दिल्ली दंगा के 5 साल

violence-delhi_1582837341.jpg

मृत्युंजय कुमार

‘हम देखेंगे’ वाले कहीं दिख क्यों नहीं रहे? दिल्ली को लहूलुहान करने वाले बताएं कि CAA से कितने मुसलमानों की नागरिकता गई‍‍!

23, 24 एवं 25 फरवरी, 2020 भारत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत की तैयारियां कर रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति का यह भारत दौरा दुनिया भर में सुर्खियों में था। लेकिन देश की राजधानी में बैठे मुट्ठी भर लोग किसी और तैयारी में थे। जिस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति दिल्ली में मौजूद थे, वहां से चंद किलोमीटर दूर दंगा भड़क उठा। चुन-चुनकर हिंदुओं, सरकारी कर्मचारियों और पुलिस को निशाना बनाया जाने लगा।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति के दिल्ली में मौजूद रहने के दौरान ही दिल्ली को लहूलुहान करने की प्लानिंग हुई थी ताकि इसे वैश्विक मीडिया में ज्यादा से ज्यादा भुनाया जा सके। इन सबकी पृष्ठभूमि में CAA के खिलाफ चल रहा एक आंदोलन था। जिसका केंद्र दिल्ली का शाहीनबाग था। देश की राजधानी में सेकुलर-लिबरल गिरोह की गोद में पल रहे इस आंदोलन की तासीर शुरू से सांप्रदायिक थी। वहां के पोस्टर विषाक्त आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की कहानी कहते थे। पाकिस्तानी कवि फैज रातोंरात इन आंदोलनकारियों के धर्मपिता बन गए और ‘हम देखेंगे’ का नारा बुलंद होने लगा। देश की राजधानी में सड़क घेरकर ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे जिहादी जुमले पढ़े जाने लगे। पूर्वोत्तर भारत को देश से काटने की योजना मंच से समझाई जा रही थी। शाहीनबाग में नेशनल मीडिया के रिपोर्टर्स से मारपीट की खबरें आए दिन आती थीं। इस दौरान दिल्ली का शाहीनबाग एक ऐसा इलाका बन गया था, जहां पुलिस, प्रशासन और सरकार की कोई परवाह नहीं थी। एक तरह से वहां समानांतर सरकार चलाने की कोशिश की गई। लेकिन भाजपा विरोध में अंधे आंदोलनजीवी इन सबसे मुंह मोड़े रहे। शाहीनबाग के गर्भ में पल रहे इस सांप्रदायिक दंगे में उन्होंने क्रांति की किरण देखी। मीडिया प्रोपगैंडा के दम पर 80 साल की एक अनपढ़ बुजुर्ग महिला को आंदोलन का आइकॉन बनाया गया। दुनिया भर में ऐसा प्रचारित किया गया कि भारत अपने यहां के अल्पसंख्यकों से नागरिकता का अधिकार छीनने वाला है।

इस पूरी कवायद के नतीजे में दिल्ली को जख्म और एक बदनुमा दाग मिला। देश की राजधानी में दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क के राष्ट्रपति की मौजूदगी में दंगा हुआ। हिंदुओं की संपत्ति कोे चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। दिल्ली में सत्ताधारी पार्टी के नेता की छत पर एक बड़ी गुलेल मिली, जिसके सहारे पत्थर और पेट्रोल बम हिंदू घरों पर फेंके जा रहे थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा शुरू होने के समय वैश्विक मीडिया में भारत की बढ़ती सामरिक, राजनैतिक और आर्थिक शक्ति की खबरें थीं। लेकिन 23, 24 एवं 25 फरवरी के बीच स्थिति बदल गई। अब वैश्विक मीडिया के केंद्र में दिल्ली का दंगा था। भारत की छवि एक युद्धग्रस्त, आतंरिक कलह से जूझते देश के रूप में गढ़ने की नाकाम कोशिश की गई।

हालांकि इस दंगे को 5 साल बीत चुके हैं। बीते दिनों CAA भी शांतिपूर्ण तरीके से लागू हो गया। दंगाई जेल भी गए। देश सामरिक, राजनैतिक और आर्थिक मोर्चे पर नित्य नई ऊंचाइयां छू रहा है।

लेकिन इन सबके बीच फिर वही सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली को दंगे की आग में क्यों झोंका गया? 5 साल पहले के सोशल मीडिया पोस्ट्स और मीडिया की सुर्खियां देखेंगे तो पाएंगे कि उसमें CAA को नागरिकता छीनने वाला कानून बताया गया था। मुसलमानों के मन में डर बैठाया गया कि CAA के लागू होते ही उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी। दूसरी ओर, सरकार की ओर से लगातार सफाई पेश की जाती रही कि CAA पड़ोसी देशों के सताए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने वाला कानून है न कि किसी की नागरिकता छीनने वाला। लेकिन नई-नई शुरू हुई यूट्यूब पत्रकारिता के उस दौर में अफवाह सच से तेज निकली। दिल्ली को झुलसना पड़ा। तिकड़मबाजी के चक्कर में नौकरी गंवाने वाले पुराने संपादक माइक लेकर सड़कों पर उतर आए। झूठ फैलाने में इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। बदले में इन्होंने यूट्यूब पर अपना साम्राज्य खड़ा किया और दिल्ली के हिस्से में दंगा आया। आज दिल्ली के दंगाई तो जेल में हैं। लेकिन वे सिर्फ प्यादे भर थे। जिन्होंने इस दंगे को भड़काया, वे आज भी अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे हैं, यूट्यूब पर भ्रामक थंबनेल के सहारे पेट पाल रहे हैं।

दिल्ली दंगे के 5 साल बाद शाहीनबाग के आंदोलन को हवा देने वाले स्वघोषित बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए कि इतने दिनों में CAA से कितने मुसलमानों की नागरिकता गई, कितने मुसलमानों को पाकिस्तान भेजा गया। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर लखनऊ से लेकर हैदराबाद और पटना से लेकर दिल्ली को दहलाने का क्या मतलब था? CAA को देश के मुसलमानों के खिलाफ बताने वाली मीडिया रिपोर्ट्स का क्या मकसद था?

क्या ‘हम देखेंगे’ का नारा बुलंद करने वाले आंदोलनजीवियों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह एक ख्याली मुद्दे पर आंदोलन शुरू करने और देश को दंगे में झोंकने के लिए माफी मांगें?

5 साल बाद यह बात शीशे की तरह साफ हो गई है कि दिल्ली का दंगा एक साजिश था। जिस आंदोलन ने यह दंगा फैलाया, उसकी कोई वजह ही नहीं थी। एक ख्याली मुद्दे पर आंदोलन शुरू किया गया था।

अगर पैटर्न देखें तो पाएंगे कि शाहीनबाग का आंदोलन और दिल्ली दंगा इकलौता ऐसा मामला नहीं है। इससे पहले 2015 का जेएनयू विवाद हो या 2021 का लालकिला हिंसा। हर बार हिंसा से सहारे देश को अस्थिर करने की कोशिश हुई। इन सबके पीछे आंदोलनजीवी टूलकिट गैंग का हाथ पाया गया।
इस टूलकिट गैंग की बैचेनी समझना भी ज्यादा मुश्किल नहीं है। दरअसल, आजादी के बाद इन्हें लगातार सत्ता का साथ मिलता रहा। सत्ता की गोद में बैठकर एनजीओ, सभा-समितियों, मीडिया और शिक्षण संस्थानों पर 6 दशक तक कब्जा जमाए रखने वाला यह वर्ग 2014 के बाद से खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा था। भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से मिलने वाली इनकी मदद भी प्रायः बंद हो गई। दूसरी ओर, देश की जनता चुनावों में खुलकर भारतीयता और सनातन का पक्ष लेने लगी।

ऐसी स्थिति में टूलकिल गैंग ने देश को अस्थिर करने की असफल कोशिश की। उपद्रव के सहारे लोकतंत्र के कुचलने की कोशिश हुई। बिल्कुल यही पैटर्न श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में भी देखने को मिला। अंतर बस इतना है कि श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में उपद्रव करके सरकार गिरा दी गई। लेकिन भारतवंशियों ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रभक्ति के दम पर देसी-विदेशी टूटकिट गैंग के प्रोपगैंडे को ध्वस्त कर दिया।

दिल्ली दंगे की बरसी इस पूरे प्रसंग के अवलोकन का समय होना चाहिए। अगर भारत को सशक्त, समृद्ध और वैभवशाली राष्ट्र के रूप में खड़ा करना है तो इस टूलकिट गैंग से निपटने और उपद्रव करके देश को अस्थिर करने वाली साजिशों को बेनकाब करते रहना होगा। सरकार के पास ऐसी ताकतों से निपटने के लिए पर्याप्त बल है। लेकिन राष्ट्र विरोधी प्रोपगैंडा से लड़ने के लिए देश के सुधी नागरिकों को भी आगे आना होगा।

दिल्ली दंगे की बरसी पर आंदोलनजीवियों से पूछना होगा कि ‘हम देखेंगे’ वाले कहीं दिख क्यों नहीं रहे? दिल्ली को लहूलुहान करने वाले बताएं कि CAA से कितने मुसलमानों की नागरिकता गई‍‍! अगर इससे किसी की नागरिकता नहीं गई (जो कि सच्चाई है) तो देश को दंगे में झोंकने वाले बुद्धिजीवी शर्म करें और राष्ट्र के प्रति इस गंभीर अपराध के लिए माफी मांगें।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान में पत्रकारिता पढ़ाते हैं)

एक डरावना ख्वाब या हक़ीक़त?

time.jpg


2047 के “विकसित भारत” में आगरा की क्या तस्वीर होगी? क्या ताज सिटी आगरा भारत के टॉप 5 स्मार्ट शहरों में शुमार होगा? या फिर ये शहरी बदहवासी और लापरवाही के साये में एक डरावने ख्वाब में तब्दील हो जाएगा?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने टाइम मशीन का सहारा लिया। “टीएम” के लेंस के जरिए हमने भविष्य के आगरा की एक झलक देखी…जो इतनी डरावनी थी कि दिल दहल गया।
हमारी रिपोर्ट:

“ये 2047 की एक तपती हुई सोमवार की दोपहर है। मैं दिल्ली-आगरा हाईवे पर उतरता हूँ। सिकंदरा से लेकर ताजमहल तक, सड़कें बर्बादी का एक डरावना नज़ारा पेश कर रही हैं। धूल और कूड़े से भरी हुई ये सड़कें, ढहती हुई इमारतों से घिरी हुई हैं। बसें जहरीला धुआँ उगल रही हैं, जिससे हवा में बदबू फैल रही है।

हरि पर्वत चौराहे पर, ट्रैफिक पुलिस मास्क और इनहेलर बांट रही है, ताकि लोग जहरीली हवा से बच सकें। जब हम राजा की मंडी पहुँचते हैं, तो हमें ऑक्सीजन बूथ पर ले जाया जाता है, ताकि हम अपने फेफड़ों को ताज़ी हवा से भर सकें। जून की गर्मी इतनी तेज़ है कि सहन करना मुश्किल है।
हम एक रेस्तरां में शरण लेते हैं, लेकिन वहाँ बिजली गुल होने की वजह से अंधेरा और बदबूदार माहौल है। सड़कों पर दम घुट रहा है, हॉर्न बजाते वाहनों की भीड़ है, और शोर इतना ज़्यादा है कि कान पक जाएँ। मेट्रो सेवाएँ, जो कभी उम्मीद की किरण हुआ करती थीं, बहुत पहले बंद कर दी गई थीं, क्योंकि औसत यात्री महंगे टिकट नहीं खरीद पा रहा था। मेडिकल कॉलेज आधा खाली पड़ा है, इसके हॉल अव्यवस्था से भरे हुए हैं। बाहर लंबी लाइन लगी है। सूर सदन खस्ता हाल दिख रहा है। वॉचमैन कह रहा है, ‘अब सब घर बैठे देखते हैं।’ हर कोई खौफज़दा है। सड़क पर कम लोग हैं, वाहनों से कम। ऐसा लग रहा है कि शहर का बुनियादी ढांचा लगातार दबाव के कारण ढह गया है।

यमुना नदी, जो कभी जीवन रेखा हुआ करती थी, अब एक स्थिर, प्रदूषित धारा बन गई है। इसके किनारों पर झुग्गियाँ हैं, और नदी के तल पर कॉलोनियाँ उग आई हैं। तथाकथित ‘स्मार्ट सिटी’ एक अव्यवस्थित फैलाव में बदल गई है, जो अनियोजित शहरीकरण का शिकार है। कॉलेज परिसर भयावह रूप से खाली हैं, क्योंकि छात्र अपने उपकरणों से चिपके हुए हैं। उन्हें ऐसी दुनिया में कक्षाओं की कोई ज़रूरत नहीं है, जहाँ AI ही सारा सोचने का काम करता है।

आगरा में प्रदूषण की एक गहरी धुंध छाई हुई है, जो राजसी ताजमहल को ढक रही है। हवा में ज़हर घुला हुआ है, हर शख़्स परेशान दिख रहा है। नदी, औद्योगिक कचरे का कब्रिस्तान बन गई है। सामुदायिक तालाब और नहर नेटवर्क, जो कभी जीवन से गुलज़ार रहते थे, अब घुटन भरे आशियानों से भर गए हैं – विफल शहरी नियोजन का एक डरावना सबूत। सड़कें अव्यवस्थित गंदगी से भरी हैं। जीर्ण-शीर्ण इमारतें उपेक्षा के बोझ तले ढह रही हैं, उनके अग्रभाग पर गंदगी के निशान हैं। कभी जीवंत और रंगीन रहने वाले बाजार अब भूतिया छाया बनकर रह गए हैं। दुकानें वीरान खड़ी हैं, उनकी खामोशी केवल गड्ढों से भरी सड़कों पर चलने वाले खस्ताहाल वाहनों के कराहते इंजनों से टूटती है।

आगरा में ‘विकसित भारत’ का वादा धूल में मिल गया है। स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, जिन्हें कभी उद्धारक के रूप में सराहा गया था, अब विफल महत्वाकांक्षाओं के खोखले स्मारक बनकर रह गई हैं। गहरे मुद्दों को छिपाने के लिए किए गए सौंदर्यीकरण के प्रयास गुमनामी में खो गए हैं। ताजमहल, जो कभी शाश्वत प्रेम का प्रतीक था, पर एसिड रेन और उपेक्षा के निशान हैं। शहर की गंदगी से दूर रहने वाले पर्यटक गायब हो गए हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है। AI होटल के कमरों में आराम से वर्चुअल टूरिज्म की व्यवस्था करता है।

युवा लोग उम्मीद की किरण दिखाने वाले शहरों में अवसरों की तलाश में भाग गए हैं। केवल बूढ़े, बीमार और बेसहारा लोग ही बचे हैं, जो एक ऐसे शहर में फंसे हुए हैं जिसने उन्हें छोड़ दिया है। कभी आगरा की शान रहे शैक्षणिक संस्थान वीरान हो चुके हैं, उनके पुस्तकालय धूल खा रहे हैं। शहर की जीवंत संस्कृति मुरझा गई है, उसकी जगह निराशा ने ले ली है।

मैं झटकों को झेलने के लिए शाहजहां के बगीचे में रुकता हूं। प्यास से कलेजा बैठा है, एक दुकान से पानी की बोतल मांगता हूं, ” पानी नहीं है, नुक्कड़ के स्टोर से ठंडी बीयर ले लो,” शॉप कीपर एक नेक सलाह देता है।
मैं सोचता हूं, वास्तव में, “आगरा 2047″ एक चेतावनी भरी कहानी है। ये याद दिलाती है कि जब शहरी समस्याओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है, जब अल्पकालिक समाधान दीर्घकालिक समाधानों पर हावी हो जाते हैं, और जब लालच और उदासीनता दूरदर्शिता और करुणा पर हावी हो जाती है, तो क्या होता है। ये एक ऐसा शहर है जो अपना रास्ता खो चुका है, एक ऐसा शहर जिसने क्षणभंगुर लाभों के लिए अपने भविष्य का बलिदान कर दिया है। ये अनियंत्रित शहरी क्षय के विनाशकारी परिणामों का एक डरावना प्रमाण है।”

चिंतित और खौफज़दा हम टाइम मशीन में दाखिल होकर, वर्तमान में लौटने का फैसला करते हैं। लेकिन आगरा के संभावित पतन की भयावह दृष्टि बनी हुई है। क्या हम अपने प्यारे शहर को बचाने के लिए अभी कदम उठाएंगे, या हम इसे बर्बाद होने देंगे? ये चुनाव करना हमारा अधिकार है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का इतिहास भारत और विश्व मे मातृभाषाओं की स्थिति

768-512-17808881-thumbnail-4x3-koidkdkd.jpg

समीर कौशिक

मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान, संस्कृति और समाज से जुड़ी होती है। यह भाषा, जो एक व्यक्ति बचपन से ही सीखता है, भाषा न केवल संचार का माध्यम है, बल्कि यह समाज के सोचने और समझने का तरीका भी बन जाती है। विश्व भर में भाषाओं की स्थिति और उनका अस्तित्व बहुत विविधतापूर्ण है। आज के समय में, मातृभाषाओं का अस्तित्व संकट में है, और यह संकट कई कारणों से उत्पन्न हुआ है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) द्वारा 1999 में घोषित किया गया था। यह दिवस भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति के आत्म-संस्कार, संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा होती है, और इस दिन को मनाने का उद्देश्य मातृभाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
इस दिन की शुरुआत बांग्लादेश में 1952 में हुए एक ऐतिहासिक घटना से हुई। उस समय बांग्लादेश (जो तब पूर्व पाकिस्तान था) में उर्दू को राष्ट्रभाषा के रूप में लागू करने का विरोध किया गया था, क्योंकि बांग्लादेशी लोग अपनी मातृभाषा बंगाली में बात करते थे। इस विरोध के दौरान, 21 फरवरी 1952 को ढाका में पुलिस फायरिंग में कई छात्रों की मृत्यु हो गई। इस घटना को याद करते हुए, 1999 में UNESCO ने 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।

भारत में मातृभाषा का विशेष महत्व है क्योंकि यहां की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता विश्वभर में प्रसिद्ध है। भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं, जिन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इसके अलावा, लगभग 122 प्रमुख भाषाएं और 1599 बोलियाँ देश में बोली जाती हैं। प्रत्येक राज्य और क्षेत्र की अपनी एक प्रमुख मातृभाषा है, जिसे लोग अपनी दैनिक जीवनशैली और संचार में इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि, भारत में मातृभाषाओं की स्थिति में कई बदलाव आए हैं। आजकल, शिक्षा, सरकारी कामकाजी भाषा और मीडिया में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ गया है, जिसके कारण कई मातृभाषाएं संकट की स्थिती में हैं। विशेष रूप से बड़े शहरी क्षेत्रों में, विशेषकर दक्षिणी एवं पूर्वोत्तर के राज्यों में लोग अपनी मातृभाषाओं की जगह अंग्रेजी का अधिक प्रयोग करने लगे हैं, जिससे स्थानीय भाषाओं का प्रयोग घट रहा है। कई भाषाएं अपनी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान खो रही हैं।

भारत सरकार ने भाषाओं के संरक्षण के लिए कई उपाय किए हैं, जैसे ‘संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषाओं का समावेश’, ‘राष्ट्रीय भाषा नीति’ 2020 और ‘मातृभाषा में शिक्षा’ को बढ़ावा देना। इसके अलावा, कई गैर सरकारी संगठन और भाषा संस्थान भी मातृभाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए काम कर रहे हैं। फिर भी, भारत में कुछ भाषाएं ऐसे संकट का सामना कर रही हैं, जो भविष्य में विलुप्त हो सकती हैं।

विश्व में मातृभाषाओं की स्थिति भी आज विचारणीय है जिसे कुछ बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है ।

भाषाई विधाताओं के रूप में यदि समझा जाए तो विश्व में लगभग 7,000 भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही प्रमुख हैं, और बहुत सी भाषाएँ कम बोलने वाले समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। यूनेस्को के अनुसार, 90% भाषाओं में से आधी से अधिक भाषाएं ऐसे संकट में हैं जो विलुप्त हो सकती हैं। यह संकट मुख्य रूप से शहरीकरण, शिक्षा, और वैश्वीकरण के प्रभावों के कारण उत्पन्न हुआ है, जिसके चलते लोग अपनी मातृभाषाओं के स्थान पर अधिक व्यापक भाषाओं का उपयोग करते हैं, जैसे कि अंग्रेजी, हिंदी, स्पैनिश आदि।

वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) का अपना एक अलग प्रभाव विश्व भर में मातृभाषाओं पर देखा जा सकता है जिसके चलते आज बहुतायत मातृभाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी भाषा लेती जा रही है जैसे कि भारत के पूर्वोत्तर के राज्योँ की स्थिति है अफ़्रीकी देशों के समेत विश्व में बहुत सारे देश हैं जंहा पर स्थानीय मातृभाषाओं के साथ ऐसी स्थिति है ।

विश्व में आज लगभग 2,500 भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। ये भाषाएँ अक्सर छोटे समुदायों द्वारा बोली जाती हैं, और जब इस समुदाय की संख्या घटती जाती है, तो उस भाषा का प्रयोग भी धीरे-धीरे कम होता जाता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा अंग्रेजी भाषा का प्रसार बढ़ाया गया। इसके परिणामस्वरूप, मातृभाषाओं की उपयोगिता में कमी आई है। विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, बच्चों को अपनी मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी या अन्य प्रमुख भाषाएँ सिखाई जा रही हैं। इसके कारण, मातृभाषाएँ शिक्षा, सरकार और मीडिया के प्रभाव से बाहर हो रही हैं, और उनका संरक्षण और प्रोत्साहन चुनौतीपूर्ण हो गया है ।

कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भाषाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं। यूनेस्को द्वारा विभिन्न भाषाओं के संरक्षण के लिए ‘इंटरनेशनल डे फॉर लिंग्विस्टिक डाइवर्सिटी’ जैसे पहल किए गए हैं। कई सरकारें अपनी मातृभाषाओं को बढ़ावा देने के लिए नीति बना रही हैं। जैसे, चीन ने मांचू, म्यामार ने बर्मी, और भारत ने हिंदी, तमिल, बंगाली, आदि भाषाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं ।

मातृभाषा न केवल वार्तालाप का माध्यम होती है, बल्कि यह किसी समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं का भी संवाहक होती है। जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो उसके साथ उस भाषा के बोलने वालों की सांस्कृतिक पहचान भी समाप्त हो जाती है। इसके साथ ही, भाषा के साथ जुड़ी हुई काव्य, गीत, लोककथाएँ, और परंपराएँ भी समाप्त हो जाती हैं ।

मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए समाज और सरकार दोनों का योगदान आवश्यक है। सरकारों को चाहिए कि वे मातृभाषाओं को शिक्षा, प्रशासन, और मीडिया में प्राथमिकता दें। इसके साथ ही, मातृभाषाओं को बच्चों को सिखाने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना चाहिए। समाज को भी इन भाषाओं को जीवित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए और युवा पीढ़ी को इन भाषाओं के प्रति जागरूक करना चाहिए ।

आज के युग में, विश्व भर में मातृभाषाओं के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। हालांकि, कई भाषाओं के संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन वैश्वीकरण, शिक्षा की एकरूपता और शहरीकरण जैसे कारणों से यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। हर समाज और देश का यह कर्तव्य है कि वह अपनी मातृभाषाओं को संरक्षित करे और उन्हें अगली पीढ़ी के लिए बचाए रखे, ताकि भाषा और संस्कृति की समृद्धि बनी रहे ।

Eikhoigi Imphal International Film Festival 2025: Cinema as a Catalyst for Change

3-2.jpeg

Imphal – The 2nd Eikhoigi Imphal International Film Festival (EIIFF) opened its doors to a global audience this year, bringing the cinematic world to Manipur, a state that has faced political unrest in recent years. The festival, launched as part of a broader effort to reassert Manipur’s identity, has become a beacon of hope and change. Sunzu Bachaspatimayum, Festival Director and Secretary of the Manipur State Film Development Society (MSFDS), shared his vision behind this initiative that aims to use cinema and culture as tools for peace and reconciliation.

“We believe cinema is more than just entertainment,” Sunzu explained. “It’s a powerful medium to foster dialogue, build understanding, and rebuild our community’s image. Despite the challenges, the festival is a statement that Manipur is not just a conflict zone, but a space where creativity and culture can thrive.”

While Manipur has long been isolated in the broader film industry, Sunzu sees the EIIFF as a crucial step toward changing that narrative. He shared, “Our state is geographically positioned as India’s gateway to Southeast Asia. We have a vibrant film industry, but it’s been limited by resources and accessibility. We want to bring the world to us, to provide a platform for local filmmakers to showcase their talent and engage with the global cinematic community.”

This year’s festival introduced a series of masterclasses, pitching sessions, and panel discussions aimed at developing the skills of emerging filmmakers in the region. Sunzu highlighted the importance of these initiatives, saying, “Manipur lacks formal academic institutions for film studies, but we’re compensating for this gap by bringing experts and professionals from across the world. This is essential for elevating our industry and creating opportunities.”

Prominent filmmakers such as Umesh Kulkarni and Shyamal Sengupta offered their expertise, providing invaluable insights into the nuances of short films, distribution, and marketing. Documentary filmmaker Sean McAllister led an online session on crafting intimate character-driven documentaries, while industry experts from Japan and India discussed international collaborations and production strategies. “We want to shift the mindset here,” Sunzu said. “Filmmakers often think that their market is limited to Manipur, but we need to teach them about the international market and how to pitch their stories to global audiences.”

The festival also paid homage to Manipur’s rich cinematic legacy. Sunzu reflected on the legacy of “Ishanou,” a film that was recently restored and screened at Cannes. “This film represents the golden era of Manipuri cinema, and now, films like Boong are representing the future of Manipur’s film industry,” he said, underscoring the transformation that has taken place.

The EIIFF is not just about film screenings; it is a celebration of Manipur’s cultural heritage. The state, known for its scenic beauty, boasts landmarks like the Loktak Lake and the Keibul Lamjao National Park. These locations offer a unique backdrop for the films shown at the festival, adding to the region’s cinematic appeal.

Despite financial limitations and staffing challenges, the MSFDS is committed to growing this festival into a global platform. “It’s not going to be easy, but we are determined to continue,” Sunzu concluded. “This festival is a small but significant step towards building a sustainable film ecosystem here.”

The 2nd EIIFF marks a new chapter for Manipur, one where cinema and culture can heal and unite a state marked by conflict. As the festival continues to grow, it holds the promise of transforming Manipur into a thriving hub for filmmaking in Southeast Asia.

scroll to top