राहुल देव और नरेश सक्सेना का वैचारिक दिवालियापन

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शिवेश प्रताप

हाल ही में आजतक के साहित्यिक मंच पर पत्रकार राहुल देव और कवि नरेश सक्सेना ने एक गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “आरएसएस सौ साल से बौद्धिक कर रहा है, किंतु आज तक ऐसा कोई बुद्धिजीवी नहीं पैदा कर पाया, जिसका नाम संघ के बाहर कोई जानता हो।” यह सवाल जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही विचारणीय भी। ऐसा कह इस कवि-पत्रकार द्वय ने अपने वैचारिक दिवालियेपन से समाज का परिचय कराया और यह बताया की ये बेचारे संघ की रीति और नीति से कितने अनभिज्ञ हैं। इन्हें यह समझना चाहिए की वामपंथ की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ख़ालिस बुद्धिजीवी पैदा करने की फैक्ट्री नहीं है। संघ का उद्देश्य वास्तविक चरित्र-व्यक्ति निर्माण है, न कि बुद्धिजीविता से कुण्ठित भीड़ का सृजन।

संघ न तो व्यक्ति को केवल बुद्धि आधारित जीवन जीने की शिक्षा देता है और न ही ऐसी किसी प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। अपनी प्रार्थना में संघ का स्वयंसेवक “सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्” कहकर ऐसा शुद्ध शील-चारित्र्य मांगता है जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये। संघ का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ावा देना नहीं है, संघ विचार को बढ़ावा देता है। “विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्” कहकर हम विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति के द्वारा “परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं” यानि राष्ट्र के वैभव को उच्चतम शिखर पर पहुँचाने का सामर्थ्य मांगते हैं। संघ का हर कार्य आत्मभाव, समर्पण और त्याग पर आधारित है। संघ व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण का मंच है। इसका लक्ष्य हर स्वयंसेवक को भारत माता की सेवा के लिए तैयार करना है। संघ के लिए बुद्धिजीविता साध्य नहीं है, बल्कि यह समाज और राष्ट्रहित में कार्य करने वाले व्यक्तियों को तैयार करने का माध्यम है।

आज के समाज में बुद्धिजीविता को एक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि बुद्धिजीविता केवल क्षणिक परिवर्तन ला सकती है। इसके विपरीत, व्यक्ति निर्माण का प्रभाव दीर्घकालिक और समाज के हर क्षेत्र में सकारात्मक होता है। संघ बुद्धिजीविता की अल्पकालिक चमक के बजाय व्यक्ति निर्माण के दीर्घकालिक प्रभाव में विश्वास रखता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इसी व्यक्ति निर्माण की दिशा में पिछले सौ वर्षों से कार्य कर रहा है।

पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री जी कहा करते थे की बुद्धिजीवी का अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो अपनी बुद्धि के आधार पर जीविका चलाता हो। जब बुद्धि के आधार पर जीविका चलाने को महिमामंडित किया गया, तब समाज में कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुईं। बीते दशकों में यह सत्य भी होता दिखाई दिया है, डॉक्टरों ने मरीजों को केवल पैसा कमाने का साधन मान लिया, शिक्षकों ने कक्षाओं से गायब होकर “अर्बन नक्सल” बनने का रास्ता चुना और छात्रों ने “टुकड़े-टुकड़े गैंग” बनाकर समाज में विघटनकारी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। वामपंथी बुद्धिजीविता ने समाज को हिंसा, विभाजन और अशांति के अलावा कुछ नहीं दिया। यह बुद्धिजीविता पूंजीवादी नेक्सस का हिस्सा बनकर समाज को खोखला करती है। वामपंथ ने श्रमिकों को “बुद्धिजीवी” बनने का सपना दिखाया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कलकत्ता से कानपुर तक औद्योगिक संयंत्र बंद हो गए। श्रमजीवी लोगों को दाने-दाने का मोहताज कर दिया। इस विचारधारा ने परिवार और सामाजिक मूल्यों को कमजोर किया और देशभक्ति व सांस्कृतिक चेतना पर भी आघात किया।

राहुल देव और नरेश सक्सेना को याद दिलाना चाहता हूं कि आज वह जिस बुद्धिजीविता का महिमा मंडन कर रहे हैं इस वामपंथी बुद्धिजीविता के राजनैतिक गढ़ त्रिपुरा को कुछ वर्ष पहले संघ के चार समर्पित स्वयंसेवकों श्री श्यामलकांति सेनगुप्ता, श्री दीनेंद्र डे, श्री सुधामय दत्त तथा श्री शुभंकर चक्रवर्ती ने अपने प्राणोत्सर्ग से उखाड़ फेंका। इन चारों को अपहरण 6 अगस्त 1999 को त्रिपुरा के कंचनपुर के वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास से हुआ था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई थी। आपकी सोने की बनी बुद्धिजीवी लंका को व्यक्तिनिर्माण की पूंछ ही जलाकर भस्म करती है। त्रिपुरा ने व्यक्ति निर्माण से आपकी बुद्धिजीविता को उत्तर दिया, आगे और भी नाम जुड़ेंगे।

वामपंथी और पूंजीवादी नेक्सस आज इतना मजबूत हो चुका है कि पूरी दुनिया इसके प्रभाव में है। राष्ट्र की संकल्पना में बुरु तरह विफल वामपंथी बुद्धिजीविता ने अब अपना रूप बदल समाज में भ्रम फैलाकर परिजीवी के रूप में पूंजीवाद को प्रश्रय दे रहा है। अमेरिका से भारत तक बुद्धिजीविता ने पूंजीवाद की दासी बनकर राजनीति और समाज में अपनी जगह बनाई। भारत से लेकर अमेरिका तक राष्ट्रभाव का उत्थान इन परिजीवियों के लिए संकट के रूप में खड़ा हुआ है इसलिए ये इतने बेचैन हैं।

राहुल देव और नरेश सक्सेना का यह सवाल कि “संघ ने कोई बुद्धिजीवी क्यों नहीं पैदा किया?” उचित है और इस तरह से वामपंथी गिरोह के हरावल दस्ते के दो बेरोजगार सेनापति आज जब अपने पुराने बुद्धिजीवी अखाड़े में संघ को ललकार रहे हैं तो यह नास्टैल्जिया उनकी बेचारगी को प्रगट कर रहा है। राहुल देव और नरेश सक्सेना जी काश आप इस विषय पर भी विचार करते की जिस देश को तोड़ने के लिए आने वैचारिक पूर्वज लगे रहे और पाकिस्तान बनवाया तो उस पाकिस्तान में आपका बुद्धिजीवी अवशेष क्यों नहीं मिलता?

पुनः एक बार कहना चाहूँगा संघ बुद्धिजीवी पैदा करने का मंच नहीं है। यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक यज्ञ है जिसमें सौ वर्षों से अनगिनत प्रचारकों, स्वयंसेवकों नें “मैं नहीं, तू ही” कह-कह कर स्व जीवन की आहुति दे दिया है। संघ का उद्देश्य व्यक्ति को राष्ट्रहित में कार्य करने के लिए तैयार करना है। संघ के चरित्रबल और कार्यों ने यह सिद्ध किया है कि समाज का उत्थान बुद्धिजीविता से नहीं, बल्कि नैतिकता और त्याग से होता है। वामपंथी बुद्धिजीविता जहां समाज में विभाजन और अशांति का कारण बनी है, वहीं संघ ने अपने सौ वर्षों के साधना से शांति, समरसता और राष्ट्रभक्ति का दीप जलाया है।

साहित्य और इतिहास लेखन में गिरफ्तार हुये : पहले वामपंथी फिर भारत राष्ट्र और हिन्दुत्व के पक्ष में खुलकर लेखन

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सीताराम जी गोयल भारत के ऐसे विरले विचारकों में से एक हैं जो पहले नास्तिक बने और फिर अपने धर्म में लौटकर क्राँतिकारी साहित्य की रचना की । जिसमें इतिहास के ऐसे पक्ष भी उजागर किये जिनपर चर्चा करना भी साहस की बात थी । उनके लेखन पर याचिकाएँ लगीं और गिरफ्तारी भी हुई । वे उत्कृष्ट विचारक, इतिहासकार, लेखक एवं प्रकाशक थे।”हाऊ आई बीकेम हिंदू”, “द कलकत्ता कुरान पेटिशन” और “द ऋषि ऑफ ए रिसर्जेंट इंडिया” अपने समय की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।

सीताराम जी गोयल धर्म को व्यक्तिगत जीवन का आधार मानते थे लेकिन सार्वजनिक जीवन में “धर्मनिरपेक्षता” के पक्षधर थे । लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल हिन्दुधर्म और राष्ट्र की मान्यताओं पर आघात करने की मानसिकता के विरुद्ध थे । इसी विचार ने उनकी धारा मोड़ी और उन्होंने कट्टरपंथ और छद्म वामपंथ पर तीखे प्रहार किये । उन्होंने इस विषय को केंद्र में रखकर “धर्मनिरपेक्षता : देशद्रोह का वैकल्पिक नाम” पुस्तक लिखी । इसमें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ईसाई मिशनरीज, मार्क्सवादियों और मुस्लिम कट्टरपंथियों की युति का विवेचन किया । इस रचना के बाद उनपर साम्प्रदायिक होने के आरोप लगे । तब उन्होंने कहा था कि “यदि सत्य लिखना साम्प्रदायिक होना है तो वे साम्प्रदायिक हैं”। ऐसे क्राँतिकारी लेखक और विचारक सीताराम जी गोयल का जन्म 16 अक्टूबर 1921 को हरियाणा प्राँत के छारा गाँव में हुआ था । परिवार आर्यसमाज से जुड़ा था लेकिन घर में निर्गुण संत गरीबदास जी का प्रभाव आना जाना था । किसी महामारी के कारण बचपन में ही माता पिता का निधन हो गया और वे अपने ननिहाल कलकत्ता पहुँच गये । वे बचपन से बहुत संघर्षशील और कुशाग्र बुद्धि थे । उन्होंने पढ़ाई के साथ अर्थोपार्जन भी किया । आरंभिक शिक्षा कलकत्ता में हुई और बाद में दिल्ली आ गये । दिल्ली के हिंदू कॉलेज से इतिहास में एमए किया । निर्धारित पाठ्यक्रम के साथ उन्होंने संस्कृत भाषाकी शिक्षा भी ली थी । छात्र जीवन से ही उनमें सामाजिक कार्यों की रुचि भी जाग गई थी। वे आर्य समाज के निर्गुण सिद्धांत के साथ गांधीजी के स्वदेशी एवं हरिजन उद्धार अभियान के भी समर्थन थे । उन्होंने अपने गाँव में उपेक्षित एवं सेवा बस्तियों में काम भी किया ।

छात्र जीवन में उनका संपर्क वामपंथी विचारकों से हुआ और वे इसी धारा में मुड़ गये । 1940 में उनकी पहचान एक सक्रिय वामपंथी कार्यकर्ता के रूप में गई थी । उनका आरंभिक लेखन इसी धारा पर हुआ । वे बहुत तीखा और आक्रामक लिखते थे। लेकिन 1946 में मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन में नर संहार देखकर उनका मन उद्वेलित हो गया । वह नरसंहार एकतरफा था । उनका मानना था कि साम्यवाद को इस नरसंहार का विरोध करना चाहिए, पर ईसाई और साम्यवादी तंत्र ने उस हिंसा के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठाई । यह हिंसा भारत विभाजन तक जारी रही । यहाँ से उनका मन बदला । वे इतिहास के विद्यार्थी रहे थे । उनकी स्मृति में इतिहास के नरसंहारों का विवरण उभर आया । यहीं से उनके विचार और लेखन की धारा बदल गई । अब उनकी गणना वामपंथ विरोधियों में होने लगी । उनके द्वारा 1950 में स्थापित “सोसाइटी फॉर द डिफेंस ऑफ फ्रीडम इन एशिया” संस्था कम्युनिस्ट विरोधी संस्था मानी जाने लगी । इस संस्था ने सोवियत संघ और पीपुल्स रिपब्लिक के अत्याचारों और साम्यवादी चिंतन का तथ्यात्मक विश्लेषण किया और उसके दुष्परिणामों पर एक लेखमाला प्रकाशित की । उन्होंने इसके साथ भारतीय परंपराओं की वैज्ञानिकता एवं मानवीय पक्ष की ओर मुड़े। पर उनके मन से मुस्लिम लीग का डायरेक्ट एक्शन और भारत विभाजन की हिंसा का दंश कभी न निकला । सकारात्मक राष्ट्रीउन्होंने एक पुस्तक ‘मैं हिन्दू क्यों बना ?’ भी लिखी। वामपंथ पर उन्होंने सतत लेखन किया और 1954 में कोलकाता के पुस्तक मेले में अपने वामपंथ विरोधी प्रकाशनों की एक दुकान लगाई। उसके बैनर पर लिखा था – लाल खटमल मारने की दवा यहां मिलती है। “आर्गनाइजर” में उन्होंने सतत लेखन किया । इसमें सभी विषय पर आलेख होते ।

महर्षि अरविन्द के विचारों पर आध्यात्मिक, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और रक्षामंत्री कृष्णामेनन की नीतियों और आलोचनात्मक विषय थे । यह लेखमाला बाद में पुस्तक रूप में भी प्रकाशित हुई।उन्होंने अपना एक “वाइस ऑफ इंडिया” नाम से प्रकाशन केंद्र भी स्थापित किया । इसके माध्यम से हिन्दी और अंग्रेजी में अपनी तथा अन्य लेखकों की पुस्तकें प्रकाशन का क्रम आरंभ हुआ । उनके प्रकाशन की एक पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम थ्रू हदीस” बहुत चर्चित रही । इसके लेखक राम स्वरूप जी थे । इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा 1987 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। लेकिन अदालत से उनके पक्ष में निर्णय आया । प्रतिबंध हटा और 1993 में यह पुस्तक पुनः प्रकाशित हुई । सीताराम जी की एक पुस्तक “कॉलिन मेन के निबंध द डेड हैंड ऑफ़ इस्लाम” थी । इस पुस्तक के विरुद्ध भी उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए और 295 ए का मुकदमा दर्ज कराया गया । लेकिन वे अदालत से बरी हुये ।उन्होनें भारतीय इतिहास की वास्तविक घटनाओं सामने लाने का मानों बीड़ा उठा लिया था । इसके साथ हिंदू समाज को कमजोर करने के लिए मार्क्सवाद समर्थक कथित बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों स्थापित मिथकों का तर्क सहित खंडन करके सत्य स्थापित करने का प्रयास किया है । उन्होंने उस समय की राजनीति से संबंधित कई विषयों और भविष्य की चुनौतियों पर भी लेखन किया ।इतिहास सहित इन सभी विषयों पर उन्होंने स्वयं 25 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनकी सबसे अधिक चर्चित पुस्तक आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट किए गए हिंदू मंदिरों की सूची का संकलन थी । ‘हिंदू मंदिर उनका क्या हुआ’ नामक यह संकलन दो खंडों में प्रकाशित हुआ । 1990 में उत्तरप्रदेश की मुलायमसिंह सरकार के दौरान इस पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग भी उठी ।

1993 में सांसद सैयद शहाबुद्दीन ने राम स्वरूप की पुस्तक हिंदू व्यू ऑफ क्रिश्चियनिटी एंड इस्लाम पर प्रतिबंध लगाने की मांग की ।अपने समय के सुविख्यात लेखक अरुण शौरी और केएस लाल ने प्रतिबंध की इस मांग कि विरोध किया था। श्री चाँदमल चौपड़ा द्वारा लिखित उनके प्रकाशन की एक पुस्तक “द कलकत्ता कुरान पिटीशन” है । पुस्तक के लेखक श्री चौपड़ा के साथ प्रकाशन के लिये सीताराम जी भी 31 अगस्त 1987 को गिरफ्तार हुये । उन्हें 8 सितंबर तक हिरासत में रखा गया। उनके द्वारा लिखित या प्रकाशित आलेख एवं पुस्तकों में “चीन विवाद; हम किस पर विश्वास करें?, “सोसाइटी फॉर डिफेंस ऑफ फ्रीडम इन एशिया” “माइंड मर्डर इन माओ-लैंड” “चीन में कम्युनिस्ट पार्टी: राजद्रोह पर एक अध्ययन” लाल भाई या पीला गुलाम” भारत में इस्लामी साम्राज्यवाद की कहानी” “मुस्लिम अलगाववाद: कारण और परिणाम” “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, “धर्मनिरपेक्ष धर्मतंत्र बनाम उदार लोकतंत्र” “ईसाई मिशनरी गतिविधियों पर नियोगी समिति की रिपोर्ट, “मिशनरियों के विध्वंस और धर्मांतरण” जैसे विषयों पर भी हैं । इनके अतिरिक्त उन्होंने हिंदू समाज को भविष्य की चुनौतियों से सावधान करने केलिये भी उन्होंने पुस्तक लिखी । इन विषयों पर अन्य इतिहासकारों, विचारकों, विद्वानों और वैज्ञानिकों से भी संपर्क करके उन्होंने अपने प्रकाशन “वॉयस ऑफ इंडिया” प्रकाशित किया । ये पुस्तक हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हैं । वे पाठकों को अपने प्रकाशन की ये पुस्तकें केवल लागत मूल्य पर ही उपलब्ध कराते थे ।

अपने लेखन से सतत राष्ट्रभाव जाग्रत करने वाले सीताराम जी गोयल 3 दिसम्बर 2003 को संसार से विदा हुये । उनका लेखन और उनका प्रकाशन आज भी सजीव है । इन दिनों यदि भारतीय मंदिरों को पुनर्प्रतिठित करने की बात उठ रही है तो इसमें सीताराम गोयल जैसे शोध कर्ताओं का ही योगदान है ।

डॉक्टर अम्बेडकर का आर्थिक दृष्टिकोण

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प्रहलाद सबनानी

आज भारत, पूरे विश्व में आर्थिक दृष्टि से एक सशक्त राष्ट्र बनकर उभर रहा है। वैश्विक स्तर पर कार्य कर रहे वित्तीय एवं निवेश संस्थान भारत की आर्थिक प्रगति की मुक्त कंठ से सराहना कर रहे हैं। भारत आज विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है और सकल घरेलू उत्पाद के मामले में विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तथा संभवत: आगामी दो वर्षों में ही जापान एवं जर्मनी की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ते हुए विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थ बनने की ओर भारत आज अग्रसर है। इसी प्रकार, भारत आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा शक्तिशाली देश भी बन चुका है एवं भारत का शेयर बाजार भी आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा पूंजी बाजार बन चुका है। भारत ने वर्ष 1947 में जब राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी तब भारत की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। परंतु, वर्ष 1991 के बाद भारत में आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में लागू किए सुधार कार्यक्रमों के बाद एवं विशेष रूप से वर्ष 2014 के बाद से भारत की आर्थिक विकास दर में लगातार सुधार हो रहा है एवं भारत आज उक्त स्थिति में पहुंच गया है। डॉक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर ने भी भारत द्वारा राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के आर्थिक विकास का सपना देखा था एवं अर्थशास्त्र विषय पर उनकी अपनी अलग सोच थी। यह देश का दुर्भाग्य था कि भारत की राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्हें आर्थिक क्षेत्र में काम करने का मौका ही नहीं मिला। अन्यथा, आज भारत की आर्थिक स्थिति और अधिक मजबूत बन गई होती।

डॉक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर को हम केवल भारत के संविधान निर्माता के रूप में ही जानते हैं। परंतु, उन्होंने अपनी स्नातक एवं पीएचडी की पढ़ाई विश्व के श्रेष्ठतम विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र विषय में ही की थी। अर्थशास्त्र उनका बचपन से ही पसंदीदा विषय रहा है। अर्थशास्त्र के विभिन्न विषयों पर उनके उल्लेखनीय शोध कार्य भी आज भी प्रासंगिक हैं। उक्त कारणों के चलते उनके सामाजिक कार्यों पर भी अर्थशास्त्र की छाप दिखाई देती थी। वे महिलाओं एवं दलितों को उद्यमी बनाने की बात करते थे तथा इस कार्य में तत्कालीन सरकार से इस संदर्भ में इन वर्गों की सहायता की अपील भी करते थे। उनका स्पष्ट मत था की आर्थिक उत्थान के बिना कोई भी सामाजिक एवं राजनैतिक भागीदारी संभव नहीं होगी। डॉक्टर साहेब ने जिन विषयों पर अपने शोध कार्य किए थे उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं – भारतीय मुद्रा (रुपए) की बाजार मूल्य (विनिमय दर) की समस्या, महंगाई की समस्या, भारत का राष्ट्रीय लाभांश, ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकास, प्राचीन भारतीय वाणिज्य, ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रशासन एवं वित्त, भूमिहीन मजदूरों की समस्या तथा भारतीय कृषि की समस्या। उक्त विषयों पर आपने केवल शोध कार्य ही सम्पन्न नहीं किया बल्कि इनसे सम्बंधित कई समस्याओं के व्यावहारिक एवं तार्किक हल भी सुझाए थे। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित प्राध्यापक श्री अंबीराजन जी ने मद्रास विश्वविद्यालय में अपने अम्बेडकर स्मृति व्याख्यान में कहा था कि अम्बेडकर उन पहले भारतीयों में से एक थे, जिन्होंने अर्थशास्त्र में औपचारिक शिक्षा पाई और एक पेशेवर की तरह ज्ञान की इस शाखा का अध्ययन और उपयोग किया। भारतीय अर्थशास्त्र की परम्परा प्राचीन है। भारत में सदियों पहले ‘अर्थशास्त्र’, ‘शुक्रनीति’ और ‘तिरुक्कुरल’ जैसे ग्रंथ लिखे गए जबकि पश्चिम में अर्थशास्त्र का औपचारिक शिक्षण, 19वीं सदी के मध्य में प्रारम्भ हुआ। यह देश का दुर्भाग्य रहा कि तत्कालीन सरकारों ने डॉक्टर साहब की अर्थ के क्षेत्र में गहन समझ एवं अधय्यन का लाभ नहीं उठाया।

डॉक्टर केशव बलीराम हेडगेवार जी ने उस खंडकाल में ही कई देशों में तेजी से पनप रहे पूंजीवाद के दोषों को पहिचान लिया था तथा पूंजीवाद का पुरजोर विरोध करते हुए उन्होंने भारत में राष्ट्रीयत्व को प्राथमिकता देने का आह्वान किया था। बाद में, पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने भारत को ‘एकात्म मानववाद’ का सिद्धांत दिया, इस सिद्धांत के आर्थिक पक्ष को उभारते हुए पंडित दीनदयाल जी कहते थे कि सत्ता में रहने वाले दल की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि समाज में पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक विभिन्न आर्थिक योजनाओं का लाभ पहुंचे, अन्यथा उस दल को सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। बाद के खंडकाल में श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी जी ने भी अर्थ को राष्ट्रीयत्व से जोड़ा था तथा इस संदर्भ में भारतीय नागरिकों में “स्व” के भाव को विकसित करने पर जोर दिया था। इसी प्रकार, डॉक्टर अम्बेडकर के आर्थिक दर्शन में भी लगभग यही दृष्टि दिखाई देती हैं। डॉक्टर साहेब भी आर्थिक एवं सामाजिक असमानता पैदा करने वाले पूंजीवाद के एकदम खिलाफ थे।

वर्ष 1923 में डॉक्टर अम्बेडकर ने लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स से डीएससी (अर्थशास्त्र) की डिग्री प्राप्त की थी। डीएससी की थीसिस का विषय था “The Problem of the Rupee – Its Origin and its Solution” और, आपने उस समय पर रुपए के अवमूल्यन जैसी गम्भीर समस्या पर अपना शोध कार्य सम्पन्न किया था, जो उस खंडकाल में सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विषय का शोध कहा जाता है। आपने वर्ष 1923 में ही वित्त आयोग की चर्चा करते हुए सुझाव दिया था कि वित्त आयोग का प्रतिवेदन प्रत्येक 5 वर्ष के अंतराल पर अवश्य आना चाहिए। साथ ही, लगभग इसी खंडकाल में आपने भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना का ब्लूप्रिंट तैयार करने में अपना योगदान दिया था। बाद में, भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉक्टर साहेब के इस योगदान को स्वीकार करते हुए अपनी स्थापना के 81 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में डॉक्टर अम्बेडकर के नाम पर कुछ सिक्के जारी किए थे।

डॉक्टर साहेब कृषि क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते थे और कृषि क्षेत्र के विकास के हिमायती थे। परंतु साथ ही, आप बड़े आकार के उद्योग के खिलाफ भी नहीं थे। आपका स्पष्ट मत था कि औद्योगिक क्रांति पर जोर देने के साथ साथ कृषि क्षेत्र को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि, देश की अधिकतम आबादी ग्रामों में निवास करती है एवं यह अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर है और फिर उद्योग क्षेत्र के लिए कच्चा माल भी तो कृषि क्षेत्र ही प्रदान करता है। आधुनिक भारत की इमारत कृषि क्षेत्र के विकास पर ही खड़ी हो सकेगी। इन्हीं विचारों के दृष्टिगत आपने कृषि क्षेत्र के पुनर्गठन के लिए क्रांतिकारी उपाय सुझाए थे। जैसे, कृषि योग्य भूमि के राष्ट्रीयकरण की आप वकालत करते थे। आप राज्य को यह दायित्व सौपने की सोचते थे कि राज्य नागरिकों के आर्थिक जीवन को इस प्रकार योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाए कि उससे नागरिकों की उत्पादकता का सर्वोच्चय बिंदु हासिल हो जाय, इससे इन नागरिकों की आय में वृद्धि होगी और उनका जीवन स्तर ऊपर उठाया जा सकेगा। साथ ही, निजी उद्योग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए और देश की सम्पदा का समाज में वितरण करने के भी प्रयास किए जाने चाहिए। कृषि के क्षेत्र में राजकीय स्वामित्व का नियोजन भी होना चाहिए ताकि सामूहिक रूप से खेती को बढ़ावा दिया जा सके तथा इसी प्रकार उद्योग के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कृषि एवं उद्योग क्षेत्रों के लिए आवश्यक पूंजी की व्यवस्था राज्य द्वारा की जानी चाहिए।

“Small Holdings in India and their Remedies” नामक शोधग्रंथ डॉक्टर अम्बेडकर ने वर्ष 1918 में लिखा था। यह शोधग्रंथ, भारत में किसानों के सम्बंध में जमीनी यथार्थ की व्याख्या करने में उनके कौशल और आर्थिक समस्याओं के लिए व्यावहारिक नीतियों का सुझाव देने में इनकी प्रवीणता को दर्शाता है। उनकी इस शोधपत्र में की गई व्याख्या आज भी भारत में कृषि क्षेत्र के लिए प्रासंगिक है। आपका विचार था कि श्रम, पूंजी और संयत्र – तीनों भारत में कृषि उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। पूंजी वस्तु है और श्रमिक व्यक्ति। पूंजी का यदि कोई उपयोग न किया जाय तो उससे कोई आय नहीं होती परंतु उस पर कोई खर्च भी नहीं करना पड़ता। परंतु, श्रमिक, चाहे वह आय का अर्जन करे अथवा नहीं, उसे जीवित रहने के लिए स्वयं पर व्यय करना होता है। यदि वह यह खर्च उत्पादन से नहीं निकाल पाता, जैसा कि होना चाहिए, तो वह लूटपाट करने को मजबूर हो जाता है। इसी प्रकार भारत में छोटी जोतों की समस्या, दरअसल, उसकी सामाजिक अर्थव्यवस्था की समस्या है। अतः इस समस्या का स्थाई हल खोजना ही चाहिए।

डॉक्टर साहेब द्वारा देश के आर्थिक विकास के संदर्भ में उस खंडकाल में दिए गए समस्त सुझाव आज की परिस्थितियों के बीच भी अति महत्वपूर्ण एवं उपयुक्त माने जाते हैं। वर्तमान समय में हालांकि कई प्रकार की आर्थिक समस्याओं का हल निकालने में सफलता हासिल हुई है परंतु फिर भी डॉक्टर साहेब द्वारा उस खंडकाल में किए गए शोधकार्यों एवं सुझावों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। जैसे, बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, गरीबी, आय की असमानता, भारतीय रुपए का अवमूल्यन आदि के उन्मूलन पर विचार डॉक्टर साहेब द्वारा आर्थिक विषयों पर किए गए शोधों में देखे जा सकते है। डॉक्टर साहेब ने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों एवं अपने शोधों को भारतीय समाज के लिए व्यावहारिक स्तर पर लागू करने के सम्बंध में अपने सुझाव रखे थे। डॉक्टर साहेब भारतीय समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को भारतीयता के अनुरूप लागू करना चाहते थे। यह उनकी सामाजिक आर्थिक संवेदना एवं सामाजिक एवं आर्थिक विषयों पर गहन वैचारिकी को प्रदर्शित करता है। डॉक्टर साहेब भारतीय आर्थिक व्यवस्था में भारतीय समाज में न्यायसंगत समानता, गरीबी का पूर्ण उन्मूलन, शून्य बेरोजगारी, नियंत्रित मुद्रा स्फीति, नागरिकों का आर्थिक शोषण नहीं होना एवं सामाजिक न्याय होना जैसी व्यवस्थाएं चाहते थे। यह व्यवस्थाएं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ के सिद्धांत के बहुत करीब हैं।

ईवीएम का विरोध, संसद ठप – सुधरने वाला नहीं है भारत का विपक्ष

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चार जून 2024 के लोकसभा चुनाव में पिछली बार की तुलना में मिली मामूली बढ़त से उत्साहित कांग्रेस को इसके तुरंत बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में अपने इंडी गठबंधन के साथ भारी पराजय का मुख देखना जिसके कारण ये अब गहरी निराशा व हताशा में हैं और उन्हीं हरकतों पर उतर आए हैं जो ये लोकसभा चुनावों से पहले कर रहे थे। कुछ राजनैतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे थे कि हरियाणा तथा महाराष्ट्र में भारी पराजय के बाद विपक्षी दल संसद चलाने में सहयोग करेंगे किंतु फिलहाल ऐसा होता प्रतीत नहीं होता कि संसद के शीततकालीन सत्र में कोई महत्वपूर्ण विधायी कार्य संपन्न हो सकेगा।

संसद के शीतकालीन सत्र का प्रथम सप्ताह अडाणी व संभल हिंसा को लेकर हंगामे की भेंट चढ़ चुका है। विपक्षी दल संसद में इसलिए भी बहस नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि जब संसद में बहस होने पर वे पूरी तरह बेनकाब हो जाते हैं। देश की जनता कांग्रेस को अडानी, संविधान व जातिगत जनगणना के मुद्दे पर लगातार नकार रही है किंतु कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार इन्हीं मुददों को लाल किताब जिसे वे संविधान की प्रति कहते हैं हाथ में लेकर बार -बार हवा में उछालते हैं। इन्हीं मुद्दों पर सदन को बाधित करते हैं।

दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के संविधान रक्षक सम्मेलन में राहुल गाँधी ने वही किताब दिखाते हुए कहा कि इसमें कहीं सावरकर का नाम नहीं है। इसी कार्यक्रम में बोलते हुए राहुल गांधी का माइक बंद हो गया और आदतन राहुल गाँधी इसके लिए भी मोदी सरकार को दोष देते हुए उसे तानाशाह बताने लगे। हर समय संविधान संविधान करने वाले राहुल गाँधी से अब पूछा जाना चाहिए कि संविधान की किताब में झूठे मुद्दे उठाकर संसद ठप करने की बात कहाँ लिखी गई है।

कांग्रेस और इंडी गठबंधन को लगातार मिल रही पराजय पर जब इन दलों के नेताओं को आत्मचिंतन करना चाहिए था उस समय ये ईवीएम मशीनों और चुनाव आयोग पर हमलावर हैं। कांग्रेस व विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट सहित देश की विभिन्न हाईकोर्ट में 42 याचिकाएं दायर कीं किंतु हर जगह उनके वकीलो को मुंह की खानी पड़ी । हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव परिणामों के बाद विरोधी दलों का ईवीएम पर आरोप लगाने का रेडियो एक बार फिर ऑन हो गया है। लोकसभा चुनावों के पहले भी अप्रैल माह में जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने सुनवाई करते हुए विपक्ष के सभी आरेपों को खारिज करते हुए कहाकि हमें भी वह दिन याद है जब बैलेट पेपर से चुनाव होते थे औेर पूरा का पूरा बूथ लूट लिया जाता था। हम अब देश को पुनः उस युग में नहीं ले जाना चाहते हैं। 26 नवंबर 2024 को भी सुप्रीम कोर्ट ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करने वाली एक याचिका पर न सिर्फ याचिकाकार्ता को कड़ी फटकार लगाई अपितु राजनैतिक दलों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि आप जब चुनाव हार जाते हैं तो ईवीएम खराब हो जाती है ओैर जीत जाते हैं तो चुप्पी। हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ना ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश विक्रम नाथ और पीबी वराले की पीठ ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

कोर्ट ने याचिकार्ता से पूछा कि यह याचिका दायर करने का शानदार विचार अपको कैसे मिला? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विरोधी दलों ने अब अतिविश्वसनीय ईवीएम मशीनों के खिलाफ नफरत की दुकान खोल ली है और यही कारण है कि अब कांग्रेस ने ईवीएम मशीनों के खिलाफ अभियान प्रारम्भ करने की घोषणा कर दी है जिससे वह जनता में इन मशीनों के प्रति भ्रम उत्पन्न कर सके। हारे हुए दल देश में राजनैतिक अराजकता का वातावरण उत्पन्न करना चाहते हैं। 2014 से 2024 तक राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी लगभग 47 चुनाव बुरी तरह से हारी चुकी है और अब गांधी परिवार की नाकामी छुपाने के लिए ईवीएम विरोधी अभियान प्रारम्भ कर रही है। कांग्रेस की देखादेखी महाराष्ट्र की शिवसेना- उद्धव गुट व शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने भी ईवीएम के खिलाफ अभियान प्रारम्भ कर दिया है। शिवसेना उद्वव गुट ने तो अपने हारे हुए उम्मीदवारों से पांच प्रतिशत वीवीपैट से मिलान करवाने के लिए याचिकाएं दायर करवाने के लिए कह दिया है। शरद पवार के भतीजे रोहित पवार भी चुनावों को ईवीएम से हाईजैक कराने का आरोप लगा रहे हैं।

आज वही कांग्रेस ईवीएम का विरोध कर रही है जिसकी 2004 से 2014 तक ईवीएम द्वारा चुनी गई सरकार रही। यह वही कांग्रेस पार्टी है जो अभी 4 जून 2024 को 99 सीटों पर ईवीएम द्वारा विजयी होने के बाद राहुल गाँधी को शैडो पीएम बता रही थी। बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर पंजाब व दिल्ली विधानसभा में आप पार्टी की सरकार ईवीएम से ही बनी है यही नहीं जम्मू कश्मीर में भी आप पाटी का खाता ईवीएम से ही खुला है। झारखंड में हेमंत सोरेन व जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार ईवीएम से ही वापस आई है। अगर बीजेपी को ईवीएम हैक करवानी होती तो वह उन सभी राज्यों में भी हैक करवा सकती थी जहां विरोधी दलों की सरकारें हैं । उत्तर प्रदेश के दोनों पूर्व मुख्यमंत्री क्रमशः अखिलेश यादव औैर बसपा नेत्री मायावती भी अब ईवीएम का खुलकर विरोध करने लग गये हैं। 4 जून 2024 को चुनाव परिणाम आने के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बयान दिया था कि अगर बैलेट पेपर से चुनाव होते तो वह यूपी की सभी 80 सीटों पर सफलता प्राप्त करके दिखाते। उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में सपा नौ विधानसभा सीटों में से केवल दो सीटें ही जीत पाई उस पर सपा मुखिया बयान दे रहे हैं कि ईवीम मशीनों की वजह से ही भाजपा सात सीटें जीतने में कामयाब रही वहीं बसपा नेत्री मायावती का कहना है कि अब वह कोई उपचुनाव नहीं लड़ेंगी क्योंकि सभी चुनाव धांधली से हो रहे है।

स्मरणीय है कि निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2017 में ईवीएम मशीनों को हैक करके दिखाने के लिए भरपूर अवसर दिया था किंतु कोई भी विरोधी दल उस हेकाथॉन में नहीं पहुंचा था। आप नेता सौरभ भारद्वाज ने एक बार दिल्ली विधानसभा में ईवीएम को हैक करके दिखाने का असफल प्रयास किया था। आज जो लोग संविधान रक्षक बनने का नाटक रच रहे हैं वास्तव में वही लोग संविधान के भक्षक हैं। यह सभी लोग चाहते हैं कि मतदान प्रक्रिया के दौरान कि मुस्लिम महिला का बुर्का उठाकर उसकी पहचान न की जाये क्योंकि बुर्के की आड़ में इनका फर्जी वोट पड़ता है । ये लोग एक समय में मतदाता पहचान पत्र का भी विरोध करते थे और उसमें फोटो लगाने का भी विरोध किया था, यही लोग हैं जो आधार कार्ड को मतदाता सूची से जोड़ने के भी विरोधी हैं। जनता द्वारा नकारा गया कांग्रेस का गांधी परिवार किसी न किसी तरह एक बार फिर सत्ता का नियंत्रण चाहता है औेर यही कारण है कि यह परिवार बार बार भारत की चुनाव प्रक्रिया तथा चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने का असफल प्रयास कर रहा है ।

ये देखना हास्यास्पद है कि वही राहुल गांधी और उनकी पार्टी ईवीएम विरोधी यात्रा की घोषणा कर रहे हैं जिन्होंने ईवीएम से ही वायनाड और रायबरेली का चुनाव जीता, जिनकी बहन प्रियंका गांधी ने वायनाड से उपचुनाव जीता, जिनको लोकसभा में इसी ईवीएम से 99 सीट प्राप्त हुयीं । ऐसे में राहुल एंड कंपनी से एक ही प्रश्न पूछा जाना चाहिए क्या ईवीएम विरोधी आन्दोलन से पहले राहुल, प्रियंका और उनके बाकी सांसद/ विधायक आदि अपनी अपनी सीटों से त्यागपत्र देंगे क्योंकि ईवीएम से जीते गए चुनावों में तो घोटाला हुआ है।

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