मुस्लिम नेतृत्व के आक्रामक प्रचार और वोट जिहाद की अपीलों के बीच भविष्य की राजनीति का संकेत

bjp-maharashtra-232632476-16x9_0.jpg.webp

महाराष्ट्र और झारखण्ड विधान सभा एवं 13 अन्य प्रदेशों की रिक्त 36 विधानसभा सीटों केलिये संपन्न उपचुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत की राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण और कट्टरपंथ की आक्रामकता से संचालित नहीं होगी । लेकिन यह संकेत भी दिया है कि आने वाला समय भारतीय सामाज जीवन केलिये सामान्य नहीं होगा और कट्टरपंथी शक्तियाँ कुछ नया प्रपंच भी कर सकतीं हैं।

हाल ही संपन्न चुनाव महाराष्ट्र और झारखंड में सरकार बनाने के लिये, लोकसभा के दो एवं तेरह प्राँतों में विधानसभा की 36 सीटों केलिये उपचुनाव हुये । प्रथम दृष्टया इनके परिणाम उतने असामान्य नहीं लगते जितना चुनाव प्रचार अभियान में असामान्य बनाने का प्रयास हुआ था । महाराष्ट्र और झारखंड दोनो प्राँतों के सत्तारूढ़ गठबंधनों ने अपेक्षाकृत अधिक बहुमत से सत्ता में वापसी की। जबकि अन्य सभी प्राँतों की 46 रिक्त विधानसभा सीटों पर भी उन प्राँतों के सत्तारूढ दलों को सफलता मिली । इनमें भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 26 एवं कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को 20 सीटें मिलीं। इन परिणामों की तुलना यदि पिछले परिणाम से करें तो भाजपा गठबंधन को नौ सीटों का लाभ हुआ और विपक्ष को सात सीटों का नुकसान।

लेकिन ये परिणाम वैसे साधारण नहीं हैं जैसे प्रथम दृष्टि में दिखाई दे रहे हैं। विशेषकर महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा एवं उत्तर प्रदेश विधानसभा की रिक्त नौ सीटों केलिये हुये उपचुनाव परिणाम ने भारत की भावी राजनीति के एक संदेश दिया है । इन परिणामों ने उस धुँध को छाँट दिया है जो मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनैति करने वाले राजनैतिक दलों ने फैलाने का प्रयास किया था । उनके साथ कुछ मुस्लिम धर्मगुरु, कट्टरपंथी सामाजिक संगठन और एक विचार विशेष केलिये काम करने वाले कुछ पत्रकार भी साथ थे । चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच मुस्लिम तुष्टीकरण की मानों कोई स्पर्धा चल रही थी । यह मुस्लिम तुष्टीकरण की पराकाष्ठा ही तो है कि मतदान के दिन कोई राजनैतिक दल यह मांग करे कि मुस्लिम महिला मतदाता की पहचान बुरका उठाकर न की जाय । इन सबने प्रचार अभियान में ऐसा वातावरण बना दिया था मानों हार जीत का फैसला केवल मुस्लिम मतदाता ही करने वाले हैं। इसका लाभ दो प्रकार की शक्तियों ने उठाया । एक वे कट्टरपंथी शक्तियाँ जो मुसलमानों को सदैव राष्ट्र की मूलधारा से अलग रखकर कट्टर और आक्रामक बनाये रखने के बहाने खोजतीं हैं, और दूसरी भारत विरोधी वे अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ जो भारत के सामाजिक जीवन में अशान्ति उत्पन्न करके विकास की गति अवरुद्ध करना चाहतीं हैं । इन दिनों आर्थिक, सामरिक, तकनीकि और अंतरिक्ष अनुसंधान में भी भारत की गति तीब्र हुई है । इस विकास गति को रोकने केलिये सामाजिक अशांति उत्पन्न करने केलिये अंतराष्ट्रीय स्तर पर षड्यंत्र किये जा रहे हैं। इन दोनों प्रकार की शक्तियों ने इस चुनाव अभियान पूरी तरह साम्प्रदायिक मोड़ देने का प्रयत्न किया। कहीं “बटेंगे तो कटेंगे” नारे को मुद्दा बनाकर मुसलमानों में भ्रमित करने का प्रयास किया, कहीं “एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे” नारे पर भ्रम फैलाकर मुसलमानों से भाजपा के विरुद्ध वोट करने का आव्हान किया । लेकिन परिणामों ने सबके कुचक्र को उलटकर रख दिया और भाजपा गठबंधन को पहले से अधिक शक्ति प्रदान की । कुछ क्षेत्रों में साम्प्रदायिक मानसिकता का प्रभाव अवश्य देखा गया उसकी झलक उन क्षेत्रों के मतदान पर देखी गई । लेकिन अधिकांश मतदाताओं ने तुष्टीकरण, मुस्लिम कट्टरपंथ एवं छ्द्म सेकुलरों के कुचक्र को नकार कर राष्ट्र के विकास और सकारात्मक मुद्दों को प्राथमिकता देकर भाजपा गठबंधन को प्राथमिकता दी।

महाराष्ट्र चुनाव परिणाम : एक दृष्टि

महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं। इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में महायुति गठबंधन को 235 और काँग्रेस के नेतृत्व वाले महाविकास अघाड़ी गठबंधन को 47 सीटों पर जीत मिली। समाजवादी पार्टी को दो और औबेसुद्दीन ओबैसी की एआईएमआईएम को एक सीट मिली । तीन सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीतीं। परिणाम के बाद इन तीनों निर्दलीयों ने भारतीय जनता पार्टी को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी । इस प्रकार अब महाराष्ट्र विधान सभा में महायुति गठबंधन कुल 238 विधायकों की शक्ति के साथ सरकार में आई है । (इसके अंतर्गत भारतीय जनता पार्टी को 132, शिवसेना को 57, अजित पवार की एनसीपी को 41 और तीन निर्दलीय हैं)। जबकि दूसरी ओर महाविकास आघाड़ी गठबंधन में उद्धव ठाकरे की शिवसेना 20, कांग्रेस को 16 और शरद पवार की एनसीपी को 10 सीटें और समाजवादी पार्टी को दो सीटें मिली हैं। वोट प्रतिशत और सीट दोनों दृष्टि से भाजपा ने इस बार महाराष्ट्र में सर्वाधिक आंकड़ा छुआ है । यह तब हुआ जब विपक्ष सहित भारत की विकास गति अवरुद्ध करने वाली शक्तियाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम जोड़कर केवल भाजपा को हराने के लक्ष्य पर काम कर रहीं थीं । विपक्षी प्रचार केवल चुनाव सभाओं और अपीलों तक सीमित नहीं था । इसमें उलेमा बोर्ड का समर्थन पत्र, 180 मुस्लिम सामाजिक संगठनों की सक्रियता और सेकुलरिज्म का बाना पहने एक विशिष्ठ मानसिकता पर काम करने वाले मुम्बई कुछ पत्रकार भी सक्रिय रहे । उनके अभियान को मीडिया, सोशल मीडिया एवं ट्यूटर पर उनकी टिप्पणियों से समझा जा सकता है । ये सब भ्रामक मुद्दे उछाल कर मुस्लिम मतदाताओं से प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध मतदान करने का खुली अपील कर रहे थे। यह प्रयत्न भी हुआ कि मुस्लिम मतदाता भाजपा के साथ उसके सहयोगी दल के उम्मीदवार के विरुद्ध भी एकजुट मतदान करें। कथित सामाजिक संगठनों ने मुस्लिम समाज के घर घर जाकर विकल्प भी समझाये थे ताकि मुस्लिम मतों का विभाजन न हो। उलेमा बोर्ड द्वारा प्रांतीय स्तर एक समर्थन पत्र जारी करने के साथ अनेक क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर मुस्लिम धर्म गुरुओं ने फतवे भी जारी किये । कहीं कहीं तो “वोट जिहाद” शब्द भी सुना गया । बावजूद इसके भाजपा नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को पूरे महाराष्ट्र प्रदेश में समर्थन मिला । भाजपा गठबंधन को उन सीटों पर भी विजय मिली जहाँ मुस्लिम मतदाता निर्णायक माने जाते हैं । महाराष्ट्र प्रदेश में ऐसी 38 सीटें हैं, जहाँ मुस्लिम मतदाताओं की भागीदारी 20 प्रतिशत से अधिक है कुछ पर तो पचास प्रतिशत से भी अधिक है । यदि महाराष्ट्र का चुनावी इतिहास देखे तो इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के मतदान का प्रतिशत अधिक होता है और वे एकजुट होकर मतदान करते हैं। इस बार इन 38 में से भाजपा गठबंधन ने 22 सीटें जीती । इसमें भाजपा की 14 और उसके सहयोगी दलों को आठ सीटें मिलीं । जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी महाविकास अघाड़ी गठबंधन को मुस्लिम बाहुल्य इन क्षेत्रों में 13 सीटें ही मिल सकीं। शेष तीन सीटों में समाजवादी पार्टी को दो और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम को एक सीट मिली है । 2019 के विधानसभा चुनावों में इन क्षेत्रों से कांग्रेस ने 11 सीटें जीती थीं । लेकिन इस बार वह केवल पाँच सीटें ही जीत सकी । काँग्रेस की सीटें ही कम नहीं हुई उसका मत प्रतिशत भी घटा है । नवाब मलिक और जीशान सिद्दीकी जैसे कांग्रेस के कद्दावर नेता अपनी-अपनी सीटों से चुनाव हार गए ।

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन ने अपनी इस जीत का श्रेय सरकार की कल्याणकारी योजनाओ को दिया है ।

उत्तर प्रदेश में नौ सीटों का परिणाम

चुनाव को साम्प्रदायिक रःग देने का जो अभियान महाराष्ट्र में चला उससे कहीं आगे उत्तर प्रदेश में चलाया गया । उत्तर प्रदेश में नौ विधानसभा सीटों केलिये उपचुनाव हुये थे । इसमें भाजपा गठबंधन को सात और समाजवादी पार्टी को केवल दो सीट मिलीं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस सहित विपक्षी गठबंधन के सदस्यों ने कैसे केवल मुस्लिम कट्टरपंथ को प्रोत्साहित किया इसके समाचारों से मीडिया भरा रहा । तुष्टीकरणवादी इन राजनैतिक दलों को समर्थन करने केलिये अनेक मुस्लिम धर्मगुरु, बीस से अधिक सामाजिक संगठन और गाजियाबाद के कुछ पत्रकारों की एक पूरी टोली सक्रिय थी । इनमें से कुछ तो राष्ट्रीय मीडिया से भी संबद्ध थे शेष अन्य स्थानीय और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे । चुनाव प्रचार की कुछ घटनाओं को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया । फिर भी भाजपा गठबंधन का विजय रथ रुक न पाया । मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये रात दिन एक करने वाली समाजवादी पार्टी को केवल दो सीट ही मिल सकी ।
उत्तर प्रदेश की जिन नौ विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुये उनमें मीरापुर, कुंदरकी, गाजियाबाद, खैर, करहल, सीसामऊ, फूलपुर, कटेहरी और मझवां हैं। ये सभी मुस्लिम मतदाता के प्रभाववाली सीटें हैं । इनमें मुरादाबाद जिले के अंतर्गत कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र ऐसा है जहाँ मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत साठ से अधिक है फिर भी इस सीट पर भाजपा के रामवीर सिंह ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की । इस सीट पर समाज वादी पार्टी सहित सभी 11 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। जबकि भाजपा के रामवीर सिंह ने यहां 1.44 लाख वोटों के बड़े अंतर से सीट जीती। यह इस चुनाव की सबसे बड़ी जीत है। भाजपा को यह सीट 31 साल मिली । यहाँ लगभग पचास प्रतिशत मतदान हुआ । यह भाजपा की एकतरफा जीत मानी जा रही है । इस सीट पर वे अकेले हिन्दु उम्मीदवार थे ।

अन्य उपचुनावों के परिणाम

झारखंड, महाराष्ट्र विधानसभा तथा उत्तर प्रदेश की इन सात सीटों के अतिरिक्त राजस्थान में 7, पश्चिम बंगाल में 6, असम में 5, पंजाब और बिहार में 4-4, मध्यप्रदेश में दो, छत्तीसगढ में एक, कर्नाटक और केरल में 3-3 और उत्तराखंड की एक सीट पर उपचुनाव हुये ।
लोकसभा केलिये उपचुनाव की दोनों सीटें कांग्रेस ने जीतीं। इनमें महाराष्ट्र की नांदेड़ और केरल की वायनाड सीट है । दोनों सीट जीतने के बाद भी कांग्रेस की लोकसभा में सीटों की संख्या 99 ही रहेगी । चूँकि ये दोनों सीटें काँग्रेस ने ही जीतीं थीं।
अन्य राज्यों के विधानसभा उपचुनावों में असम विधानसभा के लिये पाँच सीटों पर उपचुनाव हुये । ये सभी पांचों सीट भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल असम गण परिषद ने जीती । केरल में तीन सीट पर चुनाव हुये तीनों सीट सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) गठबंधन एलडीएफ ने जीतीं। पंजाब में चार विधानसभा सीटों के लिये हुये उपचुनाव में आम आदमी पार्टी ने तीन और एक सीट कांग्रेस ने जीती ।
बिहार में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन ने चारों विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में जीते । इसमें सत्तारूढ एनडीए गठबंधन को तीन सीटों का फायदा हुआ । बंगाल की 6 सीटों पर उपचुनाव हुये । ये सभी टीएमसी ने जीतीं। यहाँ एक सीट भाजपा के हाथ से चली गई। सिक्किम में दो सीटों पर सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा उम्मीदवार ने निर्विरोध जीते । कर्नाटक में तीन सीट पर उपचुनाव हुये तीन सीट कांग्रेस ने जीतीं । इस चुनाव में भाजपा और जनता दल (एस) को एक एक सीट का नुकसान हुआ । मध्यप्रदेश में दो सीटों पर चुनाव हुये । एक पर कांग्रेस और एक सीट भारतीय जनता पार्टी ने जीती। छत्तीसगढ की एक सीट पर हुये चुनाव में भारतीय जनता पार्टी विजयी रही ।

भविष्य की राजनीति केलिये संकेत

इन चुनाव परिणाम से भारत के राजनैतिक स्वरूप पर कोई विशेष अंतर नहीं पड़ेगा। सभी राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार की स्थिरता में भी कोई अंतर नहीं होगा लेकिन इन चुनाव परिणामों भविष्य के लिये एक बड़ा संकेत दिया है । इस चुनाव में मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन, धर्मगुरु और छद्म सेकुलरों ने पूरी योजना से काम किया । पहले लोकसभा चुनाव प्रचार में जातीय जनगणना का शोर किया गया ।गाजियाबाद के छद्म सेकुलर पत्रकार अभी खुलकर सक्रिय थे वे लोकसभा चुनाव प्रचार में जातीय समीकरणों को तूल दे रहे थे । तब न केवल उम्मीदवार की जाति से मतदाताओं के जाति आधारित आँकड़े देकर सामाजिक रेखाएँ खींची जा रहीं थीं अपितु व्यक्तिगत अपराध की घटनाओं को भी जाति से जोड़कर सनसनीखेज बनाने का प्रयास हुआ था जो अभी भी देखा जा रहा है । लोकसभा चुनाव परिणाम में इस जाति आधारित धुँध का प्रभाव देखा गया । सनातन समाज को जाति आधारित गणना में उलझाकर अब मुस्लिम समुदाय को संगठित और आक्रामक बनाने का प्रयास हुआ । यह ठीक वैसा ही है जैसे 1921 के बाद भारतीय समाज जीवन में देखा गया । इतिहास गवाह है कि मालाबार हिन्साके बाद जातीय गणित, मुस्लिम कट्टरता बढ़ी थी । वहीं कांग्रेस ने तुष्टीकरण की राह पकड़ी थी जो अभी भी यथावत है । लोकसभा चुनाव के बाद से ही मुस्लिम समुदाय को आक्रामक बनाने का प्रयोग किया जाने लगा था । इसे हम कांवड़ यात्राओं पर पथराव, गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव पर हुये हमलों से समझा जा सकता है ।

विधानसभा के इन चुनाव परिणामों में दोनों प्रकार की झलक है । एक तो सनातन समाज में जागरूकता देखी जा रही है और दूसरे कम प्रतिशत ही सही लेकिन मुस्लिम समाज में भी जागरुकता बढ़ी है । मुस्लिम समाज का प्रबुद्ध वर्ग कट्टरवाद की राजनीति का मर्म समझने लगा है इसीलिये आक्रामक प्रचार के बाद भी भाजपा गठबंधन उम्मीदवारों को मुस्लिम वोट मिले । उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की कुछ सीटों पर यह जागरुकता स्पस्ट देखने को मिल रही है ।
इन चुनाव परिणाम में हिन्दू और मुसलमान दोनों प्रकार के मतदाताओं में जागरूकता का संदेश है तो यह संकेत भी है कि भारत की विकास गति को अवरुद्ध करने वाली शक्तियाँ अथवा केवल तुष्टीकरण और हिन्दु मुस्लिम की राजनीति करके अपना स्वार्थ पूरा करने वाले तत्त्व भी चुप नहीं बैठेंगे। वे कोई नया कुचक्र करेंगे । इस चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार मुस्लिम धर्म गुरुओं और उलेमाओं ने जिस प्रकार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को और उड़ीसा के मुख्यमंत्री श्री नायडू को तोड़ने का प्रयास किया, ऐसे प्रयास और बढ़ सकते हैं। इसलिए समाज और सरकार दोनों के अतिरिक्त राजनैतिक दलों को भी चुनाव में तुष्टीकरण का खेल करने की बजाय राष्ट्र विकास के विन्दु सामने रखकर चुनाव तैयारी करनी होगी । तभी 2047 तक भारत के सर्वोन्नत राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होने का लक्ष्य पूरा होगा ।

क्या लेखक राजनीति के पीछे चलने वाला दलाल है?

writer.jpg

रंगनाथ राम

पिछले और मौजूदा निजाम में कई पुरस्कार बटोर चुके एक महात्मा ने अचानक से घोषणा की कि अब वे एंटी-सेकुलर फोर्सेज के खिलाफ निर्णायक यलगार शुरू कर रहे हैं। उन्होंने लम्बे-लम्बे फर्रे लिखने शुरू किये। कई सूरमाओं ने उनके लिए जी भर के ताली बजायी। उनके सेकुलर जिहाद का धारावाहिक प्रसारण जारी ही था कि अचानक 5 अगस्त आ गया। सेकुलर जिहाद की गाड़ी पर उन्हें पॉवर ब्रेक लगाना पड़ा। उनकी वॉल पर “सूई पटक सन्नाटा” छा गया। उसके बाद उनकी नींद केवल एक दिन खुली और उन्होंने लिखा कि गुरुदेव रविंद्रनाथ ठाकुर की प्रतिमा गिराना कोई बड़ी बात नहीं है, भारत में भी लोग मूर्तियों के संग तोड़फोड़ करते रहते हैं! एक तरह से महात्मा जी ने मूर्ति तोड़ने वालों के बचाव के लिए तर्क मुहैया कराने का कुकृत्य किया।

बांग्ला-देश में रविंद्रनाथ की प्रतिमा पर चढ़कर मूतने और फिर उसे तोड़ने के गहरे सांस्कृतिक निहितार्थ हैं। मेरे ख्याल से भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक इतिहास का यह ऐतिहासिक क्षण था। मैंने उसपर एक लम्बी पोस्ट लिखी थी लेकिन उसे फिनिश करने की फुरसत नहीं मिली तो उसे पोस्ट नहीं कर पाया था। मगर सच कहूँ तो रविंद्रनाथ वाली एक पोस्ट से वह लेखक मेरी नजरों में जितने गिरे उतने उसके पहले के विभिन्न मुद्दों पर अनगिनत वैचारिक मतभेद के बावजूद न गिरे होंगे क्योंकि मैं मानकर चलता हूँ कि लोकतंत्र परस्पर प्रतियोगी विचारों का तंत्र है मगर जिस लेखक के लिए राजनीति साहित्य से ऊपर हो जाए वह मूलतः लेखक नहीं है, बल्कि भाषा के अन्दर बैठा दलाल है। वह पोलिटिकली करेक्ट उपन्यास और कहानी लिखकर प्रसिद्ध और पुरस्कृत हो सकता है मगर वह लेखक नहीं हो सकता जिसे प्रेमचन्द “राजनीति के आगे चलने वाली मशाल” कह गये हैं और मैं उन्हें “राजनीति के पीछे चलने वाले दलाल” कहना पसन्द करता हूँ।

ऐसे ज्यादातर लेखक पहचान के संकट से मुक्त होने के लिए जवानी के जोश में दो-चार पठनीय कहानी-कविता लिखकर “बौद्धिक दलाली” के क्षेत्र में उतर जाते हैं। उसके बाद आजीवन वे प्रकाशक द्वारा पीछे से धक्का देकर आगे पहुँचाए जाने को अभिशप्त होते हैं। उनकी किताब झटपट छप जाएगी। किसी स्वजातीय द्वारा अनूदित हो जाएगी। अन्य स्वजातीय द्वारा पुरस्कृत हो जाएगी। किसी अन्य स्वजातीय द्वारा लाइब्रेरी में खरीद ली जाएगी। स्वजातीय समारोहों में बतौर लेखक सुर्खरू होते रहेंगे मगर मरने के 50 साल बाद वो दलाल के रूप में भी याद नहीं किए जाएँगे, लेखक होना तो दूर की बात है।

आज ऐसे ही एक अन्य लेखक चित्त से उतर गये। उन्होंने एक दशक पहले बांग्लादेश पर एक मोटी सी किताब लिखी थी। वे इंग्लिश दाँ हैं मगर अपने प्रोफाइल में “जय बांग्ला” (वस्तुतः जय हिन्द के काउंटर में) लिखते हैं मगर आज वे यह कहते हुए पाए गये कि बांग्लादेश में जो हो रहा है वह उसका “आंतरिक मामला” है! दोगलापन और दलाली का ऐसा कॉकटेल! जाहिर है कि उनका वही हश्र होगा जैसा सीपीए-परस्त के कई बुद्धिजीवियों का सिंगुर-नन्दीग्राम के समय हुआ था। उनका बरसों से ओढ़ा हुआ केचुल उतर जाएगा।

लेखकों के अन्दर इस प्रजाति के वर्चस्व ने लेखकीय संज्ञा की स्वायत्तता खत्म कर दी है। इनसे अच्छे वे दरबारी लेखक होते थे जो जीवनयापन के लिए दरबारी साहित्य लिखते थे और साहित्य सेवा के लिए वह भी लिखते थे जो वे लेखक के तौर पर लिखना चाहते थे! अमीर खुसरो और गालिब का दरबारी साहित्य आज भुला दिया गया है क्योंकि वह जिस मकसद से लिखा गया था वह उसी समय पूरा हो गया था। मगर आज का कथित वामपंथी लेखक आइडियोलॉजी साहित्य के अलावा अपनी लेखकीय आत्मा के लिए भी कुछ लिख रहा है क्या?!

भारत में सहकारिता आंदोलन को सफल होना ही होगा

AddText_07-21-11.36.06.jpeg


भारत में आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से सहकारिता आंदोलन को सफल बनाना बहुत जरूरी है। वैसे तो हमारे देश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1904 से हुई है एवं तब से आज तक सहकारी क्षेत्र में लाखों समितियों की स्थापना हुई है। कुछ अत्यधिक सफल रही हैं, जैसे अमूल डेयरी, परंतु इस प्रकार की सफलता की कहानियां बहुत कम ही रही हैं। कहा जाता है कि देश में सहकारिता आंदोलन को जिस तरह से सफल होना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं है। बल्कि, भारत में सहकारिता आंदोलन में कई प्रकार की कमियां ही दिखाई दी हैं। देश की अर्थव्यवस्था को यदि 5 लाख करोड़ अमेरिकी डालर के आकार का बनाना है तो देश में सहकारिता आंदोलन को भी सफल बनाना ही होगा। इस दृष्टि से केंद्र सरकार द्वारा एक नए सहकारिता मंत्रालय का गठन भी किया गया है। विशेष रूप से गठित किए गए इस सहकारिता मंत्रालय से अब “सहकार से समृद्धि” की परिकल्पना के साकार होने की उम्मीद भी की जा रही है।

भारत में सहकारिता आंदोलन का यदि सहकारिता की संरचना की दृष्टि से आंकलन किया जाय तो ध्यान में आता है कि देश में लगभग 8.5 लाख से अधिक सहकारी साख समितियां कार्यरत हैं। इन समितियों में कुल सदस्य संख्या लगभग 28 करोड़ है। हमारे देश में 55 किस्मों की सहकारी समितियां विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। जैसे, देश में 1.5 लाख प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियां कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 93,000 प्राथमिक कृषि सहकारी साख समितियां कार्यरत हैं। ये मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में कार्य करती हैं। इन दोनों प्रकार की लगभग 2.5 लाख सहकारी समितियां ग्रामीण इलाकों को अपनी कर्मभूमि बनाकर इन इलाकों की 75 प्रतिशत जनसंख्या को अपने दायरे में लिए हुए है। उक्त के अलावा देश में सहकारी साख समितियां भी कार्यरत हैं और यह तीन प्रकार की हैं। एक तो वे जो अपनी सेवाएं शहरी इलाकों में प्रदान कर रही हैं। दूसरी वे हैं जो ग्रामीण इलाकों में तो अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं, परंतु कृषि क्षेत्र में ऋण प्रदान नहीं करती हैं। तीसरी वे हैं जो उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों एवं कर्मचारियों की वित्त सम्बंधी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करती हैं। इसी प्रकार देश में महिला सहकारी साख समितियां भी कार्यरत हैं। इनकी संख्या भी लगभग एक लाख है। मछली पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मछली सहकारी साख समितियां भी स्थापित की गई हैं, इनकी संख्या कुछ कम है। ये समितियां मुख्यतः देश में समुद्र के आसपास के इलाकों में स्थापित की गई हैं। देश में बुनकर सहकारी साख समितियां भी गठित की गई हैं, इनकी संख्या भी लगभग 35,000 है। इसके अतिरिक्त हाउसिंग सहकारी समितियां भी कार्यरत हैं।

उक्तवर्णित विभिन क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी समितियों के अतिरिक्त देश में सहकारी क्षेत्र में तीन प्रकार के बैंक भी कार्यरत हैं। एक, प्राथमिक शहरी सहकारी बैंक जिनकी संख्या 1550 है और ये देश के लगभग सभी जिलों में कार्यरत हैं। दूसरे, 300 जिला सहकारी बैंक कार्यरत हैं एवं तीसरे, प्रत्येक राज्य में एपेक्स सहकारी बैंक भी बनाए गए हैं। उक्त समस्त आंकडें वर्ष 2021-22 तक के हैं।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में सहकारी आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। दुग्ध क्षेत्र में अमूल सहकारी समिती लगभग 70 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई है, जिसे आज भी सहकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता के रूप में गिना जाता है। सहकारी क्षेत्र में स्थापित की गई समितियों द्वारा रोजगार के कई नए अवसर निर्मित किए गए हैं। सहकारी क्षेत्र में एक विशेषता यह पाई जाती है कि इन समितियों में सामान्यतः निर्णय सभी सदस्यों द्वारा मिलकर लिए जाते हैं। सहकारी क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। परंतु इस क्षेत्र में बहुत सारी चुनौतियां भी रही हैं। जैसे, सहकारी बैंकों की कार्य प्रणाली को दिशा देने एवं इनके कार्यों को प्रभावशाली तरीके से नियंत्रित करने के लिए अपेक्स स्तर पर कोई संस्थान नहीं है। जिस प्रकार अन्य बैकों पर भारतीय रिजर्व बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थानों का नियंत्रण रहता है ऐसा सहकारी क्षेत्र के बैकों पर नहीं है। इसीलिए सहकारी क्षेत्र के बैंकों की कार्य पद्धति पर हमेशा से ही आरोप लगते रहे हैं एवं कई तरह की धोखेबाजी की घटनाएं समय समय पर उजागर होती रही हैं। इसके विपरीत सरकारी क्षेत्र के बैंकों का प्रबंधन बहुत पेशेवर, अनुभवी एवं सक्रिय रहा है। ये बैंक जोखिम प्रबंधन की पेशेवर नीतियों पर चलते आए हैं जिसके कारण इन बैंकों की विकास यात्रा अनुकरणीय रही है। सहकारी क्षेत्र के बैंकों में पेशेवर प्रबंधन का अभाव रहा है एवं ये बैंक पूंजी बाजार से पूंजी जुटा पाने में भी सफल नहीं रहे हैं। अभी तक चूंकि सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी तंत्र का अभाव था केंद्र सरकार द्वारा किए गए नए मंत्रालय के गठन के बाद सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने में कसावट आएगी एवं इन संस्थानों का प्रबंधन भी पेशेवर बन जाएगा जिसके चलते इन संस्थानों की कार्य प्रणाली में भी निश्चित ही सुधार होगा।

सहकारी क्षेत्र पर आधरित आर्थिक मोडेल के कई लाभ हैं तो कई प्रकार की चुनौतियां भी हैं। मुख्य चुनौतियां ग्रामीण इलाकों में कार्य कर रही जिला केंद्रीय सहकारी बैकों की शाखाओं के सामने हैं। इन बैंकों द्वारा ऋण प्रदान करने की स्कीम बहुत पुरानी हैं एवं समय के साथ इनमें परिवर्तन नहीं किया जा सका है। जबकि अब तो ग्रामीण क्षेत्रों में आय का स्वरूप ही बदल गया है। ग्रामीण इलाकों में अब केवल 35 प्रतिशत आय कृषि आधारित कार्य से होती है शेष 65 प्रतिशत आय गैर कृषि आधारित कार्यों से होती है। अतः ग्रामीण इलाकों में कार्य कर रहे इन बैकों को अब नए व्यवसाय माडल खड़े करने होंगे। अब केवल कृषि व्यवसाय आधारित ऋण प्रदान करने वाली योजनाओं से काम चलने वाला नहीं है।

भारत विश्व में सबसे अधिक दूध उत्पादन करने वाले देशों में शामिल हो गया है। अब हमें दूध के पावडर के आयात की जरूरत नहीं पड़ती है। परंतु दूध के उत्पादन के मामले में भारत के कुछ भाग ही, जैसे पश्चिमी भाग, सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं। देश के उत्तरी भाग, मध्य भाग, उत्तर-पूर्व भाग में दुग्ध उत्पादन का कार्य संतोषजनक रूप से नहीं हो पा रहा है। जबकि ग्रामीण इलाकों में तो बहुत बड़ी जनसंख्या को डेयरी उद्योग से ही सबसे अधिक आय हो रही है। अतः देश के सभी भागों में डेयरी उद्योग को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। केवल दुग्ध सहकारी समितियां स्थापित करने से इस क्षेत्र की समस्याओं का हल नहीं होगा। डेयरी उद्योग को अब पेशेवर बनाने का समय आ गया है। गाय एवं भैंस को चिकित्सा सुविधाएं एवं उनके लिए चारे की व्यवस्था करना, आदि समस्याओं का हल भी खोजा जाना चाहिए। साथ ही, ग्रामीण इलाकों में किसानों की आय को दुगुना करने के लिए सहकारी क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना करनी होगी। इससे खाद्य सामग्री की बर्बादी को भी बचाया जा सकेगा। एक अनुमान के अनुसार देश में प्रति वर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत फल एवं सब्जियों का उत्पादन उचित रख रखाव के अभाव में बर्बाद हो जाता है।

शहरी क्षेत्रों में गृह निर्माण सहकारी समितियों का गठन किया जाना भी अब समय की मांग बन गया है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में मकानों के अभाव में बहुत बड़ी जनसंख्या झुग्गी झोपड़ियों में रहने को विवश है। अतः इन गृह निर्माण सहकारी समितियों द्वारा मकानों को बनाने के काम को गति दी जा सकती है। देश में आवश्यक वस्तुओं को उचित दामों पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कंजूमर सहकारी समितियों का भी अभाव है। पहिले इस तरह के संस्थानों द्वारा देश में अच्छा कार्य किया गया है। इससे मुद्रा स्फीति की समस्या को भी हल किया जा सकता है।

देश में व्यापार एवं निर्माण कार्यों को आसान बनाने के उद्देश्य से “ईज आफ डूइंग बिजिनेस” के क्षेत्र में जो कार्य किया जा रहा है उसे सहकारी संस्थानों पर भी लागू किया जाना चाहिए ताकि इस क्षेत्र में भी काम करना आसान हो सके। सहकारी संस्थानों को पूंजी की कमी नहीं हो इस हेतु भी प्रयास किए जाने चाहिए। केवल ऋण के ऊपर अत्यधिक निर्भरता भी ठीक नहीं है। सहकारी क्षेत्र के संस्थान भी पूंजी बाजार से पूंजी जुटा सकें ऐसी व्यवस्था की जा सकती हैं।

विभिन्न राज्यों के सहकारी क्षेत्र में लागू किए गए कानून बहुत पुराने हैं। अब, आज के समय के अनुसार इन कानूनो में परिवर्तन करने का समय आ गया है। सहकारी क्षेत्र में पेशेवर लोगों की भी कमी है, पेशेवर लोग इस क्षेत्र में टिकते ही नहीं हैं। डेयरी क्षेत्र इसका एक जीता जागता प्रमाण है। केंद्र सरकार द्वारा सहकारी क्षेत्र में नए मंत्रालय का गठन के बाद यह आशा की जानी चाहिए के सहकारी क्षेत्र में भी पेशेवर लोग आकर्षित होने लगेंगे और इस क्षेत्र को सफल बनाने में अपना भरपूर योगदान दे सकेंगे। साथ ही, किन्हीं समस्याओं एवं कारणों के चलते जो सहकारी समितियां निष्क्रिय होकर बंद होने के कगार पर पहुंच गई हैं, उन्हें अब पुनः चालू हालत में लाया जा सकेगा। अमूल की तर्ज पर अन्य क्षेत्रों में भी सहकारी समितियों द्वारा सफलता की कहानियां लिखी जाएंगी ऐसी आशा की जा रही है। “सहकारिता से विकास” का मंत्र पूरे भारत में सफलता पूर्वक लागू होने से गरीब किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त हो जाएंगे।

राजनैतिक संघर्ष के साथ स्वाभिमान और सामाजिक जागरण अभियान चलाया

images.jpeg

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ सेनानी ऐसे भी हैं जिन्होंने अपना संघर्ष केवल राजनैतिक अथवा अंग्रेजों से मुक्ति तक ही सीमित न रखा अपितु उन्होंने जीवन भर स्वाभिमान और सामाजिक जागरण का अभियान चलाया । काका कालेलकर ऐसे ही स्वाधीनता सेनानी थे जिन्होंने शैक्षणिक और आर्थिक स्तर भी समाज के उत्थान का अभियान चलाया।

उनका जन्म 1 दिसम्बर 1885 को महाराष्ट्र के सतारा में हुआ था । उनक परिवार मूल रूप से कर्नाटक के करवार जिले का रहने वाला था । लेकिन पहले महाराष्ट्र और फिर गुजरात आकर बस गया था । उनके पिता बालकृष्ण कालेलकर एक शिक्षाविद् और आध्यात्मिक व्यक्ति थे । वे भगवान दत्तात्रेय के अनुयायी थे इसलिये उन्होंने अपने पुत्र का नाम दत्तात्रेय ही रखा । लेकिन आगे चलकर दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर काकासाहब कालेलकर के नाम से प्रसिद्ध हुये । उनकी प्रारंम्भिक शिक्षा महाराष्ट्र में और बाद की उच्च शिक्षा गुजरात में हुई । उनका मराठी, गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी सहित दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं पर अधिकार था । उनका आरंभिक लेखन गुजराती में हुआ । और फिर अन्य भाषाओं में भी । लेकिन वे हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के पक्षधर थे । इसके लिये उन्होंने देश व्यापी अभियान भी चलाया । वे हिन्दी प्रचार सभा से जुड़े थे और उन्होंने दक्षिण भारत में हिन्दी के समर्थन में वातावरण बनाया

काका कालेलकर राष्ट्रीय मराठी डेली के संपादकीय विभाग से जुड़े और यहाँ से उनका पत्रकारीय जीवन आरंभ हुआ । इसके बाद 1910 में वे गंगानाथ विद्यालय में शिक्षक बने । लेकिन 1912 में अंग्रेज सरकार ने स्कूल को बंद करवा दिया । गुजरात से महाराष्ट्र तक की अपनी जीवन यात्रा में उन्होंने भारतीय जनों की दुर्दशा देखी । उन्हें अंग्रेजों पर गुस्सा बहुत आता था । इसलिए वे सशस्त्र क्रान्ति के समर्थक थे । पर चाहते थे कि भगवान जी भारतीय समाज को शक्ति प्रदान करें जिससे भारत स्वतंत्र हो सके । प्रभु की आराधना के लिये वे 1912 में हिमालय की ओर चल दिये । लगभग तीन वर्ष तक वे पैदल ही विभिन्न क्षेत्रों में गये । न केवल भारत के विभिन्न भागों में अपितु म्यांमार भी गये । इसी यात्रा में उनकी भेंट आचार्य कृपलानी से हुई और उनकी सलाह पर गाँधी से मिलने शाँति निकेतन पहुँचे। गाँधी जी ने उनकी ऊर्जा को अहिसंक आँदोलन और सामाजिक जागरण में लगाने की सलाह दी । गाँधी जी के आग्रह पर काका साहब साबरमती आश्रम विद्यालय के प्राचार्य बन गये । गाँधी जी इनके अनुभवों के आधार पर ‘बेसिक शिक्षा’ की योजना बनाई ।

1928 से 1935 तक ‘गुजरात विद्यापीठ’ के कुलपति रहे। 1935 में वर्धा आये और हिन्दी के प्रचार के कार्य में लग गये । अपनी बौद्धिक सामर्थ्य, विलक्षण बुद्धि और व्यापक अध्ययन की साख चारों ओर फैली । उनकी गणना प्रमुख अध्यापकों और व्यवस्थापकों में होने लगी और यहीं उन्हें काकासाहब का संबोधन मिला । हिंदी-प्रचार के कार्य में जहाँ कहीं कोई दोष दिखाई देते या हिन्दी प्रचार कार्य की प्रगति में कोई अवरोध आता तो गांधी जी इनको ही जाँच के लिए भेजते। ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना के बाद हिंदी-प्रचार की व्यवस्था के लिए गांधी जी ने काका कालेलकर को गुजरात भेजा । साहित्य अकादमी में काका साहब गुजराती भाषा के प्रतिनिधि रहे। गुजरात में हिंदी-प्रचार को जो सफलता मिली, उसका मुख्य श्रेय काका साहब को है। उन्होंने मराठी गुजराती और हिन्दी में विपुल साहित्य रचना की। जीवन मानों हिन्दी के लिये समर्पित कर दिया । उनके आलेखों में और व्याख्यान में स्वत्व और स्वाभिमान जागरण का संकेत होता और यह भी कि स्वभाषा के बिना स्वाभिमान जागरण कैसे होगा । स्वतंत्रता के 1952 में उन्हें राजसभा सदस्य मनोनीत किया गया । उनके द्वारा रचित जीवन–व्यवस्था नामक निबन्ध–संग्रह के लिये 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेखन में उनकी भाषा शैली बड़ी सजीव और प्रभावशाली और उपदेशात्मक है । जिसमें लगभग सभी विधाएँ व्यंग्य, हास्य, गद्य और पद्य सभी तत्व विद्यमान हैं।

उनकी लगभग 30 पुस्तकें प्रकाशित हुई उनमें ‘स्मरण-यात्रा’, ‘धर्मोदय’ ‘हिमालयनो प्रवास’, ‘लोकमाता’ ‘जीवननो आनंद’, ‘अवरनावर’ बहुत प्रसिद्ध हुईं । उनकी अधिकांश रचनाएँ लोक जीवन पर आधारित थीं जिसमें जीवन और समाज निर्माण का संदेश होता था । इस प्रकार समाज जीवन के सकारात्मक निर्माण के लिये समर्पित काकासाहब कालेलकर ने 21 अगस्त 1981 को संसार से विदा हुये ।

scroll to top