भारत के डेयरी उद्योग का आधुनिकीकरण गौ पालकों को सशक्त करेगा

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मथुरा। कभी भारत में दूध की नदियां बहती थीं। ब्रज भूमि कृष्ण कन्हैया की माखन, दही, छाछ की लीलाओं से गुंजित था।
दूध आज फिर चर्चा में है, नकली दूध से देवी देवताओं का अभिषेक हो रहा है, दूध की परिक्रमा लग रही है। रासायनिक जहरों से नकली मिलावटी, पनीर, खोया, मिठाई बना कर लोगों की सेहत से खिलवाड़ हो रहा है।

बहरहाल, दुग्ध क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में चलाए गए ऑपरेशन फ्लड की बदौलत श्वेत क्रांति से भारत में दुग्ध उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। आज पूरा भारत पीता है अमूल का दूध।

भारत की विशाल दुधारू मवेशी आबादी, जिसमें लगभग 300 मिलियन गाय और भैंस शामिल हैं, एक विरोधाभास भी प्रस्तुत करती है। एक ओर, देश का डेयरी उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है, जो सालाना 210 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक दूध का उत्पादन करता है। दूसरी ओर, इस उद्योग को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जो इसकी स्थिरता और डेयरी किसानों की आजीविका को खतरे में डालती हैं।

दूध की कीमतों में उतार-चढ़ाव, उत्पादन लागत में वृद्धि और पौधों पर आधारित विकल्पों से प्रतिस्पर्धा जैसे आर्थिक दबावों ने डेयरी किसानों की लाभप्रदता पर भारी असर डाला है। मूल्य स्थिरीकरण कार्यक्रमों को लागू करना, उत्पाद पेशकशों में विविधता लाना और सहकारी विपणन रणनीतियों का समर्थन करना सौदेबाजी की शक्ति को मजबूत करने में मदद कर सकता है, एक डेयरी एक्सपर्ट कहते हैं।

हालांकि, डेयरी उद्योग के पर्यावरणीय प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जल उपयोग और भूमि क्षरण सभी महत्वपूर्ण चिंताएँ हैं। अपशिष्ट प्रबंधन और पुनर्चक्रण के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रोत्साहित करना, संधारणीय कृषि प्रथाओं में अनुसंधान को बढ़ावा देना और कार्बन क्रेडिट और संधारणीय प्रमाणन के लिए पहलों का समर्थन करना इन मुद्दों को कम करने में मदद कर सकता है।

इसके अलावा, श्रम की कमी और पशु स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ डेयरी उद्योग के सामने आने वाली चुनौतियों को और बढ़ा देती हैं।

भारत में दूध उद्योग को उन्नत और आधुनिक बनाने के लिए, डेयरी मूल्य श्रृंखला के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। विशेषज्ञ दक्षता, स्वच्छता और दूध की गुणवत्ता में सुधार के लिए स्वचालित दूध देने की प्रणाली को लागू करने का सुझाव देते हैं। वे पशु स्वास्थ्य, पोषण और प्रजनन की निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने और संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करने की भी सलाह देते हैं।

भारत में मजबूत कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। परिवहन और भंडारण के दौरान दूध की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सरकार को इसमें निवेश करना चाहिए। कई अध्ययन डेटा प्रबंधन, आपूर्ति श्रृंखला ट्रैकिंग और वित्तीय प्रबंधन के लिए डिजिटल टूल अपनाने की सलाह देते हैं।

पशुपालन में सुधार महत्वपूर्ण है। कृत्रिम गर्भाधान और भ्रूण स्थानांतरण जैसी वैज्ञानिक प्रजनन तकनीकों को बढ़ावा देने से पशुधन की आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। नुकसान को कम करने के लिए प्रभावी रोग नियंत्रण और टीकाकरण कार्यक्रमों की आवश्यकता है। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए फ़ीड और चारे की गुणवत्ता और उपलब्धता में सुधार करना आवश्यक है।

किसानों का सशक्तिकरण महत्वपूर्ण है। आधुनिक कृषि पद्धतियों, पशुपालन और व्यवसाय प्रबंधन पर डेयरी किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। डेयरी सहकारी समितियों को मजबूत करने से किसान सशक्त हो सकते हैं और सामूहिक सौदेबाजी को सुविधाजनक बना सकते हैं।

उन्नत तकनीक के साथ प्रसंस्करण संयंत्रों को उन्नत करके डेयरियों का आधुनिकीकरण उत्पाद की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार कर सकता है। पनीर, दही और मक्खन जैसे मूल्यवर्धित डेयरी उत्पादों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने से लाभप्रदता बढ़ सकती है। दूध और डेयरी उत्पादों की सुरक्षा और शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए अभिनव पैकेजिंग और कठोर गुणवत्ता नियंत्रण उपाय आवश्यक हैं। आईएसओ 22000 जैसे अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों का अनुपालन करने से बाजार तक पहुंच प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।

सहकारी विशेषज्ञ अजय दुबे कहते हैं, “नई तकनीक विकसित करने और डेयरी फार्मिंग प्रथाओं में सुधार करने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश करें। डेयरी उद्योग को समर्थन देने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली आपूर्ति और पशु चिकित्सा सेवाओं जैसे बुनियादी ढांचे का विकास करें।”

ईमानदारी से विकास का आधार बना उपचुनाव में जीत का कारण

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राजस्थान की 7 विधानसभा सीटों के उपचुनाव नतीजों ने प्रदेश में डबल इंजन वाली भाजपा सरकार के जनकल्याणकारी कामों पर मोहर लगाई है। यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की मंशा के अनुरूप प्रदेश के लिए ईमानदारी से विकास को आधार बना कर जो काम हुए, वही इस जीत का मुख्य आधार बने हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार ने 11 महीनों में ’सर्वजन हिताय’ को आधार बनाकर समावेशी विकास करके दिखाया। मुख्यमंत्री ने पूर्वी राजस्थान और शेखावाटी अंचल के लोगों के दशकों से सूखे कंठों की प्यास बुझाने के लिए संशोधित पीकेसी-एकीकृत ईआरसीपी योजना एमओयू और यमुना जल समझौता किया। जब इन योजनाओं के पूरा होने पर पानी खेतों को सींचेगा तो किसानों के चेहरे पर मुस्कान आएगी, साथ ही इन इलाकों में नई कृषि और औद्योगिक क्रांति देखने को मिलेगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुसार देश में चार ही जातियां गरीब, युवा, महिला, किसान हैं और इसी सोच को आधार बनाकर राज्य सरकार ने जब अपना पहला बजट पेश किया गया तो सभी ओर से एक ही आवाज आई कि यह बजट समावेशी, सर्वस्पर्शी और सर्वांगीण विकास वाला है। विकसित राजस्थान-2047 की आधारशिला सरकार के पहले वर्ष में ही रख दी गई है। इन चार प्रमुख वर्गों सहित सभी वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं एवं ऊर्जा, सड़क, औद्योगिक विकास, पर्यटन, वन एवं पर्यावरण, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, सुशासन, सिंचाई, कृषि, सहकारिता, पशुपालन एवं डेयरी जैसे सभी क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए जरूरी बजट दिया गया। सभी ने कहा कि यह पहली बार हुआ है जब बजट में सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों को बिना किसी भेदभाव के विकास कार्यों की महत्वपूर्ण सौगातें मिली हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व वाली राज्य की डबल इंजन की सरकार द्वारा ईमानदारी से प्रदेश के विकास की नवीन इबारत लिखी जा रही है। सभी को मालूम है पिछली कांग्रेस सरकार में विकास एवं रोजगार के नाम पर जिस ’इन्वेस्ट राजस्थान समिट’ का आयोजन किया गया, उसका क्या हश्र हुआ। मजबूत संकल्प और दृढ़इच्छा शक्ति वाली भाजपा सरकार ने पहले वर्ष ही 9 से 11 दिसंबर तक राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इनवेस्मेंट समिट के आयोजन करने का फैसला लिया, इस समिट में अब तक 25 लाख करोड़ रुपये से अधिक के एमओयू साइन हो चुके हैं। इससे प्रदेश का औद्योगिक विकास नई गति से आगे बढ़ेगा, साथ ही राज्य की बड़ी युवा आबादी को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के मौके भी मिलेंगे।

राजस्थान का युवा, महिला, किसान, गरीब और वंचित वर्ग कांग्रेस की लूट और उनके झूठ को पहचान गया। जनता ने भाजपा सरकार के कामों को स्वीकार करते हुए उपचुनाव में विधानसभा सीटों पर जीत का जो फैसला सुनाया है, निश्चित तौर पर इससे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा सरकार को प्रदेश का चहुंमुखी विकास करने की नई ऊर्जा मिलेगी।

आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए मीडिया जुड़ाव हेतु सीएमएस द्वारा “राष्ट्रीय मीडिया परामर्श” का सफल आयोजन

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नई दिल्ली 23 नवंबर 2024 : आर्द्रभूमि संरक्षण के मीडिया जुड़ाव हेतु आयोजित “राष्ट्रीय मीडिया परामर्श” का तीन दिवसीय राष्ट्रीय मीडिया परामर्श कार्यक्रम का आज ग्रेटर नोएडा स्थित सूरजपुर आर्द्रभूमि पर क्षेत्रीय भ्रमण के साथ सफल समापन हुआ। इस कार्यक्रम में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, GIZ के इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम एवं WWF-इंडिया जैसे संगठनों के प्रतिनिधियों सहित कई विश्वविधालयों के पत्रकारिता के छात्र छात्रों ने भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के प्रति मीडिया के जुड़ाव को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बिन्दुओ पर परिचर्चा की।

उल्लेखनीय है यह व्यापक कार्यक्रम 21 नवंबर को हमदर्द कन्वेंशन सेंटर, जामिया हमदर्द में शुरू हुआ, जहां दिल्ली-एनसीआर विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता और जनसंचार छात्रों के लिए एक सघन क्षमता निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई। उद्घाटन सत्र में सम्मानित वक्ताओं में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के वैज्ञानिक एफ डॉ. रमेश एम, इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम, GIZ के वरिष्ठ सलाहकार श्री किर्तिमान अवस्थी, और जामिया हमदर्द के सेंटर फॉर मीडिया एंड मास कम्युनिकेशन स्टडीज की निदेशक प्रो. रेशमा नसरीन शामिल थे।

दूसरे दिन, नई दिल्ली के द ललित होटल में वरिष्ठ पत्रकारों और पर्यावरण विशेषज्ञों की बैठक हुई। इस दौरान, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सदस्य और पूर्व में आर्द्रभूमि प्रभाग के संयुक्त सचिव डॉ. सुजीत बाजपेई, GIZ के इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम के निदेशक श्री रविंद्र सिंह, और WWF-इंडिया के सीनियर डायरेक्टर-इकोलॉजिकल फुटप्रिंट श्री सुरेश बाबू ने आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में नवाचार की आवश्यकता पर चर्चा की। वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक डॉ. रितेश कुमार ने भारत की आर्द्रभूमि के इतिहास और वर्तमान स्थिति पर उपयोगी जानकारी साझा की।

अंतिम दिन, सूरजपुर आर्द्रभूमि का शैक्षिक क्षेत्रीय भ्रमण आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों को आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र और संरक्षण की चुनौतियों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ। इस भ्रमण का आयोजन गौतम बुद्ध नगर के जिला वन अधिकारी श्री प्रमोद कुमार श्रीवास्तव, रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर श्रीमती अनामिका झा और साइट प्रभारी श्री राम अवतार चौधरी ने किया। इस दौरान, प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ श्री सुरेंद्र मिया ने इस क्षेत्र के विविध पक्षियों की जानकारी दी।

इस कार्यक्रम की सफलता पर CMS की महानिदेशक, डॉ. वसंती राव ने कहा, “यह तीन दिवसीय आयोजन पर्यावरणीय पत्रकारिता के लिए एक मजबूत मंच के रूप में उभरा है, जिसने अनुभवी पत्रकारों, भावी मीडिया पेशेवरों और विशेषज्ञों को आर्द्रभूमि संरक्षण के विज्ञान, नीति और सार्वजनिक समझ के बीच के अंतर को पाटने में मदद की है।”

डॉ. रमेश एम ने आर्द्रभूमि संरक्षण के व्यापक महत्व पर प्रकाश डाला, “आज सूरजपुर आर्द्रभूमि का अनुभव यह दर्शाता है कि ये पारिस्थितिकी तंत्र वायु प्रदूषण जैसी वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान बन सकते हैं। इस कार्यक्रम ने जटिल पर्यावरणीय अंतर्संबंधों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित किया है।”

यह आयोजन सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) द्वारा इंडो-जर्मन तकनीकी सहयोग परियोजना ‘वेटलैंड्स मैनेजमेंट फॉर बायोडायवर्सिटी एंड क्लाइमेट प्रोटेक्शन’ के तहत किया गया। यह परियोजना जर्मन संघीय पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण, परमाणु सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण मंत्रालय (BMUV) के अंतर्राष्ट्रीय जलवायु पहल (IKI) द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के सहयोग से कार्यान्वित किया गया ।

भारत में एकात्म मानववाद के सिद्धांत को अपनाकर हो आर्थिक विकास

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भारतीय संस्कृति के अनुसार ही भारतीय आर्थिक दर्शन में भी सृष्टि की समस्त इकाईयों, अर्थात व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं समष्टि को एक माला की कड़ी के रूप में देखा गया है। एकता की इस कड़ी को ही पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ बताया है। एकात्म मानववाद वैदिक काल से चले आ रहे सनातन प्रवाह का ही युगानुरूप प्रकटीकरण है। सनातन हिंदू दर्शन आत्मवादी है। आत्मा ही परम चेतन का अंश है। पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने समाज और राष्ट्र में भी चित्त, आत्मा, मन, बुद्धि एवं शरीर आदि का समुच्चय देखा है। अतः इस एकात्म मानववादी दर्शन के उतने ही आयाम एवं विस्तार है, जितनी मनुष्य की आवश्यकताएं हैं। इन विभिन्न आवश्यकताओं का केंद्र बिंदु अर्थ को ही माना गया है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की परिभाषा में लिखा है कि अर्थशास्त्र का मुख्य अभिप्राय, अप्राप्ति की प्राप्ति; प्राप्ति का संरक्षण तथा संरक्षित का उपभोग है। एकात्म मानववाद में भी आर्थिक व्यवहार उक्त आधारों पर ही टिके होते हैं। इस प्रकार, अर्थशास्त्र की दिशा स्वतः ही विकासवादी हो जाती है।

भारत के नागरिक पिछले लम्बे समय से पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था में पले बढ़े हैं अतः वे भारत की पौराणिक एवं वैदिक ज्ञान परम्परा से विमुख हो गए हैं। इसी प्रकार, प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र एवं आर्थिक चिंतन से भी हम भारतीय इतने अधिक दूर हो गए हैं कि प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र को सिर्फ उक्ति एवं सिद्धांत मानने के साथ साथ अव्यवहारिक भी मानने लगे हैं। जबकि, वैदिक साहित्य में धन के 22 से अधिक प्रकारों की स्पष्ट व्याख्या की गई है, जिसमें शेयर से लेकर आय एवं मूलधन भी सम्मिलित है। प्राचीन भारत के आर्थिक चिंतन को आज यदि लागू किया जाता है तो केवल भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता का कल्याण होगा, क्योंकि हिंदू अर्थशास्त्र एकात्म मानववाद पर आधारित है, जिसमें व्यक्ति अपने लिए नहीं, वरन समष्टि के लिए जीता है। इसे निम्नलिखित सूत्र के माध्यम से अधिक स्पष्ट किया जा सकता हैं –

हिंदू अर्थशास्त्र = व्यक्ति x परमार्थ (एकात्म मानववाद एवं त्याग)
पश्चिमी अर्थशास्त्र = व्यक्ति x स्वार्थ (आत्म केंद्रित एवं लाभ)

एकात्म मानववादी अर्थशास्त्र में व्यक्ति अपने एवं अपनों के स्थान पर समष्टि तथा चराचर और परमार्थ के लिए जीता है। जिसमें स्वयं के लिए मुनाफा एवं लाभ के स्थान पर दूसरों की चिंता मुख्य होती है। परंतु, इसके ठीक विपरीत पश्चिम का अर्थशास्त्र आत्मकेंद्रित व्यवहार एवं स्वार्थ पर खड़ा है।

पश्चिम के विकासवादी दर्शन का केंद्र मुनाफा, स्वार्थ एवं लाभ है। परंतु, हिंदू आर्थिक चिंतन के आधार पर खड़े एकात्म मानववाद का आधार अथवा केंद्र परमार्थ है। इसलिए एकात्म मानववादी आर्थिक विकास में विकास केवल अर्थ के लिए नहीं वरन परमार्थ के लिए है। हिंदू आर्थिक दर्शन परम्परा में विकास की अवधारणा को समग्रता में व्यक्त किया गया है। यह विकास त्रिगुण आधारित है। इस त्रिगुण में – सत, रज एवं तम सम्मिलित है। प्राचीन भारतीय चिंतन में सत्तवादी विकास श्रेष्ठ माना गया है। इस सत्तवादी विकास के तत्व हैं ज्ञान, तपस्या, सदकर्म, प्रेम एवं समत्वभाव तथा इसकी उपस्थिति सतयुग में मानी गई है। विकास का दूसरा स्वरूप रजस को माना गया। इस रजसवादी विकास के तत्व हैं अहंबुद्धि, प्रतिष्ठा, मानबढ़ाई, लौकिक, पारलौकिक सुखा मत्सर, दम्भ एवं लोभ तथा इसकी उपस्थिति त्रेतायुग में मानी गई है। इसे मानवीय और मध्यम माना गया है। इसी प्रकार, विकास का तीसरा स्वरूप तमस को माना गया है। इस तमसवादी विकास के तत्व हैं असत्य, माया, कपट, आलस्य, निंदा, हिंसा, विषाद, शोक, मोह, भय तथा इसकी उपस्थिति कलयुग में मानी गई है। इस प्रकार सत, रज एवं तम गुणों के आधार पर उक्त विकास के तीन रूपों के साथ एक मिश्रित विकास का भी मॉडल माना गया है, जिसमें रजस एवं तमस गुण मिले होते हैं और इस मॉडल की उपस्थिति द्वापर युग में मानी गई है।

इस प्रकार भारतीय चिंतन परम्परा में विकास के उक्त चार प्रारूप माने गए हैं। इन चारों प्रारूपों का उपयोग चार युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलियुग में होता पाया गया है। इसमें सबसे उत्तम सतयुगी विकास प्रारूप को माना गया है तथा सबसे अधम कलियुगी विकास प्रारूप को माना गया है। भारत में, वर्तमान खंडकाल में त्रेतायुग के रामराज्य को भी बहुत अच्छा माना गया है एवं इसके स्थापना की कल्पना की जाती रही है। पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने महात्मा गांधी जी के ट्रस्टी शिप एवं हिंद स्वराज्य के विवेचन को भी अपने विमर्श में स्थान दिया है। इस प्रकार भारतीय चिंतन परम्परा का आदर्श रामराज्य है, इसमें भरत जैसे राजा एवं जनक जैसे राजा तपस्वी के रूप में राज्य करते थे। स्वयं श्रीराम धर्म की मर्यादा को अपने लिए भी लागू करते थे एवं धर्म की मर्यादा का कभी भी उल्लंघन नहीं करते थे। सदैव प्रजा एवं प्रकृति की रक्षा एवं संवर्धन करते रहते हैं। यह एक ऐसा विकास का प्रारूप है जो आज भी आदर्श है। रामराज्य की अवधारणा भी एकात्म मानववाद के आधारों पर खड़ी थी। यह शासन तथा विकास एवं व्यवस्था में सब की भागीदारी तथा सब के लिए व्यवस्था थी, जो प्रकृति आधारित विकास पर बल देती थी।

भारत में सबसे छोटी इकाई व्यक्ति पर बल दिया गया है और उसका संगठन किया गया है। भारत में व्यक्ति के स्वरूप को जिस प्रकार संगठित और एकात्म किया गया वैसा पश्चिम में नहीं हो सका है। पश्चिम में केवल भौतिक प्रगति पर ही बल दिया गया है। पूरे विश्व में आज सर्वाधिक विकसित राष्ट्र अमेरिका को माना जाता है। अमेरिका में नागरिकों की भौतिक प्रगति तो बहुत हो गई है, परंतु अमेरिका के नागरिकों में सुख, संतोष और समाधान का पूर्णतया अभाव है। अमेरिका में व्यक्ति के जीवन में परस्पर विरोध, असमाधान, असंतोष, सर्वाधिक अपराध और आत्महत्याएं बहुत बड़ी मात्रा में व्याप्त हैं। अमेरिकी नागरिकों में तीव्र रक्तचाप, हृदय रोग एवं अपराध की प्रवृत्ति बहुत अधिक मात्रा में पाई जा रही है। पूरे विश्व को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला अमेरिका अपने नागरिकों के लिए भौतिक समाधान से आगे बढ़कर मानसिक समाधान प्राप्त नहीं कर सका है। इस धरा पर जन्म लेने के बाद प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य आखिर है क्या? सम्भवतः सुख जो चिरंतन एवं घनीभूत हो। इतनी भौतिक प्रगति करने के बाद भी अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के नागरिकों में समाधान व सुख का अभाव है। ईसा ने कहा था कि ‘सम्पूर्ण संसार का साम्राज्य भी प्राप्त कर लिया और यदि आत्मा का सुख खो दिया तो उससे क्या लाभ?’

भारत में छोटी से छोटी इकाई व्यक्ति संगठित और एकात्म है एवं व्यक्ति को खंडो में विभक्त समझने की बुद्धिमता प्रदर्शित नहीं की गई है। परंतु, अमेरिका के एक मनोवैज्ञानिक ने वर्णन किया है कि ‘सड़कों पर एक ऐसी बड़ी भीड़ हमेशा लगी रहती है जो आत्मविहीन, मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ, एक दूसरे से अपरिचित और निःसंग स्थिति में है। उनका अपने ही साथ समन्वय नहीं तो दुनिया के साथ क्या होगा? व्यक्ति का समाज के साथ समन्वय नहीं। व्यक्ति भी संगठित और एकात्म इकाई नहीं। केवल भौतिक स्तर पर विचार करने के कारण वहां व्यक्ति को भौतिक एवं आर्थिक प्राणी माना गया है। यदि भौतिक आर्थिक उत्कर्ष मानव को मिले तो उससे सुख की प्राप्ति होगी, यह माना गया। किंतु भौतिक आर्थिक उत्कर्ष की चरम सीमा होने पर भी सुख का अभाव है और इसका कारण यही है कि वहां खंड खंड में विचार करने की प्रणाली है, जिसमें व्यक्ति को केवल भौतिक आर्थिक प्राणी मान लिया गया है और व्यक्ति के सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर संगठित एवं एकात्म रूप में विचार नहीं किया गया है।

भारत के प्राचीन ग्रंथों में यह माना गया है कि मनुष्य एक आर्थिक प्राणी भी है एवं ‘आहार, निद्रा, भय, मैथुन, आर्थिक आवश्यकताओं, आदि’ की तृप्ति की बात भारत में भी कही गई है। इन जरूरतों की पूर्ति होना चाहिए, इस तथ्य को भी स्वीकार किया गया है। किंतु भारत में मनुष्य को आर्थिक प्राणी से कुछ ऊपर भी माना गया है। मनुष्य आर्थिक प्राणी के साथ साथ वह एक शरीरधारी, मनोवौज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक प्राणी भी है। भारतीय मनुष्य के व्यक्तित्व के अनेकानेक पहलू है। अतः यदि सम्पूर्ण व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का संगठित और एकात्म रूप से विचार नहीं हुआ तो उसको सुख समाधान की अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए भारत में इस दृष्टि से संगठित एवं एकात्म स्वरूप का विचार हुआ है। मनुष्य की आर्थिक एवं भौतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर यह कहा गया है कि इन वासनाओं की तृप्ति होनी चाहिए लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि इन आवश्यकताओं पर कुछ वांछनीय मर्यादा होना भी आवश्यक है। गीता के तृतीय अध्याय के 42वें श्लोक में कहा गया है कि इंद्रियां (विषयों से) ऊपर स्थित हैं, इंद्रियों से मन उत्कृष्ट है। बुद्धि मन से भी ऊपर अवस्थित है, जो बुद्धि की अपेक्षा भी उत्कृष्ट है और उससे भी अगम्य है – वही आत्मा है। अतः काम को स्वीकार करने के उपरांत भी उसे अनियत्रिंत नहीं रहने दिया गया है। काम की पूर्ति धर्म के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए, ऐसा भारतीय शास्त्रों में कहा गया है।

प्राचीन भारत में अर्थ के महत्व को भी स्वीकार किया गया है एवं अर्थशास्त्र की रचना भी हुई है। यह माना जाता रहा है कि राज्य के समस्त नागरिकों की भौतिक आवश्यकताओं की पर्याप्त पूर्ति होनी चाहिए ताकि इसके अभाव में अपना पेट पालने के लिए व्यक्ति को 24 घंटे चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़े। राज्य के नागरिकों को पर्याप्त अवकाश मिल सके, जिससे वह संस्कृति, कला, साहित्य और भगवान आदि के बारे में चिन्तनशील हो सके। इस प्रकार अर्थ और काम को मान्यता देकर साथ ही यह भी कहा गया है कि एक व्यक्ति का अर्थ और काम उसके विनाश का अथवा समाज के विघटन का कारण न बने। इस दृष्टि से भारत के प्राचीन दृष्टाओं ने विशिष्ट दर्शन दिया था। उसमें विश्व की धारणा के लिए शाश्वत नियम और सार्वजनिक नियम देखे थे, उनका दर्शन किया था। व्यक्ति को विनाश से बचाने के लिए, समाज को विघटन से बचाने के लिए एवं व्यक्ति के परम उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक एवं सार्वदेशिक नियमों के प्रकाश में जो अवस्था उन्होंने बनायी उसके समुच्चय को धर्म कहा गया। इस धर्म के अंतर्गत अर्थ और काम की पूर्ति का भी विचार हुआ। साथ ही, प्रत्येक व्यक्ति परम सुख यानी मोक्ष प्राप्त कर सके, इसका चिंतन भी हुआ। इस प्रकार धर्म और मोक्ष के मध्य अर्थ और काम को रखते हुए चतुर्विध पुरुषार्थ की कल्पना भारत में ही की गई है। इस समन्वयात्मक, संगठित और एकात्मवादी कल्पना में व्यक्ति का व्यक्तित्व विभक्त्त नहीं हुआ। यह आत्मविहीन एवं मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ प्राणी न बन सका। इस चतुर्विध पुरुषार्थ ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार अपना जीवनादर्शन चुनने का अवसर दे दिया और साथ ही व्यक्तित्व को अखंड बनाए रखा।

यह स्मरण रखना चाहिए कि जहां व्यक्ति के व्यक्तित्व रूपी विभिन्न पहलू संगठित नहीं है या व्यक्ति संगठित नहीं है, वहां समाज संगठित कैसे हो सकता है? इस संगठित आधार पर ही भारत में व्यक्ति से परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और चराचर सृष्टि का विचार किया गया। एकात्म मानवदर्शन इसी का नाम है और आज भारत में आर्थिक विकास को एकात्म मानववाद के सिद्धांत का अनुपालन करते हुए ही गति दी जानी चाहिए।

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