प्रेमजाल, पैसे और छल से चल रही मजहबी मशीनरी का भंडाफोड़: अवैध धर्मांतरण पर चला योगी का चाबुक

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-प्रणय विक्रम सिंह

यह कोई सामान्य गिरफ़्तारी नहीं थी। यह उस अदृश्य मानसिक युद्ध के पर्दे उठने का क्षण था, जिसमें आस्था को अस्त्र बनाकर अस्मिता पर आघात किया जा रहा था। प्रेम, पंथ और पैसा, इन 3P के सहारे चल रहा यह अवैध धर्मांतरण का ‘मजहबी मिशन’ विशुद्ध रूप से एक वैचारिक व सामरिक अतिक्रमण था, जिसमें हिंदू समाज की जड़ों को हिलाने की कुचेष्टा की जा रही थी।

*बलरामपुर से ब्रेनवॉश तक: छांगुर बाबा का छलावरण*

बलरामपुर की गलियों में वर्षों से एक अघोषित युद्ध चल रहा था। धर्मांतरण का छद्म युद्ध, जिसमें निशाना थी बेटियां। साधन था प्रलोभन और छल। उद्देश्य था भारत की आत्मा को विखंडित करना।

यूपी एटीएस व एसटीएफ द्वारा सहयोगी नीतू उर्फ नसरीन सहित बलरामपुर के मधपुर से गिरफ्तार 50 हजार का इनामी मास्टरमाइंड जमालुद्दीन उर्फ ‘छांगुर बाबा’ खुद को ‘पीर बाबा’ और ‘हज़रत जलालुद्दीन’ जैसे नामों से प्रचारित करता था। उसका नेटवर्क केवल एक व्यक्ति या स्थान नहीं, बल्कि एक विस्तृत मानसिक और मजहबी अभियान था। उसके मज़हबी चोले के पीछे एक वैश्विक एजेंडा छिपा था। भारत के भीतर से ही उसकी संस्कृति, उसकी बेटियों और उसकी चेतना को तोड़ने का प्रयास।

*मोह, मजहब और मनी: विदेशी फंडिंग से फैला फरेब का जाल*

छांगुर गिरोह के सदस्यों की 40 से अधिक बार इस्लामिक देशों की यात्राएं, 40 से ज्यादा बैंक खाते, ₹100 करोड़ की संदिग्ध फंडिंग, विदेशी संपर्क और मानसिक ब्रेनवॉश के लिए छपी किताबें, ये केवल तथ्य नहीं, फतवा रूपी फरेब के सबूत हैं। इन्हीं अवैध पैसों से बंगले, शोरूम और लग्जरी गाड़ियां खरीदी गईं। यह गिरोह धर्मांतरण को एक संगठित आर्थिक अपराध के रूप में संचालित कर रहा था। विदेशों से आई यह राशि धार्मिक उद्देश्य की आड़ में देश के भीतर सामाजिक अस्थिरता फैलाने में प्रयुक्त हो रही थी।

छांगुर गिरोह ने ‘प्रेमजाल’ को ब्रह्मास्त्र बनाया और हिंदू युवतियों को टारगेट कर धर्मांतरण का तंत्र खड़ा किया। ‘शिजर-ए-तैय्यबा’ जैसी पुस्तकों से मनोवैज्ञानिक जिहाद चलाया गया, जहां कथित सूफी भावनाओं की ओट में आस्थाओं को खंडित किया गया। यह किताब ब्रेनवॉश का मैनुअल थी, जो हिंदू युवतियों की मानसिक संरचना को ध्वस्त करने का षड्यंत्र था।

वह युवतियां जो कभी तुलसी के पौधे में जल चढ़ाती थीं, वे अब मानसिक रूप से दरगाह की जंजीरों में बंध चुकी थीं। यह धर्मांतरण नहीं, आत्मांतरण था, जिसमें चेतना को धीरे-धीरे छीन लिया गया।

*जाति के आधार पर ईमान की कीमत: धर्मांतरण की ‘रेट लिस्ट’*

धर्मांतरण के इस गिरोह ने पीड़िताओं की जाति के आधार पर ‘दरें’ तय कर रखी थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और सिख लड़कियों के लिए ₹15-16 लाख, पिछड़ी जातियों के लिए ₹10-12 लाख, और अन्य वर्गों के लिए ₹8-10 लाख की राशि निर्धारित थी। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह धर्मांतरण न तो आस्था था, न आवश्यकता बल्कि यह एक बाज़ार था, जहां ईमान को बोली पर चढ़ाया जाता था। यह ‘रेट कार्ड’ ही साबित करता है कि इस षड्यंत्र का उद्देश्य किसी ईश्वरीय आस्था का विस्तार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का आर्थिक अपहरण था। लखनऊ निवासी गुंजा गुप्ता जैसे मामले इसकी भयावहता को सामने लाते हैं। यह ‘रेट कार्ड’ उस कलंक का प्रमाण है, जहां स्त्री का विश्वास बाजार में नीलाम हो रहा था।

*डर की दरगाह: जब धर्मांतरण में सहमति नहीं, सिर्फ साज़िश थी*

गिरोह का कार्य केवल प्रेमजाल में फंसाना नहीं था, बल्कि उसमें असहमति पर उत्पीड़न का उपकरण भी शामिल था।

यदि कोई लड़की धर्मांतरण से इनकार करती, तो उसे डराया जाता, बदनाम किया जाता, उसके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज कराने का भय दिखाया जाता। यह ‘लव जिहाद’ नहीं, लव-जाल-जिहाद था, जिसमें सुरक्षा और समृद्धि के सपनों के माध्यम से लड़की को मानसिक कैदी बनाया जाता था। यह कार्य न केवल समाज, बल्कि संविधान के विरुद्ध अपराध था। यह एक मानसिक और सामाजिक बलात्कार था।

*STF की सटीक सर्जरी: जब वर्दी बनी धर्म की प्रहरी*

इस समस्त प्रकरण में सबसे सराहनीय भूमिका उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने निभाई है। STF ने न केवल गुप्त सूचनाओं को बारीकी से संकलित किया, बल्कि छांगुर बाबा जैसे खतरनाक व्यक्ति को पकड़ने के लिए जो तकनीकी दक्षता, मनोवैज्ञानिक परिपक्वता और सामरिक रणनीति अपनाई, वह देश भर की पुलिस इकाइयों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। इस केस में STF ने फंडिंग, पासपोर्ट रिकॉर्ड, संदिग्ध सोशल नेटवर्क और मोबाइल डाटा के माध्यम से अपराध के उस चेहरे को बेनकाब किया, जो ‘पीर’ की पोशाक में ‘पैसों के पैगंबर’ बने घूम रहा था। एसटीएफ ने दिखा दिया कि उत्तर प्रदेश अब धर्मांतरण के दलालों का नहीं, धर्म की गरिमा के रक्षकों का प्रदेश है। यह केवल गिरफ्तारी नहीं, अंतःकरण की सुरक्षा थी। यह दिखाता है कि यूपी पुलिस अब अपराध पर नहीं, अस्मिता पर अतिक्रमण को रोकने में सक्षम है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में ‘लव जिहाद’, अवैध धर्मांतरण और विदेशी फंडेड षड्यंत्रों के लिए कोई स्थान नहीं है। इधर, UP STF और ATS की इस संयुक्त कार्रवाई ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उत्तर प्रदेश की धरती पर न प्रेम के नाम पर प्रपंच चलेगा, न पंथ के नाम पर षड्यंत्र पनपेगा। यह केवल गिरफ़्तारी नहीं, एक चेतावनी है कि अब कानून केवल किताब नहीं, धर्म और न्याय का कटिबंध है।

छांगुर बाबा की गिरफ्तारी कोई अंत नहीं, यह शुरुआत है उस प्रक्रिया की, जहां सांस्कृतिक सुरक्षा, महिला अस्मिता और राष्ट्र की चेतना को एक सूत्र में बांधने का प्रयास हो रहा है। उत्तर प्रदेश यह संदेश दे चुका है कि अब ‘आस्था’ के नाम पर ‘अधर्म’ नहीं पनपेगा।

यह लड़ाई केवल एक गिरोह के विरुद्ध नहीं थी। यह संघर्ष था उस मानसिक उपनिवेशवाद के विरुद्ध, जो भारत को तोड़ना चाहता है, भीतर से, बगैर गोली के। पर योगी सरकार और उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब न मजहबी मशीनरी चलेगी, न मजहबी मक्कारी।

कांवड़ यात्रा : आस्था, त्याग और सामाजिक समरसता का दिव्य संगम

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कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों की एक महत्वपूर्ण वार्षिक तीर्थयात्रा है, जो श्रावण मास (आमतौर पर जुलाई-अगस्त) में आयोजित होती है। लाखों श्रद्धालु, जिन्हें कांवड़िया या शिव भक्त कहा जाता है, इस दौरान पवित्र गंगा नदी से जल भरकर लाते हैं और उसे अपने स्थानीय या किसी प्रसिद्ध शिव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। यह यात्रा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि भारतीय संस्कृति, समाज और विरासत का भी एक अभिन्न अंग है, जो श्रद्धा, त्याग, तपस्या और सामाजिक भावना का एक अनूठा परिचायक है। दुर्भाग्यवश, कुछ लोग इस पवित्र यात्रा को समाज में जातिगत भेदभाव और वैमनस्य फैलाने के लिए नकारात्मक रूप से प्रचारित करने का प्रयास करते हैं। सच्चाई इसके विपरीत है, कांवड़ यात्रा वास्तव में सामाजिक एकता, सद्भाव और समावेश का एक शक्तिशाली प्रतीक है। यह एक ऐसा दिव्य अवसर है जब श्रद्धालु सांसारिक बंधनों को त्यागकर, त्याग और तपस्या के मार्ग पर चलते हुए आध्यात्मिक शांति और परमात्मा के साथ अपने संबंध को महसूस करते हैं। आइए, इस पवित्र यात्रा को हृदय से स्वीकार करें, अपनी आस्था को जागृत करें और भगवान शिव के चरणों में पूर्ण समर्पण के भाव से आगे बढ़ें। यही सच्ची भक्ति है और यही इस यात्रा का परम उद्देश्य है, जो हमारे जीवन को धन्य और सार्थक बना सकता है।

🟧 *प्रारंभ और पौराणिक संदर्भ :*

कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब हुई, इसके बारे में कई पौराणिक मान्यताएं हैं:

• *श्रवण कुमार :* रामायण में उल्लेख मिलता है कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा की थी, ताकि वे अपने नेत्रहीन माता-पिता को हरिद्वार में गंगा स्नान करा सकें।

• *भगवान परशुराम :* एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम पहले कांवड़िया थे, जिन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था।

• *दशानन रावण :* शिव पुराणों और अन्य पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंकापति रावण को भी पहला कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव जब समुद्र मंथन से निकले विष को पीकर व्याकुल हो गए थे, तब रावण ने हिमालय से गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था जिससे उन्हें शांति मिली थी। कुछ लोक कथाओं और मंदिर परंपराओं में भी रावण द्वारा गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करने का उल्लेख मिलता है।

• *समुद्र मंथन :* कांवड़ यात्रा का संबंध समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है, जिसके अनुसार देवताओं ने भगवान शिव को विष के प्रभाव से बचाने के लिए गंगाजल अर्पित किया था।

इन कथाओं से प्रेरणा लेकर, भक्त सदियों से कांवड़ यात्रा करते आ रहे हैं।

🟧 *कांवड़ यात्रा का कारण और महत्व :*

कांवड़ यात्रा का मूल उद्देश्य भगवान शिव के प्रति अपनी गहरी भक्ति और श्रद्धा को व्यक्त करना है। गंगाजल को शिवलिंग पर अर्पित करना एक पवित्र कार्य माना जाता है, जिससे भक्तों को पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह यात्रा आत्म-शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का भी एक माध्यम है। हरिद्वार के अलावा, कई श्रद्धालु सुल्तानगंज (बिहार) से भी जल भरकर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बैद्यनाथ धाम (देवघर, झारखण्ड) की यात्रा करते हैं। इस मार्ग पर श्रद्धालु सुईया पहाड़ पर नंगे पांव यात्रा करते हुए अपनी श्रद्धा और तपस्या का परिचय देते हैं।

🟧 *कांवड़ के प्रकार और उनका महत्व :*

कांवड़ यात्रा में विभिन्न प्रकार की कांवड़ों का उपयोग किया जाता है, जिनका अपना विशेष महत्व है:

• *सामान्य कांवड़ :* भक्त पैदल चलते हैं और आवश्यकतानुसार विश्राम करते हुए गंगाजल ले जाते हैं।

• *डाक कांवड़ :* भक्त बिना रुके, लगातार दौड़ते हुए गंगाजल को अपने गंतव्य तक पहुंचाते हैं, जो कठिन तपस्या का प्रतीक है।

• *खड़ी कांवड़ :* भक्त चलते समय कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते; विश्राम के दौरान साथी इसे कंधों पर रखते हैं।

• *बैठी कांवड़ :* भक्त कुछ समय बैठकर आराम कर सकते हैं, लेकिन कांवड़ पास ही रखते हैं।

• *दंडी कांवड़ :* भक्त दंडवत प्रणाम करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, यह सबसे कठिन प्रकार की यात्रा है।

🟧 *धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और विरासत पहलू :*

• *धार्मिक महत्व :* कांवड़ यात्रा भगवान शिव की आराधना का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसे करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।

• *सांस्कृतिक महत्व :* केसरिया वस्त्र पहने और ‘बोल बम’ के नारे लगाते लाखों भक्तों का दृश्य भारतीय संस्कृति की विविधता और धार्मिक उत्साह को दर्शाता है।

• *सामाजिक महत्व :* कांवड़ यात्रा सामाजिक एकता और समरसता का प्रतीक है, जहाँ विभिन्न जाति, पंथ और वर्ग के लोग बिना भेदभाव के ‘शिव भक्त’ के रूप में एक साथ यात्रा करते हैं। स्वयंसेवी संगठन और स्थानीय लोग यात्रियों की सेवा करते हैं, जिससे सामाजिक सहयोग और सद्भाव बढ़ता है। विभिन्न समुदायों द्वारा यात्रियों के लिए शिविर लगाना इसकी समावेशी प्रकृति का प्रमाण है।

• *विरासत 🙁 यह यात्रा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, हमारी प्राचीन धार्मिक परंपराओं को जीवित रखती है और युवा पीढ़ी को उनके सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ती है।

🟧 *वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ :*

कांवड़ यात्रा में लंबी दूरी तक पैदल चलना शारीरिक व्यायाम है, जो मांसपेशियों को मजबूत करता है और हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। यह मानसिक शांति और सकारात्मकता भी प्रदान करता है।

🟧 *श्रद्धालु द्वारा किया जाने वाला त्याग, तपस्या, अनुष्ठान और सावधानी :*

कांवड़ यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालु आरामदायक जीवन छोड़कर कठोर नियमों का पालन करते हैं। वे पैदल यात्रा करते हैं, मौसम की चुनौतियों का सामना करते हैं और जमीन पर सोते हैं। चमड़े की वस्तुओं का उपयोग वर्जित होता है। गंगाजल भरने से पहले और बाद में स्नान, पवित्र मंत्रों का जाप और भगवान शिव की पूजा महत्वपूर्ण अनुष्ठान हैं। यात्रा के दौरान स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखना, पर्याप्त पानी पीना और सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करना आवश्यक है।

🟧 *नशा, मांसाहार, कटु बचन से बचना 🙁

यात्रा में पूर्ण पवित्रता बनाए रखने के लिए नशा, मांसाहार और कटु वचनों का प्रयोग वर्जित है। भक्तों को सात्विक भोजन करना और विचारों को शुद्ध रखना होता है।

🟧 *बोल बम का महत्व :*

‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति दर्शाते हैं, यात्रियों को ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं और माहौल को आध्यात्मिक बनाते हैं।

🟧 *श्रद्धालुओं के अनुभव :*

कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों के अनुभव गहरे और भावनात्मक होते हैं, जो उनके जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, भगवान शिव के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करते हैं।

🟧 *नशा, गैर-शाकाहारी / तामसी भोजन, कटु बचन से बचना :*

यात्रा में पूर्ण पवित्रता बनाए रखने के लिए नशा, गैर-शाकाहारी भोजन और कटु वचनों का प्रयोग वर्जित है। भक्तों को सात्विक भोजन करना और विचारों को शुद्ध रखना होता है।

🟧 *बोल बम का महत्व :*

‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति दर्शाते हैं, यात्रियों को ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं और माहौल को आध्यात्मिक बनाते हैं।

🟧 *बोल बम का महत्व :*

‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति दर्शाते हैं, यात्रियों को ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं और माहौल को आध्यात्मिक बनाते हैं।

🟧 *श्रद्धालुओं के अनुभव :*

कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों के अनुभव गहरे और भावनात्मक होते हैं, जो उनके जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, भगवान शिव के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करते हैं।

🟧 *रसद और व्यवस्था :*

सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए शिविर, सुरक्षा, परिवहन और चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करती हैं, जहाँ सभी का स्वागत किया जाता है।

🟧 *महिलाओं और बच्चों की भागीदारी :*

हाल के वर्षों में महिलाओं और बच्चों की भागीदारी बढ़ी है, जिनके लिए सुरक्षा और आराम की विशेष व्यवस्थाएँ की जाती हैं।

🟧 *आधुनिकता और कांवड़ यात्रा :*

आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ा है, लेकिन यात्रा का मूल भाव और श्रद्धालुओं की आस्था आज भी अटूट है।

🟧 *पर्यावरण संरक्षण :*

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं और आयोजकों द्वारा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। अब पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को अपनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जैसे कि कचरे का उचित निपटान और प्लास्टिक का कम उपयोग। कई स्वयंसेवी संगठन सक्रिय रूप से यात्रियों को पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में शिक्षित कर रहे हैं और स्वच्छता बनाए रखने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं, जिससे इस पवित्र यात्रा का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सके।

🟧 *श्रद्धा और आस्था का दिव्य पथ :*

कांवड़ यात्रा मूल रूप से एक धार्मिक तीर्थयात्रा है जो श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और भगवान शिव के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इस यात्रा का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति और पवित्रता प्राप्त करना है। सभी यात्रियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इस यात्रा को धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा के साथ करें, न कि इसे मात्र मनोरंजन या पर्यटन का साधन समझें। यात्रा के दौरान मर्यादा बनाए रखना, धार्मिक नियमों का पालन करना और भगवान शिव के प्रति पूर्ण भक्ति भाव रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह त्याग, तपस्या और विश्वास का मार्ग है, जिसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और ईश्वर के साथ अपने संबंध को मजबूत करना है।

🟧 *सामाजिक संदेश :*

कांवड़ यात्रा एकता और सद्भाव का महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश देती है, यह दिखाती है कि जब लोग आस्था के बंधन में बंधते हैं, तो वे सभी प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठकर लोगों को एक साथ आ सकते हैं, सांप्रदायिक एकता और सामाजिक समरसता का प्रदर्शन करती है। यह यात्रा विभिन्न राज्यों के श्रद्धालुओं को एक साथ लाकर राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करती है। स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, और स्वयंसेवकों का नेटवर्क अक्सर आपदा प्रबंधन में मदद करता है। यह युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा देती है और श्रद्धालुओं में सहनशीलता व अनुशासन जैसे गुणों का विकास करती है।

🟧 *निष्कर्ष :*

कांवड़ यात्रा एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव है जो लाखों भक्तों को भगवान शिव के करीब लाता है। यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों का जीवंत प्रतिनिधित्व है। आस्था, त्याग और समरसता के इस संगम में भाग लेकर श्रद्धालु आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ मजबूत सामाजिक बंधन का भी अनुभव करते हैं। नकारात्मक प्रचार के बावजूद, यह यात्रा सामाजिक एकता और सद्भाव का शक्तिशाली प्रतीक बनी हुई है और हमारी धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगी।

✍️अखिलेश

हिम संवाद 2025 और अरुणाचल यात्रा

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सर्जना शर्मा

मैं —डू यू हैव कांब
महिला दुकानदार हिंदी में – आपको कंघी चाहिए हां है मेरे पास है बीस रुपए की है।

ईटानगर में मेरे अंग्रेजी में पूछे गए सवाल का जवाब मुझे स्थानीय महिला इतनी खांटी हिंदी में देगी मुझे उम्मीद नहीं थी । पूर्वोत्तर भारत के सुदूर प्रांत अरुणाचल के लोगों ने सचमुच मुझे हैरान किया यहां हर व्यक्ति शुद्ध हिंदी बोलता है।किसी को फोन करो तो फोन में मधुर हिंदी फिल्मी गीत सुनायी देते हैं। बहुत खुशी हुई दिल को ये जानकार कि जिस राज्य में 26 जनजातियां रहतीं हैं उनको एकता की डोर में पिरोती है हिंदी। मैं चार दिन ईटानगर में रही किसी के दिल में हिंदी के प्रति नफरत नहीं देखी। दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, केरल में विशेष रूप से हिंदीबोलना अपराध है वहां के लोगों की नजर में। सबसे बुरा हाल तमिलनाडु का है।

जैसे ही आप चेन्नई एयरपोर्ट पर उतरते हैं सबसे पहली मुलाकात होती है टैक्सी वाले से भूल से यदि आपने हिंदी में कुछ पूछ लिया तो वो हाथ नचा नचा कर गुस्से से बोलेगा – हिंदी नहीं हिंदी नहीं । कोई दुकानदार बस चालक आपसे हिंदी में बात नहीं करेगा। और तो छोड़िए हिंदी को लेकर इतनी ज्यादा राजनीति है कि डीएमके के एक राज्यसभा सांसद आपके हिंदी में पूछे गए सवाल का उत्तर हमेशा अंग्रेजी में देते हैं आप यदि कह दो हिंदी में बाइट दे दो वो कहते हैं – no हिंदी ,ओनली इंग्लिश। जबकि उनको बहुत अच्छी हिंदी आती है सांसदों की पार्टियों में वे हिंदी फिल्मों के गाने बहुत तरन्नुम में गाते हैं। केरल का भी यही हाल है कर्नाटक में इतना बुरा हाल नहीं था अब वहां भी हिंदी पर राजनीति हो रही है। अब तो महाराष्ट्र जो कि हिंदी सिनेमा की कमाई खाता है वहां भी ठाकरे बंधुओं ने हिंदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

मुझे समझ नहीं आता हिंदी ही क्यों किसी भी भारतीय भाषा का विरोध क्यों होना चाहिए। भारत विविधताओं से भरा देश है हम कितने सौभाग्यसाली हैं ऐसे देश में पैदा हुए हैं । जहां इतनी सारी भाषाएं हैं बोलियां हैं । मेरा बस चले तो में हर भाषा सीख लूं । अभी हिंदी पंजाबी , हरियाणवी ,हिमाचली ,मारवाडी भाषा बोल लेती हूं । बांग्ला गुजराती मराठी बोल नहीं सकती लेकिन समझ लेती हूं । आप को शायद यकीन न हो मेरे पास भारत के अनेक प्रांतों की भाषाओं केvभजन हैं जिनकों में बहुत चाव से सुनती हूं । असम के बिहू गीत और भजन , बंगाल के बाउलगीत , बांग्ला में चैतन्य महाप्रभु के भजन , भगवान कृष्ण के भजन , सबसे सुंदर हैमायापुर इस्कॉन की तुलसी आरती – तुलसी कृष्ण प्रेयसी नमो नम पता नहीं कितनी बारमैं सुनती हूं मन भीग भीग जाता है आप भी कभी सुनिए । गुजरात की प्रीति गज्जर के भजनआंखों में आंसू ला देते हैं। रसभीना राय रणछोड़ वसो म्हारा रूदया मां (रस भीनाराय रणछोड मेरे हृदय में बसो) जब दिल करता है ये भजन सुनती हूं । गुजरात के हेमंतचौहान को भगवान ने दृष्टि नहीं दी लेकिन इतना खनकदार और मधुर स्वर दिया है कि आपबस सुनते ही रहोगे सुनते ही रहोगे । म्हारा घट में बिराजता श्री नाथ जी बृंदा जीमहाप्रभु जी , पावागढ़ की काली मां के भजन सुनिए उनके – पांखिडा रे उडी जाओ पावा गढ़ रे । भगवान कृष्ण के भजन गुजरातका कोई गायक न गाए सा कैसा हो सकता है – जय रणछोड़ जय रणछोड़ माखन चोर , प्रथम वेला स्मरिए रे स्वामी तैने सूंडावाल ( गणपति) आप मेरी बात माने तो सुनिए इनके भजन आपको गुजराती भाषा से प्यार हो जाएगा । मैं पंजाबी लोगों के बीचपली बढी हूं इसलिए पंजाबी बोलने समझने पंजाबी गीत गाने सुनने में बहुत मजा आता है। सुरेंद्र कौर प्रकाश कौर के लोक गीत सुन सुन कर बड़े हुए जो आज भी हर शादी ब्याहमें गाए जाते हैं। काला श्याह काला मेरा काला ई सरदार गौरयां नूं दफा करो मैं आपतिल्ले दी तार काला श्याह काला, लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया आओ सामनेकोलो दी रूस के लंघ माहिया।

गुरदास मान का छल्ला, जुगनी, ट्प्पे। शब्द कीर्तन भी मैं बहुत सुनती हूं – जपुजी साहिब, चौपाई साहिब, दुख भंजन साहिब और अन्य बहुत से शब्द इतनी सुंदर मधुर गुरबाणी जब भी दिल बहुत उदास हो विचलित हो शब्द सुनिए दिल में अमृत रस की बौछार होगी । भाईमनजिंदर सिंह जी अमृतसर वाले , भाई हरजिंदर सिंह जी श्रीनगर वाले, भाई मेहताब सिंहजलंधर वाले भाई रविंदर सिंह हजूरी रागी श्री दरबार साहिब अमृतसर वाले कभी इनके औरअन्य सिख रागियों का शब्द कीर्तन सुनिए भाषा की दीवारें अपने आप गिर जाएगी । हरियाणा की रागिनियां ,राजस्थान के भक्ति गीत और लोकगीत मांगणिया गायक जब गाते हैं तो सुनने वाले सब कुछ भूलजाते हैं और उनके पैर थिरक उठते हैं । होलिया में उडे रे गुलाल तो हर किसी की जुबान परहै . म्हारो पल्लो लटको जरा सा टेढ़ों हो जा बालमा । बस दिल को एक बार बड़ा किजिए भारतकी हर भाषा से प्यार हो जाएगा आपको। भगवानजगन्नाथ के भजन उड़िया में सुनिए पंडित सूर्य नारायण रथ के भजन और जगन्न नाथ अष्टक सुनिए। भोजपुरी गीत तो बॉलीवुड में भी हिटरहे हैं हम सब यदा कदा गुनगुनाते हैं । महाराष्ट्र में पंडित भीमसेन जोशी, किशोरीअमोनकर जैसे बड़े शास्त्रीय गायक हैं तो सुरेश वाडेकर जैसे सुगम संगीत गायकों केअभंग सुनिए अजीत कडकडे अहिल्या फड़के को सुनिए। आप भी विट्ठला विट्ठला की माला जपने लगेंगे । दक्षिण भारतीय गायक कर्नाटक संगीतशैली में गाते हैं जबकि देश के बाकी हिस्से में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन शैलीहै । सुब्बालक्ष्मी के स्वर में विष्णु सहस्त्रनाम नहीं सुना तो क्या सुना , भजगोविंदम् और सुप्रभताम नहीं सुना तो संगीत प्रेम अधूरा है। मलयाली गायक येसुदास ने अय्यप्पा के लिए जो भजन गाए हैं उनका कोई तोड़नहीं है यकीन मानिए जब आप उनका — हरिवासनं विश्वमोहनम् , हरिदधीश्वरमर्जुनमणडनम्प्रणत सारणम् शरणम् अय्यपा स्वामी शरणम् अय्यप्पा ।

सूची बहुत लंबी है जी न्यूज में जबपांच साल तक धर्म संस्कृति पर मंथन कार्यक्रम बनाया तो भारत के हर प्रांत केत्यौहार व्रत उपवास तीर्थ स्थान दिखाते थे सबके भजन भी मंगवाते थे । जब हर प्रांतके गायकों को सुना तो लगा कि भाषा की दीवार इतनी बड़ी नहीं है जरा सा प्रयास जरा साप्यार जरा सा अपनापन मन में लाना होगा भारत की सब भाषाएं अपनी लगेगी । हम हिंदीभाषियों की मां हिंदी है तो बाकी सभी भाषाएं हमारी मौसियां हैं यानी मां जैसी हैं। भाषा की राजनीति कर रहे नेताओं की बात न सुने अपने एक भारत श्रेष्ठ भारत के दिलकी धड़कन सुनें । भारत को एक जन्म में समझ पाना कठिन हैं सौ जन्म लेनें होंगेभारत में भारत को समझने के लिए । मैं सौ क्या हजार जन्म भी अपने विविधताओं से भरे भारत में लेना चाहूंगी । इस लेख में बहुत कुछ लिखना रह गयाहै इतना कुछ लिखने को हैं लेकिन अब के लिए बस इतना ही । अरुणाचल यात्रा से प्रेरितहो कर उनका हिंदी प्रेम देख कर लगा कि यदि ये लोग हिंदी को इतना प्यार कर सकते हैंतो देश के बाकी गैर हिंदी भाषी क्यों नहीं कर सकते ।

महानगर से लेकर नगर और शहर तक अर्बन डेवलपमेंट विभाग की यह जिम्मेवारी होनी चाहिए कि किस शहर में कितनी नई गाड़ियां बेची जा सकती हैं और कितनी गाड़ियां अब सड़क पर चलने की स्थिति में नहीं है। उन्हें हटाया जा सकता है। इसका हिसाब किताब रखे।

भाषायी विवादों के पीछे विभाजनकारी षड्यंत्र

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

संत ज्ञानेश्वर और हिंदवी स्वराज्य प्रणेता छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यभूमि में राजनीतिक वितंडावादियों ने ‘भाषा’ के नाम पर जिस अराजकता का परिचय दिया।हिंसा का मार्ग अपनाते हुए विभाजनकारी सोच का उत्पात मचाया। वह हर किसी को अंदर से झकझोर देने वाला षड्यंत्र है। वस्तुत: ऐसा करने वालों के मूल में ‘मराठी अस्मिता’ का भाव नहीं है। बल्कि वे भारत की विराट पहचान को मिटाने की कुत्सित सोच से ग्रसित हैं। आप सोचिए कि जिस महान महाराष्ट्र की भूमि में – संत नामदेव , संत एकनाथ, संत तुकाराम महाराज, संत बहिणाबाई,संत जनाबाई, संत कान्होपात्रा और समर्थ रामदास, संत गाडगे जैसी महान विभूतियों ने राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को स्थापित किया हो। मूल्यों, संस्कारों और आदर्शों का मार्ग दिखाया हो। उस भूमि से अगर अलगाव के उत्पाती कृत्य आ रहे हों तो यह निश्चित तौर पर महाराष्ट्र की छवि को धूमिल करने का षड्यंत्र ही सिद्ध होता है।‌ जो ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर समाज में विभाजन फैला रहे हैं। विराट हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र कर रहे हैं। वे महाराष्ट्र के आदर्शों की कही या लिखी गई — ऐसी एक पंक्ति लाकर समाज के मध्य दिखला दें। जो किसी भी प्रकार के विभाजन की बात करती हो। ऐसे में क्या यह अक्षम्य अपराध नहीं है? क्या महाराष्ट्र की महान परंपरा को आघात पहुंचाने वालों को समाज स्वीकार करेगा?

ईश्वरीय निमित्त वश मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य स्थापना के 350 वें वर्ष पर एक ग्रंथ के संपादन का सौभाग्य मिला। उस समय मैंने छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़े कई ग्रंथों का अध्ययन किया।‌विभिन्न विद्वानों के विचारों को पढ़ा और सुना। लेकिन एक भी अंश ऐसा नहीं पाया जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्थानीयता, प्रांतीयता की परिधि में स्वयं को समेटा हो। उनके कार्यों और विचारों की दृष्टि सर्वदा अखिल भारतीय-अखंड भारत वर्ष पर ही केंद्रित रही।‌ शिवाजी महाराज ने जब स्वराज्य की स्थापना की तो उसका नाम उन्होंने ‘महाराष्ट्र’ या मराठी राज्य नहीं किया। अपितु उन्होंने उसका नामकरण’हिंदवी स्वराज्य’ किया। उन्होंने स्वराज्य के संचालन के लिए जब ‘राज व्यवहार कोश’ का निर्माण कराया।‌उस समय उन्होंने अरबी फ़ारसी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और मराठी के शब्दों का शब्दकोष बनवाया। इसी प्रकार शिवाजी महाराज की राजमुद्रा में ‘संस्कृत’ का प्रयोग किया गया। उनकी राजमुद्रा में लिखा रहता था—
“प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववन्दिता ।
शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते ।।”

अभिप्रायत: छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस महान हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को स्थापित किया। अब उस पर ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर आघात किया जा रहा है। विराट हिंदू पहचान को संकुचित और संकीर्ण दायरों में समेटने का अक्षम्य अपराध किया जा रहा है। ऐसा करने वाले ये वही लोग हैं जिन्हें ‘मराठी मानुष’ ने चुनावों में सिरे से खारिज़ कर दिया है। क्योंकि महाराष्ट्र की जनता अपनी महान विरासत के साथ राष्ट्रीय विचारों के साथ एकात्म है।उसे किसी भी हाल में विभाजन स्वीकार नहीं है। ऐसे में विभाजनकारी मानसिकता से ग्रस्त लोग और राजनेता; समाज की एकता को खंडित करने में जुट गए हैं। चाहे हिंदी हो, मराठी हो, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ हो या बंगाली हो। संस्कृत हो मलयालम हो, कोंकणी,संथाली या उड़िया हो चाहे पंजाबी हो। याकि कश्मीरी, असमिया, बोडो या डोगरी हो। संथाली, सिंधी, नेपाली हो। सभी भारतीय भाषाएं हमारी हैं। भारत की कोख से जन्मी हर भाषा, बोली और परंपराएं हमारी अमूल्य विरासत हैं। ये किसी व्यक्ति विशेष या राज्य विशेष की संपत्ति नहीं हैं बल्कि हर भारतीय का जीवन मूल्य और संस्कार हैं। इनमें राष्ट्र की महान परंपरा और संस्कृति का अविरल और अक्षुण्ण प्रवाह अंतर्निहित है। जो एक ही धुन सुनाता है जय-जय जय भारत।‌

ऐसे में भला कोई ये दावा कैसे कर सकता है कि— ये मेरी भाषा है-ये तुम्हारी भाषा है? क्या हमारे महापुरुषों और भाषाओं ने किसी भी व्यक्ति, दल या समूह को ऐसे कोई अधिकार दिए हैं? क्या समाज ने कभी भी ऐसे विभाजन को स्वीकार किया है? क्या हमारे संविधान ने ऐसे किसी भी प्रकार के भेदभाव का प्रावधान किया है? इन सबका उत्तर है— नहीं। भारत के कोने-कोने में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी हर भाषा, बोली, परंपराओं के प्रति गहरा आदर और श्रद्धा रखता है। उसे अपनी सभी भाषाओं और सभी परंपराओं से प्रेम है। उसके लिए कुछ भी अपना या पराया नहीं है। हमारे सभी श्रद्धा के केंद्र, आदर्श, महापुरुष और भाषाएं हमें एकता के सूत्रों से गुंफित किए हुए हैं।‌हम सबका मस्तक अपनी महान परंपरा के हर मानबिंदु के समक्ष श्रद्धा से नत होता है। यही तो भारतीय मूल्य और संस्कार हैं। हो सकता है सभी को हर भाषा नहीं आती हो। किसी को सभी भारतीय भाषाएं आती हों। किसी को दो-चार या उससे अधिक भाषाएं आती हों।‌लेकिन इसका अर्थ तो ये नहीं कि — इस आधार पर कोई अपनी श्रेष्ठता का दावा करेगा? किसी के साथ अत्याचार या भेदभाव करेगा। यह तो असह्य है। इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।‌

दूजे जहां तक बात रही ‘हिंदी’ के विरोध की — तो ये कोई नई बात नहीं है। भारत विभाजनकारी शक्तियां ‘हिंदी और हिंदू’ के विरोध से अपना षड्यंत्र शुरू करते हैं और फिर हिंदुस्तान के विरोध में उतर जाते हैं। भारत विभाजनकारी शक्तियों का एक और अंतिम लक्ष्य है भारत राष्ट्र का खंडन करना। इसके लिए वो कभी समाज को भाषा के आधार पर लड़ाएंगे। कभी जाति और महापुरुष के नाम पर लड़ाएंगे।‌कभी क्षेत्रवाद, बोली, पहनावों और परंपराओं के नाम पर समाज के मध्य विभाजन की दीवार खड़ी करेंगे। क्योंकि उन्हें ये पता है कि विराट हिंदू समाज को छोटे-छोटे विभाजनों में फंसाकर आसानी से तोड़ा जा सकता है।लेकिन अगर एक और अंतिम पहचान ‘हिंदू’ है तो वे मुंह की खाएंगे।वे कभी भी हिंदू समाज को कमजोर नहीं कर पाएंगे। बस इसी के निमित्त वो कोई न कोई ऐसा भावनात्मक मुद्दा उठाएंगे जो हिंदू समाज को आपस में ही लड़ा देने वाला हो। वो भावनाओं को उद्वेलित करेंगे। मुद्दा बनाएंगे और समाज में विभाजन के विष फैलाने में जुट जाएंगे। अक्सर जो राजनीतिक दल, नेता या समूह हिंदी या संस्कृत का विरोध करते दिखते हैं। वो क्या कभी विदेशी विशेषकर ‘अंग्रेजी’ भाषा का विरोध करते नज़र आए हैं? क्या कभी आपने ऐसा देखा है कि — वे अंग्रेजी के बायकॉट का अभियान चलाते दिखे हों। आप एक भी उदाहरण नहीं देखेंगे। क्योंकि भाषायी आधार पर समाज में अलगाववाद फैलाने वालों का एजेंडा भारतीय भाषाओं-स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देना नहीं है। बल्कि हिंदी विरोध के नाम पर समाज में विभाजन उत्पन्न करना और ध्रुवीकरण करना है। ताकि उनकी राजनीतिक सत्ता बनी रहे और संपूर्ण हिंदू समाज एकजुट न हो पाए। इतना ही नहीं भाषायी या क्षेत्रीय आधार पर अलगाववाद फैलाने वालों के पीछे कई सारी भारत विरोधी शक्तियां काम करती हैं। जो कभी राजनेताओं के माध्यम से,कभी समूहों के माध्यम से — विभाजन उत्पन्न करती रहती हैं।‌ प्रायः चुनावों के समय इसकी गति बढ़ जाती है। क्या आप ये सब अनुभव करते हैं? अगर हां तो तय मानिए कि ये सब बिल्कुल योजनाबद्ध ढंग से किया जाता है। आपने ध्यान दिया होगा कि—
असमय ही हिंदी विरोध की ये मुहिम कभी इस राज्य से तो कभी उस राज्य से दिखाई देती है। ये सब इसलिए होता है क्योंकि राष्ट्र की अधिसंख्य जनता हिंदी में एकता और राष्ट्रीयता का बोध पाती है। ऐसे में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को व्यक्त करने वाले जितने भी प्रतीक, आदर्श और व्यवहार होंगे। उनके विरोध में अलगाववाद का वातावरण तैयार करना— राष्ट्रद्रोही शक्तियों का उद्देश्य है।‌

इसीलिए हम सबकी सतर्कता और सजगता की महती आवश्यकता है।‌ हम देश के किसी भी हिस्से में रहें। जहां भी पृथकता और अलगाववाद के ये कुकृत्य हों। उनका हमें मुखरता के साथ प्रतिकार करना चाहिए।क्योंकि हम सब भारतवासी — भारत माता की संतान हैं। जो हमारी माता का अपमान करेगा। भारत माता को पीड़ा देने का अपराध करेगा। हम भला उसे कैसे छोड़ सकते हैं? हमारी परंपरा तो यही कहती है न कि— न्यायार्थ अपने बंधु को भी, दंड देना धर्म है।

अतएव हम सबकी जितनी भी भिन्न-भिन्न पहचाने हैं वो सब ‘राष्ट्रीयता’ और हिंदुत्व की छतरी के नीचे ही समवेत होनी चाहिए। एकाकार और एकात्म होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो हम नि:संदेह यह मान लें कि हम किसी बहुत बड़े विभाजनकारी ‘ट्रैप’ का टूल बनते जा रहे हैं।
हमारी सभी भाषाएं, बोलियां, प्रांत, स्थानीयता वेशभूषा सबकुछ राष्ट्र की एकता-अखण्डता को अभिव्यक्त करने वाली हैं। भारत की संस्कृति इतनी विविधवर्णी है कि वह अपने संयोजन में संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है। अनंत कलाएं, अनंत परंपराएं और शैलियां आपको मिलेंगी। लेकिन सबके केन्द्र में सर्वसमावेशी दृष्टि और सृष्टि का दर्शन मिलेगा। आप किसी भी भाषा, बोली या क्षेत्र में जाइए वहां एकता के सूत्र एक मिलेंगे। हमारे आदर्श, मूल्य और संस्कार एक मिलेंगे। कहीं कोई विभाजन नहीं मिलेगा। हां ये ज़रूर हो सकता है कि इनके रुप और अभिव्यक्तियां अलग-अलग हों। लेकिन मूल और ध्येय आपको एक ही मिलेगा जो राष्ट्र को अभिव्यक्त करेगा। अपनी-अपनी परंपराओं, क्षेत्रों , बोलियों और भाषाओं के प्रत्येक आदर्शों को देख लीजिए। कहावतों, मुहावरों और सूक्तियों को देख लीजिए। संतों और विद्वानों को देख लीजिए। उनके विचारों और कार्यों में ‘विराट राष्ट्र’ और एकता, समरसता, बंधुता और प्राणि मात्र के कल्याण की ही भावना मिलेगी। सबमें राष्ट्र की परंपरा का अविरल प्रवाह मिलेगा जो सबको सत्मार्ग की ओर ले जाने वाला है। यही हमारा वैशिष्ट्य है। यही हमारी शक्ति और सामर्थ्य है।‌ लेकिन भारत की यही शक्ति और सामर्थ्य भारत विरोधियों को रास नहीं आ रही है। दुराग्रही कुंठित राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को राष्ट्रीयता का यह विराट स्वरूप पच नहीं पा रहा है। क्योंकि अलगाववाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के नाम पर बने राजनीतिक दलों को जनता ने बारंबार ख़ारिज कर दिया है। ऐसे में राष्ट्रीयता के समस्त मूल्य और आदर्श उनके लिए बाधक सिद्ध हो रहे हैं। इसीलिए वो अपनी खीझ उतारने के लिए किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जा रहे हैं। लेकिन क्या राष्ट्र और समाज उन्हें देख और समझ नहीं रहा है? अगर उन्हें ये भ्रम है तो वो जितना जल्दी हो उसे दूर कर लें। क्योंकि ये राष्ट्र अपने महान आदर्शों और परंपराओं के साथ आगे बढ़ चला है। जो हर विभाजन का मुखर प्रतिकार कर रहा है। एकता की बांसुरी बजाता हुआ—हर भाषा और परंपराओं को अपनाता हुआ नित निरंतर आगे बढ़ रहा है। ये राष्ट्र पाञ्चजन्य का शंखनाद करते हुए समरसता का जीवन जीते हुए नई लीक बनाते की ओर बढ़ चला है।
~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
(‌साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)

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