वर्तमान अंग्रेजी गैगेरियन कैलेण्डर केवल 443 वर्ष पुराना , भारत में 272 वर्ष पहले लागू हुआ

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एक जनवरी से नया साल आरंभ हो रहा है । पूरी दुनियाँ वर्ष 2025 में प्रवेश करेगी । समय नापने की यह पद्धति ग्रेगोरियन कैलेण्डर कहलाती है । पर यह ग्रेगोरियन कैलेण्डर 2024 वर्ष पुराना नहीं है । यह केवल 443 वर्ष पुराना है । भारत में इसे लागू हुये केवल 272 वर्ष ही हुये हैं। 

दुनियाँ में काल गणना का इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव से भरा है । विभिन्न देशों में सात हजार वर्ष में बीस से अधिक कैलेण्डरों का इतिहास उपलब्ध है । जिस ग्रेगेरियन कैलेण्डर के अनुसार आज की दुनियाँ चल रही है, यह 1582 ईस्वी सन् में आरंभ हुआ था । और भारत में अंग्रेजों ने 1753 में लागू किया था । आरंभ में इसका उपयोग केवल यूरोपीय समुदाय ही करता था । भारतीय जन जीवन में कहीं विक्रम संवत और कहीं हिजरी सन् प्रचलित था । जब अंग्रेजों ने  इस कैलेण्डर को भारतीय शासन व्यवस्था का अंग बनाया तब से समाज जीवन में घुलने लगा। और अब पूरे भारत की जीवनचर्या इसी कैलेण्डर से निर्धारित होती है । आज भारत की आधुनिक पीढ़ी भले अपना अतीत भूल गयी हो पर यह गर्व की बात है कि यूरोप को काल गणना से परिचित कराने वाले भारतीय शोध कर्ता ही रहे हैं। यूरोप के प्राचीन इतिहास में वर्णन मिलता है कि दो सौ नावों से आर्यों का एक दल यूरोप गया था जिसने रोम की स्थापना की थी वे अपने साथ समय की गणना पद्धति लेकर गये थे । दूसरा विवरण सुप्रसिद्ध यूनानी सम्राट सिकन्दर के समय का है । सिकन्दर आक्रमणकारी के रूप में भारत आया था । और जब लौटा तो वह भारत से विभिन्न विषय के विद्वानों का दल साथ ले गया था । उनमें पंचांग पद्धति विशेषज्ञ भी थे । इन विशेषज्ञों ने यूरोप जाकर यूरोपीय काल गणना पद्धति में संशोधन किये और जूलियन कैलेण्डर आरंभ किया । पोप ग्रेगरी अष्टम ने 1582 में कुछ संशोधन किये और वर्तमान कैलेण्डर का यह स्वरूप सामने आया । इसलिए पोप अष्टम के नाम से इसका नाम “ग्रेगोरियन कैलेण्डर” हुआ। पोप ग्रेगरी अष्टम ने डेढ़ हजार वर्ष पूर्व ईसा मसीह की अनुमानित जन्मतिथि की गणना करके 1582 वर्ष पूर्व की तिथि 1 जनवरी से लागू किया गया था । ईसा मसीह की अनुमानित जन्मतिथि से लागू करने के कारण इसे “ईस्वी सन्” और लागू करने वाले पोप ग्रेगरी के नाम पर कैलेण्डर का नाम गेग्रेरियन दिया गया । इस कैलेण्डर को वैश्विक बनाने का श्रेय अंग्रेजों को है । अंग्रेज जिस देश में व्यापार करने गये, शासक बने,  उन्होने अपनी परंपराएँ लागू कीं और यह ग्रेगेरियन ईस्वी सन् कैलेण्डर पद्धति भी । अंग्रेज अपनी जड़ों और परंपराओं से इतने गहरे जुड़े रहे कि उन्होंने पूरी दुनियाँ को अपने ही परिवेश में ढाला । पता नहीं अंग्रेजों के पास क्या जादू था कि दुनिया से उनके शासन का अंत भले हो गया हो पर उनके द्वारा शासित रहे अधिकांश देश आज भी अंग्रेजी परंपराएँ और उनके इस ग्रेगोरियन कैलेंडर से ही अपनी सरकार और समाज चलाते हैं । कुछ देशों में भीतर अपनी निजी काल गणना पद्धति प्रचलित तो है, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी दुनियाँ अंग्रेजी महीनों और तिथियों के अनुसार ही संचालित होती है । 

संसार में कैलेण्डर लागू होने की तिथियाँ 

ग्रेगोरियन कैलेण्डर उपयोग किये गये महीनों और दिनों के नाम भी अंग्रेजों के अपने नहीं हैं । वे दुनियाँ की विभिन्न भाषाओं से लेकर रूपान्तरित किये गये है । सबसे पहले इसका नाम “कैलेण्डर” ही देखें । कैलेण्डर शब्द अंग्रेजी भाषा का नहीं है । लैटिन भाषा का है । लैटिन भाषा में “कैलेण्ड” शब्द का अर्थ हिसाब किताब होता है । उधर चीन में “केलैण्ड” का अर्थ चिल्लाना होता है । वहाँ ढोल बजाकर तिथि दिन और समय की सूचना दी जाती थी । इस तरह कैलेण्ड शब्द से इस पद्धति का नाम कैलेण्डर पड़ा । इसे संसार में अलग-अलग देशों में अलग अलग तिथियों में लागू किया गया । यह ग्रेगोरियन कैलेंडर इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने सन् 1582 ईस्वी में, परशिया, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड और फ़्लैंडर्स ने 1583 ईस्वी में, पोलैंड ने 1586 ईस्वी में, हंगरी ने 1587 ईस्वी में, जर्मनी, नीदरलैंड, डेनमार्क ने 1700 ईस्वी में, ब्रिटेन और उनके द्वारा शासित लगभग सभी देशों में 1752 ईस्वी, जापान ने 1972 ईस्वी, चीन ने 1912 ईस्वी, बुल्गारिया ने 1915 ईस्वी, तुर्की और सोवियत रूस ने 1917 ईस्वी, युगोस्लाविया और रोमानिया ने 1919 ईस्वी में लागू हुआ । 

संसार के ज्ञात इतिहास में जितने भी सन् संवत् या न्यू एयर परंपराएँ मिलतीं हैं उनमें सबसे प्राचीन काल गणना पद्धति भारत में है । भारत की सबसे पुरानी पुरानी काल गणना पद्धति को “युगाब्ध संवत् ” कहा जाता है जो लगभग 5127 वर्ष पुराना है । इसका संबंध महाभारत काल से है । यह संवत् युधिष्ठिर के राज्याभिषेक तिथि से आरंभ हुआ था । इसका सत्यापन द्वारिका के किनारे समुद्र की पुरातत्व खुदाई में मिली विभिन्न सामग्री से होता है । अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने इस उपलब्घ सामग्री के समय लगभग पाँच हजार से पाँच हजार दो सौ वर्ष के बीच का माना गया है । संवत् आरंभ होने का दूसरा प्राचीन उल्लेख बेबीलोनिया से मिलता है । इस संवत् का इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना है । तब वहां नववर्ष का आरंभ बसंत ऋतु से होता था । यह तिथि लगभग एक मार्च के आसपास ठहरती है । ग्रेगोरियन कैलेण्डर लागू होने से पहले समूचे यूरोप में यही कैलेण्डर लागू था । इसलिये आज भी मार्च का महीना हिसाब-किताब का वर्षांत माना जाता है । जिन अंग्रेजों ने एक जनवरी से नववर्ष का आरंभ माना वे भी अपना हिसाब किताब मार्च माह से ही करते थे । तीसरा प्राचीन नववर्ष पारसी नौरोज है । इसका आरंभ लगभग तीन हजार वर्ष पहले हुआ था । पारसी नौरोज 19 अगस्त से आरंभ होता है । चौथा प्राचीन संवत् भारत का विक्रम संवत है जो महाराज विक्रमादित्य के राज्याभिषेक से आरंभ हुआ था । इसे 2081 वर्ष बीत गये । विक्रम संवत् के अतिरिक्त भारत में शक संवत् और वीर निर्वाण संवत् की भी मान्यता रही है । शक संवत् का संबंध भारत को शक आक्रमण से मुक्ति की स्मृति में आरंभ हुआ था तो वीर निर्वाण संवत् का संबंध भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण तिथि से है । इसका आरंभ 7 अक्टूबर 528 ईसा पूर्व माना जाता है ।

यूरोप में कैलेण्डर की शुरुआत 

 यूरोपियन कैलेण्डर का आरंभ रोम से हुआ था । इसे आरंभ करने वाले रोमन सम्राट जूलियन सीजर थे । इसलिये उसका पुराना जूलियन कैलेण्डर था । उन्होने वहां पूर्व से प्रचलित कैलेण्डर में कुछ परिवर्तन किये थे जो उनसे पूर्व राजा न्यूमा पोपेलियस ने आरंभ किया था । तब इसमें केवल दस माह और 354 दिन ही हुआ करते थे । कहते हैं शोध कर्ता तो बारह मास का ही कैलेण्डर तैयार करना चाहते थे पर राजा बारह माह का कैलेण्डर बनाने तैयार न हुआ था । राजा की जिद के चलते बारह के बजाय दस माह का कैलेण्डर तैयार हुआ था । बादमें जूलियट सीजर ने उस कैलेण्डर में परिवर्तन करने के आदेश दिये और तब यह कैलेण्डर बारह महीने का तैयार हुआ। अब कुछ विद्वानों का मत है कि इसमें ईसा मसीह की जन्मतिथि में चार वर्ष का अंतर आ गया है । इसमें समय के साथ अनेक परिवर्तन हुये । जब यह कैलेण्डर आरंभ हुआ था तब इसमें लीप एयर या हर चौथे साल फरवरी 29 दिन का प्रावधान नहीं था । यह प्रावधान खगोल अनुसंधान के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी परिक्रमा की गणना करके जोड़ा । जबकि भारत में पाँच हजार वर्ष पुरानी गणना भी बारह माह की थी । जो ऋतु परिवर्तन का अध्ययन करके निर्धारित किया गया था । भारत में इसे कैलेण्डर नहीं “पंचांग” कहा जाता है । शब्द “पंचांग” भी गहन अर्थ लिए हुए है । पंचांग अर्थात पाँच अंग । भारतीय पंचांग में कुल पाँच आधार होते हैं। ये तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं । इन पाँच अंगों से ही भारतीय पंचांग में तिथि दिन की गणना होती है जबकि वर्ष और माह की जानकारी इन पाँच अंगों से अलग होती है । जबकि ग्रेगोरियन कैलेण्डर में केवल दो  जानकारी होती है । तारीख और दिन की । माह और वर्ष भी । इस प्रकार पाँच हजार वर्ष पुरानी भारतीय कालगणना पद्धति “पंचांग” पश्चिम की आधुनिक कैलेण्डर पद्धति से अपेक्षाकृत अधिक उन्नत रही है ।

पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ आल वी इमैजिन ऐज लाइट ‘ – एक भारतीय फिल्म जिसने इतिहास रच दिया

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अजित राय

भारत की युवा फिल्मकार पायल कपाड़िया की पहली हीं फिल्म ‘ आल वी इमैजिन ऐज लाइट ‘ ने वैश्विक स्तर पर इतिहास रच दिया। इस बार प्रतिष्ठित मुंबई फिल्म समारोह मामी की यह ओपनिंग फिल्म रही। हालांकि भारत के 55 वे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा में इसे विश्व सिनेमा खंड में दिखाया गया। दुनिया भर के फिल्म समारोहों में भारी प्रशंसा बटोरने के बाद इसे नवंबर के आखिरी हफ्ते में भारतीय सिनेमा घरों में प्रदर्शित किया गया। भारत से आस्कर अवार्ड में भेजे जाने की प्रतियोगिता से बाहर होने के सदमे से अभी हम सब उबरे भी नहीं थे कि इस फिल्म को प्रतिष्ठित गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड में दो नामांकन मिल गया – विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक की श्रेणी में। पायल कपाड़िया गोल्डन ग्लोब अवार्ड में नामांकित होने वाली पहली महिला फिल्मकार बन गई। आस्कर अवार्ड में भारत की ओर से आधिकारिक प्रविष्टि भेजने वाली फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की जूरी के अध्यक्ष जाह्नू बरुआ का बयान छपा कि यह फिल्म तकनीकी रूप से कमजोर है। उनका यह बयान तब आया जब उनकी चुनी हुई किरण राव की फिल्म ‘ लापता लेडीज ‘ आस्कर अवार्ड की प्रतियोगिता से पहले ही दौर में बाहर हो गई। उनके बयान की प्रतिक्रिया में हंसल मेहता, सुधीर मिश्रा आदि फिल्मकारों के बयानों की बाढ़ आ गई। हालांकि यहां यह बात बता दें कि इस मामले से भारत सरकार का कुछ भी नहीं लेना देना है। इसी बीच पायल कपाड़िया के लिए दो खुश खबरी आई। पहली यह कि चूंकि उनकी फिल्म अमेरिका में प्रदर्शित हो गई है, लिहाजा वह स्वतंत्र रूप में 97 वे आस्कर अवार्ड के मुख्य प्रतियोगिता खंड की कई श्रेणियों में शामिल हो गई है। दूसरे, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा प्रतिवर्ष जारी की जानेवाली पसंदीदा फिल्मों की सूची में ‘ आल वी इमैजिन ऐज लाइट ‘ पहले नंबर पर है।

इस साल 77 वें कान फिल्म समारोह में पायल कपाड़िया की हिंदी मलयाली फिल्म ‘ आल वी इमैजिन ऐज लाइट ‘ ने न सिर्फ मुख्य प्रतियोगिता खंड में जगह बनाई वल्कि बेस्ट फिल्म का पाल्मा डोर के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार ग्रैंड प्रिक्स भी जीत कर इतिहास बना दिया। तीस साल बाद किसी भारतीय फिल्म ने मुख्य प्रतियोगिता खंड में जगह बनाई थी। इससे पहले 1994 में शाजी एन करुण की मलयालम फिल्म ‘ स्वाहम ‘ प्रतियोगिता खंड में चुनी गई थी।इसके बारे में काफी कुछ दुनिया भर में आज तक लिखा जा रहा है। उस समय पश्चिम के कई मशहूर फिल्म समीक्षकों का मानना था कि यदि यह फिल्म भारत में आस्कर पुरस्कार के लिए भेजी जाती है तो इसके जीतने की काफी संभावना है। माना जा रहा था कि पायल कपाड़िया की फिल्म बेस्ट इंटरनेशनल फिल्म की श्रेणी में आस्कर पुरस्कार जीत सकती है। ‘ डेट लाइन ‘ , ‘ वैरायटी ‘, ‘ बालीवुड रिपोर्टर ‘, स्क्रीन इंटरनेशनल ‘ आदि दुनिया की कई मशहूर फिल्म पत्रिकाओं में इस आशय के यहां लेख भी छपे थे। इसकी मुख्य वजह यह है कि इधर कान फिल्म समारोह और आस्कर पुरस्कारों के बीच कुछ साझेदारी बढ़ रही है। पिछले कई सालों से लगातार आस्कर पुरस्कारों में कान फिल्म समारोह की फिल्मों के करीब दो दर्जन से अधिक नामांकन हुए हैं। उसी तरह कान फिल्म समारोह में लगातार हालीवुड और अमेरिकी सिनेमा का वर्चस्व बढ़ा है। आस्कर अवार्ड की जूरी में वोट देने वाले करीब सात हजार वोटर पहले ही कान, बर्लिन, वेनिस जैसे फिल्म समारोहों में इन फिल्मों को देख चुके होते हैं इसलिए इन फिल्मों के अवार्ड जीतने की संभावना बढ़ जाती है। इसी साल टोकियो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में एक महत्वपूर्ण घटना घटी ‌। जापान के इस समय सबसे महत्वपूर्ण और कान में ‘ शाप लिफ्टर’ फिल्म के लिए बेस्ट फिल्म का पाल्मा डोर जीत चुके फिल्मकार कोरेईडा हिरोकाजू ने मंच पर पायल कपाड़िया से संवाद किया। भारतीय सिनेमा के लिए यह गौरव का क्षण था।

पायल कपाड़िया जब भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे में पढ़ती थी तो 2017 में उनकी शार्ट फिल्म ‘ आफ्टरनून क्लाउड्स ‘ अकेली भारतीय फिल्म थी जिसे 70 वें कान फिल्म समारोह के सिनेफोंडेशन खंड में चुना गया था। इसके बाद 2021 में उनकी डाक्यूमेंट्री ‘ अ नाइट आफ नोइंग नथिंग ‘ को कान फिल्म समारोह के’ डायरेक्टर्स फोर्टनाइट में चुना गया था और उसे बेस्ट डाक्यूमेंट्री का गोल्डन आई अवार्ड भी मिला था। लेकिन इस साल 77 वें कान फिल्म समारोह में पायल कपाड़िया ने इतिहास रच दिया था क्योंकि वे यहां ‘ गाडफादर ‘ जैसी कल्ट फिल्म बनाने वाले फ्रांसिस फोर्ड कपोला, आस्कर विजेता पाउलो सोरेंतिनों, माइकल हाजाविसियस और जिया झंके, मोहम्मद रसूलौफ, अली अब्बासी, जैक ओदियार डेविड क्रोनेनबर्ग जैसे विश्व के दिग्गज फिल्मकारों के साथ प्रतियोगिता खंड में चुनी गई थी। कान के ग्रैंड थियेटर लूमिएर में इस फिल्म के स्वागत में काफी देर तक खड़े होकर दर्शकों ने ताली बजाई थी। पायल कपाड़िया के साथ छाया कदम, कनी कस्तूरी और दिव्य प्रभा पुरस्कार लेने मंच पर जब एक साथ भारत की पारंपरिक वेशभूषा रंगीन साड़ी में आईं तो ऐसा लगा जैसे कि भारत की स्त्री शक्ति का सम्मान हो रहा है।

‘ आल वी इमैजिन ऐज लाइट

मुंबई में नर्स का काम करने वाली केरल की दो औरतों प्रभा और अनु की कहानी है जो एक रूम किचेन ( वन आर के) साझा करती हैं। फिल्म में मुख्य भूमिकाएं तीन अभिनेत्रियों – कनी कुसरुती, दिव्य प्रभा और छाया कदम – ने निभाई है। रणबीर दास का छायांकन बहुत उम्दा है और अपने फोकस से कभी भटकता नहीं है। मुंबई की भीड़, आसमान, बादल बारिश हवा और समुद्र के साथ इस पास की आवाजें भी रणबीर दास के कैमरे से होकर जैसे फिल्म के असंख्य चरित्रों में बदल जाते हैं।
सुदूर केरल से नर्स की नौकरी करने मुंबई आई दो औरतों का बहनापा बेजोड़ है। एक छोटे से कमरे में दोनों की साझी गतिविधियां एक भरा पूरा संसार रचती है। बड़ी नर्स प्रभा जब तक कुछ समझ पाती, उसके घरवालों ने उसकी शादी कर दी। शादी के तुरंत बाद ही उसका पति जर्मनी चला गया और उसने प्रभा की कभी खोज खबर नहीं ली। प्रभा को इंतज़ार है और उम्मीद भी कि एक दिन उसका पति वापस लौटेगा। उसके अस्पताल का एक मलयाली डाक्टर उसकी ओर आकर्षित होता है पर प्रभा इनकार कर देती हैं।दोनों औरतें चौक जाती हैं जब एक दिन जर्मनी से एक पार्सल आता है। जाहिर है प्रभा के पति ने उसे सालों बाद कोई उपहार भेजा है। छोटी नर्स अनु केरल से मुंबई आए एक मुस्लिम लड़के शियाज से प्रेम में पड़ जाती है। वह इस भीड़ भरे शहर में उससे मिलने का एकांत खोजती रहती है। एक दूसरी अधेड़ औरत को बिल्डर ने धोखा दे दिया है क्योंकि उसके पति के मरने के बाद उसके पास पैसे जमा कराने का कोई कागजी सबूत नहीं है।

रणबीर दास का कैमरा मुंबई की भीड़ में अपने चरित्रों के इर्द-गिर्द ही फोकस रहता है। सब्जी मंडी से शुरू करके लोकल रेलवे की आवा-जाही, रेलवे स्टेशन की भीड़ में आना जाना, भीड़ भरी सड़कों से गुजरना, छोटी सी रसोई में मछली तलना और बाथरूम में कपड़े धोना, बिस्तर पर सोते हुए शून्य को निहारना, यानि सब कुछ हम महसूस कर सकते हैं। मुंबई में साथ रहते हुए भी अकेलापन कभी पीछा नहीं छोड़ता। पायल कपाड़िया ने फिल्म की गति को धीमा रखा है जिससे छवियां और दृश्य दर्शकों के दिलो-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ सकें। प्रकट हिंसा कहीं भी नहीं है पर जीवन में मैल की तरह जम चुके दुःख की चादर पूरे माहौल में फैली हुई है।
एक दृश्य में अनु घर की खिड़की से बादलों के जरिए अपने प्रेमी को चुंबन भेजती हैं। दूसरे दृश्य में वह अपने प्रेमी के घर जाने के लिए काला बुर्का खरीदती है। आधे रास्ते में उसके प्रेमी का मैसेज आता है कि घरवालों का शादी में जाने का प्रोग्राम कैंसल हो गया। अनु की निराशा समझी जा सकती है। पर प्रेम तो आखिर प्रेम है जो सिनेमा से बाहर जीवन में होता है।

प्रभा और अनु उस धोखा खाई अधेड़ औरत के साथ मुंबई से बाहर एक समुद्री शहर में घूमने का प्रोग्राम बनाती है। अनु अपने प्रेमी को भी बुला लेती है कि उसे उसके साथ अंतरंग समय बीताने का मौका मिलेगा। एक दोपहर समुद्र किनारे एक बेहोश आदमी पड़ा मिलता है। नियति इन औरतों के जीवन से रौशनी को लगातार दूर ले जा रही है। प्रभा अनु से कहती भी है कि मुंबई मायानगरी है, माया पर जो विश्वास नहीं करेगा वह यहां पागल हो जाएगा। इतने बड़े शहर में दो औरतें साथ साथ रौशनी की चाहत में हैं जबकि उनके चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है।

हिंदुत्व की मजबूती के लिए जातिवाद को खत्म करना होगा

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भारत में हिंदुत्व का साम्राज्य स्थापित करने के लिए पहली आवश्यकता है जातिवादी प्रथा को जड़ मूल से नष्ट करना।

इस दिशा में RSS और अन्य हिंदूवादी संगठन अयोध्या में बाबरी मस्जिद विवाद के बाद से ही सक्रिय हो गए थे जिसका परिणाम चुनावों में देखने को मिला है। आजकल पूरे भारत में हर तीज त्यौहार जोरदारी से मनाया जा रहा है जिसमें सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ी है। खासकर परिक्रमाओं, कांवर  यात्राओं, जयंतियां,  मेले, तमाशों, कीर्तन, कथा भागवत आयोजनों, भंडारों में उपेक्षित समूहों की हिस्सेदारी बेतहाशा बढ़ी है। हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े संगठन अब काफी सक्रिय हो चुके हैं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। जमीनी स्तर पर गौ हत्या के खिलाफ, धर्म परिवर्तन और लव जिहाद के मामलों में इन ग्रुप्स की निगरानी और सक्रियता बढ़ी है। 

आम जन मानस के हृदय में ये बात बैठा दी गई है कि तुष्टिकरण की राजनीति ने राष्ट्र को काफी नुकसान पहुंचाया है। जातियों के आधार पर समाज के विघटन से देश कमजोर हुआ है, इसलिए भविष्य में राजनीति खुलकर ध्रुवीकरण आधारित होगी।

यह सही है कि हजारों वर्षों से चल रहे जातिवाद ने भारत को आर्थिक और राजनैतिक शक्ति के रूप में कभी उभरने नहीं दिया है। घुसपैठिए और आक्रामक लुटेरे आते रहे और सामाजिक विभाजन का फायदा उठाते रहे। गुलामी की आदत बन गई, सांस्कृतिक और धार्मिक विध्वंश होता रहा।
आजादी के बाद भी कुछ राजनैतिक दलों ने ये खेल जारी रखा। जातियों के नाम पर पार्टियां बनी, क्षेत्रीय जातिगत ठेकेदारों ने सामाजिक खाइयों को और चौड़ा करने के अवसर भुनाए और सत्ता हथियाई।

हिंदुत्व की राजनैतिक विचारधारा को सशक्त बनाने के लिए जातिवाद का मकड़जाल तोड़ना ही होगा। जाति व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से भारत के विभिन्न समुदायों को हाशिए पर धकेल दिया है, खासकर पर  तथाकथित निचली जातियों के रूप में वर्गीकृत लोगों को।  इन जातिगत बाधाओं को कम करने की आवश्यकता केवल सामाजिक न्याय के बारे में नहीं है; यह हिंदुओं और हिंदुत्व विचारधारा के एकीकरण के लिए भी आवश्यक है।

सोशलिस्ट विचारकों ने हमेशा माना कि जाति व्यवस्था  लोकतंत्र और समानता के आदर्शों के विपरीत  है। इसीलिए डॉ लोहिया ने जाति तोड़ो सम्मेलनों की श्रृंखला शुरू की। सोशलिस्ट लीडर राम किशोर कहते हैं, “जाति-आधारित भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से विधायी उपायों के बावजूद, गहरी जड़ें जमाए हुए सामाजिक प्रथाएँ असमानता को कायम रखती हैं। हाशिए पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाना और उन्हें मुख्यधारा में एकीकृत करना केवल एक नैतिक दायित्व नहीं है; यह राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। एक समाज जो अपने सबसे कमजोर सदस्यों का उत्थान नहीं कर सकता, वह सामाजिक और राजनीतिक दोनों रूप से कमजोर होता है।”

हिंदुत्व विचारधारा को सहिष्णुता और स्वीकृति पर आधारित एक नरेटिव को अपनाने के लिए, उसे जाति व्यवस्था द्वारा खड़ी की गई बाधाओं को खत्म करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करना होगा। तथाकथित निचली जातियों के सम्मान और अधिकारों को स्वीकार करने से न केवल समावेशी माहौल को बढ़ावा मिलता है बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव भी मजबूत होता है, जो राष्ट्रीय अखंडता के लिए आवश्यक है।

सामाजिक एकीकरण को उत्प्रेरित करने वाले सबसे प्रभावशाली सुधारों में से एक अंतर-जातीय विवाहों को बढ़ावा देना है, ये कहना है प्रो पारस नाथ चौधरी का। “ये जुड़ाव पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दे सकते हैं, जिससे जातिगत रेखाओं के पार संबंधों की अधिक सामाजिक स्वीकृति और सामान्यीकरण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इन विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए, व्यापक कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए, जिसमें वित्तीय लाभ, सामाजिक मान्यता और कानूनी सहायता प्रदान की जाए। विविध पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को एकजुट होने के लिए प्रोत्साहित करके, जाति की कठोर सीमाएँ धीरे-धीरे खत्म हो सकती हैं, जिससे समावेशिता की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।”

सामाजिक एकीकरण के लिए  शैक्षिक सुधार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से निचली जातियों के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति कार्यक्रम और शैक्षिक अवसर बनाना उन्हें सशक्त बना सकता है, जिससे वे  प्रतिस्पर्धा की दुनिया  में सक्षम हो सकते हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करके, वंचित लोग अपनी सामाजिक स्थिति से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी अनूठी प्रतिभा और दृष्टिकोण को मुख्यधारा में ला सकते हैं। यह सशक्तिकरण न केवल व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देता है बल्कि पूरे राष्ट्र को समृद्ध भी बनाता है। 

इस प्रक्रिया में मीडिया और सामाजिक मंचों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। अंतरजातीय विवाह और साझेदारी की सफलता की कहानियों का जश्न मनाने वाले अभियान धारणाओं को बदल सकते हैं, और अधिक प्रगतिशील सामाजिक मानसिकता का निर्माण कर सकते हैं।  
इसके अलावा, अंतरजातीय जोड़ों की सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है। अपनी जाति से बाहर विवाह करने का विकल्प चुनने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोपरि है। ऐसे कानून बनाए जाने चाहिए जो ऐसे विवाहों से उत्पन्न होने वाले भेदभाव या हिंसा के मामलों में न्याय के लिए स्पष्ट रास्ते प्रदान करें, जिससे जाति-आधारित हिंसा और पूर्वाग्रह के खिलाफ एक मजबूत संदेश जाए। सहिष्णुता और उदार आदर्शों में निहित बहुसंख्यक समुदाय का सशक्तिकरण महत्वपूर्ण है। जब हिंदू समावेशिता और स्वीकृति के बैनर तले एकजुट होते हैं, तो वे विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा पेश कर सकते हैं। आपसी सम्मान और साझा मानवता पर बनी नींव एक मजबूत, अधिक लचीले भारत की ओर ले जा सकती है।
विकसित भारत में जाति व्यवस्था की बाधाओं को कम करने के सामूहिक प्रयास के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। अंतर-जातीय विवाह को बढ़ावा देना, शैक्षिक सुधारों को बढ़ाना और रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देना एक समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

तिब्बत में छुपकर क्या यह भारत पर हमला है

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बांग्लादेश में जब तख्ता पलट हुआ था, अब ऐसा लग रहा है कि उस समय मीडिया संस्थानों ने ठीक ही लिखा था कि इसके पीछे चीन का हाथ हो सकता है। बांग्लादेश की जनता ने मोहम्मद यूनुस को कार्यवाहक प्रधानमंत्री स्वीकार करके अपनी तबाही के मसौदे पर ही मानों हस्ताक्षर कर दिया था। अब बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल होते होते सबकुछ लूट चुका होगा।

तिब्बत में इस समय दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर बांध तैयार हो रहा है। इससे चीन सिर्फ भारत को नुकसान पहुंचा रहा है, ऐसा नहीं है। इससे बांगलदेश भी प्रभावित होगा। बांग्लादेश छोटा देश है तो उस पड़ी चीन की हल्की मार भी, उसे भारी पड़ने वाली है।

बांग्लादेश को यह बात कौन समझाए कि उसके देश में एक ऐसा कठपुतली शासक चीन ने बैठा दिया है। जो बांग्लदेश से अधिक चीन के हितों की चिंता कर रहा है।

भारत में बाबा साहब को मानने वाले अम्बेडकरवादी नव बौद्धों के बीच भी तिब्बत को लेकर कभी कोई चर्चा नहीं सुनी। चीन जिस तरह से बांध के नाम पर बौद्ध विहारों को तबाह कर रहा है। नव बौद्धों को इसे लेकर किसी मंच पर तो आवाज उठानी चाहिए थी। इस समय चीन तिब्बत की पूरी पारिस्थितिकी के साथ खिलवाड़ कर रहा है। यह चिंता की बात है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 15 लाख तिब्बतियों को विस्थापित करने की तैयारी चीन कर चुका है। 23 मई 1951 को चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया था। बौद्धों के सबसे बड़े गुरु दलाई लामा को अपने देश से विस्थापित होने को उसने मजबूर किया। क्या बाबा साहब में यकिन रखने का दावा करने वाले किसी एक्टिविस्ट को इस मुद्दे पर कभी बात करते हुए सुना है आपने? तिब्बत को लेकर भारत के नव बौद्धों के बीच कभी कोई चर्चा होते मैने तो नहीं सुनी।

पूरा तिब्बत बौद्धों का है। जिसे उन्हें चीन से वापस लेना है। इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा किसी अम्बेडकरवादी बौद्ध सम्मेलन में सुनने को नहीं मिलती।

इस साल के प्रारंभ में एक अन्य हाइड्रोपावर परियोजना का​ विरोध कर रहे सैकड़ों तिब्बतियों को चीन ने बुरी तरह पीटवाया और उनकी गिरफ्तारी भी करवाई। यह सब पढ़कर यही समझ आता है कि तिब्बतियों की स्थिति चीन में उईगर मुसलमानों से बेहतर नहीं है। लेकिन इस मुद्दे पर ना कभी भारतीय मुसलमान चिन्तित दिखते हैं और ना नव-बौद्ध!

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