सम्मानित हुए अन्नपूर्णा के महाप्रबंधक मनोज

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न्यूयॉर्क (यूएसए) – न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के सदस्य डेविड आई. वेप्रिन ने मीडिया प्रबंधन में उत्कृष्ट कार्य कौशल और दूरदर्शी नेतृत्व प्रदान करने के लिए अन्नपूर्णा मीडिया नेटवर्क के महाप्रबंधक मनोज बासनेट को सम्मानित किया है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, वेप्रिन ने उन्हें अमेरिका के न्यूयॉर्क से संचालित मीडिया हाउस त्रिवेणी टाइम्स की अनुशंसा पर एक लिखित प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया।

15 वर्षों तक बासनेट के उत्कृष्ट कार्य कौशल और दूरदर्शी मीडिया प्रबंधन ने अन्नपूर्णा मीडिया नेटवर्क को एक अग्रणी नेपाली मीडिया हाउस के रूप में प्रसिद्ध बनाने में अतुलनीय योगदान दिया है। वेप्रिन द्वारा लिखित रूप में दिए गए सम्मान पत्र में कहा गया, ‘इसके लिए मैं बासनेट का सम्मान करता हूं।’ उन्होंने नेपाल में एक लोकप्रिय, उत्कृष्ट और प्रभावशाली मीडिया हाउस के रूप में अन्नपूर्णा मीडिया नेटवर्क की प्रशंसा की।

वेप्रिन पहली बार 2010 में न्यूयॉर्क राज्य विधानसभा के लिए चुने गए थे। तब से वह हर चुनाव में विधानसभा सदस्य का चुनाव जीतते आ रहे हैं। वह न्यूयॉर्क राज्य बीमा समिति के अध्यक्ष, बैंक की समिति, न्यायपालिका की समिति, एशियाई प्रशांत अमेरिकी यातायात बल सहित राज्य की विभिन्न समितियों के सदस्य के रूप में काम कर रहे हैं।

गंगा पर बोल बौने होंगे राज ठाकरे

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संजय स्वामी

गंगा तो गंगा है। गोमुख उद्गम से लेकर कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना होते हुए कोलकाता के निकट गंगासागर तक अनवरतअनथक यात्रा करते हुए बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है। सभी स्थानों पर गंगा गंगा ही है। भागीरथ जब स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाए थे तब भी गंगा गंगा थी और आज हम सभी गंगा के लिए जो कुछ कर रहे हैं तब भी गंगा गंगा ही है। गंगा ने स्वरूप बदला या हमने उसका स्वरूप बदल दिया यह प्रश्न विचारणीय है! परंतु नहीं बदला तो गंगा का नाम नहीं बदला। असंख्य श्रद्धालुओं की भावना नहीं बदली, विश्वास नहीं डिगा, श्रद्धा न्यून नहीं हुई।

हां, कुछ अंतर है तो गंगा के पानी में अंतर है। जो गंगा का पानी गोमुख, गंगोत्री, ऋषिकेश तक है; वैसा ही निर्मल उतना ही गुणवत्ता पूर्ण गंगा का पानी कानपुर, बनारस, पटना या कोलकाता में होगा यह जरूरी नहीं। जिस प्रकार से घर की छत के ऊपर स्थापित पानी की टंकी में पानी एक ही होता है परंतु अलग-अलग स्थान पर उस पानी का प्रयोग हमारी भावना को बदल देता है। पाइप में एक ही पानी है वही रसोई घर में प्रयोग होता है और वही शौचालय में। तो क्या हम शौचालय के नल से पानी लेकर उसे पी सकते हैं ? या शौचालय का मग्गा लाकर रसोई में प्रयोग कर सकते हैं ? अर्थात पानी तो एक है स्थान तथा प्रयोग के कारण से उसका स्वरूप और भावना परिवर्तित हो जाती है।

इसी प्रकार से गंगा तथा उसके प्रवाह में जिस स्थान पर मालिन जल का नाला आकार सम्मिलित हो रहा है वहां के कुछ किलोमीटर के क्षेत्र में उसका पानी प्रदूषित हो जाता है। पूरे गंगा के प्रवाह में अनेक नगरों महानगरों में मालिन जल के नाले गंगा में सम्मिलित होते हैं। उस निश्चित स्थान पर गंगा का पानी प्रदूषित हो जाता है। परंतु 2000 किलोमीटर से अधिक प्रवाहमान पूरी गंगा ही अपवित्र या प्रदूषित हो गई ऐसी धारणा या बयान अपरिपक्व मानसिकता को दर्शाता है। गंगा स्वच्छता मिशन के अंतर्गत सरकारी तथा अ सरकारी स्तर पर गंगा के जल को प्रदूषण मुक्त रखने निमित्त अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या तथा आवश्यकताओं की दृष्टि से और भी अधिक तेजी से प्रयास करने की आवश्यकता है। परंतु राज ठाकरे जैसे राजनेता का यह कहना कि “गंगा का पानी साफ नहीं मैं इस छू भी नहीं सकता” यह उनकी मानसिकता को दर्शाता है। सत्य यह भी है कि हमारे देश में अनेक नेताओं को बड़बोलेपन की आदत है। अब आदत से लाचार हैं तो फिर उत्साह में कुछ भी बयान दे देते हैं। विडंबना, जो गंगा निकट गए नहीं, गंगा में स्नान नहीं किया, भारत की जल संस्कृति को नहीं समझा, गंगा के बारे में लिखें ऋषि महात्माओं विद्वानों के साहित्य का अवगाहन नहीं किया, वे नदियों के बारे में अनर्गल बातें करते हैं। इसलिए उनके बयानों का कोई औचित्य नहीं।

मेरा पत्रकारों से भी निवेदन है कि पीत पत्रकारिता से बचें। ऐसे नेताओं के भाषणों को कोई तवज्जो न दें, जो देश की संस्कृति, परंपराओं, श्रध्दा केंद्रों का तिरस्कार करते हों। संपादक मंडल इस तरह के फिजूल के समाचार अपने समाचार पत्र में छाप कर अपने समाचार पत्रों की प्रतिष्ठा को हल्का न करें। अपने पाठक वर्ग को निराश न करें। नेताओं का तो कुछ बिगड़ता नहीं। वे कभी भी बयान बदल लेंगे। या आरोप लगा देंगे कि मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। परंतु पाठकों ने जिस समाचार पत्र को यदि एक बार ठुकरा दिया उसको पुनः प्रतिष्ठा पाने में बहुत लंबा समय लग जाता है। जिस प्रकार से प्रभाष जोशी के एक ही संपादकीय से जनसत्ता धाराशाई हो गया था। सावधान रहें, सुधि पाठक सर्वत्र दृष्टि रखता है।

राष्ट्रों की विभिन्नता उनकी अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण है। प्रत्येक देश की अपनी अलग संस्कृति तथा परंपराएं होती है। वही उसकी पहचान होती है। नदियां देवी स्वरूपा हैं। भारतीय मनीषा ने उनको मां के रूप में महत्व दिया है। मां सर्वदा देती है। नदियां करोड़ों लोगों तथा असंख्य जीव जंतुओं की प्यास बुझाती हैं। उनके जल से खेतों में सिंचाई होती है। सभी के लिए अनाज, फल, सब्जियां आदि की उपज होती है, वन्यजीवों को संरक्षण मिलता है।

क्या नदियों ने स्वयं अपने आपको प्रदूषित किया है ? मानवीय क्रियाकलापों से नदियां प्रदूषित हुई हैं। मनुष्य की अनदेखी, उपेक्षा की नदिया शिकार हैं। मनुष्य की भोगवादी प्रवृत्ति से नदियां सिसक रही हैं। नदियों ने स्वयं पर अतिक्रमण नहीं किया सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तर पर नदियों के डूब क्षेत्र पर अतिक्रमण हो रहा है और आरोप नदियों पर लग रहा है?

आवश्यकता मानवीय विवेक के जागरण की है। नदियों में स्नान करें या न करें यह आपकी इच्छा, विवेक पर निर्भर है। नदियों में मात्र सामान्य रूप से स्नान करें। शैंपू, साबुन का प्रयोग न करें नदियों के किनारे मल मूत्र विसर्जन न करें। अपने पुराने कपड़ों को नदियों के घाट पर न छोड़े। स्नान के पश्चात घाट से पर्याप्त दूरी पर ही कपड़े आदि धोने चाहिए। नदियों को आपसे फुल, माला, धूप, अगरबत्ती आदि की अपेक्षा नहीं है। नदियों की पूजा उनके किनारे बैठकर ईश्वर का ध्यान करें बहते हुए जल को देखें। उनमें कोई भी सामग्री प्रवाहित करने की आवश्यकता नहीं। नदियों में नौका विहार करते हुए कोई खाद्य पदार्थ खाएं उनके खाली रैपर, पॉलिथीन, खाली पानी/ कोल्ड ड्रिंक की बोतलें नदियों में नहीं फैंकनी चाहिए। नदियां स्थल मंडल की नस नाड़ियां हैं। प्रकृति के स्वास्थ्य की दृष्टि से उनके प्रवाह हो हमें अपनी अविवेकी आदतों से अवरुद्ध नहीं करना चाहिए।

(लेखक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संयोजक, पर्यावरण हैं)

सब यादव के चाहने वाले थे, यादव परिवार का कोई नहीं!

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बसावन

फ्रैंक हुज़ूर, जिनका असली नाम मनोज यादव था, का जन्म बिहार के बक्सर में हुआ था जाति व्यवस्था के कटु आलोचना के साथ फ्रैंक हुज़ूर ने न सिर्फ जातिवाद के खिलाफ कलम चलाई, बल्कि अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में भी जाति की बेड़ियों को तोड़ते हुए अंतरजातीय विवाह किया। समाजवादी और प्रगतिशील विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने अपना नाम बदलकर फ्रैंक हुज़ूर रख लिया। फ्रैंक हुज़ूर ने सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची में अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया और बाद में हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में शिक्षा प्राप्त की दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान, उन्होंने नाटक और पत्रकारिता में गहरी रुचि दिखाई। फ्रैंक हुज़ूर ने कई प्रमुख हस्तियों पर पुस्तकें लिखीं, जिनमें शामिल हैं: इमरान खान: उन्होंने “Imran vs Imran: The Untold Story” शीर्षक से इमरान खान की जीवनी लिखी, जो उनकी राजनीतिक यात्रा को उजागर करती है।

मुलायम सिंह यादव: फ्रैंक हुज़ूर ने समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव जीवनी पर “Mulayam Singh Yadav: The Socialist” लिखकर कार्य किया, जिससे उनकी राजनीतिक विचारधारा को समझने में सहायता मिलती है। अखिलेश यादव: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जीवनगाथा “Tipu Story” लिखी, जो उनकी राजनीतिक यात्रा को दर्शाती है। हिटलर: उनकी पुस्तक “Hitler in Love with Madonna” एक नाटक है, जो हिटलर के जीवन के अनछुए पहलुओं को प्रस्तुत करती है। लालू प्रसाद यादव:- फ्रैंक हुज़ूर ने लालू प्रसाद यादव पर आधारित एक नाटक लिखा था जिसका शीर्षक था “स्टाइल है लालू की ज़िंदगी”। यह नाटक बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के जीवन से प्रेरित था और उनकी शैली को रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है। फ्रैंक हुज़ूर “सोशलिस्ट फैक्टर” नामक मासिक अंग्रेज़ी पत्रिका के संपादक थे, जो प्रगतिशील समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारों का मंच बनी। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाजवादी मूल्यों को बढ़ावा दिया और उत्पीड़ित वर्गों की आवाज़ को बुलंद किया, बाद के दिनों में अपने आर्थिक हालातों के चलते उन्हें ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ पत्रिका बन्द करनी पड़ी! फ्रैंक हुज़ूर की लड़ाई अब खत्म नहीं हुई, अब यह जिम्मेदारी उन सभी पर है, जो सच में सामाजिक न्याय और इंसाफ में यकीन रखते हैं! फ्रैंक हुज़ूर अपने पीछे पत्नी मुक्ता सिंह और 10 साल के बेटे मार्कोस को छोड़ गए हैं। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी सामाजिक न्याय, समाजवादी विचारधारा और पिछड़ों-दलितों के अधिकारों के लिए लगा दी लेकिन आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं, तो क्या वे नेता, जिनके लिए उन्होंने लिखा, उनके परिवार का ख्याल रखेंगे?

पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी को हाफ-यादव क्यों कह रहे हैं बिहार के लोग

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बिहार में तेजस्वी को हाफ-यादव कहा जाने लगा है। प्रदेश के यादव परिवारों में अब जैसी लालू प्रसादजी की लोकप्रियता थी। वह तेजस्वी की नहीं रही। इसकी एक वजह रशेल गोडिन्हो से उनकी शादी है। उनके मामा और चाचा परिवार के लोग इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। अभी भी बिहार के हिन्दू ओबीसी परिवारों में शादी को दो लोगों का नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। यहां जाति और गोत्र को बहुत महत्व मिलता है। तेजस्वी की शादी में ना गोत्र देखा गया और ना ही जाति मिलाई गई। बताया जाता है कि इस शादी के लिए परिवार (संयुक्त) तैयार नहीं था।

अब यदुवंशी राजकुमार क्रिश्चियन परिवार में शादी करके आया है तो यादव समाज के बीच इसको लेकर बात तो होगी ही। अभी बिहार का समाज ऐसी शादियों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

इससे पहले भी लालूजी ने अपना उत्तराधिकार बड़े बेटे को ना देकर छोटे बेटे को दिया, उस समय भी परिवार के बीच इस बात को लेकर चर्चा हुई थी कि बड़े बेटे के जीवित रहते छोटे बेटे को राजनीतिक उत्तराधिकार देना यदुवंशी परंपरा नहीं है। माता पिता के जीवित रहते, अब तेजस्वी अपनी पसंद से क्रिश्चियन बहू ले आया है।

ओबीसी समाज के बीच तेजस्वी के उप मुख्यमंत्री बनते ही कन्वर्जन बढ़ा और हिन्दू समाज को लेकर पार्टी के अंदर खूब अनर्गल बयानबाजी हुई। श्रीराम और श्रीरामचरित मानस को लेकर अपशब्द कहने वाले नेता तेजस्वी के सबसे प्रिय नेताओं में आज भी शामिल हैं। राजद के अंदर जो नेता ऐसे बयान दे रहे थे, बिहार के क्रिश्चियन लॉबी से भी उन्हें पूरा समर्थन मिल रहा था। यही लॉबी बिहार में तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एकजुट है।

अब बिहार के यादवों के बीच ही यह बात हो रही है कि जो लालू प्रसादजी अपनी बेटी के प्रेम विवाह के लिए तैयार नहीं थे, अचानक बेटे के समय ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने अपनी सहमति दे दी। क्या अपने ही परिवार के अंदर लालू प्रसाद अब कमजोर पड़ गए हैं?

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