पुस्तक समीक्षा : शब्दों की आत्मा तक पहुँचती एक विलक्षण कृति — ‘शब्द-संधान’

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मुकेश कुमार शर्मा

भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कृति और समय की सजीव चेतना भी है। इसी चेतना को स्पर्श करती है हिंदी के चर्चित लेखक, भाषाविद् और व्युत्पत्तिशास्त्री कमलेश कमल की नवीनतम और चर्चित कृति ‘शब्द-संधान’, जो प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

यह पुस्तक शब्दों के उद्गम, उनकी यात्रा, अर्थ विस्तार और समय के साथ उनके व्यावहारिक रूपांतरण की खोज है। कमलेश कमल ने विशुद्ध भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण को लोकप्रिय शैली में ढालते हुए यह सिद्ध कर दिया है कि जटिलतम भाषिक विषयवस्तु भी सामान्य पाठक तक प्रभावी रूप से पहुँचाई जा सकती है।

‘शब्द-संधान’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल भाषाविदों या शोधार्थियों की रुचि की पुस्तक नहीं है, बल्कि आम हिंदी प्रेमियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों, प्रशासकों और पत्रकारों के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। पुस्तक में प्रयुक्त उदाहरण हमारे दैनिक जीवन से लिए गए हैं, जिनके माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि कैसे शब्दों के प्रयोग में सूक्ष्म अंतर भी अर्थ का पूरी तरह परिवर्तन कर सकता है।

पुस्तक तीन खण्डों में विभाजित है। प्रथम खण्ड में 100 छोटे-छोटे अध्याय हैं, जिनमें शब्दों की व्युत्पत्ति, पर्याय, अर्थपरक विभेद, अंग्रेज़ी पर्याय इत्यादि को रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया है। दूसरे खण्ड में 07 अध्याय हैं, जिनमें शब्दों की तहों को खोलते हुए लेखक ने यह दिखाया है कि भाषा कैसे अच्छी और प्रांजल हो सकती है। तीसरे और अंतिम खण्ड में पर्यायवाची, विलोम, श्रुतिसमभिन्नार्थक इत्यादि शब्दों का वृहद् संकलन प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में शब्दों की व्युत्पत्ति, प्रयोग और भावार्थ को एक साथ समेटते हुए यह बताने का प्रयास किया है कि भाषा में शब्द का चुनाव केवल व्याकरण की दृष्टि से नहीं, भाव की गरिमा को ध्यान में रखते हुए भी किया जाना चाहिए।

प्रशंसनीय यह भी है कि कमलेश कमल ने अपने लेखन में न तो संस्कृतनिष्ठ शुद्धतावाद की कट्टरता अपनाई है और न ही आधुनिक भाषिक विकृतियों को स्वीकार किया है। वे भाषिक समृद्धि के पक्षधर हैं, जहाँ भाषा दूसरी भाषाओं और लोक से भी जुड़ी रहे और शुद्धता तथा व्याकरणिक मानकों की गरिमा भी बनाए रखे। यही विरल संयोग ‘शब्द-संधान’ को समकालीन भाषिक विमर्श में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

प्रकाशन की दृष्टि से पुस्तक का मुद्रण, आवरण और संयोजन अत्यंत स्तरीय है। प्रभात प्रकाशन ने एक गंभीर विषय को जनसुलभ बनाने वाले लेखक के इस प्रयास को उचित गरिमा प्रदान की है। संक्षेप में कहा जाए तो ‘शब्द-संधान’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भाषिक सामर्थ्य को बढ़ाने वाली बहुमूल्य कृति है। 300 पृष्ठों की यह कृति हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो शब्दों से सरोकार रखता है—चाहे वह लेखक हो, विद्यार्थी हो, शिक्षक हो या सामान्य पाठक।

अपना इतिहास नहीं जानोगे तो अपने को पहचानोगे कैसे?

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महान शूरवीर राणा सांगा को “राष्ट्र अधिनायक” और उनके पूर्वज बाप्पा रावल को “मध्ययुग का राष्ट्रपिता” घोषित किया जाना चाहिए!

औरंगज़ेब को लेकर ही विवाद थमा नहीं था कि अब सोलहवीं सदी के राजा राणा सांगा को लेकर भी विवाद शुरू हो गया, इस बार ये विवाद शुरू किया है समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन ने, जिन्होंने राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान राणा सांगा को गद्दार बता दिया । बयाना में जहां राणा सांगा ने बाबर को हराया था, उस जगह को पूछने वाला कोई नहीं है। जिस ऐतिहासिक किले पर राणा सांगा ने कब्ज़ा किया था, वो खंडहर हो रहा है, बस एक साइनबोर्ड ही दिखता है, जो बता रहा है कि यहीं बयाना की ऐतिहासिक लड़ाई हुई थी । राजनीति करने तो सब आ रहे हैं, लेकिन राणा सांगा की विरासत को यादगार बनाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा। राणा सांगा ने लोदी सहित सभी समकालीन सुल्तानों को हराया था, तो उन्हें बाबर को भारत आमंत्रित करने कि आवश्यकता ही नहीं थी। यह दौलत खान लोदी ही था जिन्होंने बाबर को भारत आमंत्रित किया था। पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी, दिल्ली के अंतिम लोदी सुल्तान इब्राहिम लोदी के चाचा थे और इब्राहिम के पतन में एक प्रमुख व्यक्ति थे, जिन्होंने अंततः बाबर को आक्रमण करने और उसे उखाड़ फेंकने के लिए आमंत्रित किया था ।

वामपंथी इतिहासकारों का दावा है कि राणा सांगा 16 मार्च 1527 को खानवा की लड़ाई हार गए थे, लेकिन सच्चाई यह है कि राणा सांगा ने युद्ध के मैदान में पहली बार तोपों के हमलों का सामना करने के बावजूद यह लड़ाई जीती थी और उसके बाद बाबर ने राणा सांगा को जहर देने की साजिश रची थी क्योंकि बाबर लड़ाई हारने के कारण राणा सांगा के साथ बातचीत में कमजोर पड़ रहा था था। वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को विकृत किया है। भारतीय डीप स्टेट इतिहासकारों द्वारा की गई गलतियों को सुधारने के लिए इतिहास बोर्ड बनाने के लिए राष्ट्रवादी भावना को वापस लाने का समय आ गया है। यही कारण है कि किसी देश के इतिहास को बदनाम करने का सबसे पक्का तरीका उसके प्रमुख नायकों के वर्ग को बदनाम करना है – नायक और नायिकाएँ जिन्होंने कभी सांस्कृतिक और राजनीतिक मुक्ति के लिए बलिदान देने की अपनी क्षमता से देश का प्यार और सम्मान अर्जित किया था। उन पर छल, अहंकार, अंधराष्ट्रवाद और विश्वासघात का आरोप लगाओ – इस प्रकार नायकों को खलनायक बना दो, और बस! वामपंथी इतिहासकार लोगों की ऐतिहासिक धारणा को उलटने में सफल रहे हैं। वामपंथी इतिहासकार इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। उन्होंने भारतीय लोगों की ऐतिहासिक धारणा को विकृत करने के लिए इस उपकरण का उदारतापूर्वक इस्तेमाल किया है – खासकर राणा सांगा जैसे हमारे राष्ट्रीय नायकों को निशाना बनाकर।

जिन लोगों का अपना इतिहास नहीं है, वे वोट की राजनीति के निहित स्वार्थ के लिए राणा सांगा की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें समाज से बहिष्कृत कर देना चाहिए और संसद को हमारे राष्ट्रीय नायकों के गौरव को बनाए रखने के लिए कानून बनाना चाहिए जिसके वे हकदार हैं। राणा सांगा के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। संग्राम सिंह, जिन्हें आमतौर पर राणा सांगा के नाम से जाना जाता है, 1508 से 1528 तक मेवाड़ के राणा थे। सिसोदिया राजवंश के सदस्य, उन्होंने चित्तौड़ को अपनी राजधानी के साथ वर्तमान राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को नियंत्रित किया। उनके शासनकाल की उनके कई समकालीनों ने प्रशंसा की, जिनमें प्रथम मुगल सम्राट बाबर भी शामिल था, जिन्होंने उन्हें उस समय का “सबसे महान भारतीय शासक” बताया था

अपने सैन्य करियर में, सांगा ने अठारह भीषण युद्धों में दिल्ली, मालवा और गुजरात के सुल्तानों को हराया और वर्तमान राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त करके अपने क्षेत्र का विस्तार किया। उन्होंने हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अमरकोट, सिंध के कुछ हिस्सों पर भी नियंत्रण किया। राजगद्दी पर बैठने के बाद, सांगा ने कूटनीति और वैवाहिक गठबंधनों के माध्यम से राजपूताना के युद्धरत कुलों को फिर से एकजुट किया। राणा सांगा को तराइन की दूसरी लड़ाई के बाद पहली बार कई राजपूत शासकों को एकजुट करने और बाबर की हमलावर सेनाओं के खिलाफ़ मार्च करने का श्रेय दिया जाता है। सांगा ने करीब 100 लड़ाइयाँ लड़ी थीं और उनमें से एक भी नहीं हारी।

भारत के लोग भारत पर इस्लामी आक्रमण को रोकने के लिए राणा सांगा और उनके पूर्वज बप्पा रावल के ऋणी हैं। सिंध में अरबों का शासन स्थापित हो जाने के बाद जिस वीर ने उनको न केवल पूर्व की ओर बढ़ने से सफलतापूर्वक रोका था, बल्कि उनको कई बार करारी हार भी दी थी, उसका नाम था बप्पा रावल। जब अरबों का पहला आक्रमण सिंध में हुआ और सिंध के राजा दाहिर की हत्या करके आक्रमणकारी राजा दाहिर की पुत्री को उठाकर ले गए उस समय भारतीय इतिहास के लिए यह एक दुर्दांत घटना थी। यहां युद्ध होते थे, हार- जीत भी होती थी लेकिन उसके बाद औरतो के साथ जीता हुवा राजा सम्मान पूर्वक पेश आता था। इस घटना से विचलित होकर बप्पा रावल ने राजस्थान के आस – पास के राजाओ को एकत्रित कर अरबो को खदेड़ते हुए अरब तक ले गए। लौटने के क्रम में उन्होंने जगह -जगह अपनी चौकी स्थापित की और वहां पर चौकीदार नियक्त किया। इसके कारन अगले लगभग ४५० वर्षो तक अरब से भारत पर कोई आक्रमण नहीं हुआ। इस प्रकार लगभग ४५० – ५०० वर्षो तक भररत के सीमा की सुरक्षा बप्पा रावल के पराक्रम और दूरदर्शित से मिली।

राणा सांगा और बप्पा रावल के योगदान को देखते हुए भारत सरकार को उन्हें क्रमशः “राष्ट्र अधिनायक” और “मध्यकालीन भारत का पिता” घोषित करना चाहिए।

ITALIAN CINEMA & ARCHEOLOGY: HERITAGE & DEMOCRACY

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New Delhi – The Humayun’s Tomb Museum Auditorium recently hosted an intellectually stimulating evening that brought together filmmakers, historians, archaeologists, and cultural enthusiasts for a profound discussion on Heritage & Democracy. The event, presented by the Italian Embassy Cultural Centre in collaboration with the Aga Khan Trust for Culture (AKTC) and showcased acclaimed Italian filmmaker Milo Adami’s documentaries—Appia Antica and Mirabilia Urbis. These screenings were followed by a compelling public talk that delved into the intersection of cinema, archaeology, and the role of heritage in shaping democratic consciousness.

The panel discussion featured eminent personalities, including film director Milo Adami, renowned Italian actor Giuseppe Cederna, Ratish Nanda (Director, Aga Khan Trust for Culture), Jyotsna Lall (Director, AKTC Programmes), and Biraj Patnaik (Director, National Foundation for India). The discussion was moderated by Andrea Anastasio (Director, Italian Embassy Cultural Centre). It revolved around how archaeological heritage plays a crucial role in fostering public awareness and how cinema serves as a powerful medium to communicate the significance of preserving history.

Milo Adami’s films provided an insightful lens into the layered narratives of heritage conservation, urban archaeology, and the transformation of public spaces. His documentary Mirabilia Urbis particularly resonated with the audience, as it highlighted the invisible yet deeply embedded cultural heritage within modern cityscapes. Giuseppe Cederna, known for his compelling performances and his advocacy for cultural preservation, offered a unique perspective on the symbiotic relationship between storytelling and tangible heritage, evoking the efforts of his journalist father Antonio Cederna— a fundamental figure in the history of the Italian environmentalism and the defense of the Italian cultural heritage.

Ratish Nanda emphasized how the Aga Khan Trust for Culture has been at the forefront of heritage restoration, particularly in India, where projects such as the restoration of Humayun’s Tomb and other UNESCO World Heritage sites have played a pivotal role in reviving historical spaces. Jyotsna Lall talked about the Nizamuddin Urban Renewal Initiative – an Aga Khan Historic Cities Programme for the AKTC. Biraj Patnaik emphasized the need for fighting against all kinds of cultural erasures.

Masterclass by Marco Tullio Giordana at Ambedkar University

As part of the Heritage International Film Festival (HIFF) 2025, another highlight of the week was a directing masterclass by legendary Italian filmmaker Marco Tullio Giordana at the Dr B R Ambedkar University Delhi. Known for his seminal works such as The Best of Youth, Giordana provided invaluable insights into his craft, influences, and cinematic philosophy. Drawing from the works of Dante Alighieri, Roberto Rossellini, Vittorio De Sica, Ingmar Bergman, and Valerio Zurlini, he spoke about the deep interconnections between literature, realism, and visual storytelling.

The masterclass was attended by aspiring filmmakers, film students, and cinema lovers eager to learn from Giordana’s rich experience in the industry. He elaborated on the art of constructing historical narratives with emotional depth, the balance between realism and dramatization, and the importance of revisiting historical events through a contemporary lens.

Workshop by Celine Pozzi

Also, as part of the Italian Focus at HIFF 2025, a special workshop was conducted by Céline Stéphanie Pozzi from the Cineteca di Bologna, offering an in-depth exploration of film restoration and preservation, at the India Habitat Centre. The session focused on the restoration of Vittorio De Sica’s films and the challenges of preserving the original elements of Satyajit Ray’s Apu Trilogy, while also delving into the advanced restoration techniques practiced at L’Immagine Ritrovata. With over two decades of experience, Pozzi—who has played a key role in digital restoration and international film preservation training—shared insights from her work at FIAF Film Restoration Schools and her expertise in analog and digital restoration workflows.

A Landmark Celebration of Heritage and Cinema

Both events—Cinema & Archaeology: Heritage & Democracy and Marco Tullio Giordana’s Masterclass—were significant contributions to the dialogue on heritage conservation, cinema’s transformative power, and the cultural bridges between India and Italy. They reaffirmed the role of cinema as not just entertainment but as an essential medium for historical consciousness, democratic values, and cultural preservation.

The screenings, discussions, workshop, and the masterclass marked a successful cultural exchange, leaving attendees with a deeper appreciation of the power of storytelling in shaping public awareness and preserving history.

सरकारों की उदासीनता और उपेक्षा से आगरा का पर्यावरणीय पतन

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भारत के दिल में, जहाँ ताजमहल की भव्य छवि नील गगन को छूती है, वहाँ एक कड़वी सच्चाई इस ऐतिहासिक गुंबद के साए में पनप रही है।
आगरा, जो कभी संस्कृति और पर्यावरण का प्रतीक था, आज शासन की विफलता का एक भयावह उदाहरण बन चुका है—इसकी खूबसूरती को उन्हीं हाथों ने धोखा दिया है जो इसे बचाने के लिए जिम्मेदार थे। मंत्री, सांसद, विधायक, मेयर, पार्षद सब जिता के भेजे, लेकिन शासकीय दल की प्राथमिकताओं में शहर आगरा कभी नहीं रहा। उधर जोर दार शुरुआती पहलों के बाद, न्यायपालिका भी बोर हो गई। यानी एक फलता फूलता जीवंत शहर प्रदूषण के खिलाफ जंग में उजड़ गया। बदले में भरपाई नहीं हुई।

पर्यावरणविद कहते हैं, गर्मी शुरू होते ही जहरीली धुंध से भरी हवा गले में सांप की तरह लिपटती है, और यमुना—जो कभी जीवनदायिनी नदी थी—अब एक विषैले कीचड़ में तब्दील हो चुकी है, जो सरकारी उपेक्षा का प्रतिबिंब है।

डॉ देवाशीष भट्टाचार्य के मुताबिक, “शाम ढलते ही शहर पर एक धुंध छा जाती है, जो दिन को रात में बदल देती है—प्रदूषण का एक घातक बादल, जो आसमान में मंडराता रहता है। इतिहास की मधुर खुशबू अब सड़ांध और निराशा के तीखेपन में डूब चुकी है। कभी हरे-भरे पार्क अब वीरान हैं, उनकी हरियाली ऐसे छीन ली गई है जैसे किसी पुराने कैनवास से रंग उखड़ गया हो। बाजारों की रौनक, जो कभी हँसी और जीवंतता से भरी होती थी, अब सिर्फ एक सूनी गूँज बनकर रह गई है—जहाँ नागरिक एक जहरीले अस्तित्व की क्रूर हकीकत से जूझ रहे हैं।”

यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक छल है। दशकों के न्यायिक हस्तक्षेप और नौकरशाही के वादों के बावजूद, आगरा का पर्यावरण लगातार बदतर होता गया। जहाँ ताजमहल प्रेम का प्रतीक था, आज वह भारत की पर्यावरणीय विफलता का मूक साक्षी बन चुका है।

टूटे हुए वादों की विरासत

1993 में, पर्यावरणविद् एम.सी. मेहता की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 10,000 वर्ग किमी के ताज ट्रैपेज़ियम जोन (TTZ) को बचाने के लिए सख्त निर्देश जारी किए। तीन दशक बाद भी, मुख्य आदेश कागजों तक ही सीमित हैं। कोर्ट ने हरित बफर जोन, स्वच्छ हवा और यमुना के पुनर्जीवन की जो तस्वीर बनाई थी, वह एक क्रूर मजाक बनकर रह गई है।

हवा जहर बन चुकी है – गर्मियों में SPM (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) का स्तर 600 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के पार चला जाता है, जो सुरक्षित सीमा से छह गुना अधिक है।

सिकुड़ती हरियाली – शहर का हरित आवरण मात्र सात आठ प्रतिशत रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33% है।

वाहनों से उगलता जहर – 1980 के दशक में 40,000 वाहन थे, आज 10 लाख से अधिक—लेकिन प्रदूषण रोकने के कोई ठोस कदम नहीं। सभी प्रमुख मार्गों पर डेली घंटों ट्रैफिक जाम रहता है।

यमुना: एक मृत नदी की दुखद कहानी बनके रह गई है। जो कभी आगरा की जीवनरेखा थी, अब एक नाले में तब्दील हो चुकी है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) धोखा – ये 250 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) सीवेज साफ करने के बजाय 150 MLD भी पूरी तरह नहीं संभाल पाते, और वह भी नाले का पानी, असली सीवेज नहीं। नदी में सीधा गंदा पानी – शहर की टूटी सीवर लाइनें सीधे यमुना में गंदगी उड़ेल रही हैं, जिससे यह एक जहरीला, दुर्गंधयुक्त नाला बन गई है। सूखा नदी तल – यमुना का बहाव खत्म हो चुका है, हरित आवरण के अभाव में राजस्थान से आने वाली धूल भरी हवाएँ सीधे शहर में घुस रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिमी इलाकों में पेड़ लगाने का आदेश दिया था, ताकि धूल रोकी जा सके। लेकिन इसके बजाय, बिल्डरों ने तालाबों, पार्कों और नदी के किनारों पर अतिक्रमण करके मॉल और अवैध निर्माण खड़े कर दिए। आगरा की आखिरी बची हुई जल संरचनाओं को भी पाट दिया गया और ऐतिहासिक इमारतों को अवैध निर्माणों ने घेर लिया।

प्रदूषण नियंत्रण झूठ – करोड़ों रुपये स्वच्छ हवा” योजनाओं पर खर्च हुए, लेकिन उद्योगों का धुआँ, वाहनों का जहर और निर्माण धूल बेरोकटोक जारी है।
ताजमहल, एक यूनेस्को विश्व धरोहर, उन्हीं की बेरुखी से परेशाँ है जो इसे बचाने के लिए जिम्मेदार हैं। यह भारत की पर्यावरण नीतियों की असफलता का प्रतीक है।

अब क्या करना चाहिए?

पारदर्शी जाँच – आगरा में खर्च किए गए पर्यावरणीय फंड्स की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करो – अवैध निर्माण रोको, जलाशयों को पुनर्जीवित करो, प्रदूषण नियमों को सख्ती से लागू करो।

जवाबदेही तय करो – दशकों की विफलता के लिए अधिकारियों और एजेंसियों पर मुकदमा चले।

आगरा का पर्यावरणीय पतन एक अनिवार्य त्रासदी नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा का सीधा नतीजा है। अगर यह विश्वासघात जारी रहा, तो ताजमहल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत के पर्यावरणीय विनाश का स्मारक बनकर रह जाएगा।

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