वृंदावन के पवित्र वृक्षों की हत्या, कार्रवाई का आह्वान

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वृंदावन : ब्रज मंडल के ग्रीन कार्यकर्ताओं द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्रेषित ज्ञापन एक गंभीर मुद्दे को उजागर करता है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। वृंदावन में वैष्णोदेवी मंदिर के पास 300 से अधिक पेड़ एक ही रात में, बारिश और अंधकार का फायदा उठाते हुए बेरहमी से काट दिए गए हैं, जिससे समूचा भक्त समुदाय और पर्यावरण प्रेमी सदमे और आक्रोश में है।

पर्यावरण के साथ बर्बरता का यह कृत्य उस क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन और सांस्कृतिक विरासत को खतरे में डालता है, जो कभी अपने मंदिरों, घुमावदार गलियों (कुंज गलियों) और पक्षियों और जानवरों को आकर्षित करने वाली हरी-भरी हरियाली के लिए जाना जाता था।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने कहा, “पर्यावरण की भलाई को बनाए रखने, छाया प्रदान करने, हवा को शुद्ध करने और विभिन्न प्रजातियों के लिए आवास के रूप में काम करने में पेड़ों का महत्व है। माना जाता है कि अपराधी भू-माफिया और डेवलपर्स हैं, जो दीर्घकालिक परिणामों की परवाह किए बिना लाभ के उद्देश्य से प्रेरित हैं।”

चिंतित नागरिकों, धार्मिक नेताओं और पर्यावरणविदों की सामूहिक आवाज़ जिम्मेदार लोगों के खिलाफ़ कार्रवाई की मांग करती है। जैसा कि हम एक स्थायी भविष्य के लिए प्रयास करते हैं, ब्रज भूमि की प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। वृंदावन के हरित कार्यकर्ता मधु मंगल शुक्ला, जिनकी इस विषय पर याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है, कहते हैं कि कार्रवाई करने का समय अभी है, और हमारी विरासत आज हमारे द्वारा लिए गए निर्णयों पर निर्भर करती है।

वृंदावन, जो इतिहास और आध्यात्मिकता से भरा शहर है, में पेड़ों का विनाश बढ़ते पर्यावरणीय खतरों की एक कठोर याद दिलाता है। निधि वन जैसे कई पवित्र स्थल और वन जो अपनी रहस्यमयी और मनमोहक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें तुलसी के पेड़ और राधा और कृष्ण की लीलाओं को समर्पित एक मंदिर है, को भूमि हड़पने वालों के खिलाफ़ सुरक्षा और सतर्कता की आवश्यकता है।

प्रकृति के प्रति श्रद्धा और पेड़ों के बेतहाशा विनाश के बीच का अंतर इससे अधिक स्पष्ट नहीं हो सकता।

फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन संस्था के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार जैसे स्थानीय कार्यकर्ता कहते हैं, “इस घटना को पर्यावरण की रक्षा और श्री कृष्ण भूमि के सांस्कृतिक परिदृश्य को परिभाषित करने वाले मूल्यों को बनाए रखने की हमारी प्रतिबद्धता में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनने दें। वृंदावन में पेड़ों की सामूहिक कटाई सिर्फ़ पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संकट भी है। पेड़ हमेशा से वृंदावन की पहचान का अभिन्न हिस्सा रहे हैं, जो प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच दिव्य संबंध का प्रतीक हैं। इन पेड़ों का खत्म होना विरासत का नुकसान है, सदियों से पूजनीय रही इस भूमि की आत्मा पर आघात है।

अब तक, इस त्रासदी के प्रति समुदाय की प्रतिक्रिया एकता और दृढ़ संकल्प की रही है। स्थानीय सांसद हेमा मालिनी पेड़ों की सामूहिक कटाई की कथित घटना से स्तब्ध हैं। उन्होंने कार्रवाई की मांग करते हुए यूपी के मुख्यमंत्री से शिकायत की है। पेड़ प्रेमी जनार्दन शर्मा ने कहा, “मैं इस साइट पर सैकड़ों मोरों को उनके आवास से वंचित देखकर बेहद दुखी हूं। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ों की कटाई के दौरान कई पक्षी भी मर गए। “उन्होंने अपना आशियाना खो दिया है।”

वृंदावन के कृष्ण भक्त शोक में हैं। लखनऊ के पर्यावरणविद साथी राम किशोर चाहते हैं कि सरकार इस संकट का तुरंत और दृढ़ संकल्प के साथ जवाब दे। पेड़ों की सामूहिक कटाई के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और उन्हें जवाबदेह ठहराने के लिए तत्काल कार्रवाई की जरूरत है। वनों और हरित क्षेत्रों को शोषण से बचाने के लिए सख्त नियम लागू किए जाने चाहिए।

ग्रीन कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि बार-बार पर्यावरण के साथ होने वाली बर्बरता को रोकने के लिए जागरूकता बढ़ाने और जन समर्थन जुटाने के लिए सामुदायिक भागीदारी बहुत ज़रूरी है।

दृढ़ कदम उठाकर हम वृंदावन की विरासत का सम्मान कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि इसकी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक सार भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहें।

जैव विविधता विशेषज्ञ डॉ. मुकुल पंड्या कहते हैं कि वृंदावन के पवित्र वृक्षों का नरसंहार एक चेतावनी है, जो हमें पर्यावरण की रक्षा करने और उसे संजोने की हमारी ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है, जो हम सभी को जीवित रखता है।

यदि नदियाँ मर जाएँगी, तो हमारी संस्कृति और आस्था भी मर जाएगी

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आगरा/वृंदावन : 22 सितंबर को विश्व नदी दिवस के नज़दीक आते ही, पर्यावरण कार्यकर्ता प्रदूषण और अंतर-राज्यीय नदी जल बंटवारे के विवादों से निपटने के लिए राष्ट्रीय नदी नीति की तत्काल माँग कर रहे हैं।

देवाशीष भट्टाचार्य ने आगरा में यमुना नदी पर एक बैराज की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि इसके किनारों पर स्थित स्मारकों और पर्यटन स्थलों की सुरक्षा की जा सके।

चतुर्भुज तिवारी ने राज्य सरकार से जहरीले प्रदूषकों को खत्म करने के लिए नदी के तल से गाद निकालने और ड्रेजिंग करने का आह्वान किया, जबकि लोक स्वर के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने दिल्ली से आगरा तक फेरी सेवा के अधूरे वादे पर प्रकाश डाला। नितिन गडकरी ने २०१५ में वायदा किया था आगरा से दिल्ली के बीच टूरिस्ट्स के लिए फैरी सर्विस शुरू करने का वायदा किया था। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ ने भी यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करके दोबारा पुराना गौरव लौटाने का सपना दिखाया था जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है।

कार्यकर्ता राहुल राज और पद्मिनी अय्यर ने नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए अपस्ट्रीम बैराज द्वारा पानी का निरंतर प्रवाह जारी करने के महत्व को रेखांकित किया।

रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक ने प्रदूषण और अंतर-राज्यीय विवादों से संबंधित मुद्दों को संबोधित करने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नदी नीति की मांग की।

ग्रीन कार्यकर्ताओं ने भारत में नदियों को बचाने और नदियों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए उपाय शुरू करने में सभी प्रकार के राजनेताओं की विफलता पर दुख जताया।

फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार ने कहा, “दुनिया भर में नदियां मर रही हैं। विकास ने जल निकायों पर भारी असर डाला है, जबकि नियामक एजेंसियां ​​जल संरक्षण और नदियों को बचाने के लिए एक रूपरेखा तैयार करने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जो एक विरासत और कीमती पेयजल का स्रोत दोनों हैं। दुनिया की कई नदियाँ खराब स्थिति में हैं और प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और औद्योगिक विकास से जुड़े बढ़ते दबावों का सामना कर रही हैं, इसलिए वैश्विक प्रयासों की तत्काल आवश्यकता है।”

पंडित जुगल किशोर ने कहा कि भारतीय नदियाँ सीवेज नहरों में बदल गई हैं। राज्य सरकारें नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए उपयुक्त रणनीति बनाने में अपने पैर पीछे खींच रही हैं।

नदी कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि हमारी नदियाँ मर जाती हैं, तो हमारी गौरवशाली संस्कृति, धार्मिक विश्वास, हमारी पहचान और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

स्थिति भयावह है और तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। सरकार को औद्योगिक अपशिष्ट निपटान पर सख्त नियम लागू करके, टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर और उन्नत जल उपचार सुविधाओं में निवेश करके हमारी नदियों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।

राज कुमार माहेश्वरी और शाहतोष गौतम ने कहा कि नागरिकों को नदी संरक्षण के महत्व और इन महत्वपूर्ण जल निकायों की रक्षा में उनकी भूमिका के बारे में शिक्षित करने के लिए जन जागरूकता अभियान भी आवश्यक हैं।

इसके अलावा, जल बंटवारे के विवादों को सुलझाने और संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करने के लिए अंतर-राज्यीय सहयोग महत्वपूर्ण है। मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामुदायिक भागीदारी द्वारा समर्थित एक एकीकृत दृष्टिकोण एक स्थायी भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकता है जहाँ हमारी नदियाँ फलती-फूलती रहेंगी और हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत संरक्षित रहेगी।

एक देश एक चुनाव – लाभ अनेक

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीसरी पारी में राष्ट्रहित के संकल्पों को पूर्ण करने के लिए लगातार आगे बढ़ रहे हैं, इसी कड़ी के अंतर्गत उन्होंने बहु प्रतीक्षित “एक देश -एक चुनाव” का संकल्प पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण पहल कर दी है। लगातार तीसरी बार देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के 100 दिन पूर्ण होने के अवसर पर मोदी कैबिनेट ने, “एक देश एक चुनाव” पर उठ रहे प्रश्नों पर विराम लगा दिया है। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से अपना सन्देश देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने “एक देश एक चुनाव“ पर आगे बढ़ने के संकेत दिये थे और अब कैबिनेट ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद समिति की अनुशंसा को मंजूरी प्रदान कर दी है।

एक देश एक चुनाव, परिकल्पना को कैबिनेट की मंजूरी प्राप्त हो जाने के बाद राजनैतिक दलों के बीच सहमति बनाने की जिम्मेदारी रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, किरन रिजिजू व कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को दी गई है। एक देश एक चुनाव को लेकर गठित समिति ने इस विषय पर सभी प्रमुख राजनैतिक दलों से विचार विमर्श किया था जिनमें 32 राजनैतिक दल इसके समर्थन में और 15 विरोध में थे। अब इस बात की प्रबल संभावना बन गई है कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इस हेतु आवश्यक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किये जाएंगे और ऐसा माना जा रहा है कि सरकार ने इन सभी विधेयको को पारित करवाने के लिए प्रबंध भी लगभग कर लिया है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में वर्ष 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे हैं उस समय संपूर्ण भरत मे कांग्रेस व उसके समर्थित दलों की सरकारें ही राज्य विधानसभाओें में हुआ करती थीं। चुनाव आयोग ने वर्ष 1982 में फिर उसके बाद जस्टिस बी. बी. जीवन की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने एक देश एक चुनाव की सिफारिश की थी। वर्ष 2018 में जस्टिस बी एस चौहान की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने एक ड्राफ्ट रिपोर्ट में एक साथ चुनाव की बात करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 83, 85,172, 174 और 356 में संशोधन करने होंगे। वर्ष 2015 में संसद की स्थायी समिति ने भी दो चरणों में लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव कराने की सिफारिश की थी।

राजनैतिक दृष्टिकोण से यह बहुत ही हैरान करने वाली बात है कि कांग्रेस पूर्वज पहले तो एक देश एक चुनाव का समर्थन कर रहे थे किंतु जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक कदम आगे बढ़ाया है और उसे लागू करने के लिए पूर्णता की ओर बढ़ रही है तब से कांग्रेस व उसके सहयोगी दल जिन्होंने इंडी गठबंधन बनाया है एक देश एक चुनाव की व्यवस्था का विरोध करने लगे हैं। सभी राजनैतिक दलों का मानना है कि भारत में एक देश एक चुनाव की व्यवस्था अलोकतांत्रिक,असंवैधानिक तथा असंभव है। कई नेता इसे प्रधानमंत्री व भाजपा सरकार का मात्र एक शिगूफा कह रहे हैं । एक देश एक चुनाव की नीति का क्षेत्रीय दलों द्वारा विरोध किए जाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि उन्हें आशंका है कि भारत में यह प्रणाली लागू हो जाने के बाद उनका अस्त्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। भारत में कई दलों का अस्तित्व बार बार होने वाले चुनावों के कारण ही संभव है।

वर्ष 1967 के बाद कतिपय राजनैतिक कारणों से कई विधानसभाओं को भंग करना पड़ा और फिर बीच में लम्बे समय तक केंद्र व राज्यों की राजनीति में अस्थिरता का वातावरण रहा । वर्तमान समय में भारत में दो लोकसभा चुनावों के बीच पांच सालों में कहीं न कहीं विधानसभा चुनाव होते रहते हैं जिसके कारण बार- बार आचार संहिता लगती है और जनहित व विकास के कार्यक्रम प्रभावित होते हैं। भारत में नगर निगम, नगर निकाय और ग्राम पंचायतों के चुनाव भी हर वर्ष, हर माह कहीं न कहीं होते ही रहते हैं और बीच- बीच में उपचुनाव भी आते रहते हैं और विकास कार्यों को बाधित करते हैं।

बार -बार चुनाव होने के कारण राजनैतिक दलों व नेताओं का खर्च भी भी बहुत बढ़ा रहता है जिसके कारण आर्थिक भ्रष्टाचार को बल मिल मिलता है। राजनैतिक दलों के नेता व उनके सामर्थक अपने समाज व मतदाताओ को लुभाने के लिए अनाप -शनाप बयानबाजी करते हैं जिसके कारण सामाजिक वातावरण दूषित होता है। धार्मिक वैमनस्यता भी गहराती है।

बार- बार चुनाव होने के कारण आदर्श आचार संहिता लागू होती है जिसके कारण सरकार आवश्यक नीतिगत निर्णय नहीं ले पाती और विभिन्न योजनाओं को लागू करने में समस्या आती है। यदि देश में एक ही बार में लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराये जायें तो आदर्श आचार संहिता कुछ ही समय तक लागू रहेगी।एक देश एक चुनाव की व्यवस्था लागू हो जाने के बाद चुनावों में होने वाले भारी खर्च में कमी आयेगी। इससे काले धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में सहायता मिलेगी।एक साथ चुनाव कराने से सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षाबलों को बार -बार चुनावी ड्यूटी पर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। देश में एक साथ चुनाव कराये जाने से देश की जीडीपी में लगभग 1.5 प्रतिशत वृद्धि का भी अनुमान लगाया जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मत है कि “एक देश एक चुनाव से ” सरकारें सही मायने में कम से कम साढ़े चार वर्ष विकास कार्य करा पायेंगी। अभी लगातार अलग -अलग होने वाले चुनावों और आचार संहिता के कारण सरकारों के हाथ 12 -15 महीने बंधे रहते हैं।

एक देश -एक चुनाव पर रामनाथ कोविंद समिति ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं जिसके अंतर्गत यह योजना देश में दो चरणों में लागू की जायेगी। पहले चरण में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव करायें जायें और दूसरे चरण में नगरीय निकायों और पंचायतों के चुनाव कराये जायें लेकिन इन्हें पहले चरण के 100 दिन के भीतर ही कराया जाये । लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होते ही राज्यों की विधानसभा का चुनाव कराया जाये अगर किसी विधानसभा का चुनाव अपरिहार्य कारणों से एक साथ नहीं हो पाता है तो बाद की तिथि में होगा किंतु कार्यकाल उसी दिन समाप्त होगा। यदि किसी राज्य की विधानसभा बीच में ही भंग हो जाती है तो नया चुनाव विधानसभा के बाकी के कार्यकाल के लिए ही कराया जाये। सभी चुनावों के लिए एक समान मतदाता सूची तैयार की जाये। इसे अमल में लाने के लिए एक कार्यान्व्यन समूह का गठन किया जाये।कोविंद समिति ने 18 संविधान संशोधनों की सिफारिश भी की है जिसमें से अधिकांश में राज्य विधानसभाओं के अनुमोदन की जरूरत नहीं होगी जबकि समान मतदाता सूची और समान मतदाता पहचान पत्र से जुड़े कुछ प्रस्तावित बदलावों के लिए आधे राज्यों द्वारा अनुमोदन की जरूरत होगी। मोदी सरकार का दावा है कि समिति की परामर्श प्रक्रिया के दौरान 80 प्रतिशत युवा एक देश व एक चुनाव का समर्थन किया था।

वर्तमान में विपक्ष केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी नीतियों का विरोध करने के लिए ही एक देश -एक चुनाव को लोकतंत्र व संविधान विरोधी बता रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते ही रहे हैं औैर तब कांग्रेस का ही युग था अतः कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना होगा कि तब देश में क्या संविधान विरोधी सरकार चल रही थी ? उचित तो यही है की सभी विरोधी दलों को एक साथ आकर उन विषयों का समर्थन करना चाहिए जो एक राष्ट्र के रूप में भारत के हित में है और जो भारत को विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ने में सहायक हैं ।

Silent Bastar’s Roar at Jantar Mantar

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September 19, New Delhi: A group of 50 victims of Naxal violence from Bastar, Chhattisgarh, held a silent protest at Jantar Mantar. The demonstration began at Kartavya Path, and by noon, the group reached Jantar Mantar. Under the banner of the Bastar Shanti Samiti, many of the protestors are victims of Naxalite violence, some of whom have lost limbs in these brutal attacks. They have come to Delhi demanding justice and peace for the Bastar region.

Manguram Kawade, the coordinator of the Bastar Shanti Samiti leading the protest, said, “We have been suffering from Naxalite violence for decades. Many villages in our area have been affected by this violence, and due to Naxalism, the entire Bastar region is far from any development. Our demand is that the voice of Bastar be heard and that the people there be freed from this Naxal violence.”

Gudduram Lekam, from Kachilwar village in Bijapur district of Bastar, is part of the group and shared his story with the media. He said, “On March 11, 2024, I was returning home after picking chilies from the fields when I stepped on a landmine planted by Naxals in the forest. The bomb exploded, and I lost my leg in the incident. I don’t want anyone else to suffer the same fate, so it is crucial to eliminate Naxalism from our region. This is why we have come to protest here today.”

The participants, all victims of Naxal violence, carried banners and placards during the protest. These placards bore slogans like “I am Silent Bastar, but Today I Speak!” expressing their pain and determination.

According to the Bastar Shanti Samiti, these protestors plan to use various platforms in Delhi to raise awareness, so that people in metropolitan cities like Delhi and across other major states can understand their plight and hear their voices.

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