मशरूम उत्पादन में अव्वल बन सकता है झारखंड

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पद्मश्री अशोक भगत 

झारखंड में यदि मशरूम की व्यावसायिक खेती की जाए, तो यह स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति बदल सकता है. हालांकि हाल के दिनों में इस दिशा में थोड़ा काम हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यापारिक योजना के तहत इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है. 

विकासशील देशों में भारत तेजी से आगे की ओर बढ़ रहा है. एक अनुमान में बताया गया है कि आने वाले 10 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था चीन को पछाड़ कर दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था बन जायेगी. अब यहां गुणवत्तापूर्ण विकास की बात होने लगी है. विगत कुछ वर्षों में सरकार ने खाद्य गुणवत्ता पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. प्रधानमंत्री लगातार श्रीअन्न की बात कर रहे हैं. ऐसे में हमारे लिए मशरूम एक बेहतर विकल्प प्रदान कर सकता है. मशरूम का न केवल आसानी से, अपितु कम लागत पर उत्पादन किया जा सकता है. इसके लिए भारत की जलवायु भी बेहद सकारात्मक मानी जाती है. दुनिया में बड़ी संख्या में कवक पाये जाते हैं. अधिकृत आंकड़ों के अनुसार, पूरे विश्व में 15 लाख कवक हैं, जिसमें से केवल 11 लाख कवक का ही अब तक अध्ययन हो पाया है. उनमें से 14,000 कवक मशरूम हैं, जिनमें से मात्र 3,000 ही खाने योग्य है. अमेरिका और यूरोपीय देशों ने केवल बटन मशरूम पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है. उसी प्रकार जापान, चौन आदि देशों ने शिटेक और ओरिकुलेरिया जैसे मशरूमों के उत्पादन पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. इसके अलावा भी कई ऐसे मशरूम हैं, जो न केवल खाने में स्वादिष्ट होते हैं, अपितु स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पोषक हैं.
 
मशरूम में भरपूर मात्रा में फाइबर, सेलेनियम, विटामिन सी, विटामिन डी जैसे पोषक तत्व पाये जाते हैं. एंजाइम से परिपूर्ण मशरूम का इस्तेमाल करने से कई बीमारियां दूर रहती हैं. इनमें एंटीबायोटिक पाये जाते हैं, जो हमारे शरीर में नयी कोशिकाओं का निर्माण करते हैं. चीन में इसे महाऔषधि माना जाता है, तो रोम में लोग इसे ईश्वर  का आहार मानते हैं, मशरूम में लीन प्रोटीन होता है, जो वजन घटाने और मांसपेशी बनाने के लिए आदर्श है. फंक्शनल फूड सेंटर द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट की मानें, तो डायबिटीज के मरीजों के लिए मशरूम आदर्श आहार है. इसमें न फैट होता है, न कोलेस्ट्रॉल. कार्बोहाइड्रेट भी इसमें न के बराबर होता है, जबकि प्रोटीन, विटामिन और खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं. यह हड्डियों को भी मजबूत बनाता है. इसमें प्राकृतिक इंसुलिन है, जो डायबिटीज के रोगियों के लिए वरदान है. 

मशरूम में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट्स हानिकारक रेडिकल्स से बचाते हैं. इसमें एगोंथायोनीन नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में बहुत प्रभावी है. दिल की बीमारी में यह वरदान है, तो कैंसर के रोगियों के लिए यह दैवीय औषधि से कम नहीं है. जापान में किये गये एक शोध के अनुसार, मशरूम के सेवन से प्रॉस्टेट और ब्रेस्ट कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है. इधर मशरूम उत्पादन में क्रांति आयी है. वर्ष 1960 में वैश्विक स्तर पर मशरूम का उत्पादन केवल 1.7 करोड़ टन था, जो वर्तमान में बढ़ कर चार करोड़ टन तक पहुंच गया है. इसका अत्पादन लगातार बढ़ रहा है. पिछले दशक में इसके उत्पादन में 200 गुना से अधिक वृद्धि हुई है और उम्मीद की जा रही है कि 2050 तक इसका उत्पादन 10 करोड़ टन तक पहुंच जायेगा. गुणवत्तापूर्ण मशरूम उत्पादन में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यह न केवल गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न की समस्या का समाधान करेगा, अपितु ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा. भारत का वातावरण मशरूम उत्पादन 
की दृष्टि से बेहद अनुकूल माना जा रहा है. झारखंड की बात करें, तो यहां मशरूम पहले से ही खाद्य शैली का अंग रहा है. झारखंड और अगल-बगल के वन क्षेत्रों में बारिश के दिनों में एक खास प्रकार का जंगली मशरूम मिलता है. इसे स्थानीय भाषा में खुखड़ी कहा जाता है. गुणवत्ता और स्वाद की दृष्टि से खुखड़ी का कोई विकल्प नहीं, लेकिन यह सीमित समय में प्राप्त होता है. झारखंड में यदि मशरूम की व्यावसायिक खेती की जाए, तो यह स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति भी बदल सकता है. हालांकि हाल के दिनों में इस दिशा में थोड़ा काम हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यापारिक योजना के तहत इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है. 

इसके उत्पादन से ग्रामीणों में कुपोषण की समस्या का समाधान तो होगा ही, इसका व्यापार कर लोग बढ़िया आमदनी भी कर सकते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल झारखंड में सालाना लगभग 50 टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है. लेकिन यहां इसके उत्पादन की अपार संभावना है. बिहार की तुलना में झारखंड की जलवायु मशरूम उत्पादन के लिए बेहतर है, लेकिन बिहार देश का प्रथम मशरूम उत्पादक राज्य बन गया है, जबकि झारखंड अभी बहुत पीछे है. इसके लिए यहां बेहतर आधारभूत संरचना की जरूरत है. दूसरी यहां की सबसे बड़ी समस्या चूहा है, जो मशरूम का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है. झारखंड के किसान इस दृष्टि से पिछड़ रहे हैं. यदि मशरूम की खेती पर ध्यान दिया जाए, तो झारखंड देश का प्रथम मशरूम उत्पादक राज्य बन सकता है. इसके लिए सरकार को भी इस दिशा में थोड़ा ध्यान देना होगा. 

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

जितना भव्य भवन उतना भव्य कार्य खड़ा करना है

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देश में संघ कार्य गति पकड़ रहा है, व्यापक हो रहा है। आज जिस पुनर्निर्मित भवन का यह प्रवेशोत्सव है उसकी भव्यता के अनुरूप ही हमें संघ कार्य का रूवरूप भव्य बनाना है और हमारे कार्य से उसकी अनुभुति होनी चाहिए। यह कार्य पूरे विश्व तक जाएगा और भारत को विश्वगुरु के पद पर आसीन करेगा, ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। और हम अपनी इसी देह, इन्हीं आखों से बनते देखेंगे, यह विश्वास है। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों को इसके लिए पुरुषार्थ करना होगा। हमें इसके लिए कार्य को सतत विस्तार देना होगा।’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने झंडेवालान में पुनर्निर्मित ‘केशव कुंज’ के प्रवेशोत्सव कार्यक्रम में उपस्थित जन को संबोधित करते हुए उक्त विचार व्यक्त किए।

उन्होंने आगे कहा कि आज संघ के विभिन्न आयामों के माध्यम से संघ कार्य विस्तृत हो रहा है। इसलिए अपेक्षा है कि संघ के स्वयंसेवक के व्यवहार में सामर्थ्य, शुचिता बनी रहे। श्री भागवत ने कहा कि आज संघ की दशा बदली है, लेकिन दिशा नहीं बदलनी चाहिए। समृद्धि की आवश्यकता है, जितना आवश्यक है उतना वैभव होना चाहिए भी, लेकिन ऐसा मर्यादा में रहकर होना चाहिए। श्री केशव स्मारक समिति का यह पुनर्निर्मित भवन भव्य है, इसकी भव्यता के अनुरूप ही कार्य खड़ा करना होगा।

सरसंघचालक जी ने इस अवसर पर संघ के आरम्भ से ही आद्य सरसंघचालक द्वारा झेली अनेक कठिनाइयों का उल्लेख किया और नागपुर में पहले कार्यालय ‘महाल’ की शुरुआत के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि क्योंकि दिल्ली देश की राजधानी है और सूत्रों का संचालन यहां से होता है, इसलिए यहां एक कार्यालय की आवश्यकता महसूस हुई और उस आवश्यकता के अनुसार यहां कार्यालय बनाया गया है। उन्होंने कहा, आज यह भव्य भवन बन जाने भर से संघ स्वयंसेवक का काम पूरा नहीं होता। हमें ध्यान रखना होगा कि उपेक्षा और विरोध हमें सावधान रखता है, लेकिन अब अनुकूलता का वातावरण है हमें अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर उपस्थित स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि कार्यालय हमें कार्य की प्रेरणा देता है, लेकिन उसके वातावरण की चिंता करना प्रत्येक स्वयंसेवक का कर्तव्य है।

श्रीराम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष पूज्य गोविंददेव गिरी जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि आज श्री गुरुजी की जयंती है इसलिए पावन दिन है। आज शिवाजी की भी जयंती है। शिवाजी संघ की विचार शक्ति हैं। कांची कामकोटि पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य परमाचार्य जी ने एक बार एक वरिष्ठ प्रचारक से कहा था कि संघ प्रार्थना से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है। गोविंददेव गिरी जी ने छावा फिल्म का उल्लेख करते हुए कहा कि छत्रपति ने ऐसे मावले तैयार किए, जो थकते नहीं, रुकते नहीं, झुकते नहीं और बिकते नहीं। संघ के स्वयंसेवक छत्रपति शिवाजी के तपोनिष्ठ मावलों सरीखे ही हैं। हम हिन्दू भूमि के पुत्र हैं, संघ राष्ट्र की परंपरा को पुष्ट करते हुए राष्ट्र की उन्नति की बात करता है।

उदासीन आश्रम दिल्ली के प्रमुख संत राघावानंद जी महाराज ने अपने संक्षिप्त आशीर्वचन में कहा कि संघ 100 वर्ष पूर्ण कर चुका है तो इसके पीछे डाक्टर साहब का प्रखर संकल्प ही है। संघ ने समाज के प्रति समर्पण भाव से कार्य किया है, समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए कार्य किया है। इसलिए संघ कार्य सतत बढ़ रहा है।

श्री केशव स्मारक समिति के अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने शुरू से लेकर अब तक के केशव कुंज के

पुनर्निर्माण के विभिन्न पड़ावों की विस्तार से जानकारी दी। उल्लेखनीय है कि दिल्ली में 1939 से ही संघ का काम रहा है। तब झंडेवालान में इसी स्थान पर एक छोटा सा भवन बनाया था जिसमें संघ कार्यालय का कुछ हिस्सा बना था। लेकिन आगे 1962 में इसका विस्तार करके अन्य कक्ष बनाए गए थे। 1969 में श्री केशव स्मारक समिति का गठन हुआ।80 के दशक में आवश्यकता के अनुसार भवन का और विस्तार हुआ। साल 2016 में पूज्य सरसंघचालक जी ने ही अपने करकमलों से इसी स्थान पर पूजानुष्ठान के साथ श्री केशव स्मारक समिति के द्वारा निर्मित केशव कुंज के तीन टॉवर वाले इस भवन का शिलान्यास किया था। और आज यह पुनर्निर्मित स्वरूप में हम सबके सामने है।

केशव कुंज में मुख्यत: तीन टॉवर हैं—1. साधना 2. प्रेरणा 3. अर्चना। एक आकर्षक और आज की सब आवश्यकताओं से परिपूर्ण अशोक सिंहल सभागार है, आम जन के लिए एक केशव पुस्तकालय है, ओपीडी चिकित्सालय है, साहित्य भंडार है, सुरुचिपूर्ण और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत पुस्तकों के लिए सुरुचि प्रकाशन है। केशव कुंज की विद्युत आवश्यकताओं की पूर्ति में सहयोग के लिए 150 किलोवाट का सोलर प्लांट है, कचरे के उचित निस्तारण रीसाइकिलिंग के लिए 140 केएलडी क्षमता का एसटीपी प्लांट है। पूर्व की तरह ही नूतन भवन में एक सुंदर-दिव्य हनुमान मंदिर है।

कार्यक्रम में ऐसे कुछ सेवा प्रदाताओं का प्रतिनिधि रूप में सम्मान किया गया जिन्होंने भवन के निर्माण में विविध कामों में योगदान दिया है।

कार्यक्रम में मंच पर सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, उत्तर क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल, दिल्ली प्रांत संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल भी उपस्थित थे। प्रवेशोत्सव में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्ढा, संघ के सहसरकार्यवाह डा. कृष्ण गोपाल, श्री अरुण कुमार, वरिष्ठ प्रचारक श्री सुरेश सोनी, सम्पर्क प्रमुख श्री रामलाल, सह प्रचार प्रमुख श्री नरेन्द्र ठाकुर, श्री इंद्रेश कुमार, श्री प्रेम गोयल, श्री रामेश्वर सहित अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता, स्वयंसेवक उपस्थित थे।

“Our work must uphold the grandeur of this new building”

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“The work of the Rashtriya Swayamsewak Sangh (RSS) is gaining momentum across the country and expanding day by day. Today is the celebration of the homecoming to this newly reconstructed building. Our work should also be as grand as this building. Our work should reflect that grandness. We believe that this work will reach across the world and again take Bharat to the position of Vishwaguru. Bharat will soon become Vishwaguru, and we are confident that we will witness this in our lifetime. However, for this to happen, every Swayamsevak must work selflessly and remain committed to the cause,” said RSS Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat at the Praveshotsav of RSS’ newly reconstructed Keshav Kunj, at Jhandewalan in Delhi on February 19, 2025 evening.

He further stated that Sangh’s activities are expanding in multiple dimensions; therefore, every Swayamsevak must embody purity and the capability to execute responsibilities effectively. Shri Bhagwat further emphasised that while the conditions of the Sangh (in comparison to the previous times of hardship) has changed, its direction should not change. Prosperity is a necessity—we must have what we need, but it should be attained with limits. He said, “The newly constructed building by Keshav Smarak Samiti is undoubtedly grand. However, with this grandeur comes responsibility, and we must work accordingly to uphold its stature.”

On this occasion, Sarsanghchalak Dr Bhagwat remembered RSS founder and first Sarsanghchalak Dr Keshav Baliram Hedgewar and his struggles during the initial period of the Sangh, which began in Mahal, Nagpur. He noted that Delhi, being the national capital, serves as the center of numerous activities and plays a crucial role in providing direction. Therefore, having a structure that meets the requirements was essential, and thus, this Karyalaya came into existence. While the building is now ready, the Sangh’s work does not end here. We must always keep in mind that criticism and opposition keep us vigilant. Even in a positive environment, we must remain cautious.

He further advised Swayamsevaks that while the Karyalaya inspires us to work, it is the duty of every Swayamsevak to maintain a positive environment within the building.

Shri Ram Janmabhoomi Nyas Treasurer, Pujya Govinddev Giri Ji Maharaj, in his Aashirvachan, said that today is a sacred day because it is the Jayanti of Shri Guruji and also of Chhatrapati Shivaji Maharaj, who represents the ideological strength of the Sangh.

He recalled that the then Shankaracharya of Kanchi Kamakoti Peeth, Paramacharya Ji, once told a senior Pracharak that there is no greater mantra than the Sangh Prarthna. While mentioning the film ‘Chhaava’, based on the courageous life of Chhatrapati Sambhaji Maharaj, son of Shivaji Maharaj, Govinddev Giri Ji reminded how Chhatrapati Shivaji nurtured mavalas who never get tired, never stops, never surrenders and who cannot be bought by anybody. He reassembled the Sangh Swayamsevaks with mavalas, the soldiers, of Chhatrapati Shivaji. He emphasised that we are the sons of Hindu Bhumi and Sangh always talks about the progress of country on the line of tradition of Bharat.

In his brief Aashirvachan, Pujya Raghavanand Ji Maharaj, the head saint of Udaseen Ashram, Delhi, said that the Sangh is about to complete 100 years due to the unwavering resolve of Doctor Saheb. The Sangh has worked with a spirit of dedication to society and for the upliftment of all sections of the community. This is why the work of the Sangh is continuously on progress.

Addressing the Swayamsevaks, the President of Keshav Smarak Samiti, Shri Alok Kumar Ji, shared insights into the various stages of the reconstruction of Keshav Kunj, Jhandewalan, which began in 2016. It is noteworthy that this RSS Karyalaya came into existence in 1939. At that time, a small building was constructed at this very location in Jhandewalan. Later, in 1962, it was expanded to include additional rooms. In 1969, the Keshav Smarak Samiti was formed. During the 1980s, the building was further expanded as per the requirements. In 2016, Pujya Sarsanghchalak Ji laid the foundation stone for the reconstruction of this three-tower building of Keshav Kunj, built by the Keshav Smarak Samiti, through sacred rituals. Today, it stands before us in its newly reconstructed form.

Keshav Kunj primarily consists of three towers—1. Sadhana, 2. Prerana, and 3. Archana. It houses the Ashok Singhal Auditorium, which is modern and well-equipped to meet contemporary needs. There is also the Keshav Library, an OPD clinic, Suruchi Prakashan and others. To support its electricity needs, Keshav Kunj is equipped with a 150-kilowatt solar plant. For proper waste management and recycling, a 140 KLD capacity STP (Sewage Treatment Plant) has been installed. The newly built karyalaya also has a beautiful and divine Hanuman Mandir.

During the event, people who contributed in the construction of these buildings were honoured.

On the stage, Sarkaryavah Shri Dattatreya Hosabale, Uttar Kshetriya Sanghchalak Shri Pawan Jindal and Delhi Prant Sanghchalak Dr. Anil Aggarwal were present.

The Praveshotsav was attended by Union Home Minister Amit Shah, Defense Minister Rajnath Singh, Health Minister JP Nadda, RSS Sah-Sarkaryavah Dr Krishna Gopal, Shri Arun Kumar, senior Pracharak Shri Suresh Soni, Sampark Pramukh Shri Ramlal, Sah-Prachar Pramukh Shri Narendra Thakur, Shri Indresh Kumar, Shri Premji Goyal, Shri Rameshwar, and numerous senior functionaries and Swayamsevaks.

संघ साधना के तपोनिष्ठ ऋषिवर : श्री गुरुजी

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~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

आक्रमणों और वर्षों की परतन्त्रता के कारण कमजोर और दैन्य हो चुके हिन्दू समाज को संगठित करने के ध्येय से डॉ.हेडगेवार ने २७ सितम्बर सन् १९२५ विजयादशमी के दिन शक्ति की पूर्णता को मानकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन किया। जो हिन्दू समाज को सशक्त और सामर्थ्यवान बनाने तथा राष्ट्रीयता के प्रखर स्वर के साथ राष्ट्र के सर्वांगीण विकास और हिन्दुत्व के लिए प्रतिबद्ध है। समयानुसार संघ ने राष्ट्र की आवश्यकता अनुरूप राष्ट्रसेवा के यज्ञ में लाखों स्वयंसेवकों के माध्यम से आहुति दी है। उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर जिन्हें आदर श्रद्धावश श्रीगुरूजी के रुप में जाना जाता है। उन्होंने अपने जीवन को – हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए समर्पित कर दिया। उनके कृतित्व और विचारमंथन से जो अमृत निकला वह राष्ट्र के सांस्कृतिक उन्मेष के तेज-पुञ्ज के रुप भारतवर्ष की उन्नति के रुप में आलोकित हो रहा है।

१९ फरवरी १९०६ को महाराष्ट्र के रामटेक में जन्में माधवराव सदाशिवराव ‘मधु’ जो आगे चलकर संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने। राष्ट्र और समाज ने उन्हें श्रीगुरूजी के तौर पर जाना-पहचाना। सन् १९१९ में उन्होंने ‘हाई स्कूल और १९२२ में मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (चन्द्रपुर,महाराष्ट्र) के ‘जुबली हाई स्कूल’ से उत्तीर्ण की। सन् १९२४ में उन्होंने नागपुर के ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित ‘हिस्लाप कॉलेज’ से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सन् १९२६ में बी.एससी. और सन् १९२८ में एम.एससी. में शिक्षा पूर्ण की।

तत्पश्चात १६ अगस्त सन् १९३१ को अस्थायी सेवा के रुप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में निदर्शक के रुप में प्राणिशास्त्र विषय में अध्यापन कार्य कराने लगे। उनकी विलक्षण प्रतिभा, ऊर्जस्वित प्रखर विचार,निष्ठा और समर्पण मुझे यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि आखिर! बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापक रहते हुए वो विद्यार्थियों में इतने लोकप्रिय कैसे हो गए? कुछ न कुछ तो अवश्य ही रहा होगा। वे भी उन अध्यापकों में से ही एक रहे होंगें जो अपने वेतन को निजी हित से आगे सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन श्री गुरुजी ने अपना मानदेय – आर्थिक तौर कमजोर विद्यार्थियों की शुल्क और पाठ्य-सामग्रियों को उपलब्ध करवाने में लगाया।

यदि विचार करें तो समाज को शक्ति-सम्पन्न बनाने के लिए गति देने के लिए आगे आने की प्रेरणा कहाँ से आई? निश्चित ही यह हमारी संस्कृति और मूल्यों की परम्परा से ही स्फुरित हुई होगी। प्राणिशास्त्र के अध्यापन के अलावा उन्होंने राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र,आँग्ल भाषा, दर्शन शास्त्र में भी निरन्तर अपनी मेधा के माध्यम से सबको चकित किया। वे विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए हर क्षण तत्पर रहते थे। विद्यार्थियों से अपार स्नेह,सहजता-सरलता ने ही तो उन्हें माधवराव से ‘गुरुजी’ बना दिया और फिर वे सदा श्री गुरुजी के नाम से ही जाने गए।

वे हिन्दू समाज के लिए निष्ठ थे। आध्यात्मिकता के विचार स्त्रोत ने उन्हें संन्यास के पथ की ओर मोड़ा और स्वामी अखण्डानन्द जी से दीक्षित हुए। किन्तु जीवन के क्रम में कुछ और ही लिखा था इसलिए सन् १९३८ में संघ संस्थापक डॉ.हेडगेवार के पास वे पुनः लौटे और उनके सतत् सम्पर्क में रहे आए।

उनका ज्ञान और बहुविशेषज्ञता अचरज में डालती है। उस पर भी दृढ़ संकल्प शक्ति और स्वयं को आहुति की भाँति समर्पित करने का अद्वितीय साहस और आदर्शोन्मुख व्यक्तित्व -कृतित्व। उनका यथार्थ की अनुभूति के साथ मूल्य परम्पराओं का वाहक बनकर हिन्दू समाज को सशक्त करने के लिए योगी सदृश बनकर जीवन को माँ भारती की सेवा का पर्याय बना पाना असंभव सा लगने वाला कार्य ही प्रतीत होता है।

किन्तु उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में वह कर दिखाया जिसे डॉ.हेडगेवार ने अपनी पारखी दृष्टि से पहचाना था। डॉ हेडगेवार ने अपने जीवन के अन्तिम समय में चिठ्ठी में यह कहते हुए कि-

“इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो,मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि अब से संगठन चलाने की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी”

श्री गुरुजी से यह वचन ले लिया था।

श्री गुरुजी ने सन् १९४० में मात्र ३४ वर्ष की आयु में संघ के सरसंघचालक का दायित्व ग्रहण किया । फिर वे नश्वर देह को त्यागने के समय अर्थात् सन् १९७३ तक संघ-जीवन के महान व्रत को पूर्ण करने में लगे रहे।

डॉक्टर हेडगेवार ने जिस संकल्पना के साथ हिन्दू समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक औय एवं शारीरिक तौर पर शक्ति-सामर्थ्यवान बनाने का जो संकल्प लिया था। उसे योजनाबद्ध ढँग से सूत्रबद्ध करने में वे अथक अविराम लगे रहे। उन्होंने वैचारिक और बौध्दिक विकास के साथ कुशल संगठनात्मक क्षमता और ओजस्विता को मूर्तरूप दिया। उनके अन्दर राष्ट्रीयता और संस्कृति का प्रचण्ड ज्वालामुखी प्रतिक्षण राष्ट्रोत्थान के लिए धधकता रहता था। जो
समर्पण, सशक्तिकरण और गर्वोक्ति के साथ हिन्दू और हिन्दुत्व के लिए निष्ठा का सञ्चार कर रहा था। श्री गुरुजी का मानस अपनी परम्पराओं, संस्कृति, धर्म-ग्रन्थों, पूर्वजों और भारतवर्ष के गौरवशाली महान इतिहास के प्रति चैतन्य था। वे धर्मनिष्ठ और अपनी संस्कृति के प्रति गहरे अनुराग से भरे थे। उन्होंने डॉ हेडगेवार की भांति ही देशवासियों को स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने के लिए जनचेतना का संचार किया। स्वातंत्र्य यज्ञ के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले स्वयंसेवकों को तैयार किया।

यह वह कालखंड था जब संघकार्य अपने आप में अत्यंत कठिन था। भोजन-पानी से लेकर आवास तक की व्यवस्था का कोई भरोसा नहीं रहता था।संघ के प्रचारकों के पास एक झोला,एक जोड़ी वस्त्र , सतत् सम्पर्क के लिए यात्रा,शाखा कार्य की चुनौतियाँ थी। किन्तु
स्वयंसेवकों के लिए भूख-प्यास चिन्ता का विषय नहीं थी बल्कि उनके चिन्तन के केन्द्र में राष्ट्र था। गुरूजी इस मर्म को जानते थे लेकिन जब सम्मुख राष्ट्र हो तब निज दु:ख स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इस महत् भाव को उन्होंने जीवन के दृष्टांत के रूप में संघ की सृष्टि के माध्यम से साकार किया।

हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प लेकर गुरुजी , सरसंघचालक बनने के साथ ही राष्ट्र पथ के अथक अविराम गतिशील साधक बन गए। उन्होंने समूचे देश की लगभग ६५ बार से अधिक यात्राएँ की होंगी। उनकी संघयात्रा निरन्तर चुनौतियों और संघर्षमय रही। सात वर्षों के अन्दर ही देश विभाजन की त्रासदी समक्ष खड़ी थी। विभाजन के दंगों में हिन्दुओं का नरसंहार और इस्लामिक क्रूरता के घ्रणित कृत्यों से समूचे राष्ट्र की अन्तरात्मा काँप गई थी। अब ऐसे समय में हिन्दुओं को संगठित और शक्ति-सम्पन्न बनाने ,पाकिस्तान से आने वाले हिन्दुओं को सुरक्षित आश्रय स्थल और उनके भरणपोषण की चिन्ता के साथ राष्ट्र के रुप में भव्य भारतवर्ष का दायित्वबोध उनके समक्ष साक्षात्कार के रुप में प्रत्यक्ष खड़ा था। इन विषम परिस्थितियों में उन्होंने राष्ट्रीय एकता और दंगों से बचाव, पुनर्वास में संपूर्ण शक्ति के साथ स्वयंसेवकों की मालिका तैयार की‌। राष्ट्र और समाज के मध्य विभाजन की त्रासदी से आए संकट को हरने के लिए स्वयंसेवकों ने दिन-रात इस यज्ञ में स्वयं को अर्पित कर दिया।

इसी प्रकार सन् १९४७ में काश्मीर के विलय में सरदार पटेल के अलावा श्री गुरुजी का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। १८ अगस्त १९४७ को श्री गुरुजी ने महाराजा हरिसिंह से मिलकर विलय के लिए वार्ता की थी। राष्ट्रीय हित पर निर्णय लेने के लिए चिंतन-मंथन किया था।
अन्ततोगत्वा सभी के संयुक्त प्रयास से महाराजा हरिसिंह ने विलय पत्र में हस्ताक्षर किया और काश्मीर भारत का हिस्सा बना।

श्री गुरुजी के सरसंघचालक दायित्व के दौरान
उनका संपूर्ण पथ चुनौतियों से भरा हुआ था।
इधर देश को स्वाधीन हुए एक वर्ष ही नहीं बीता था कि महात्मा गाँधी की हत्या के बाद राजनीतिक दबाव – सन्देह , दुराग्रह विवशता और मिथ्यारोपों के कारणवश सन् १९४८ में संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। लेकिन गुरुजी क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं हुए। क्योंकि उनकी राष्ट्रीय चेतना,सांस्कृतिक प्रवाह,राष्ट्रभक्ति, हिन्दू समाज के प्रति असीम आत्मीयता-अनुराग और संघ के व्रत को लेकर हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरोत्थान के प्रति दृढ़ आस्था थी। सत्य का शंखनाद करते हुए श्री गुरुजी ने
उस समय कहा था कि —

“सन्देह के बादल शीघ्र ही छँट जाएँगे और हम बिना किसी दाग के वापस आएँगे।”

उनका यह भविष्यवाणी सत्य हुई और छ:महीने बाद संघ पर लगा प्रतिबन्ध हटा दिया गया। यह जीत संघ की नहीं अपितु हिन्दू समाज की जीत थी। क्योंकि संघ में जो भी है सबकुछ प्रत्यक्ष था और वह हिन्दू समाज का है। उसे चाहे किसी परीक्षण से गुजार दिया जाए संघ सदैव सत्य की कसौटी पर खरा उतरा है। संघ की प्रारंभ से ही यही धारणा रही है कि – संघ अर्थात् समाज। इससे हटकर और कुछ नहीं। संघ के स्वरूप में
जो कुछ भी दिखता है वह सबकुछ राष्ट्र और समाज का है। जोकि भारत की महान सांस्कृतिक विरासत से प्राप्त हुआ है।

इसी प्रकार सन् १९५० में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने श्रीगुरुजी से राजनीतिक दल के गठन की स्वीकृति और सहयोग माँगा‌। उस समय श्री गुरुजी ने स्पष्ट कर दिया था कि ― संघ प्रत्यक्ष राजनीति से सदैव दूर रहेगा और हिन्दू राष्ट्र भाव नए दल को स्वीकार्य होगा। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा गुरूजी की शर्तों को स्वीकार करने पर जनसंघ का गठन हुआ। वे राष्ट्रीय और राजनीतिक घटनाक्रमों पर भलीभाँति नजर रखते थे। किन्तु दलगत राजनीति की धारा से उन्होंने संघ को सदैव दूर रखा। क्योंकि उनके विचार बिन्दु में डॉ हेडगेवार जी का वही स्वप्न था कि – हम हर हिन्दू को संगठित और समर्थ बनाएँगे । जो राष्ट्र के विभिन्न आयामों में अपने-अपने कार्यों के माध्यम से राष्ट्र की सेवा कर सकें।

श्रीगुरुजी को कोई भी संकट-विपदा या चुनौती डिगा नहीं सकी। उनके समक्ष जो चुनौतियाँ आईं उनका उन्होंने डटकर सामना किया और हेडगेवारजी के संकल्प रुपी बीज को वटवृक्ष बनाने लिए संगठन विस्तार से लेकर वे बौद्धिक प्रबोधन में सदैव रत रहे आए। प्रवास के रूप में पारस्परिक मिलन और वार्ता के पथ पर बढ़ते हुए वे ‘हिन्दू-हिन्दुत्व-राष्ट्रीयता’ को लेकर सुस्पष्ट रहे। उन्होंने एक ऐसी पीढ़ी के निर्माण को लक्ष्य बनाया जो ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ राष्ट्रीयता और संस्कृति से परिपूर्ण और जिसकी रग-रग में प्रखर राष्ट्रभक्ति का रक्त प्रवाहित हो। उन्होंने गर्वोक्ति के साथ हिन्दुत्व के भाव और सामाजिक चेतना के ऊर्जस्वित स्वर से राष्ट्रीयता के मूलमन्त्र को झंकृत किया। उन्होंने अनुशासित और राष्ट्रप्रेमी समाज को — अपने पुरखों के अभूतपूर्व तेज , त्याग -बलिदान और राष्ट्र की संस्कृति के उच्च मानबिन्दुओं से सीख लेकर माँ भारती को परम् वैभव सम्पन्न बनाने के लिए आह्वान किया।

श्री गुरुजी राष्ट्र की प्रत्येक गतिविधि पर गहराई के साथ पारखी दृष्टि रखते थे। दूरदृष्टा के साथ ही वे राष्ट्र की आन्तरिक और विदेश नीति के सम्बन्ध में पूर्णरूप स्पष्ट थे।चीन की सन्देहास्पद गतिविधियों और नीतियों को लेकर उन्होंने कई बार अपने वक्तयों के माध्यम से तत्कालीन सरकार को आगाह किया था । लेकिन तत्कालीन नेहरू सरकार ने उनकी उपेक्षा की। चीन से जिस विश्वास घात की आशंका थी। वह सन् १९६२ के भारत-चीन युद्ध के रुप में परिणत हो गई। इस युद्ध में अक्षय चीन के रुप में देश को लगभग ३८ हजार वर्ग किलोमीटर भू-भाग गवांना पड़ गया।

भारत-चीन युद्ध के समय श्रीगुरुजी ने संघ के स्वयंसेवकों को सेना के जवानों को राशन पहुँचाने और सैनिक मार्ग की सुरक्षा के लिए तैनात किया था। संघ के इस अतुलनीय कार्य से प्रधानमंत्री नेहरू अत्यंत प्रभावित हुए थे । उन्होंने २६ जनवरी सन् १९६३ को गणतंत्र दिवस की परेड में संघ को आमन्त्रित किया था। इस परेड में संघ के स्वयंसेवकों ने गणवेश के साथ परेड में भाग लिया था।

वे गुरुजी ही थे जिनके समक्ष दोनों घटनाक्रम घटे – एक वह जब सन् १९५८ में संघ पर प्रतिबन्ध लगा। दूसरा वह घटनाक्रम जब सन् १९६३ में गणतन्त्र दिवस की परेड पर सम्मिलित होने का नेहरू सरकार ने आमन्त्रण दिया। श्रीगुरुजी ने अपनी कुशल संगठनात्मक क्षमता के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि – संघ के लिए सदैव राष्ट्र प्रथम था और राष्ट्रीयता का दूसरा पर्याय हिन्दू और हिन्दुत्व है।

लालबहादुर शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनसे भी गुरुजी का सतत् सम्पर्क रहा । सन् १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय पं. लालबहादुर शास्त्री ने उनके साथ परामर्श-वार्ता की थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनसंघ के गठन होने के बावजूद भी उन्होंने दलगत राजनीति से हटकर निर्णय लिए। राष्ट्रोन्नति के लिए संघ और स्वयंसेवकों की जब-जब आवश्यकता हुई । उन्होंने तब-तब पूर्ण निष्ठा के साथ राष्ट्र की गति-प्रगति, संकट में सरकार के सहयोग के लिए तत्परता के साथ नैसर्गिक दायित्वों का निर्वहन किया। समाज के मध्य नई लकीर खींची ।

श्रीगुरुजी अपनी वैचारिक मेधा,कुशल संगठनात्मक क्षमता,विराट हिन्दू समाज के प्रति समर्पण,राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति के प्रति अनुराग से भरे हुए थे। उन्होंने दीन-हीन -पतित मनुष्य के उद्धार और सामाजिक सशक्तिकरण तथा राष्ट्रीयता के भाव को संघ साधना के माध्यम से साकार किया। समूचे राष्ट्र को हिन्दुत्व मूल्यों-परम्पराओं को शाखा कार्य के द्वारा―
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्। प्रार्थना को चरितार्थ का नवीन दिशा दी।

श्री गुरुजी ने राष्ट्र और समाज को एकसूत्रता में पिरोने के लिए मन्त्र दिया था —

हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू पतितो भवेत्।

मम दीक्षा हिन्दू: रक्षा,मम मंत्र: समानता।।

अर्थात् — सभी हिंदू सहोदर भाई हैं कोई भी हिन्दू पतीत नहीं हो सकता, मेरी दीक्षा ही हिन्दू रक्षा है, और मेरा मंत्र समानता का मंत्र है।
इन समस्त भाव-विचारों को लेकर संघ के स्वयंसेवक कार्य करते हैं। संघ ने युगानुकूल ढँग से अपनी कार्य पद्धति को विस्तारित एवं आधुनिक किया है। लेकिन जो ध्येय डॉ. हेडगेवार जी और श्री गुरुजी ने दिया था — उन्हीं भारतीय संस्कृति के मूल्यादर्शों के अनुरूप संघ कार्य सतत् बढ़ता जा रहा है। डॉ हेडगेवार और श्री गुरुजी प्रणीत पथ का अनुसरण करते हुए —
संघ की तपोस्थली से विविध क्षेत्रों में नेतृत्व करने वाले नेतृत्वकर्ता स्वयंसेवक तैयार हो रहे हैं
जो राष्ट्र देवो भव और राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ समाज के विविध क्षेत्रों में गतिशील हैं।

श्री गुरुजी के विचार और दर्शन के मूल में हिन्दू समाज , राष्ट्र का गौरवशाली इतिहास , परंपराएं, हिन्दू संस्कृति की सनातन चेतना है। जो राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला को जलाकर अखण्ड भारतवर्ष के स्वप्न को साकार करने का व्रत है। भले ही ५जून १९७३ को उनकी ज्योति अनन्त में विलीन हो गई लेकिन उनका दर्शन और कृतित्व सदैव प्रेरणा बनकर उपस्थित है। उन्होंने अपने जीवन के ३३ वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के रुप में समाज के मध्य तपस्वी साधक का दृश्य चित्र उकेरा है। विचार और दर्शन को संस्कारों में परिवर्तित कर व्यक्ति से समाज निर्माण- राष्ट्र निर्माण की चेतना विकसित की। यह उसी की परिणति है कि डॉ. हेडगेवार ने जिस संघ का बीजारोपण किया था। वह वटवृक्ष के रुप में अपनी विभिन्न शाखाओं के द्वारा राष्ट्रोत्थान के पथ पर अनवरत गतिमान है। श्रीगुरूजी उनका उज्ज्वल चरित्र, दिशा बोध और संघकार्यों की प्रेरणा ,विचार और दर्शन सतत् राष्ट्र और समाज का पथ प्रशस्त करते रहेंगे। उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व की दिव्य दृष्टि और वैचारिकी की प्रखर दीप्ति से सतत् नव चैतन्यता का निर्माण होता रहेगा।

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