संस्कार भारती ने की ‘भरतमुनि सम्मान – 2024’’ पाने वाले कलाकारों की घोषणा

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बृजेश भट्ट

नई दिल्ली, 19 फरवरी 2025: कला एवं साहित्य की अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती द्वारा वर्ष 2024 के लिए भरतमुनि सम्मान 2024 मंचीय कला एवं साहित्य (भारतीय भाषाएं) मे कलासाधकों को देने की घोषणा की। मंचीय कला में लखनऊ की कत्थक नृत्यांगना डॉ कुमकुम धर एवं साहित्य में भवानी पटना ओड़िशा के संस्कृत साहित्यकर डॉ हरेकृष्ण मेहेर को उनकी कला साधना और अपने कार्यक्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए संस्कार भारती द्वारा सम्मानित किया जाएगा।

इन दोनों नामों की घोषणा करते हुए संस्कार भारती के अखिल भारतीय महामंत्री श्री अश्विन दलवी ने कहा कि “संस्कार भारती द्वारा दिया जानेवाला यह ‘भरतमुनि सम्मान’ भारत में पंचम वेद के नाम से विख्यात नाट्य शास्त्र के रचियता महर्षि भरत मुनि को समर्पित है और ऐसे विशिष्ट कलाकारों को सम्मानित करते हुए हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी, संस्कार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ मैसूर मंजुनाथ, केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के करकमलों द्वारा यह सम्मान 22 फरवरी ,2025 को नई दिल्ली नगर पालिका कन्वेन्शन सेंटर, दिल्ली में आयोज्य ‘भरत मुनि सम्मान 2024 ‘ कार्यक्रम में दिया जाएगा। जिसमें सम्मान के रूप में एक स्मृति चिह्न, सम्मान पत्र एवं रुपए 1,51,000 की राशि भेंट की जाएगी। उसी समय संस्कार भारती द्वारा निर्मित दोनो ही कलाकारों के जीवन और उनके कार्यों पर आधारित लघु फिल्म भी दिखाई जाएगी।”

उल्लेखनीय है कला जगत के इस प्रतिष्ठित सम्मान का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भगवत के द्वारा विगत वर्ष बंगलौर में कला साधक संगम में किया गया। जिसका ‘प्रथम सम्मान’ दृश्यकला में मुंबई के चित्रकार श्री विजय दशरथ आचरेकर एवं लोककला में सिंधुदुर्ग के श्री गणपत सखाराम मसगे को उनकी कला साधना और अपने कार्यक्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया था। वार्षिक आयोजित होने वाले इस सम्मान में प्रतिवर्ष दो विधाओं में दिए जाने वाले इस सम्मान का संस्थागत, कला विश्वविधालयों एवं व्यक्तिगत संपर्को के आधार पर आवेदन के माध्यम से कला साधको का निर्णायक मंडल द्वारा चयन किया जाता है।

अद्भुत संगठक, विलक्षण व्यक्तित्व और साधना की विभूति

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कुधारणाओं के निवारण और सही मार्गदर्शन के लिये प्रकृति समय-समय पर दिव्य विभूतियाँ को संसार में अवतरित करती है जो विषमताओं और विपरीत परिस्थियों में व्यथित मानवता को एक निश्चित दिशा का संकेत करते हैं। ऐसी ही दिव्य विभूति थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर जी । जो “परमपूज्य गुरुजी” के संबोधन से जाने जाते हैं।

उनका जन्म 19 फ़रवरी 1906) को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था । उनके पिता श्री सदाशिव राव उपाख्य ‘भाऊ जी’ पहले डाकघर में कार्यरत थे फिर 1908 में शिक्षक बने । माता लक्ष्मीबाई उपाख्य ‘ताई’ धार्मिक, आध्यात्म और साँस्कृतिक परंपराओं की वाहक थीं । परिवार ने उनका नाम माधव रखा । पर वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। परिवार का वातावरण भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आधुनिक शिक्षा का था । इसलिये बालक मधु की जीवन धारा इन दोनों दिशाओं के समन्वय के साथ संवाहित हुई ।

जो दिव्य और विशिष्ट विभुतियाँ संसार में आतीं हैं उनके जन्म के प्रथम दिन से ही असाधारणता लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। यही असाधारण झलक बालक मधु में भी थी । माता पिता से उनकी यह विलक्षण प्रतिभा छुपी न रह सकी । जब दो वर्ष के थे पिता ने तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ कर दी थी । पिता स्वयं पढ़ाते और बालक की जिज्ञासाओं का समुचित समाधान करते थे । बालक मधु की स्मरण शक्ति अद्भुत थी । वे एक बार सुनकर या पढ़कर कंठस्थ कर लेते थे । ज्ञान की लालसा और उसका स्वयं विश्लेषण करने का स्वभाव ठीक वैसा ही था जैसे बचपन में स्वामी दयानन्द सरस्वती या स्वामी विवेकानंद का पढ़ने को मिलता है ।

समय के साथ शिक्षा और आयु आगे बढ़ी । 1922 में प्रथम श्रेणी में’हाई स्कूल परीक्षा’ उत्तीर्ण की। सन् 1924 में नागपुर के ईसाई मिशनरी ‘हिस्लाप कॉलेज’ से इण्टरमीडिएट उत्तीर्ण की। इन दोनों परीक्षाओं में उन्होंने केवल प्रथम श्रेणी ही प्राप्त नहीं की अपितु विशेष योग्यता भी अर्जित की जिससे छात्रवृत्ति एवं पारितोषिक भी प्राप्त किया । उनके विषय अंग्रेजी और विज्ञान रहे । छात्र जीवन में वे पढ़ाई के साथ अन्य गतिविधियों में भी भाग लेते थे । बौद्धिक गतिविधियों के साथ उनकी खेलों में भी रुचि थी । कबड्डी, हाकी और टेनिस जैसे खेल उन्हे अति प्रिय थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम, कुश्ती मलखम्ब के करतबों में भी वे बहुत कुशल थे।

विश्वविद्यालय जीवन

इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की शिक्षा के लिये माधव 1924 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आये । उन्होने 1926 में बी.एससी. और 1928 में एम.एससी. की परीक्षायें उत्तीर्ण कीं। महाविद्यालयीन परीक्षा में उनके विषय प्राणी विज्ञान था । ये परीक्षाएँ भी प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण कीं। उनकी खेल वाद विवाद और बौद्धिक गतिविधियाँ महाविद्यालयीन जीवन में भी उत्कृष्ट रहीं। इस प्रकार वे अपने महाविद्यालयीन जीवन में एक सर्वप्रिय छात्र रहे ।

परिवार की पृष्ठभूमि संस्कृत और साँस्कृतिक थी । ये दोनों विधायें उनके जीवन में सदैव साथ चलीं। महविद्यालयीन जीवन में अपने निर्धारित विषयों के साथ उन्होंने इन दोनों विधाओं का भी अन्वेषण निरंतर रखा । “संस्कृत महाकाव्यों, पाश्चात्य दर्शन, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की ओजपूर्ण एवं प्रेरक ‘विचार सम्पदा’, भिन्न-भिन्न उपासना-पंथों के प्रमुख ग्रंथों तथा शास्त्रीय विषयों के अनेक ग्रंथों का आस्थापूर्वक पठन पाठन किया । यह परिवार के संस्कार और अध्ययन की रुचि का प्रभाव था कि महाविद्यालयीन जीवन से ही उनके जीवन में आध्यात्मिक ज्योति जागृत हो गई। एम.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे प्राणि-शास्त्र विषय में ‘मत्स्य जीवन’ पर शोध कार्य हेतु चेन्नई के मत्स्यालय से जुड़ गये। पर यहाँ एक वर्ष के भीतर ही उनके समक्ष दो समस्याएँ सामने आईं। एक तो पिताश्री सेवानिवृत्त हो गये । इसके परिवार में कुछ आर्थिक समस्या आई दूसरे स्वयं माधल चैन्नई में बीमार हो गये । उनका उपचार दो माह चला । यह एक प्रकार से उनका पुनर्जीवन था । आर्थिक कठिनाई के चलते अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़ कर अप्रैल 1929 में नागपुर वापस आ गये ।नागपुर आकर भी ये दोनों समस्याएँ उनके सामने रहीं। एक स्वास्थ्य और दूसरी पारिवार की आर्थिक समस्या । उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। उनकी आत्मशक्ति और व्यायाम आदि से स्वास्थ्य सामान्यता की ओर बढ़ रहा था । आर्थिक स्थिति सुधारने कै लिये उन्होंने स्थानीय स्तर पर अध्ययन अध्यापन का कार्य आरंभ किया । इसी बीच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें निदर्शन पद का प्रस्ताव मिला। जिसे उन्होने स्वीकार किया और 16 अगस्त 1931 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में निदर्शक का पदभार ग्रहण कर लिया। यहाँ अपने निर्धारित कार्य के साथ वे युवाओं को शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सक्षमता पर भी ध्यान देते बातें करते । और यहीं से उन्हें गुरुजी संबोधन या उपाख्य मिला । उनके अध्यापन का विषय यद्यपि प्राणि-शास्त्र था । पर उनकी रुचि और सक्रियता देखकर विश्वविद्यालय ने उन्हें बी.ए.कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का दायित्व भी सौंप दिया।। माधव राव जी का विषय यद्यपि प्राणी विज्ञान था पर वे अपने छात्रों तथा मित्रों को अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, गणित तथा दर्शन जैसे अन्य विषय में भी मार्ग दर्शन करते थे । पुस्तकों के लिये वे केवल पुस्तकालय के भरोसे नहीं रहते थे । स्वयं भी पैसे बचाकर पुस्तकें क्रय कर लिया करते थे । बहुत कम समय में उनके पास निजी पुस्तकों का एक बड़ा संग्रह बन गया । स्थिति यह थी कि उनके वेतन का एक बड़ा भाग अपने छात्रों और मित्रों की फीस भरने अथवा उन्हे पुस्तकें देने में ही व्यय हो जाया करता था। बनारस में रहते हुये 1934 में श्रीगुरूजी ने अखंडनानंद जी से विधिवत दीक्षा ली और उनके शिष्य बने । इस प्रकार उनके जीवन की यात्रा में एक नया आयाम जुड़ा।

संघ से संपर्क और प्रवेश

गुरु जी ने अपने नागपुर जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ के संस्थापक डा हेडगेवार के के बारे में सुन लिया था । पर संघ को समझने का बीजारोपण बनारस में ही हुआ । बनारस में उनका संपर्क भैय्याजी दाणी से हुआ । भैय्या जी दाणी नागपुर के स्वयंसेवक थे डॉ॰ हेडगेवार ने उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भेजा था । श्री गुरूजी का संपर्क उनसे बना । और गुरुजी संघ के सम्पर्क में आये । संघ की शाखा प्रारंभ हुई और उस शाखा के संघचालक गुरुजी बने। गुरुजी ने बनारस में संघ कार्य का विस्तार किया और 1937 में नागपुर वापस आ गए।
नागपुर लौटकर श्री गुरूजी को डॉ हेडगेवार का सानिध्य मिला । यह 1938 का वर्ष था । यह सानिध्य मानों राष्ट्र और संस्कृति के गौरव की रक्षा के लिये मानों प्रकृति ने नियत किया था । श्री गुरुजी ने डा हेडगेवार ने एक कुशल मार्ग दर्शक देखा तो डा हेडगेवार ने श्री गुरूजी के भीतर एक प्रेरणादायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। और इस घड़ी के बाद श्री गुरूजी का जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन विस्तार के माध्यम से राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में समर्पित हो गया । डॉ हेडगेवार के साथ निरन्तर रहते हुवे श्रीगुरूजी ने अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित कर लिया ।

द्वितीय सरसंघचालक बने

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्मसंयम होने के कारण से 1939 में श्री गुरूजी को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में डॉ हेडगेवार अस्वस्थ हुये । काफी उपचार के बाद भी जब स्वास्थ्य सुधार न हुआ तो डा हेडगेवार ने अपने जीवन का अन्त समय जाना और उन्होंने वहाँ उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने श्रीगुरूजी अर्थात माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ कार्य विस्तार का दायित्व सौप दाया । 21 जून 1940 को डाॅ हेडगेवार अनन्त में विलीन हो गए और श्री गुरूजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने । श्री गुरूजी ने देस भर की यात्राएँ की । लाहौर कश्मीर से लेकर सागर तट पर कन्याकुमारी तक यात्राएँ की । संघ कार्य का विस्तार किया और उस समय की राजनैतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय परिस्थियों का सामना करने केलिये समाज को तैयार किया ।

भारत छोड़ो आँदोलन

इसी तैयारी के बीच 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन का वातावरण बना । श्रीगुरुजी ने स्वयंसेवकों से इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लेने के निर्देश दिये पर कहा का संघ के बैनर का उपयोग न हो । जहाँ जिस बैनर से आंदोलन चल रहा हो उसी के नेतृत्व में भाग लिया जाये । उनके इस निर्देश के दो कारण थे । एक तो श्रीगुरुजी चाहते थे कि आंदोलन में एक रूपता रहे और दूसरा यह कि वे संघ को पूरी तरह समाज संस्कृति और राष्ट्र सेवा का निमित्त ही बनाना चाहते थे । श्रीगुरुजी की भावना के अनुरुप स्वयं सेवकों ने भारत छोड़ो आँदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनर का उपयोग न करके जहाँ जो बैनर सामने था उसी के अंतर्गत योगदान दिया । विदर्भ और महाकौशल के अनेक ऐसे स्थान थे जहाँ इस आंदोलन में गोली चली और स्वयं सेवकों के बलिदान हुये । विदर्भ के चंद्रपुर और महाकौशल के जबलपुर में इस आदोलन के दौरान गोली चालन से बलिदान होने वाले नौजवान संघ के स्वयं सेवक थे । इस आन्दोलन के दौरान मध्यप्रदेश के सीहोर में बंदी बनाए गये भाई उद्धवदास मेहता भोपाल राज्य के संघ चालक थे तो ग्वालियर में बंदी बनाये गये किशोर वय अटल बिहारी बाजपेई भी स्वयंसेवक थे ।

मुस्लिम लीग की सीधी कार्यवाही और भारत विभाजन का दौर

मुस्लिम लीग अपनी स्थापना के दिन से ही मुसलमानों के लिये पृथक राष्ट्र का अभियान चला रही थी । 1930 में मुस्लिम लीग ने बाकायदा पाकिस्तान का नाम और पूरी योजना ही घोषित कर दी थी । अपनी इसी योजना के अंतर्गत मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्यवाही करने की घोषणा कर दी । इस दिन मुस्लिम लीग के प्रभावी क्षेत्रों विशेषकर पंजाब और बंगाल में हिन्दुओं की हत्या का मानों ताण्डव मच गया। उस पीडित मानवता की सेवा के लिये संघ के स्वयंसेवक ही सामने आये । इस भीषण हत्याकांड के बाद एक ओर मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना यदि विभाजन के लिये जनमत बना रहे थे तो दूसरी ओर श्री गुरूजी देश भर के अपने प्रत्येक भाषण में भारत विभाजन के विरुद्ध डट कर खड़े होने के लिए जनता का आह्वान कर रहे थे । किन्तु अंग्रेज सरकार का समर्थन मुस्लिम लीग के साथ था और तत्कालीन अन्य वरिष्ठ नेता भी अखण्ड भारत के लिए लड़ने की मनः स्थिति में नहीं थे। अंततः 3 जून 1947 को भारत विभाजन की घोषणा कर दी गई। एकाएक पूरे देश का वातावरण बदल गया । इस कठिन समय में संघ के स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पंजाब ही नहीं आसपास के सभी क्षेत्र के स्वयंसेवक पाकिस्तान केलिये घोषित भू भाग से हिंदुओं को सुरक्षित भारत भेजने का कार्य में लग गये । संघ का प्रयास था कि जब तक आखिरी हिन्दू सुरक्षित ना आ जाए तब तक डटे रहना है। उन कठिन दिनों में स्वयंसेवकों का अतुलनीय साहस, सेवा, समर्पण, पराक्रम, कार्यकुशलता, त्याग और बलिदान की गाथा भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखने योग्य है। श्री गुरूजी भी भारत के उसी भाग में घूमते रहे जो १५ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान बना दिया गया था। जितना संभव हो सकी गुरूजी के मार्गदर्शन में सकी संघ के स्वयंसेवकों ने सेवा और सहायता की ।

कश्मीर के भारत में विलय में योगदान

भारत विभाजन के उस कालखंड में मुस्लिम लीग के प्रभाव वाले क्षेत्र में हिन्दुओं की सुरक्षा की जितनी बड़ी चुनौती थी उतना ही महत्वपूर्ण था उन राज्यों को भारत से जोड़ना जो सीमा पर थे । इसमें कश्मीर सबसे महत्वपूर्ण राज्य था । मोहम्मद अली जिन्ना तरह तरह के प्रलोभन और भय दिखाकर कश्मीर के राजा को अपनी ओर मिलाने का कार्य करने में लगा था । ऐसे में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल ने जम्मू-कश्मीर रियासत के दीवान मेहरचन्द महाजन से भारत के साथ विलीनीकरण करने के लिए कश्मीर-नरेश श्री हरि सिंह जी को तैयार करने के लिए कहा था। और श्री मेहरचन्द महाजन ने मध्यस्थता के लिये श्रीगुरुजी का नाम सुझाया । श्रीगुरुजी के पास संदेश भिजवाया कि वे कश्मीर-नरेश से मिलकर उन्हें विलीनीकरण के लिए तैयार करें। श्रीगुरूजी तैयार हुये । सरदार पटेल और महाजन जी के प्रयास से कश्मीर के राजा हरिसिंह और श्रीगुरुजी की भेंट की तिथि निश्चित हो गई ।
श्रीगुरुजी 17 अक्तूबर 1947 को विमान द्वारा श्रीनगर पहुँचे। भेंट 18 अक्टूबर को प्रातः हुई। भेंट के समय 15-16 वर्षीय युवराज कर्ण सिंह जांघ की हड्डी टूटने से प्लास्टर में बंधे वहीं लेटे हुए थे। श्री मेहरचन्द महाजन भी भेंट के समय उपस्थित थे। कश्मीर-नरेश का कहना था – मेरी रियासत पूरी तरह से पाकिस्तान से घिरी है । सारे रास्ते सियालकोट तथा रावलपिण्डी की ओर से है। रेल सियालकोट की ओर से है। अनेक व्यवहारिक कठिनाइयाँ हैं।
श्रीगुरुजी ने समझाया कि आप हिन्दू राजा हैं। पाकिस्तान में विलय करने से आपको और आपकी हिन्दू प्रजा को भीषण संकटों से संघर्ष करना होगा। यह ठीक है कि अभी हिन्दुस्थान से रेल के रास्ते और हवाई मार्ग का कोई सम्पर्क नहीं है, किन्तु इन सबका प्रबन्ध शीघ्र ही हो जायेगा। आपका और जम्मू-कश्मीर रियासत का भला इसी में है कि आप हिन्दुस्थान के साथ विलीनीकरण कर लें। श्री गुरूजी के समझाने पर अन्ततः कश्मीर नरेश सहमत हो गये । वे 23 अक्टूबर को दिल्ली आये और जम्मू-कश्मीर राज्य का भारतीय गणतंत्र में विलय हो गया ।

चीनी आक्रमण के समय
श्री गुरूजी की भूमिका

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया । वह समय पूरे देश के लिये क्षोभ और शोक का था । भारतीय सेना अपने सीमित साधनों से उस आक्रमण का उत्तर देने में जुट गई। पर समाज का मनोबल बढ़ाना, भारतीय सैनिकों को सहायता पहुँचाना और युद्ध प्रभावित क्षेत्र सें सेवा सहायता का काम बड़ी चुनौती का था । इन चुनौतियों से निबटने का काम संघ ने संभाला और श्रीगुरु जी के मार्गदर्शन में संघ के स्वयंसेवक सेवा सहायता के कार्य में जुट गए। उनके सामयिक सहयोग का महत्व तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू नेषभी स्वीकारा और सन् 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में के संघ के स्वयंसेवकों को भी आमंत्रण भिजवाया। संघ के तीन सौ गणवेषधारी स्वयंसेवकों का घोष की ताल पर कदम मिलाकर चलना उस दिन के कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था।

जीवन की अंतिम यात्रा

श्री गुरुजी के जीवन का समापन रांची में ही हुआ । वहाँ बिहार प्राँत के कार्यकर्ताओं के एक दो दिवसीय वर्ग का आयोजन था । वह 10-11 मार्च 1973 की तिथि थी । आयोजन में लगभग एक हजार स्वयंसेवक उपस्थित थे। कार्यक्रम में बौद्धिक दर्शन देने के बाद श्रीगुरू जी कोलकाता जाने के लिए रांची रेल्वे स्टेशन पहुंचे । कार से उतरते ही लड़खड़ा गए। और अस्वस्थ हो गये । वे लगभग तीन माह अस्वस्थ रहे । रांची का आयोजन उनके जीवन का अंतिम सार्वजनिक आयोजन था । 5 जून 1973 को वे देह त्याग कर परम ज्योति में विलीन हो गये ।

कृतियाँ एवं विचार

श्रीगुरूजी ने बंच ऑफ थॉट्स तथा वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइंड पुस्तकें लिखीं। ‘बंच ऑफ थॉट्स’ का हिन्दी में “विचार नवनीत” नाम से अनुवाद हुआ ।

उनके विचारों पर आधारित संघ द्वारा प्रकाशित “गुरूजी : दृष्टि एवं लक्ष्य” नामक पुस्तक में “हिन्दू – मातृभूमि का पुत्र” नामक एक अध्याय में लिखा है कि ‘भारतीय’ वही है जिनकी दृष्टि व्यापक है और भारतीय धर्मों के मानने वाले सभी मानते हैं कि ईश्वर एक ही है उसे पाने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं ।
इस प्रकार श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य परम् पूज्य गुरुजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पौधे को एक विशाल वटवृक्ष का स्वरूप देकर और भारत राष्ट्र में राष्ट्र भाव प्रबल करने के लिये एक सशक्त संगठन और विचार देकर अमृत्तव को प्राप्त हुये । आज वे संसार भर में फैले लाखों करोड़ों स्वयंसेवकों श्रृद्धा और आदर्श जीवन का केन्द्र हैं।

आगरा में बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण: एकल-उपयोग प्लास्टिक के खिलाफ जंग की जरूरत

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आगरा, अपने ऐतिहासिक गौरव और मनमोहक वास्तुकला के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन आज यह शहर एक गंभीर पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। पॉलीथीन, PVC, छोटी प्लास्टिक की बोतलें और 100-200 ग्राम के पाउच जैसे एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के अंधाधुंध इस्तेमाल ने शहर की जल निकासी और सीवर प्रणाली को अवरुद्ध कर दिया है। यह समस्या न केवल शहर की सुंदरता को धूमिल कर रही है, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन गई है।

हर साल, लाखों एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद कुछ ही मिनटों के इस्तेमाल के बाद कचरे में तब्दील हो जाते हैं। ये उत्पाद सामाजिक समारोहों, शादियों और धार्मिक आयोजनों में सुविधाजनक लग सकते हैं, लेकिन इनका पर्यावरण पर होने वाला प्रभाव बेहद विनाशकारी है। ये प्लास्टिक उत्पाद न केवल हमारे प्राकृतिक परिदृश्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और वन्यजीवों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।

आगरा की सड़कों, पार्कों और नदियों में प्लास्टिक कचरे के ढेर दिखाई देते हैं। यह नज़ारा न केवल शहर की छवि को खराब करता है, बल्कि यह हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत का भी अपमान है। प्लास्टिक कचरा कीटों को आकर्षित करता है, जो बीमारियों को फैलाने का कारण बनता है। इसके अलावा, यह वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है।

एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद बायोडिग्रेडेबल नहीं होते। ये समय के साथ माइक्रोप्लास्टिक में टूट जाते हैं और हमारी मिट्टी और जल स्रोतों में मिल जाते हैं। इससे न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता है, बल्कि यह हमारे खाद्य श्रृंखला में भी प्रवेश कर जाता है। शोध के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक मानव शरीर में प्रवेश करके श्वसन संबंधी समस्याएं और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

प्लास्टिक कचरा शहर के बुनियादी ढांचे को भी प्रभावित कर रहा है। नालियों और सीवर लाइनों का अवरुद्ध होना आम बात हो गई है, जिससे मानसून के मौसम में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। नगर निगम को इन नालियों को साफ करने और कचरा प्रबंधन में भारी मात्रा में संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। अगर इस समस्या पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो यह शहर के विकास और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डालेगा।

इस समस्या से निपटने के लिए एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है। पॉलीथीन बैग, छोटी पानी की बोतलें और 200 ग्राम से कम वजन वाले पाउच जैसे उत्पादों के बजाय पुन: प्रयोज्य विकल्पों को अपनाने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, केवल 2 किलोग्राम की पानी की बोतलों को ही अनुमति दी जाए। इससे न केवल प्लास्टिक कचरा कम होगा, बल्कि नागरिकों में स्थिरता की संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा।

इस लड़ाई में सभी हितधारकों की भागीदारी जरूरी है। विक्रेताओं, इवेंट प्लानर्स और धार्मिक संगठनों को पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शैक्षिक अभियानों के माध्यम से लोगों को प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना होगा। साथ ही, सरकार को कड़े नियम लागू करने और उनके अनुपालन को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

आगरा के निवासियों का स्वास्थ्य, शहर का बुनियादी ढांचा और इसकी सुंदरता आज हमारे द्वारा किए गए विकल्पों पर निर्भर करती है। एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के अभिशाप को खत्म करने के लिए हमें सामूहिक रूप से काम करना होगा। आइए, हम सभी मिलकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, हरियाली भरा और टिकाऊ आगरा बनाने का संकल्प लें।

Tirlok Malik Highlights the Power of Universal Content at SIFFCY Panel on India-Global Cinematic Collaboration

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Emmy-nominated Indian-American filmmaker Tirlok Malik was among the distinguished panelists at the Smile International Film Festival for Children & Youth (SIFFCY) 2025, an initiative of Smile Foundation, in partnership with the European Union. Malik participated in a high-profile discussion titled “The Cinematic Bridges: Fostering India-Global Collaboration and Opportunities in Cinema”, held at Siri Fort Auditorium. Jitendra Mishra, Festival Director of SIFFCY, is committed to forging strong and long-lasting global collaborations.

The panel brought together some of the most influential voices in global cinema and art, including Andrea Anastasio, Director, Italian Embassy Cultural Centre, Stephan Ottenbruch, Festival Director, IndoGerman Film Week; Ketki Parikh, Co-Founder, Chicago South Asian Film Festival (CSFF); and Lichtkoppler Elisabeth, Director, Vienna International Children’s Film Festival.

Speaking on the evolving landscape of global cinema and the role of India in fostering cross-border collaborations, Tirlok Malik emphasized the significance of high-quality, universal content in transcending cultural and geographical boundaries. Reflecting on his own journey in cinema, Malik said, “When I started out in the 1990s with ‘Lonely in America,’ the landscape of cinema was very different. Today, digital platforms and streaming services have democratized the industry, offering immense opportunities for storytellers to connect with audiences worldwide.”

He further stressed the importance of content-driven storytelling in an era dominated by digital consumption. “The focus should always be on storytelling that resonates with a global audience. Technology has changed, distribution has changed, but emotions remain the same. A good story, told well, will always find its audience,” he remarked.

The panelists discussed the evolving nature of international co-productions, highlighting how India’s diverse cinematic heritage and expanding market make it an attractive hub for filmmakers worldwide. Stephan Ottenbruch noted the growing presence of Indian films in European film festivals, stating, “India’s storytelling tradition is unique, and there is an increasing appetite for its narratives across international platforms.”

Adding to the discourse, Ketki Parikh spoke about the rising opportunities for Indian filmmakers in global circuits, particularly in the United States. She remarked, “With festivals like CSFF in Chicago, we aim to bring South Asian stories to a wider audience. There is a strong demand for authentic, cross-cultural narratives that represent the Indian diaspora.”

Lichtkoppler Elisabeth, Director of the Vienna International Children’s Film Festival, emphasized the role of children’s cinema in fostering global understanding. She commented, “Children’s films have the power to bridge cultures and instill empathy from a young age. Indian cinema, with its rich tradition of storytelling, can play a pivotal role in this space.”

The discussion also touched upon the challenges of balancing commercial viability with artistic integrity in global collaborations. Malik addressed this by saying, “Independent filmmakers often face the challenge of funding, but the key lies in creating content that is both artistically satisfying and commercially viable. Platforms like SIFFCY provide an excellent opportunity for emerging filmmakers to showcase their work and connect with the right audience.”

Andrea Anastasio contributed to the conversation by discussing the programming lineup of the Italian Embassy Cultural Centre, including the ongoing Marcello Mastroianni centenary celebrations and the upcoming screening of the restored version of Apu Trilogy at the 2025 Habitat International Film Festival. He also talked about the importance of co-production treaties between countries.

Malik expressed his gratitude towards SIFFCY for organizing such a significant forum, stating, “Platforms like SIFFCY play a crucial role in shaping the future of cinema by bringing together filmmakers, industry experts, and young audiences. It is an honor to be part of such a meaningful conversation.”

The panel concluded with an engaging Q&A session, where budding filmmakers and students had the opportunity to interact with the esteemed speakers. The discussion underscored the ever-growing potential of India’s film industry in shaping the global cinematic landscape while reinforcing the importance of meaningful storytelling in building cultural bridges.

As cinema continues to evolve, discussions like these at SIFFCY reaffirm the power of storytelling in fostering collaboration and understanding across borders.

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