूठी घोषणा की-दोनों के लिए माफी मांगी। उनकी गलतियां हमेशा बीजेपी नेताओं को निशाना बनाती हैं, जो उनके पक्षपात को उजागर करती हैं। उनके इस काले रिकॉर्ड के बावजूद, देश की एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस उन्हें क्यों पाल पोस रही है।

खान मार्केट गैंग वाले इस बात को जानते हैं कि इतने बदनाम पत्रकार को किसी मीडिया हाउस से ये सम्मान बिना किसी बड़ी पैरवी के नहीं मिल सकता। अब राजदीप ने जब पत्रकारिता में कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता की तरह ही काम किया है फिर चैनल की मजबूरी को समझना बहुत मुश्किल नहीं है।

सोनिया गांधी के दो या दो से अधिकद इंटरव्यू लेने वाले देश में गिनती के पत्रकार हैं। उनमें एक राजदीप हैं और दूसरे राजीव शुक्ला हैं। वैसे पत्रकारिता में राजदीप और राजीव शुक्ला में सिर्फ इतना अंतर रहा है कि राजीव कांग्रेस पार्टी में रहकर पार्टी के लिए पत्रकारिता कर रहे थे, वहीं राजदीप पार्टी से बाहर रहकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम कर रहे थे।

राजदीप के लिए कहा जा सकता है कि वे टीआरपी की होड़ में तथ्यों को ताक पर रखकर, केवल एक कमजोर पत्रकार नहीं बल्कि पत्रकारिता के दुश्मन भी हैं, जो न्यूज़रूम को पोलिटिकल पार्टी के ‘प्रोपगेंडा’ का अड्डा बना देता है।

संपूर्ण राष्ट्र और समाज को एक सूत्र में समरस होने की अवधि

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विजयदशमीं और दीपावली के बीच ये बीस दिन संपूर्ण समाज और राष्ट्र को एक सूत्र में समरस होने की अवधि है। इसका बहुत स्पष्ट संदेश लंका विजय के बाद श्रीरामजी के अयोध्या लौटने की तैयारी में भी दिया है और इसे लोकजीवन में दीपावली की तैयारी से भी समझा जा सकता है।
भारतीय वाड्मय की प्रत्येक पुराण कथा, अवतारों की अवधारणा अथवा तीज त्यौहार मनाने की परंपरा साधारण नहीं है। इसके पीछे आदर्श समाज निर्माण, प्रत्येक प्राणी और प्रकृति से समन्वय का संदेश है। यदि “वसुधैव कुटुम्बकम” कहा है तो यह केवल सिद्धांत नहीं है। इसे व्यवहारिक जीवन में उतारने का संदेश सभी तीज त्यौहार में दिया गया है। अब विजय दशमीं के बाद दीपावली तैयारी की इन बीस दिनों की अवधि को ही देखें, इसमें संपूर्ण समाज एक दूसरे का पूरक है, एक दूसरे पर आधारित है। मानों संपूर्ण राष्ट्र समरसता की एक माला में पिरोया हुआ है। यही कार्य रामजी ने लंका विजय के बाद किया था और यही परंपरा दीपावली की तैयारी में है।

रावण वध के बाद के बीस दिन

रावण वध के बाद रामजी को अयोध्या लौटने में पूरे बीस दिन लगे थे। यह अवधि अनावश्यक विलंब या विजय का उत्सव मनाने की नहीं है अपितु रामजी द्वारा पूरे भारतवर्ष और प्रत्येक समाज को समरस बनाकर एक सूत्र में पिरोने की अवधि है। इसका स्पष्ट वर्णन रामचरितमानस में है। रावण वध अश्विन माह शुक्लपक्ष दशमीं को हो गया था। लेकिन रामजी कार्तिक मास की अमावस को अयौध्या लौटे। इन दोनों तिथियों में बीस दिन का अंतर है। बीस दिन की इस अवधि में लंका में नहीं रुके थे। केवल दो दिन लंका में रुके थे। रावण वध के बाद रामजी अपने सैन्य शिविर में रहे। उन्होंने विभीषण से युद्ध में मारे गये रावण सहित सभी परिजनों का अंतिम संस्कार करने को कहा। इसमें एक दिन लगा। अगले दिन विभीषण का राज्याभिषेक हुआ। राज्याभिषेक के बाद विभीषण स्वयं सीता माता को सम्मान सहित लेकर रामजी के पास लेकर आये। विभीषण विभिन्न भेंट और पुष्पक विमान भी अपने साथ लेकर आये थे ताकि रामजी तुरन्त अयोध्या लौट सकें। ये मिलाकर कुल दो दिन हुये।
पुष्पक विमान साधारण नहीं था वह दिव्य था जो पवन से तीव्रगति से चल सकता था। उसमें यात्रियों के बैठने की क्षमता भी असीम थी। यात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ उसका विस्तार हो सकता था। रामजी पुष्पक विमान द्वारा उसी साँझ लंका से चल दिये थे। वे चाहते तो कुछ घंटों में ही अयोध्या आ सकते थे। लेकिन उन्हें मार्ग में अठारह दिन लगे और कार्तिक मास की अमावस को अयोध्या लौट सके। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि रामजी ने पुष्पक विमान में बैठकर सीधे अयौध्या का मार्ग क्यों नहीं पकड़ा था और उन्हें य। अठारह दिन कहाँ लगे? इस प्रश्न का समाधान रामजी के लौटने के विवरण में है। लौटने केलिये रामजी ने उसी मार्ग से अपनी यात्रा आरंभ की, जिस मार्ग से वे लंका गये थे। लौटने की अपनी यात्रा में रामजी उन सभी वन्य और ग्राम्य क्षेत्रों के निवासियों से मिले जिनसे जाते समय मिले थे। लौटने में रामजी उन सभी ऋषि आश्रमों में भी गये जिनमें जाते समय गये थे। लौटते समय भी रामजी ने सभी समाज प्रतिनिधियों से भेंट की जिनसे जाते समय मिले थे। इतना ही नहीं, वनवासियों से लेकर ऋषि आश्रमों तक सबको अयोध्या आने का आमंत्रण भी दिया। जो समाज प्रमुख उनके साथ ही चलने को तैयार हो गये उन सबको अपने साथ पुष्पक विमान में बैठा लिया। इनमें भील समाज के मुखिया, निषाद, किरात आदि समाज प्रमुख थे। रामजी ने हर स्थान पर एक एक रात्रि भी बिताई। इसी कार्य में उन्हे अट्ठारह दिन लगे ।
इन अठारह दिनों में रामजी ने पूरे भारत और सभी समाज जनों को स्वयं से जोड़ा और सबको परस्पर जुड़ने का संकल्प भी दिलाया । चूँकि दानवी शक्तियाँ सात्विक समाज के विखराव का ही लाभ उठातीं हैं। यदि समाज संगठित है, जागरूक है, एक सूत्र में आबद्ध है तो आसुरी शक्तियाँ कभी प्रभावी नहीं हो सकती । इसके साथ रामजी ने यह संदेश भी दिया कि उन लोगों के प्रति सदैव आभार का भाव रखना चाहिये जो असामान्य दिनों में सहयोगी बनते हैं।

दीपोत्सव की तैयारी में भी संपूर्ण समाज के एक सूत्र होने की झलक

रामजी ने जो संदेश लंका से अयोध्या लौटने की यात्रा में दिया था वही संदेश आज भी दीपावली की तैयारी में झलकता है । रामजी के अयोध्या लौटने पर केवल दीप जलाने परंपरा होती तो यह कार्य तो एक ही दिन में हो सकता है। लेकिन दीपावली एक दिन का उत्सव नहीं है। यह त्यौहार पूरे पांच दिन का है और इसकी तैयारी में पूरे अठारह बीस दिन लग जाते हैं। यह पाँच दिवसीय त्यौहार और इसकी तैयारी संपूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़ती है। इसमें संपूर्ण समाज की प्रत्यक्ष या परोक्ष सहभागिता होती है। त्यौहार की तैयारी, साफ सफाई, लिपाई पुताई, पुरानी वस्तुओं को हटाना और नयी वस्तुओं के क्रय करने में समाज का ऐसा कौन सा वर्ग है जिसकी सहभागिता नहीं होती । घर की झाड़ू से लेकर स्वर्णाभूषण तक सभी वस्तुएँ क्रय की जातीं हैं। समाज का ऐसा कौनसा वर्ग या व्यक्ति है जिसे भेंट नहीं दी जाती । यही तो सर्व समाज की सहभागिता और सहयोग है। दीपावली की पूजन में जो वस्तुएँ अनिवार्य बताई गई हैं उनका संबंध भी समाज के प्रत्येक शिल्प समूह से है।

रामजी ने श्रीलंका से लौटते समय संपूर्ण समाज को एकत्व का यही संदेश दिया कि संपूर्ण भारतीय समाज संगठित रहे, परस्पर सहयोगी रहे। तभी आसुरी शक्तियों से सभ्य सुसंस्कृत समाज सुरक्षित रहेगा। हम आज भले मूल उद्देश्य का स्मरण न करते हों पर समाज को जोड़ने जुड़ने की प्रक्रिया यथावत है। साफ सफाई, लिपाई पुताई से लेकर नयी वस्त्र वर्तन आभूषण, घर या भवन को सजाने की वस्तुएँ क्रय करते हैं जिससे हर हाथ को काम मिले। सबको एक दूसरे की आवश्यकता अनुभव हो। सब एक दूसरे का महत्व समझे। सब एक दूसरे का सहयोग करें तब ही तो सबकी दीवाली मनती है ।

भारतीय संस्कृति एक मात्र ऐसी मानवीय मूल्यों को महत्व देती है इसमें संसार का एक एक प्राणी समाया है । त्यौहारों की परंपराओं का संदेश भी यही है कि विभिन्न समाजों और वर्गों का एक एक व्यक्ति परस्पर जुड़ सके, एक दूसरे का पूरक बन सके। इसमें कोई भेद नहीं। न नगरवासी का, न ग्रामवासी का और न कोई वन के निवासी का । भारतीय संस्कृति में न जन्म का भेद है, न वर्ग का, न वर्ण का भेद है और न जाति का । यह गुण और कर्म पर आधारित है । इसीलिए निषाद किरात और वनावासी सुग्रीव सब रामजी के मित्र हैं। जो अंतर हमें दिखाई देता है, वह केवल वाह्य स्वरूप है। जिस प्रकार भूमि के हर हिस्से में एक ही प्रकार के फल फूल या फसल नहीं होते। हर पर्वत पर एक सी औषधि नहीं होती। लेकिन सब एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। उसी प्रकार प्राणियों की भाव भाषा में विविधता भी देशकाल और परिस्थिति के अनुरूप है। समय के साथ व्यक्ति अथवा समाज की जीवन शैली विकास की धारा है।इसी आधार पर समूह बने जिन्होंने वर्ग या उपवर्ग बने। लेकिन आतंरिक स्वरूप में कोई अंतर नहीं। ग्रामवासियों और वनवासियों जो वर्ग उपवर्ग भील गौंड, कोल, कोरकू माढ़िया मुंडा आदि आज हैं, वे वर्ग उपवर्ग रामायण काल में भी थे। लेकिन उनमें मानवीय सम्मान में कोई भेद नहीं था। तभी तो रामजी इन सभी वर्ग और उपवर्ग समूहों के बीच रहे और लौटते समय उन सबके मुखियाओं को पुष्पक विमान में अपने साथ लेकर अयौध्या आये। जिस प्रकार एक ही वृक्ष की शाखाएं अलग-अलग दिशाओं में फैलती हैं या उसके पके हुये फल से निकला बीज किसी दूसरे स्थान पर पनप जाता है और नया वृक्ष बन जाता है उसी समाज का विस्तार होता है। विश्व की संपूर्ण मानवता का केन्द्रीभूत विन्दु तो एक ही है । इसी भाव से भरा हुआ रामजी का आचरण और यही संदेश दीपावली की तैयारी में है। भले रामायण काल को बीते हजारों वर्ष बीत गये। दासत्व का अंधकार भी सैकड़ों साल रहा फिर भी भारतीय जीवन में यह परंपरा आज भी बनी हुई । इसीलिए दीपावली पर केवल दीपोत्सव नहीं होता, यह समूचे समाज का कायाकल्प होता है । धन से भी, श्रम से भी, परस्पर आदान प्रदान से भी और भेंट मिलाप से भी। इस प्रकार विजयदशमीं से दीपावली के बीच बीस दिन की यह अवधि संपूर्ण राष्ट्र और समाज वर्गों को परस्पर समरूप होने और एक दूसरे का पूरक बनने की बनने और बनाने की अवधि है।

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