‘राष्ट्रनिष्ठ – शुचितापूर्ण पत्रकारिता के प्रखर स्तम्भ गणेश शंकर विद्यार्थी’

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~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

स्वातन्त्र्य आन्दोलन के क्रान्तिकारी सम्पादक पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने अपने समूचे जीवन को स्वतन्त्रता की बलिवेदी को होम कर दिया। वे राष्ट्र धर्म का निर्वहन करते हुए लेखनी व आन्दोलन के दोनों मोर्चों में निर्भीक योध्दा की भांति डटकर खड़े थे। नवम्बर 1913 को उनके द्वारा साप्ताहिक प्रताप के प्रथमांक में ‘कर्मवीर महाराणा प्रताप’ शीर्षक से लिखे गए लेख की यह पँक्ति उनके सर्वोच्च आदर्श को प्रतिबिम्बित करती है — “ जो सिर स्वतन्त्रता देवी के सामने झुका, याद रखो, उसे अधिकार नहीं कि संसार की किसी शक्ति के सामने झुके।”

फिर उनकी लेखनी और ध्येयनिष्ठा ने क्रांतिकारी विचारों का चारों ओर अथाह प्रवाह निर्मित कर दिया। पत्रकारिता में उनके आदर्श को खड़ा करने में – ‘कर्मयोगी’ पत्र के सम्पादक पं. सुन्दरलाल और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी की भूमिका थी। उन्होंने जहाँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य में हिन्दी भाषा के संस्कार सीखे। वहीं पं.सुन्दरलाल से ‘कर्मयोगी’ की भाँति ही राष्ट्र एवं समाज के उत्थान व स्वातन्त्र्य के लिए विचारों का प्रखर स्वर अपनाया। और उनके ये तेवर महामना पं मदनमोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ में भी निरन्तर परिष्कृत होते रहे। तत्पश्चात नौ नवम्बर 1913 को कानपुर से शुरू हुए ‘प्रताप’ की अठारह वर्षों तक चली ‘स्वातन्त्र्य यात्रा’ में यह क्रम दिनानुदिन अपने तीव्र वेग को प्राप्त करता गया। उनकी पत्रकारिता का ध्येय सुस्पष्ट था – वह ध्येय था स्वाधीनता के महत् उद्देश्य को प्राप्त करना । और समाज के वंचित – पीड़ित, उपेक्षितों की आवाज़ बनना। किसान – मजदूरों को न्याय दिलाना। चाहे इसके दोषी ब्रिटिश हुक्मरान रहे हों, याकि देशी रियासतों के राजा- रजवाड़े। याकि शोषणकारी सामन्त।

विद्यार्थी जी ने जिस मुखरता के साथ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध पत्रकारिता को जन आन्दोलन बनाया। उसी तरह उन्होंने – भारतीय समाज में व्याप्त रुढ़ियों, कुरीतियों एवं समस्याओं पर तीखे तेवर में अपनी कलम चलाई। और समाज को आत्मचिंतन के लिए झकझोर कर रख डाला था।
पत्रकारिता के आदर्श एवं दायित्वबोध को लेकर वे बेहद सजग एवं स्पष्टवादी थे। सन् 1930 में उन्होंने लिखा था — “पत्रकार की समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है, वह अपने विवेक के अनुसार अपने पाठकों को ठीक मार्ग पर ले जाता है, वह जो कुछ लिखे प्रमाण और परिणाम काविचार रखकर लिखे, और अपनी गति-मति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहे। पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं है, लोक सेवा उसका ध्येय है।”

उनकी यही प्रखर विचार रश्मि ने उन्हें इतना क्रान्तिकारी बना दिया था कि – उन्होंने सत्य को आधार बनाकर राष्ट्र के प्रति असंदिग्ध श्रध्दा एवं समर्पण के साथ गतिमान रहे। उन्हें कोई भी परिस्थितियां – कभी भी उनके कर्त्तव्यपथ सू विचलित न कर सकीं। उनके ओजस्वी विचारों से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने सुनियोजित ढंग से उन्हें गिरफ्तार किया। जेल की यातनाएं दी। लेकिन विद्यार्थी जी ‘लोकसेवा-राष्ट्रसेवा’ का लक्ष्य लिए निरन्तर गतिशील बने रहे। प्रताप में उनके जाज्वल्यमान क्रान्तिकारी तेवरों पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा था —“उनके उग्र लेख देखकर मैं कभी-कभी कांप उठता था।’ मगर ओज और सत्याग्रह ही ‘प्रताप’ और संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की ज्वलंत पहचान थी। लप्पो-चप्पो का स्वर उसके चरित्र के लिए सर्वथा विजातीय था। सतेज सत्य के बल पर ही ‘प्रताप’ लोकप्रियता के उत्कर्ष पर पहुंचा था और उसकी लोकप्रियता का स्तर यह था कि हिंदी भाषी प्रदेश की जनता ‘समाचारपत्र का अर्थ’ केवल ‘प्रताप’ ही समझती थी । और यह धारणा गणेशशंकर के लोकमानस के प्रतिनिधित्व करने के सामर्थ्य को दर्शाती है। ”

प्रसिद्ध पत्रकार रहे मुकुटबिहारी वर्मा ने भी गणेश शंकर विद्यार्थी जी की गौरवपूर्ण राष्ट्रपरक विशद् विचार दृष्टि पर लिखा – “ ‘प्रताप’ के लिए पत्रकारिता व्यवसायपरक नहीं लोक-कल्याणार्थ थी। इसीलिए आर्थिक प्रलोभनों से मुक्त रहते हुए अन्याय-अत्याचार के खिलाफ सब तरह के बलिदान के लिए वह तैयार रहा। फलत: कई रियासतों में उस पर प्रतिबंध लगे, तरह- तरह की धमकियां दी गईं और मुकदमे भी चले। साथ ही अर्थ प्रलोभन भी उसके सामने आए। पर वह बिना झुके और बगैर प्रलोभन में आए अपने रास्ते चलता रहा; यहां तक कि उन लोगों पर हुए अन्याय के विरुद्ध भी उसने अपनी आवाज उठाई जिनके अन्याय के खिलाफ वह लड़ रहा था और खुद जिनके अन्याय का शिकार था।”
देश के जातीय स्वाभिमान पर आधारित उनकी अग्निधर्मी लेखनी ने अपनी परिपाटी का सृजन किया। और राष्ट्रीय परिदृश्य के प्रत्येक घटनाक्रमों एवं विषयों को मुखरता के साथ उठाया। उन्होंने राष्ट्र की चेतना को जागृत करने के लिए विचारों का ज्वार उत्पन्न किया। यह उनकी उसी राष्ट्रनिष्ठा का परिणाम था कि — जिस प्रकार लोकमान्य तिलक जी द्वारा सम्पादित ‘मराठा’ एवं ‘केसरी’ ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता का श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। उसी प्रकार विद्यार्थी जी द्वारा सम्पादित ‘प्रताप’ ने हिन्दी भाषा में राष्ट्रवादी पत्रकारिता में अपनी अनन्य प्रतिष्ठा पाई। और जन- जन की आवाज़ के रूप में जाना जाने लगा। विद्यार्थी जी की ‘स्वराज्य’ विषयक विचार दृष्टि का दर्शन ‘प्रताप’ में 14 जुलाई 1924 के ‘स्वराज्य किसके लिए?’ शीर्षक से लिखे लेख के अंश से मिलता है —
“इस युग में, केवल भारतवर्ष के करोड़ों नर-नारियों के ललाट पर ये शब्द नहीं हैं कि जब सब आजाद होंगे तब तुम्हीं गुलाम बने रहोगे, तुम्हारी राह में रोड़े अटकाएंगे और तुम्हें अज्ञान और अंधकार में रखेंगे। यदि सचमुच इस देश के भाग्य में ही बदा है, तो हम यहीं कहेंगे, हमें स्वराज्य नहीं चाहिए। हमारे करोड़ों भाई, यदि गुलामी के बंधन में जकड़े हुए हैं, यदि वे अज्ञान और अंधकार में पड़े हैं, यदि उन्हें पेट भर खाने को नहीं मिलता और पहनने भर को कपड़ा, यदि उन्हें रहने के लिए जगह नहीं मिलती और चलने के लिए राह तो—उस दिशा की ओर जिधर हमारे इने-गिने आदमी सुख से समय बिताते हों और प्रभुता के अधिकारी बने हुए हों-उधर हम अपना मुंह भी नहीं करना चाहते। हम तो उसी ओर जाएंगे, उसी ओर रहेंगे-सड़ने, घुटने, और गुमनामी में मर जाने तक के लिए जिधर हमारे शरीर, हमारे हृदय, हमारे दीन-हीन और पीड़ित करोड़ों भाई होंगे। उस दुःख में एक शांति होगी, और उस सुख में करोड़ों के कंकाल पर भोगे जाने वाले थोड़े से आदमियों के उस सुख में- एक गहरी ग्लानि।”

उपर्युक्त उद्धृत अंश से यह सुस्पष्ट होता है कि – विद्यार्थी जी केवल ‘राजनैतिक स्वतन्त्रता ‘ की भी बात नहीं कहते थे। बल्कि उनकी दृष्टि में ‘स्वाधीनता’ यानी ‘स्वराज्य’ अर्थात् — भारतीय जनमानस के सर्वांगीण विकास एवं कल्याण के लिए वे प्रतिबद्ध थे। विद्यार्थी जी लोकमान्य तिलक के प्रखर – मुखर राष्ट्रवादी विचारों के पक्षधर थे। लेकिन दूसरी ओर महात्मा गाँधी की ‘अहिंसा’ की अवधारणा पर भी उतना ही विश्वास रखते थे। इतना ही नहीं गांधीजी के प्रति उनकी निष्ठा ‘सत्याग्रह’ आन्दोलन के दौरान सर्वाधिक मुखरता के साथ देखने को मिली थी। उनके सम्पादन में ‘प्रताप’ ने सत्याग्रह आन्दोलन को‌ लेकर व्यापक जनचेतना का प्रसार किया था। याकि फिर बात देश के किसानों या मजदूरों की हो ; उन्होंने भारत के कृषक व श्रमिक – इन दोनों वर्गों के लिए भी अपनी लेखनी और आन्दोलन दोनों से लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने किसानों पर होने वाले अत्याचारों के लिए रियासतों के राजाओं, सामंतों एवं अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोला। होमरुल आन्दोलन के समय ही कानपुर में मिल मालिकों के विरुद्ध हुई हड़ताल का गणेश जी ने नेतृत्व किया था। इसमें 25000 की संख्या में मजदूर शामिल थे। वहीं बिहार के चम्पारण में अंग्रेजों द्वारा किसानों के शोषण के विरोध में जब गांधी जी वहां पहुंचे। तब प्रताप ने उस मुद्दे को उठाया। रायबरेली के निरंकुश जमींदार वीरपाल सिंह द्वारा किसानों पर गोली चलवाने की घटना को — उन्होंने ‘प्रताप’ में विस्तार से प्रकाशित किया था। इसी के चलते अंग्रेज सरकार व वीरपाल सिंह द्वारा सुनियोजित ढंग से उन पर मानहानि का मुकदमा दर्ज किया गया था। इसमें उन्हें आठ महीने की सजा हुई थी।

वे किसानों से जुड़े हुए ब्रिटिश सरकार के दमनकारी – शोषणकारी निर्णयों का निरन्तर निर्भीकतापूर्वक प्रतिकार करते थे। वे स्वयं को एक पत्रकार या राजनेता के स्थान पर गर्वपूर्वक ‘किसान’ कहा करते थे। किसानों – मजदूरों के सच्चे हितचिन्तक के रूप में वे प्रसिद्ध हो चुके थे। उनकी हत्या के बाद एक श्रद्धांजलि सभा में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जी ने विद्यार्थी जी के विषय में कहा था —“आज उस दीनबंधु के लिए किसान रो रहे हैं। कौन उनकी उद्गार-ज्वाला को शांत करने के लिए स्वयं आग में कूद पड़ेगा? मजदूर पछता रहे हैं, कौन उन पीड़ितों का संगठन करेगा, मवेशीखाने से भी बदतर देशी राज्यों के निवासी अश्रुपात कर रहे हैं, कौन उनका दुखड़ा सुनेगा और सुनाएगा? राजनीतिक कार्यकता रो रहे हैं, कौन उन्हें आश्रय देकर स्वयं आफत में फंसेगा? कौन उनके कंधे से कंधा मिलाकर स्वातंत्र्य संग्राम में चलेगा? और एक कोने में पड़े हुए उनके पत्रकार बंधु भी अपने को निराश्रित पाकर चुपचाप चार आंसू बहा रहे हैं। आपातकाल में कौन उन्हें सहारा देगा, किससे वे दिल खोलकर बात कहेंगे, किसे वे अपना बड़ा भाई समझेंगे, और कौन छुटभइयों का इतना खयाल करेगा ?”

उन्होंने ‘प्रताप’ में उस समय चलने वाली मुस्लिम तुष्टिकरण की निरन्तर भर्त्सना करते थे। और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए उन्होंने इस बात पर जोर डाला था कि – मुसलमानों को अपने मूल यानि भारतीय संस्कृति पर आधारित रास्ते में चलना चाहिए। हिन्दू – मुस्लिम समस्या पर वे अत्यन्त स्पष्ट थे। वे दूरदर्शी थे। अतएव उन्होंने प्रताप में लिखा था — “शुभ होगा वह दिन तब इस देश के मुसलमान यह समझने लगेंगे कि हमारा नाता इस देश के हिंदुओं से तुर्कों और काबुलियों की अपेक्षा अधिक बड़ा और स्वाभाविक है, और जब वे उसी प्रकार जिस प्रकार रोम और ग्रीस के वर्तमान ईसाई, निवासी अपने गैर-ईसाई पूर्वजों की कीर्ति और कला को अपनाते हैं, भारतवर्ष की प्राचीन कीर्ति एवं कला को अपनाने लगेंगे।”

वे जिस साम्प्रदायिक तुष्टिकरण के विरुद्ध लड़ते रहे। बाद में उसी तुष्टिकरण एवं मुस्लिम हठधर्मिता ने देश को विभाजन की त्रासदी में झोंका। और नरसंहार की विभीषिका से देश को रक्त रंजित कर दिया। इतना ही नहीं गणेश शंकर विद्यार्थी जी की हत्या भी कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में अज्ञात धर्मांध मुसलमानों द्वारा 25 मार्च 1931 को की गई थी। जबकि विद्यार्थी जी दंगे से हिन्दू – मुसलमानों को सुरक्षित लाने में जुटे हुए थे।

विद्यार्थी जी की पत्रकारिता के कई आयाम थे। वे हिन्दी के प्रति विशेष निष्ठा रखते थे। यह बात कम लोगों को ही पता होगी मुंशी प्रेमचंद को उर्दू से हिन्दी की ओर लाने में विद्यार्थी जी का ही अतुलनीय योगदान था। इस तथ्य की पुष्टि इस बात से होती है कि – मुंशी प्रेमचंद की पहले -पहल कई कहानियां 1920 —1925 के दौरान ‘प्रभा’ में ही प्रकाशित हुईं थी। इस समय ‘प्रभा’ कानपुर से ‘प्रताप’ प्रेस से प्रकाशित होती थी। 1929 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए विद्यार्थी जी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के विषय में कहा था — “हिंदी राष्ट्रभाषा बने, इसका यह अर्थ कदापी नहीं कि हिंदू हिंदू होने के नाते हिंदी सीखें। मेरे लिए तो हिंदी एक संस्कृति की प्रतीक है और केवल हिंदी के द्वारा ही बिखरे हुए भारत में एकत्व की भावना भरी जा सकती है और सबको एक सूत्र में आबद्ध करने का हिंदी एकमेव साधन है।”

इसी तरह उन्होंने राष्ट्र के स्वत्वबोध को जगाते हुए राष्ट्र भाषा के सन्दर्भ में कहा था—

“ राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। विजयी लोगों की विजय-गति विजित के जीवन के प्रत्येक विभाग पर अपनी श्रेष्ठता की छाप लगाने का सतत प्रयत्न करती है। स्वाभाविक ढंग से विजितों की भाषा पर उनका सबसे पहले वार होता है । भाषा जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता।विजितों के मुंह से निकली हुई विजयी जनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिह्नानी है- पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है।”

वे पत्रकारिता को देश सेवा का सबसे अच्छा माध्यम मानते थे। उनकी पत्रकारिता के सिद्धान्त सत्यनिष्ठा, राष्ट्रनिष्ठा, स्वदेशी एवं स्वराज्य की संकल्पना पर आधारित थे। उनके ध्येय में भारतीय समाज का उत्थान एवं स्वाधीनता की चैतन्यता थी। उन्होंने भारतीय समाज की ‘न्यासत्व’ की पध्दति को ‘प्रताप’ में अपनाया। और ‘प्रताप ट्रस्ट’ का गठन किया था। 15 मार्च 1919 को रजिस्टर्ड प्रताप ट्रस्ट में पाँच सदस्य थे — गणेश शंकर विद्यार्थी, शिवनारायण मिश्र ‘वैद्य’, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. जवाहरलाल रोहतगी और लाला फूलचंद। विद्यार्थी जी की पत्रकारिता में ‘प्रताप’ की यात्रा के साथ – पं.माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल, श्रीराम शर्मा, देवव्रत शास्त्री, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य और युगल किशोर सिंह शास्त्री इत्यादि का नाम प्रमुख सहयोगी पत्रकारों के रूप में जाना जाता है।

सरस्वती से अभ्युदय एवं तदुपरान्त ‘प्रताप’ व ‘प्रभा’ के माध्यम से उन्होंने भारतीय पत्रकारिता की क्रान्तिकारी धुरी का निर्माण किया। और स्वातन्त्र्य समर में भारतीय चेतना को जागृत करने के अभूतपूर्व पुरुषार्थ को उन्होंने निभाया। 18 वर्ष के प्रतापी ‘प्रताप’ ने भारत को ‘स्वत्व-स्वाभिमान- स्वदेशी – स्वराज्य – स्वाधीनता एवं स्वधर्म ‘ का महान पथ प्रशस्त किया। युगबोध दिशाबोध प्रदान किया। गणेश शंकर विद्यार्थी जी के अनन्य सहयोगी -मित्र दादा माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ में 28 मार्च 1935 को उनका स्मरण करते हुए लिखा —“कठिनाइयों में उन दिनों संकटों की अपेक्षा संन्यास अधिक यशस्वी होता था। गणेश जी ने इस प्रवाह को सीधा संकटों की ओर घुमा दिया। जमानतें, तलाशियां, मुकदमे, सजा-दंड देकर शासक सुखी होते, दंड पाकर गणेश गर्वीले होते क्योंकि गणेश जी संकटों में चाहे जो सोचते, किंतु सहस्र-सहस्र हिंदी भाषी, गणेश जी और ‘प्रताप’ के संकटों के साथ सोचते और सेवा के लिए प्रस्तुत रहते। पत्रकार-कला के हिंदी स्वरूप के ‘प्रताप’ नामक राष्ट्र मंच से गणेशी जी ने कायरों को, देश-घातकों को, महलों को, मुकुटों को, अत्याचारियों को और स्वार्थियों को लगातार चुनौतियां दीं और परिणाम में तलाशियां, अपमान, अर्थ हानि और कारागर सहे।”

( साहित्यकार – स्तम्भकार एवं पत्रकार)

सन्दर्भ ग्रन्थ : गणेश शंकर विद्यार्थी और स्वतन्त्रता आन्दोलन
लेखक – विष्णु कुमार राय

२. पत्रकारिता के युग निर्माता गणेश शंकर विद्यार्थी — सुरेश सलिल

कैमरा कामरा और सलेक्टिव आजादी

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बिपिन पांडेय

कुछ साल पहले जब कुणाल कामरा ने अर्नब गोस्वामी को प्लेन में हैकल किया था तो सारे वामपंथी लोगों ने उसका बीच – बचाव किया था। वरुण ग्रोवर ने समर्थन करते हुए कहा था – “अगर आपके घर में सांप निकल आए तो सांप – सांप चिल्लाने से अच्छा है कि सांप को मार दो, और उस दिन प्लेन में एक सांप तो बैठा ही था “।

आज संविधान की लाल कॉपी हाथ में लेकर कॉमेडी करने वाले कामरा ने कंगना रनौत के घर पर बुलडोजर चलने पर खुशी मनाई थी। शिव सेना के हारमोनियम संजय राउत के साथ संवाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें कंगना के घर बुलडोजर चलता देख अच्छा लगा।

अर्नब और कंगना वाले मुद्दे पर बहुतेरे बुद्धिजीवियों ने उद्धव ठाकरे की बलैया लेने का और उन्हें संविधान रक्षक बनाने का काम किया था।
समय पलटा, सरकार बदली और अब कामरा की राजनैतिक कॉमेडी के चलते जब शिव सेना में से निकली शिव सेना ने कॉमेडी स्थल पर तोड़ – फोड़ की तो वही बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार बने घूमते दिख रहे हैं ।

वामपंथियों का पुराना शगल रहा है कि वे केवल अपनी अभिव्यक्ति को ही अभिव्यक्ति मानते हैं और बाकी की अभिव्यक्ति को मानवता के लिए खतरा । इस हिपोक्रेसी के आपको हजारों उदाहरण मिल जाएंगे।

पर क्या एक लोकतांत्रिक देश में सेलेक्टिव चुप्पी और सलेक्टिव समर्थन जायज है ?

इसका एकदम सीधा उत्तर होगा – नहीं, एकदम नहीं।

कॉमेडी करने पर, किताब लिखने पर, किसी अन्य दूसरे तरीके से अभिव्यक्त करने पर हिंसा और तोड़ – फोड़ का विरोध होना ही चाहिए।
जब भी नागरिक बनाम राज्य में किसी का पक्ष लेना हो तो हमें हमेशा नागरिक के पक्ष में खड़े दिखना चाहिए। इस आधार पर मै कुणाल कामरा के खिलाफ की गई हिंसा का विरोध करता हूं।

जहां तक कुणाल कामरा के कॉमेडी की बात है तो वह एक सस्ते और गालीबाज कॉमेडियन से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं । हर तीसरी लाइन में गाली निकाले बिना खुद को अभिव्यक्त नहीं कर सकते।

पता नहीं किसी ने ध्यान दिया या नहीं पर विवादित वीडियो में ही एक जगह वो घोर असंवेदनशील बात कर रहे हैं।
वीडियो की शुरुआत में ही वे मुकेश अंबानी के बेटे के मोटापे, उनकी बहु के पतले शरीर और खोले गए अस्पताल को लेकर व्यंग करते हैं। सबको पता है कि अनंत अंबानी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से गुजर रहे हैं और चाहकर भी अपने मोटापे को कम नहीं कर सकते । ऐसे में उनके मोटापे का मजाक उड़ाया जाना कहां तक ठीक है ? निसंदेह यह घोर असंवेदनशीलता की निशानी है।

कुणाल कामरा और उनके जैसे तमाम लोग अक्सर कहते हैं कि वे सत्ता के विरोध में हैं।

पूछो कौन सी सत्ता के विरोध में हो ?

केवल केंद्र सरकार या हर राज्य सरकार ?

राज्य सरकारों के विरोध में हो तो क्या सभी राज्य सरकारों के विरोध में हो या जहां आपके पसंद की सरकार नहीं है उसके विरोध में भी हो ? ध्यान से देखने और समझने पर पता लगता है कि ये लोग उसी सत्ता का विरोध करते हैं जो कि पसंद की ना हो।

पसंद की सत्ता होने पर घर बुलडोज किए जाने पर ऑन कैमरा खुशी मनाते हैं। सांप को मार देने की बात करते हैं।

शायद इसी हिपोक्रेसी के चलते अब विभाजन रेखाएं और स्पष्ट एवं गहरी होती जा रही हैं। समय रहते चेतना होगा। अभिव्यक्ति की आजादी बचानी है, स्वतंत्रता, समानता , धर्म निरपेक्षता के लिए लड़ाई लड़नी है तो सबके लिए लड़नी होगी
खेमेबाजी से केवल और केवल नुकसान ही होगा.. बाकी जो है सो हैइये है….

स्वाधीनता आँदोलन में युवाओं की प्रेरणा और आदर्श थे

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम में ऐसे बलिदानी हुये हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन और प्राण तो देश के लिये बलिदान किये ही साथ ही युवा पीढ़ी को स्वाभिमान संघर्ष की प्रेरणा भी दी । क्राँतिकारी सरदार भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ऐसे ही बलिदानी थे । इनका बलिदान 23 मार्च को हुआ था।
इन क्राँतिकारियों का पूरा जीवन राष्ट्र के स्वत्व, स्वाभिमान और साँस्कृतिक चेतना केलिये समर्पित रहा । जब ये महान क्राँतिकारी बलिदान हुये तब भगतसिंह और सुखदेव की आयु तेइस वर्ष और  राजगुरु की आयु बाईस वर्ष थी । वे इतनी कम आयु में उन्होंने क्राँति का जो उद्घोष किया, उसकी गूँज लंदन तक हुई । इन तीनों के परिवार और परिवेश की पृष्ठभूमि राष्ट्र, संस्कृति और स्वत्व जागरण की थी। इसलिए किशोरवय से ही उनका रुझान स्वाधीनता आँदोलन की ओर हो गया था । बालवय में इनकी शिक्षा आर्यसमाज के विद्यालयों में हुई थी। उन दिनों इन विद्यालयों में निर्धारित पाठ्यक्रम के अतिरिक्त स्वत्व स्वाभिमान और साँस्कृतिक महत्व का संदेश भी दिया जाता था । पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश युवाओं को स्वाधीनता आँदोलन के प्रति रुझान का एक बड़ा कारण ये विद्यालय भी रहे । महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बलिदानी लाला लाजपत राय भी आर्यसमाज से जुड़े थे ।

 यह सही है कि भारत ने दासत्व के अंधकार की सबसे लंबी रात्रि देखी है लेकिन भारतीयों के स्वत्व का संघर्ष हर स्तर पर हुआ । लाखों प्राणों का बलिदान हुआ और परिवारों ने प्रताड़ना सही । संघर्ष की लंबी गाथा में गाँधी जी ने अहिसंक आँदोलन का एक नया अध्याय जोड़ा किन्तु चौरी चौरा काँड के बाद आँदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी । जिससे युवाओं में बैचेनी हुई और युवाओं की टोलियाँ पुनः सशस्त्र सशस्त्र आँदोलन की ओर मुड़ गईं। युवाओं का यह क्राँतिकारी आँदोलन देश के हर कोने में आरंभ हुआ । समय के साथ ऐसे क्राँतिकारी युवाओं में परस्पर समन्वय स्थापित हुआ । पंजाब से बंगाल तक क्राँतिकारी युवाओं की इन टोलियों ने उन अंग्रेज अधिकारियों को निशाना बनाने लगीं जो भारतीयों पर क्रूरतम व्यवहार के लिये कुख्यात थे । पंजाब में क्राँतिकारी आँदोलन की कमान सरदार भगतसिंह और उनकी टोली के हाथ में थी तो उत्तरप्रदेश सहित मध्यभारत की कमान चंद्रशेखर आजाद के हाथ में थी तो बंगाल की कमान क्राँतिकारी सूर्यसेन के हाथ में थी । इन आंदोलनकारियों का संपर्क पूरे देश में था और परस्पर संपर्क सूत्र भी थे । पंजाब में क्राँतिकारी आँदोलन की टोली लाला लाजपत राय से जुड़ी थी तो उत्तरप्रदेश में गणेश शंकर विद्यार्थी से तो बंगाल में सुभाषचंद्र बोस से । पंजाब  उत्तरप्रदेश और बंगाल में इस टोली ने अंग्रेजों को भारत से बाहर करने केलिये अनेक घटनाओं को अंजाम दिया फिर भी चार ऐसी बड़ी घटनाएँ घटीं जिससे लंदन तक को हिला दिया । ये घटनाएँ थीं काॅकोरी कांड, सांडर्स वध, चटगांव शस्त्रागार की लूट और असेंबली बम काँड । काॅकोरी कांड का नेतृत्व क्राँतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने किया तो चटगांव में सरकारी शस्त्रागार को लूटने की योजना का नेतृत्व क्राँतिकारी सूर्यसेन ने किया जबकि सेन्डर्स वध और, असेंबली बम काँड की योजना क्राँतिकारी सरदार भगतसिंह की थी । इन घटनाओं के बाद पूरी ब्रिटिश सरकार हिल गई थी और सरकार पूरी ताकत से क्राँतिकारी आँदोलन का दमन करने में लग गई। अभियान पूरे देश में चला । सरदार भगतसिंह की टोली से अंग्रेज सरकार सर्वाधिक आशंकित थी और इस टोली के दमन के लिये विशेष अभियान चला । इस टोली के प्रति जन सामान्य में  कितना समर्थन था और अंग्रेज सरकार कितनी आशंकित थी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि तीनों क्राँतिकारियों को फाँसी देने की तिथि 24 मार्च निर्धारित थी । लेकिन एक दिन पहले 23 मार्च को ही फाँसी दे दी गई थी ।

सेन्डर्स और चेन्नन सिंह वध

अंग्रेजी सत्ता उखाड़ फेकने के संकल्प के साथ क्राँतिकारी आँदोलन पूरे देश में आरंभ हो गया था । सरदार भगतसिंह डीएवी कॉलेज में अपने छात्र जीवन से ही इन गतिविधियों से जुड़ गए थे । पर जिन दो बड़ी घटनाओं में उनका सीधा सीधा नाम जुड़ा उनमें पहली है सेन्डर्स और चन्नन सिंह वध । इस घटना की नींव सायमन कमीशन के भारत आने पर पड़ी। अंग्रेजी सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम का दबाब करने केलिये कोई बीच का रास्ता निकालने का मार्ग बनाया ।  और विभिन्न पक्षों से बात करने एक दल भारत भेजा । इस दल के मुखिया सायमन थे इसलिए इसे “साइमन कमीशन” के नाम से जाना गया । यह दल 1928 में भारत आया । अक्टूबर 1928 को पंजाब पहुँचा। दल का विरोध किया गया । स्वतंत्रता सेनानियों का तर्क था कि इसमें कोई भ्रतीय प्रतिनिधि नहीं है । मुस्लिम लीग ने दल का समर्थन किया था । इसलिए अंग्रेज सरकार और मुस्लिम लीग के संयुक्त प्रयास से य। दल भारत के विभिन्न स्थानों पर जाकर विभिन्न संगठनों से मिलने लगा । 28 अक्टूबर को यह कमीशन लाहौर पहुँचा। प्रदर्शन आरंभ हुये । 30 अक्टूबर को प्रदर्शन का नेतृत्व लाला लाजपत राय ने किया। जुलूस पर लाठीचार्ज हुआ । दो अंग्रेज अफसरों ने लाजपत राय को लक्ष्य बनाकर बुरी तरह पीटा । लालाजी गंभीर रूप से घायल हो और इन्ही चोटों के कारण 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। लाला लाजपत राय सरदार भगतसिंह सहित पंजाब के सभी क्राँतिकारियों के आदर्श थे । क्राँतिकारियों ने लालाजी की इस क्रूरता पूर्ण मृत्यु केलिये पंजाब पुलिस उपअधीक्षक स्काॅर्ट और एक अन्य पुलिस अधिकारी सांंडर्स को जिम्मेदार माना और बदला लेने का प्रण किया । क्राँतिकारी चन्द्र शेखर आजाद, सरदार भगतसिंह और अन्य ने मिलकर योजना बनाई । दोनों अधिकारियों की गतिविधियों का अध्ययन करने केलिये टीम जुटाई और दोनों को दंडित करने के लिये 21 दिसम्बर 1928 का दिन निश्चित  हुआ । निर्धारित तिथि और समय पर सभी क्राँतिकारी एकत्र हुये और सभी ने अपना अपना मोर्चा संभाल लिया । इस टोली में चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू समेत कोई छै क्राँतिकारी थे । कुछ अन्य उन साधनों के साथ आसपास एकत्र थे कि सबको सुरक्षित निकाला जा सके । सामान्य तया ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स और उपपुलिस अधीक्षक जेम्स स्काॅर्ट साथ साथ निकला करते थे । लाला लाजपत राय की पिटाई का आदेश स्काॅर्ट ने दिया था और सेन्डर्स ने लाठियाँ चलाईं थीं। इसलिये दोनों को मारने का निर्णय हुआ था । पर उस दिन अकेला सेन्डर्स निकला । राजगुरू ने गोली चलाई, निशाना सटीक लगा और सेन्डर्स ढेर हो गया ।

सॉन्डर्स को मारने के बाद यह डीएवी कॉलेज के प्रवेश द्वार से होकर जाने लगा । लेकिन सिपाही चेन्नन सिंह ने पीछा किया । उसे भी गोली मारकर ढेर कर दिया गया और सभी क्राँतिकारी सुरक्षित निकल गये । बाद में इस प्रकरण में कुल 21 लोग गिरफ्तार हुये ।

 दिल्ली असेंबली बम कांड

  8 अप्रैल,1929 को दिल्ली असेंबली में हुये बम काँड का उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था । यह जन जागरण के लिये किया गया था । लेकिन इसकी गूंज पूरी दुनियाँ में हुई । सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त की जोड़ी ने कम तीव्रता एवं तेज आवाज करने वाले बम फेंके और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाये । बम से निकले धुयें से पूरा हाल भर गया था । भगदड़ मची । उसमें कई लोग घायल भी हुये । दोनों क्राँतिकारी बम फेंकने के बाद नारे लगाते हुये बाहर आये । और आत्मसमर्पण कर दिया । इन्होंने वहाँ पर्चे भी फेके ।  जिसका प्रथम वाक्य था कि- “बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है”। बाद में चले मुकदमे के दौरान क्राँतिकारियों ने कहा था कि  सरकार दिल्ली की असेंबली में ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने जा रही था । इस बिल का उद्देश्य  क्रांति के आरंभिक काल में दमन करना था । इसे रोकने और इसके प्रति जन सामान्य को जाग्रत करने के उद्देश से ये बम फेकने गये थे ।

क्राँतिकारी सरदार भगत सिंह

 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी सरदार भगतसिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिला अंतर्गत बंगा गांव में हुआ था । यह क्षेत्र अब पाकिस्तान में है । पिता किशन सिंह संधू सिक्ख पंथ से संबंधित थे लेकिन आर्यसमाज से भी जुड़े थे। माता विद्यावती धार्मिक प्रवृत्ति की स्वाभिमानी महिला थीं। यह प्रभाव सभी बच्चों पर पड़ा । सरदार भगतसिंह सात बहन भाइयों दूसरे दूसरे क्रम पर थे ।पिता काशीसिंह और चाचा अजीत सिंह भी सार्वजनिक जीवन में थे । वे लाहौर में संपन्न काँग्रेस अधिवेशन में सहभागी हुये और 1914-1915 के आंदोलन में भाग लिया। 

बालवय में भगतसिंह की शिक्षा गाँव के ही विद्यालय में हुई और आगे की शिक्षा के लिये लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक विद्यालय पढ़ने भेजे गये और महाविद्यालयीन शिक्षा के लिये 1923 में लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया । इस महाविद्यालय की स्थापना दो लाला लाजपत राय ने की थी । इस महाविद्यालय की शिक्षा पूरी तरह भारतीय स्वत्व आधारित थी । किशोर वय भगतसिंह का जो आधार डीएवी स्कूल में अंकुरित हुआ था वह इस महाविद्यालय में पल्लवित हुआ । यह महाविद्यालय क्राँतिकारी आँदोलन का एक प्रकार से मिलन केन्द्र था । अपने परिवार की पृष्ठभूमि और विद्यालय की आरंभिक शिक्षा से स्वत्व के जिस विचार ने आकार लिया उसका क्रियान्वयन इसी महाविद्यालय में हुआ । इस महाविद्यालय में एक ओर उनका संपर्क देशभर के क्राँतिकारियों से संपर्क बना और दूसरी ओर लाला लाजपत राय के निर्देशन में स्वाधीनता संघर्ष में भाग लेने का अवसर मिला।  उन्होंने 1926 में उत्तर प्रदेश और 1927 में बंगाल की यात्रा की । 1928 में सेन्डर्स और चन्नन सिंह वध की योजना बनाई और 1929 में असेम्बली में बम फेका । सेन्डर्स वध के बाद वे अपना वेश बदलकर पहले कलकत्ता गये फिर कानपुर के प्रताप समाचार पत्र में नाम बदलकर काम करने लगे । उन दिनों इस समाचार पत्र के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी थे ।

क्राँतिकारी राजगुरु 

23 मार्च को बलिदान होने वाले दूसरे क्राँतिकारी राजगुरु थे । उनका पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था । उनका जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् 1965 (ईस्वी सन् 1908) महाराष्ट्र के पुणे जिला अंतर्गत खेडा गाँव में हुआ था। जब वे 6 वर्ष हुये तभी पिता का निधन हो गया । परिवार भारतीय पंरपराओं और संस्कृतनिष्ठ था । इसलिये वालवय में ही विद्याध्ययन केलिये  बनारस भेजे गये । जहाँ संस्कृत और वेद सहित हिन्दू धर्म ग्रंन्थों का अध्ययन किया । उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी । एक बार जो पढ़ लेते वह कंठस्थ हो जाता वे योगाभ्यास और व्यायाम नियमित करते थे । वे औसत कद काठी के थे पर नियमित अभ्यास से चुस्ती, बल बुद्धि अद्वितीय थी । पुणे की पृष्ठभूमि के कारण शिवाजी महाराज उनके आदर्श थे ।

वाराणसी में विद्याध्ययन के दौरान ही उनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हुआ। इशमें चन्द्रशेखर आजाद भी थे । राजगुरु आजाद की हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गये। आजाद ने इनका छद्म नाम रघुनाथ रखा । यहीं इनका परिचय सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि से बना और एक टोली बन गई । राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज थे। साण्डर्स वध में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने इन तीनों को सामरिक सुरक्षा (कवर) प्रदान की थी। सेन्डर्स वध के बाद वे भी वेश बदलकर लाहौर से निकल आये थे और कानपुर आ गये थे ।

क्रन्तिकारी सुखदेव 

सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था उनका जन्म पंजाब प्राँत के लुधियाना नगर में 15 मई 1907 को हुआ था । पिता रामलाल थापर व माता रल्ली देवी भारतीय संस्कारों के प्रति समर्पित थे । लेकिन इनके जन्म से तीन माह पूर्व ही पिता का स्वर्गवास हो गया था । इनका पालन पोषण ताऊ अचिन्तराम की देखरेख में माता ने किया था । अंचित राम जी भी आर्यसमाज से जुड़े थे । इसलिये संस्कार, स्वत्व और स्वाभिमान का भाव बचपन से जाग्रत हुआ । इनकी आरंभिक शिक्षा लुधियाना में हुई और महाविद्यालयीन शिक्षा के लिये लाहौर के नेशनल कालेज भेजे गये । यहीं उनकी भेंट क्राँतिकारी भगतसिंह और अन्य क्राँतिकारियों से हुई । और जब लाला लाजपत राय के बलिदान का प्रतिशोध लेने के लिये टोली बनी तो वे इसमें सहभागी हो गये। यही नहीं, 1929 में कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार के विरोध में की गयी व्यापक हड़ताल में भी भाग लिया । गाँधी इर्विन समझौते पर इन्होंने एक खुला खत गाँधी जी के नाम अंग्रेजी में लिखकर गाँधी जी से कुछ प्रश्न किये थे।

गिरफ्तारी और बलिदान 

सेन्डर्स और चन्नन सिंह वध के बाद तो सभी क्राँतिकारी लाहौर से सुरक्षित निकल गये थे । 
भगत सिंह और राजगुरु ने अपना वेष बदला भगत सिंह ने अपनी दाड़ी और बाल कटवाए और  टोपी पहन ली । उन्हें सुरक्षित निकाला दुर्गाभाभी ने दोनो एक महाजन पति पत्नि के जोड़े और हाथ में बच्चा लेकर लाहौर से रवाना हुये जबकि राजगुरु ने उनके नौकर के रूप में उनका सामान उठाया। तीनों पहले कानपुर आये वहाँ से ट्रेन बदलकर लखनऊ पहुँचे। लखनऊ से राजगुरु  बनारस के लिए और भगत सिंह एवं दुर्गा भाभी हावड़ा रवाना हुये । कुछ दिन कलकत्ता रहकर वापस लाहौर लौट आये । 

अन्य गतिविधियों के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेका और गिरफ्तारी दी । इस घटना की गूंज लंदन तक हुई । पूरे देश में गिरफ्तारियाँ हुई और छापे पड़े। सहारनपुर बम फैक्ट्री तक पुलिस पहुँची। कुछ क्राँतिकारी पुलिस प्रताड़ना से भयभीत हुये और पुलिस को सूचनाएँ मिलीं । देशभर में कुल 272 गिरफ्तारियाँ हुई। अलग अलग प्रकरणों में अलग अलग अदालतों में मुकदमें चले । 15 अप्रैल 1929 को, पुलिस ने लाहौर बम फैक्ट्री की खोज की, जिसके कारण सुखदेव, किशोरी लाल और जय गोपाल सहित एचएसआरए के अन्य सदस्यों को गिरफ्तार हुये । पहले सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त पर असेम्बली बम काँड का ही मुकदमा था फिर भगतसिंह सिंह, सुखदेव, राजगुरु और 21 अन्य पर सॉन्डर्स की हत्या का आरोप लगाया गया। दिल्ली जेल से लाहौर जेल भेज दिया गया । लाहौर जेल में राजनैतिक कैदियों के साथ अमानुषिक व्यवहार के विरूद्ध भूख हड़ताल आरंभ हुई । इसकी चर्चा देशभर में हुई । सभी क्राँतिकारियों के प्रति जन समर्थन भी बढ़ा । 

पहले असेंबली बम काँड का फैसला आया जिसमें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और फिर 10 जुलाई 1929 से सेन्डर्स वध का मुकदमा शुरू हुआ। इस मुकदमें में सरदार भगतसिंह के अतिरिक्त 27 अन्य क्राँतिकारियों पर सेन्डर्स और चन्नन सिंह का वध एवं स्कॉट की हत्या की साजिश रचने का मुकदमा चला । इस मुकदमें में तीन क्राँतिकारियों सरदार भगतसिंह, सुखदेव थापर और राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। फाँसी के लिये 24 मार्च 1931 की तिथि तय की गई।  लेकिन विरोध प्रदर्शन आरंभ हो गये । जिन्हे देखते हुये एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई और जनरोष से बचने के लिये इनके पार्थिव शरीर को जेल के पीछे ही अंतिम संस्कार कर दिया गया ।

Habitat International Film Festival 2025 celebrates Italian Cinema and Cultural Heritage

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New Delhi – The Habitat International Film Festival (HIFF) 2025 proudly announces Italy as the Focus Country, presenting a rich cinematic showcase in collaboration with the Italian Embassy Cultural Centre, Cineteca di Bologna, and L’Immagine Ritrovata. The festival will highlight contemporary Italian films alongside meticulously restored classics, offering Indian audiences a deep dive into Italy’s remarkable film legacy.

The Italian Focus at the HIFF 2025 also brings back the Italian Screens. Roberto Stabile, Head of the International Department at Cinecittà, stated, “We are delighted to return to New Delhi for the fourth edition of Italian Screens to showcase the best of contemporary Italian cinema and promote tax incentives for distribution and co-productions. Supported by the Italian Ministry of Culture and the Ministry of Foreign Affairs and International Cooperation, this initiative also aims to strengthen Indo-Italian creative collaboration and present our funding opportunities.

Andrea Anastasio, Director of the Italian Embassy Cultural Centre, expressed enthusiasm about the initiative: “Italy as the Focus Country at HIFF 2025 is a wonderful opportunity to share our deep-rooted passion for cinema with Indian audiences. Our approach has been twofold—showcasing outstanding contemporary films and highlighting the exceptional film restoration work done by Cineteca di Bologna and L’Immagine Ritrovata. These institutions have preserved cinematic heritage for future generations, ensuring that masterpieces are not lost to time.”

Curated by Stefano Francia di Celle, the Italian Focus program features two major segments: a selection of contemporary Italian films from 2024 and a retrospective dedicated to the legendary Marcello Mastroianni on his centenary.

“The Italian Focus at HIFF 2025 is divided into two segments—a selection of 2024’s finest contemporary films and a tribute to the legendary Marcello Mastroianni on his centenary. We aim to offer a broad spectrum of genres, from thrillers and dramas to romantic comedies and socially conscious films, reflecting the evolution of Italian cinema across generations,” Stefano explains.

He further adds, “We also pay special tribute to Marco Tullio Giordana, whose latest film, The Life Apart, a psychological thriller, will open the festival. The meticulously restored classics will allow audiences to relive the grandeur of Italian cinema’s golden age, particularly through the works of Federico Fellini and Vittorio De Sica. A highlight will be the restored Apu Trilogy by Satyajit Ray, whose work was deeply influenced by De Sica’s neorealism.”

“Additionally, Celine Pozzi from L’Immagine Ritrovata will conduct a workshop on film restoration, while our collaboration with the Aga Khan Trust for Culture will extend the discussion to preserving archaeological heritage. We are thrilled to bring these cinematic gems to India and celebrate the power of film as a cultural bridge,” Stefano rejoices.

“Cinema, like literature, nurtures creativity, fosters community, and keeps storytelling alive. In an era dominated by screens on our smartphones and laptops, it is vital to come together and experience the magic of the big screen. We are grateful to Cineteca di Bologna, the Italian Ministry of Culture, and all our collaborators for making this vision a reality. Special thanks to the India Habitat Centre for their unwavering support in bringing this festival to life,” sums up Andrea.

With a carefully curated selection of films and expert-led discussions, the Italian Focus at HIFF 2025 promises to be an unmissable celebration of cinema, bridging the past and present while strengthening Indo-Italian cultural ties.

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