सोशल मीडिया का उफान, देसी भाषाओं का बोलबाला, और Gen Beta की दस्तक

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डिजिटल मकड़जाल में फंसा भारत: रील्स, सेल्फी और अश्लीलता के नशे में बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी!!

दुर्घटनाएं, षडयंत्र, अपराध, मौत, बिखरते रिश्ते, तनाव, और क्या क्या दे रहा है इंटरनेट क्रांति का भूत ?

स्क्रॉल, स्वाइप, रिकॉर्ड, रीप्ले—हमारी उंगलियां थमती नहीं, और नजरें स्क्रीन से हटती नहीं! रील्स और शॉर्ट्स की चकाचौंध में डूबे हम, सेल्फी के जुनून और सोशल मीडिया की लत में ढूंढ रहे मोक्ष। क्या हम डिजिटल आजादी के नाम पर अपनी संस्कृति, संवेदनाएं और समय को खो रहे हैं? यह कहानी है एक ऐसी पीढ़ी की, जो लाइक्स के पीछे अपनी पहचान भूल रही है और वायरल होने की होड़ में खतरों से खेल रही है|

चेन्नई के एन्नोर में 18 वर्षीय प्रदीप 30 जून 2025 को एक रील बनाते वक्त समंदर की तेज़ लहर से टकरा कर चट्टान पर गिर गया और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई।

मई 2025 में कैनरी द्वीप में एक 48 वर्षीय व्यक्ति होटल की छत की रेलिंग से सेल्फी लेने की कोशिश में 100 फीट नीचे गिर गया।

फरवरी 2025 में श्रीलंका में एक रूसी महिला पर्यटक चलती ट्रेन से सेल्फी लेते हुए चट्टान से टकरा गई और जान गंवा बैठी।
ये सब हादसे सोशल मीडिया की रील सनक (Reel Mania) के खतरनाक असर को दिखाते हैं, जिसमें कुछ सेकंड की शोहरत के लिए लोग जान की बाज़ी लगा रहे हैं। तेज़, चकाचौंध भरे, नाटकीय कंटेंट को बढ़ावा देने वाले एल्गोरिद्म लोगों को और मौत से खेलने के लिए उकसाते हैं। मगर इन “लाइक्स” और “दिल” के पीछे छिपी होती है एक त्रासदी—मौतें, उजड़े घर और सदमे में डूबी बस्तियाँ।

जब रिस्क को रोमांच की तरह पेश किया जाता है, तो हकीकत से रिश्ता टूटने लगता है। प्रदीप की मौत जैसी घटनाएँ एक दिन की खबर बन कर सोशल मीडिया फीड में दब जाती हैं।

असली रचनात्मकता जान लेवा नहीं होनी चाहिए। प्लेटफॉर्म्स को चाहिए कि वो खतरनाक कंटेंट को चिन्हित करें और उसकी पहुँच कम करें। क्रिएटर्स को भी ज़िम्मेदारी से काम लेना होगा—क्लिफ, रेलिंग, लहरों पर शूट करने से पहले एक पल रुकना ज़रूरी है। रील्स में सच्चे अनुभवों को सेलिब्रेट किया जाए, न कि बेवकूफ़ी भरे खतरे को।
आज भारत का डिजिटल परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। 2025 की शुरुआत में भारत में 806 मिलियन इंटरनेट यूज़र्स (55.3% आबादी) और 491 मिलियन सोशल मीडिया अकाउंट (33.7%) थे। सस्ता डेटा और युवा आबादी (औसत उम्र 28.8) इस क्रांति को रफ्तार दे रहे हैं।

इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म्स छा गए हैं, जहां हर दिन औसतन 2 घंटे 28 मिनट भारतीय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं।

मगर एक सच्चाई यह भी है कि 65.5% सोशल मीडिया यूज़र्स पुरुष हैं—जो महिलाओं के लिए सांस्कृतिक और तकनीकी रुकावटों से जुड़े खतरे बढ़ाता है। ग्रामीण भारत (62.9% आबादी) अभी भी डिजिटल पहुँच से वंचित है।

भारत में कंटेंट की जंग तेज़ हो रही है। इंस्टाग्राम शहरी फैशन और ट्रेंड से चमक रहा है, वहीं यूट्यूब शॉर्ट्स धीमी लेकिन गहरी पकड़ बना रहा है, खासकर छोटे शहरों और गांवों में। मजे की बात है कि 70% नए इंटरनेट यूज़र्स हिंदी, तमिल, बांग्ला जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट पसंद कर रहे हैं। देसी भाषाओं में विज्ञापन करने वाली कंपनियों को इंग्लिश-केंद्रित कंपनियों की तुलना में 40–60% ज़्यादा प्रॉफिट हो रहा है।

ShareChat, Moj, Josh जैसे प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय क्रांति के अगुवा हैं। यूट्यूब और इंस्टा पर भी लोकल क्रिएटर्स की बाढ़ आ चुकी है। उदाहरण के लिए, Sudarshan AI Labs ने हिंदी, अवधी और भोजपुरी इंटरफेस लाकर यूज़र संतुष्टि में 40% बढ़ोतरी दर्ज की।

हाल की स्ट्डीज के मुताबिक भारत का Gen Z (1995–2009) व्यावहारिक तो है, पर तनावग्रस्त भी है। 28% को चिंता और 18% को सोशल मीडिया से तनाव होता है। 39% करियर के लिए नौकरी बदलने को तैयार हैं। 59% बचत कर रहे हैं और 46% स्टॉक्स में निवेश कर रहे हैं।

सोशल एक्टिविस्ट और कम्युनिकेशन ट्रेनर मुक्त गुप्ता के मुताबिक, “अब आ रही है Generation Beta (2025–2039):ये वो पीढ़ी है जो AI, स्मार्ट गैजेट्स और वर्चुअल रिएलिटी में जन्मेगी। यह पीढ़ी टिकाऊ विकास (sustainability) और वैश्विक सोच को प्राथमिकता देगी, जिससे ब्रांड्स को भी खुद को ढालना पड़ेगा।”

लेकिन चुनौतियाँ अभी बाकी हैं। 652 मिलियन भारतीय अब भी इंटरनेट से कटे हैं। स्वतंत्र अभिव्यक्ति और सुरक्षा में संतुलन जरूरी है। लेकिन भारत की डिजिटल क्रांति अब रुकने वाली नहीं है।लोकल भाषाओं का उभार, शॉर्ट वीडियो का बोलबाला और Gen Beta की दस्तक—ये भारत को ग्लोबल डिजिटल ट्रेंड्स का अगुवा बना सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ: विश्व शांति का चौकन्ना सिपाही या खामोश असहाय दर्शक?

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क्या डोनाल्ड ट्रंप के उदय के बाद विश्व शांति खतरे में है? क्या न्यूक्लियर युद्ध का भय बढ़ रहा है, क्योंकि कई हॉटस्पॉट्स—यूक्रेन, ताइवान, मध्य पूर्व—तनावपूर्ण हैं? व्यापार युद्ध तेज हो रहे हैं, देश आर्थिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। “सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट” का माहौल बन रहा है, जहां शक्ति और संसाधनों की होड़ ने सहयोग को कमजोर कर दिया है। वैश्विक स्थिरता डगमगा रही है, और एक छोटी सी चिंगारी भी विनाशकारी परिणाम ला सकती है।

ये वक्त सीज फायर, सीज फायर खेलने का नहीं है?

ऐसे में क्या संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी मौजूदा संरचना और शक्ति संतुलन के साथ, 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है?

संयुक्त राष्ट्र संघ: विश्व शांति का चौकन्ना सिपाही या खामोश असहाय दर्शक?

बृज खंडेलवाल

क्या डोनाल्ड ट्रंप के उदय के बाद विश्व शांति खतरे में है? क्या न्यूक्लियर युद्ध का भय बढ़ रहा है, क्योंकि कई हॉटस्पॉट्स—यूक्रेन, ताइवान, मध्य पूर्व—तनावपूर्ण हैं? व्यापार युद्ध तेज हो रहे हैं, देश आर्थिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। “सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट” का माहौल बन रहा है, जहां शक्ति और संसाधनों की होड़ ने सहयोग को कमजोर कर दिया है। वैश्विक स्थिरता डगमगा रही है, और एक छोटी सी चिंगारी भी विनाशकारी परिणाम ला सकती है।
ये वक्त सीज फायर, सीज फायर खेलने का नहीं है?
ऐसे में क्या संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी मौजूदा संरचना और शक्ति संतुलन के साथ, 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है?
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रूस-यूक्रेन युद्ध तीसरे साल में, ग़ाज़ा पर इस्राइली बमबारी जारी, ईरान पर अमेरिका की एयर स्ट्राइक्स — दुनिया जल रही है और संयुक्त राष्ट्र एक बेबस तमाशबीन की तरह मूक बैठा है। क्या यह संस्था अब केवल दिखावटी समारोहों और खोखले प्रस्तावों तक सिमट गई है?

जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र (United Nations) का गठन हुआ था, तो यह उम्मीद की जा रही थी कि यह संस्था दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचा पाएगी और वैश्विक न्याय व शांति की नींव रखेगी। लेकिन आज के हालात इस वायदे की विफलता की कहानी कह रहे हैं। ग़ाज़ा में बच्चों की लाशें बिछी हैं, यूक्रेन के शहर मलबों में तब्दील हो चुके हैं, और ईरान के ऊपर बम गिर रहे हैं — मगर संयुक्त राष्ट्र सिर्फ़ “कड़ी निंदा” करता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इस्राइल-फिलस्तीन संघर्ष, यूएन की निष्क्रियता ने इसकी प्रासंगिकता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषक ने तीखा बयान दिया — “यूएन अब एक ऐसी संस्था है जो आख़िरी साँसें गिन रही है।” दरअसल, वैश्विक समुदाय की अपेक्षाओं पर यह संस्था लगातार असफल साबित हो रही है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), जिसे विश्व शांति का मुख्य संरक्षक माना जाता है, पाँच स्थायी सदस्य देशों — अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन — की वीटो शक्ति के कारण पंगु बन चुकी है। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण की निंदा करने वाले प्रस्तावों को रूस ने वीटो कर दिया, तो ग़ाज़ा में इस्राइल की कार्रवाइयों के विरोध में अमेरिका ने बार-बार अड़ंगा लगाया।

“जिसकी लाठी, उसकी भैंस” — यह कहावत अब यूएन की कार्यप्रणाली पर सटीक बैठती है। शक्तिशाली देश अपने हितों के अनुसार संस्था को मोड़ते हैं, जबकि बाकी देश दर्शक बने रह जाते हैं।
कठपुतली नृत्य
COVID-19 महामारी के दौरान, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), जो संयुक्त राष्ट्र की ही एक इकाई है, पर चीन के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगा। महामारी की घोषणा में देरी और वायरस की उत्पत्ति पर पर्दा डालने की कोशिशों ने WHO की साख को झटका दिया। “न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी” — जब पारदर्शिता ही न हो, तो वैश्विक स्वास्थ्य संकट से लड़ना कैसे संभव होगा?

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं “UN की मानवाधिकार परिषद में चीन की प्रमुख भूमिका और पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी समिति में उपस्थिति ने वैश्विक न्याय के सिद्धांतों की खिल्ली उड़ा दी है। हांगकांग और झिंजियांग में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए कुख्यात चीन का मानवाधिकारों पर भाषण देना और कश्मीर में आतंकवाद फैलाने वाले पाकिस्तान का आतंकवाद विरोधी मंच की अगुवाई करना, “चिराग तले अंधेरा” जैसी विडंबना को चरितार्थ करता है।”

संयुक्त राष्ट्र की लाचारी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अमेरिका, इस्राइल, रूस और कुछ अन्य देश बिना यूएन की अनुमति के ही एकतरफा सैन्य कार्रवाई करते हैं — ड्रोन हमले, लक्षित हत्याएं, और बमबारी अब सामान्य बन गई हैं। वैश्विक कानून व्यवस्था की संरचना जब अनदेखी हो, तो संस्था की प्रासंगिकता पर संदेह होना स्वाभाविक है।

आज का विश्व बहुध्रुवीय हो चुका है। भारत, ब्राज़ील, जर्मनी और जापान जैसे देश वर्षों से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहे हैं। मगर पुराने सदस्य अपनी सत्ता नहीं छोड़ना चाहते। नतीजा यह है कि संयुक्त राष्ट्र “ना खुदा ही मिला, ना विसाले सनम” की स्थिति में फंस चुका है — न असरदार बन पा रहा है, न निष्पक्ष।

सीनियर पत्रकार अजय झा को अभी उम्मीद है। ” तमाम असफलताओं के बावजूद संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। जलवायु परिवर्तन, आपदा राहत, और शरणार्थी सहायता जैसे क्षेत्रों में इसकी भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है। UNFCCC और UNHCR जैसी संस्थाएं पर्यावरणीय नीति और मानवीय संकटों के दौरान कुछ उम्मीद जगाती हैं।”

लेकिन अगर इस संस्था ने “जो समय के साथ नहीं बदले, उन्हें समय बदल देता है” की सीख नहीं ली, और वीटो जैसी विषैली शक्तियों पर नियंत्रण, जवाबदेही की प्रणाली और समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया, तो यह संस्था इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी — एक ‘अवसर गंवाने वाली संस्था’ के रूप में।

संयुक्त राष्ट्र आज जिस चौराहे पर खड़ा है, वहां से या तो यह संस्थागत सुधारों के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है — या फिर एक ऐसे ‘भूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय मंच’ में तब्दील हो सकता है, जिसकी केवल सालगिरहें मनाई जाएंगी, काम नहीं याद किया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस: ‘मैं और मेरा थैला’

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आगरा । पचास वर्षों का साथ ! मेरे जीवन का एक विश्वस्त साथी रहा है—मेरा झोला। यह कोई साधारण थैला नहीं, बल्कि मेरे व्यक्तित्व, मेरे विचारों और मेरी आदतों का प्रतीक है। पचास वर्षों से यह मेरे साथ रहा है। कभी किताबों से भरा, कभी कागज़ातों से, तो कभी सपनों से। मेरे मित्र स्व. श्रवण कुमार समय-समय पर मुझे नए थैले भेंट करते रहे, जिनमें से हर एक की अपनी एक कहानी थी। दिल्ली के पुराने समाजवादी साथी प्रो. पारस नाथ चौधरी (दरभंगा वाले) तो अपने थैले के साथ ही सोते हैं। वहीं, स्व. कामरेड राम किशोर का झोला ज़माने भर के क्रांतिकारी पेम्प्लेट्स और पर्चों से भरा रहता था। ये झोले सिर्फ़ थैले नहीं थे, बल्कि आत्मनिर्भरता, विचारधारा और परिवर्तन के प्रतीक थे।

झोला: आज़ादी और स्थिरता का प्रतीक

झोला या कपड़े का थैला केवल एक सामान रखने की वस्तु नहीं है—यह एक जीवनशैली है। यह उस सोच को दर्शाता है जो प्लास्टिक की गुलामी से मुक्त होकर प्रकृति के साथ तालमेल बिठाती है। जब हमारे पास अपना झोला होता है, तो हमें प्लास्टिक या पॉलीथिन की थैलियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह छोटा-सा कदम पर्यावरण को बचाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

प्लास्टिक मुक्ति: एक ज़रूरी संकल्प

आज अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्लास्टिक बैग्स का उपयोग बंद कर देंगे। प्लास्टिक प्रदूषण आज दुनिया की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। यह न सिर्फ़ हमारी धरती को प्रदूषित कर रहा है, बल्कि समुद्री जीवन, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य के लिए भी घातक साबित हो रहा है। प्लास्टिक की थैलियाँ सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होतीं और मिट्टी व पानी को जहरीला बना देती हैं।

कपड़े के थैले: टिकाऊ और स्टाइलिश विकल्प
कपड़े के थैले न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि ये टिकाऊ और स्टाइलिश भी हैं। आजकल बाज़ार में कई तरह के आकर्षक डिज़ाइनों वाले कपड़े के झोले उपलब्ध हैं, जिन पर प्रेरक संदेश लिखे होते हैं, जैसे—

– “प्लास्टिक फ्री, दैट्स मी!”
– “कैरी क्लॉथ, सेव अर्थ!”
– “मेरा झोला, मेरी पहचान!”

ये थैले न सिर्फ़ आपके शॉपिंग एक्सपीरियंस को बेहतर बनाते हैं, बल्कि आपको एक जागरूक नागरिक के रूप में भी पहचान दिलाते हैं।
एक छोटा कदम, बड़ा बदलाव

हर व्यक्ति यदि अपने स्तर पर प्लास्टिक बैग्स का उपयोग बंद कर दे, तो इससे बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। आइए, इस दिवस पर हम यह प्रण लें—
1. हमेशा अपना कपड़े का थैला साथ रखेंगे।
2. दुकानदारों को प्लास्टिक बैग देने से मना करेंगे।
3. अपने परिवार और दोस्तों को भी प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे।

मेरा झोला मेरे लिए सिर्फ़ एक थैला नहीं, बल्कि एक विचारधारा है—सादगी, स्वावलंबन और पर्यावरण संरक्षण की। आप भी अपने जीवन में एक सुंदर-सा झोला अपनाइए, जो न सिर्फ़ आपका सामान संभालेगा, बल्कि प्रकृति के प्रति आपकी ज़िम्मेदारी भी निभाएगा।

शृंखला आलेख – 18 उस दौर के शहरी माओवादी

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रायपुर : बंदूख लेकर माओवाद सीधे नहीं उपजा, बल्कि उसे उर्वरा जमीन शहरी माओवादियों ने प्रदान की है। बस्तर परिक्षेत्र में माओवाद को अस्सी के दशक का बताया जाता है लेकिन आश्चर्य होगा इससे दशकों पहले जमीन तैयार की जा रही थी। इसका प्रयास महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव के जीवित रहते ही आंध्रप्रदेश की ओर से आरंभ हो चला था।

तेलांगाना सशस्त्र संघर्ष के इतिहास लेखक पी. सुंदरैया ने लिखा है कि “1951 में पहली बार अविभाजित सीपीआई ने गोदावरी पार कर बस्तर में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन उन लोगों के बीच से उन्हें कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। वे उनकी भाषा तक नहीं समझ सकते थे। इसके बजाय उनका सामना हुआ शत्रुतापूर्ण पुलिस से। भोपालपट्टनम में जब उनके तीन साथियों को गोली मारी गई तो कम्युनिष्ट वहाँ से लौट गये”। सुंदरैया के अनुसार प्रयास यहीं नहीं रुके बल्कि वर्ष 1963 में लाल झंडों के साथ एक सायकिल रैली भी कम्युनिष्टों द्वारा निकाली गई थी। महाराजा प्रवीर के कारण बस्तर को एक स्वर और प्रतिनिधित्व प्राप्त था इसलिए असफलता स्वाभाविक है।

जब शहरी नक्सलवाद शब्द आविष्कृत भी नहीं हुआ था उस दौर की यह घटना महत्व की है। बात है वर्ष 1968 की और स्थान है जगदलपुर जबकि दीवारों पर उग्र वामपंथी नारों के लेखन के लिए वाई. एस. मूर्ति नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया था। यह व्यक्ति भी आंध्र-तेलांगाना का ही था। मूर्ति की गिरफ्तारी बहुत चर्चा में रही थी और इसका विरोध तब शंकर गुहा नियोगी ने भी किया और अपनी गिरफ्तारी भी दी थी।

इन छुटपुट घाटनाओं के बीच एक वारंगल का एक शहरी नक्सली चुपचाप अपना काम कर रहा था और उसका नाम था पी विजय कुमार। बंदूख वालों के आगमन से पहले ही आंध्र-तेलांगाना से शहरी नक्सली लगातार दस्तक दे रहे थे और बस्तर में माओवाद के लिए जमीन तैयार करने में लगे थे। विजय कुमार एक डॉक्टर था और उसने वर्ष 1974 में भोपालपट्टनम में डॉ. श्रीनिवास राव के नाम से काम शुरू किया। इसका सहयोगी था तुषार कान्ति भट्टाचार्य जो बदले हुए नाम मोहन सिंह के साथ काम कर रहा था। बाद में तुषार ने अपना अलग क्लीनिक तारलागुड़ा में खोल लिया। इनकी गतिविधियों पर पुलिस की निगाह थी। जब छापा मारा गया तो बहुत बड़ी मात्रा में जमीन में गाड़ कर छिपाया गया नक्सल साहित्य बरामद हुआ। डॉक्टरों के भेस में आतंकवाद का पोषण करने वाला विजय कुमार या तुषार कोई अकेले उदाहरण तो नहीं है बल्कि यहाँ से आरंभ कर विनायक सेन तक यह एक श्रंखला है जो शहरी माओवाद शब्द को तथ्यपरक बनाती है। विजय कुमार के बारे में बताया जाता है कि गिरफ्तार होने के डर से संभवत: वह अमेरिका भाग गया था।

शहरी नक्सलवाद आज मीडिया और सोशल मीडिया का सहारा लेता है। वर्ष 1980 के दौर में टेलीविजन बहुत हद तक सरकारी नियंत्रण में था और सोशल मीडिया समुपस्थित नहीं था परंतु तब सिनेमा, विशेषरूप से समानांतर सिनेमा कम्युनिष्टों और शहरी माओवादियों की ताकत बना। इस कडी में माओवसाद को महिमामण्डित करती वर्ष 1980 में बनायी गयी ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म दि नेक्सलाईट पर चर्चा आवश्यक है। कथानक आश्चर्य में डालता है चूंकि फिल्म में उस दौर का बस्तर दिखाया गया है जब यहाँ नक्सल गतिविधियाँ आरम्भ भी नहीं हुई थीं। बस्तर को बहुत शोध के स्थान पर रुमानियत के साथ दिखाया गया है। फिल्म का बस्तरिया पात्र अर्जुन आदिवासी रॉबिन हुड अधिक प्रतीत होता है। नायिका स्मिता पाटिल ने ताकतवर भूमिका अदा की है। केवल शक के आधार पर नायिका अपने कमांडर का आदेश मिलने के कारण प्रेमी पर उसके निर्दोष होने की बात जानते-बूझते हुए भी गोली चला कर हत्या कर देती है।

मुझे यह बात आश्चर्य में डालती है कि जब आंध्र-तेलांगाना नक्सलवाद की आग में झुलस रहे थे तब उसे ओर से बस्तर के भीतर कोई अध्यापक, कोई चिकित्सक या कोई सिनेमा कैसे बंदूख की आमद के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था। उस दौर के शहरी नक्सली भी भुलाये नहीं जाने चाहिए क्योंकि माओवाद केवल बंदूख नहीं है।

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