Chairman IFFCO Shri. Dileep Sanghani Announced Shri. K J Patel as the new Managing Director of IFFCO

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–Chairman IFFCO Shri Dileep Sanghani, announced Shri K. J Patel as the new Managing Director of IFFCO. Mr. Patel was holding the position Director Technical IFFCO and brings with him a wealth of experience in the fertilizer industry. Shri. K. J Patel holds a Mechanical Engineers from Saurashtra University and has a rich experience of more than 32 years in maintenance of Nitrogenous & Phosphatic fertiliser plants. He is recognized for his strong track record of driving operational excellence and sustainable growth. He was heading the IFFCO Paradeep Plant, the biggest complex fertiliser plant in India.

Shri. Sanghani welcomed Shri. K J Patel as the new Managing Director and said that Shri. Patel brings deep industry knowledge, proven strategic thinking approach that aligns with goals of IFFCO. Further, he added that the board is confident that Shri. K J Patel will steer IFFCO into a new era of Innovation and value creation & IFFCO will continue to build on its strong foundation and continue to work towards the welfare of farmers & cooperatives.

Shri. Dileep Sanghani also thanked the outgoing MD Dr. U S Awasthi for his invaluable contribution & dedication to IFFCO & Farmers across the Country.

IFFCO is ranked World’s No.1 Cooperative (with respect to ratio towards contribution to GDP) according to World Cooperative Monitor (WCM) Report published by EURCISE and International Cooperative Alliance (ICA), the premier International cooperative body.

बिहार की सोशल मीडिया सनसनी सीमा कुशवाहा का राजनीतिक भविष्य

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पटना। सीमा कुशवाहा बिहार के रोहतास जिले से ताल्लुक रखने वाली एक चर्चित राजनीतिक और सोशल मीडिया हस्ती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सामाजिक कार्यों और स्थानीय राजनीति से की और रोहतास जिला परिषद की पूर्व सदस्य रह चुकी हैं। उनकी सोशल मीडिया उपस्थिति ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई है, जहां फेसबुक पर उनके 15 लाख से अधिक, इंस्टाग्राम पर 5 लाख और यूट्यूब पर लाखों फॉलोअर्स हैं। उनकी रील्स और तस्वीरें भोजपुरी और बॉलीवुड हस्तियों को टक्कर देती हैं, जिससे युवाओं और कुशवाहा समुदाय में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है।

सीमा कुशवाहा का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने 2020 में उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा में प्रदेश महासचिव के रूप में काम किया, लेकिन टिकट न मिलने पर पार्टी छोड़ दी। इसके बाद वे मुकेश साहनी की वीआईपी पार्टी में शामिल हुईं और 2023 में बिहार महिला प्रकोष्ठ की उपाध्यक्ष बनीं। हालांकि, वहां भी स्थायित्व नहीं मिला, और अब वे आरजेडी के साथ जुड़ी हैं, जहां वे तेजस्वी यादव के साथ मंच साझा करती नजर आती हैं।

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में करगहर विधानसभा सीट से उनकी उम्मीदवारी की चर्चा थी, लेकिन यह सीट कांग्रेस की सिटिंग सीट है, और कांग्रेस इसे छोड़ने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर, जदयू ने नीतीश कुमार के करीबी, हाल ही में वीआरएस लेने वाले आईएएस अधिकारी दिनेश कुमार राय को इस सीट से उतारने का फैसला किया है, जो कुर्मी समुदाय से हैं और नीतीश के विश्वासपात्र माने जाते हैं।

सीमा कुशवाहा का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित दिखता है। उनकी सोशल मीडिया लोकप्रियता और कुशवाहा समुदाय में पकड़ उन्हें मजबूत बनाती है, लेकिन बार-बार दल-बदल और टिकट न मिलने की स्थिति उनकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है। यदि आरजेडी उन्हें वैकल्पिक सीट देती है, तो उनकी युवा अपील और सामाजिक जुड़ाव जीत की संभावना बढ़ा सकता है। हालांकि, जदयू और कांग्रेस जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के सामने उनकी राह कठिन है। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने सोशल मीडिया प्रभाव को वोटों में बदल पाती हैं या नहीं।

अकादमिक ईमानदारी: स्व-मूल्यांकन का दर्पण

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दिल्ली। अकादमिक जगत में ईमानदारी केवल शब्दों का जाल नहीं, बल्कि एक कठिन स्व-मूल्यांकन की प्रक्रिया है। एक अकादमिक व्यक्ति के रूप में हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए: अंतिम बार हमने कब किसी प्रतिष्ठित जर्नल में अपना शोध पत्र भेजा, जो बेनामी पियर रिव्यू की कसौटी पर खरा उतरा और प्रकाशित हुआ?

यह प्रश्न विशेष रूप से उन स्थापित विद्वानों के लिए महत्वपूर्ण है, जो पचास की उम्र पार कर चुके हैं और अकादमिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके हैं। यह कसौटी न केवल उनकी विद्वता को परखती है, बल्कि उनकी ईमानदारी को भी सामने लाती है।

अकादमिक ईमानदारी का अर्थ है अपने कार्य को निष्पक्षता और कठोरता के साथ प्रस्तुत करना, न कि केवल दोस्तों या संपादकों के निमंत्रण पर लेख प्रकाशित करवाना। प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां लेखक का नाम नहीं, बल्कि शोध की गुणवत्ता और मौलिकता महत्व रखती है। यह प्रक्रिया हमें हमारी कमियों को दर्शाती है और हमें बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है। परंतु, अक्सर अकादमिक जगत में देखा जाता है कि कुछ विद्वान इस कठिन रास्ते से बचते हैं और इसके बजाय अकादमिक राजनीति या प्रभाव का सहारा लेते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल व्यक्तिगत विश्वसनीयता को कम करती है, बल्कि पूरे अकादमिक समुदाय की साख को भी खतरे में डालती है।

अकादमिक ईमानदारी का असली मापदंड स्वयं के प्रति सच्चाई में निहित है। जब हम अपने कार्य को कठोर पियर रिव्यू के लिए प्रस्तुत करते हैं, तो हम न केवल अपने शोध को, बल्कि अपनी नैतिकता को भी परखते हैं। यह प्रक्रिया हमें यह सिखाती है कि सच्चा विद्वान वही है, जो अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए। सोशल मीडिया पर उपदेश देना या अकादमिक राजनीति में लिप्त होना आसान है, लेकिन प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशन के लिए कठिन परिश्रम और ईमानदारी की आवश्यकता होती है।

इसलिए, प्रत्येक अकादमिक व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं को इस दर्पण में देखे। यदि रत्ती भर भी ईमान बाकी है, तो वह अपने कार्य को निष्पक्षता से परखेगा और सच्चाई के रास्ते पर चलकर ही शांति पाएगा। यह आत्म-मूल्यांकन न केवल व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देता है, बल्कि अकादमिक जगत को भी अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाता है।

बिहार में पंचायत स्तर पर पारदर्शिता की क्रांति: क्या कोई राजनीतिक दल उठाएगा यह जोखिम?

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पटना। बिहार, एक ऐसा राज्य जहां की मिट्टी में मेहनत और संघर्ष की कहानियां बसी हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों ने इसकी प्रगति को बार-बार बाधित किया है। क्या होगा अगर बिहार में कोई राजनीतिक दल पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल कायम कर दे, ठीक वैसे ही जैसे एक दौर में सूचना के अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ताओं ने देश भर में गड़बड़ियों को उजागर किया था? यह एक ऐसा सवाल है जो बिहार की राजनीति और समाज को नई दिशा दे सकता है।

कल्पना करें कि किसी राजनीतिक दल के प्रखंड स्तर के कार्यकर्ता अपने निर्वाचित मुखिया, वार्ड सदस्यों और पंचायत प्रतिनिधियों से हिसाब-किताब मांगना शुरू कर दें। वे पंचायत की बैठकों में खर्चों का ब्यौरा मांगें, ठीक उसी तरह जैसे आरटीआई के जरिए भ्रष्टाचार के पर्दे उठाए गए थे। अगर ये कार्यकर्ता अंचल कार्यालयों में हेल्प डेस्क बनाकर ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान करें, जमीन विवाद से लेकर सरकारी योजनाओं के लाभ तक पहुंचाने में मदद करें, तो यह एक क्रांतिकारी कदम होगा। इससे न केवल जनता का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।

सबसे जोखिम भरा लेकिन प्रभावशाली कदम होगा पंचायत में हुए खर्चों का हिसाब सार्वजनिक करना। अगर हर वार्ड में एक बोर्ड लगे, जहां विकास कार्यों का पूरा ब्यौरा—कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ—लिखा हो, तो यह पारदर्शिता की मिसाल बनेगा। इसके साथ ही, अगर कार्यकर्ता पंचायत के कार्यों का वीडियो बनाकर अच्छे-बुरे पहलुओं को जनता के सामने लाएं, तो यह न केवल गड़बड़ियों को रोकेगा, बल्कि जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करेगा। यह काम जोखिम भरा है, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को अक्सर धमकियां और विरोध का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर अगले दो महीनों, यानी सितंबर 2025 तक, कोई दल बिना डर के यह कर दिखाए, तो बिहार में सैकड़ों ‘नायक’ सामने आ सकते हैं।

सवाल यह है कि क्या बिहार में कोई राजनीतिक दल इस जोखिम को उठाने को तैयार है? अगर कोई दल अगले पांच साल तक ईमानदारी से काम करे, रिश्वतखोरी को पूरी तरह त्याग दे, और केवल सही सवाल उठाकर जवाबदेही सुनिश्चित करे, तो बिहार की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकती हैं। पांच साल तक रिश्वत न लेने से कोई धनकुबेर मर नहीं जाएगा, लेकिन इससे बिहार की जनता को वह विकास और सम्मान मिलेगा, जिसकी वह हकदार है।

यह आसान नहीं होगा। भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं, और स्थानीय स्तर पर सत्ता का दुरुपयोग आम है। फिर भी, अगर कोई दल यह संकल्प ले कि वह पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी ताकत बनाएगा, तो वह न केवल जनता का विश्वास जीतेगा, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिखेगा। क्या बिहार का कोई दल इस चुनौती को स्वीकार करेगा, या यह केवल एक सपना बनकर रह जाएगा? समय और साहस ही इसका जवाब देंगे।

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