Massive Airline Banner Calls to End Violence against Hindus in Bangladesh

3-30.jpeg

New York : In the wake of recent unrest in Bangladesh, reports of unprecedented, brutal attacks targeting the Hindu minority have resurfaced, raising fears of a repeat of the 1971 genocide, which claimed 2.8 million lives and saw at least 200,000 predominantly Hindu women raped, according to U.S. Congress Resolution HR 1430 (2022). The genocide has had lasting effects, with the Hindu population in Bangladesh plummeting from 20% in 1971 to just 8.9% today. Current violence has not only resulted in attacks but also reports of systematic impoverishment, with some accounts claiming that 2 million Hindus have been forced to resign from their jobs, and properties belonging to Hindus have been systematically targeted.

In light of the ongoing United Nations Plenary Session, where Bangladesh’s interim president Muhammad Yunus is in attendance, a large-scale airline banner will be flown across the Hudson River and around the Statue of Liberty on Friday, September 27th, at 1 PM EST. This banner aims to raise global awareness of the current violence in Bangladesh and the looming threat of another genocide.

Three designated viewing spots have been identified for those wishing to witness the banner:

1) New York City: In front of the Museum of Jewish Heritage at Battery Park

2) New Jersey: At the New York Skyline Vista Point in Liberty State Park

3) Statue of Liberty: The banner will also be visible from various points along both sides of the Hudson River.

The event will also be live-streamed on https://StopHinduGenocide.org for wider global reach. Those in NYC taking pictures and videos are requested to post on X tagging @StopHinduGenocide, #StopHinduGenocide and #BangladeshiHindus and stream live on their Facebook and Instagram pages and YouTube channels.

शक्तिशाली देशों की सूची में भारत पहुंचा तीसरे स्थान पर

india-flag_large_1244_23.webp

आस्ट्रेलिया के एक संस्थान, लोवी इन्स्टिटयूट थिंक टैंक, ने हाल ही में एशिया में शक्तिशाली देशों की एक सूची जारी की है। “एशिया पावर इंडेक्स 2024” नामक इस सूची में भारत को एशिया में तीसरा सबसे बड़ा शक्तिशाली देश बताया गया है। वर्ष 2024 के इस इंडेक्स में भारत ने जापान को पीछे छोड़ा है। इस इंडेक्स में अब केवल अमेरिका एवं चीन ही भारत से आगे है। रूस तो पहिले से ही इस इंडेक्स में भारत से पीछे हो चुका है। इस प्रकार अब भारत की शक्ति का आभास वैश्विक स्तर पर भी महसूस किया जाने लगा है। एशिया पावर इंडेक्स 2024 के प्रतिवेदन में बताया गया है कि वर्ष 2023 के इंडेक्स में भारत को 36.3 अंक प्राप्त हुए थे जो वर्ष 2024 के इंडेक्स में 2.8 अंक से बढ़कर 39.1 अंकों पर पहुंच गए हैं एवं भारत इस इंडेक्स में चौथे स्थान से तीसरे स्थान पर आ गया है।

एशिया पावर इंडेक्स 2024 को विकसित करने के लिए कुल 27 देशों और क्षेत्रों से प्राप्त आंकड़ों का आंकलन एवं सूक्षम विश्लेषण किया गया है। एशिया में जो नए शक्ति समीकरण बन रहे हैं उनका ध्यान भी इस इंडेक्स में रखा गया है तथा विभिन्न मापदंडों पर आधारित पिछले 6 वर्षों के आकड़ों का विश्लेषण कर यह इंडेक्स बनाया गया है। आर्थिक क्षमता, सैन्य (मिलिटरी) क्षमता, अर्थव्यवस्था में लचीलापन, भविष्य में संसाधनों की उपलब्धता, कूटनीतिक, राजनयिक एवं आर्थिक सम्बंध एवं सांस्कृतिक प्रभाव जैसे मापदंडो पर उक्त 27 देशों एवं क्षेत्रों का आंकलन कर विभिन्न देशों को इस इंडेक्स में स्थान प्रदान किया गया है।

उक्त इंडेक्स में अमेरिका, 81.7 अंकों के साथ प्रथम स्थान पर है। चीन 72.7 अंकों के साथ द्वितीय स्थान पर है। भारत ने इस इंडेक्स में 39.1 अंक प्राप्त कर तृतीय स्थान प्राप्त किया है। जापान को 38.9 अंक, आस्ट्रेलिया को 31.9 अंक एवं रूस को 31.1 अंक प्राप्त हुए हैं एवं इन देशों का क्रमशः चतुर्थ, पांचवा एवं छठवां स्थान रहा है। इस इंडेक्स में प्रथम 5 स्थानों में से 4 स्थानों पर “क्वाड” के सदस्य देश हैं – अमेरिका, भारत, जापान एवं आस्ट्रेलिया। एशिया में अमेरिका की लगातार बढ़ती मजबूत ताकत के चलते उसे इस इंडेक्स में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। जबकि, चीन की मजबूत मिलिटरी ताकत के चलते उसे इस इंडेक्स में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। जापान के इस इंडेक्स में तीसरे से चौथे स्थान पर आने के कारणों में मुख्य कारण उसकी आर्थिक स्थिति में लगातार आ रही गिरावट है। भारत ने चौथे स्थान से तीसरे स्थान पर छलांग लगाई है। आर्थिक क्षमता एवं भविष्य में संसाधनो की उपलब्धता के क्षेत्र में भारत को तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है। साथ ही, सैन्य क्षमता, कूटनीतिक, राजनयिक एवं आर्थिक सम्बंध के क्षेत्र एवं सांस्कृतिक प्रभाव के क्षेत्र में भारत को चौथा स्थान प्राप्त हुआ है। अब केवल अमेरिका और चीन ही भारत से आगे हैं एवं जापान, आस्ट्रेलिया एवं रूस भारत से पीछे हो गए हैं। जबकि, कुछ वर्ष पूर्व तक विश्व की महान शक्तियों में भारत का कहीं भी स्थान नजर नहीं आता था। केवल अमेरिका, रूस, चीन, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रान्स आदि देशों को ही विश्व में महाशक्ति के रूप में गिना जाता था। अब इस सूची में भारत तीसरे स्थान पर पहुंच गया है।

उक्त इंडेक्स तैयार करते समय आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि अन्य शक्तिशाली देशों का भी आंकलन किया गया है। साथ ही, विश्व में तेजी से बदल रहे शक्ति के नए समीकरणों का भी व्यापक आंकलन किया गया है। इस आंकलन के अनुसार अमेरिका अभी भी एशिया में सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बना हुआ है। चीन तेजी से आगे बढ़कर दूसरे स्थान पर आया है। तेजी से बढ़ती सेना एवं आर्थिक तरक्की चीन की मुख्य ताकत है। उक्त प्रतिवेदन में यह तथ्य भी बताया गया है कि उभरते हुए भारत से अपेक्षाओं एवं वास्तविकताओं में अंतर दिखाई दे रहा है। इस प्रतिवेदन के अनुसार, भारत के पास अपने पूर्वी देशों को प्रभावित करने की सीमित क्षमता है। परंतु, वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। भारत अपने पड़ौसी देशों नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बंगलादेश, म्यांमार एवं अफगानिस्तान, आदि की विपरीत परिस्थितियों के बीच भारी मदद करता रहा है। आसियान के सदस्य देशों की भी भारत समय समय पर मदद करता रहा है, एवं इन देशों का भारत पर अपार विश्वास रहा है। कोरोना के खंडकाल में एवं श्रीलंका, म्यांमार तथा अफगानिस्तान में आए सामाजिक संघर्ष के बीच भारत ने इन देशों की मानवीय आधार पर भरपूर आर्थिक सहायता की थी एवं इन्हें अमेरिकी डॉलर में लाइन आफ क्रेडिट की सुविधा भी प्रदान की थी ताकि इनके विदेशी व्यापार को विपरीत रूप से प्रभावित होने से बचाया जा सके। उक्त प्रतिवेदन के अनुसार भारत के पास भारी मात्रा में संसाधन मौजूद हैं एवं जिसके बलबूते पर आगे आने वाले समय में भारत के आर्थिक विकास को और अधिक गति मिलने की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं। साथ ही, भारत अपने पड़ौसी देशों की आर्थिक स्थिति सुधारने की भी क्षमता रखता है। भारत ने हाल ही के वर्षों में उल्लेखनीय आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू किए हैं। जिसके चलते लगातार तेज हो रहे आर्थिक विकास के बीच सकल घरेलू उत्पाद की स्थिति और बेहतर हो रही है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की मान्यता बढ़ रही है। साथ ही, बहुपक्षीय मंचों पर भी भारत की सक्रिय भागीदारी बढ़ती जा रही है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में एशिया के कई देशों के साथ अपने सम्बंधों को मजबूत किया है। अब तो अफ्रीकी देशों का भी भारत पर विश्वास बढ़ता जा रहा है एवं भारत में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं। भारत में हाल ही में अपनी कूटनीतिक एवं राजनयिक क्षमता में भी भरपूर सुधार किया है एवं इसके बल पर वैश्विक स्तर पर न केवल विकसित देशों बल्कि विकासशील देशों को भी प्रभावित करने में सफल रहा है। यूक्रेन एवं रूस युद्ध के समय केवल भारत ही दोनों देशों के साथ चर्चा कर पाता है एवं युद्ध को समाप्त करने का आग्रह दोनों देशों को कर पाता है। इसी प्रकार, इजराईल एवं हमास युद्ध के समय भी भारत दोनों देशों के साथ युद्ध समाप्त करने की चर्चा करने में अपने आप को सहज एवं सक्षम पाता है। आपस में युद्ध करने वाले दोनों देश भारत की सलाह को गम्भीरता से सुनते नजर आते हैं। भारत ने कभी भी विभिन्न देशों के आंतरिक स्थितियों पर अपनी विपरीत राय व्यक्त नहीं की है और न ही कभी उनके आंतरिक मामलों में कभी हस्तक्षेप किया है। इस दृष्टि से वैश्विक पटल पर भारत की यह विशिष्ट पहचान एवं स्थिति है।

दक्षिण एशिया के देशों में चीन अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है इसलिए भारत का पूरा ध्यान इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम कर अपने प्रभाव को बढ़ाना है। इसी मुख्य कारण से शायद भारत दक्षिण एशिया के देशों पर अधिक ध्यान देता दिखाई दे रहा है। जिसका आशय उक्त प्रतिवेदन में यह लिया गया है कि विश्व के अन्य देशों को सहायता करने की भारत की क्षमता तो अधिक है परंतु अभी उसका उपयोग भारत नहीं कर पा रहा है। हिंद महासागर पर भारत का ध्यान अधिक है और क्वाड के सदस्य देश मिलकर भारत की इस दृष्टि से सहायता भी कर रहे हैं। दक्षिण एशियाई देशों के अलावा विश्व के अन्य देशों की मदद करने के संदर्भ में भारत ने हालांकि अभी हाल ही के समय में बढ़त तो बनाई है परंतु अभी और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। भारत में आगे बढ़ने की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं।

उक्त प्रतिवेदन में भारत को एशिया को तीसरा सबसे बड़ा ताकतवर देश बताया गया है परंतु वस्तुतः भारत अब एशिया का ही नहीं बल्कि विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ताकतवर देश बन गया है क्योंकि इस सूची में एशिया के बाहर से अमेरिका को भी एशिया में पहिले स्थान पर बताया गया है। एक अन्य अमेरिकी थिंक टैंक का आंकलन है कि भारत यदि इसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा तो इस शताब्दी के अंत तक भारत, चीन एवं अमेरिका को भी पीछे छोड़कर विश्व का सबसे अधिक शक्तिशाली देश बन जाएगा।

फटी या फेडेड जींस ने वैश्विक स्तर पर परिधान समाजवाद की शुरुआत की

image_870x_66f66b4c17220.jpg

पूरे विश्व में एक ही ऐसा परिधान है जिसे अमीर, गरीब, बूढ़े बच्चे, नर नारी, शहरी, ग्रामीण, सब पहन कर अपनी आजादी या आत्म विश्वास का एहसास कराते हैं।

जी हम बात कर रहे हैं जींस की, जो पैंट, पतलून या पायजामा तो है ही, लेकिन साथ ही एक फैशन स्टेटमेंट भी है, क्योंकि वस्त्र आपके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।

लोकप्रियता तो इतनी कि कुछ साल पहले वृंदावन के एक प्रतिष्ठित मंदिर में बवाल कटा था, जब किसी खुशकेट पुजारी ने ठाकुर जी को जींस पहना दी थी, विद हैट एंड गॉगल्स।

जींस की शुरुआत अमेरिका में लेबर क्लास के लिए कई सौ साल पहले हुई थी। उस वक्त संपन्न वर्ग के लोग जींस नहीं पहनते थे। फिर 1960 के दशक में हिप्पी मूवमेंट की लोकप्रियता के साथ, जींस पैंट, आजादी पसंद युवाओं को ऐसा भाया कि आज दुनिया भर में सबसे ज्यादा इसकी डिमांड है, इसके लिए हम लीवाइस को धन्यवाद दे सकते हैं।
शुरुआत में ओरिजनल ब्लू जींस मेटल बैज, रिविट्स और बटंस के साथ आम आदमी की पहुंच से बाहर थी। पुरानी जींस भी हजार की मिलती थी। फिर ऐसा क्रेज बढ़ा कि दर्जनों ब्रांड एक साथ मार्केट में कूद पड़े।

अब तो नीली जींस, और इसके अनेक रूप, रंग, हमारे वार्डरोब का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन उनका प्रभाव फैशन के रुझानों से कहीं आगे तक फैला हुआ है। जींस ने वैश्विक संस्कृति को आकार देने, स्वतंत्रता, समानता और अनौपचारिकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

“मैं सीधे तौर पर सभी स्टूडेंट्स के लिए जींस पहनना अनिवार्य करने की सलाह दूंगी, साथ ही राजनेताओं के लिए भी जिन्हें अपने विषम शरीर को संवारने की ज़रूरत है,” बैंगलोर की जींस प्रेमी मुक्ता गुप्ता कहती हैं।

जींस धारी वृंदावन के जगन नाथ पोद्दार कहते हैं कि “पीछे मुड़कर देखें तो 1960 के दशक में जींस क्रांति की शुरुआत हुई, जो हिप्पी आंदोलन के उदय के साथ मेल खाती थी। इस प्रतिसंस्कृति घटना ने मुख्यधारा के पश्चिमी मूल्यों को खारिज कर दिया, और मुक्त-आत्मा और गैर-अनुरूपता को अपनाया। जींस इस आंदोलन की यूनिफॉर्म बन गई, जो सामाजिक मानदंडों के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक थी।”

जैसे-जैसे जींस की लोकप्रियता बढ़ी, उसने सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को पार करते हुए अमीर-गरीब के बीच की खाई को पाट दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर द्वारा व्हाइट हाउस में जींस पहनने से लेकर दुनिया भर में आम लोगों द्वारा परिधान को अपनाने तक, जींस ने फैशन को लोकतांत्रिक बनाया, पत्रकार विष्णु बताते हैं।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर का कहना है कि “महिलाओं के लिए, जींस सशक्तिकरण और स्वायत्तता का प्रतिनिधित्व करती है। जींस पहनकर, महिलाओं ने पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को चुनौती देते हुए अपने पुरुष समकक्षों के साथ खेल के मैदान को समतल किया। जींस ने महिलाओं को पहले पुरुषों के लिए आरक्षित गतिविधियों में भाग लेने में सक्षम बनाया, जिससे मुक्ति की भावना को बढ़ावा मिला। जींस ने उन्हें स्मार्ट महसूस कराया और दिखने में भी।”

जींस क्रांति ने नैतिक दृष्टिकोण में बदलाव में भी योगदान दिया। सहूलियत वाले आरामदायक कपड़ों को अपनाने से, लोगों ने कठोर सामाजिक मानदंडों और नैतिक संहिताओं पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। जींस ने “बढ़ी हुई नैतिकता को कम करने” में मदद की, जिससे व्यक्तियों को खुद को अधिक स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की अनुमति मिली, स्कूल शिक्षक डॉक्टर अनुभव कहते हैं।

७५ वर्षों से ज्यादा से जींस फैशन के रुझानों की क्षणभंगुर प्रकृति को चुनौती दे रही है। इस दृढ़ता का श्रेय जींस की अनुकूलनशीलता और बहुमुखी प्रतिभा के साथ-साथ स्वतंत्रता और समानता के साथ उनके निरंतर जुड़ाव को दिया जा सकता है, युवा वकील अंकुर कहते हैं।

जाने माने समीक्षक पारस नाथ चौधरी के मुताबिक “मैं फेडेड जींस का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं। मुझे वे बहुत पसंद हैं। मैंने 60 के दशक में उनका उपयोग करना शुरू किया था और आज तक मैं उन्हें पहनता हूं। मैं जींस को केवल फैशनेबल कपड़ों के रूप में नहीं देखता, बल्कि दुनिया में एक पूरी नई संस्कृति के अग्रदूत के रूप में भी देखता हूं। नीले जींस ने स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा दिया। उन्होंने दुनिया में आनंद की मात्रा को बढ़ाते हुए अतिरंजित नैतिकता को कम करने में भूमिका निभाई। नीले परिधान से मोहित होकर, कई लोगों ने यह भी घोषणा की कि फेडेड ग्लोरी जींस में लिपटी युवा महिलाएं अधिक सेक्सी और सुंदर दिखती हैं। जींस के आगमन के साथ ही परिधानों में अनौपचारिकता में उछाल आया और दुनिया भर में अमीर, गरीब और उच्च-निम्न का अंतर एक साथ खत्म हो गया। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर जींस पहनकर व्हाइट हाउस स्थित अपने कार्यालय में जाते थे, तो उसी समय दुनिया भर में आम लोगों की भीड़ जींस को बड़े पैमाने पर अपनाती थी। जींस हिप्पी आंदोलन की वर्दी बन गई, जिसने पश्चिम की जड़ और सड़ी हुई मुख्यधारा की संस्कृति को खारिज कर दिया। जींस पहनने वाली महिला
तुरंत अपने पुरुष समकक्षों के बराबर आ गईं और उनमें स्वायत्तता की भावना पैदा हो गई। इसके अलावा, जींस फैशन की दुनिया में एकमात्र क्रांति थी, जो 75 साल बाद भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही ।”

आज, जींस वैश्विक फैशन का एक अभिन्न अंग है, जिसमें विभिन्न स्वादों के अनुरूप डिजाइन और शैलियाँ विकसित हो रही हैं। फिर भी, उनका सांस्कृतिक महत्व सौंदर्यशास्त्र से परे है। जींस औपचारिकता पर अनौपचारिकता, परंपरा पर आराम की जीत का प्रतिनिधित्व करती है। अब तो युवा फटी जींस, तार तार जींस, शॉर्ट्स, जैकेट्स, शर्ट्स की तरफ मुखातिब हो रहे हैं।

फैशन प्रेमी माही हीदर कहती हैं, “नीली जींस सिर्फ फैशन का एक अहम हिस्सा नहीं रही है; वे सामाजिक बदलाव के लिए उत्प्रेरक रही हैं। समानता, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति को बढ़ावा देकर, जींस ने परिधान समाजवाद के युग की शुरुआत की है, जहां फैशन कोई सीमा, वर्ग या लिंग नहीं जानता।”

उनके स्थायी प्रभाव के प्रमाण के रूप में, जींस हमारी अलमारी का एक अभिन्न अंग बनी हुई है, जो संस्कृति और समाज को आकार देने के लिए फैशन की शक्ति का प्रतीक है।

समाजिक ताना बाना तोड़कर राष्ट्र की समृद्धि अवरुद्ध करने का कुचक्र

Bihar-Mein-Jatigat-Janganana.jpg

भारत में जाति आधारित जनगणना की माँग जोर पकड़ रही है । इससे केवल जातीय आँकड़े ही सामने नहीं आयेंगे अपितु जातिवाद फैलाकर भारत की प्रगति अवरुद्ध करने का संकट भी उत्पन्न हो गया है ।

भारत में एक बार जातीय आधारित जनगणना की माँग जोर पकड़ रही है । यह माँग जनसामान्य की ओर से नहीं अपितु कुछ राजनैतिक दलों और कुछ सामाजिक संगठनों की ओर से इस माँग को तूफानी बनाने का प्रयास हो रहा है। माँग के बढ़ने साथ कुछ मीडिया हाउस व्यक्तिगत अपराध की घटनाओं में जातिगत समीकरण ढूंढ़कर समाचार दिखाने में लग गये। कुछ राजनैतिक दलों, कुछ सामाजिक संगठन और कुछ मीडिया कर्मियों के इस त्रिकोण के अभियान से भारत के सामाजिक वातावरण में एक विशिष्ट खिंचाव दिखने लगा है । यह खिंचाव ऐसे समय आ रहा है जब भारत अपनी प्रगति के उन्नत लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहा है । इसके परिणाम दिखने लगे और दुनियाँ स्वीकार भी करने लगी । भारत की प्रगति से ईर्ष्या करने वाली शक्तियाँ प्रगति अवरुद्ध करने का कूचक्र चला सकतीं हैं। देश के विभिन्न भागों में घटने वाली घटनाओं में इसकी झलक भी दिखने लगी है । भारत में भारत को कमजोर करने के लिये कोई सनातन धर्म को डेंगू मलेरिया बताता है, कोई सनातन धर्म को समाप्त करने का आव्हान करता है और बंगलादेश की भाँति भारत में आँदोलन की धमकी दे रहा है । इसका सामना सामाज की संगठित शक्ति से ही किया जा सकता है । लेकिन यदि इस तनाव में जातिवाद का घोल मिला दिया गया और समाज जातिगत खिंचाव में उलझ गया तो भविष्य की दीवारों पर उभर रहीं इन समस्याओं से हट जायेगा और भारत की विकास गति अवरूद्ध हो जायेगी।
जातीय आधारित जनगणना को हवा देने वाले वे क्षेत्रीय दल हैं जिनकी राजनीति का आधार जाति, वर्ग भाषा, और क्षेत्रीयता है। अब इन्हें काँग्रेस का साथ भी मिल गया है । इन दलों के नेताओं उनका उद्देश्य राष्ट्ररक्षा या समाज सेवा नहीं केवल सत्ता है । ये सभी राजनैतिक दल गठबंधन बनाकर केवल जातिवाद की बात कर रहे हैं।

लंबा इतिहास है सत्ता केलिये विभाजन की राजनीति का

समाज को बाँटकर सत्ता प्राप्त करने का फार्मूला नया नहीं है । यह वही फार्मूला है जो भारत पर राज करने केलिए विदेशियों ने अपनाया था । सल्तनतकाल में रियासतों को बाँटकर आपस में लड़ाने का कुचक्र चला । अंग्रेजी काल में रियासतों के साथ समाज को बाँटने की भी नीति बनी। अंग्रेजों ने इसे छुपाया भी नहीं, स्पष्ट कहा था “डिवाइड एण्ड रूल” अर्थात बाँटों और राज करो। अंग्रेजों ने इसकी शुरुआत 1757 में प्लासी का युद्ध जीतने के साथ की थी। उन्होंने अपनी सत्ता विस्तार केलिये चर्च को सक्रिय किया । चर्च ने भारत के राजनीतिक और समाज जीवन का मनोवैज्ञानिक सर्वे किया । फिर विभाजन नीति तैयार करके शुरुआत वनक्षेत्रों से की । ऐसा साहित्य तैयार कराया और ऐसी कहानियाँ गढ़ीं जिससे वनवासी और नगरवासी समाज अलग अलग दिखे । अंग्रेजों ने कूटरचित साहित्य से पहले विभाजन की रेखा ही नहीं खींची फिर वैमनस्यता का रंग चढ़ाया। इसके बाद नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में विभाजन की लकीरें खींचने की योजना बनी । इसका आधार जाति को बनाया । अंग्रेजों ने पहली बार जन्म आधारित जाति व्यवस्था घोषित की अंर शासकीय अभिलेखों में जाति लिखना आरंभ किया । अंग्रेज यहीं तक नहीं रुके । उन्होंने जाति आधारित सेना गठित की । जैसे एक ही प्राँत महाराष्ट्र में “महार रेजिमेंट” अलग और “मराठा रेजिमेंट” अलग । राजस्थान में”राजपूताना राइफल्स” अलग और “राजस्थान राइफल्स” अलग इसी तरह पंजाब में “सिक्ख रेजीडेंट” अलग और “पंजाब रेजीडेंट” अलग । ऐसा विभाजन पूरे देश में किया । अपनी सैन्य छावनियों में भी ऐसा वातावरण बनाया जिससे जातीय स्पर्धा और ईर्ष्या बढ़े । यही वातावरण सभी शासकीय कार्यों में बनाया । और इसी के साथ जातीय आधारित जनगणना आरंभ की ।

जातीय आधारित जनगणना का इतिहास : विरोध और समर्थन

जाति आधारित जनगणना करने का निर्णय 1872 में हुआ । वायसराय मैयो के निर्देशन में जातीय आधारित जनगणना के आँकड़े पहली बार 1881 में सामने आये । यह काम 1931 तक चला । 1941 की जनगणना भी जाति आधारित हुई थी पर गाँधी जी और अन्य प्रमुख जनों के आग्रह पर अंग्रेजों ने आकड़े जारी नहीं किये। स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज चले गये पर अंग्रेजियत बनी रही । यह अंग्रेजियत के बने रहने के कारण ही अंग्रेजों का अंतिम वायसराय भारत का पहला गवर्नर जनरल बना, अंग्रेजों का दिया गया नाम “इंडिया” नाम भी बना रहा और राजकाज में अंग्रेजी का प्रभुत्व भी यथावत रहा । यह अंग्रेजों द्वारा बोये गये बीज का प्रतिफल था कि स्वतंत्रता के बाद भी एक समूह ऐसा रहा जो जाति आधारित जनगणना पर जोर देता रहा । स्वतंत्र भारत में पहली जनगणना 1951 में हुई थी । तब भी जाति आधारित जनगणना की मांग उठी थी । लेकिन तब लगभग सभी नीति निर्धारकों ने इस माँग को देशहित के विरुद्ध बताकर नकार दिया था । तबके राजनेताओं ने गाँधीजी के सिद्धांत पर अमल करना उचित समझा । गाँधीजी ने अपने स्वराज की कल्पना में कहा था- “स्वराज सबके कल्याण के लिये होगा, स्वराज में जाति और धर्म को स्थान नहीं होगा” । गाँधीजी का यह आलेख ‘यंग इंडिया’ के मई 1930 अंक में छपा था । जाति आधारित जनगणना का मुखर विरोध सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था, जिनका समर्थन पं जवाहरलाल नेहरू, बाबासाहब अंबेडकर और डा राम लोहिया ने भी किया था । अंबेडकर जी और डा लोहिया का तो पूरा अभियान ही जातिवाद को मिटाने का था । लेकिन अब उन्हे अपना आदर्श बताकर राजनीति करने वाले राजनैतिक दल अब जाति आधारित जनगणना कराने पर अड़े हुये हैं। यही स्थिति काँग्रेस की है । गाँधीजी, नेहरूजी और शास्त्री जी के बाद की पीढ़ी में श्रीमती इंदिरा गाँधी भी जाति आधारित जनगणना के विरुद्ध थीं। एक समय काँग्रेस का तो नारा था- “जात पर, न पांत पर- मोहर लगेगी हाथ पर”‘ किन्तु आज काँग्रेस आधारित जनगणना का अभियान चला रही हैं । जगह जगह सभायें कर रही है उनके नेताओं के भाषण इतने आक्रामक हैं जिन्हें सुनकर लगता है मानो देश में सारी समस्याओं का निदान केवल जातीय आधारित जनगणना में है । कुछ राजनैतिक दलों के नेता तो अब अपराधियों के बारे में टिप्पणी भी जाति देखकर करने लगे । जिन डा राम मनोहर लोहिया ने समाज से जातिवाद मिटाने का संकल्प लिया था उनको आदर्श मानने वाले अखिलेश यादव, लालू प्रसाद यादव और नितीश कुमार जातिवाद का झंडा बुलंद कर रहे हैं ।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार की शक्ति समाज के एकत्व, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव के भाव में है। इसे तोड़ने के लिये ही जातीय आधारित जनगणना का मार्ग बनाया जा रहा है । जातीय विमर्श के अभियान से समाज का ध्यान उन समस्याओं से दूर होने लगा जो देश की प्रगति और संस्कृति को कमजोर करने केलिये उत्पन्न की जा रही हैं । जबसे जातीय आधारित जनगणना की माँग उठी तब से समाज का ध्यान उन लोगों की ओर से भी हट गया जो सनातन धर्म को समाप्त करने का आव्हान कर रहे थे । जब यह आव्हान हुआ था, तब संपूर्ण सनातनी समाज में भावनात्मक एकात्मकता दिखने लगी थी । पता नहीं यह केवल संयोग है कि योजनानुसार कार्य कि जबसे जातीय आधारित जनगणना की माँग उठी है तब से वे लोग ओझल हो गये जो सनातन धर्म को समाप्त करने का कुचक्र कर रहे हैं। उनका काम रूका नहीं होगा । बल्कि समाज जातीय समीकरण के आँकड़ों में उलझ गया ।

भविष्य के संकेत चिंताजनक

भविष्य की दीवार पर जो आशंका झाँक रही है । उसे देखकर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आगे चलकर यह अभियान केवल जाति आधारित जनगणना अथवा उनके आँकड़े एकत्र करने तक सीमित न रहेगा अपितु समाज के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी सक्रिय हो सकते हैं जो समाज में जाति आधारित वैमनस्य फैलाने का काम करें। यह सोशल मीडिया का जमाना है । कुछ लोग फर्जी एकाउंट बना कर जातियों के परस्पर वैमनस्य फैलाने की सामग्री डाल सकते हैं फर्जी वीडियो भी हो सकते हैं। ऐसी फर्जी सामग्री और वीडियो सामने आने भी लगे हैं । यह आशंक भी प्रबल है कि राजनैतिक समूहों में वे शक्तियाँ भी शामिल हो जाये जो भारतीय समाज में जातीय विवाद पैदाकर प्रगति का मार्ग अवरुद्ध करें।

scroll to top