छत्तीसगढ़: मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज कुमार झा का पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम खुला पत्र

images-2.jpeg

सम्माननीय भूपेश बघेलजी,
सादर नमस्कार, जय जोहार।

आपको ‘जनादेश दिवस’ की विलंबित बधाई। आशा है अब आप सानंद होंगे। उम्मीद है अब आपका गुस्सा भी थोड़ा ठंडा हुआ होगा। आपके अहं को ठेस पहुचाने के लिए मैं जरा भी शर्मिंदा तो नहीं हूं, पर आपको हुई तकलीफ के लिए थोड़ा बुरा महसूस कर रहा हूं। दुःख इस बात का हुआ है कि ‘जनादेश दिवस’ की पूर्व संध्या पर आपको एक ‘वेतन पर पलने वाले’ के विरुद्ध प्रेस वार्ता आयोजित करनी पड़ी।

साल भर पहले तक अजीमो शान शहंशाह स्वयं को समझ लेने वाले व्यक्ति की अगर यह दुर्गति हो गयी कि उसे मेरे जैसे वेतनभोगी के मूंह लगना पड़ जाय, तो पराजय की बरसी के अवसर पर यह आपके लिए दुगना पीड़ा का विषय है। आपके स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की कामना करता हूं। महतारी वंदन की किश्त जारी हो चुकी है। आशा है विधायक के रूप में मिलने वाला आपका वेतन भी आपके खाते में पहुंच गया होगा। सलाहकार वाला वेतन मेरा भी आ ही गया है, जिस पर मुझे अगले माह तक ‘पलना’ होगा। बहरहाल।

जानते हैं भूपेशजी? हम भारत के (निम्न मध्यवर्गीय) लोग निस्संदेह वेतन पर पलते हैं। हमारे जैसे करोड़ों लोगों को इसलिए वेतन पर पलना होता है, क्योंकि हम किसी गायकवाड़ या महराज दरभंगा के वंशज नहीं होते हैं। जितना आपके बारे में रिसर्च करना पड़ा है हमें, उसके अनुसार आप भी किसी अकबर या निजाम हैदराबाद की विरासत के उत्तराधिकारी रहे हों, ऐसा नहीं है। तो ऐसे में आपके पास भी या तो वेतन पर, या कमीशन पर पलने का ही विकल्प होगा, विशेषकर अगर अलग कोई व्यवसाय नहीं हो तो। हमने वेतन वाला विकल्प चुना हुआ है। आपने क्या-क्या विकल्प चुना है ‘पलने के लिए’ इसके बारे में कयास लगाने का कोई मतलब नहीं है। सम्बंधित एजेंसियां बकायदा यह जांच कर ही रही होगी। लेकिन यह तय है कि भाजपा की पुरानी सरकार द्वारा धान खरीदी की, की गयी पुख्ता व्यवस्था से पहले वेतन-कमीशन के अलावा आपके पास भी पलने का कोई और माध्यम नहीं रहा होगा। अतः आग्रह है कि वेतन पर पलने वालों को इस तरह हिकारत से कृपया नहीं देखें। यह छत्तीसगढ़ के लाखों शासकीय-अशासकीय कर्मचारियों समेत भारत के करोड़ों वेतनभोगियों का अपमान है। देश-प्रदेश के तमाम वेतनभोगी ‘पक्के में’ काम करते हैं और ये समुंह सबसे अधिक आयकर चुकाकर देश की प्रगति में अपना योगदान देते हैं। सो, मुझे जो कहना हो कहिए, वेतनभोगी जमात आपसे अधिक सम्मान का अधिकारी है। आशा है आगे आप इसका ध्यान रखेंगे।

आपके प्रेस वार्ता का वीडियो बार-बार देखा। आपके कष्ट को समझने की कोशिश की कि आखिर आपकी आपत्ति किन बातों से है? मैंने यही पाया कि स्वयं विरोधाभासी बयान देते हुए आप इस प्रेस वार्ता में बुरी तरह कनफ्यूज नजर आए। जिस विषय पर आप यह कह रहे कि वर्तमान मुख्यमंत्री जी के पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं है, उसी मूंह से वहीं आप उसी विषय पर, उसी प्रेस वार्ता में लोकप्रिय सांसद और आपको लोकसभा में पटखनी देने वाले श्री संतोष पांडेय जी के बयान का जवाब भी दे रहे हैं। उसी ‘जोगी-2.0’ विषय पर हमारे उप-मुख्यमंत्री श्री अरुण साव जी, जिन्होंने प्रदेश अध्यक्ष रहते आपकी सरकार को पिछले वर्ष इसी दिन धूल छटा दी थी, उनका भी बयान आया, उसका भी जवाब दिया आपने। तो आपको यह किसने बता दिया था कि केवल ‘वेतन पर पलने वाला’ बोल रहा है, और शेष सभी खामोश हैं। सबने कहा, बार-बार कहा, अनेक बार कहा, लेकिन मुझे आश्चर्य है कि हमारे सभी कद्दावर नेताओं के बयानों से अधिक आपको एक वेतनभोगी का ‘एक्स पोस्ट’ चुभ गया।

एक्स सीएम साहब, आपको क्या स्मरण भी नहीं है कि, आपने भी ‘वजीर ए आला’ बनते ही सलाहकार के रूप में आपके शब्दों में ही कहे तो चार-चार ‘तनख़्वाह पर पलने वाले’ इकट्ठा किए थे। वे राजनीतिक बयानबाजी में पारंगत थे। बाहर के प्रदेशों में घूम-घूम कर वे चुनावी राजनीति में भी व्यस्त रहते थे। यादाश्त कमजोर हो गयी हो तो स्मरण कराता हूं कि आपके एक सलाहकार महोदय ने मात्र 15 महीने के राजनीतिक जीवन में इतना अनुभव बटोर लिया था कि 15 वर्ष मुख्यमंत्री रहे डा. रमन सिंह जी को पत्र लिख कर उन्होंने भाषा ठीक रखने की नसीहत दे डाली थी। तब आपको बड़ा आनंद आया था कि आपके द्वारा नियुक्त वेतनभोगी आपके ‘दुश्मन’ को अपमानित कर रहे थे। है न? हालांकि तब भी इस वेतन पर पलने वाले ने अपनी पार्टी के नेता के बचाव में पत्र का जवाब पत्र से ही देकर लंबा पत्र लिखा था।

इसी तरह पत्र लेखन के बाद वे सलाहकार सीधे ‘शाहीन बाग’ पहुंच गए थे, रायपुर में भी उन्होंने ‘शाहीन बाग’ तामीर करा दिया था अपनी उपस्थिति से। लेकिन तब आपको उनकी राजनीति करना, राजनीतिक बयानबाजी, भाषणबाजी बिलकुल आपत्तिजनक नहीं लगी थी, जबकि आपकी पार्टी में सदस्य के रूप में उनकी उम्र महज कुछ महीने की ही थी। दशकों तक ‘कांग्रेस मीडिया विभाग’ में जी-जान लगा कर काम करने वाले मित्रों की उपेक्षा कर, कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हक छीनते हुए राजनीतिक बयानबाजी के लिए आपने यह नियुक्ति की थी? दुःख की बात यह भी थी कि कांग्रेस में मीडिया प्रबंधन का सुदीर्घ अनुभव रखने वाले आपके किसी कार्यकर्ता को आपने भरोसे लायक़ तब नहीं समझा था। इसी तरह आपकी ही भाषा में कहें तो एक दूसरे ‘वेतन पर पलने वाले सलाहकार’ को आपने पूरी ठसक के साथ अपने राष्ट्रीय संगठन में सचिव आदि बनवा दिया था, तीसरे ‘वेतनभोगी’ तुरत-फ़ुरत निकले ही थे अश्लील नकली सीडी आदि बना कर जैसा कि आरोप है, और आप स्वयं उसके वितरण के आरोप में अपने ‘वेतनभोगी’ रहे सलाहकार के साथ जमानत पर हैं। तो आपके वेतनभोगी लोग राजनेता हो गए, और भाजपा सरकार के ‘वेतनभोगी’ आपके चपरासी हैं कि कुछ भी लिखने-कहने से पहले आपसे अनापत्ति प्रमाण पत्र लेंगे? ऐसे कैसे होगा दाऊ? खेल का नियम एक ही रखिए न कृपया, तब खेलने में आनंद आएगा न? है कि नहीं?

जहां तक इस ‘वेतन पर पलने वाले’ का सवाल है, तो वह आज से 25 वर्ष पहले तब के एशिया के एकमात्र पत्रकारिता विश्वविद्यालय रहे संस्थान से तब की पत्रकारिता की सबसे बड़ी डिग्री लेकर राजनीतिक-सामाजिक लेखन में जुटा है। पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में ही हमने अपना जीवन गुजरा है। राजनीतिक समीक्षक के तौर पर भी आपकी वजन से अधिक केवल देश भर के अखबारों में लिख चुका है। जिस सोश्यल मीडिया पोस्ट पर आप इतने अधिक आहत हुए, अपने लोगों से पूछिएगा, वे बतायेंगे आपको कि इस ‘सिटिजन मीडिया’ पर तबसे सक्रिय रहा हूं, जब आपकी पार्टी ने किसी टेसू मीडिया या आइटी सेल का नाम भी नहीं सुना था। एक्स, ट्विटर, फ़ेसबुक, ओरकुट, माइक्रो ब्लॉग के जमाने से पहले ब्लॉग आदि और उससे पहले भी हम अपना डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बना कर उस जमाने में भी देश-विदेश के भारतवंशियों के बीच पढ़े जाते थे। न केवल पढ़े जाते थे, बल्कि गर्व है इसका कि राष्ट्रवादी विचारधारा को हम मित्रों ने मिलकर सैकड़ों युवा लेखक तैयार कराए हैं, जो आज देश भर में भगवा पताका लहरा रहे हैं।

जिस तरह आपके ‘वेतन पर पलने वालों’ ने अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग किया, वैसा करने का तो अपन सोच भी नहीं सकते, लेकिन मुझे सोश्यल मीडिया पर लिखने और संविधान के अनुछेद ‘19 (1) क’ के द्वारा प्रदत्त ‘वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को कोई भी राजनीतिक दायित्व छीन नहीं सकता, उसका सदुपयोग जम कर करते रहे हैं, उसका उपयोग जम कर करेंगे भी। मैं सलाहकार हूं इसलिए नहीं लिख रहा अपितु लिखता रहा हूं, इसलिए सलाहकार हूं। मेरे इस मौलिक अधिकार को छीन ले, ऐसे किसी दायित्व को हम चिमटे से भी छूना नहीं चाहेंगे। जब आपके शासन में, महज बिजली कटौती का पोस्ट फेसबुक पर करने के कारण राजद्रोह का मुकदमा लगा दिया जाता था, जब महज असहमति दर्ज कराने पर आप सौ-सौ मुकदमा दर्ज करा देते थे, तब लिखना नहीं छोड़ा, तो अब क्यों छोड़ेंगे कका? अटलजी के शब्दों में कहें तो – कभी थे अकेले, हुए आज इतने, नहीं तब डरे तो भला अब डरेंगे…. गगन पर लहरता है भगवा हमारा, गगन पर लहरता है भगवा हमारा। इसी तिरंगा और भगवा की शान का बखान करते-करते यही भगवा ओढ़ कर एक दिन छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा में ही अंतिम सांस ले लेंगे। क्या हुआ यहां जन्म नहीं लिया तो, मर तो सकते ही हैं यहां! जानते हैं बघेल जी? हम जैसे करोड़ों भारतीयों के लिए एक देवकी माता होती है जिसने जन्म दिया होता है, और एक यशोदा माता होती है, जो पालन करती हैं। इसी भावना से हम काम करते हैं – जहां बसहु तंह सुंदर देसू, जोई प्रतिपालहि सोई नरेशू। उसी संविधान को जिसे आपकी पार्टी ने महज ‘लाल किताब’ में बदल देने का अभियान चलाया हुआ है, के ‘अनुछेद 19 (1) ई’ जो अधिकार भारत के हर नागरिक को देता है, उसे आप मुझसे छीन थोड़े लेंगे भला?

समस्या यही है श्रीमान, कि आप छत्तीसगढ़ से वेतन लेकर लालू जैसे एक घोषित सजायाफ़्ता अपराधी के पक्ष में चुनाव सम्हालने बिहार जा सकते हैं, बिहार के ही दूसरे बाहुबली राजेश रंजन की पत्नी को, जिसने छत्तीसगढ़ शायद देखा भी नहीं हुआ होता है, उसे छत्तीसगढ़ के लोगों का, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का हक छीन कर राज्यसभा से ‘वेतन पर पलने वाला’ बना सकते हैं, तब उसे बिहार से सरकार चलाना नहीं कहा जाएगा, लेकिन कोई व्यक्ति एक ट्वीट आपके विरुद्ध कर दे, तो वह सरकार चलाना हो जाता है? आप उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जाकर कथित किसानों को 50-50 लाख देने की घोषणा कर सकते हैं, जबकि अपने प्रदेश में किसानों की आत्महत्या का नोटिस तक नहीं लेते, आप असम जा कर तब वहां से अपने बस्तर के सांसद के साथ रात्रि भोज का फोटो पोस्ट करते हुए खिलखिलाते रहते हैं, जबकि उसी रात उसी बस्तर में नक्सलियों ने दर्जनों जवानों को शहीद कर दिया होता है।

आप झारखंड के नेताओं की कोरोना के दौरान यहां शराब पार्टी करा सकते हैं। आप ब्रिटिश द्वारा स्थापित पार्टी, इटली में पैदा हुई व्यक्ति की सरपरस्ती स्वीकार करते हुए एटीएम लुटा देंगे, जैसा हमेशा आप पर विपक्ष आरोप लगाता रहा है, आप पंजाब के के. टी. एस. तुलसी को राज्यसभा भेजे देंगे, उन्हें जीत का प्रमाण पत्र तक अपने कैबिनेट मंत्री के माध्यम से उनके घर दिल्ली या पंजाब भिजवायेंगे, वे अपना प्रमाण पत्र तक लेने रायपुर आने की जहमत नहीं उठायेंगे। प्रदेश का इतना अपमान कराएंगे आप? आप उत्तर प्रदेश के किसी राजीव शुक्ला को अकारण यहां के लोगों का हक छीन कर राज्यसभा से वेतन दिलवा कर ‘पलने वाला’ बना देंगे, वे सभी वेतन पर पलने वाले नहीं हुए, लेकिन एक व्यक्ति अगर अपनी विचारधारा के लिए काम करते हुए केवल एक्स पोस्ट लिख देता है, तो वह आपको गवारा नहीं? उसे आप उसके जन्म क्षेत्र के आधार पर जज करेंगे। कोई तो कसौटी रखिए सर। इतना दोहरा आचरण लेकर आप कैसे सरवाइव कर लेते हैं? 

श्रीमान जी, अपन यह समझने की कोशिश कर रहे हैं, कि रायपुर में बैठ कर एक्स पर महज एक पोस्ट लिख देना ‘बिहार से सरकार चलाना’ कैसे हो गया भला? क्या एक्स पोस्ट से सरकार चलती है? अत्यधिक माथापच्ची के बाद अंततः मैं इस नतीजे पर पहुंच पाया कि आपने शायद अपना ही अनुभव व्यक्त किया है जब आप केवल सोश्यल मीडिया पर लिखवा कर या थोक में केंद्रीय नेताओं के नाम पत्र लिखवा कर सरकार चला रहे थे, उसे ही सरकार चलाना शायद समझ लिया था आपने। भाजपा में ऐसा नहीं होता महाशय। यहां परिश्रम की पराकाष्ठा करनी होती है। एक-एक मिनट का हिसाब तय रहता है। यह नहीं कि पत्र लिख दिया कि ‘पीएम गरीब कल्याण चावल योजना’ द्वारा चावल वितरण को तीन महीने आगे बढ़ाया जाय, जब केंद्र ने सीधे पांच वर्ष बढ़ा दिया तो अपने लोगों से कहलवाया जाय कि देखो कितनी गरीबी है कि पांच किलो चावल देना पड़ रहा है सरकार को। यह नहीं कि एथेनोल बनाने का पत्र लिखा जाय, और बात जब आगे बढ़ती दिखे तो अपने राष्ट्रीय नेता से कहला दिया जाय कि एथेनोल बनाने का निर्णय खाद्य संकट पैदा करेगा। तब के विपक्ष का सवाल आए कि शराब घोटाला क्यों हो रहा है, तो एक्स (तब ट्विटर) पर जवाब आए कि सावरकर कायर थे, माफ़ीवीर थे, कि नाथूराम मुर्दाबाद बोलना पड़ेगा।

ऐसे-ऐसे उटपटांग पत्र लिखने, सड़े हुए नैरेटिव गढ़ते रहने को ‘सरकार चलाना’ समझते रहने के कारण ही शायद आज भी आपको इस बात का भ्रम हो गया होगा कि किसी ने एक ‘एक्स पोस्ट’ लिख दिया तो वह सरकार चला रहा है। सरकार ऐसे नहीं चलती पूर्व मुख्यमंत्री जी। सरकार चलाने के लिए मनुष्यता, समरूपता, समग्र सोच, सम-विधान वाली दृष्टि विकसित करनी होती है। मुख्यमंत्री बन जाना और ऐन-केन-प्रकारेण अगले ‘ढाई वर्ष’ भी बने रह जाने से बात नहीं बनती। मुख्यमंत्री तो राबड़ी देवी जी भी बन गयी थी जिन्होंने शपथ के बाद हस्ताक्षर करना सीखा, मुख्यमंत्री तो अकेले सदस्य वाले निर्दलीय मधु कोड़ा भी बन गए थे। मुख्यमंत्री होने और उसका औचित्य निरूपण करते रहने के लिए विष्णुदेव साय जी जैसा सौम्य होना होता है, डा. रमन सिंह जी जैसा आदमकद होना होता है। सीएम पद रूपी चादर को ऐसे ओढ़ना होता है कि जब दायित्व पूर्ण हो तब बकौल कबीर साहब, उसे ‘जस की तस रख दीनी चदरिया’ व्याख्यायित किया जा सके। ये नहीं कि ‘पूर्व’ होने पर भी अहंकार इतना अधिक बढ़ जाय कि असहमति का जरा सा स्वर सुना नहीं कि एक छोटे से राजनीतिक कार्यकर्ता को उसके जन्म क्षेत्र, जाति या पेशे के आधार पर अपमानित करते रहा जाय और धृतराष्ट्र की सभा जैसा शेष सभासदों को विद्रूप हँसी हँसने को उकसाया जाय। पद पर रहते हुए भी ऐसा नहीं हुआ जाय कि भरी सभा में हजारों की भीड़ के बीच, अपनी ही प्रदेश की प्रार्थी बिटिया को कहा जाय कि –ऐ लड़की, राजनीति मत कर। गोया राजनीति करने का अकेला टेंडर खुद के नाम से ही निकाल लिया हो आपने। अन्य कोई ‘राजनीति’ करे ही नहीं।

अब बात जरा तनख़्वाह से सम्बंधित भी हो जाय। श्रीमान आपको पता तो होगा कि वेतन की व्यवस्था महान भारत गणराज्य के राष्ट्रपति तक के लिए भी होती है। विधायक के रूप में आज आप वेतन लेते हैं, तो ऐसा ही तमाम जन-प्रतिनिधियों के लिए भी है। हां, सामाजिक जीवन में तय यह करना होता है कि आपको वेतन पर पलना है या कमीशन पर? राजनीति के क्षेत्र के कुछ पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था होती है। अगर आपको अपनी ही पार्टी का इतिहास पता होता, या आपके वामपंथी सलाहकारों ने कम्युनिस्टों के यहां की ही वेतन व्यवस्था भी आपको बतायी होती, तो आप शायद ‘तनख़्वाह पर पलने’ को ऐसे हिकारत से नहीं देखते। वेतन कभी भी अपमान या उपहास की चीज नहीं हुआ करती है वैतनिक महोदय। कम्युनिस्टों में तो ऐसी व्यवस्था रही है कि वहां के मुख्यमंत्री भी अपना वेतन पार्टी कार्यालय में जमा कर फिर पार्टी से पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में नियत वेतन वापस लेते रहे हैं। मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य जी का इतिहास निकाल कर कहिएगा अपने पूर्व सलाहकारों को देने के लिए। वे बता देंगे आपको अगर सच में थोड़ी पढ़ने-समझने की रुचि हो तो।

आपके अहंकार को ठेस इसलिए पहुंच गयी क्योंकि मेरे जैसा छोटा आदमी कैसे आप जैसे ‘महान व्यक्ति’ पर सवाल उठा सकता है। तो दाऊ, इसका भी जवाब यही है कि आप जैसा करते हैं न, प्रकृति आपको वही लौटाती है। 25 वर्ष राजनीतिक-सामाजिक जीवन में गुजारने के बाद भी हमारी औकात आपके बारे में बात करने की नहीं हुई है, लेकिन आपने अपनी हैसियत यह समझ ली थी कि आप इतिहास पुरुष, परम तपस्वी, दो-दो बार आजीवन कारावास की सजा पाए हुतात्मा वीर सावरकार जी तक पर कीचड़ उछाल देंगे। ऐसे हुतात्मा पर कीचड़, जो भाजपा की कौन कहे, कभी भारतीय जनसंघ, संघ से भी संबंधित नहीं रहे। और न ही वे आपके कीचड़ को धोने आते अब। आज आपको यह भी कष्ट हो रहा है, इस कष्ट में आप मीडिया पर भी आक्रमण करने से खुद को रोक नहीं पाए कि कोई छाप कैसे सकता है मेरे जैसे ‘तनख्वाह पर पलने वाले’ के पोस्ट को। जबकि अपने तमाम उल-जुलूल पत्रों, एक्स पोस्टों को आपकी सरकार किस तरह हेडलाइन बना देने का दबाव डालती रही थी, वह प्रदेश के प्रेस जगत के मित्र भूले नहीं हैं। हालांकि आपके लोगों द्वारा फैलाए वैसे ही कीचड़ पर फिर से कमल खिला है, और ‘जनादेश दिवस’ के दिन जब यह पंक्ति लिख रहा हूं, तब ‘कमल’ खिलखिला भी रहा है।

आप विश्व के सार्वाधिक लोकप्रिय नेता, हमारे यशस्वी प्रधानमंत्रीजी के बारे में अनाप-शनाप बोल सकते हैं, वह आपका राजनीतिक अधिकार है, लेकिन मैं एक ‘वेतन पर पलने वाला’ हो गया, जो एक साधारण ट्वीट भी नहीं कर सकता? क्या आप मुसोलिनी के अवतार हैं या इटली से इतना अधिक प्रभावित हैं? स्मरण कीजिए आप कि आपकी पार्टी और आप 15 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे व्यक्तित्व के बयानों पर कैसी प्रतिक्रिया देते थे, किस तरह जानबूझ कर अपने जिला स्तर के कार्यकर्ता का बयान पूर्व सीएम के विरुद्ध छपाते थे ताकि वे अधिक से अधिक वे अपमानित महसूस करें। याद कीजिए अपने उस अपराध को, जब वर्तमान मुख्यमंत्री और सहज-सरल, सौम्य नेता, तब के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री विष्णुदेव साय जी के खिलाफ आप किस तरह के बयान देते थे? याद दिलायें आपको? आपने अपनी तुनकमिज़ाजी और पद के अहंकार में हमारे तब के प्रदेश अध्यक्ष सायजी को कहा था कि उनके दिमाग में गोबर भरा है, जिससे आपको बिजली बनाना है। एक राष्ट्रीय आदिवासी नेता जो अनेक बार सांसद, विधायक, केंद्रीय मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष रहे हों, उनके ख़िलाफ क्या बिना वेतन पर पलते हुए ही आपने ऐसा असंसदीय विषवमन किया था क्या? आप सदन तक में ‘दो-गला’ जैसा अमर्यादित शब्द उच्चारित करते थे। अगर आपको याद हो, तो आपके और कांग्रेसियों के ऐसे सौ अपशब्दों की हमने सूची जारी की थी। वे सारे बयान क्या बिना ‘तनख्वाह पर पलते हुए ही’ दिया जा रहा था क्या?

निस्संदेह राजनीतिक बयानों के लिए हमारे बड़े नेतागण हैं, वे बयान देते भी हैं। देंगे भी। जैसा इस ‘जोगी 2.0’ मामले में दिया भी है। आपके राजनीतिक कवायद के कयास को तब और बल मिला जब लम्बे समय तक आपके साथ जुड़ी रही, कांग्रेस की राष्ट्रीय टीम की सदस्य रही नेत्री ने भी आलोच्य पोस्ट को ‘कोट रि-पोस्ट’ किया। अपने कांग्रेस के अनुभवों की बिनाह पर उन्होंने भी वही अनुमान लगाया जो अपन ने पोस्ट किया था। निस्संदेह भाजपा में प्रखर और मुखर प्रवक्ताओं की एक फौज है। उस टीम पर हमें गर्व है। सभी लिखने-पढ़ने, सोचने-समझने वाले तेजस्वी युवती और युवा हैं। अनुभवी वरिष्ठ भी हैं। वे लगातार तथ्यों पर आधारित जवाब आपको देते भी रहते हैं, वे ही देंगे भी। मेरा काम पार्टी प्रतिनिधि के तौर पर राजनीतिक बयान देना बिल्कुल नहीं है। इस मर्यादा का हम हमेशा पालन करते हैं। लेकिन मुझसे मेरा ‘की-बोर्ड’ या ‘आइफोन’आप नहीं छीन सकते हैं। यह स्वतंत्रता मुझे उसी संविधान ने दिया है जिसे ‘लाल किताब’ बना कर आपके राहुल गांधी उछालते रहते हैं। 

आ.विधायक जी,आपने अवसर दिया है, तो अत्यधिक संकोच और पूरी विनम्रता के साथ अपने बारे में भी कुछ बताना चाहूंगा आपको। आप नहीं जानते मुझे यह आपकी समस्या है, मेरी नहीं। आपकी पार्टी में जो भी थोड़ा-बहुत पढ़ने-लिखने वाले हों, उनसे परिचय है अपना। न भी हो तो कोई बात नहीं। मेरी पार्टी मुझे जानती है, मेरे ‘पलने’ के लिए इतना बहुत है। अत्यधिक विनम्रता के साथ बताना आवश्यक है कि लगभग 20 वर्ष अपनी पार्टी के प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य रहा हूं। भाजपा में एक ‘पार्टी पत्रिकायें एवं प्रकाशन विभाग’ होता है, जिसके दायित्ववान के रूप में भी इतने ही समय से जुड़ा हूं। पार्टी के मुखपत्र, जिसकी प्रसार संख्या भारत के 10 सबसे अधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिकाओं में आता है, का संपादक हूं। आपके लिए भले पार्टी मुखपत्र का मतलब ‘नेशनल हेराल्ड जमीन हथियाओ’ अभियान, ‘यंग इंडिया घोटाला करो’ अखबार होता हो, जिसके आरोप में आपका शीर्ष नेतृत्व भी अभी जमानत पर है। लेकिन भाजपा के लिए उसके मुखपत्रों का संवैधानिक महत्व है। पार्टी के संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त और संरक्षित है हमारी पत्रिका।

इसी तरह पार्टी के मीडिया, सोश्यल मीडिया, पुस्तकालय, पॉलिसी रिसर्च समेत ऐसे दर्जनों घोषित-अघोषित दायित्वों से अलग-अलग समय पर दशकों से जुड़ा रहते हुए भी आप नहीं जानते हैं मुझे, तो इससे बड़ी सफलता मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकती। यह दिखाता है कि मर्यादा में रह कर पर्दे के पीछे काम कैसे किया जाता है। किस तरह स्वयं को पीछे रह कर अपनी विचारधारा के लिए काम किया जाता है। किस तरह राजनीतिक बयानबाजी से, सुर्ख़ियों में रहने के स्वाभाविक लोभ का संवरण कर काम किया जाता है। अपनी हैसियत समझते हुए माटीपुत्रों को किस तरह ‘मैं नहीं तू’ की भावना से सम्मान देकर सम्पूर्ण शालीनता के साथ अपना गिलहरी योगदान दिया जाता है।

आप अगर सच में इतना लंबा पढ़ चुके हों तो आश्चर्य ही लग रहा होगा आपको कि किसी राजनीतिक दल में ऐसा भी होता है क्या? अचंभित आप इसलिए होते होंगे क्योंकि अपनी पार्टी में आपने अक्सर गाली-गलौज, जूतमपैजार ही होते देखा है जिसके वीडियो आदि मीडिया में भी आते रहते हैं, जैसा अभी हाल में बिलासपुर में भी हुआ है। जैसा कुछ समय पहले आपकी पार्टी के दफ़्तर में ही हुआ था। अगर इसी चुनाव की बात करें तो जिस ‘मोदी गारंटी’ ने आपके झूठे कथित जन घोषणा पत्र की पोल खोल कर जनता के सामने रख दी, उस ‘भाजपा घोषणा पत्र समिति’ का यह ‘वेतन पर पलने वाला’ न केवल सदस्य-सचिव था, उसके प्रारूप समिति का अध्यक्ष था, बल्कि अपने आदरणीय नेता विजय बघेल जी के संयोजकत्व में बनी उस समिति के अनेक उप-समितियों का भी संयोजक था। आदरणीय विजय बघेल जी को तो जानते ही होंगे आप?

जिस ‘हमने बनाया हम ही सवारेंगे’ नारे का आप अब बौखलाहट में मजाक उड़ाते हैं, उस नारे को गढ़ने, और ऐसे कंटेंट बनाने वाली ‘कंटेंट क्रियेशन टीम’ के संयोजक का दायित्व भी अपना था। हमारे नेताओं ने आपके तमाम झूठों की बखिया उधेर कर रख दी थी, उस भाषण समिति का भी घोषित संयोजक अपन थे। ये तमाम घोषित दायित्व थे, बावजूद इसके अगर आप नहीं जानते हैं, तो इस से यह समझा जा सकता है कि मेरी पार्टी के कार्यकर्ता किस तरह प्रसिद्धि से परे होकर कार्य करते हैं। क्या-क्या कहें। जब यह लिख रहा हूं, तब ‘जनादेश दिवस’ मना रही है भाजपा सरकार। आपको पिछली बार मिले ऐतिहासिक समर्थन के बावजूद अपने अहंकार के कारण आपने अपना क्या हाल बना लिया, उसे बताने के लिए इस दिन से बेहतर और क्या हो सकता है भला?

चुनाव में हार-जीत लगी रहती है। भाजपा कभी जबरन ईवीएम पर ठीकरा भी नहीं फोड़ती। अगर कभी पराजित भी होती है तो स्वीकार करती है बड़े मन से। अगर जीतती है तो विनम्रता से उसे ‘दायित्व’ समझते हुए काम पर लग जाती है। इस महत्वपूर्ण दिवस पर आपसे ‘हाथ’ जोड़कर यही निवेदन करता हूं कि अगर सच में स्वयं को बड़ी हस्ती समझते हों, तो कृपया बड़प्पन लाइए स्वयं में। बड़प्पन लाने का अर्थ यह होता है कि आलोचनाओं को सहा जाय। इस ‘वेतन पर पलने वाले सलाहकार’ की आपको यही सलाह होगी कि – निंदक नियरे राखिए। किसी छोटे कार्यकर्ता की, चाहे वे विपक्षी दल का ही क्यों न हो, उसका अपमान नहीं किया जाय, उसकी खिल्ली नहीं उड़ायी जाय, किसी के पेशे, क्षेत्र, जाति, वेतन, आदि के आधार पर ‘पलने वाला’ जैसा शब्द उपयोग नहीं किया जाय।

महाशय, हर व्यक्ति अपने प्रारब्ध का पाता-खाता-पलता है। काहु न कोई सुख-दुःख कर दाता, निज कृत करम भोग सब भ्राता। कृपया अपने अहंकार से मुक्त होईए। भाजपा या हमारे नेताओं, प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री जी की चिंता में आपको दुबले होनी की जरूरत नहीं है। आप अपनी और अपने बचे-खुचे कुनबे की चिंता कीजिए। स्वयं में शालीनता और सौजन्य लाइए। दर्पण देखिए। कृपया बड़े बन जाइए। हमारे प्रदेश अध्यक्ष किरण देव जी से शालीनता सीख सकते हैं। हमारे संगठन मंत्रियों के जीवन ये यह सीखा जा सकता है कि किस तरह संगठन शिल्प को विनम्रता और सादगी के साथ गढ़ा जाता है। हमारे विचार परिवार के प्रातः स्मरणीय प्रचारकों के जीवन से संदेश लिया जा सकता है। असली गांधी को पढ़ कर उनके आचरण का रंच मात्र भी जीवन में उतारने की कोशिश होनी चाहिए। नेता होने, बड़ा या महान होने के लाइ ही नहीं बल्कि अच्छा मनुष्य होने के लिए भी यह अंगीकार करना चाहिए। इस ‘वेतन पर पलने वाले सलाहकार’ की आपको आख़िरी यही सलाह होगी कि – ज्ञान गरीबी हरि भजन, कोमल वचन अदोष, तुलसी कबहु न छोड़िए, क्षमा, शील, संतोष।

ईश्वर आपको कम से कम उतनी आलोचना सहने की शक्ति अवश्य प्रदान करें, जितनी बेजा आलोचना आप और आपका कुनबा हुतात्मा वीर सावरकर जी से लेकर नरेंद्र दामोदरदास मोदीजी तक की करता है। अपना ध्यान रखिए।

प्रमोद भार्गव को मिलेगा नरेश मेहता स्मृति वांग्मय सम्मान

1-1-e1733309233980.jpeg

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,भोपाल द्वारा दिये जाने वाले सम्मान घोषित

मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति हिंदी भवन भोपाल द्वारा दिए जाने वाले वार्षिक सम्मानों की घोषणा समिति के संचालक श्री कैलाशचंद पंत ने एक विज्ञप्ति जारी करके कर दी है।इस बार का समिति का सबसे प्रमुख अखिल भारतीय सम्मान शिवपुरी के साहित्यकार एवं पत्रकार प्रमोद भार्गव को उनकी पुस्तक “पुरातन विज्ञान” पर दिया जाएगा।सम्मान के अंतर्गत 51 हजार की राशि,प्रशस्ति पत्र, शॉल,श्रीफल भेंट किए जाएंगे।

प्रमोद भार्गव को यह विशिष्ट सम्मान उनकी पुस्तक “पुरातन विज्ञान” को दिया गया है।इस पुस्तक में पुरातन विज्ञान और भारतिय ज्ञान परंपरा से जुड़े ऐसे विज्ञान सम्मत लेख हैं,जो पुरातन ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हैं। इन लेखों में दिए तथ्यों की पुष्टि दुनिया भर में हो रहे उन अनुसंधानों से की है, जो विश्व के वैज्ञानिक कर रहे हैं।जिन्हें वैश्विक मान्यता भी मिली है।भार्गव के ये लेख हिंदी की सभी प्रमुख विज्ञान पत्रिकाओं के साथ ‘पत्रिका’ और ‘राजस्थान पत्रिका’ के सभी संस्करणों में एक स्तंभ में प्रकाशित भी हुए हैं ।भार्गव का इसी विषय पर लिखा उपन्यास “दशावतार” भी खूब चर्चित हुआ है।इस उपन्यास के अनेक संस्करण तो निकले ही हैं,अंग्रेजी में भी इसका अनुवाद छप चुका है। भार्गव की उपन्यास ,कहानी संग्रह समेत विविध विषयों की दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यह सम्मान 25 दिसंबर 2024 को हिंदी भवन ,भोपाल में एक भव्य समारोह में प्रदान किया जयेगा।

इसी तरह वीरेंद्र कुमार तिवारी सम्मान बैतूल के शिशिर कुमार चौधरी,शैलेश मटियानी कथा सम्मान भोपाल की श्रीमती शीला मिश्रा, सुरेशचंद्र शुक्ल नाट्य सम्मान मुम्बई के जयंत शंकर देशमुख, डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय आलोचना सम्मान कोच्चि की डॉ के वनजा ,शंकरलाल बत्ता पौराणिक सम्मान भोपाल के मोहन तिवारी आनंद ,संतोष श्रीवास्तव कथा सम्मान हल्द्वानी को दिया जाएगा।इन सम्मानों के अंतर्गत 21 हजार की राशि,प्रशस्ति पत्र, शॉल, श्रीफल प्रदान किए जाएंगे।श्री मती संतोष बत्ता स्मृति सम्मान भोपाल की श्रीमती इंदिरा दांगी को दिया गाएगा।इसमें 11 हजार की राशि के साथ प्रशस्ति पत्र, शॉल,श्रीफल दिए जाएंगे।

शिक्षाविद् ठाकुर लालसिंह का संदिग्ध दुर्घटना में निधन, भोपाल विलीनीकरण आँदोलन का अंतिम उद्घोष इन्हीं ने किया था

0521_shahid_smarak.jpg

सल्तनत और अंग्रेजीकाल के घोर अंधकार के बीच भी यदि भारतीय संस्कृति और परंपराएँ आज पुनर्प्रतिठित हो रहीं हैं तो इसके पीछे कुछ ऐसी विभूतियाँ के जीवन का समर्पण हैं, जो अपने लिये नहीं अपितु संपूर्ण समाज के लिये जिये, उनके जीवन का प्रत्येक पल राष्ट्र,संस्कृति और परंपराओं की पुनर्स्थापना के समर्पण में रहा । ऐसे ही जीवनदानी थे ठाकुर लालसिंह । स्वतंत्रता से पहले भोपाल रियासत काल में वे नागरिक अधिकार एवं समानता के संघर्ष में जेल गये और स्वतंत्रता के बाद भोपाल रियासत के भारतीय गणतंत्र व्यवस्था के अंतर्गत मध्यभारत में विलीनीकरण केलिये भी जेल यात्रा की।
ऐसे जीवन बलिदानी ठाकुर लालसिंह का परिवार मूलतः राजस्थान में भरतपुर क्षेत्र अंतर्गत सिनसिनी गांव का रहने वाला था । इस क्षेत्र के मूल निवासी जाट क्षत्रिय सिनसिनवार गोत्र के कहे जाते है । भरतपुर के इतिहास प्रसिद्ध शासक सूरजमल जाट इसी “सिनसिनवार” गोत्र से थे । अठारहवीं शताब्दी भरतपुर क्षेत्र केलिये बहुत उथल पुथल से भरी हुई थी। पहले औरंगजेब के हमले, और फिर अंग्रेजों के। लगातार हमलों के बीच सिनसिनी से एक शाखा मालवा आई । आगे चलकर इनमें से एक परिवार भोपाल रियासत में आया। यह परिवार पहले इछावर और फिर बैरसिया आया । इसी परिवार में ठाकुर लालसिंह का जन्म हुआ । जन्मवर्ष 1889 माना जाता है । पिता हीरा सिंह आर्य समाज से जुड़े थे । आर्यसमाज के ये संस्कार ठाकुर लालसिंह जी में जीवन भर रहे । पढ़ने केलिये इंदौर भेजा गया । इंदौर के क्रिश्चियन कालेज से उन्होंने बीए किया और 1913 में भोपाल के अलेक्जेंडर कॉलेज में शिक्षक हो गये ।

शिक्षक के रूप में जब ठाकुर लालसिंह भोपाल लौटे तब भोपाल रियासत में नबाब बेगम सुल्तान जहाँ का शासन था । नबाब बेगम यद्यपि सुधारवादी और प्रगतिशील थीं लेकिन अपने धर्म के प्रति बहुत कट्टर। इसके चलते पूरी रियासत के सामाजिक वातावरण में असहजता बढ़ रही थी । पंजाब उत्तर प्रदेश आदि स्थानों से मुस्लिम परिवारों का भोपाल आने का क्रम तेज हो गया था । इन मुस्लिम परिवारों को नबाब प्रशासन द्वारा राजकीय पद अथवा जमीन जायदाद देकर बसाया जा रहा था। इसके साथ बाहर से आये इन तत्वों द्वारा असामाजिक गतिविधियाँ भी की जा रहीं थीं। जिससे हिन्दु समाज में भय और असुरक्षा का भाव बढ़ने लगा । हिन्दु समाज में एक तो कुछ आंतरिक विषमताएं, दूसरे इन घटनाओं का तनाव बढ़ने लगा था। इस सामाजिक वातावरण से ठाकुर लालसिंह बहुत व्यथित हुये । इन्ही दिनों नबाब बेगम ने एक ईशनिंदा कानून बनाया जिसके अंतर्गत इस्लाम की आलोचना करने पर गैर जमानती गिरफ्तारी का प्रावधान था । इस कानून की विशेषता थी इसमें आरोप लगाने वाले को अपना आरोप साबित नहीं करना होता था बल्कि आरोपी को अपने आपको निर्दोष होना प्रमाणित करना होता था । इन सभी परिस्थियों में ठाकुर लालसिंह को लगा कि वाह्य समस्याओं का सामना करने से पहले समाज को अपनी आंतरिक विसंगितियों से मुक्त होना होगा । उन्होंने पहले इसी दिशा में अपना काम आरंभ किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते वे आर्यसमाज के संपर्क में थे । उन्होंने अपने समाज के सुधार और समाज सशक्तीकरण उद्देश्य की पूर्ति के लिये आर्यसमाज का ही मार्ग अपनाया । वे विभिन्न सेवा बस्तियों में गये सबको एकजुटता और भय रहित जीवन तथा शिक्षा से जुड़ने का संदेश दिया । यही संदेश उन्होंने अपने विद्यालय के छात्रों को भी दिया और सामाजिक एकजुटता के लिये सक्रिय किया । उन्ही दिनों गांधीजी ने अंग्रेजों से मुक्ति केलिये असहयोग आँदोलन का आव्हान किया । भोपाल में अंग्रेजों का सीधा शासन नहीं था । इसलिये भोपाल रियासत के बुद्धिजीवियों ने जन जाग्रति केलिये केवल प्रभात फेरी निकालने का निर्णय लिया । भोपाल नगर में बच्चों की जो प्रभात फेरी निकाली गई, उसमें प्रत्यक्ष रूप से किशोरवय उद्धवदास मेहता थे लेकिन परदे के पीछे ठाकुर लालसिंह की भूमिका महत्वपूर्ण थी । चूँकि अधिकांश बच्चे अलेक्जेंडर कॉलेज के ही थे । 1922 में आर्य समाज ने लड़कियों की शिक्षा केलिये जो विद्यालय आरंभ किया उसमें भी ठाकुर लालसिंह की भूमिका महत्वपूर्ण थी ।

1932 में उन्होंने शिक्षक पद से त्यागपत्र दिया और खुलकर समाज सेवा में आ आये । वे हिन्दू समाज की कुरीतियों के निवारण केलिये भोपाल में गठित हिन्दू सेवा संघ और सीहोर में गठित यंग मैन एसोसिएशन के संस्थापक सदस्यों में से एक थे । हिन्दूसेवा संघ ने हिन्दू समाज की समस्याओं के निराकरण केलिये एक ज्ञापन नबाब प्रशासन को सौंपा तथा विभिन्न स्थानों पर जाग्रति के लिये सम्मेलन किये । इसी अभियान के अंतर्गत उनकी पहली गिरफ्तारी 1932 में हुई ।

समाज जागरण केलिये भोपाल के शाहजहाँनाबाद में हुये सम्मेलन में सुप्रसिद्ध समाज सुधारक ठक्कर बाबा भी आये थे ।

भोपाल रियासत में हिन्दू महासभा की इकाई गठित करने में भी ठाकुर लालसिंह की भूमिका महत्वपूर्ण थी । उन्होंने लाहौर और नासिक,पुणे सम्मेलनों में भाग लिया और वे हिन्दु महासभा की भोपाल इकाई के पहले अध्यक्ष बने । 1934 में भाई उद्धवदास मेहता के साथ मिलकर एक समाचार पत्र “प्रजा पुकार” का प्रकाशन आरंभ किया । डा लालसिंह इसके संपादक बने। बाद में उनके मार्ग दर्शन में 2-3और हिंदी समाचारपत्र निकले गए जिनमे प्रजा मित्र और किसान प्रमुख है ।1937 में जन आंदोलन के चलते वे दूसरी बार गिरफ्तार हुये । इस बार उन्हें छै माह की सजा हुई । जेल से लौटकर पुनः अपने अभियान में लगे । इसी वर्ष आर्यसमाज ने हैदराबाद आँदोलन आरंभ किया । इसमें भाग लेने केलिये हिन्दु महा सभा ने भोपाल से जत्थे भेजे । निजाम हैदराबाद के संकेत पर भोपाल नबाब ने जत्थों की रवानगी पर प्रतिबंध लगा दिया । ठाकुर लालसिंह को जत्थे रवानगी की तैयारी में गिरफ्तार किया उन्हें पन्द्रह दिन जेल में रखा गया ।

अक्टूबर 1938 में प्रजा मंडल की भोपाल इकाई गठित हुई। ठाकुर लालसिंह इसके पहले अध्यक्ष बने । प्रजा मंडल वस्तुतःपंडित मदन मोहन द्वारा स्थापित राजनैतिक इकाई थी । भारत के जिन क्षेत्रों में अंग्रेजों का सीधा शासन था वहाँ काँग्रेस थी । लेकिन जहाँ अंग्रेजों के आधीन रियासतों का शासन था वहाँ प्रजा मंडल काम करता था । ठाकुर लालसिंह को लगा था अंग्रेजों और अंग्रेज नियंत्रित नबाब के अत्याचारों से मुक्ति के लिये हिन्दुओं और मुसलमानों को मिलकर साथ आना चाहिए। इसलिए वे प्रजा मंडल के संस्थापक बने । पर यह ठाकुर लालसिंह के व्यक्तित्व और उनके द्वारा किये गये समाज जागरण के कार्यों का प्रभाव था कि हिन्दु महासभा ने उन्हें यह सुविधा दी थी कि ठाकुर लालसिंह प्रजा मंडल के साथ हिन्दु महासभा के सदस्य भी रह सकते हैं। 1942 में आरंभ हुआ भारत छोड़ो आँदोलन केलिये ठाकुर लालसिंह ने पूरी रियासत की यात्रा की ।

1947 में भारत स्वतंत्र हुआ लेकिन भोपाल में स्वतंत्रता न आ सकी । भोपाल में स्वतंत्रता आँदोलन आरंभ करने के लिये 1947 में सीहोर में एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। इस बैठक की अध्यक्षता ठाकुर लालसिंह जी ने की ।

इसी बीच भोपाल नबाब ने एक चाल चली । उत्तरदायी शासन के लिये प्रजा मंडल से चर्चा की और एक अंतरिम मंत्रीमंडल बनाकर प्रशासन चलाने का सुझाव रखा नबाब ने आश्वस्त किया कि सभी नागरिकों को समान अधिकार होंगे। ठाकुर लालसिंह इससे सहमत हो गये और एक सर्वदलीय मंत्रीमंडल बन गया । लेकिन भारत विभाजन के समय आसपास से मुस्लिम परिवार भोपाल रियासत आने लगे । ठाकुर लालसिंह को यह स्थिति असहज लगी फिर भोपाल नबाब यात्रा पर चले गये इसलिए कोई समाधान न निकल सका । नवम्बर 1947 में इस संबंधी समाचार टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा । इसके अनुसार लगभग दस लाख मुस्लिम शरणार्थी भोपाल में आ गये थे । उन्हें वापस भेजने के लिये वीपी मेनन और सरदार वल्लभभाई पटेल की भोपाल नबाब से भी चर्चा हुई । इन्हीं तनावो के बीच दिल्ली में गाँधी जी की हत्या हुई। भोपाल नबाब को अवसर मिला । हिन्दु महासभा सहित वे तमाम नेता गिरफ्तार कर लिये गये जो नबाब विरोधी थे । इससे भोपाल रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलीन करने का अभियान ठंडा पड़ा। लेकिन नबाब की कूटनीति को ठाकुर लालसिंह ने समझा और प्रजा मंडल के सदस्यों से मंत्रीमंडल छोड़ने को कहा । उन दिनों मौलाना तरजी मशरीकी प्रजा मंडल के अध्यक्ष थे । वे सहमत नहीं हुये । जून 1948 आते आते प्रजा मंडल में विभाजन जैसी स्थिति बनी । अंत में ठाकुर लालसिंह ने हिन्दु महा सभा तथा अन्य सामाजिक संगठनों के सदस्यों से चर्चा की और अक्टूबर 1948 में इछावर से विलीनीकरण आँदोलन का उद्घोष कर दिया । पुलिस ने लाठीचार्ज किया, सभा को तितर वितर किया । ठाकुर लालसिंह द्वारा विलीनीकरण आँदोलन की घोषणा कर देने से प्रजा मंडल में नबाब समर्थक कुछ सदस्य नाराज हुये और अध्यक्ष तरजी मशरीकी ने ठाकुर लालसिंह जी के इस कार्य को अनुशासनहीनता माना और उन्हें प्रजा मंडल से निलंबित कर दिया । पर ठाकुर लालसिंह ने इसकी परवाह नहीं की और पूरी रियासत की यात्रा की । उनके अभियान का हिन्दु महासभा और अनेक सामाजिक संगठनों ने सहयोग किया । अक्टूबर 1948 को ठाकुर लालसिंह द्वारा इछावर में किया गया विलीनीकरण आँदोलन का यह उद्घोष पूरी रियासत में फैला । दिसंबर 1948 तक आँदोलन पूरे राज्य में फैल गया था । कोई गांव, कोई कस्बा ऐसा नहीं जहाँ नौजवान विलीनीकरण केलिये उठकर खड़े न हुये हों। ठाकुर लालसिंह अलेक्जेंडर कॉलेज में शिक्षक रहे थे । यह भोपाल रियासत का एक मात्र कॉलेज था । रियासत के अधिकांश शिक्षित लोग इसी कॉलेज के थे। इसलिये जब ठाकुर लालसिंह ने विलीनीकरण आँदोलन का आव्हान किया तो युवा शक्ति उठ खड़ी हुई । इनमें सबसे प्रमुख भाई रतन कुमार भी थे जो उनके छात्र रहे थे जिनके समाचारपत्र “नई राह” ने चिन्गारी को ज्वाला में बदला । सीहोर बरेली उदयपुरा आदि अनेक स्थानों में गोलियाँ भी चलीं बलिदान हुये । अंत में 1 जून 1949 को भोपाल रियासत भारतीय गणतंत्र का अंग बनी ।

भोपाल रियासत एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आ गई । समझौते के अंतर्गत पुलिस सहित नबाब का पूरा प्रशासनिक अमला यथावत रहा । अक्टूबर 1951 में चुनाव प्रक्रिया आरंभ हुई । ठाकुर लालसिंह भावी नेतृत्व के लिये एक स्वाभाविक चेहरा थे । लेकिन भोपाल नबाब और नबाब समर्थक लाॅवी उन्हें कतई पसंद नहीं करती थी । वे 4 दिसंबर 1951 को चुनाव केलिये जीप से अपना नामांकन भरने सीहोर के लिये रवाना हुये । वे जैसे ही रायल मार्केट पार करके आगे बढ़े कि अगले चौराहे पर जीप दुर्घटना ग्रस्त हो गई और इस दुर्घटना ठाकुर लालसिंह न बच सके । उन दिनों भोपाल में ट्रैफिक भी न था, उस रास्ते भीड़ भी न रहती थी । जीप की स्पीड भी न थी फिर भी ऐसी दुर्घटना ? यह रहस्य आज भी बना हुआ है कि वह दुर्घटना कैसे इतनी भीषण हुई कि ठाकुर लालसिंह न बच सके ।

इतिहास के पन्नों में ठाकुर लालसिंह को उतना स्थान नहीं मिला जैसी उन्होंने समाज की सेवा की । उनका पूरा जीवन सामाजिक, सांस्कृतिक, सनातन परंपराओं और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिये समर्पित था । भोपाल में पहली कन्या शाला और पहला अनाथालय आरंभ करने वाले ठाकुर लालसिंह ही थे। छुआछूत के विरुद्ध सामाजिक जाग्रति और मतान्तरण करने वालों की घर वापसी और मंदिर में प्रवेश कराने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी । दंगों में अपहृत कुछ बालिकाओं को मुक्त करा कर उनका कन्यादान उन्होंने स्वयम् किया था । बैरसिया में उनके द्वारा बनवायी गयी एक कन्या शाला,और एक बालक विद्यालय, भोपाल में उनकी स्मृति में एक पार्क, एक हास्पिटल और एक विद्यालय आज भी है। यह जन मन में ठाकुर लालसिंह का सम्मान और लोकप्रियता थी कि जब उनके असामयिक निधन का समाचार आया तब न केवल पूरे भोपाल रियासत के क्षेत्र अपितु विदिशा से धार तक स्वप्रेरणा से बाजार बंद हो गये थे । कहीं कहीं तो शोक में तीन दिन तक दुकानें नहीं खुलीं थीं।

राहुल देव और नरेश सक्सेना का वैचारिक दिवालियापन

images-1-1.jpeg

शिवेश प्रताप

हाल ही में आजतक के साहित्यिक मंच पर पत्रकार राहुल देव और कवि नरेश सक्सेना ने एक गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “आरएसएस सौ साल से बौद्धिक कर रहा है, किंतु आज तक ऐसा कोई बुद्धिजीवी नहीं पैदा कर पाया, जिसका नाम संघ के बाहर कोई जानता हो।” यह सवाल जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही विचारणीय भी। ऐसा कह इस कवि-पत्रकार द्वय ने अपने वैचारिक दिवालियेपन से समाज का परिचय कराया और यह बताया की ये बेचारे संघ की रीति और नीति से कितने अनभिज्ञ हैं। इन्हें यह समझना चाहिए की वामपंथ की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ख़ालिस बुद्धिजीवी पैदा करने की फैक्ट्री नहीं है। संघ का उद्देश्य वास्तविक चरित्र-व्यक्ति निर्माण है, न कि बुद्धिजीविता से कुण्ठित भीड़ का सृजन।

संघ न तो व्यक्ति को केवल बुद्धि आधारित जीवन जीने की शिक्षा देता है और न ही ऐसी किसी प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। अपनी प्रार्थना में संघ का स्वयंसेवक “सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्” कहकर ऐसा शुद्ध शील-चारित्र्य मांगता है जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये। संघ का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ावा देना नहीं है, संघ विचार को बढ़ावा देता है। “विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्” कहकर हम विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति के द्वारा “परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं” यानि राष्ट्र के वैभव को उच्चतम शिखर पर पहुँचाने का सामर्थ्य मांगते हैं। संघ का हर कार्य आत्मभाव, समर्पण और त्याग पर आधारित है। संघ व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण का मंच है। इसका लक्ष्य हर स्वयंसेवक को भारत माता की सेवा के लिए तैयार करना है। संघ के लिए बुद्धिजीविता साध्य नहीं है, बल्कि यह समाज और राष्ट्रहित में कार्य करने वाले व्यक्तियों को तैयार करने का माध्यम है।

आज के समाज में बुद्धिजीविता को एक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि बुद्धिजीविता केवल क्षणिक परिवर्तन ला सकती है। इसके विपरीत, व्यक्ति निर्माण का प्रभाव दीर्घकालिक और समाज के हर क्षेत्र में सकारात्मक होता है। संघ बुद्धिजीविता की अल्पकालिक चमक के बजाय व्यक्ति निर्माण के दीर्घकालिक प्रभाव में विश्वास रखता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इसी व्यक्ति निर्माण की दिशा में पिछले सौ वर्षों से कार्य कर रहा है।

पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री जी कहा करते थे की बुद्धिजीवी का अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो अपनी बुद्धि के आधार पर जीविका चलाता हो। जब बुद्धि के आधार पर जीविका चलाने को महिमामंडित किया गया, तब समाज में कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुईं। बीते दशकों में यह सत्य भी होता दिखाई दिया है, डॉक्टरों ने मरीजों को केवल पैसा कमाने का साधन मान लिया, शिक्षकों ने कक्षाओं से गायब होकर “अर्बन नक्सल” बनने का रास्ता चुना और छात्रों ने “टुकड़े-टुकड़े गैंग” बनाकर समाज में विघटनकारी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। वामपंथी बुद्धिजीविता ने समाज को हिंसा, विभाजन और अशांति के अलावा कुछ नहीं दिया। यह बुद्धिजीविता पूंजीवादी नेक्सस का हिस्सा बनकर समाज को खोखला करती है। वामपंथ ने श्रमिकों को “बुद्धिजीवी” बनने का सपना दिखाया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कलकत्ता से कानपुर तक औद्योगिक संयंत्र बंद हो गए। श्रमजीवी लोगों को दाने-दाने का मोहताज कर दिया। इस विचारधारा ने परिवार और सामाजिक मूल्यों को कमजोर किया और देशभक्ति व सांस्कृतिक चेतना पर भी आघात किया।

राहुल देव और नरेश सक्सेना को याद दिलाना चाहता हूं कि आज वह जिस बुद्धिजीविता का महिमा मंडन कर रहे हैं इस वामपंथी बुद्धिजीविता के राजनैतिक गढ़ त्रिपुरा को कुछ वर्ष पहले संघ के चार समर्पित स्वयंसेवकों श्री श्यामलकांति सेनगुप्ता, श्री दीनेंद्र डे, श्री सुधामय दत्त तथा श्री शुभंकर चक्रवर्ती ने अपने प्राणोत्सर्ग से उखाड़ फेंका। इन चारों को अपहरण 6 अगस्त 1999 को त्रिपुरा के कंचनपुर के वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास से हुआ था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई थी। आपकी सोने की बनी बुद्धिजीवी लंका को व्यक्तिनिर्माण की पूंछ ही जलाकर भस्म करती है। त्रिपुरा ने व्यक्ति निर्माण से आपकी बुद्धिजीविता को उत्तर दिया, आगे और भी नाम जुड़ेंगे।

वामपंथी और पूंजीवादी नेक्सस आज इतना मजबूत हो चुका है कि पूरी दुनिया इसके प्रभाव में है। राष्ट्र की संकल्पना में बुरु तरह विफल वामपंथी बुद्धिजीविता ने अब अपना रूप बदल समाज में भ्रम फैलाकर परिजीवी के रूप में पूंजीवाद को प्रश्रय दे रहा है। अमेरिका से भारत तक बुद्धिजीविता ने पूंजीवाद की दासी बनकर राजनीति और समाज में अपनी जगह बनाई। भारत से लेकर अमेरिका तक राष्ट्रभाव का उत्थान इन परिजीवियों के लिए संकट के रूप में खड़ा हुआ है इसलिए ये इतने बेचैन हैं।

राहुल देव और नरेश सक्सेना का यह सवाल कि “संघ ने कोई बुद्धिजीवी क्यों नहीं पैदा किया?” उचित है और इस तरह से वामपंथी गिरोह के हरावल दस्ते के दो बेरोजगार सेनापति आज जब अपने पुराने बुद्धिजीवी अखाड़े में संघ को ललकार रहे हैं तो यह नास्टैल्जिया उनकी बेचारगी को प्रगट कर रहा है। राहुल देव और नरेश सक्सेना जी काश आप इस विषय पर भी विचार करते की जिस देश को तोड़ने के लिए आने वैचारिक पूर्वज लगे रहे और पाकिस्तान बनवाया तो उस पाकिस्तान में आपका बुद्धिजीवी अवशेष क्यों नहीं मिलता?

पुनः एक बार कहना चाहूँगा संघ बुद्धिजीवी पैदा करने का मंच नहीं है। यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक यज्ञ है जिसमें सौ वर्षों से अनगिनत प्रचारकों, स्वयंसेवकों नें “मैं नहीं, तू ही” कह-कह कर स्व जीवन की आहुति दे दिया है। संघ का उद्देश्य व्यक्ति को राष्ट्रहित में कार्य करने के लिए तैयार करना है। संघ के चरित्रबल और कार्यों ने यह सिद्ध किया है कि समाज का उत्थान बुद्धिजीविता से नहीं, बल्कि नैतिकता और त्याग से होता है। वामपंथी बुद्धिजीविता जहां समाज में विभाजन और अशांति का कारण बनी है, वहीं संघ ने अपने सौ वर्षों के साधना से शांति, समरसता और राष्ट्रभक्ति का दीप जलाया है।

scroll to top