दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का आंखों देखा हाल

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संजीव पालीवाल

दिल्ली । मैं ठीक हूँ । मुझे कुछ नहीं हुआ। लेकिन तीन दिन एक सरकारी अस्पताल में कटे। कितना सीखा। कितना बर्दाश्त किया। हम सब मुग़ालते में हैं। यही समझ आया। मैं कितना कम जानता हूं। ये अहसास भी हुआ।

अस्पताल में डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों की हालत देख कर अफ़सोस हुआ। मरीज़ का हाल तो पूछिये ही नहीं।
पंद्रह घंटे खड़ा रहा क्योंकि बैठने की जगह नहीं थी। पानी तक नहीं पी सका क्योंकि हिम्मत नहीं हुई टॉयलेट जाने की। डर के मारे कुछ खाया भी नहीं क्योंकि हाथ में कितने तरह के कीटाणु होंगे सोच कर ही थर्रा रहा था।
ये बात दिल्ली की है। बहुत बड़े सरकारी अस्पताल की है। इलाज के लिये सब मिला। दवा मिली, टेस्ट हुए, बिस्तर मिला। सब बगैर सिफारिश के मिला। लेकिन जो हाल देखा उसने हिला दिया।

पहली बार समझ आया कि अस्पतालों में परिवार क्यों जमें रहते हैं। क्यों भीड़ रहती है। क्योंकि आपको सब कुछ खुद करना पड़ता है। स्ट्रेचर तीन तीन मंजिल खुद खींचते रहिये। स्ट्रेचर लेकर आइये और जमा भी कीजिये। पहली बाद भोगा। समझा। मरीज को भी खुद उठाकर बेड पर रखिये। कोई नहीं है मदद करने वाला।
डॉक्टर क्यों चिढ़े रहते हैं। मरीज़ों की भीड़ है। अटेंडेंट की भारी कमी है।

एक मरीज़ को देखते हैं तो तीन और आ जाते हैं। एक बिस्तर पर दो दो मरीज़ हैं।
किसी को इस पूरी सरकारी व्यवस्था को बदलना पड़ेगा। बदलाव करना पड़ेगा। एक इंसान चाहिये जो ये कहे कि मरीज़ की इज़्ज़त है। जब आपके पास डॉक्टर है, दवा है, मशीनें हैं तो अटेंडेंट क्यों नहीं हैं। बेड क्यूँ नहीं हैं। सफाई क्यूं नहीं है।

मरीज़ को इज़्ज़त देने की ज़रूरत है। सरकार में किसी को सोचना पड़ेगा। बजट दिया अच्छा किया।लेकिन कार्य संस्कृति भी बदलिये। मानवीयता लाइये। गरीब की भी इज़्ज़त कीजिये।

मैं दिल्ली के गुरू तेग़ बहादुर अस्पताल में था। अपने चचेरे भाई के लिये।

यही समझ आया कि एक बड़ी मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी अपने परिवार के लिये ज़रूर रखिये। इलाज प्राइवेट अस्पताल में कराना ही होगा। मरीज़ और तीमारदार दोनो के लिये बेहद जरूरी है।

राजद प्रवक्ताओं की अभद्रता: टीवी डिबेट में तथ्यों की जगह अपशब्द और प्रोपेगेंडा

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दिल्ली। हाल के दिनों में, सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की प्रवक्ताओं—कंचना यादव, सारिका पासवान और प्रियंका भारती—के टीवी डिबेट्स में अभद्र व्यवहार और अपशब्दों से भरे वीडियो वायरल हो रहे हैं। इन प्रवक्ताओं का व्यवहार न केवल राजनीतिक चर्चा के स्तर को नीचे लाता है, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। न्यूज चैनलों पर होने वाली पैनल चर्चाओं में ये प्रवक्ता तथ्यों और तर्कों के बजाय व्यक्तिगत हमलों, अपशब्दों और प्रोपेगेंडा का सहारा लेती नजर आ रही हैं, जिसकी कड़ी आलोचना हो रही है।

इन वीडियो में कंचना यादव, सारिका पासवान और प्रियंका भारती द्वारा अन्य पैनलिस्टों के साथ किया गया व्यवहार निंदनीय है। ये प्रवक्ता अक्सर चर्चा के दौरान विषय से भटककर व्यक्तिगत टिप्पणियां करती हैं और विरोधी पक्ष के तर्कों को सुनने की बजाय चीख-चिल्लाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करती हैं। हाल ही में एक डिबेट में, कंचना यादव ने एक पैनलिस्ट को अपशब्द कहते हुए उनकी योग्यता पर सवाल उठाया, जबकि सारिका पासवान ने बिना किसी तथ्य के विपक्षी दलों पर कीचड़ उछालने की कोशिश की। प्रियंका भारती ने भी एक चर्चा में तर्कों को नजरअंदाज करते हुए भावनात्मक प्रोपेगेंडा और महिला व पिछड़ा कार्ड खेलने की कोशिश की, जो उनकी कमजोर तैयारी को उजागर करता है। इस तरह की हरकतें न केवल उनके राजनीतिक दल की छवि को धूमिल करती हैं, बल्कि जनता के बीच भी गलत संदेश देती हैं।

यह विशेष रूप से शर्मनाक है कि ये प्रवक्ता अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए बार-बार महिला और पिछड़ा होने का कार्ड खेलती हैं। यह रणनीति न केवल पुरानी हो चुकी है, बल्कि यह समाज के उन लोगों का भी अपमान करती है जो वास्तव में अपने समुदाय के लिए संघर्ष करते हैं। अगर इन प्रवक्ताओं को वंचित वर्ग से आने वाले किसी व्यक्ति से प्रेरणा लेनी है, तो उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता डॉ. गुरु पासवान को देखना चाहिए। डॉ. पासवान, जो स्वयं एक वंचित समाज से आते हैं, अपनी हर बात को तथ्यों और तर्कों के साथ पेश करते हैं। वह किसी भी प्रश्न से पीछे नहीं हटते और न ही व्यक्तिगत हमलों का सहारा लेते। उनकी पढ़ाई-लिखाई और गहन विषय-ज्ञान उन्हें एक प्रभावी वक्ता बनाता है। क्या राजद की प्रवक्ताएं उनसे कुछ नहीं सीख सकतीं? डॉ. पासवान का व्यवहार और उनकी तार्किक क्षमता इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक पृष्ठभूमि कोई बहाना नहीं होनी चाहिए; मेहनत और ज्ञान ही असली ताकत हैं।

इन राजद प्रवक्ताओं की सबसे बड़ी कमी उनकी तथ्यहीनता और तैयारी की कमी है। चर्चा में जब तथ्य और आंकड़े मांगे जाते हैं, तो ये प्रवक्ता या तो विषय बदल देती हैं या फिर चीख-चिल्लाकर माहौल को विषाक्त करने की कोशिश करती हैं। उदाहरण के लिए, एक हालिया डिबेट में जब उनसे बिहार में राजद शासन के दौरान शिक्षा और रोजगार के आंकड़ों पर सवाल किया गया, तो कंचना यादव ने जवाब देने के बजाय विपक्षी पैनलिस्ट पर व्यक्तिगत टिप्पणी की। यह व्यवहार न केवल उनकी अक्षमता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वे जनता के असल मुद्दों से कितनी दूर हैं।

 


सोशल मीडिया पर इन वीडियो को देखकर जनता का गुस्सा साफ झलकता है। लोग इन प्रवक्ताओं की तुलना उन नेताओं से कर रहे हैं जो तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात रखते हैं। यह समय है कि राजद अपनी प्रवक्ताओं को प्रशिक्षित करे और उन्हें समझाए कि राजनीतिक चर्चा का मकसद प्रोपेगेंडा फैलाना नहीं, बल्कि जनता को सच्चाई से अवगत कराना है। इन प्रवक्ताओं को यह समझना होगा कि अपशब्द और अभद्रता उनकी कमजोरियों को और उजागर करती है। अगर वे डॉ. गुरु पासवान जैसे प्रवक्ताओं से प्रेरणा लें, तो शायद वे अपनी विश्वसनीयता को बचा सकें।

अंत में, राजद को अपनी प्रवक्ताओं की इस तरह की हरकतों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जनता अब ऐसी राजनीति को बर्दाश्त नहीं करेगी जो तथ्यों के बजाय शोर-शराबे और अपशब्दों पर टिकी हो। इन प्रवक्ताओं को अपनी गलतियों से सबक लेना होगा और राजनीतिक चर्चा को एक सभ्य और तार्किक स्तर पर लाना होगा।

भारत के सात प्रमुख फोटोग्राफरों की कला: सौंदर्य और स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति

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दिल्ली। भारत में फोटोग्राफी एक ऐसी कला है जो न केवल दृश्य सौंदर्य को उजागर करती है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशों को भी प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है। हाल के वर्षों में, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों ने फोटोग्राफरों को अपनी रचनात्मकता को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर प्रदान किया है। इस लेख में, हम सात उल्लेखनीय भारतीय फोटोग्राफरों-तारस तारापोरवाला, अर्जुन मार्क, रोहन श्रेष्ठ, विक्रम बावा, रफीक सईद, भूमिका भाटिया और सौम्या अय्यर-के कार्यों पर प्रकाश डालेंगे, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से Nude Art को न केवल सौंदर्यपूर्ण बनाया, बल्कि सामाजिक मानदंडों को चुनौती भी दी।

तारस तारापोरवाला: कामुकता का सौंदर्य
तारस तारापोरवाला (@taras84) की फोटोग्राफी उनकी संवेदनशील और कामुक छवियों के लिए जानी जाती है। उनकी इंस्टाग्राम फीड दर्शकों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां मानव शरीर को कला के रूप में उत्सव के साथ प्रस्तुत किया जाता है। तारस की तस्वीरें नग्नता को एक नाजुक और सौंदर्यपूर्ण तरीके से चित्रित करती हैं, जो दर्शकों को मानव शरीर की सुंदरता और उसकी सहजता की ओर आकर्षित करती हैं। उनकी रचनाएं न केवल तकनीकी रूप से उत्कृष्ट हैं, बल्कि भावनात्मक गहराई भी प्रदान करती हैं, जो दर्शकों को गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं।

अर्जुन मार्क: फैशन और कला का संगम
फोटोग्राफर अर्जुन मार्क अपनी फैशन फोटोग्राफी में एक अनूठी संवेदनशीलता लाते हैं। उनकी तस्वीरें बोल्ड और नवीन हैं, जो Nude Art को फैशन के साथ जोड़कर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। अर्जुन की रचनाएं अक्सर समकालीन सौंदर्यशास्त्र और पारंपरिक भारतीय तत्वों का मिश्रण होती हैं, जो उनकी फोटोग्राफी को विशिष्ट बनाती हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड एक दृश्यात्मक यात्रा है, जो दर्शकों को न केवल देखने, बल्कि महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।

रोहन श्रेष्ठ: बॉलीवुड का पसंदीदा लेंस

रोहन श्रेष्ठ (@rohanshrestha) बॉलीवुड के जाने-माने फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने शाहरुख खान से लेकर प्रियंका चोपड़ा तक कई बड़े सितारों को अपने कैमरे में कैद किया है। उनकी फोटोग्राफी में टेस्टोस्टेरोन से भरी ऊर्जा और Nude Art का साहसी प्रदर्शन देखने को मिलता है। रोहन की तस्वीरें न केवल तकनीकी रूप से मजबूत होती हैं, बल्कि वे अपने विषयों की व्यक्तित्व को भी उजागर करती हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड में Nude Art का प्रदर्शन अनपोलोजेटिक और सशक्त है, जो सामाजिक धारणाओं को चुनौती देता है।

विक्रम बावा: त्रि-आयामी दृष्टिकोण
विक्रम बावा (@vikram_bawa) भारत में त्रि-आयामी (3D) फोटोग्राफी के अग्रणी हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड सेलिब्रिटी पोर्ट्रेट्स और नग्न कला का एक शानदार मिश्रण प्रस्तुत करती है। विक्रम की तस्वीरें मानव शरीर की सुंदरता को एक नए दृष्टिकोण से दर्शाती हैं, जहां तकनीक और कला का संगम होता है। उनकी रचनाएं दर्शकों को न केवल दृश्यात्मक रूप से आकर्षित करती हैं, बल्कि मानव शरीर की जटिलता और सौंदर्य को समझने के लिए प्रेरित करती हैं।

रफीक सईद: श्वेत-श्याम का जादू
रफीक सईद (@rafique_sayed) भारत के सबसे प्रसिद्ध श्वेत-श्याम (B&W) फोटोग्राफरों में से एक हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड उनकी तीक्ष्ण सौंदर्यबोध को दर्शाती है, जहां Nude Art को एक कालातीत और गहन तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। रफीक की तस्वीरें अक्सर प्रमुख विज्ञापन अभियानों का हिस्सा रही हैं, और उनकी Nude Art समाज के रूढ़िगत विचारों को तोड़ने का प्रयास करती है। उनकी रचनाएं न केवल दृश्यात्मक रूप से प्रभावशाली हैं, बल्कि भावनात्मक और वैचारिक गहराई भी प्रदान करती हैं।

भूमिका भाटिया: प्रकाश और छाया का खेल
भूमिका भाटिया (@bhumikab) की फोटोग्राफी प्रकाश और छाया के साथ एक जादुई खेल है। उनकी तस्वीरें ईथरियल और कभी-कभी अतियथार्थवादी होती हैं, जो दर्शकों के दिल को छू लेती हैं। भूमिका की Nude Art मानव शरीर को एक काव्यात्मक और सौंदर्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है, जो समाज में नग्नता के प्रति गलत धारणाओं को चुनौती देती है। उनकी इंस्टाग्राम फीड एक ऐसी दुनिया की झलक देती है जहां कला और भावनाएं एक-दूसरे के साथ संनाद करती हैं।

सौम्या अय्यर: साहसी और नवीन दृष्टिकोण
मुंबई की फैशन फोटोग्राफर सौम्या अय्यर की तस्वीरें अपनी साहसिकता और अनूठे दृष्टिकोण के लिए जानी जाती हैं। उनकी रचनाएं पहली नजर में ही ध्यान खींचती हैं, और उनकी Nude Art सामाजिक मानदंडों को चुनौती देती है। सौम्या की फोटोग्राफी में एक तीक्ष्णता और परिप्रेक्ष्य है जो दर्शकों को न केवल देखने, बल्कि सोचने के लिए मजबूर करता है। उनकी इंस्टाग्राम फीड उनकी रचनात्मकता और साहस का एक जीवंत प्रदर्शन है।

 

नग्न कला और सामाजिक संदेश
इन फोटोग्राफरों की कला न केवल सौंदर्यपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशों को भी व्यक्त करती है। भारत जैसे देश में, जहां नग्नता को अक्सर कामुकता के साथ जोड़कर देखा जाता है, ये फोटोग्राफर Nude Art को एक स्वतंत्र और सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाएं खजुराहो जैसे प्राचीन भारतीय मंदिरों की नग्न मूर्तियों की याद दिलाती हैं, जो मानव शरीर को कला और सौंदर्य के प्रतीक के रूप में उत्सव मनाते थे।

चुनौतियां और विवाद
हालांकि, Nude Art का प्रदर्शन भारत में विवादों से मुक्त नहीं रहा है। 2006 में, एम.एफ. हुसैन की नग्न चित्रकारी ने व्यापक विवाद खड़ा किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें देश छोड़ना पड़ा। इन फोटोग्राफरों को भी इंस्टाग्राम जैसे मंचों पर सेंसरशिप और सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता है। फिर भी, ये कलाकार अपनी कला के माध्यम से समाज की रूढ़ियों को तोड़ने और मानव शरीर को एक सौंदर्यपूर्ण और सशक्त रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

तारस तारापोरवाला, अर्जुन मार्क, रोहन श्रेष्ठ, विक्रम बावा, रफीक सईद, भूमिका भाटिया और सौम्या अय्यर भारतीय फोटोग्राफी के क्षेत्र में अपनी अनूठी छाप छोड़ रहे हैं। उनकी इंस्टाग्राम फीड्स न केवल दृश्यात्मक सौंदर्य का खजाना हैं, बल्कि सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने और मानव शरीर की सुंदरता को उत्सव के रूप में प्रस्तुत करने का एक साहसी प्रयास भी हैं। ये फोटोग्राफर नग्न कला को एक नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करते हैं, जहां यह न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम भी है।
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संघ यात्रा के नए क्षितिज..!

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– प्रशांत पोळ

दिल्ली । दिनांक 26, 27 और 28 अगस्त को, दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ इस शीर्षक से व्याख्यानमाला संपन्न हुई। यह व्याख्यानमाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आयोजित की थी और सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी इसमें वक्ता थे। इस कार्यक्रम में देश-विदेश के गिने-चुने एक हजार लोग आमंत्रित थे। इनमें कुछ देशों के राजनयिक भी सम्मिलित थे। विज्ञान भवन अत्याधुनिक तकनीकी से सुसज्जित हैं। इसलिए, सरसंघचालक जी जब हिंदी में बोल रहे थे, तभी हेडफोन्स के माध्यम से उसे अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश और जर्मन भाषा में सुनने की व्यवस्था थी। हम यूं समझें, कि देश के वैचारिक क्षेत्र के Who’s Who वहां उपस्थित थे।

मोटे तौर पर, पहले दिन सरसंघचालक जी ने सौ वर्ष के संघ के प्रवास का वर्णन
किया। संघ की स्थापना की आवश्यकता का गहराई से विवेचन किया। दूसरे दिन, संघ के प्रवास की दिशा क्या रहेगी, संघ का लक्ष्य क्या रहेगा, अगले सौ वर्षों की संघ की सोच क्या रहेगी, इन विषयों पर चर्चा की। अंतिम दिन श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए।

*तीन दिनों की यहां व्याख्यानमाला अनेक अर्थों में ऐतिहासिक थी। संघ के बारे में अत्यंत स्पष्ट चित्र खींचने वाली थी। यह दिशा दर्शक भी थी।*

इस विजया दशमी को संघ को सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा मील का पत्थर हैं। किंतु साध्य नहीं हैं। इस प्रवास में अभी और आगे जाना है।

‘कहां तक और किस दिशा में..?’

इसका उत्तर भी सरसंघचालक जी ने बड़े विस्तार के साथ दिया हैं। आपका दूसरे दिन का उद्बोधन, कार्यक्रम प्रारंभ होने के बाद 30 वे मिनट से आगे, लगभग 10 – 12 मिनट तक यदि हम सुनते हैं, तो सारा चित्र स्पष्ट हो जाता हैं।

सरसंघचालक जी ने धर्म (रिलिजन नहीं) की स्पष्टता बताते हुए कहा कि, “धर्म तो इस सृष्टि में पहले से ही अस्तित्व में था। धर्म यह यूनिवर्सल हैं। *विश्व की गति को पहचान कर उसको ठीक से चलाने वाला जो प्राकृतिक नियम हैं, वह धर्म हैं।*”

धर्म की इतनी सरल, इतनी सुंदर और इतनी सुस्पष्ट व्याख्या हमने कहीं सुनी नही होगी।

*इसी विचार को आगे बढ़ते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि, “इस धर्म को हमें विश्व को समझाना हैं। उसे सारे विश्व में लेकर जाना हैं।”*

पर कैसे..?

Not by Preaching, not by Conversion, but by Practice.
_(प्रवचन या भाषण देकर नहीं, धर्मांतरण करके भी नहीं, तो धर्म को जीने का उदाहरण प्रस्तुत करके)_

*यह जबरदस्त हैं। नए वैश्विक परिदृश्य में यह अत्यंत प्रभावी संदेश हैं। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की हमारी संकल्पना प्राचीन हैं। उसे अगले 100 वर्षों में धरातल पर उतारने का संकल्प लेकर संघ आगे बढ़ रहा हैं।*

सरसंघचालक जी ने वर्ष 1991 का एक वाकया बताया। तब वह विदर्भ प्रांत के प्रांत प्रचारक थे। स्वर्गीय लक्ष्मणराव जी भिड़े उन दिनों पश्चिम क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक थे। इससे पहले वह अनेक वर्ष विदेश विभाग में प्रचारक थे। सरसंघचालक जी 1991 के वर्ग में लक्ष्मणराव जी भिड़े के उद्बोधन का उल्लेख कर रहे थे। उस उद्बोधन में लक्ष्मणराव जी ने कहा कि, “भारत के बाहर संघ का कार्य करने वाली अब तीसरी पीढ़ी हैं। इस पीढ़ी ने अपने-अपने देशों में, देश – काल – परिस्थिति और प्रवृत्ति के अनुरूप संघ खड़ा करना चाहिए। ऐसा संघ, जिसे देखकर उस देश के लोग कहे, हमें ऐसा RSS खड़ा करना हैं..!”

कितनी बड़ी सोच है यह..!

स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी की कविता की पंक्तियां हैं –
_शत जन्म शोधिताना I शत आर्ति व्यर्थ झाल्या I_
_शत सूर्य मालिकांच्या I दीपावली विझाल्या II_
(असंख्य जन्मों की खोज, अनगिनत आरतियाँ और हजारों सूर्य-मालाओं की दीप्ति भी निष्फल सिद्ध हुई, मानो दीपावली के दीप भी बुझ गए हों।)

इसमें सावरकर जी अपने सौरमाला (सूर्य मंडल) जैसे सौ सौरमाला (Solar System) की बात कर रहे हैं। प्रख्यात मराठी लेखक पु. ल. देशपांडे जी ने कहा था, “सावरकर जी की इन दो पंक्तियों में दिखी विचारों की उडान के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल मिलना चाहिए।”

बस् ऐसा ही कुछ इस सोच में भी है।

_विश्व धर्म प्रकाशेन I विश्व शांति प्रवर्तके II_
अर्थात, इस विश्व धर्म के प्रकाश में, विश्व शांति का प्रवर्तन होना चाहिए।

आज जो विश्व का परिदृश्य हम देख रहे हैं, वह बहुत अच्छा नहीं हैं। यहां लड़ाई हैं, संघर्ष हैं, गरीबी हैं, सामाजिक अस्वस्थता हैं, उजड़े हुए कुटुंब हैं, विद्वेष हैं, कट्टरपन और बहशीपन हैं… ऐसे विश्व में आज अपने देश का ‘हिंदू विचार’ अत्यंत प्रासंगिक और महत्व का बन गया हैं। इसलिए, अब विश्व के अनेक देशों में यह विचार लेकर, उन – उन देशों की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार उसे ढालकर, नयी विश्व रचना का सृजन करने की आवश्यकता दिख रही हैं।

सहसा, 11 सितंबर 1893 को, शिकागो के अंतरराष्ट्रीय धर्म परिषद में दिया गया स्वामी विवेकानंद जी का भाषण स्मरण हो आया..!

सरसंघचालक जी ने कहा कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संकल्पना संघ में नई नहीं हैं। संघ के अंदर कई बार इसकी चर्चा हो चुकी हैं। किंतु प्रकट रूप से संघ यह बात कहता नहीं था। सरसंघचालक जी ने कहा, “उन दिनों यदि हम आपको बुलाते तो आप नहीं आते। आते भी, तो हमारी बातों को गंभीरता से नहीं लेते। और यह विश्व कल्याण की बातें तो आपको स्वप्नरंजन लगती।”

इसका कारण था। तब संघ की विशेष ताकत नहीं थी, और अपने देश की भी स्थिती, किसी को सुनाने जैसी नहीं थी।

*किंतु अब नहीं। अब बहुत कुछ बदला हैं। संघ की शक्ति और फैलाव भी बढा हैं। साथ ही, भारत वैश्विक मंच पर एक शक्तिशाली तथा तेजी से आगे बढ़ते देश के रुप मे प्रस्थापित हो चुका हैं।*

किंतु सरसंघचालक ने यह भी कहा कि, “विश्व कल्याण की बात करने से पहले हमें एक प्रतीक के रूप में, एक मॉडल के रूप में खड़ा होना पड़ेगा। यदि हम ही हमारे हिंदू विचार को प्रत्यक्ष जीवन में नहीं उतारेंगे, तो विश्व हमारी बातें क्यों सुनेगा.?”

इसलिए, संघ ने अपने प्रवास के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर प्रत्यक्ष समाज में परिवर्तन लाने का संकल्प लिया हैं। इस परिवर्तन के पांच आयाम है –

1. *समरसता* – सारा समाज जाति पंथ से परे, एकजुट हो। ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ यह भावना सबके मन में रहे।

2. *पर्यावरण* – पर्यावरण पूरक जीवन यह हमारी हिंदू जीवन पद्धति का अभिन्न अंग रहा हैं। उसे, हमे पुनः आज के परिपेक्ष्य में अपनाना हैं।

3. *’स्व’ के भाव का जागरण* – देश तभी उठ खड़ा होगा, जब हमारे अंदर अपने ‘स्व’ का भाव जागृत होगा। इसलिए स्वदेशी समवेत, हमारी पहचान से जुड़ी हर चीज अपनानी होगी।

4. *परिवार प्रबोधन* – समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार, उसे मजबूत करना।

5. *नागरिक कर्तव्य* – सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन करते हुए राष्ट्रहित में योगदान देना।

इन पांच बातों को यदि हम समाज में ठीक से उतारते हैं, तो हम निश्चित रूप से विश्व को कुछ बताने की भूमिका में रह सकेंगे।

इस त्रि दिवसीय व्याख्यानमाला में सरसंघचालक जी ने अत्यंत खुलकर और पारदर्शिता से सारी बातें कहीं। ‘हिंदू’ शब्द के आग्रह के बारे में तर्कपूर्ण विचार रखें। साथ ही, “भारत यह हिंदू राष्ट्र है। अलग से घोषित करने की आवश्यकता नहीं।” यह भी अत्यंत स्पष्टता से कहा।

दो मिनट के लिए जरा राजनीति को बाजू में रखें, मीडिया के टीआरपी समाचारों को दुर्लक्षित करें और इस तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के बारे में सोचे, तो हम पाएंगे कि भारत के भविष्य का एक सुस्पष्ट चित्र सरसंघचालक जी ने खींचा है..!

_(अगर यह व्याख्यानमाला नही सुनी होगी, तो एक बार अवश्य सुने।)_

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