विश्व संवाद केन्द्र में बाबा साहेब को अर्पित की गयीं पुष्पांजलि

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लखनऊ। भारत रत्न डा. भीमराव आम्बेडकर की जयंती के अवसर पर सोमवार को जियामऊ स्थित विश्व संवाद केन्द्र में बाबा साहेब के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर कृतज्ञतापूर्वक उन्हें नमन किया गया। सामाजिक समरसता गतिविधि की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र सम्पर्क प्रमुख मनोज ने कहा कि भारत रत्न बाबा साहेब डा. भीमराव आम्बेडकर विलक्षण क्षमता और प्रतिभा के धनी थे। उन्हें अधिकांश लोग केवल संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं। बाबा साहेब ने वंचित समाज को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। अनेक प्रलोभनों के बावजूद उन्होंने ईसाई व इस्लाम नहीं अपनाया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्त प्रचारक प्रमुख यशोदानंदन ने कहा कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी से बाबा साहब का बहुत ही घनिष्ठ संबंध था। बाबा साहेब के चुनाव में दत्तोपंत ने काम किया था। संघ के प्रति बाबा साहब निष्ठा रखते थे।

सामाजिक समरसता गतिविधि की प्रान्तीय टोली के सदस्य व मीडिया प्रमुख बृजनन्दन राजू ने कहा कि बाबा साहेब का जीवन सबके लिए अनुकरणीय है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक समरसता गतिविधि के माध्यम से देशभर में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए कार्य कर रहा है।

इस अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र के कार्यालय प्रमुख सनी सिंह,सह नगर संघचालक विजय विश्वकर्मा, सह नगर कार्यवाह शशिकांत,नगर बौद्धिक प्रमुख अवधेश पाण्डेय एडवोकेट,नगर सम्पर्क प्रमुख डा. मदन मोहन मिश्रा, सायं कार्यवाह अर्जुन,शाखा कार्यवाह डा.उमेश कुमार राय, आशीष कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट,सुधांश एडवोकेट व विकास पाठक एडवोकेट प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

30 Youth Volunteers Complete 15-Day Campaign to Raise Awareness against Perverted Content

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New Delhi – The Save Culture Save Bharat Foundation has successfully concluded the first batch of its 15-day volunteer campaign, aimed at spreading awareness about the harmful effects of perverted content on individuals and society. The campaign culminated with the distribution of certificates to 30 young and dedicated volunteers who gave their time, energy, and voice to this important cause.

Over the span of two weeks, the volunteers worked both online and offline conducting awareness drives, engaging in thought-provoking discussions, and using digital platforms to highlight how perverted content is silently corroding the moral and cultural fabric of our society, especially among the youth.

This first batch wasn’t just a group of volunteers; it was a community of changemakers united by a shared concern for the future of our culture. Their commitment and sincerity turned this campaign into a movement, sparking meaningful conversations and inspiring others to reflect on the kind of content we consume and normalize.

As we honour their efforts with certificates, we also celebrate their courage to speak up, educate others, and stand for a cause that many shy away from. The Save Culture Save Bharat Foundation extends its heartfelt thanks to every volunteer and wishes them the very best in all their future endeavours. Their contribution is a powerful reminder that real change begins with awareness and a few determined individuals can make a big difference.

This is just the beginning. More batches will follow, and with them, a growing community of young minds committed to protecting the values that define us as a nation.

30 युवा स्वयंसेवकों ने पूरा किया 15 दिवसीय जागरूकता अभियान, विकृत कंटेंट के खिलाफ उठाई आवाज

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नई दिल्ली – सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन ने अपने पहले 15-दिवसीय वालंटियर अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इस अभियान का उद्देश्य लोगों को विकृत कंटेंट के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना था। अभियान के समापन में 30 युवा और समर्पित स्वयंसेवकों को उनके योगदान के लिए प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

पिछले दो हफ्तों के दौरान, इन स्वयंसेवकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से जागरूकता फैलाने का काम किया। उन्होंने जागरूकता रैलियां निकालीं, विचारोत्तेजक चर्चाएं कीं, और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से यह बताया कि कैसे विकृत कंटेंट धीरे-धीरे हमारे समाज और विशेष रूप से युवाओं की सोच को प्रभावित कर रहा है।

यह सिर्फ एक वालंटियर बैच नहीं था, बल्कि एक ऐसा समूह था जो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए एकजुट हुआ। उनकी लगन और ईमानदारी ने इस अभियान को एक आंदोलन का रूप दे दिया, जिससे समाज में जरूरी बातचीत शुरू हुई और लोगों को सोचने पर मजबूर किया कि हम क्या देख रहे हैं और क्या सामान्य मान रहे हैं। फाउंडेशन के अनुसार, यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत है, जिसमें युवा जागरूकता के जरिए समाज में बदलाव लाने के लिए जुटे हैं। स्वयंसेवकों ने न केवल अपने विचार रखे, बल्कि दूसरों को भी इस विषय पर सोचने और सजग होने के लिए प्रेरित किया।

फाउंडेशन ने सभी प्रतिभागियों के समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि यह पहला बैच देशभर में जागरूकता की एक नई लहर की शुरुआत है।सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन हर स्वयंसेवक को दिल से धन्यवाद देता है और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। उनका योगदान यह साबित करता है कि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है और कुछ संकल्पित लोग भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

आने वाले समय में और भी युवाओं को इस अभियान से जोड़ा जाएगा, ताकि सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा और स्वस्थ सामाजिक वातावरण को बढ़ावा दिया जा सके।

डा. भीमराव अंबेडकर का आत्मनिर्भर भारत हेतु चिंतन एवं नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उसका समावेश

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समीर कौशिक

डा. भीमराव अंबेडकर का संपूर्ण चिंतन समाज के हर वर्ग को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में था। वे शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय को भारत के विकास का मूल स्तंभ मानते थे। उनका मानना था कि जब तक समाज का हर वर्ग शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक भारत की असली स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

डा. अंबेडकर एक महान समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री एवं दूरदर्शी विचारक थे। उन्होंने भारतीय समाज की विषमताओं को दूर करने एवं आत्मनिर्भर भारत की नींव रखने हेतु अनेक विचार प्रस्तुत किए। डॉ. अंबेडकर का मानना था कि सशक्त राष्ट्र के लिए शिक्षा, समानता, सामाजिक न्याय और आर्थिक स्वतंत्रता आवश्यक हैं। आज जब भारत “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में अग्रसर है और “नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020” लागू हो रही है, तब डॉ. अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

डा. अंबेडकर द्वारा आत्मनिर्भर भारत हेतु चिंतन शिक्षा के महत्व को समझाते हुए कहा था डा. “शिक्षा वह शस्त्र है जिससे व्यक्ति अपने जीवन को बदल सकता है।” वे शिक्षा को व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का माध्यम मानते थे। उन्होंने समान अवसरों की शिक्षा की वकालत की, जहाँ जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो। कौशल विकास और व्यावसायिक शिक्षा आत्मनिर्भरता के लिए स्किल-बेस्ड शिक्षा पर बल। युवाओं को नौकरी नहीं, रोजगार देने वाला बनाने की दिशा में कदम।

डा. अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा साधन माना। उनका प्रसिद्ध उद्धरण “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” यही दर्शाता है कि व्यक्ति को सबसे पहले आत्मनिर्भर बनने के लिए शिक्षित होना चाहिए।

उनका मानना था कि “प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण सर्वांगीण राष्ट्रीय प्रगति का आधार है। इसलिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के लिए एक कानून होना चाहिए।”

आर्थिक स्वतंत्रता के विषय मे उनका विचार था कि बिना आर्थिक स्वाधीनता के सामाजिक समानता संभव नहीं है। वे समावेशी विकास, भूमि सुधार और श्रम अधिकारों के पक्षधर थे।

सबको समान अवसर देने के पक्षधर डॉ. अंबेडकर प्रत्येक नागरिक को बराबरी का अवसर देने के पक्षधर थे, जिससे व्यक्ति अपनी योग्यता और प्रयासों के बल पर आत्मनिर्भर बन सके।

तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा पर बल देते हुए डा. अंबेडकर ने व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को आत्मनिर्भरता की कुंजी माना, जिससे युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकें।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) और अंबेडकरवादी दृष्टिकोण
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में कई ऐसे प्रावधान हैं जो डा. अंबेडकर के विचारों से मेल खाते हैं जैसे समावेशी शिक्षा प्रणाली की सुविधा द्वारा NEP का उद्देश्य सभी वर्गों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। विशेष रूप से वंचित वर्गों, जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए स्कॉलरशिप, डिजिटल सामग्री और बहुभाषिक शिक्षा की सुविधा दी जा रही है।

भाषायी विविधता और मातृभाषा में शिक्षा डा. अंबेडकर ने भारतीय भाषाओं के महत्व को समझा था। उसी के अनुरूप NEP मातृभाषा में शिक्षा देने की वकालत करती है, जिससे शिक्षा अधिक प्रभावी और सबके लिए सुलभ हो सके। बहुभाषी शिक्षा और मातृभाषा पर जोर प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने का प्रावधान डा. अंबेडकर के शिक्षा सुलभता के विचारों के साथ मेल खाता है।

शिक्षा का व्यावसायीकरण नहीं, व्यावसायिकता की बात करके डा. अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक दायित्व माना था, न कि केवल रोजगार पाने का साधन। NEP में भी कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा और स्टार्टअप कल्चर को बढ़ावा देकर युवाओं को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रोत्साहित किया गया है।

व्यावसायिक शिक्षा का समावेश कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा का आरंभ युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
गुणवत्ता और नवाचार पर बल उच्च शिक्षा में अनुसंधान, नवाचार, और डिजिटल तकनीकों के समावेश से शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और रोजगारपरक बनाया गया है।

लचीलापन और वैयक्तिक रुचियों का सम्मान करते हुए नई नीति में छात्रों को अपने रुचि के अनुसार विषय चुनने की स्वतंत्रता दी गई है, जिससे वे अपने कौशलों का विकास कर सकें। उन्होंने “राज्य समाजवाद” का समर्थन किया, जिसमें उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियंत्रण हो। उन्होंने लघु उद्योगों, सहकारिता, और भूमि सुधारों की बात की।

लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था की पैरवी करते हुए डा. अंबेडकर ने लोकतंत्र को “समान अवसरों की व्यवस्था” कहा था। NEP में स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में समान अवसर सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है, जिससे सभी को आगे बढ़ने का समान अधिकार मिले। जो आज विभिन्न योजनाओं एवँ छात्रवृत्ति के माध्यम से NEP 2020 के माध्यम से किया जा रहा है ।

डा. अंबेडकर का चिंतन आज भी भारत के सामाजिक और शैक्षणिक विकास का पथप्रदर्शक है। आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता मिले। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उनके विचारों की स्पष्ट झलक दिखाई देती है, जिससे यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाला भारत एक समतामूलक, सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनेगा।
डा. अंबेडकर का चिंतन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उनके विचारों की झलक मिलती है—शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत का निर्माण। यदि नीति के प्रावधानों को जमीनी स्तर पर ईमानदारी से लागू किया जाए, तो यह डा. अंबेडकर के सपनों के भारत की ओर एक ठोस कदम हो सकता है।

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