Renowned Delhi Painter Shri Anand Narain, awarded/ honoured by the National Award

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Delhi : Beginning this month, Shri Anand Narain was honoured with the National Award in the 64th National Art Exhibition organised by Lalit Kala Akademi, New Delhi and Ministry of Culture, Government of India. He was honoured on August 5, 2025 by Minister of Culture and Tourism, Shri Gajendra Singh Shekhawat at the inaugural ceremony of the National Exhibition, accompanied by Secretary, Ministry of Culture, Government of India Shri Vivek Agarwal, Additional Secretary Ms. Amita Prasad Sarabhai, and Vice President of Lalit Kala Akademi Dr. Nandlal Thakur. There were 5922 applicants in the National Art Exhibition, out of which 283 works were selected, in which 20 artists from across the country were honoured in various genres such as painting, sculpture, drawing, graphic, photography and mixed media.
Mr. Narain has been awarded for the year 2024 from Uttar Pradesh for his painting ‘Kan-Kan Mein Hain Ram’. This work depicts the grandeur of the spiritual city of Ayodhya. Overwhelmed by cultural values,he has a vision of seeing things holistically, away from individualistic thoughts, which makes him different from others. A noteworthy contribution of the integration of art and literature in Mr. Narain’s inner self is that poetry can be seen and heard peeping in his artworks and in the same way, the diversity, attraction and brightness like the colors contained in the vocabulary of pictorial scenery in his poetic lines and expressions can also be seen in many forms and levels. Talking of his initial thought behind the award winning painting, Mr. Narain mesmerizes by reciting his own two lines

– “जिस से हो हर रोज दिवाली, ऐसा दिया दिला दो राम
दिया तले अंधेरे को भी अबकी बार जला दो राम” – आनन्द नारायण

He is an artist who is known for his experiments, creative diversity and innovation in the field of contemporary Indian art. He completed his graduation (B.F.A) from College of ArtLucknow and post graduation (M.F.A) from Jamia Millia Islamia New Delhi. Mr. Narain has had a long journey as a painter so far. As a result of the movement of subjects, his paintings got expanded by participating in more than fifty group painting exhibitions at the state, national and international level. His stylistic identity got established. So far, fourteen solo exhibitions have been organized in the prestigious art galleries of the metropolis. Both art and artist got recognition from the series of paintings in special exhibitions. He has also been honoured by the UP State LalitKala Akademi Award amongst many others.

The series’ of his paintings titled “Banaras” and “Untouched Nature” depict the expanse of Indian plains, settlements on the banks of rivers, or rivers making barren land fertile, bridges and culverts to cross them, forests that nourish life, the factors of myths embedded in the Indian psyche, a man living with self-respect, taking pride of being a pure Indian amidst culture and traditions – all these together give shape and concerns to his series of paintings. Whether it is Anand’s “Spiritual Heritage Banaras” series or his award winning work ‘Kan-KanMein Hain Ram’, they are evidence of twenty-first century India. It has become rare today for an artist to be in his time, to express himself with his cultural metaphors. In such a situation, Anand Narain’s pure Indian mind sees India in its ‘self’, historical images marking the country and time, the effort to preserve Indian symbols amidst all this is at an artistic peak, it is no less than an achievement. The National Art Exhibition will run till 15 September 2025.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संवाद सत्र द्वितीय दिवस

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आने वाली पीढ़ी को संकट से बचाने केलिये समाज में सकारात्मक पर जोर

–रमेश शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅक्टर मोहनजी भागवत ने अपने संवाद संबोधन में दूसरे दिन पूरे विश्व को उपभोक्तावाद के नये संघर्ष से सावधान किया और आने वाली पीढ़ी को इस संकट से बचाने केलिये आत्म जाग्रति और संयम-समन्वय पर जोर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है। अपने शताब्दी समागम के अंतर्गत संघ ने दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया है। इस संवाद समागम में दूसरे दिन सरसंघचालक डाॅक्टर मोहन जी भागवत ने दूसरे दिन पूरे संसार में आने वाले उपभोक्तावाद के संकट से सचेत किया। उनका कहना था कि परिवार, समाज और देश ही नहीं पूरे संसार में भोगवाद की स्पर्धा बढ़ रही है। बढ़ता हुआ भोगवाद स्पर्धा को जन्म देता है और स्पर्धा नये संघर्ष को जन्म देती है। भागवत जी की यह चेतावनी उस मानवीय मनोविज्ञान पर आधारित है जिसमें भोगवाद की प्रवृत्ति मनुष्य को अहंकारी बनाती है। और अहंकार ही परिवार समाज एवं दुनियाँ में संघर्ष का कारण बनता है। यदि इतिहास के पुराने महायुद्ध की घटनाओं को छोड़ दें तो भी बीसवीं शताब्दी के दोनों विश्व युद्ध केवल अपने अहंकार के विस्तार का प्रयास करने के कारण ही हुये। सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में इन दोनों महायुद्धों का उल्लेख करके सचेत किया कि जिस अहंकार से वे दोनों युद्ध हुये वह अहंकार समाप्त नहीं हुआ। इन दिनों भले विश्व युद्ध न चल रहा हो लेकिन संसार में युद्ध जैसी स्थिति है। जो आने वाली पीढ़ी के लिये ही नहीं पूरे विश्व की मानवता केलिये नया संकट है। इस संकट से बचने के एक मात्र उपाय धर्म आधारित

सकारात्मक सोच है। निसंदेह सरसंघचालक जी का यह कथन वर्तमान परिस्थिति में मानवता की रक्षा का सबसे सुगम उपाय है। लेकिन धर्म का अर्थ वह नहीं पश्चिमी जगत की अवधारणा है अथवा मध्य एशिया में जो स्वरूप उभरा। प्रकृति विविधता से भरी है। एक उपवन जितनी वनस्पति होती हैं सबके रंग रूप अलग होते हैं। एक वन में सभी प्राणियों के आकार प्रकार, भोजन रहने की शैली सब अलग होती है। वन और उपवन का सौन्दर्य उनकी विविधता में है तब कैसे सारे संसार के सभी मनुष्यों को एक रंग, भाषा भूषा में ढाला जा सकता है। भारतीय दर्शन की यही विशेषता है। इसमें न एकसी पूजा पद्धति पर जोर है और न भाषा, भूषा, भोजन, भजन पर जोर है। सब अपनी पसंद के देव को अपना ईष्ट बनायें। केवल इतनी मर्यादा आवश्यक है कि हम अपने ईष्ट अपने आराध्य की पूजा उपासना तो करें लेकिन किसी अन्य की आस्था को ठेस न पहुँचे। सरसंघचालक जी ने अपने द्वितीय दिवस के संवाद में इस विविधता को संघर्ष का नहीं समन्वय की शक्ति बनाने का आव्हान किया और संकेत किया कि आज विश्व को इसी भारतीय दर्शन की आवश्यकता है। जिसमें धर्म केवल पूजा उपासना की कर्म क्रिया तक सीमित नहीं है। प्रकृति और मानवता केलिये जितने आदर्श कर्त्तव्य हैं, जितने धारणीय कर्त्तव्य हैं वे सब धर्म की परिभाषा में आते हैं। सरसंघचालक जी ने धर्म की यही शास्त्रोक्त व्याख्या अपने संवाद में की।

उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म सार्वभौमिक है। यह सृष्टि के आरम्भ से ही अस्तित्व में है और सृष्टि के रहने तक चलेगा। यह मनुष्य की बुद्धि पर निर्भर करता है कि वह उसे कितना मानता है, अथवा कितना जानता है। सरसंघचालक जी की यह बात अत्यंत सटीक है। व्यक्ति के जानने या मानने से सत्य पर कोई अंतर नहीं आता। कुछ शताब्दी पहले तक मनुष्य गुरुत्वाकर्षण शक्ति से अनभिज्ञ था। लेकिन यह शक्ति तो तब भी थी और प्रकृति के अस्तित्व बनाये रखने में उसकी भूमिका भी थी और आज भी है। मनुष्य को उसका ज्ञान हुआ तो उसका उपयोग करके जीवन को अधिक सुगम बनाने लगा। ठीक इसी प्रकार धर्म का विषय है। धर्म का वास्तविक अर्थ भारतीय चिंतन में है, इसके केन्द्र में संपूर्ण प्रकृति और प्राणी मात्र है। जड़ और चेतन का धारणीय कर्तव्य को धर्म माना है। धरती, आकाश, पवन, वायु और अग्नि द्वारा जीवन संचालन उनका धर्म है। धर्म के इस वास्तविक दर्शन से ही संसार में शांति रहेगी, मानवता का विकास होगा। भागवत जी स्पष्ट किया कि पूरे विश्व को शांति और मानवता का विश्व धर्म समझाने के लिए हिंदू समाज का संगठित होना होगा। विश्व शांति केलिये धर्म सब जगह जाना चाहिए। लेकिन इसका अर्थ धर्मांतरण या “कनवर्सन” कतई नहीं है। धर्म में कनवर्सन होता भी नहीं है। धर्म तो शाश्वत है, मौलिक है, सत्य का तत्व है, जिसके आधार पर जीवन चलता है। पूजा उपासना जिसको जैसी करना हो, वह करे। लेकिन मानवीय और प्राकृतिक गुणों को सर्वोपरि रखकर ही करना चाहिए।

सरसंघचालक जी ने वैश्विक शांति और मानवता की रक्षा केलिये पाँच आधारभूत विन्दुओ॔ पर जोर दिया। इसमें पर्यावरण सुरक्षा, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब परंपरा की रक्षा, दायित्व वोध और आत्म अनुशासन है। उन्होंने चेतावनी दी कि आर्थिक उन्नति की लालसा मानवीय मूल्यों और पर्यावरण दोनों की क्षरण कर रही है। भागवतजी की यह चेतावनी आज के संदर्भ में अति उपयुक्त है। व्यक्ति को प्रगति करना चाहिये, आर्थिक उन्नति भी करना चाहिए लेकिन इस प्रगति और आर्थिक उन्नति आधार क्या हो, आर्थिक प्रगति की अंधी रफ्तार न हो, इसमें अहंकार का भाव न हो, किसी अन्य के हितों का शोषण न हो। यदि ऐसा होगा तो यह मानवता के बीच असमानता पैदा करती है, द्वेष पैदा करती है, गरीब और अमीर का अंतर बढ़ाती है। यह अंतर मानवीय मूल्यों के विरुद्ध होगा। इसलिये आर्थिक उन्नति में भी मानवता और पर्यावरण दोनों का संतुलन आवश्यक है। इसी बात पर भागवत जी ने जोर दिया। उन्होंने इस अंतर को स्पष्ट करते हुये पश्चिम और दक्षिण के देशों का उदाहरण भी दिया। दक्षिण के देशों की शिकायतों का उल्लेख भी किया। उन्होंने दो टूक शब्दों कहा कि इसपर चर्चा तो होती है लेकिन समाधान नहीं निकलता। इसका समाधान आत्म चिंतन से होगा। यही विशेषता भारतीय चितन की है। भारत संसार को तभी समाधान दे सकता है जब हिन्दु समाज जागरुक हो और संगठित हो। विश्व शांति केलिये सरसंघचालक जी ने हिन्दु समाज की जागरुकता और संगठन पर जोर दिया।

मोहन भागवत जी ने भारतीय समाज जीवन में उदारता और क्षमाशीलता की भी चर्चा की और कहा कि संसार मे शांति केलिये उदारता का यही भाव आना चाहिए, दूसरे के अस्तित्व, और सम्मान दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए। आज विश्व में अशांति और तनाव का जो वातावरण बढ़ रहा है वह असहिष्णुता के कारण है। इससे मुक्ति का मार्ग मानवता और विश्व बंधुत्व के भाव में है। यही भाव भारतीय चिंतन के मूल में। पूरे विश्व के कल्याण की इच्छा रखने का ऐसा दर्शन संसार में कहीं नहीं है। यह मानवीय और प्राकृतिक सिद्धांत के धर्म का ही अनुपालन है कि भारत ने किसी पर अपनी बात मानने का दबाव कभी नहीं बनाया, और न अपने मतानुसार जीवन जीने के लिये किसी को बाध्य किया। भारत ने तो शत्रुओं को भी क्षमा किया है, आक्रमणकारियों को भी क्षमा किया है। क्षमाशीलता के इस भारतीय गुण का उल्लेख करते हुये भागवतजी स्पष्ट किया कि भारत ने हमेशा अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम बरता है। जिन्होंने भारत का नुकसान किया है, उनके साथ भी उदारता का व्यवहार किया, उनकी भी सहायता की है। व्यक्ति के अहंकार और देशों के अहंकार के कारण दुश्मनी होती है लेकिन भारत उस अहंकार के परे है।

मोहन भागवत जी ने प्रत्येक व्यक्ति के दृष्टिकोण में सकारात्मकता रखने का आव्हान किया। सकारात्मकता का यह चिन्तन ही समाज एवं संस्कृति को दीर्घजीवी बनाता है। हमारे दृष्टिकोण में भी सकारात्मकता और मौलिकता होनी चाहिए। देखकर और सुनकर राय बनाना हितकारी नहीं है। भागवत जी ने उदाहरण दिया कि भारतीय समाज जीवन में जितनी बुराई दिखती है। समाज में उससे 40 गुना ज्यादा अच्छाई हैं। लेकिन योजनापूर्वक कुछ लोग और कुछ मीडिया समूह केवल बुराइयों पर ही अपनी बात केन्द्रित करते हैं। यदि केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर भारतीय का आकलन होगा तो यह अनुचित होगा। सुनकर राय बनाना और समझ कर राय बनाना दोनों में अंतर होता है। सुनकर केवल बुराइयों की चर्चा करने से आत्मविश्वास कम होता है जो प्रगति में बाधक है।

उन्होनें कहा कि हिन्दु विचार वसुधैव कुटुम्बकम वाला है। वह हर रास्ते को अच्छा मानता है। दुनियाँ धर्म के आधार पर जो दूरियाँ बढ़ रही हैं उन्हें दूर करने के लिए सभी ओर से प्रयास करने की जरूरत है।

अपने संवाद में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोध का विन्दु भी लिया और कहा कि जितना विरोध संघ का हुआ, उतना विरोध किसी अन्य संगठन का नहीं हुआ, फिर भी यदि संघ बढ़ रहा है, संघ का समर्थन बढ़ रहा है तो इसके पीछे स्वयंसेवकों के मन में भारत राष्ट्र और समाज के प्रति प्रेम है। और अब समय के साथ विरोध की धार कम हुई है। उन्होंने सभी समाज जनों से यह भी आव्हान किया कि अच्छे लोगों से दोस्ती करें, उन लोगों को नजरअंदाज करें जो अच्छा काम नहीं करते। अच्छे कामों की सराहना करें, भले ही वे विरोधियों द्वारा किए गए हों। गलत काम करने वालों के प्रति क्रूरता नहीं, बल्कि करुणा दिखाए। उन्होंने समाज की निस्वार्थ सेवा करने पर जोर दिया और कहा कि निस्वार्थ सेवा में जो सार्थकता है उसका आनंद अलग होता है।
सरसंघचालक जी ने अपने समाज में संवादशीलता पर बहुत जोर दिया। और कहा कि समस्याओं का जैसा समाधान संवाद से मिलता है वैसा संघर्ष से नहीं मिलता। उन्होंने सामाजिक समरसता पर बहुत जोर दिया और कहा कि यह काम कठिन है लेकिन करना है। निसंदेश समाज विभाजन न तो भारतीय संस्कृति के मूल में है और न यह भारत राष्ट्र के हित में है। जो संस्कृति संपूर्ण वसुन्धरा के निवासियों को एक कुटुम्ब मानती है, सभी प्राणियों सद्भाव की प्रार्थना करती है भला उसमें सामाजिक विभाजन की रेखाएँ। अतीत के अनुभव और भविष्य की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही मोहन भागवत जी ने सामाजिक समरसता का आव्हान किया। सरसंघचालक जी के इस संवाद संबोधन में भारत के साँस्कृतिक गौरव, ज्ञान विज्ञान की विरासत और भविष्य में आने वाली सभी समस्याओं के समाधान की झलक है। उन्होंने किसी के प्रति किसी आलोचना अथवा नकारात्मक बात नहीं कही। सबको साथ लेकर चलने और सबसे संवाद की ही महत्ता समझाई जो आज परिवार, समाज और राष्ट्र सबको लिये आवश्यक है।

संस्कार भारती, दिल्ली प्रांत की साधारण सभा सम्पन्न – संस्कृति और संगठन पर विमर्श

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नई दिल्ली : संस्कार भारती दिल्ली प्रांत की साधारण सभा आयुषम केंद्र के सभागार में गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर उत्तर क्षेत्र प्रमुख विजय जी, केंद्रीय कार्यालय सचिव अशोक तिवारी जी, प्रांत अध्यक्ष प्रभात कुमार, महामंत्री भूपेंद्र कौशिक, संरक्षक शिव प्रकाश सहित अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

प्रांतीय अध्यक्ष श्री प्रभात कुमार जी ने वरिष्ठ कवि एवं समाजसेवी राजेश चेतन जी को दिल्ली प्रांत का कार्यकारी अध्यक्ष रूप में घोषणा की साथ ही प्रांतीय कोषाध्यक्ष रूप श्री महेंद्र गुप्ता घोषणा हुई, श्री प्रदीप जालीवाला को प्रान्त मंत्री बनाया गया। पदाधिकारियों के घोषणा को संगठन की सांस्कृतिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। साथ ही प्रांत के विभिन्न विभागों में नए दायित्वों के निर्धारण और कार्य विस्तार पर विमर्श हुआ।

इस वर्ष ‘कला उत्सव’ विशेष आकर्षण रहेगा। इसके साथ ही दिल्ली प्रांत के आठ विभाग विकास और विस्तार की दिशा में सक्रिय कार्यक्रम करेंगे। संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर संगोष्ठी, सेमिनार और प्रदर्शनी, तथा गणेश उत्सव पर सात दिवसीय पेंटिंग एवं प्रदर्शनी कार्यशाला आयोजित की जाएगी।

विशेष बौद्धिक सत्र में विजय जी और अशोक तिवारी जी ने कहा कि संस्कार भारती केवल एक सांस्कृतिक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की जीवंत चेतना है। नई संरचना और सक्रिय कार्ययोजना के साथ संगठन समाज में और प्रभावशाली भूमिका निभाएगा।

गौरतलब है कि अपनी स्थापना से लेकर अब तक विस्तार की दृष्टि से कला जगत में संस्कार भारती आज विश्व की सबसे बड़ी संस्था के रूप में प्रतिष्ठित है।

भगवान गणेश का रहस्य और वर्तमान सामूहिक उपासना

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– गिरीश जोशी

सनातन से विपरीत विचार रखने वाले या नास्तिक लोगों द्वारा उठाए गए एक प्रश्न से भगवान गणेश को समझने का प्रयास करते हैं। ये लोग पुछते हैं कि हिंदू अपने सभी मंगल कार्यों कि शुरुआत गणेश पूजन से करते हैं, तो भगवान शिव और पार्वती जो कि उनके माता-पिता हैं उनके विवाह के समय प्रथम पूजन किसका हुआ था। इस प्रकार के प्रश्नों से अनेकों बार सनातन के अनुगामी बुद्धिजीवी खास कर युवा भी भ्रमित हो जाते हैं, उनको ये प्रश्न बड़ा तार्किक लगता है। इसका उत्तर जानने के लिए गणपती अथर्वशीर्ष के प्रथम श्लोक को देखते हैं जिसमें कहा गया है– “त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥ त्वमेव केवलं कर्तासि ॥ त्वमेव केवलं धर्तासि ॥ त्वमेव केवलं हर्तासि ॥ त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रम्हासि ॥ त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥“ इसके श्लोक के द्वारा भगवान गणेश के लिए उसी ब्रह्म तत्व को इंगित किया गया है जो ब्रह्मतत्व अथवा परमेश्वर इस सृष्टि का सृजनकर्ता है जो आदि , अनादी और अनंत है यानि जिसका न तो आरंभ है और न ही अंत ।

हम जानते हैं कि ब्रह्मतत्व निर्गुण और निराकार है। वो सृष्टि का सृजन, पालन और विसर्जन करता है। हमारे शास्त्रों में इसे स्पष्ट किया गया है कि सृजन का कार्य ब्रह्मा,पालन का विष्णु और विसर्जन का कार्य शिव के माध्यम से होता है। लेकिन किसी भी कार्य को करने के लिए किसी स्थान की आवश्यकता होती है या कहें कि आधार की आवश्यकता होती है। सृष्टि संचालन की इन तीनों क्रियाओं के लिए इस अखिल ब्रह्मांड का आधार कौन है इसे समझने के लिए फिर से अथर्वशीर्ष की एक उक्ति को देखते हैं जो कहती है – ” त्वं मूलाधार: स्थितोसि नित्यम ॥” इसका अर्थ ये लगाया जाता है कि मनुष्य के शरीर में जो सात चक्र है उसमें सबसे पहला चक्र मूलाधार होता है वहां श्री गणेश का वास होता है। किंतु हमारे शास्त्रों की एक और उक्ति “यत पिंडे तत ब्रह्मांडे” से यह स्पष्ट होता है कि भगवान गणेश प्रत्येक मानव के मूलाधार में ही नहीं बल्कि इस अखिल ब्रह्मांड के मूलाधार में स्थित है और अनादि काल से विद्यमान है।
जब माता पार्वती ने मिट्टी की मूरत बनाकर उसमें प्राण तत्व की स्थापना करने के लिए शक्ति का आह्वान किया तब वो गणेश तत्व जो पूर्व से ही विद्यमान रहा है उसका अंश उस मिट्टी की मूरत में आकर प्रतिष्ठित हुआ। हम मंदिर बनाते हैं, उसमें पत्थर अथवा धातु की मूर्ति स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा की विधि पूर्ण करते हैं तब उस मूर्ति का चैतन्य दर्शनीय होता है। जब मानव के पास ये क्षमता है तब स्वयं आदिशक्ति आव्हान करें तो निश्चित ही परम तत्व का ही आगमन होता है।

कलयुग के पूर्व द्वापर में जब उस परमतत्व का श्री कृष्ण के रूप में अवतरण हुआ तब कितनी विलक्षण घटनाएं घटी थी ये हम पौराणिक – ऐतिहासिक ग्रंथों में पढ़ते ही हैं। भगवान गणेश का जन्म तो उसके भी पूर्व की घटना है। उस दिव्य शक्ति के आवतरण के बाद जो भी घटनाएं घटी खासकर भगवान शिव से उनका द्वंद, सर का काटा जाना, हाथी के बच्चे का सर उनके धड़ पर लगाना इन सारी घटनाओं का विश्लेषण अनेक ग्रंथों में किया गया है ।

गणेश चतुर्थी से भगवान गणेश की आराधना- उपासना दस दिनों के लिए की जाती है क्योंकि उस समय धरती पर गणेश तत्व की पृथ्वी से अधिक निकटता रहती है। उस अवधि में गणपति की उपासना करने पर हमारा चित्त गणपति चैतन्य के साथ सहजता से जुड़ जाता है। भगवान गणेश सृष्टि का आधार है, सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत है। सृष्टि में जहां से सृजन होता है, रचनात्मकता प्रस्फुटित होती है उसका भी मूल केंद्र है।इसीलिए भगवान गणेश रचनात्मकता और सृजनशीलता के अधिष्ठाता है ।
आज हमें साहित्य, फ़िल्म, नाट्य, मूर्ति, चित्रकला, नृत्य,निर्माण आदि क्षेत्र में रचनात्मकता, सृजनशीलता,नवीनता में कमी दिखाई दे रही है। उसका मूल कारण ये है कि इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले रचनात्मकता के इस नित्य चिरंतन स्त्रोत से दूर होते दिखाई पड़ते हैं। यदि कला साधक सतत गणपति की उपासना करें, आराधना करें, उनका ध्यान करें तो उनके भीतर ईश्वर प्रदत्त रचनात्मकता, सृजनशीलता की धारा कभी कुंद नहीं हो सकती। कलाकारों, साहित्यकारों, लेखकों, अभिनेताओं आदि को इस रहस्य को समझना पड़ेगा। जिस तरह मोबाइल का उपयोग करने के लिए बैटरी को चार्ज करना पड़ता है उसी तरह हमारे भीतर की रचनात्मकता को चिरंतन बनाए रखने के लिए उसे ब्रह्मांड की रचनात्मकता के मूल स्त्रोत के साथ जुड़कर रिचार्ज करना ही पड़ेगा ।

गणपति की उपासना को व्यक्तिगत स्तर से उठाकर सामाजिक स्तर पर लाने का विलक्षण विचार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को सुझा था। उन्होंने गणपति उपासना को सामाजिक स्वरूप प्रदान कर इस प्रकार के कार्यक्रमों की रचना दस दिन के लिए की ताकि आने वाली पीढ़ी हमारी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ सकें, साथ ही समाज को जागृत कर उसे अंग्रेजों के विरुद्ध खड़ा कर देश को स्वतंत्र किया जा सके क्योंकि तत्कालीन परिस्थिति में समाज व देश के लिए वो सर्वोच्च प्राथमिकता थी।

आज की स्थिति में देखें तो ध्यान में आता है की समय काल परिस्थिति के कारण कार्यक्रमों के स्वरूपों में बदलाव हुआ है। लेकिन ये बदलाव कितना समाजहित में है,देशहित में हैं इसे समझने की आवश्यकता है। आज गणपति उत्सव के कार्यक्रम की योजना बनाते समय आयोजकों को इस बात का विचार करना होगा की वर्तमान में हमारे देश की जो समस्याएं हैं उनका निराकरण करने के लिए समाज को किन बातों के प्रति जागरूक करना है,समाज को देश विरोधी ताकतों के खिलाफ संगठित करने के लिए किस प्रकार के प्रबोधन की आवश्यकता है और भविष्य में जो चुनौतियां हमारे समाज और राष्ट्र के सामने आने वाली है उन चुनौतियों का सामना करने के लिए समर्थ -सक्षम समाज और राष्ट्र का निर्माण करने हेतु नवीन पीढ़ी को गढ़ने के लिए हमें किस प्रकार के कार्यक्रमों की रचनाएं करना है ।

उदाहरण के लिए देखें तो आज पर्यावरण असंतुलन एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ा है जो भविष्य के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है। इसीलिए पर्यावरण से संबंधित सभी आयामों पर समाज को जागृत करने की गतिविधि इन दस दिनों के उत्सव में की जा सकती है। उसी तरह आज हमारे परिवार वर्तमान परिस्थिति के कारण छोटे होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी को जिस प्रकार के संस्कार परंपरागत रूप से मिलते थे उसमें कमी आती दिखाई देती हैं।इसीलिए आयोजन से जुड़े प्रत्येक कुटुंब का प्रबोधन इस विषय में हो सके इस बात का विचार भी कार्यक्रम को करते समय कर सकते हैं ।

देश विरोधी ताकतें समाज में वैमनस्य फैलाकर देश को टुकड़ों- टुकड़ों में बांटने का मंसूबा लिए समाज के बीच खाई खोदने का षड्यंत्र रचती रहती है। इन गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए समाज में समरसता बढ़ाने के उद्देश्य वाले कार्यक्रमों को शामिल किया जा सकता है।

नई पीढ़ी को सनातन धर्म की आधारभूत जानकारी देने के लिए हमारे मूल ग्रंथों जैसे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, उपनिषद, वेदों की शिक्षा देकर धर्म के प्रति समाज का जागरण किया जा सकता है।
भगवान गणपति, गणों के पति यानी सेनापति भी है। भगवान गणेश ने सतयुग में देवांतक व नरांतक नामक असुरों का संहार किया था। उसी तरह त्रेता युग में सिंधु , द्वापर में सिंदूरासुर के साथ मत्सासुर, मदासुर, मोहासुर, कामासुर, लोभासुर, क्रोधासुर, मामासुर, अहंतासुर जैसे असुरों के संहार का वर्णन शास्त्रों में मिलता है ।

भगवान गणपति चतुर्भुज हैं वे अपने एक हाथ में ज्ञान के प्रतीक मोदक को रखते हैं, दूसरे हाथ से हमें आशीर्वाद देते हैं। तीसरे व चौथे हाथ में “पाश और अंकुश” धारण किए हुए हैं। वर्तमान परिस्थिति में गणपति के मोदक और लड्डू पर ध्यान देने के अलावा ‘पाश और अंकुश’ पर ध्यान देना भी आवश्यक हो गया है। आज के समय में देश विरोधी ताकतें जिस प्रकार से समाज में वैमनस्य को बढ़ाने वाले विमर्श स्थापित करने में लगी हैं उन्हें रोकने के लिए विवेक के ‘अंकुश’ का उपयोग समाज को बढ़ाना होगा। उसी तरह हमारे समाज को अपसंस्कृति की जंजीरों से बांधने का प्रयास अलग-अलग माध्यमों से हो रहा है। इन जंजीरों को अपने सनातन मूल्यों के विचार ‘पाश’ से काट कर समाज को देश के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का काम करने की आवश्यकता है। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को दूषित करने का काम जो तत्व, बातें, विचार करते हैं उन पर ‘अंकुश’ का उपयोग करना है।

लोक कल्याणकारी कामों में सफलता निश्चित मिलेगी इस बात का आश्वासन भगवान गणेश की अभय मुद्रा हमें देती है। परिणाम के रूप में मन में जो मोद यानि आनंद उत्पन्न होगा वो मोदक के रूप में भगवान के प्रसाद स्वरूप प्राप्त होगा। आज के समय में राष्ट्र एवं समाज की दृष्टि से यही सच्ची गणेश उपासना होगी ।

– (श्री जोशी संस्कृति अध्येता एवं अकादमिक प्रशासक हैं)

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